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                <title> गोपालपुरा माताजी मंदिर- लकवा पीड़ितों की आस्था का केंद्र, 400 साल से अधिक पुराना है चमत्कारी मंदिर  </title>
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                        <![CDATA[यहां नवरात्र के अलावा शनिवार व रविवार को श्रद्धालुओं का तांता।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/gopalpura-mataji-temple---a-center-of-faith-for-those-suffering-from-paralysis--the-miraculous-temple-is-over-400-years-old/article-128300"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(1)45.png" alt=""></a><br /><p> मंडाना। मंडाना के पास गोपालपुरा गांव में स्थित गोपालपुरा माताजी मंदिर लगभग 400 साल पुराना रियासतकालीन मंदिर है, जो बीजासन माता और कंकाली माता के लिए प्रसिद्ध है। इस मंदिर को लकवा (पैरालिसिस) पीड़ितों की आस्था का केंद्र माना जाता है। मंडाना कस्बे से 7 किमी दूर नेशनल हाइवे 52 से 250 मीटर दूर गोपालपुरा गांव मे स्थित है मां राजराजेश्वरी बिजासन माता का चमत्कारी मन्दिर मान्यता है कि है कि लोग यहां रोते रोते आते है व हंसते हंसते जाते है। माँ का ऐसा अद्धभुत चमत्कार है की यहाँ लकवा पैरालाइज अन्य बीमारियां से पीड़ित मरीज ठीक हो जाते है। नवरात्रा के अलावा हर शनिवार व रविवार को श्रद्धालु आते है। </p>
<p><strong> मान्यताएं और महत्व</strong><br />मान्यता है कि शनिवार और रविवार को यहां दर्शन करने से लकवाग्रस्त मरीजों को राहत मिलती है। मरीज माता की परिक्रमा करते हैं और पाठ (मंत्रोच्चार) करते हैं, जिससे स्वास्थ्य में सुधार होने की बात कही जाती है।  भक्त इसे चमत्कारिक स्थल मानते हैं, जहाँ मनोकामनाएं पूरी होती हैं।</p>
<p><strong> मंदिर की विशेषताएँ</strong><br />मंदिर में दो प्रतिमाएँ है। मंदिर में बीजासन माता और कंकाली माता की प्रतिमाएं विराजमान हैं। अखंड हवन भक्तों के सहयोग से यहाँ 24 घंटे अखंड हवन प्रज्वलित रहता है।  रियासतकालीन विरासत यह मंदिर लगभग 400 वर्ष पुराना है और उस समय की स्थापत्य कला की झलक दिखाता है</p>
<p><strong> सेवाएं और सुविधाएं</strong><br /> भंडारा नवरात्र के दौरान प्रतिदिन भंडारे का आयोजन होता है, जिसमें एक हजार से अधिक भक्त प्रसादी ग्रहण करते हैं। प्रतिदिन सुबह 4 बजे मंगला आरती और शाम 7 बजे शयन आरती होती है।  धर्मशाला भक्तों के ठहरने की सुविधा भी उपलब्ध है, जहां लोग 9 दिन तक रहकर आरती और पूजा में भाग लेते हैं। नवरात्र और अन्य पर्वों पर मंदिर परिसर में हजारों की संख्या में भक्त पहुँचते हैं। दूर-दराज से आने वाले लकवा पीड़ित यहाँ दर्शन कर अपनी बीमारी से राहत पाने की आशा रखते हैं।  </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Tue, 30 Sep 2025 14:43:51 +0530</pubDate>
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                <title>बिजासन माता : जहां हर भक्त पाता है विश्वास का संबल, नवरात्र में श्रद्धालुओं का लगता है तांता</title>
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                        <![CDATA[केवल माता की परिक्रमा से ही पीड़ितों को राहत मिलती है।
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/bijasan-mata--where-every-devotee-finds-strength-in-faith--a-throng-of-devotees-gathers-during-navratri/article-128243"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(1)43.png" alt=""></a><br /><p>कसार। कसार में स्थित बिजासन माता मंदिर, जिसे बाग वाली माता मंदिर के नाम से पूरे क्षेत्र में जाना जाता है, श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यहां नवरात्रि ही नहीं बल्कि प्रत्येक शनिवार और रविवार को भी दूर-दराज से बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। इस मंदिर में मां बिजासन के साथ सातों देवियों की प्रतिमाएं एक साथ विराजमान हैं। मान्यता है कि माता के दर्शन मात्र से लकवे और जोड़ों के दर्द जैसी पीड़ाएं दूर हो जाती हैं। विशेषकर लकवे से ग्रसित और सर्पदंश से पीड़ित लोग यहां परिक्रमा कर माता के दरबार में ह्लडोकह्व लगाते हैं। ग्रामीणों के अनुसार, यहां की प्रतिमाएं लगभग 500 वर्ष प्राचीन हैं। पूर्व में यह स्थान घने जंगल से घिरा हुआ था, जहां इमली, जामुन और आम के विशाल वृक्ष लगे हुए थे। इमली के पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर माता की प्राचीन प्रतिमाएं स्थापित थीं, लेकिन इन्हें स्थापित करने वाले कौन थे इसका उल्लेख उपलब्ध नहीं है। बाद में मंदिर का निर्माण जनसहयोग से किया गया। मंदिर के सामने बावन भेरू की प्राचीन प्रतिमा, बाईं ओर मां कंकाली की प्रतिमा, पीछे प्राचीन कुंड में बालाजी की मूर्ति और दार्इं ओर बावड़ी में जाना जींद बाबा का भव्य स्थान स्थित है। नवरात्र में यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। मंदिर पुजारी तुलसीराम प्रजापति ने बताया कि मंदिर के सामने बने सिंह द्वार का निर्माण 5 सितंबर 2019 को श्रद्धालुओं द्वारा कराया गया था। सिंह द्वार के दोनों ओर माता के वाहन शेरों की प्रतिमा तथा बीच में शेरावाली की मूर्ति स्थापित की गई। उन्होंने बताया कि वर्षों से उनका परिवार माता की पूजा करता आ रहा है और नवरात्र में माता की प्रतिमाओं का भव्य श्रृंगार किया जाता है।</p>
<p>केवल परिक्रमा लगाने से ही हो जाते हैं कष्ट दूर : मंदिर में यह मान्यता है कि केवल परिक्रमा लगाने से ही लोगों के कष्ट दूर हो जाते हैं। लकवे से पीड़ित कई लोग यहां दूसरे का सहारा लेकर आते हैं, लेकिन माता के दरबार में हाजिरी लगाने और राख ग्रहण करने से उनकी बीमारी दूर हो जाती है। श्रद्धालु बताते हैं कि यहां न तो कोई झाड़ा-फूंक होता है और न ही किसी पंडित की दवा-टोना। केवल माता की परिक्रमा से ही पीड़ितों को राहत मिलती है। बीमारी से मुक्त होने के बाद श्रद्धालु भोग चढ़ाकर अपनी मन्नत पूरी करते हैं।  </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Mon, 29 Sep 2025 17:06:46 +0530</pubDate>
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                <title> आलनिया माता मंदिर : माता की कृपा से मिलता है संतान सुख और समृद्धि, श्रद्धालुओं की आस्था और श्रद्धा का केंद्र </title>
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                        <![CDATA[यहां यात्रियों को रात में रुकने और विश्राम करने की सुविधा उपलब्ध है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/alaniya-mata-temple--the-blessings-of-the-mother-goddess-bring-happiness-and-prosperity-through-her-children/article-128042"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news43.png" alt=""></a><br /><p>कसार। कोटा झालावाड़ नेशनल हाईवे 52 के समीप स्थित नाहर सिंही माता का विशाल मंदिर, जिसे आलनिया माताजी के नाम से भी जाना जाता है, क्षेत्र में श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि नि:संतान दंपतियों को संतान सहजता से प्राप्त हो जाती है। मंदिर में कालका माता व नाहर सिंही माता की प्राचीन प्रतिमाएं लगभग 500 साल पुरानी हैं। ग्रामीणों के अनुसार, इन्हें बूंदी जिले के मेनाल से दो साधु लेकर आए थे और जंगल में एक पेड़ के नीचे स्थापित किया। धीरे-धीरे आसपास का क्षेत्र बसा और श्रद्धालु दर्शन के लिए आने लगे।</p>
<p><strong>विशाल सिंह द्वार बनाया जाने की मांग: </strong> हाइवे किनारे स्थित आलनिया माता मंदिर पर माता के दर्शन मात्र से ही मानव के दुख दूर हो जाते हैं। नवरात्रि के दौरान दूर-दराज से श्रद्धालुओं का ताता लगता है। रविवार व सोमवार को भी काफी संख्या में भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर समिति ने बताया कि यदि सर्विस रोड के समीप विशाल सिंहद्वार बनाया जाए तो हाईवे से गुजरने वाले यात्रियों की नजरें मंदिर पर पड़ेगी और दर्शनार्थियों की संख्या बढ़ेगी।</p>
<p><strong>परिसर में विशाल भोजनशाला, 10 कमरे, दो वाटर कूलर </strong><br />मंदिर अब ट्रस्ट द्वारा संचालित है। परिसर में विशाल भोजनशाला, 10 कमरे, दो वाटर कूलर और राहगीरों के लिए पेयजल टंकी व शौचालय बनाए गए हैं। यात्रियों को रात में रुकने और विश्राम करने की सुविधा उपलब्ध है।</p>
<p><strong>नौ दिनों तक माता का होता है आकर्षक श्रृंगार </strong><br />श्रद्धालुओं का विश्वास है कि दुनिया की कठिनाइयों से थककर माता के दरबार में आने से मनोकामना पूर्ण होती है। नवरात्रि के दौरान नौ दिनों तक माता का आकर्षक श्रृंगार किया जाता है और दुर्गा शतचंडी पाठ व पालकी नगर भ्रमण आयोजित होता है। मंदिर पुजारी रामनिवास सुमन ने बताया कि उनकी चार पीढ़ियां वर्षों से माता की पूजा अर्चना करती आ रही हैं।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Sat, 27 Sep 2025 14:50:44 +0530</pubDate>
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                <title>डाढ़ देवी माता के ऑनलाइन दर्शन की नहीं मिली सौगात : जंगल में नेटवर्क गुल, ऑनलाइन दर्शन मुश्किल</title>
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                        <![CDATA[देवस्थान विभाग की ओर से ऑनलाइन दर्शन कराने के लिए पांच लाख का बजट स्वीकृत किया गया था।
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/online-darshan-of-dhard-devi-mata-was-not-available--network-failure-in-the-forest--making-online-darshan-difficult/article-127979"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/1127.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शक्ति की भक्ति का पर्व नवरात्र शुरू हो गया है। नवरात्र पर शहर के नजदीक स्थित प्रसिद्ध डाढ़ देवी मंदिर में माता के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी है। देवस्थान विभाग की ओर से डाढ़ देवी माता के आॅनलाइन दर्शन कराने के लिए पांच लाख का बजट स्वीकृत किया गया था। इसके लिए कई बार टैंडर निकाले जा चुके हैं, लेकिन ठेकेदार फर्मो के टैंडर प्रक्रिया में भाग नहीं लेने से आॅनलाइन दर्शन की योजना अधरझूल में लटकी हुई है। माता का मंदिर जंगल के बीच स्थित हैं। इस कारण यहां पर दूरसंचार नेटवर्क पर्याप्त नहीं आ पाता है। जिससे ठेकेदार फर्म इस योजना में रुचि नहीं ले रही है। दो साल बाद भी श्रद्धालुओं को डाढ़ देवी के आॅनलाइन दर्शन की सौगात नहीं मिल पाई है।</p>
<p><strong>नवरात्र पर उमड़ रही श्रद्धालुओं की भीड़</strong><br />कोटा जिले में डाढ़ देवी माता मंदिर काफी प्रसिद्ध स्थल हैं। माता के प्रति कोटा के अलावा दूरदराज रहने वाले श्रद्धालुओं की अगाधा आस्था है। नवरात्र के अवसर पर यहां पर नौ दिनों तक मेला आयोजित किया जाता है। रोजाना यहां पर काफी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन करने के लिए पहुंच रहे हैं। दूरदराज रहने वाले कई श्रद्धालु नवरात्र पर माता के दर्शन करने नहींं आ पाते हैं। ऐसे में आॅनलाइन दर्शन योजना शुरू होने से उनकों सुविधा मिल जाती है। श्रद्धालुओं का कहना है कि नेटवर्क की समस्या के समाधान के लिए प्रयास करना चाहिए ताकि दूरदराज क्षेत्रों में रहने वाले श्रद्धालुओं की दर्शन की आस पूरी हो सके।  </p>
<p><strong>मंदिर परिसर में लग चुके कैमरे</strong><br />देवस्थान विभाग के अधिकारियों के अनुसार इस योजना के तहत पांच लाख रुपए की लागत से डाढ़ देवी माता मंदिर में कैमरे व नेटवर्क से जोड़ने के लिए कई संसाधन लगाने थे। इसके लिए दो बार टैंडर आमंत्रित किए जा चुके हैं, लेकिन दूरसंचार नेटवर्क की समस्या के चलते किसी भी ठेकेदार फर्म ने टैंडर प्रक्रिया में रुझान नहीं दिखाया है। हालांकि योजना के लिए स्वीकृत बजट से मंदिर परिसर में निगरानी के लिए कैमरे लगा दिए गए हैं, लेकिन आॅनलाइन दर्शन की व्यवस्था शुरू नहीं हो पाई है। इस क्षेत्र में नेटवर्क की समस्या ज्यादा रहती है। इससे योजना अभी तक मूर्तरूप नहीं ले पाई है। इस योजना के तहत श्रद्धालुओं को ई-दान की सुविधा भी मिलने वाली थी। </p>
<p><strong>बजट मिला, फिर भी अधरझूल में मामला</strong><br />पिछली कांग्रेस सरकार ने वर्ष 2023 में प्रदेश के प्रमुख धार्मिक स्थलों के आॅनलाइन दर्शन कराने की योजना बनाई थी। इसके तहत देवस्थान विभाग के अधीन आने वाले प्रदेश के पांच प्रमुख मंदिरों को शामिल किया गया था। प्रदेश में आॅनलाइन दर्शन की शुरुआत प्रदेश के ऋषभदेव और गोगामेडी मंदिर से की गई थी। इसके बाद पिछले साल योजना का विस्तार करते हुए प्रदेश के पांच और मंदिरों को शामिल किया गया था। जिसमें कोटा शहर का प्रमुख धार्मिक स्थल डाढ़ देवी माता मंदिर भी शामिल था। यहां आॅनलाइन दर्शन व्यवस्था के लिए सरकार ने पांच लाख रुपए का बजट भी स्वीकृत कर दिया था, लेकिन अभी तक डाढ़ देवी माता के आॅनलाइन दर्शन की सुविधा शुरू नहीं हो पाई।</p>
<p>डाढ़ देवी माता मंदिर में आॅनलाइन दर्शन की योजना काफी अच्छी है। इस सुविधा से दूरदराज में रहने वाले श्रद्धालुओं को माता के आॅनलाइन दर्शन करने की आस पूरी हो जाती। सरकार को यहां पर दूरसंचार नेटवर्क की समस्या का समाधान करना चाहिए।<br /><strong>- मनोहर सिंह, श्रद्धालु</strong></p>
<p>डाढ़ देवी माता मंदिर जंगल में स्थित है। यहां पर पर्याप्त नेटवर्क नहीं आ पाता है। पूर्व में आॅनलाइन दर्शन योजना के लिए टैंडर निकाले गए थे, लेकिन किसी भी ठेकेदार फर्म ने इसमें भाग नहीं लिया। नेटवर्क के अभाव में आॅनलाइन दर्शन की सुविधा शुरू नहीं हो पाई है।   <br /><strong>- राम सिंह, प्रबंधक, देवस्थान विभाग कोटा</strong></p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Sep 2025 16:30:17 +0530</pubDate>
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                <title>देवी पार्वती का स्वरूप मानी जाती हैं बूंदी की चौथ माता, बूंदी राजपरिवार कुलदेवी के रूप में करते है पूजा</title>
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                        <![CDATA[बूंदी में बाणगंगा पहाड़ी पर चौथ माता का मंदिर स्थापित है। 
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/bundi-s-chauth-mata-is-considered-a-form-of-goddess-parvati-and-is-worshipped-by-the-bundi-royal-family-as-their-family-deity/article-127973"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(1)32.png" alt=""></a><br /><p>नमाना रोड़। चौथ माता का मंदिर देवी पार्वती के एक स्वरूप, चौथ माता को समर्पित है। माना जाता है कि देवी चौथ माता का जन्म समुद्र मंथन से हुआ था और वे एक शक्तिशाली देवी मानी जाती हैं। कहा जाता है कि एक बार मणि नामक असुर ने देवी को पराजित कर दिया था, लेकिन चौथ माता ने अपनी शक्तियों से उसे हराया। कहा जाता है कि बूंदी के हाड़ा राजा, सवाई माधोपुर के चौथ का बरवाड़ा स्थित चौथ माता मंदिर में दर्शन के लिए जाते थे,जब राजा वृद्ध हो गए और मंदिर तक पहुंचने का साहस नहीं जुटा पाए, तो उस समय राजा चौथ का बरवाड़ा की चौथ माता की प्रतिकृति बूंदी लेकर आए और बूंदी में बाणगंगा पहाड़ी पर चौथ माता का मंदिर स्थापित किया। आज भी चौथ माता की पूजा बूंदी के राजपरिवार में कुलदेवी के रूप में करते है।</p>
<p>महापर्व नवरात्रि के पहले दिन से ही बूंदी मेंं भक्ति और आस्था का माहौल चरम पर होता है। बूंदी शहर से 5 किलोमीटर दूर अलोद रोड पर रामगढ़ विषधारी टाईगर रिजर्व में स्थित बाणगंगा पहाड़ी (चौथ माता पहाड़ी) पर स्थित चौथ माता के मंदिर स्थित है, जहां भक्तों का तांता लगा रहता है सुबह से ही श्रद्धालु माता के जयकारे लगाते हुए 700 के लगभग सीढ़ियां चढ़कर माता के दरबार में पहुंचते हैं। हर श्रद्धालु के चेहरे पर माता के प्रति गहरी आस्था और मनोकामनाएं पूरी होने की उम्मीद नजर आती है। चौथ माता के आने का एकमात्र सड़क मार्ग है, जो बूंदी शहर से 5 किलोमीटर दूर अलोद रोड पर बाणगंगा में मंदिर स्थिति हैं टेम्पो और बस से श्रद्धालु माता के दर्शन करने आते हैं मंदिर पर जाने के लिए सीसी सड़क और सीढ़ियां चढ़ कर मंदिर पर पहुंचते हैं।</p>
<p><strong>विशेष पूजा-अर्चना और अनुष्ठान</strong><br />नवरात्रि के इन नौ दिनों में मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है। सुबह से शाम तक होने वाली आरती और धार्मिक अनुष्ठान भक्तों को आकर्षित करते हैं। कई भक्त दंडवत प्रणाम करते हुए माता के दरबार में पहुंचते हैं, जो उनकी गहन आस्था का प्रतीक है।</p>
<p><strong>अरावली पर्वत श्रृंखला की बाणगंगा पहाड़ी पर स्थित मंदिर</strong><br /> शहर के भीड़-भाड़ से दूर, बाणगंगा पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर शांत और पवित्र वातावरण प्रदान करता है, नवरात्रि के दौरान मंदिर का शांत माहौल भक्तों के जयकारों और उत्साह से जीवंत हो उठता है। हजारों श्रद्धालु पैदल चलकर माता के दर्शन के लिए आते हैं, जिससे मंदिर पहुंचने वाला रास्ता भक्तिमय हो जाता है।</p>
<p><strong>पर्यटक स्थल बन रहा</strong><br />नवरात्रि के दौरान यह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि एक पर्यटन स्थल भी हैं रास्ते में जैतसागर झील और मन्दिर के सामने शंभू सागर झील का प्राकृतिक सौन्दर्य, मंदिर के ऊपर से रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व की सुरम्य वादियां, जैतसागर झील, शंभुसागर झील, और ठीकरदा तालाब एक साथ नजर आते हैं जो मंदिर की खूबसूरती को कई गुना बढ़ा देते हैं। आसपास के क्षेत्रों से लोग मेले जैसे माहौल का आनंद लेने और माता के दर्शन करने आते हैं। रंग-बिरंगी चुनरियां और फूलों से सजे मंदिर का नजारा बेहद खूबसूरत होता है।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बूंदी</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Sep 2025 15:35:27 +0530</pubDate>
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                <title>बंगाली समाज 27 सितम्बर से रहेगा देवी आराधना में लीन, शहर के विभिन्न स्थानों पर माता की पूजा के लिए सज रहे पांडाल</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[राजधानी में निवास कर रहे पश्चिम बंगाल के लोग 27 सितम्बर से दो अक्टूबर तक मां दुर्गा की आराधना में लीन रहेंगे। ]]>
                    </description>
                
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/bengali-society-will-remain-from-september-27-goddess-aradhana-will/article-127933"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(2)28.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राजधानी में निवास कर रहे पश्चिम बंगाल के लोग 27 सितम्बर से दो अक्टूबर तक मां दुर्गा की आराधना में लीन रहेंगे। आनंद मेले से दुर्गा पूजा महोत्सव का शुभारंभ होगा और सिंदूर उत्सव के साथ समापन होगा। सभी स्थानों पर तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। शहर में विभिन्न स्थानों पर बंगाली समाज के पांडाल बनाए हैं, जहां पर शनिवार को मां दुर्गा को पांडाल में लेकर आएंगे। प्रवासी बंगाली सांस्कृतिक सोसायटी की ओर से 27 सितम्बर से दुर्गा पूजा महोत्सव जय क्लब लॉन में होगा। सोसायटी के अध्यक्ष डॉ. एसके सरकार ने बताया कि महोत्सव के दौरान विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम, सामाजिक पहल और धार्मिक अनुष्ठान पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ संपन्न किए जाएंगे। प्रतिदिन सुबह से रात तक महोत्सव स्थल पर कार्यक्रमों की श्रृंखला आयोजित होगी। आयोजन में समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति सहित अन्य लोग शामिल होंगे। आयोजन की तैयारियां व्यापक स्तर पर की जा रही है। मीडिया समन्वयक दीपाली सरकार ने बताया कि आयोजन में सुबह छह बजे से रात दस बजे तक विभिन्न कार्यक्रम होंगे।</p>
<p><strong>अग्रणी पूजा महोत्सव मनाएगा दुर्गा पूजा :</strong></p>
<p>अग्रणी पूजा महोत्सव संघ की ओर से दादी का फाटक गंगा जमुना कॉलानी में दुर्गा पूजा होगी। महोत्सव संघ के महामंत्री संतोष चटर्जी ने बताया कि 27-28 सितम्बर को डांडिया नाइट्स होगी और उसके बाद बंगाली कल्चर की गतिविधियां होंगी। 27 सितम्बर को महापंचमी पूजा, 29 सितम्बर को महासप्तमी पूजा, 30 सितम्बर को महाअष्टमी पूजा, 1 अक्टूबर को महानवमी पूजा और दो अक्टूबर को दशमी पूजा का आयोजन होगा।</p>
<p><strong>मालवीय नगर में होगी दुर्गा पूजा :</strong></p>
<p>मालवीय नगर सेक्टर-10 स्थित में कालीबाड़ी सोसायटी में दुर्गा पूजा महोत्सव 27 सितंबर से 2 अक्टूबर तक आयोजित होगा। महापंचमी पर 27 सितंबर को शाम सात बजे महोत्सव का शुभारंभ होगा। इस अवसर पर आनंद मेला फूड फेस्टिवल की शुरुआत होगी। दुर्गा प्रतिमा बंगाल की विशेष कलीपाट और बंदन नगर की रोशनी कला के अनुसार सजाई जाएगी। सोसायटी के अध्यक्ष डॉ. सुबीर देबनाथ ने बताया कि महाषष्ठी और महासप्तमी पर सुबह-शाम पूजा, पुष्पांजलि, भोग वितरण, खेल और रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। महाअष्टमी और महानवमी पर कुमारी पूजा, संध्या आरती और पारंपरिक धनुची नृत्य होगा। महादशमी पर 2 अक्टूबर को सिंदूर उत्सव के बाद प्रतिमा विसर्जन किया जाएगा। रात्रि 8 बजे शांति जल एवं विजयादशमी अनुष्ठान के साथ महोत्सव संपन्न होगा।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Sep 2025 11:00:55 +0530</pubDate>
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                <title>करणी माता करती लोगों की मनोकामना पूरी : हजारों श्रद्धालु करते है रोजाना दर्शन, 302 साल पुराना है मंदिर </title>
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                        <![CDATA[चैत्र नवरात्रि में देवी मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ रही है। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/karni-mata-fulfils-the-wishes-of-people--thousands-of-devotees-visit-her-daily/article-127749"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(2)21.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। चैत्र नवरात्रि में देवी मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ रही है। शहर के नांता इलाके में स्थित श्रीकरणी माता मंदिर इन दिनों खास आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। तीन सौ साल से भी पुराना यह मंदिर कोटा के राजपरिवार की आस्था से जुड़ा हुआ है और इसे बीकानेर स्थित प्रसिद्ध करणी माता मंदिर का ही रूप माना जाता है। खास बात यह है कि यहां हर दिन माता का अलग श्रृंगार किया जाता है, जिससे भक्तों को देवी के नए स्वरूप के दर्शन का सौभाग्य मिलता है। नांता स्थित श्रीकरणी माता मंदिर नवरात्रि में श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। 302 साल पुराना यह मंदिर केवल धार्मिक धरोहर ही नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा का प्रतीक भी है। यहां रोज होने वाले अलग-अलग शृंगार भक्तों को देवी के नए स्वरूप के दर्शन कराते है। नवरात्रि के अवसर पर आयोजित अखंड पाठ और रामायण से वातावरण भक्तिमय हो उठता है। राजपरिवार की परंपरा और करणी माता से जुड़ी मान्यताएं इस मंदिर को और भी विशेष बनाती हैं। यह मंदिर सरोवर स्थित है। यहां पानी प्राचीन स्रोत से आता है। हमेशा से यह सरोवर भरा रहता है।</p>
<p><strong>भक्तों को आस्था से जोडती है</strong><br />पुजारी सुरेश शर्मा ने बताया कि करणी माता का मुख्य मंदिर बीकानेर जिले के देशनोक में स्थित है। यहां हजारों की संख्या में चूहे पाए जाते हैं, जिन्हें ह्यकाबाह्ण कहा जाता है। इनकी पूर्ण सुरक्षा की जाती है और इन्हें देवी का प्रसाद माना जाता है। करणी चालीसा में उल्लेख है कि करणी माता के कुल या उनके भक्त मृत्यु के बाद यमलोक न जाकर मूषक रूप में मंदिर में जन्म लेते हैं और फिर अगली बार मनुष्य योनि में आते हैं। यह मान्यता आज भी भक्तों की आस्था को गहराई से जोड़ती है।</p>
<p><strong>करणी माता के साथ पूजते हैं काल भैरव को </strong><br />श्रद्धालुओं के अनुसार मंदिर की स्थापना की कहानी भी बेहद रोचक है। बताया जाता है कि मारवाड़ की राजकुमारी का विवाह कोटा के राजकुमार से हुआ था। विवाह के समय वे अपने साथ करणी माता की प्रतिमा लेकर आई थीं। उस दौर में मारवाड़ की परंपरा थी कि राजकुमारियां विवाह के बाद अपने ससुराल में करणी माता की प्रतिमा लेकर जाती थीं और वहां मंदिर की स्थापना होती थी। इसी परंपरा के तहत कोटा में यह मंदिर स्थापित हुआ। इसी तरह अलवर और उदयपुर में भी करणी माता के मंदिर आज मौजूद हैं। आज भी कोटा का राजपरिवार नवरात्रि में मंदिर पहुंचकर शाही अंदाज में पूजा करता है। उनके साथ पूरा लवाजमा आता है और विधिविधान से करणी माता और काल भैरव की पूजा की जाती है। राजपरिवार की यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और स्थानीय लोग इस मंदिर में बड़ी श्रद्धा से रखते हैं।</p>
<p><strong>हर दिन नया शृंगार, उमड़ता है आस्था का सैलाब</strong><br />इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां करणी माता की प्रतिमा को रोज नए वस्त्र और श्रृंगार से सजाया जाता है। उन्होंने कहा आज जो शृंगार किया है वो कल नहीं दिखेगा। रोजाना नया शृंगार किया जाता है। भक्तों को हर दिन देवी का नया रूप देखने को मिलता है। यह परंपरा कई दशकों से चली आ रही है। पुजारी सुरेश शर्मा का कहना है कि यह परंपरा भक्तों की आस्था को और गहरा करती है। नवरात्रि के दौरान मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। सुबह से ही दर्शन के लिए कतारें लग जाती हैं। विशेष श्रृंगार, भजन-कीर्तन और दुर्गा सप्तशती पाठ से मंदिर परिसर भक्ति और श्रद्धा से गूंजता रहता है।</p>
<p><strong>नवरात्रि में अखंड पाठ और रामायण</strong><br />नवरात्रि के अवसर पर मंदिर में विशेष आयोजन किए जाते हैं। स्थापना दिवस से ही दुर्गा सप्तशती का अखंड पाठ शुरू हो जाता है। प्रतिदिन एक आचार्य इसका पाठ करते हैं। छठे दिन रामायण का पाठ आरंभ होता है और यह अखंड रामायण अष्टमी तक चलता है। इसके समापन के बाद हवन और कन्या पूजन भी किया जाता है। इन धार्मिक आयोजनों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। सुबह और शाम आरती के समय मंदिर परिसर भक्ति रस में डूब जाता है।</p>
<p><strong>302 साल पुराना मंदिर, राजपरिवार से जुड़ी है स्थापना की गाथा</strong><br />करीब 40 वर्षों से इस मंदिर में देखरेख व पूजा-पाठ कर रहे पुजारी सुरेश शर्मा ने बताया कि श्रीकरणी माता मंदिर की स्थापना विक्रम संवत 1778 में आसोज नवरात्र की सप्तमी को की गई थी। इस हिसाब से मंदिर को स्थापित हुए 302 साल पूरे हो चुके हैं। इस अवसर पर हर साल कोटा का राजपरिवार विशेष पूजा-अर्चना करने के लिए यहां पहुंचता है। पूरे लवाजमे और शाही अंदाज में राजपरिवार नांता के काल भैरव और करणी माता की पूजा करता है। माना जाता है कि कोटा के राजपरिवार ने अपने पूर्वजों की परंपरा को निभाते हुए इस मंदिर की स्थापना की थी। आज भी यह परंपरा जीवंत है और नवरात्र में मंदिर परिसर में विशेष आयोजन होते हैं। यह मंदिर देवस्थान विभाग के अधीन है।</p>
<p><strong>देवस्थान विभाग और केडीए के अधीन व्यवस्था</strong><br />वर्तमान में यह मंदिर देवस्थान विभाग के अधीन आ चुका है। वहीं मंदिर परिसर का सुंदर गार्डन नगर विकास न्यास (यूआईटी) की जिम्मेदारी में है। गार्डन की देखरेख और सुरक्षा का जिम्मा यूआईटी के पास है। यहां पर भक्तों की सुरक्षा के लिए 24 घंटे होमगार्ड भी तैनात रहते हैं।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Sep 2025 14:26:43 +0530</pubDate>
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                <title>इस नवरात्रि अपने मन में बैठे महिषासुर का नाश करें</title>
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                        <![CDATA[भारत अपनी प्राचीन संस्कृति और विविध पर्व-त्योहारों के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/destroy-mahishasura-sitting-in-your-mind-this-navratri/article-127760"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(2)20.png" alt=""></a><br /><p>भारत अपनी प्राचीन संस्कृति और विविध पर्व-त्योहारों के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यहां प्रत्येक त्योहार केवल एक सामाजिक या धार्मिक आयोजन नहीं होता, बल्कि उसमें कोई गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ छुपा होता है। परंतु खेद की बात यह है कि आज के समय में बहुत कम लोग ऐसे हैं, जो इन त्योहारों के पीछे छिपे गहरे रहस्यों को समझते हैं। नवरात्रि भी ऐसा ही एक पर्व है जिसे आश्विन मास की शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक बड़े ही उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। यह पर्व मां दुर्गा, मां लक्ष्मी, मां सरस्वती जैसी शक्तियों की आराधना का प्रतीक माना जाता है। लोग घरों में मिट्टी का कलश स्थापित करते हैं, अखंड दीप जलाया जाता है, कन्याओं का पूजन किया जाता है, उपवास रखे जाते हैं और माता का जागरण होता है। यह एकमात्र ऐसा पर्व है, जहां लगातार 9 दिनों तक स्त्री शक्ति के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है।</p>
<p><strong>आध्यात्मिक रहस्य :</strong></p>
<p>क्या कभी हमने यह सोचा है कि ये देवी-स्वरूप वास्तव में कौन हैं नवरात्रि के पीछे छिपे आध्यात्मिक रहस्य क्या हैं। इन सवालों के उत्तर हमें उन पौराणिक आख्यानों में मिलते हैं, जिन्हें हम कथा के रूप में सुनते हैं-जैसे कि महिषासुर वध की कथा। इस कथा के अनुसार, जब महिषासुर नामक असुर ने देवताओं को पराजित कर दिया, तब त्रिदेवों की सामूहिक शक्ति से आदि शक्ति का प्रकट रूप हुआ-जो अष्टभुजा, त्रिनेत्री और दिव्य शस्त्रों से सुसज्जित थीं। उन्होंने महिषासुर का वध किया और देवताओं को मुक्त कराया। इसी कारण उन्हें महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है। यदि इस आख्यान को गहराई से देखा जाए, तो यह केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक कहानी नहीं है, बल्कि इसमें एक गहरा आध्यात्मिक रूप छिपा है। महिषासुर का तात्पर्य किसी विशेष व्यक्ति से नहीं, बल्कि एक मनोवृत्ति से है, महिष अर्थात भैंसा, जो मंद बुद्धि, तमोगुण और आलस्य का प्रतीक है। वही तमसिक प्रवृत्तियां हमारे मन में भी बसती हैं, जो हमें आत्मज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति से दूर रखती हैं। ऐसे ही अन्य असुर भी प्रतीकात्मक हैं -मधु और कैटभ राग और द्वेष के प्रतीक हैं। धूम्रलोचन यानी धुएं जैसी दृष्टि ,जो ईर्ष्या और भ्रम का सूचक है। शुम्भ और निशुम्भ हिंसा और द्वेष के प्रतिनिधि हैं। रक्तबीज उस आदत या दोष का प्रतीक है, जो जितना नष्ट किया जाए, उतना ही अधिक बढ़ जाता है।</p>
<p><strong>असुरों का अर्थ :</strong></p>
<p>इन सभी असुरों का अर्थ है हमारे भीतर की नकारात्मक,अवांछनीय और विनाशकारी प्रवृत्तियां। जब ये प्रवृत्तियां हमारे जीवन में हावी हो जाती हैं, तब भीतर की दिव्यता दब जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब कलियुग के प्रारंभ में अज्ञान, अधर्म और असुरी शक्तियां चारों ओर फैल चुकी थीं, तब स्वयं परमपिता परमात्मा ने त्रिदेवों के माध्यम से भारत की सुकन्याओं को दिव्य ज्ञान, योगबल और सात्विक गुणों से सुसज्जित किया। वे कन्याएं आत्मिक दृष्टि से जागृत थीं। उनका तीसरा नेत्र ज्ञान और विवेक का प्रतीक था और अष्ट भुजाएं,उनके अंदर की दिव्य शक्तियों-जैसे सहनशीलता, करुणा, त्याग, आत्मबल आदि का प्रतीक थीं। इन कन्याओं ने ही आत्मज्ञान से अपने भीतर और समाज में बसे हुए असुरतत्वों को परास्त किया। यही कारण है कि वे आदि शक्ति के रूप में पूजी गईं। उन्होंने न केवल स्वयं को तमोगुण से मुक्त किया, बल्कि अन्य लोगों को भी दिव्यता की ओर प्रेरित किया। नवरात्रि पर्व के प्रमुख प्रतीक कलश स्थापना, अखंड दीप, कन्या पूजन और जागरण सब इसी आध्यात्मिक घटना की स्मृति में हैं। कलश आत्मा का प्रतीक है, जिसमें दिव्यता और सात्विकता की स्थापना होती है। अखंड दीप आत्मिक जागृति और परमात्मा के ज्ञान का प्रकाश है, जो नव दिनों तक सतत जलता है।</p>
<p><strong>अज्ञान से जगाना :</strong></p>
<p>कन्या पूजन उस शक्ति की स्मृति है, जो इन कन्याओं ने संसार को अज्ञान से जगाने में दिखाई। जागरण अज्ञान की नींद से बाहर आने का प्रतीक है। इसलिए आज आवश्यकता है कि हम नवरात्रि को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान न मानें, बल्कि इसके पीछे छिपे आध्यात्मिक सन्देश को समझें। यह पर्व हमें अपने भीतर झांकने का अवसर देता है, जहां महिषासुर, रक्तबीज, शुम्भ-निशुम्भ जैसी प्रवृत्तियां आज भी सक्रिय हैं आलस्य, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, लालच, मोह, और घमंड। इस नवरात्रि पर संकल्प लें कि हम केवल बाह्य पूजा या जयघोष तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि अपने भीतर की इन असुर प्रवृत्तियों का नाश करेंगे। अपने भीतर के तम को दूर कर ज्ञान का दीप जलाएंगे। यही सच्चे अर्थों में नवरात्रि मनाना होगा। तो आइए, इस नवरात्रि हम केवल कन्याओं का पूजन न करें, बल्कि अपने भीतर की आत्मिक कन्या यानी आत्मा में स्थित शुद्धता, पवित्रता, सहनशीलता और दिव्यता को जागृत करें। इसी के माध्यम से हम महिषासुर जैसे तमोगुणी विचारों का नाश कर सकते हैं और अपने जीवन को सच्चे अर्थों में दिव्य बना सकते हैं। नवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि एक आत्मिक अभियान है स्वयं को पहचानने, आंतरिक अशुद्धियों से युद्ध करने और आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का। यह पर्व हमें यही प्रेरणा देता है कि हम अपने भीतर के अंधकार को दूर कर आत्मिक प्रकाश से जगमगाएं।</p>
<p><strong>-राजयोगी ब्रह्माकुमार निकुंज</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Sep 2025 12:29:56 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur KD]]>
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            <item>
                <title>जीएसटी 2.0 लागू : मोदी सरकार ने दिया भारत के लोगों को दिवाली का असली उपहार, नवरात्र और टैक्स कटौती के पहले दिन उपभोक्ताओं का उत्साह रहा चरम पर</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[कार शोरूम में कतारें देखी गईं, गाड़ियों के लिए भारी संख्या में ऑनलाइन ऑर्डर किए गए और उत्सव से जुड़ी बिक्री में रिकॉर्ड तोड़ वृद्धि देखी गई।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/gst-20-applicable-modi-government-gave-the-real-gift-of/article-127718"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/gst.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। 22 सितंबर 2025 एक ऐसी तिथि बन गई जो दुकानदारों, ऑटो डीलरों और प्रत्येक भारतीय परिवार की स्मृति में सदैव अंकित रहेगी क्योंकि उपभोक्ताओं ने इस दिन जीएसटी 2.0 का स्वागत अभूतपूर्व उत्साह के साथ किया। मोदी सरकार ने नवरात्र की पहली पूजा के दिन जीएसटी 2.0 को लागू कर भारत के लोगों को दिवाली का असली उपहार दे दिया। नवरात्र के पहले दिन के साथ सही तालमेल बिठाते हुए, सुधारित कर व्यवस्था ने कम कीमतें, सरलीकृत स्लैब और दैनिक आवश्यक वस्तुओं पर तत्काल राहत के रुप में आम आदमी को प्रसन्न होने का एक प्रत्यक्ष कारण दे दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने जीएसटी 2.0 को भारत के लोगों को समर्पित एक सुधार बताया और उनके शब्दों के ही अनुरूप यह एक शुष्क नीति परिवर्तन की तरह कम और एक उत्सव के उपहार की तरह प्रतीत हुआ। कार शोरूम में कतारें देखी गईं, गाड़ियों के लिए भारी संख्या में ऑनलाइन ऑर्डर किए गए और उत्सव से जुड़ी बिक्री में रिकॉर्ड तोड़ वृद्धि देखी गई।</p>
<p><br /><strong>ई-कॉमर्स कार्ट पर ऑनलाइन ऑर्डर की भरमार</strong><br />खरीदारी से जुड़ा उत्साह डिजिटल बाजारों में भी देखने को मिला, जहां लोगों में फैशन, घरेलू आवश्यक वस्तुओं और उत्सव की आवश्यक वस्तुओं का स्टॉक करने की होड़ सी लग गई।<br />फ्लिपकार्ट और अमेजन ने सोमवार को लॉयल्टी प्रोग्राम यूजर्स के लिए अपने फेस्टिव सेल इवेंट्स की शुरूआत की, जिसमें विक्रेताओं और ब्रांडों ने जीएसटी में छूट की बदौलत मजबूत शुरूआती ट्रैक्शन की रिपोर्ट की।<br />फैशन ब्रांड द पैंट प्रोजेक्ट में पिछले वर्ष की तुलना में 15 से 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई, जबकि दोनों मार्केटप्लेस पर विक्रेता शैडो एटेल ने पिछले सप्ताह की तुलना में होम एसेंशियल सेगमेंट में 151 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की।<br />स्निच जैसे फैशन ब्रांडों के ऑनलाइन ऑर्डर में 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई।</p>
<p><strong>ऑटोमोबाइल सेक्टर में नया कीर्तिमान</strong><br />ऑटोमोबाइल सेक्टर ने ऐतिहासिक आंकड़ों के साथ सुर्खियां बटोरीं। नए जीएसटी ढांचे के तहत, छोटी सब-4 मीटर कारों को 18 प्रतिशत स्लैब में स्थानांतरित कर दिया गया था, जबकि ऑटोमोबाइल पर मुआवजा उपकर को पूरी तरह से हटा दिया गया था।</p>
<p>जीएसटी 2.0 के पहले दिन मारुति के लिए 80,000 इंक्वायरी दर्ज की गई और उसने 30,000 कारों की डिलीवरी की, जो 35 वर्षों में इसका एक दिन का सबसे बड़ा प्रदर्शन है। आम त्योहारी सीजन की तुलना में छोटी कारों की बुकिंग में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।</p>
<p>हुंडई के लिए डीलर बिलिंग भी उस दिन 11,000 तक बढ़ गई, जो पांच वर्षों में इसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है।</p>
<p>टाटा मोटर्स ने नवरात्रि के पहले दिन 10,000 कारों की डिलीवरी और 25,000 से अधिक इंक्वायरी दर्ज की, जो शोरूम वॉक-इन में उल्लेखनीय वृद्धि, उच्च कन्वर्जन और बढ़ते ऑर्डर बुक के साथ त्योहारी सीजन की मजबूत शुरूआत को चिह्नित करता है।</p>
<p>हुत से परिवारों के लिए, जीएसटी 2.0 ने लंबे समय से अटके हुए सपनों को वास्तविकता में बदल दिया। ऑटोमोबाइल न केवल उनके लिए अधिक सुलभ हो गए, बल्कि उन परिवारों की उत्सव की एक सच्ची खरीदारी भी हो गई।</p>
<p><strong>एसी और टीवी की भारी बिक्री</strong><br />जीएसटी 2.0 के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर ने एक और बड़ी सफलता गाथा लिखी, जिसमें लोग उच्च मांग वाले उत्पादों पर कम कीमतों का भारी लाभ उठा रहे हैं। ्प्लिलट एसी की कीमतों में 3,000 से 5,000 रुपए की कमी आई है, जबकि महंगे टीवी की कीमतों में 85,000 रुपए तक की कटौती देखी गई है।</p>
<p>22 सितंबर को, हायर जैसी कंपनियों ने एक सामान्य सोमवार की तुलना में लगभग 2 गुना बिक्री दर्ज कराई, जिसमें नई दरों के लागू होने से पहले ही कई प्री-बुकिंग कर दी गई थी।</p>
<p>ब्लू स्टार का अनुमान है कि जीएसटी 2.0 के पहले दिन की बिक्री पिछले साल के इसी दिन की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत अधिक थी।<br />टीवी, खासकर 43 इंच और 55 इंच के सेगमेंट की बिक्री में भी तेज वृद्धि हुई। सुपर प्लास्ट्रोनिक्स प्राइवेट लिमिटेड जैसी कंपनियों ने फ्लिपकार्ट के माध्यम से बिक्री में 30 से 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की।</p>
<p><strong>दीपावली का असली उपहार</strong><br />जीएसटी 2.0 ने पहले दिन से ही तत्काल राहत दी और उपभोक्ताओं को आनंदित कर दिया। इससे घरेलू खर्च कम हुए, सभी उद्योगों में मांग में तेजी आई और रिकॉर्ड तोड़ बिक्री के साथ त्योहारी सीजन जगमगा उठा। कारों और इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर किराने का सामान और फैशन तक, हर सेक्टर में भारी वृद्धि देखी गई। यह केवल कर सुधार ही नहीं था। यह बचत का त्योहार था, मांग को बढ़ावा देने और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से भारत के लोगों को दिवाली का असली उपहार था। </p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>बिजनेस</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Sep 2025 09:41:06 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur PS]]>
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                <title>800 साल से भी अधिक पुराना है कोटा का आशापुरा माता मंदिर, दशहरा मेले की शुरूआत होती है मंदिर की पूजा से</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[कोटा के दशहरा मैदान के पास स्थित यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा और लोकमान्यताओं का संगम है।]]>
                    </description>
                
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-ashapura-mata-temple-in-kota-is-over-800-years-old/article-127651"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/11-(1)20.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। नवरात्रि का पर्व शुरू होते ही कोटा शहर भक्ति और आस्था में सराबोर हो उठता है। हर गली-मोहल्ले में देवी के जयकारे गूंजने लगते हैं, माता की चौकियां सजती हैं और भक्तजन व्रत-उपवास रखते हुए माता की साधना में लीन हो जाते हैं। ऐसे पावन अवसर पर कोटा का आशापुरा माता मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बन जाता है। कोटा के दशहरा मैदान के पास स्थित यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा और लोकमान्यताओं का संगम है। माना जाता है कि यह मंदिर करीब 800 साल से भी अधिक पुराना है। इसकी स्थापना रियासतकाल में हुई है। आज यह मंदिर केवल स्थानीय ही नहीं, बल्कि राजस्थान भर के श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन चुका है। दशहरा और नवरात्र के दिनों में यहां देशभर से भक्त पहुंचते हैं। वर्तमान में भी मंदिर का रख-रखाव और पूजा-पाठ परंपरागत रीति-रिवाजों के अनुसार ही किया जाता है। यह आशापुरा माता हाड़ौती व चौहानों की कुलदेवी है। इसके लिए अन्य समाज में भी माता की आस्था है तथा कई जने कुलदेवी मानते है।</p>
<p><strong>आशापुरा मंदिर के दर्शन से होती हैं दशहरा मेले की शुरूआत</strong><br />कोटा का दशहरा मेला आज विश्व प्रसिद्ध है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसकी शुरूआत भी इसी मंदिर से होती है। परंपरा के अनुसार, दशहरे के शुभारंभ से पूर्व राजपरिवार के सदस्य यहां विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। जब तक माता की आराधना पूरी नहीं हो जाती, तब तक मेले के कार्यक्रमों की शुरूआत नहीं होती। नगर निगम के अधिकारी, जनप्रतिनिधि और बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस पूजा में शामिल होते हैं। इसके बाद ही दशहरा मैदान का विशाल आयोजन प्रारंभ होता है। कोटा का यह मंदिर एक ऐसा स्थल है, जहां राजपरिवार और आमजन दोनों समान रूप से श्रद्धा अर्पित करते हैं। दशहरा मेला हो या नवरात्र, दोनों अवसरों पर यहां की भव्यता देखते ही बनती है। यहां पूजा-अर्चना के बाद प्रसाद वितरण की परंपरा है, जिसे ग्रहण करने के लिए भक्त उत्सुक रहते हैं।</p>
<p><strong>समाधि और चमत्कारी किंवदंतियां</strong><br />मंदिर परिसर में स्थित सिद्धयोगी महाराज की समाधि स्थित है यह भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है। भक्त मानते हैं कि यहां समाधि से निकलने वाली ऊर्जा हर व्यक्ति का कल्याण करती है। कहा जाता है कि जो भी यहां सच्चे मन से मनोकामना मांगता है, माता उसकी हर इच्छा पूर्ण करती हैं। यही कारण है कि मंदिर का नाम आशापुरा पड़ा  जो सबकी आशा पूरी करती हैं।</p>
<p><strong>आशापुरा से बनीं आशापाला</strong><br />मंदिर के पुजारी सिद्धनाथ योगी बताते हैं कि यहां आने वाले भक्त खाली हाथ नहीं लौटते। माता हर मनोकामना को पूर्ण करती हैं। यही कारण है कि माता का नाम आशापुरा पड़ा। लाखों लोगों की आस्था से जुड़ा यह मंदिर आज भी उसी महिमा और चमत्कार से परिपूर्ण है, जैसे सदियों पहले हुआ करता था। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं ने बताया कि  माता आशापुरा का प्राकट्य एक अशोक वृक्ष से हुआ था। इसी कारण इस मंदिर को लंबे समय तक आशापाला मंदिर के नाम से भी जाना जाता रहा। समय के साथ जब भक्तों ने महसूस किया कि माता उनकी हर मनोकामना पूरी करती हैं, तब यह मंदिर आशापुरा माता मंदिर कहलाने लगा। </p>
<p><strong>नवरात्र के दिन होते हैं विशेष कार्यक्रम</strong><br />- भजन संध्या और जागरण आयोजित होते हैं।<br />- भक्तों द्वारा सुंदरकांड पाठ और माता की चौकी सजाई जाती है।<br />- बड़ी संख्या में महिलाएं गरबा और डांडिया खेलकर माता का आह्वान करती हैं।</p>
<p><strong>नवरात्र में उमड़ती है आस्था की गंगा</strong><br />- नवरात्रि आते ही इस मंदिर की रौनक देखते ही बनती है। सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं।<br />- सुबह 5 बजे मंदिर खुलता है और दोपहर 12.30 बजे तक दर्शन होते हैं।<br />- शाम को 4 बजे मंदिर पुन: खुलता है और रात 10 बजे तक दर्शनार्थियों की भीड़ रहती है।<br />- नवरात्रि में मंदिर पूरे दिन खुला रहता है ताकि कोई भी भक्त दर्शन से वंचित न रह जाए। अष्टमी के दिन यहां श्रद्धालुओं की संख्या बड़ी संख्या में पहुंचते है। अष्टमी के दिन मंदिर में खड़े होने के लिए भी जगह नहीं मिलती।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Sep 2025 14:26:05 +0530</pubDate>
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                <title>डाढ़ देवी माता मंदिर में नवरात्र पर उमड़ती है श्रद्धा की गंगा : दांत दर्द से बनीं डाढ़ देवी, रियासतकालीन से चली आ रही पूजा-अर्चना</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[हर रविवार को भरता है मेला, सैंकड़ों लोगों को मिलता है रोजगार।
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/dhar-devi-mata-temple-is-flooded-with-devotion-during-navratri--the-dhar-devi-was-created-from-a-toothache/article-127588"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/_4500-px)-(6)6.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। राजस्थान की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर में देवी मंदिरों का विशेष महत्व है। इन्हीं मंदिरों में से एक है डाढ़ देवी माता मंदिर, जो कोटा शहर बस स्टैंड से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह मंदिर अपनी आस्था, चमत्कारिक मान्यताओं और ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है। चाहे नवरात्र का पर्व हो या साधारण दिन, यहां भक्तों की भीड़ हमेशा उमड़ी रहती है। यह मंदिर रेलवे स्टेशन से लगभग 19 किलोमीटर तथा एरोड्रम से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। मंदिर तक पहुंचने वाली सड़क कहीं डामर से बनी हुई है तो कहीं सीसी रोड का रूप लिए हुए है। बावजूद इसके, श्रद्धालुओं की आस्था और भक्ति उन्हें माता के दरबार तक खींच ही लाती है। डाढ़ देवी मंदिर के पुजारी भोलाराम ने बताया कि नवरात्र के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते है। नवरात्र के दिन मंदिर पूरे दिन खुला रहता है। माता के विशेष शृंगार में चार घंटे से भी अधिक का समय लगता है। पहले चोला बदला जाता है। फिर नई पोशाक के साथ माता का शृंगार किया जाता है। रोजाना नया शृंगार होता है। यह मंदिर वर्षों पुराना है। यहां आने वाले श्रद्धालु मन में अपनी मनोकामना मांगते है। ईच्छा पूरी होने पर पूरे परिवार के साथ माता के दर्शन करने व धोक लगाने आते है। यह मंदिर देवस्थान विभाग के अधीन आता है। इस मंदिर में दो गार्ड व एक चौकीदार है जो व्यवस्था संभालते है। यहां पुजारी धनराज भी है जो मुख्य व्यवस्था में सहयोग करते है। नवरात्र के अलावा इस मंदिर हर रविवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते है। इस मंदिर के सामने एक कुंड है जिसमें पानी भरा हुआ है इस कुंड के पानी में कभी कीड़े नहीं लगते है तथा किसान इस पानी को अपने खेतों में छिड़कते है। इसे गंगा के समान ही माना गया है।</p>
<p><strong>दांत दर्द से डाढ़ माता बनीं</strong><br />एक रोचक किंवदंती के अनुसार, कैथून दरबार में रियासतकालीन समय पर एक व्यक्ति को दाढ़ में बहुत तेज दर्द था। उसने माता से प्रार्थना की कि उसका कष्ट दूर हो जाए। चमत्कारिक रूप से उसका दाढ़ दर्द ठीक हो गया। इसी घटना के बाद इस स्थान पर मंदिर बनवाया गया और देवी को डाढ़ माता के रूप में पूजा जाने लगा। एक अन्य श्रद्धालु काशीराम गुर्जर बताते हैं कि प्राचीन समय में जब मंदिर में आरती होती थी, तो बंदरों से लेकर शेर जैसे जंगली जानवर भी यहां पहुंचते थे। वे शांत भाव से आरती सुनते और फिर अपने-अपने रास्ते चले जाते। आज भी मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में बंदर दिखाई देते हैं। डाढ़ देवी माता को दृष्टादेवी भी कहा जाता है।</p>
<p><strong>नौ दिन तक चलता है उत्सव</strong><br />डाढ़ माता मंदिर में शारदीय और चैत्र नवरात्रि के अवसर पर नौ दिन का विशाल मेला भरता है। इन दिनों मंदिर का माहौल भक्तिमय हो उठता है। माता का विशेष श्रृंगार किया जाता है, जिसमें करीब चार घंटे का समय लगता है। नवरात्रि के दौरान प्रतिदिन माता को नई पोशाक पहनाई जाती है। इस अवसर पर लाखों श्रद्धालु दूर-दराज से माता के दर्शन के लिए आते हैं। राजस्थान ही नहीं बल्कि दिल्ली, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों से भी भक्त यहां पहुंचते हैं। मंदिर में आने वाले भक्त माता को चुनरी, नारियल और प्रसाद अर्पित कर अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। मेला केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव का भी प्रतीक बन जाता है।</p>
<p><strong>कुंड के जल की अनोखी शक्ति</strong><br />मंदिर के पास स्थित एक प्राचीन कुंड को बेहद पवित्र माना जाता है। इसकी मान्यता है कि इस जल को खेतों में छिड़कने से फसलें अच्छी होती हैं और कीट-रोग नहीं लगते। यह जल गंगा के समान पवित्र और कभी खराब न होने वाला माना जाता है। किसान इसे अपने लिए वरदान स्वरूप मानते हैं।</p>
<p><strong>पुजारी और देवस्थान विभाग की देखरेख</strong><br />मंदिर की व्यवस्था देवस्थान विभाग के अधीन है। मंदिर में इस समय पुजारी भोलाराम और धनराज सेवा-अर्चना का कार्य करते हैं। भोलाराम सीकर जिले के रहने वाले हैं और पिछले दो साल से यहां पूजा-पाठ कर रहे हैं। नवरात्र के दौरान जब लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं, तब प्रशासन की ओर से विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं। सुरक्षा और व्यवस्था संभालने के लिए दो गार्ड और एक चौकीदार तैनात रहते हैं।</p>
<p><strong>राजा-महाराजाओं के समय की धरोहर</strong><br />किंवदंतियों के अनुसार डाढ़ देवी माता का मंदिर 8वीं से 10वीं शताब्दी के बीच निर्मित हुआ था। तंवर राजपूतों द्वारा इसे अपनी कुलदेवी के रूप में स्थापित किया गया था।  एक अन्य किवंदती के अनुसार माता ने स्वप्न में राजा को आदेश दिया कि मेरा स्थान यही रहेगा और यहीं से श्रद्धालुओं का भला होगा। तब से माता का मंदिर अपने मूल स्थान पर ही विद्यमान है।</p>]]>
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                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Sep 2025 15:49:35 +0530</pubDate>
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                <title>नवरात्रि पर जयपुर एयरपोर्ट से उड़ानें दोगुनी रफ्तार पर : रोजाना 59 उड़ानें होंगी संचालित, पहले दिन से ही एयरपोर्ट पर रौनक </title>
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                        <![CDATA[ जयपुर एयरपोर्ट से यात्रियों के लिए खुशखबरी है। त्यौहारों के मौसम में एयर कनेक्टिविटी में बड़ा इजाफा हुआ है]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/flights-from-jaipur-airport-on-navratri-will-have-59-flights/article-127584"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-09/airport.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। जयपुर एयरपोर्ट से यात्रियों के लिए खुशखबरी है। त्यौहारों के मौसम में एयर कनेक्टिविटी में बड़ा इजाफा हुआ है। सोमवार से एक साथ सात नई फ्लाइट्स की शुरुआत के बाद अब एयरपोर्ट से रोजाना 59 उड़ानें संचालित होंगी। कल तक यहां से 52 फ्लाइट्स चल रही थीं।</p>
<p>नवरात्रि के पहले दिन से ही एयरपोर्ट पर रौनक बढ़ गई है। इंडिगो एयरलाइंस ने इंदौर, बेंगलुरु, उदयपुर, देहरादून, चंडीगढ़, कोलकाता और अहमदाबाद के लिए नई उड़ानों की शुरुआत की है। इंडिगो की इंदौर के लिए जयपुर से सुबह 5:10 बजे, बेंगलुरु के लिए इंडिगो की जयपुर से सुबह 5:25 बजे, उदयपुर के लिए इंडिगो की फ्लाइट जयपुर से शाम 5:30 बजे, देहरादून के लिए इंडिगो की फ्लाइट जयपुर से शाम 6:30 बजे, चंडीगढ़ के लिए इंडिगो की फ्लाइट जयपुर से शाम 7:50 बजे, जयपुर से रात 8:10 बजे कोलकाता के लिए फ्लाइट शुरू की गई है। त्यौहारों के इस सीजन में बढ़ी हुई हवाई सेवाएं जयपुर से यात्रा करने वाले यात्रियों को और अधिक सुविधा व विकल्प देंगी। इससे जयपुर की एयर कनेक्टिविटी मजबूत होगी और व्यापार व पर्यटन दोनों को गति मिलेगी।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Sep 2025 15:20:39 +0530</pubDate>
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