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                <title> Noise Pollution - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description> Noise Pollution RSS Feed</description>
                
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                <title>पक्षियों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है ध्वनि प्रदूषण</title>
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                        <![CDATA[ध्वनि प्रदूषण के कारण पक्षी अपनी रोज़मर्रा की गतिविधियां नहीं कर पा रहे, प्रजनन नहीं कर पा रहे और उनका नेविगेशन भी बाधित हो रहा है। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/noise-pollution-is-proving-fatal-for-birds/article-142859"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/(12200-x-600-px)-(9)2.png" alt=""></a><br /><p>ध्वनि प्रदूषण के कारण पक्षी अपनी रोज़मर्रा की गतिविधियां नहीं कर पा रहे, प्रजनन नहीं कर पा रहे और उनका नेविगेशन भी बाधित हो रहा है। पक्षियों के लिए ध्वनि केवल एक आवाज नहीं, बल्कि उनके पूरे अस्तित्व का आधार है। उनका अस्तित्व, संचार, प्रजनन, दिशा निर्देशन और अनेक अन्य प्रक्रियाएं ध्वनि पर आधारित हैं। वर्तमान समय में स्थिति ऐसी हो गई है कि जैसे जैसे शहरों में शोर बढ़ता गया है और मानवीय गतिविधियां बढ़ी हैं, वैसे वैसे पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता गया है। पक्षी आवाज के माध्यम से ही एक दूसरे से संवाद करते हैं। उनकी ध्वनि की तीव्रता में ही उनका प्रेम, उनका विरोध, उनका भय, उनके संकेत, अपने क्षेत्र की रक्षा, सामाजिक संरचना और परिवार की पहचान सब कुछ समाहित होता है।</p>
<p><strong>विभिन्न प्रकार के प्रदूषण : </strong></p>
<p>आज का कोलाहल इन सबको बिखेर रहा है। पक्षी अपने स्वर, गीत और नृत्य के माध्यम से साथी का चयन करते हैं। चारों ओर बढ़ते शोर के कारण उन्हें अपने स्वर और गायन में बदलाव करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। यह परिवर्तन उनकी समस्या का अस्थाई समाधान हो सकता है, लेकिन इसकी मधुरता और प्रभाव कम हो गए हैं। शहरीकरण और तकनीकी विकास की दौड़ में आज दुनिया बहुत आगे निकल चुकी है। इस विकसित होते संसार में जो समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं, उनकी ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा। विकास के मार्ग पर दौड़ती दुनिया ने चारों ओर विभिन्न प्रकार के प्रदूषण फैला दिए हैं। इस तेज रफ्तार दुनिया में एक ऐसा प्रदूषण बढ़ा है, जिसकी अब भी खुलकर अनदेखी की जा रही है, वह है ध्वनि प्रदूषण।</p>
<p><strong>पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित :</strong></p>
<p>यह नुकसान पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को असंतुलित कर देता है। पर्यावरण को इससे जो हानि पहुंचती है, उसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। विशेषज्ञों के अनुसार ध्वनि प्रदूषण का सबसे अधिक प्रभाव पक्षियों पर पड़ा है। पक्षियों का पूरा जीवन ध्वनि पर आधारित है। पक्षियों के लिए ध्वनि केवल एक आवाज नहीं, बल्कि उनके संपूर्ण अस्तित्व का आधार है। उनका अस्तित्व, संचार, प्रजनन, दिशा निर्देशन और अनेक अन्य क्रियाएं ध्वनि पर निर्भर हैं। हमारे आसपास कभी कोयल की कूक सुनाई देती थी, मोर की पुकार गूंजती थी, चिड़ियों की चहचहाहट होती थी, कबूतरों की गुटरगूं सुनाई देती थी। इसके अलावा मैना, तोता, कबूतर, कौआ, बुलबुल और अनेक अन्य पक्षी हमारे आसपास निवास करते थे। उनका स्वर हमें मंत्रमुग्ध कर देता था।</p>
<p><strong>प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर :</strong></p>
<p>विशेषज्ञों के अनुसार प्रत्येक पक्षी अपने आवास के अनुसार,एक विशिष्ट स्वर, उसकी शैली, उसकी सीमा और उसके गुण विकसित करता है। उसी के माध्यम से वह अपना संचार तंत्र विकसित करता है। अब स्थिति यह हो गई है कि वाहनों के कारण चारों ओर ट्रैफिक बढ़ रहा है, निर्माण कार्य चल रहे हैं,औद्योगिक मशीनें शोर कर रही हैं, विमानों की आवाज गूंज रही है, शहरी क्षेत्रों में कोलाहल बढ़ रहा है और शहर फैलते हुए जंगलों को कम कर रहे हैं। इन्हीं शहरी क्षेत्रों में पक्षी रहने के लिए मजबूर हो गए हैं। इसके कारण उनकी आवाज दब गई है। जब वे आपस में संवाद करते हैं, तो बाहरी शोर के कारण कठिनाई होती है। उनका संवाद बाधित हो जाता है। इस शोर और कोलाहल के कारण कई पक्षियों की प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं और अनेक प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं।</p>
<p><strong>ध्वनि प्रदूषण का प्रभाव :</strong></p>
<p>चिंताजनक बात यह भी है कि ध्वनि प्रदूषण का प्रभाव पक्षियों की प्रजनन क्षमता पर भी पड़ा है। विशेषज्ञों के अनुसार, पक्षी अपने स्वर, गायन और नृत्य के माध्यम से साथी का चयन करते हैं। जोड़ी बनाने में उनका स्वर सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक और गंभीर प्रभाव यह है कि पक्षियों में तनाव का स्तर बढ़ गया है। ध्वनि प्रदूषण के कारण वे शिकारी की पहचान नहीं कर पाते, खतरे के संकेतों को समझ नहीं पाते और सतर्क नहीं हो पाते। सामान्यतः प्राकृतिक वातावरण में पत्तों की सरसराहट, टहनियों की आवाज, अन्य पक्षियों की चेतावनी या भय का संकेत बाकी पक्षियों को सावधान कर देता है। लेकिन जंगल घटे हैं और शोर बढ़ा है, परिणामस्वरूप उन्हें लगातार सतर्क रहना पड़ता है। उनकी नींद, विश्राम, भोजन और अन्य गतिविधियों पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।</p>
<p><strong>मोबाइल टावरों की तरंगें :</strong></p>
<p>मनुष्य द्वारा फैलाए जा रहे ध्वनि प्रदूषण, कृत्रिम प्रकाश प्रदूषण और मोबाइल टावरों से निकलने वाली तरंगों के कारण भी पक्षियों को भारी नुकसान हुआ है। कृत्रिम प्रकाश प्रदूषण भी पक्षियों के लिए हानिकारक सिद्ध हो रहा है। अनेक मामलों में देखा गया है कि तेज रोशनी के कारण पक्षी भ्रमित हो जाते हैं और इमारतों से टकरा जाते हैं। दिन में भी बड़ी इमारतों के रिफ्लेक्टिव कांच से परावर्तित सूर्यप्रकाश उनकी आंखों को चकाचौंध कर देता है, जिससे दुर्घटनाएं होती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, स्थिति ऐसी बन रही है कि पक्षियों का अस्तित्व समाप्त हो रहा है या वे अपना आवास छोड़कर अन्य स्थानों पर जाने लगे हैं। इसका प्रभाव बीज प्रसार, कीट नियंत्रण और अन्य प्राकृतिक प्रक्रियाओं पर पड़ रहा है। पर्यावरण की खाद्य श्रृंखला भी प्रभावित हो रही है।</p>
<p><strong>-स्नेहा सिंह</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 Feb 2026 12:23:43 +0530</pubDate>
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                <title>शोर का कहर-हमारी सांसों में जहर घोलता खतरा</title>
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                        <![CDATA[शोर कहें या ध्वनि प्रदूषण आज गंभीर समस्या बनता जा रहा है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/the-noise-of-the-noise-is-threatened-by-poison-in/article-122068"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/ne1ws7.png" alt=""></a><br /><p>शोर कहें या ध्वनि प्रदूषण आज गंभीर समस्या बनता जा रहा है। इसका सबसे दुखदायी पहलू यह है कि मौजूदा हालात में इसका स्तर तय मानकों को लगातार लांघता जा रहा है और एन जी टी के सख्त निर्देशों तथा सरकारी आदेशों के बावजूद इसमें कोई सुधार नहीं आ रहा है। गौरतलब यह है कि जैसे-जैसे हम अपनी सुविधाओं में बढ़ोतरी करते जा रहे हैं, वैसे-वैसे हमारे ऊपर इनका नकारात्मक असर दिखाई पड़ता जा रहा है। वायु प्रदूषण से जहां इंसान की कार्यक्षमता और स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है, वहीं ध्वनि प्रदूषण भी इंसानों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है।</p>
<p><strong>शोर के कारण :</strong></p>
<p>दुनियाभर में हो रहे शोध-अध्ययन इस बात के सबूत हैं कि दुनिया में बढ़ रहा शोर केवल कानों तक ही सीमित नहीं रह गया है, शोर के कारण न केवल इंसान की उम्र कम हो रही है, बल्कि वे नींद में कमी, तनाव, अवसाद, दिल, दिमाग, उच्च रक्तचाप, स्ट्रोक और टायप-2 डायबिटीज का कारण भी बन रहा है। इसमें कार, ट्रेन और हवाई जहाज से होने वाले ध्वनि प्रदूषण का योगदान सर्वाधिक है। ब्रिटेन की स्वास्थ्य सुरक्षा एजेंसी का शोध यह खुलासा करता है कि, जो लोग लगातार ट्रेन, कार और हवाई जहाज के शोर का सामना करते हैं, उनके अंदर नींद में कमी, तनाव, अवसाद आदि परेशानियां बढ़ने लगती हैं। यही नहीं इनमें मधुमेह और दिल की बीमारियों का खतरा ज्यादा रहता है।</p>
<p><strong>शोध में खुलासा :</strong></p>
<p>76 फीसदी लोगों का मानना है कि शोर से उनकी याददाश्त पर काफी असर पड़ रहा है। यह भी देखा गया है कि शोर के माहौल में रहने से लोगों को 5 साल में दिल का दौरा पड़ने की संभावना बनी रहती है। 24 घंटे में ज्यादा शोर सुनने वाले लोगों के जल्दी बीमार होने की संभावना रहती है। शोर से जल्दी थकान, अनिद्रा, बहरापन और याददाश्त जाने का खतरा बना रहता है। लम्बे समय तक शोर झेलने के कारण डिमेंशिया का खतरा भी हो सकता है। यही नहीं डिप्रेशन का शिकार भी हो सकता है। लंदन स्थित सेंट जार्ज यूनिवर्सिटी के शोध में यह खुलासा हुआ है कि ध्वनि प्रदूषण का असर इंसान पर सिर्फ जागते समय ही नहीं होता है, बल्कि वह नींद में भी शरीर को प्रभावित करता है।</p>
<p><strong>तनावपूर्ण स्थिति :</strong></p>
<p>तेज आवाजों से हमारे शरीर की किसी खतरे या तनावपूर्ण स्थिति का सामना करने की क्षमता भी प्रभावित होती है। इससे तनाव हार्मोन रिलीज होते हैं, जो लम्बे समय तक शरीर में बने रहने से गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं। इससे नर्वस सिस्टम प्रभावित होता है जिससे दिल की धड़कन की गति बढ़ जाती है। वैज्ञानिकों की मानें तो हमारा दिमाग सोते समय भी शोर सुनता है, इससे शरीर तनाव की अवस्था में बना रहता है। यह लम्बे समय तक जारी रहने पर दिल और दिमाग की कार्यप्रणाली को कमजोर कर सकता है। नतीजतन तनाव, चिड़चिड़ापन, नींद में बाधा और यहां तक कि अवसाद जैसी समस्यायें पैदा हो जाती हैं। ध्वनि प्रदूषण का असर प्रजनन क्षमता पर भी पड़ता है।</p>
<p><strong>पर्यावरण को खतरा :</strong></p>
<p>दरअसल जिस आवाज से नींद टूट जाए, उसे क्रोनिक साउंड्स कहते हैं। जो लोग हाइवे के किनारे रहते हैं और दिन भर ट्रैफिक का शोर सुनते रहते हैं, उनको इसकी आदत सी पड़ जाती है। इसलिए ये आवाजें उनको परेशान नहीं करतीं, लेकिन उनका शरीर इन आवाजों से प्रतिक्रिया करता है और उनको हाइपर टेंशन, दिल का दौरा जैसी बीमारियां होती हैं। वहीं शांत इलाकों जैसे गांव-देहात में रह रहे लोग अचानक तीव्र आवाजों से परेशान हो जाते हैं। उनके लिए शोर ज्यादा प्रतिक्रिया करता है। उनके लिए यह खतरा शहरों में रहने वाले लोगों की अपेक्षा तीन गुणा ज्यादा बढ़ जाता है। यूनाइटेड नेशंस ने शहरी ध्वनि प्रदूषण को पर्यावरण के लिए नए खतरों में सबसे ज्यादा खतरनाक बताया है।</p>
<p><strong>नकारात्मक प्रभाव :</strong></p>
<p>डब्ल्यूएचओ के मुताबिक 55 डेसीबल का हवाई जहाज का शोर इंसान के लिए ज्यादा खतरनाक है। 75 डेसीबल का शोर नुकसान दायक और 120 डेसीबल का शोर पीड़ा दायक है। 53 डेसीबल तक यातायात से होने वाले ध्वनि प्रदूषण से सेहत पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है। देखा गया है कि शहरों में बढ़ते ट्रैफिक, ट्रेन और हवाई जहाज की आवाज शोर के प्रमुख कारणों में से एक है। 53 डेसीबल से अधिक आवाज स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। आजकल शहरों में ’सुपरलाक’ जैसे प्रयोग किये जा रहे हैं, जहां पैदल यात्रियों के लिए विशेष क्षेत्र बनाए गए हैं, ताकि शोर को कम किया जा सके। जरूरत इस बात की है कि शोर से बचने के लिए व्यक्तिगत और प्रशासनिक स्तर पर ठोस कदम उठाए जाएं।</p>
<p><strong>-ज्ञानेन्द्र रावत</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 30 Jul 2025 12:44:26 +0530</pubDate>
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