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                <title>‘द बैटल ऑफ नरनौल’ पर खास लेखक सत्र: राव तुला राम की वीरता और 1857 के संग्राम की अनकही गाथा पर चर्चा</title>
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                        <![CDATA[जयपुर के क्लॉक टावर में कुलप्रीत यादव और मधुर राव ने 1857 के नायक राव तुला राम की वीरता पर आधारित अपनी पुस्तक पर चर्चा की। लेखकों ने इस गुमनाम युद्ध के रणनीतिक महत्व को रेखांकित किया। कार्यक्रम में राव तुला राम के वंशज राव राघवेंद्र सिंह भी शामिल हुए, जिन्होंने नई पीढ़ी को अपनी गौरवशाली विरासत से जुड़ने की प्रेरणा दी।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/special-writer-satra-rao-on-the-battle-of-narnaul-discusses/article-146598"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/1200-x-60-px)-(youtube-thumbnail)3.png" alt=""></a><br /><p> जयपुर। जयपुर के क्लॉक टावर में रविवार को इतिहास, साहित्य और देशभक्ति का अनूठा संगम देखने को मिला, जब 2- पेजेज बुक क्लब की ओर से पुस्तक ‘द बैटल ऑफ नरनौल’ पर विशेष लेखक सत्र आयोजित किया गया। पेंगुइन रैंडम हाउस और क्लॉक टावर के सहयोग से हुए इस कार्यक्रम में पुस्तक के लेखक Kulpreet Yadav और सह-लेखक Madhur Rao ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की सबसे भीषण लड़ाइयों में से एक पर आधारित इस किताब के ऐतिहासिक महत्व पर विस्तार से चर्चा की।</p>
<p>कार्यक्रम में 1857 के महान योद्धा Rao Tula Ram की वीरता, नेतृत्व और रणनीतिक कौशल पर गहन मंथन हुआ। लेखकों ने बताया कि यह पुस्तक 1857 के संग्राम की उस ऐतिहासिक लड़ाई को सामने लाती है, जिसे इतिहास में अपेक्षित महत्व नहीं मिल पाया।</p>
<p>कार्यक्रम में विशेष अतिथि के रूप में राव तुला राम के पर-परपोते राव राघवेंद्र सिंह भी उपस्थित रहे। उन्होंने अपने पूर्वज की वीरता और देशभक्ति की विरासत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि राव तुला राम केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि दूरदर्शी रणनीतिकार भी थे।</p>
<p>लेखक कुलप्रीत यादव ने बताया कि राव तुला राम ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष के लिए वर्षों तक संसाधन जुटाए और राजपूताना के कई शासकों के साथ गुप्त गठबंधन बनाए। उन्होंने फारस, अफगानिस्तान और रूस जैसे देशों से भी सहयोग प्राप्त करने का प्रयास किया, जो उनके व्यापक दृष्टिकोण और नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है।</p>
<p>सह-लेखक मधुर राव ने कहा कि ‘द बैटल ऑफ नरनौल’ जैसी किताबें भारत के इतिहास की उन अनकही कहानियों को सामने लाने का प्रयास हैं, जो समय के साथ भुला दी गईं। उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसे वीरों की गाथाओं को बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए और फिल्मों तथा नाटकों के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाना चाहिए।</p>
<p>कार्यक्रम का संचालन निष्ठा अग्रवाल ने किया। इस अवसर पर राजस्थान के पूर्व गृह राज्य मंत्री राजेंद्र सिंह यादव, पूर्व कैबिनेट मंत्री लालचंद कटारिया तथा आलसीसर परिवार के मुखिया ठाकुर गज सिंह जी आलसीसर सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे।</p>
<p>इसके साथ ही 2-पेजेज बुक क्लब के संस्थापक सदस्य डॉ. राम गुलाटी, प्रग्या रामजेवाल और मोहित बत्रा सहित बड़ी संख्या में पुस्तक प्रेमियों ने कार्यक्रम में भाग लिया। यह सत्र न केवल इतिहास को समझने का अवसर बना, बल्कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के अनदेखे अध्यायों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की प्रेरणा भी देता नजर आया।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 15 Mar 2026 17:51:32 +0530</pubDate>
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                <title>बॉर्डर से बुकशेल्फ़ तक: कश्मीर के आदिवासी इतिहास की खिड़की है डॉ. सुहील रसूल मीर की किताबें</title>
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                        <![CDATA[समाजशास्त्री डॉ. सुहील रसूल मीर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की जनजातियों की लुप्तप्राय संस्कृति को किताबों के माध्यम से सहेज रहे हैं। उनका शोध क्षेत्र के बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्य को उजागर करता है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/dr-suhail-rasool-mirs-books-are-the-window-to-the/article-143415"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/1200-x-600-px)-(21).png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। आदिवासी समुदाय के समृद्ध रीति-रिवाजों, संस्कृति और उनके जीवन के विभिन्न आयामों को नजदीकी से जानने वाले तथा कश्मीर में सीमा के पास पले-बढ़े लेखक और समाजशास्त्री डॉ. सुहील रसूल मीर का कहना है कि ऐसे समय में जब यह इलाका बदलाव के दौर से गुजर रहा है तो ऐसे में इस तरह का दस्तावेजीकरण बहुत जरूरी है।</p>
<p>डॉ. मीर का कहना है मैं सीमा के पास एक शहर में रहता हूं, लेकिन आदिवासी समुदायों की खास संस्कृति, जीवनशैली और उनके जीवन के हालात ने मेरे लिखने के तरीके और दुनिया को देखने के नजरिए को बनाया है। उन्होंने बताया कि कैसे भूगोल और जिन्दगी के अनुभवों ने उनकी पढ़ाई की दिशा को प्रभावित किया। डॉ. मीर ने पिछले 12 सालों में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के आदिवासी इलाकों में एथनोग्राफिक फील्डवर्क में खुद को पूरी तरह से झोंक दिया है। उनके अध्ययन ने जनजातियों, सीमा के इलाकों और जातीयता के समाजशास्त्र के बीच एक खास जगह बनायी है। </p>
<p>उनके काम में वॉयसेज अक्रॉस द पीर पंजाल, द हैंडबुक ऑफ दर्द आर्यन्स, और कल्चरल इनसाइक्लोपीडिया ऑफ दर्द-ट्राइब जैसे महत्वपूर्ण एथनोग्राफिक योगदान शामिल हैं। ये किताबें जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में आदिवासी जनजातियों के इतिहास, संस्कृति और जीवित परंपराओं को कागज पर उतारने का काम करती हैं। </p>
<p>उन्होंने यूनी के साथ खास बातचीत में कहा, मेरे शोध ने मुझे आदिवासी समुदायों से जोड़ा, जिसने मुझे आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।  मेरे शोध के दौरान अनोखी आदिवासी संस्कृति के साथ लगातार जुड़ाव और अनुभव ने मेरी कहानी कहने की कला पर असर डाला। खासकर संवेदनशील या टकराव वाले विषयों पर काम करते समय समाजशास्त्रीय समझ मुझे भावनाओं और यथार्थवाद के बीच तालमेल बिठाने के लिए संतुलन देती है। </p>
<p>कश्मीर से एक लेखक के तौर पर अपनी जगह बनाने में मुश्किलें आईं, लेकिन डॉ. मीर ने हिम्मत नहीं हारी। वह बताते हैं, मुझे जरूर मुश्किलें आती हैं। अनुसंधान के प्रति मेरा जोश और लगन मुझे आगे बढऩे में मदद करता है। उन्होंने अपने विषय के प्रति झुकाव के बारे में कहा, इन आदिवासियों के लोक और अनदेखे सामाजिक-सांस्कृतिक अनुभवों से मेरा जुड़ाव मुझे इन विषयों की पड़ताल करने के लिए प्रेरित करता है। उनका मानना है कि ऐसे समय में जब यह इलाका बदलाव के दौर से गुजर रहा है, इस तरह का दस्तावेजीकरण बहुत जरूरी है। </p>
<p>उन्होंने कहा कि उनके शोध का मकसद, सभी पढऩे वालों को जम्मू और लद्दाख की शानदार अलग-अलग तरह की चीजों को अपनाने का मौका देना है। उम्मीद है कि मेरी किताबें आने वाली पीढिय़ों के लिए जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की देसी संस्कृतियों को दस्तावेजों में उतारने में मदद करेंगी, जिसका मकसद पुरानी सांस्कृतिक विरासत को बचाकर रखना और उसकी झलक दिखाना है।किसी लड़ाई-झगड़े वाले इलाके से लिखने के साथ अपनी जिम्मेदारियां जुड़ी होती है। एक शोधकर्ता के तौर पर, मैं अपने लोगों की असली हालत को समझने के लिए मजबूर महसूस करता हूं और अपनी लिखाई के जरिए, मैं सिर्फ उसे दिखाने की कोशिश कर रहा हूं। मेरे सारे शोध अनुभव और अध्ययन पर आधारित है। मैं सिर्फ वही बताता हूं जो अभी आदिवासी समाज में हो रहा है। इसके साथ ही अनुभव से जुड़ी कहानियां और तथ्य भी पेश करता हूं। </p>
<p>उन्होंने कहा, समाजशास्त्र विषय का शोधकर्ता होने के नाते मेरा पहला काम पूर्वाग्रहों को खत्म करना है। इतिहास इस बात का गवाह है कि साहित्य ने देशों और सभ्यता पर असर डाला है और यह सिर्फ लेखकों की ईमानदार कोशिशों की वजह से है कि सच को बचाने की विरासत अभी भी बनी हुई है। डॉ मीर अभी कश्मीर थ्रू विलेजेस : फ्रॉम पास्ट टू प्रेजेंट किताब पर काम कर रहे हैं, जो कश्मीरी गांवों की एक मानव जाति विज्ञान से संबंधित यात्रा है। उन्होंने बताया कि इस काम का मकसद कश्मीरी परंपराओं और अलग-अलग तरह के लोगों के माहौल और इतिहास की वृहदता और विविधता को दिखाना है।</p>
<p>उनके मुताबिक, कश्मीर के गांवों में, कश्मीर की असली झलक मिल सकती है और यह परियोजना सामाजिक-सांस्कृतिक और मानव विज्ञान नजरिए से सदियों पुरानी कश्मीरी विरासत को फिर से देखने की कोशिश करती है। डॉ. मीर नये प्रयोगों के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा, मैं अपने शोध में नए तरीके आजमाने की कोशिश करूंगा। अकादमिक क्षेत्र में नयापन अपेक्षित और सराहनीय है।</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 16 Feb 2026 17:55:16 +0530</pubDate>
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                <title>वासुदेव देवनानी की पुस्तक ‘सनातन संस्कृति की अटल दृष्टि’ का उपराष्ट्रपति ने किया विमोचन</title>
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                        <![CDATA[उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने वासुदेव देवनानी द्वारा लिखित पुस्तक 'सनातन संस्कृति की अटल दृष्टि' का विमोचन किया। यह पुस्तक पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के राष्ट्रवादी विचारों और सनातन मूल्यों पर आधारित है। गडकरी ने वाजपेयी के समावेशी दृष्टिकोण और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान की सराहना की।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/vice-president-releases-vasudev-devnanis-book-sanatan-sanskriti-ki-atal/article-136993"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/vasudev-nani.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। राज्य की विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी की पुस्तक सनातन संस्कृति की अटल दृष्टि का विमोचन मंगलवार को यहां नई दिल्ली स्थित उपराष्ट्रपति एन्क्लेव में उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन की अध्यक्षता एवं केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी के मुख्य अतिथ्य में संपन्न हुआ। इस असवर पर उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में आधारभूत संरचना एवं राष्ट्रीय राजमार्ग के क्षेत्र में जो नींव रखी गई। वही आज विकसित भारत की मजबूत आधारशिला है। </p>
<p>पोखरण परमाणु परीक्षण का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह निर्णय अटल जी के दृढ़ नेतृत्व और राष्ट्रहित के प्रति उनकी अटल प्रतिबद्धता का प्रतीक था। उन्होंने पुस्तक को अटल जी के विचारों और राष्ट्रवादी दृष्टि का प्रेरणादायी दस्तावेज बताया। उन्होंने कहा कि सनातन संस्कृति की अटल दृष्टि जैसी पुस्तक का लोकार्पण करना उनके लिए भावुक और गौरवपूर्ण क्षण है। भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन और विचारों पर आधारित यह पुस्तक ऐसे समय में आई है। जब देश उनकी जन्म शताब्दी मनाने जा रहा है।</p>
<p><strong>भारतीय संस्कृति कभी संकीर्ण नहीं रही</strong></p>
<p>वहीं नितिन गडकरी ने कहा कि भारतीय संस्कृति का मूल भाव सर्वधर्म समभाव और मानव कल्याण है। गडकरी ने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने जीवन और आचरण से यह सिद्ध किया कि भारतीय संस्कृति कभी संकीर्ण नहीं रही। बल्कि न्याय, समता और सभी के प्रति सम्मान की पक्षधर रही है। इससे पहले विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने कहा कि यह पुस्तक अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन और कृतित्व को सनातन संस्कृति के मूल्यों के आलोक में समझने का एक विनम्र प्रयास है। </p>
<p>साथ ही पुस्तक लिखने का यह उनका पहला प्रयास है। इस अवसर पर केन्द्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर, वरिष्ठ भाजपा नेता वीण् सतीशए राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के अध्यक्ष मिलिंद मराठे, पूर्व सांसद रामचरण बोहरा एवं राकेश सिन्हा, उपराष्ट्रपति के सचिव अमित खरे, वरिष्ठ पत्रकार तरूण विजय सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।  </p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Dec 2025 11:44:48 +0530</pubDate>
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                <title>समाज को भविष्य का नया सपना दीजिए</title>
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                        <![CDATA[ राजस्थान ही में कोई दो हजार वर्ष की शब्द और साहित्य की चेतना यह बताती हैं कि राजपाट और सुख-दु:ख बदलते रहते हैं लेकिन रेत और पानी का रिश्ता कभी नहीं बदलता। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/give-society-a-new-dream-of-the-future/article-64616"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-12/समाज.png" alt=""></a><br /><p>जिस तरह बहता हुआ पानी और बोलता हुआ शब्द अपना रास्ता खुद बनाते हैं उसी तरह साहित्य में समाज और समय का संवाद भी अनवरत जारी रहता है। कौन लिखता है कौन पढ़ता है और कौन बोलता है उसकी प्रतिध्वनियां ही मनुष्य के मन और विचार में संवेदना का संसार रचती हैं। ज्ञान और विज्ञान के सभी विकास और सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक समता और विषमता के सभी कुरुक्षेत्र, केवल सृजन और संघर्ष से उदित शब्द ही लड़ते हैं। आज 21वीं शताब्दी के सूचना और प्रौद्योगिकी के हृदयहीन बाजार में इसीलिए हमें कभी-कभी ऐसी भी लगता है कि शायद शब्द कहीं खो गए हैं, मौन हो गए हैं या फिर संवेदनहीन हो गए हैं। लेकिन धैर्य से देखें और सोचे तो आपको दिखाई देगा कि समय का प्रत्येक सत्य, आज भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के बीच अकेला ही संचरण कर रहा है और सृजन के नित्य नए सेतु और वाद-विवाद तथा प्रतिवाद के आधार भी बना रहा है। साहित्य से समाज तक की यह शब्द यात्रा परिवर्तन की एक ऐसी मशाल हैं जो हजारों भाषाओं के साथ करोड़ों की जन चेतना में सद्भाव, सहिष्णुता और मानवीय सरोकारों की खिड़कियां खोलती रहती है। कोई 5 हजार साल से सभ्यता और संस्कृति का उज्जवल पथ यह साहित्य ही आलोकित कर रहा है, क्योंकि शब्द कभी मरता नहीं है और नूतन विचरण करता रहता है।<br /><br />राजस्थान को भारत और भारत को विश्व यह साहित्य का सत्य, शिव और सुंदरम् ही बनाता है और धर्म, जाति भाषा और क्षेत्रीयता की सरहदों को लांघकर शब्द की शाश्वत शक्ति और भक्ति का निर्माण भी करता है। राजस्थान ही में कोई दो हजार वर्ष की शब्द और साहित्य की चेतना यह बताती हैं कि राजपाट और सुख-दु:ख बदलते रहते हैं लेकिन रेत और पानी का रिश्ता कभी नहीं बदलता। धरती और आकाश की इच्छाएं कभी नहीं हारती और शब्द की विश्वसनीयता का गुरुत्वाकर्षण कभी नहीं मरता। आज हमारे समाज में दुर्भाग्य से मनुष्य और प्रकृति के बीच एक ऐसा मनमुटाव बढ़ रहा है कि लोग अपने भूत, भविष्य और वर्तमान की त्रिकाल छाया से ग्रस्त है और सामाजिक, आर्थिक गैर बराबरी के जलवायु परिवर्तन से व्याकुल और शोकाकुल अधिक है। इधर टैक्नोलॉजी लगातार मनुष्य को दिशाहीन और पैसे की खोज में समाज को संवेदनहीन और केवल सुख-शांति की आवश्यकता, हमारे जीवन दर्शन को अत्यधिक असुरक्षित बना रही है तो उधर सत्ता और व्यवस्था की आदिम हिंसक प्रवृत्तियां, शब्द और सत्य और सत्य पर निरंतर हमले कर रही हैं। फिर अराजकता के बीच अविश्वनीयता का एक ऐसा माहौल अब बन गया है कि वर्षा ऋतु में कोयल जैसे मौन हो जाती है और मेंढ़क जैसे मुकर-वाचाल हो जाते हैं वैसे ही लेखक और साहित्यकार भी बाजार, मीडिया और राजनीति के कोलाहल में आजकल अपने को अनुसना महसूस कर रहा है।<br /><br />लेकिन मित्रों! आप सब जानते हैं कि शब्द की नदी सरस्वती भी समय और अज्ञान के अंधेरे में कई बार मन से ओझल हो जाती है लेकिन वह देर-सेवर बूंद-बूंद बनकर, अग्नि परीक्षा का सृजन भी करती है और जन्म से मृत्यु तक मनुष्य की प्राण वायु बनकर बोलती भी है। वैदिक चाओं से लेकर मीरां बाई के पदों तक और रामायण से लेकर महाभारत तक यह शब्द ही साहित्य और समाज को समय के सभी प्रश्नों से मुठभेड़ करना सिखाता है। यह शब्द ही कभी निर्गुण और सगुणधारा बनकर बहते हैं तो यह सृजन का सरोकार ही कभी युद्ध और शांति का भाग्य लिखता है तो यह क्रोंचवध ही कभी शिकारी को ऋषि वाल्मीकि बनाता है तो कभी रवीन्द्रनाथ बनकर घर-घर में गाया जाता है तो कभी स्वामी विवेकानंद बनकर विश्व को धर्म की सनातन सहिष्णु व्याख्या देता है तो कभी भीमराव अंबेडकर बनकर मनुष्य होने का अधिकार और सम्मान भी सिखाता है। <br /><br />इस तरह शब्द कभी निरर्थक, लाचार और उदास नहीं होता तथा वह उपेक्षा और विस्मृति के गर्भ में रहकर भी अधिक प्रखर और अमृतधारा बन जाता है। ऐसे में शब्द और साहित्य का लोकतंत्र-सदैव राजनीति के आगे चलने वाली मशाल ही होता है और राजा की हिंसा में नहीं अपितु प्रजा (जनता) की अहिंसा में ही फलता- फूलता है। सामाजिक चेतना का प्रथम सृजनकर्ता और निर्माता यह शब्द ही है और साहित्यकार इसी पुनर्जागरण का प्रतिफल रचता और गाता है क्योंकि मनुष्य का शाश्वत सत्य तो गरीब और सर्वहारा की मंगलध्वनि में ही युगों-युगों तक प्रवाहमान बना रहता है। अत: घबराइए मत! शब्द और साहित्य को समाज के भीतर व्याप्त गैर बराबरी, हिंसा-प्रतिहिंसा और झूठ-सच को उजागर करने में अर्पित करते हुए वर्तमान समाज को भविष्य का नया सपना दीजिए। शब्द और साहित्य की प्रासंगिकता फिर आज यही है कि यथास्थिति को बदलने का जोखिम उठाएं। रागदरबारी को छोड़कर राग भैरवी और राग कल्याणी गायें। मनुष्य होने की गरिमा का महाकाव्य सुनाएं और दसों-दिशाओं में व्याप्त मुक्ति संग्राम की जनचेतना को एकजुट बनाएं।<br /><br />-वेदव्यास<br />(ये लेखक के अपने विचार हैं)</p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 20 Dec 2023 12:36:23 +0530</pubDate>
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                <title>श्रीलंकाई लेखक शेहान करुणातिलका ने जीता बुकर पुरस्कार 2022</title>
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                        <![CDATA[बुकर जीतने के बाद शेहान करुणातिलका ने कहा कि इस नोवेल को लेकर मुझे उम्मीद है कि ये भविष्य में पढ़ा जाएगा।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/sri-lankan-writer-shehan-karunatilaka-wins-booker-prize-2022/article-27006"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-10/seven.jpg" alt=""></a><br /><p>श्रीलंकाई लेखक शेहान करुणातिलका को बुकर पुरस्कार 2022 से नवाजा गया है। उन्हें यह पुरस्कार ''द सेवन मून्स ऑफ माली अल्मेडा'' उपन्यास के लिए दिया गया है। करुणातिलका को ट्रॉफी सहित 50,000 पाउंड का पुरस्कार भी मिला है। <br /><br />बुकर जीतने के बाद शेहान करुणातिलका ने कहा कि इस नोवेल को लेकर मुझे उम्मीद है कि ये भविष्य में पढ़ा जाएगा। इसे श्रीलंका में पढ़ा जाता है। जहां लोग इस नोवेल से सीखते हैं कि जातिवाद, भ्रष्टाचार और वंशवाद के विचार न कभी काम आते हैं और न ही आने वाले हैं। इसके साथ ही शेहान करुणातिलका ने कहा कि 'सेवन मून्स' कभी आउटडेटेड नहीं होगी।<br /><br /></p>
<blockquote class="twitter-tweet">
<p dir="ltr" lang="en" xml:lang="en">Shehan Karunatilaka is the winner of the <a href="https://twitter.com/hashtag/BookerPrize2022?src=hash&amp;ref_src=twsrc%5Etfw">#BookerPrize2022</a>! Watch his full acceptance speech on our website: <a href="https://t.co/Jn5UlteDaG">https://t.co/Jn5UlteDaG</a> <a href="https://twitter.com/ShehanKaru?ref_src=twsrc%5Etfw">@ShehanKaru</a> <a href="https://twitter.com/SortofBooks?ref_src=twsrc%5Etfw">@SortofBooks</a> <a href="https://t.co/tAO0HANBMV">pic.twitter.com/tAO0HANBMV</a></p>
— The Booker Prizes (@TheBookerPrizes) <a href="https://twitter.com/TheBookerPrizes/status/1582137142402162689?ref_src=twsrc%5Etfw">October 17, 2022</a></blockquote>
<p>

</p>
<p><strong>क्या है उपन्यास की कहानी</strong><br />द सेवन मून्स ऑफ माली अल्मेडा की कहानी श्रीलंका में 1990 के दौरान चल रहे गृहयुद्ध में समलैंगिक युद्ध फोटोग्राफर और जुआरी माली अल्मेडा के ऊपर आधारित है, जिनकी मौत हो जाती है।</p>]]>
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                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 18 Oct 2022 11:30:38 +0530</pubDate>
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                <title>ओटीटी पर दिखाया जा रहा है अच्छा कंटेंट : बाजपेयी </title>
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                        <![CDATA[लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान क्लार्क्स आमेर में अभिनेता मनोज बाजपेयी ने ओटीटी फिल्मों में दिखाई जा रही अश्लीलता के सवाल पर कहा कि वहां अच्छा कंटेंट भी दिखाया जा रहा है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/content-being-show-at-on-ott--says-manoj/article-5962"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-03/la-copy.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान क्लार्क्स आमेर में अभिनेता मनोज बाजपेयी ने ओटीटी फिल्मों में दिखाई जा रही अश्लीलता के सवाल पर कहा कि वहां अच्छा कंटेंट भी दिखाया जा रहा है। अश्लील कंटेंट भी, लेकिन यह दर्शकों को तय करना चाहिए कि वह क्या देखेंगे। इसी के अनुसार उन्हें फिल्में देखने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।</p>
<p>फेस्टिवल के एक सत्र में पीयूष पांडे द्वारा लिखित पुस्तक कुछ पाने की पर मनोज बाजपेयी ने कहा कि ऑटोबायोग्राफी कम देखता हूं। बाजपेयी ने कहा कि लिखने क रूचि है। ओटीटी ने देश को एकसूत्र में बांधा है। </p>]]>
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                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 11 Mar 2022 14:30:59 +0530</pubDate>
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                <title>तंजानिया के गुरनाह को साहित्य का नोबेल सम्मान</title>
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                        <![CDATA[उपन्यासों में किया शरणार्थियों का मार्मिक वर्णन]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/615fdbf2eb2de/article-1507"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-10/abdulrazak-gurnah.mks.-jpg.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>स्टॉकहोम</strong>। वर्ष 2021 का साहित्य का नोबेल पुरस्कार तंजानिया के उपन्यासकार अब्दुल रजाक गुरनाह को देने की घोषणा की गई है। गुरनाह को उपनिवेशवाद के प्रभावों और संस्कृतियों व महाद्वीपों के बीच की खाई में शरणार्थियों की स्थिति के करुणामय चित्रण को लेकर सम्मानित किया गया है। उनके उपन्यासों में शरणार्थियों का मार्मिक वर्णन मिलता है।  गुरनाह का जन्म 1948 में तंजानिया के जंजीबार में हुआ था। लेकिन 1960 के दशक के अंत में एक शरणार्थी के रूप में वह इंग्लैंड पहुंचे।  रिटायरमेंट के पहले तक वह केंट विश्वविद्यालय, कैंटरबरी में अंग्रेजी और उत्तर औपनिवेशिक साहित्य के प्रोफेसर थे।</p>
<p><br /> <strong>दुखद प्रेम कहानी ने दिलाई पहचान</strong><br /> गुरनाह के चौथे उपन्यास ‘पैराडाइज’ (1994) ने उन्हें एक लेखक के रूप में पहचान दिलाई थी। उन्होंने 1990 के आसपास पूर्वी अफ्रीका की एक शोध यात्रा के दौरान यही लिखी थी। यह एक दुखद प्रेम कहानी है जिसमें दुनिया और मान्यताएं एक-दूसरे से टकराती हैं।</p>
<p><br /> <strong>10 उपन्यास और कई लघु कथाएं प्रकाशित </strong><br />  गुरनाह के 10 उपन्यास और कई लघु कथाएं प्रकाशित हुई हैं। उनकी लेखनी में शरणार्थी की समस्याओं का वर्णन अधिक है। उन्होंने 21 वर्ष की उम्र से लिखना शुरू किया था, हालांकि शुरुआत में उनकी लिखने की भाषा स्वाहिली थी। बाद में उन्होंने अंग्रेजी को अपनी साहित्य लेखनी का माध्यम बनाया।</p>]]>
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                <pubDate>Fri, 08 Oct 2021 13:07:12 +0530</pubDate>
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