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                <title>supreme courts - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट का रूसी महिला को निर्वासन पर सख्त रुख : गुफा में रह रहीं मां-बेटियों को वापस भेजने की याचिका खारिज, इजरायली पिता को फटकार</title>
                                    <description><![CDATA[उच्चतम न्यायालय ने बिना किसी वैध दस्तावेज़ भारत में रह रही एक रूसी महिला और उसकी दो बेटियों को उनके देश वापस भेजने के फैसले को चुनौती देने वाली दायर याचिका पर विचार करने से सोमवार को इनकार कर दिया]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/supreme-courts-petition-to-send-the-mother-and-daughters-living/article-128922"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/supreme-court--3.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने बिना किसी वैध दस्तावेज़ भारत में रह रही एक रूसी महिला और उसकी दो बेटियों को उनके देश वापस भेजने के फैसले को चुनौती देने वाली दायर याचिका पर विचार करने से सोमवार को इनकार कर दिया। न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने दोनों बेटियों का पिता होने का दावा करने वाले याचिकाकर्ता इज़राइली नागरिक ड्रोर श्लोमो गोल्डस्टीन को कड़ी फटकार लगाते हुए कई सवाल पूछे। पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील से कई सवाल करते हुए उनकी इसे "प्रचार हित याचिका" भी बताया।</p>
<p>पीठ ने वकील से पूछा, "कृपया हमें कोई आधिकारिक दस्तावेज़ दिखाएँ, जिससे साबित हो कि आपको पिता घोषित किया गया है। हम आपको निर्वासित करने का निर्देश क्यों न दें? जब आपके बच्चे गुफा में रह रहे थे, तब आप गोवा में क्या कर रहे थे?"</p>
<p>इन सवालों पर वकील ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका वापस लेने का फैसला किया, जिसमें रूसी महिला और उसकी बेटियों को वापस भेजने के केंद्र सरकार के फैसले को बरकरार रखा गया था। कर्नाटक के गोकर्ण की एक गुफा में बिना किसी वैध दस्तावेज़ के पाई गई एक रूसी महिला और उसके बच्चों को वापस भेजने के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया।</p>
<p>रूसी नागरिक नीना कुटीना और उनके दो बेटियां 11 जुलाई को गोकर्ण के पास रामतीर्थ पहाड़ियों की एक गुफा में पाए गए थे। संबंधित अधिकारियों ने दावा किया था कि तीनों बिना किसी वैध दस्तावेज़ के लगभग दो महीने से गुफा में रह रहे थे। दावा किया गया था कि पैसे खत्म हो जाने के बाद महिला और उनकी दोनों बेटियां गुफा में रह रहे थे।</p>
<p>याचिकाकर्ता ने दावा किया कि अपने बच्चों का पता न लगने पर उसने पिछले साल गोवा के पणजी पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। उसने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, जिसने महिला और बेटियों को वापस भेजने के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। रूसी वाणिज्य दूतावास ने कुटीना और उसकी दोनों बेटियों के लिए आपातकालीन यात्रा दस्तावेज जारी किए थे, क्योंकि उसने जल्द से जल्द रूस लौटने की इच्छा जताई थी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Mon, 06 Oct 2025 18:42:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट का वक्फ संशोधन अधिनियम पर बड़ा फैसला : कुछ प्रावधानों पर अस्थायी रोक, गैर-मुस्लिम नियुक्तियों पर भी सीमा</title>
                                    <description><![CDATA[ उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अहम आदेश सुनाया]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/supreme-courts-major-verdict-waqf-amendment-act-2025-temporary-ban/article-126891"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/supreme-court--3.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 पर पूरी तरह से रोक लगाने से सोमवार को इनकार कर दिया लेकिन कहा कि अंतिम निर्णय आने तक इसके कुछ प्रावधानों पर रोक रहेगी। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टाइन जॉर्ज मसीह की पीठ ने संबंधित कानून के संशोधन की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अंतरिम आदेश पारित किया। पीठ ने 22 मई को उस कानून के विभिन्न प्रावधानों पर रोक लगाने की याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।</p>
<p>शीर्ष अदालत ने वक्फ संशोधन अधिनियम, 2025 के कुछ प्रावधानों पर के क्रियान्वयन पर रोक लगाते हुए वक्फ के लिए संपत्ति समर्पित करने के लिए 5 साल तक इस्लाम का पालन करने के मानदंड के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी। शीर्ष अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को वक्फ के रूप में संपत्ति समर्पित करने से पहले पांच वर्षों तक मुस्लिम होना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि धारा 3(आर), इस अनिवार्यता पर तब तक रोक रहेगी जब तक कि राज्य (सरकार) द्वारा यह जांचने के लिए नियम नहीं बनाए जाते कि व्यक्ति मुस्लिम है या नहीं।</p>
<p>न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसे किसी नियम/तंत्र के बिना, यह प्रावधान मनमाने ढंग से सत्ता का प्रयोग करेगा। अदालत ने कहा कि कलेक्टर को नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकारों का न्यायनिर्णयन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इससे शक्तियों के पृथक्करण का उल्लंघन होगा।</p>
<p>पीठ ने वक्फ निकायों में गैर-मुस्लिमों को शामिल करने के प्रावधान पर के मामले में कहा कि फिलहाल राज्य वक्फ बोर्ड में तीन से अधिक गैर-मुस्लिम सदस्य शामिल नहीं किए जाने चाहिए और केंद्रीय वक्फ बोर्ड में कुल मिलाकर चार से अधिक गैर-मुस्लिम सदस्य शामिल नहीं किए जाएगे। शीर्ष अदालत ने 25 अप्रैल को सुनवाई के दौरान केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने संशोधित वक्फ अधिनियम 2025 का बचाव करते हुए एक प्रारंभिक हलफनामा दायर किया। केंद्र ने संसद द्वारा पारित संवैधानिकता की धारणा वाले किसी भी कानून पर अदालत द्वारा किसी भी तरह की पूर्ण रोक का विरोध किया था।</p>
<p>अदालत ने 3 दिनों तक दलीलें सुनीं, जिसमें केंद्र ने तर्क दिया कि संसद द्वारा विधिवत अधिनियमित इस कानून के क्रियान्वयन पर रोक लगाने के लिए केवल कानूनी प्रस्ताव या काल्पनिक तर्क पर्याप्त नहीं हैं। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दावा किया था कि वक्फ प्रबंधन ने स्मारकों का दुरुपयोग किया है, दुकानों के लिए जगहें बनाई हैं और अनधिकृत परिवर्तन किए हैं।</p>
<p>केंद्र सरकार ने पहले आश्वासन दिया था कि किसी भी वक्फ संपत्ति (जिसमें उपयोगकर्ता द्वारा स्थापित संपत्तियाँ भी शामिल हैं) को गैर-अधिसूचित नहीं किया जाएगा। उसने यह भी कहा था कि 2025 के अधिनियम के तहत केंद्रीय वक्फ परिषद या राज्य वक्फ बोर्डों में गैर-मुस्लिमों की नियुक्ति नहीं की जाएगी। शीर्ष अदालत के समक्ष इस अधिनियम के खिलाफ 100 से अधिक याचिकाएँ दायर की गई थीं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Mon, 15 Sep 2025 12:12:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>केवल दिल्ली तक सीमित न हो पटाखा प्रतिबंध : पूरे देश में लागू हो यह नीति, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- पूरे देश को स्वच्छ वातावरण का हक</title>
                                    <description><![CDATA[ मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर सरकार पटाखों पर रोक लगाने का विचार करती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/supreme-courts-big-statement-cracker-ban-should-not-be-limited/article-126673"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/supreme-court--3.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पटाखों पर प्रतिबंध केवल राजधानी दिल्ली तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अदालत ने टिप्पणी की है कि स्वच्छ और प्रदूषण-मुक्त हवा का अधिकार देश के हर नागरिक को है, न कि केवल "अभिजात वर्ग" वाली दिल्ली को है। मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर सरकार पटाखों पर रोक लगाने का विचार करती है, तो यह नीति पूरे देश में लागू होनी चाहिए।</p>
<p>मुख्य न्यायाधीश ने सवाल उठाया कि "क्या सिर्फ इसलिए कि सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली में है या यह राजधानी है, यहां की हवा साफ होनी चाहिए और बाकी शहरों के लोग प्रदूषण झेलें। कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर में पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध के खिलाफ एक याचिका पर सीएक्यूएम को भी नोटिस जारी किया और 2 सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। <br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Fri, 12 Sep 2025 17:34:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला : बिहार में मतदाता सूची संशोधन की डेडलाइन बढ़ी, दलों और मतदाताओं को राहत</title>
                                    <description><![CDATA[ उच्चतम न्यायालय ने बिहार में मसौदा मतदाता सूची तैयार करने के लिए पूर्व निर्धारित समय सीमा (1 सितंबर) के बाद भी राज्य के निवासियों के दावे या आपत्तियां स्वीकार करने की चुनाव आयोग को सोमवार अनुमति दे दी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/supreme-courts-big-decision-of-voter-list-amendment-in-bihar/article-125478"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/1ne1ws-(1)3.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने बिहार में मसौदा मतदाता सूची तैयार करने के लिए पूर्व निर्धारित समय सीमा (1 सितंबर) के बाद भी राज्य के निवासियों के दावे या आपत्तियां स्वीकार करने की चुनाव आयोग को सोमवार अनुमति दे दी।</p>
<p>इस साल जून में विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत बिहार में मसौदा मतदाता सूची तैयार करने का शुरू किया गया। न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने अनुमति देते हुए चुनाव आयोग की इस दलील पर गौर किया कि नामांकन (इस साल निर्धारित विधानसभा चुनाव) की अंतिम तिथि से पहले दायर किए गए सभी दावों या आपत्तियों पर विचार किया जाएगा।</p>
<p>शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय जनता दल और एआईएमआईएम द्वारा दावे और आपत्तियाँ दायर करने की समय सीमा दो सप्ताह बढ़ाने के लिए दायर आवेदनों पर विचार करते हुए यह अनुमति दी। शीर्ष अदालत के समक्ष चुनाव आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी कहा कि दावे या आपत्तियाँ एक सितंबर की समय सीमा के बाद भी प्रस्तुत की जा सकती हैं। मतदाता सूची को अंतिम रूप दिए जाने के बाद उन पर विचार किया जाएगा।</p>
<p>अधिवक्ता द्विवेदी ने आश्वासन दिया कि यह प्रक्रिया नामांकन की अंतिम तिथि तक जारी रहेगी और सभी शामिल या हटाएं गए नामों को जांच प्रताल के बाद अंतिम सूची में शामिल किया जाएगा। न्यायालय ने आपत्तियाँ दर्ज कराने में संबंधित व्यक्तियों की सहायता के लिए अर्ध-विधिक स्वयंसेवकों की तैनाती का भी निर्देश दिया। साथ ही, राजनीतिक दलों से भी इस प्रक्रिया में सक्रिय होने को कहा।</p>
<p>पीठ के समक्ष श्री द्विवेदी ने कहा कि 7.24 करोड़ मतदाताओं में से 99.5 फीसदी ने अपने फॉर्म दाखिल कर दिए हैं। मसौदे से बाहर किए गए 65 लाख मतदाताओं में से, केवल 33,326 लोगों और 25 दलों के माध्यम से दावे प्रस्तुत किए गए हैं। उन्होंने कहा कि हटाए गए नामों के लिए 1,34,738 आपत्तियाँ दायर की गई हैं। अधिवक्ता ने कहा कि यह अजीब है कि राजनीतिक दल मसौदा सूची से मतदाताओं को हटाने की मांग करते हुए आपत्तियाँ दायर कर रहे हैं, न कि शामिल करने के लिए कोई दावा।</p>
<p>शीर्ष अदालत ने 22 अगस्त को आदेश दिया था कि बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान जिन लोगों को मतदाता सूची के प्रारूप से बाहर रखा गया है, वे ऑनलाइन माध्यम से आवेदन कर सकते हैं। उन्हें व्यक्तिगत रूप से आवेदन जमा करने की आवश्यकता नहीं है। राजद सांसद मनोज झा, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर), पीयूसीएल, स्वराज इंडिया के नेता योगेंद्र यादव, तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा और बिहार के पूर्व विधायक मुजाहिद आलम ने समेत अन्य ने याचिकाएं दायर की थीं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Mon, 01 Sep 2025 15:47:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>ऑपरेशन सिंदूर केस : सुप्रीम कोर्ट की बड़ी राहत, पत्रकार वरदराजन की गिरफ्तारी पर रोक</title>
                                    <description><![CDATA[उच्चतम न्यायालय ने 'ऑपरेशन सिंदूर' से संबंधित खबर के आधार पर असम पुलिस की ओर से दर्ज मुकदमे के मामले में पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन को अंतरिम राहत]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/operation-sindoor-case-ban-on-the-arrest-of-supreme-courts/article-123517"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/supreme-court--3.jpg" alt=""></a><br /><p>नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने 'ऑपरेशन सिंदूर' से संबंधित खबर के आधार पर असम पुलिस की ओर से दर्ज मुकदमे के मामले में पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन को अंतरिम राहत देते हुए उनके खिलाफ किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई करने पर मंगलवार को रोक लगा दी। इसके साथ ही अदालत ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया।</p>
<p>न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने फाउंडेशन फॉर इंडिपेंडेंट जर्नलिज्म और वरदराजन की ओर से दायर रिट याचिका पर यह अंतरिम आदेश पारित किया। याचिका में राजद्रोह कानून के दंडात्मक प्रावधान, भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 152 की वैधता को चुनौती दी गई है।</p>
<p>पीठ ने उनके अधिवक्ता की दलीलें सुनने के बाद राहत दी और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। अदालत ने इस मामले को सेवानिवृत्त मेजर जनरल एस जी वोम्बटकेरे की एक अन्य याचिका के साथ संलग्न कर दिया, जिसमें बीएनएस की धारा 152 की वैधता को चुनौती दी गई है। पीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि मीडियाकर्मियों को एक अलग वर्ग के रूप में नहीं माना जा सकता।<br />पीठ ने यह भी कहा कि जब अपराध किसी समाचार माध्यम द्वारा प्रकाशित लेखों से संबंधित हो तो हिरासत में पूछताछ आवश्यक नहीं हो सकती क्योंकि ये ऐसे मामले हैं जिनमें हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं होती।<br />याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नित्या रामकृष्णन ने तर्क दिया कि नया प्रावधान अस्पष्ट और व्यापक है और इससे मीडिया के रिपोर्टिंग के अधिकार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है। अदालत ने राजद्रोह से संबंधित भारतीय न्याय संहिता (आईपीसी की धारा 124-ए की जगह लेने वाला प्रावधान) की धारा 152 की संवैधानिक वैधता की जांच करने पर आइ अगस्त को सहमति व्यक्त की थी।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Wed, 13 Aug 2025 19:09:04 +0530</pubDate>
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