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                <title>pigeons - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>असर खबर का : नवज्योति ने समाज में किया जागरूकता का संचार, स्कूलों में पहुंचा वन विभाग, कबूतरों से स्वास्थ्य नुकसान से किया रुबरु</title>
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                        <![CDATA[नवज्योति की खबरों को वन्यजीव विभाग ने बनाया अवेयरनेस कैम्पेन]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/impact-of-news---navjyoti-spread-awareness-in-the-society--forest-department-reached-schools--made-people-aware-of-the-health-hazards-caused-by-pigeons/article-127022"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(4)7.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कबूतरों के पंखों की फड़फड़ाहट व बीट से पनपने वाले बैक्ट्रीरिया से होने वाली जानलेवा बीमारियां को लेकर दैनिक नवज्योति ने लगातार खबरें प्रकाशित कर समाज व वन विभाग को जागरूक किया। नवज्योति में छपी खबर को  वन्यजीव विभाग कोटा ने अपना अभियान बनाकर जागरूकता कैम्पेन बना लिया। वन अधिकारी व कर्मचारी अब स्कूलों में पहुंच बच्चों को कबूतरों को दाना डालने से प्रकृति के ईको सिस्टम व स्वास्थ्य को होने वाले नुकसान से रुबरु कर रहा है।  शोर्ट मूवी, खबरों की कटिंग के माध्यम से बच्चों को बुनियादी शिक्षा से ही जागरूक किया जा रहा है। वन्यजीव विभाग के डीएफओ अनुराग भटनागर ने नवज्योति के प्रयास सामाजिक सरोकार में सराहनीय है। उन्होंने बताया कि कबूतरों के पंख व बीट में जानलेवा बैक्ट्रीरिया होते हैं, जो हवा के साथ शरीर में प्रवेश करने से फेफड़ों में मधुमक्खी के छत्ते जैसे जाले और फाइब्रोसिस के खड्ढ़े बना देता है। इस पर दवाएं भी असर नहीं करती। ऐसी स्थिति में जान बचाने का एकमात्र विकल्प लंग्स ट्रांसप्लांट ही बचता है। </p>
<p>इधर, सीनियर चेस्ट फिजिशियन डॉ. केवल कृष्ण डंग कहते हैं, कबूतर की बीट और उसके पंख में थर्मोफिलिक एक्टिनोमाइ साइटिस सहित अन्य कीटाणु होते हैं, जो फेफड़ों पर बुरा असर डालते हैं। जो लोग कबूतर पालते हैं या जिनकी बालकनी, रोशनदान में कबूतर आते हैं, उन्हें एलर्जी का न्यूमोनिया होने का खतरा अधिक रहता है। जिसे हाइपरसेंसेटिव न्यूमोनाइटिस कहते हैं। यह रोग फेफड़ों की झिल्ली और श्वास नलियां खराब करता है। जिससे सांस में तकलीफ और खांसी होती है। अगर इसका तुरंत पता नहीं लगाया जाए तो फेफड़े खत्म हो सकते हैं। शरुआती दौर में खांसी बुखार जैसे लक्षण होते हैं, जो टीबी जैसे लगते हैं। भारत में बच्चों में यह बीमारी नहीं के बराबर होती है। लेकिन गत वर्ष 10 वर्षीय बच्ची का जो केस आया, वो मैंने अपने कॅरिअर में पहला मामला देखा।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Sep 2025 16:07:44 +0530</pubDate>
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                <title> कबूतर कहीं चुग न जाए आपकी सेहत, छतों से सार्वजनिक स्थानों पर कबूतरों का कब्जा</title>
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                        <![CDATA[आस्था और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बीच सामजंस्य बनाकर हल निकाले प्रशासन।
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/pigeons-should-not-eat-your-health/article-124412"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-08/1ne1ws-(2)56.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कबूतरों को दाना डालने की आदत समय के साथ आस्था में तब्दील हो गई और धीरे-धीरे आस्था की जड़े हमारे जहन में इतनी गहरी हो गई की हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण को भी अनदेखी करने लगे हैं, जो न केवल प्रकृति के ईको सिस्टम को बर्बाद कर रहा बल्कि मानव जीवन को घातक संक्रमण व बीमारियों की ओर धकेल रहा है। चिकित्सकों व पर्यावरणविदें का तर्क है, दुनिया में 90% पक्षी कीटभक्षी और 10% बीजभक्षी होते हैं, जिसमें कबूतर भी शामिल है।  अनाज, ज्वार व बाजरा किसी भी पक्षी का नेचुरल फूड नहीं है। वहीं, जाने-अनजाने में इंसानी दखल से पक्षियों की खाद्यय शृखंला टूट रही है। वर्तमान में स्थिति यह हो गई कि कबूतर अब अपना मुख्य भोजन बीज खाना भूल गया, अब वह आर्टिफिशल फूड पर निर्भर हो गया। इतना ही नहीं कबूतरों को ज्वार-बाजरा खिलाना इंसान की दिनचर्या में शामिल हो गया। नियमित भोजन मिलने से उनकी संख्या में तेजी से इजाफा हुआ। जबकि, इनके पंखों की फड़फड़ाहट व बीट से हाइपर सेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस, फंग्ल इंफेक्शन हिस्टोप्लासमोसिस और क्रिप्टोकोकोसिस जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ गया। ऐसे में प्रशासन को आस्था और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बीच सामंजस्य बनाकर गंभीर चुनौति का हल निकालने के प्रयास करना चाहिए।</p>
<p><strong>छतों से सार्वजनिक स्थानों पर कबूतरों का कब्जा</strong><br />कबूतरों को दाना डालना अब लोगों की दिनचर्या में शामिल हो चुका है। छतों से लेकर सार्वजनिक स्थानों को ही पक्षी चुग्गा स्थल बना दिया है। कोटा बैराज हो या किशोर सागर तालाब की पाल, हर जगह बड़ी संख्या में कबूतरों का जमावड़ा लगा रहता है। ऐसे में यहां से लोगों के गुजरने के दौरान कबूतर की फड़फड़ाहट से पंखों से निकलने वाले बैक्टेरिया व सूखी बीट के वायरस हवा के साथ शरीर में पहुंचकर फेफड़े डेमेज कर रहे हैं। </p>
<p>- जिम्मेदार विभाग स्कूली स्तर पर बच्चों को करें जागरूक<br />- दान-पुण्य के फेर में फूड चैन और ईको सिस्टम को कर रहे बर्बाद </p>
<p><strong>विशेषज्ञ बोले - आर्टिफिशल फिडिंग बंद हो,  ईको सिस्टम से न करें छेड़छाड़</strong><br />प्रशासन को आस्था और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बीच सामंजस्य बिठाकर सामाजिक परिवर्तन की दिशा में सार्थक जागरूकता अभियान चलाना चाहिए। फेफड़ों के इंफेक्शन से पीड़ित मरीजों में सबसे ज्यादा संख्या उन मरीजों की है जो घरों की छतों पर नियमित दाना डालते हैं और सावर्जनिक स्थानों पर कबूतरों के सम्पर्क में रहते हैं। प्रशासन को आबादी से दूर खुली जगह पर पक्षी चुग्गा विकसित करना चाहिए ताकि कबूतर एक ही जगह इक्कठा हो सके और कॉलोनियों से संख्या घटे। कबूतरों की बीट से घातक बीमरिया बढ़ रही है।<br /><strong>- डॉ. केके डंग, सीनियर चेस्ट फिजिशियन</strong></p>
<p>कबूतर के पंखों की फड़फड़ाहट व बीट के सम्पर्क में आने से  फंग्ल इंफेक्शन हिस्टोप्लासमोसिस और क्रिप्टोकोकोसिस जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा रहता है। ऐसे में घर के आंगन, बालकनी या छत पर दाना डालने से बचें। प्रशासन को दूर कहीं खुले में दाना डालने की व्यवस्था करनी चाहिए। लेकिन यहां भी लोगों को दाना डालने के दौरान फिल्टर मास्क व दस्ताने का उपयोग करना चाहिए। <br /><strong>- डॉ. राजेंद्र ताखर, श्वांस रोग विशेषज्ञ मेडिकल कॉलेज</strong></p>
<p>किसी भी धर्म में यह नहीं लिखा है कि कबूतरों को दाना डाला जाए। प्रकृति ने उन्हें खुद भोजन जुटाने और जीवन जीने के लायक बनाया है। उन्हें दाना डालकर प्रकृति के ईको सिस्टम से खिलवाड़ कर रहे हैं। आर्टिफिशल फिडिंग तुरंत बंद होनी चाहिए। चूंकी, लोगों की आस्था इससे जुड़ी है। ऐसे में जिम्मेदार विभाग की निगरानी में आबादी से दूर ऐसा स्थान डवलप करना चाहिए,जहां पक्षियों को दाना डाला जा सके। ताकि, शहरी लोग प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से गंभीर बीमारियों से बच सके। वहीं, सार्वजनिक स्थानों पर दाना डालने पर प्रशासन को रोक लगानी चाहिए।<br /><strong>- प्रो. अनिल कुमार छंगाणी, पर्यावरण विभागाध्यक्ष, बीकानेर विवि</strong></p>
<p><strong>ज्वार-बाजरा व अनाज पक्षियों के फूड में शामिल नहीं</strong><br />दुनिया में 90% पक्षी कीटभक्षी व 10% बीजभक्षी होते हैं। कीटभक्षी-कीड़े-मकोड़े खाकर पर्यावरण को स्वच्छ बनाते हैं और बीज खाने वाले पक्षी एक स्थान से दूसरे स्थान पर बीज फैलाकर पेड़-पौधों का प्रसार करते हैं।  लेकिन, वर्तमान में इंसान से प्राकृतिक खाद्य  शृंखला में दखल कर फूड चैन तोड़ दी। जिसके दुष्परिणाम गंभीर बीमारियों के रूप में सामने आ रहे हैं। यदि, दान पुण्य ही करना है तो शहर में कई गौशाला है, वहां चारा डलवाएं। कैपटेविटी एनिमल स्पोंसरशिप के तहत चिड़ियाघर व बायोलॉजिकल पार्क में मौजूद वन्यजीवों के भोजन, स्वास्थ्य व देखरेख कर आस्था निभा सकते हैं। आस्था के नाम पर पक्षियों को गुलाम बनाना नेचर के खिलाफ है। कबूतरों की संख्या तेजी से बढ़ने के कारण  गौरेया, बुलबुल, नीलकंठ, कटवा सहित अन्य चिड़िया शहरों में लुप्त हो गई। प्रकृति में हर जीव का अपना किरदार है, जिसे छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए। <br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>
<p><strong>यह बोले प्रशासनिक अधिकारी</strong><br />आबादी से दूर चुग्गा स्थल बनाया जा सकता है लेकिन निगम के पास जमीन नहीं है। गायों के लिए कायन हाउस बनाए फिर भी लोग सड़कों पर ही चारा खिला रहे हैं। सामाजिक परिवर्तन के लिए लोगों को ही जागरूक होना होगा।  <br /><strong>- अशोक त्यागी, आयुक्त कोटा उत्तर नगर निगम </strong></p>
<p>धार्मिक व सामाजिक संस्थाएं प्रस्ताव बनाकर सुझाव दें तो केडीए अपना दायित्व निभाएगा। वैसे, यह काम नगर निगम का है। केडीए का काम आधारभूत संरचना विकसित करना है। <br /><strong>- हरफूल यादव, कमिशनर केडीए</strong></p>
<p><strong>कबूतर प्रेमी बोले- दिल को मिलता सुकून</strong><br />बेजुबानों का पेट भरना पुण्य है। कबूतरों को दाना डालने से सुकून मिलता है। यदि, प्रशासन कहीं पक्षी चुग्गा डवलप करता है तो हम वहां पर दाना डाल देंगे। <br /><strong>- श्याम मेवाड़ा, हितेश विजय, पक्षी प्रेमी </strong></p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Fri, 22 Aug 2025 17:24:26 +0530</pubDate>
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                <title>सावधान मौत की चौखट पर ले जा रही कबूतरों से दोस्ती</title>
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                        <![CDATA[लंग्स ट्रांसप्लांट तक की आ जाती है नौबत ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/be-careful--friendship-with-pigeons-is-taking-you-to-the-threshold-of-death/article-124057"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-08/1ne1ws-(3)37.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। धर्म व आस्था के नाम पर यदि, आप कबूतरों को दाना डाल रहे हैं तो सावधान हो जाइए, क्योंकि, कबूतर अब संदेशा नहीं, मौत का फरमान लाता  है। कबूतरों के पंखों की फड़फड़ाहट व बीट में जानलेवा बैक्टेरिया होते हैं, जो हवा के साथ शरीर में प्रवेश करते हैं और फेफड़ों में मधुमक्खी के छत्ते जैसे स्थायी जाले और फाइब्रोसिस के खड्ढ़े बना देता है। इस पर दवाएं भी असर नहीं करती। ऐसी स्थिति में जान बचाने का एकमात्र विकल्प लंग्स ट्रांसप्लांट ही होता है, जो अत्यधिक महंगा होने के कारण हर किसी के लिए संभव नहीं होता।  शांत और मासूम लगने वाले यह कबूतर स्वास्थ्य के लिए कितने खतरनाक हैं, पढ़िए रिपोर्ट के प्रमुख अंश...</p>
<p><strong>कबूतरों की बीट से बढ़ रही घातक बीमारियां </strong><br /><strong>केस 1-10 साल की बच्ची के फेफड़े हुए खराब </strong><br />कबूतर के सम्पर्क में रहने से बोरखेड़ा क्षेत्र के आदित्य आवास कॉलोनी निवासी 10 वर्षीय बालिका के दोनों फेफड़े खराब हो गए थे। सांस में तकलीफ व कमजोरी होने पर डॉक्टरों को दिखाया तो पता चला कि फेफड़ों की झिल्ली में राई जैसे दाने बन गए और निमोनिया विकसित हो गया। सीटी स्कैन और नसों की एंजियोग्राफी  कराने पर पता चला कि उसे हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस हुआ था। </p>
<p><strong>केस 2 - कबूतरों से दूरी बनाई तो बची जान</strong><br />सीनियर चेस्ट फिजिशियन डॉ. केवल कृष्ण डंग ने बताया कि शहर की 73 वर्षीय एक महिला सालभर से सूखी खांसी और सांस की तकलीफ के साथ दिखाने आई थीं। उनके बेडरूम की बालकनी में कबूतरों का घोंसला था। एचआरसीटी  से बीमारी का शुरूआत चरण में पता चला। उन्हें तुरंत कबूतरों से दूरी व दवा लेने की सलाह दी। आज वह बिना ऑक्सीजन सपोर्ट के 200 मीटर चल पाती हैं।</p>
<p><strong>केस 3- महिला को लंग्स ट्रांसप्लांट कराना पड़ा</strong><br />नवंबर 2023 में दिल्ली निवासी एक 53 वर्षीय महिला को कबूतरों की सूखी बीट के संपर्क में आने से फेफड़ों की गंभीर बीमारी हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस हो गई। यह बीमारी इतनी गंभीर थी कि फेफड़ों ने काम करना बंद कर दिया। बाद में महिला को लंग्स ट्रांसप्लांट तक कराना पड़ा। </p>
<p><strong>यह रखें सावधानी </strong><br />- कबूतरों को घरों की छत, बालकनी पर दाना डालने से बचें। <br />- रिहायशी इलाकों से दूर खुले मैदान में दूर से दाना डाल सकते हैं।<br />- कमरों के आसपास कबूतरों के घोंसलें नहीं बनने दें। साफ-सफाई रखें।<br />- यदि लगातार खांसी या सांस की तकलीफ हो तो चिकित्सकीय जांच कराएं।<br />- छतों पर बीट को साफ करते वक्त हाथों में दस्ताने व मुंह माक्स पहनें। </p>
<p><strong>शहर में कहां-कहां कबूतरों को डाले जा रहे दाने </strong><br />- शहर में कबूतरों को दाने डालने का सबसे प्रमुख स्थान कोटा बैराज की पुलिया है। जहां हजारों लोग कबूतरों को दाना डालने आते हैं।<br />- किशोर सागर की पाल, आॅक्सीजोन पार्क, सेवन वंडर, सीवी गार्डन, पार्क, बहुमंजिला इमारतों के कैम्पस, पर्यटन स्थलों पर भी लोग कबूतरों को दाना डाल रहे हैं। </p>
<p><strong>एक्सपर्ट व्यू </strong><br />कबूतर की बीट और उसके पंख में थर्मोफिलिक एक्टिनोमाइ साइटिस सहित अन्य कीटाणु होते हैं, जो फेफड़ों पर बुरा असर डालते हैं। जो लोग कबूतर पालते हैं या जिनकी बालकनी, रोशनदान में कबूतर आते हैं, उन्हें एलर्जी का न्यूमोनिया होने का खतरा अधिक रहता है। जिसे हाइपरसेंसेटिव न्यूमोनाइटिस कहते हैं। यह रोग फेफड़ों की झिल्ली और श्वास नलियां खराब करता है। जिससे सांस में तकलीफ और खांसी होती है। अगर इसका तुरंत पता नहीं लगाया जाए तो फेफड़े खत्म हो सकते हैं। शरुआती दौर में खांसी बुखार जैसे लक्षण होते हैं, जो टीबी जैसे लगते हैं। भारत में बच्चों में यह बीमारी नहीं के बराबर होती है। लेकिन गत वर्ष 10 वर्षीय बच्ची का जो केस आया, वो मैंने अपने कॅरिअर में पहला मामला देखा।<br /><strong>-डॉ. केवल कृष्ण डंग, सीनियर चेस्ट फिजिशियन </strong></p>
<p><strong>कबूतर 100 किलो जहर पैदा करता है</strong><br />कबूतरों को दाना डालना न केवल स्वास्थ्य के लिए घातक है बल्कि ईको सिस्टम को भी बर्बाद करना जैसा है। फिडिंग और ब्रिडिंग से इनकी संख्या में लगातार बढ़ रही है। जिससे गौरेया, चिड़ियाएं, कोयल सहित कई छोटे पक्षी लुप्त होते जा रहे हैं। एक साल में एक कबूतर करीब 100 किलो बीट करता है, जो इंसानों के लिए जहर है। दाना डालने से नुकसान कर रहे हैं। वन्यजीव विभाग की ओर से कैपटेविटी एनिमल स्पोंसरशिप स्कीम चला रखी है। यहां चिड़ियाघर में मौजूद वन्यजीवों का भरण-पोषण कर दान-पुण्य कर सकते हैं। <br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग</strong></p>
<p> </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Tue, 19 Aug 2025 15:17:57 +0530</pubDate>
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