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                <title>सावधान मौत की चौखट पर ले जा रही कबूतरों से दोस्ती</title>
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                        <![CDATA[लंग्स ट्रांसप्लांट तक की आ जाती है नौबत ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/be-careful--friendship-with-pigeons-is-taking-you-to-the-threshold-of-death/article-124057"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-08/1ne1ws-(3)37.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। धर्म व आस्था के नाम पर यदि, आप कबूतरों को दाना डाल रहे हैं तो सावधान हो जाइए, क्योंकि, कबूतर अब संदेशा नहीं, मौत का फरमान लाता  है। कबूतरों के पंखों की फड़फड़ाहट व बीट में जानलेवा बैक्टेरिया होते हैं, जो हवा के साथ शरीर में प्रवेश करते हैं और फेफड़ों में मधुमक्खी के छत्ते जैसे स्थायी जाले और फाइब्रोसिस के खड्ढ़े बना देता है। इस पर दवाएं भी असर नहीं करती। ऐसी स्थिति में जान बचाने का एकमात्र विकल्प लंग्स ट्रांसप्लांट ही होता है, जो अत्यधिक महंगा होने के कारण हर किसी के लिए संभव नहीं होता।  शांत और मासूम लगने वाले यह कबूतर स्वास्थ्य के लिए कितने खतरनाक हैं, पढ़िए रिपोर्ट के प्रमुख अंश...</p>
<p><strong>कबूतरों की बीट से बढ़ रही घातक बीमारियां </strong><br /><strong>केस 1-10 साल की बच्ची के फेफड़े हुए खराब </strong><br />कबूतर के सम्पर्क में रहने से बोरखेड़ा क्षेत्र के आदित्य आवास कॉलोनी निवासी 10 वर्षीय बालिका के दोनों फेफड़े खराब हो गए थे। सांस में तकलीफ व कमजोरी होने पर डॉक्टरों को दिखाया तो पता चला कि फेफड़ों की झिल्ली में राई जैसे दाने बन गए और निमोनिया विकसित हो गया। सीटी स्कैन और नसों की एंजियोग्राफी  कराने पर पता चला कि उसे हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस हुआ था। </p>
<p><strong>केस 2 - कबूतरों से दूरी बनाई तो बची जान</strong><br />सीनियर चेस्ट फिजिशियन डॉ. केवल कृष्ण डंग ने बताया कि शहर की 73 वर्षीय एक महिला सालभर से सूखी खांसी और सांस की तकलीफ के साथ दिखाने आई थीं। उनके बेडरूम की बालकनी में कबूतरों का घोंसला था। एचआरसीटी  से बीमारी का शुरूआत चरण में पता चला। उन्हें तुरंत कबूतरों से दूरी व दवा लेने की सलाह दी। आज वह बिना ऑक्सीजन सपोर्ट के 200 मीटर चल पाती हैं।</p>
<p><strong>केस 3- महिला को लंग्स ट्रांसप्लांट कराना पड़ा</strong><br />नवंबर 2023 में दिल्ली निवासी एक 53 वर्षीय महिला को कबूतरों की सूखी बीट के संपर्क में आने से फेफड़ों की गंभीर बीमारी हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस हो गई। यह बीमारी इतनी गंभीर थी कि फेफड़ों ने काम करना बंद कर दिया। बाद में महिला को लंग्स ट्रांसप्लांट तक कराना पड़ा। </p>
<p><strong>यह रखें सावधानी </strong><br />- कबूतरों को घरों की छत, बालकनी पर दाना डालने से बचें। <br />- रिहायशी इलाकों से दूर खुले मैदान में दूर से दाना डाल सकते हैं।<br />- कमरों के आसपास कबूतरों के घोंसलें नहीं बनने दें। साफ-सफाई रखें।<br />- यदि लगातार खांसी या सांस की तकलीफ हो तो चिकित्सकीय जांच कराएं।<br />- छतों पर बीट को साफ करते वक्त हाथों में दस्ताने व मुंह माक्स पहनें। </p>
<p><strong>शहर में कहां-कहां कबूतरों को डाले जा रहे दाने </strong><br />- शहर में कबूतरों को दाने डालने का सबसे प्रमुख स्थान कोटा बैराज की पुलिया है। जहां हजारों लोग कबूतरों को दाना डालने आते हैं।<br />- किशोर सागर की पाल, आॅक्सीजोन पार्क, सेवन वंडर, सीवी गार्डन, पार्क, बहुमंजिला इमारतों के कैम्पस, पर्यटन स्थलों पर भी लोग कबूतरों को दाना डाल रहे हैं। </p>
<p><strong>एक्सपर्ट व्यू </strong><br />कबूतर की बीट और उसके पंख में थर्मोफिलिक एक्टिनोमाइ साइटिस सहित अन्य कीटाणु होते हैं, जो फेफड़ों पर बुरा असर डालते हैं। जो लोग कबूतर पालते हैं या जिनकी बालकनी, रोशनदान में कबूतर आते हैं, उन्हें एलर्जी का न्यूमोनिया होने का खतरा अधिक रहता है। जिसे हाइपरसेंसेटिव न्यूमोनाइटिस कहते हैं। यह रोग फेफड़ों की झिल्ली और श्वास नलियां खराब करता है। जिससे सांस में तकलीफ और खांसी होती है। अगर इसका तुरंत पता नहीं लगाया जाए तो फेफड़े खत्म हो सकते हैं। शरुआती दौर में खांसी बुखार जैसे लक्षण होते हैं, जो टीबी जैसे लगते हैं। भारत में बच्चों में यह बीमारी नहीं के बराबर होती है। लेकिन गत वर्ष 10 वर्षीय बच्ची का जो केस आया, वो मैंने अपने कॅरिअर में पहला मामला देखा।<br /><strong>-डॉ. केवल कृष्ण डंग, सीनियर चेस्ट फिजिशियन </strong></p>
<p><strong>कबूतर 100 किलो जहर पैदा करता है</strong><br />कबूतरों को दाना डालना न केवल स्वास्थ्य के लिए घातक है बल्कि ईको सिस्टम को भी बर्बाद करना जैसा है। फिडिंग और ब्रिडिंग से इनकी संख्या में लगातार बढ़ रही है। जिससे गौरेया, चिड़ियाएं, कोयल सहित कई छोटे पक्षी लुप्त होते जा रहे हैं। एक साल में एक कबूतर करीब 100 किलो बीट करता है, जो इंसानों के लिए जहर है। दाना डालने से नुकसान कर रहे हैं। वन्यजीव विभाग की ओर से कैपटेविटी एनिमल स्पोंसरशिप स्कीम चला रखी है। यहां चिड़ियाघर में मौजूद वन्यजीवों का भरण-पोषण कर दान-पुण्य कर सकते हैं। <br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग</strong></p>
<p> </p>]]>
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                <pubDate>Tue, 19 Aug 2025 15:17:57 +0530</pubDate>
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