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                <title>  supreme court - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>  supreme court RSS Feed</description>
                
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                <title>बाबूलाल कटारा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका : जमानत याचिका खारिज, राज्य सरकार कर रही थी जमानत का विरोध</title>
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                        <![CDATA[राजस्थान लोक सेवा आयोग के निलंबित सदस्य बाबूलाल कटारा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका। कोर्ट ने पेपर लीक मामले में उनकी अंतरिम जमानत याचिका खारिज कर दी। कटारा को पहले 9 फरवरी को अंतरिम जमानत मिली थी, लेकिन राज्य सरकार के विरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जमानत रद्द।
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/big-blow-to-babulal-katara-from-supreme-court-bail-plea/article-147548"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/1200-x-60-px)-(1)51.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राजस्थान लोक सेवा आयोग के निलंबित सदस्य बाबूलाल कटारा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है, क्योंकि एससी ने उनकी अंतरिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। बता दें कि बाबूलाल कटारा को पेपर लीक मामले में गिरफ्तार किया गया था।</p>
<p>इससे पहले 09 फरवरी को ही कटारा को सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम जमानत मिली थी। बाबूलाल कटारा की जमानत रद्द करने के लिए राज्य सरकार लगातार जमानत का विरोध कर रही थी, जिसके बाद एससी ने उनकी जमानत याचिका को खारिज कर दिया।</p>
<p> </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 15:12:07 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur NM]]>
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            <item>
                <title>आप नौकरानी से नहीं, जीवनसाथी से शादी कर रहे हैं : सुप्रीम कोर्ट ने कहा- पति को भी घरेलू कार्यों में हाथ बटाना चाहिए</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पति को भी घरेलू कामों में मदद करनी चाहिए और पत्नी के घर के काम न कर पाने को मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। 2017 में शादी करने वाले पति ने पत्नी के रवैये और खाना-पीना बनाने से इनकार का आरोप लगाया था। फैमिली कोर्ट ने तलाक दिया, हाईकोर्ट ने रद्द किया, अब मामला सुप्रीम कोर्ट में।
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/you-are-marrying-your-spouse-and-not-a-maid-supreme/article-147275"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/supreme-court--3.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक वैवाहिक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि आज के दौर में पति को भी घरेलू कार्यों में हाथ बंटाना चाहिए। जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली बेंच ने साफ किया कि पत्नी द्वारा खाना बनाने या घर के काम ठीक से न कर पाने जैसे आरोपों को मानसिक क्रूरता का आधार नहीं बनाया जा सकता है। सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि आप किसी नौकरानी से शादी नहीं कर रहे हैं, आप एक जीवनसाथी से शादी कर रहे हैं। कोर्ट ने पति से कहा कि आपको भी खाना बनाने, कपड़े धोने आदि कामों में मदद करनी होगी। अब समय बदल गया है।</p>
<p><strong>पति ने लगाया यह आरोप :</strong></p>
<p>इस वैवाहिक विवाद में शादी 2017 में हुई थी जिससे आठ साल का बच्चा है। याचिकाकर्ता पति ने आरोप लगाया कि शादी के सिर्फ एक हफ्ते बाद ही उसकी पत्नी का रवैया बदल गया और उसने उसके साथ बुरा बर्ताव करना शुरू कर दिया। पति के मुताबिक उसकी पत्नी ने उसके और उसके माता-पिता के खिलाफ गंदी भाषा का इस्तेमाल किया और उनके लिए खाना-पीना बनाने से मना कर दिया। उसकी पत्नी ने अपने मायके में बच्चे को जन्म तो दिया, लेकिन उसे पालना रस्म में नहीं बुलाया।</p>
<p><strong>बच्चे के जन्म के लिए अपने माता-पिता के घर गई :</strong></p>
<p>पत्नी के मुताबिक वो बच्चे के जन्म के लिए अपने माता-पिता के घर अपने पति और उसके परिवार की सहमति से ही गई थी। पति के माता-पिता पालना रस्म में शामिल नहीं हुए और उसके माता-पिता से नकद पैसे और सोना मांगा। इस मामले में फैमिली कोर्ट ने पति की तलाक की अर्जी कू्ररता के आधार पर स्वीकार कर ली। पत्नी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी जिसने तलाक के आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट के आदेश को पति ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 21 Mar 2026 10:47:50 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur KD]]>
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            <item>
                <title>बाबर के नाम पर मस्जिद निर्माण पर रोक लगाने वाली याचिका खारिज, सुप्रीम कोर्ट का मामले पर विचार करने से इनकार</title>
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                        <![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने बाबर या बाबरी मस्जिद के नाम पर मस्जिद निर्माण या नामकरण पर रोक की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मामले पर सुनवाई से इनकार किया। याचिकाकर्ता द्वारा याचिका वापस लेने के बाद अदालत ने इसे औपचारिक रूप से खारिज कर दिया।
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/petition-to-ban-construction-of-mosque-in-babars-name-rejected/article-143966"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/supreme-court--3.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें अधिकारियों को भारत में कहीं भी बाबर या बाबरी मस्जिद के नाम पर किसी भी मस्जिद के निर्माण या नामकरण की अनुमति देने से रोकने का निर्देश देने की मांग की गई थी। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने इस मामले पर विचार करने से इनकार कर दिया।</p>
<p>याचिकाकर्ता ने बाबर को आक्रमणकारी बताते हुए तर्क दिया था कि उसके नाम पर किसी भी मस्जिद का निर्माण या नामकरण नहीं किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने चूंकि इस याचिका को स्वीकार करने से मना कर दिया, इसलिए याचिकाकर्ता ने याचिका वापस ले ली। इसके बाद खंड पीठ ने याचिका खारिज कर दी।</p>
<p> </p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 20 Feb 2026 17:32:30 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur KD]]>
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                            </item>
            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की पंचायतों के परिसीमन को चुनौती देने वाली एसएलपी, हाईकोर्ट की खंडपीठ के आदेश में दखल से इनकार</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान में पंचायत मुख्यालय परिवर्तन व परिसीमन अधिसूचनाओं को चुनौती देने वाली एसएलपी खारिज कर दी। सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने हाईकोर्ट आदेश में हस्तक्षेप से इनकार किया। राज्य सरकार ने कहा प्रक्रिया Rajasthan Panchayati Raj Act, 1994 के तहत हुई। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/supreme-court-rejected-the-slp-challenging-the-delimitation-of-panchayats/article-143438"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-01/court-hammer04.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश में पंचायतों का मुख्यालय बदलने सहित 10 जनवरी 2025 की गाइडलाइनों का पालन नहीं करने और 20 नवम्बर 2025 व 28 दिसम्बर 2025 की संशोधित अधिसूचनाओं को चुनौती देने वाली विशेष अनुमति याचिका को खारिज कर दिया है। सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने यह आदेश जयसिंह की एसएलपी पर दिए। एसएलपी में राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ के गत 21 जनवरी के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें पंचायतों का मुख्यालय बदलने सहित परिसीमन की अधिसूचनाओं को चुनौती देने वाली याचिका अदालत ने खारिज कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की खंडपीठ के आदेश में दखल से इनकार करते हुए कहा कि प्रदेश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अदालत की ओर से हस्तक्षेप करने से परहेज करना चाहिए। पंचायत चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इस स्तर पर हाईकोर्ट के आदेश में दखल नहीं दे सकते।</p>
<p>एसएलपी में हाईकोर्ट के आदेश की चुनौती : एसएलपी में हाईकोर्ट की खंडपीठ के आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि राज्य सरकार ने परिसीमन अधिसूचना जारी करते समय वैधानिक प्रावधानों का पालन नहीं किया। मुख्यालय की दूरी एवं निवासियों को होने वाली असुविधा के संबंध में दर्ज आपत्तियों का भी निस्तारण नहीं किया। ऐसे में ग्राम पंचायत का मुख्यालय बदलना मनमाना है।</p>
<p><strong>सरकार की ओर से यह दिया गया जवाब : </strong></p>
<p>इसके जवाब में राज्य सरकार के एएसजी केएम नटराज व एएजी शिवमंगल शर्मा ने कहा कि परिसीमन की पूरी प्रक्रिया राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 के अनुसार की गई है। राज्य सरकार ने इस दौरान आपत्तियों पर विचार कर उनका निस्तारण भी किया और मंत्रिस्तरीय उप-समिति ने पुनर्गठन को मंजूरी दी थी। हाईकोर्ट ने पूर्व में निर्देश दिया था कि पुनर्गठन की प्रक्रिया को 31 दिसंबर, 2025 तक की जाए। इसके पालन में ही 28 दिसंबर 2025 को नोटिफिकेशन जारी किया था। वहीं जनवरी, 2026 में सभी पंचायती राज संस्थाओं के वार्ड के गठन का काम पूरा किया। राज्य निर्वाचन आयोग ने भी मतदाता सूचियों के प्रारूप का प्रकाशन कर चुनाव प्रक्रिया शुरू कर दी है। अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन 25 फरवरी को करना है और प्रदेश में 15 अप्रेल 2026 तक चुनाव प्रक्रिया पूरी करनी है। इसलिए एसएलपी खारिज की जाए। जिस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एसएलपी को खारिज कर दिया है। </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 17 Feb 2026 10:30:45 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur KD]]>
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                            </item>
            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला : मासिक धर्म स्वास्थ्य जीवन के अधिकार का हिस्सा, हर स्कूल में मुफ्त सैनिटरी पैड और स्वच्छ शौचालय की सुविधाएं अनिवार्य</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म स्वास्थ्य को अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा बताते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को हर सरकारी व निजी स्कूल में मुफ्त सैनिटरी नैपकिन और स्वच्छ, लिंग-विभाजित शौचालय उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/historic-decision-of-the-supreme-court-menstruation-and-health-are/article-141362"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-03/supreme-court--3.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। एक ऐतिहासिक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि मासिक धर्म स्वास्थ्य तक पहुंच संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे देश के हर सरकारी और निजी स्कूल में मुफ्त सैनिटरी नैपकिन, स्वच्छ और लिंग-विभाजित शौचालय तथा मासिक धर्म स्वच्छता से जुड़ी आवश्यक सुविधाएं सुनिश्चित करें।</p>
<p>यह मामला इस चिंता से जुड़ा था कि बुनियादी स्वच्छता सुविधाओं के अभाव में किशोरियां पढ़ाई से वंचित हो रही हैं, जिससे उनकी अनुपस्थिति बढ़ती है, आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है और शिक्षा तक समान पहुंच बाधित होती है। याचिका में बताया गया कि शौचालय, सैनिटरी पैड और अपशिष्ट निपटान व्यवस्था की कमी छात्राओं को असमान रूप से प्रभावित करती है, जो समानता और शिक्षा के संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करती है।</p>
<p> </p>
<p> </p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 30 Jan 2026 17:51:14 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur KD]]>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला : सफाई कर्मियों की मौत पर मिलेगा 30 लाख मुआवजा, जानें पूरा मामला  </title>
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                        <![CDATA[उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि मैला ढोने और नालों की सफाई के कारण होने वाली मौतों के लिए मुआवजे को बढ़ाकर 30 लाख रुपए करने का उसका आदेश पुराने मामलों पर भी लागू होगा।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/big-decision-of-supreme-court-30-lakh-compensation-will-be/article-141294"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-03/supreme-court--3.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि मैला ढोने और नालों की सफाई के कारण होने वाली मौतों के लिए मुआवजे को बढ़ाकर 30 लाख रुपए करने का उसका आदेश पुराने मामलों पर भी लागू होगा, यदि उनमें अभी तक मुआवजा तय नहीं हुआ है या मुआवजे का भुगतान नहीं किया गया है।</p>
<p>उल्लेखनीय है कि न्यायालय ने अक्टूबर 2023 के ‘बलराम’ मामले में ऐसी मौतों के लिए मुआवजे की राशि 10 लाख रुपए से बढ़ाकर 30 लाख रुपए कर दी थी। यह स्पष्टीकरण राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (नालसा) द्वारा शीर्ष अदालत के समक्ष दायर एक आवेदन के बाद आया है। </p>
<p> </p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 30 Jan 2026 14:21:04 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट ने लगाई राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले पर रोक, राजमार्ग के पास से नहीं हटेंगी शराब की दुकानें</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[उच्चतम न्यायालय ने राजस्थान उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों के 500 मीटर दायरे में शराब की दुकानों को हटाने का निर्देश दिया था। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार भविष्य में शराब की दुकानों के बारे में उचित कदम उठा सकती है। यह मामला सड़क सुरक्षा और नशे में वाहन चलाने से जुड़ा था।
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/supreme-court-put-a-stay-on-the-decision-of-rajasthan/article-140177"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/supreme-court--3.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने राजस्थान उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें राज्य भर में राष्ट्रीय या राजमार्गों के 500 मीटर के दायरे में मौजूद सभी शराब की दुकानों को हटाने या दूसरी जगह ले जाने का निर्देश दिया गया था। न्यायाधीश विक्रम नाथ और न्यायाधीश संदीप मेहता की पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता  मुकुल रोहतगी और राजस्थान राज्य की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलें सुनने के बाद यह अंतरिम आदेश पारित किया।</p>
<p><strong>मामला सिर्फ एक गांव की शिकायत से जुड़ा था :</strong></p>
<p>मेहता ने उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाकर्ता का समर्थन किया। सुनवाई के दौरान रोहतगी ने कहा कि उच्च न्यायालय के सामने मामला सुजानगढ़ गांव से जुड़ी एक शिकायत से उठा था, लेकिन उच्च न्यायालय ने प्रभावित पक्षों को सुने बिना पूरे राज्य पर लागू होने वाले निर्देश जारी कर दिए। न्यायमूर्ति मेहता ने इसके जवाब में कहा कि उच्च न्यायालय पूरे राज्य में अपना अधिकार क्षेत्र इस्तेमाल करता है।</p>
<p><strong>हाई कोर्ट का आदेश शीर्ष अदालत के बाध्यकारी फैसले के खिलाफ :</strong></p>
<p>रोहतगी ने तर्क दिया कि विवादित आदेश शीर्ष अदालत के बाध्यकारी फैसले के खिलाफ था, जिसमें नगर निगम क्षेत्रों में स्थित लाइसेंस वाले शराब प्रतिष्ठानों पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाई गई थी। न्यायमूर्ति अभी भी कह रहे हैं कि प्रतिबंध लगेगा, जो नहीं हो सकता। पीठ ने कहा कि न्यायाधीश सब कुछ कर सकते हैं। इस पर रोहतगी ने कहा कि जोधपुर में सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश होने के नाते उन्होंने शायद इसी आधार पर फैसला लिया होगा। बीच में दखल देते हुए, सॉलिसिटर जनरल ने ऐसी टिप्पणियों पर संयम बरतने का आग्रह किया।</p>
<p><strong>राज्य सरकार उचित कदम उठा सकती है :</strong></p>
<p>न्यायमूर्ति मेहता ने कहा कि यह मुद्दा संवेदनशील है, क्योंकि नशे में वाहन चलाने से कई मौतें हुई हैं। हाईकोर्ट की चिंता सही थी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार भविष्य में यह सुनिश्चित करने के लिए उचित कदम उठा सकती है कि शराब की दुकानें राज मार्ग के किनारे न हों।</p>
<p><strong>...सिर्फ दिशा बताने वाले तीर दिखाए जाते हैं :</strong></p>
<p>सुनवाई के दौरान बातचीत में सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि कुछ राज्यों में, जहां शराब के विज्ञापन वाले होर्डिंग पर रोक है, वहां सिर्फ दिशा बताने वाले तीर दिखाए जाते हैं। उन्होंने कहा, जो जानते हैं, वे जानते हैं कि इसका क्या मतलब है। रोहतगी ने कहा कि सोडा और पानी से संबंधित शैडो विज्ञापन भी होते हैं। न्यायाधीश मेहता ने मुस्कुराते हुए टिप्पणी की कि उन्हें ऐसी प्रथाओं के बारे में पता नहीं था।</p>
<p><strong>यह था मामला :</strong></p>
<p>गौरतलब है कि राजस्थान उच्च न्यायालय ने गत दिसंबर में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए राष्ट्रीय और प्रदेश के राजमार्गों के पास शराब की दुकानों पर प्रतिबंध लगाने का आदेश पारित किया था। शराब के कारण राजमार्गों पर होने वाले हादसों की बढ़ती संख्या को देखते हुए उच्च न्यायालय ने राजस्थान सरकार को निर्देश दिया था कि राष्ट्रीय या राज्य राजमार्गों के 500 मीटर के दायरे में आने वाली सभी शराब की दुकानों को दो महीने के अंदर हटा दिया जाए या कहीं और शिफ्ट कर दिया जाए, भले ही वे दुकानें नगर निगम के इलाकों, स्थानीय स्व-शासी निकायों या वैधानिक विकास प्राधिकरणों में हों। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में तमिलनाडु सरकार बनाम के. बालू मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले का हवाला दिया, जिसमें तेज रफतार और शराब पीने से होने वाले सड़क हादसों की खतरनाक स्थिति को दर्ज किया गया था और निर्देश दिया गया था कि राष्ट्रीय या राज्य राजमार्गों के बाहरी किनारे से 500 मीटर के दायरे में कोई भी शराब की दुकान नहीं होनी चाहिए। शीर्ष अदालत ने बाद में स्पष्ट किया था कि यह रोक नगर निगम के इलाकों में मौजूद लाइसेंसी दुकानों पर लागू नहीं होती, और राज्य सरकारों पर यह फैसला छोड़ दिया था कि वे इस पाबंदी को स्थानीय निकायों और विकास प्राधिकरणों के तहत आने वाले इलाकों तक बढ़ाना चाहते हैं या नहीं। इसी पृष्ठभूमि में उच्च न्यायालय ने कहा कि राजस्थान ने उच्चतम न्यायालय के फैसले के तहत मिली सीमित छूट का गलत इस्तेमाल किया है। इसने आबकारी विभाग द्वारा दायर एक हलफनामे पर भरोसा किया, जिसमें कहा गया था कि राज्य ने 1,102 शराब की दुकानों को राष्ट्रीय और राज्य राजमार्ग के किनारे नगर निगम या स्थानीय निकाय की सीमाओं के तहत मानकर चलाने की अनुमति दी थी, जिससे 2,221.78 करोड़ रुपए का राजस्व मिला। इस पर गंभीर चिंता जताते हुए उच्च न्यायालय ने कहा कि राजस्व के फायदे सार्वजनिक जीवन और सड़क सुरक्षा की रक्षा करने के संवैधानिक दायित्व से ऊपर नहीं हो सकते।</p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 20 Jan 2026 10:59:08 +0530</pubDate>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट ने अगस्ता वेस्टलैंड मामले में गौतम खेतान की याचिका खारिज की, जानें पूरा मामला </title>
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                        <![CDATA[उच्चतम न्यायालय ने अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा संपत्ति कुर्क किए जाने को चुनौती देने वाली अधिवक्ता गौतम खेतान की याचिका को खारिज कर दिया।]]>
                    </description>
                
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/supreme-court-rejects-gautam-khaitans-petition-in-agustawestland-case-know/article-138658"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/supreme-court--3.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा संपत्ति कुर्क किए जाने को चुनौती देने वाली अधिवक्ता गौतम खेतान की याचिका को खारिज कर दिया।</p>
<p>न्यायालय ने कहा कि खेतान की ओर से उाये गये कानूनी मुद्दे पहले से ही विजय मदनलाल चौधरी फैसले से जुड़ी लंबित समीक्षा याचिकाओं के विचाराधीन हैं।  मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की पीठ ने धन शोधन निवारण अधिनियम(पीएमएलए) के तहत कुर्की की कार्यवाही की वैधता की जांच करने से इनकार कर दिया। पीठ ने कहा कि इस कानून की धारा 44(1)(सी) की संवैधानिकता का मुद्दा पहले से ही न्यायालय के समक्ष समीक्षा का विषय है। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, चूंकि विजय मदनलाल मामले में पीएमएलए के प्रावधानों को लागू करने का मुद्दा समीक्षा याचिकाओं में विचाराधीन है, इसलिए हमें लगता है कि धारा 44(1)(सी) की वैधता की जांच भी उन्हीं कार्यवाहियों के दौरान की जाएगी। पीठ ने कहा कि उसी मुद्दे पर एक अलग रिट याचिका पर विचार करने का कोई औचित्य नहीं है। श्री खेतान ने दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा उनकी चुनौती खारिज किए जाने के बाद उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। यह मामला अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर खरीद में कथित रिश्वत से संबंधित है। सुनवाई के दौरान खेतान की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने अदालत से लंबित समीक्षा याचिकाओं में हस्तक्षेप करने की अनुमति मांगी। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि मुकदमे से बचने के लिए बार-बार संवैधानिक उपायों का सहारा लेने की ऐसी प्रथाएं बंद होनी चाहिए।  </p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Wed, 07 Jan 2026 11:03:16 +0530</pubDate>
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                <title>अशोक गहलोत का सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध : अरावली संरक्षण पर केंद्र की रिपोर्ट खतरनाक, छोटे पहाड़ों को बाहर करना खतरा और खनन को अनुमति</title>
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                        <![CDATA[पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अरावली पर्वतमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट से केंद्र सरकार की रिपोर्ट पर पुनर्विचार की अपील की। उन्होंने कहा कि 100 मीटर की सीमा अरावली के 90% हिस्से को कानूनी संरक्षण से बाहर कर देगी, जिससे खनन बढ़ेगा, भूजल घटेगा और थार रेगिस्तान दिल्ली तक फैलने का खतरा बढ़ेगा।
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/ashok-gehlots-request-to-supreme-court-centers-report-on-aravalli/article-136138"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/ashok-gehlot1.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अरावली पर्वतमाला केस में केंद्र सरकार की प्रस्तुत रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को देखते हुए अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करे।</p>
<p>गहलोत ने कहा है कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में ऐसी रिपोर्ट पेश की है, जिससे अरावली का दायरा सिमट गया है। अरावली राजस्थान का केवल पर्वत नहीं, हमारा ‘रक्षा कवच’  है। केंद्र सरकार की सिफारिश पर इसे '100 मीटर' के दायरे में समेटना, प्रदेश की 90 प्रतिशत अरावली के 'मृत्यु प्रमाण पत्र' पर हस्ताक्षर करने जैसा है। सबसे भयावह तथ्य यह है कि राजस्थान की 90 प्रतिशत अरावली पहाड़ियाँ 100 मीटर से कम हैं। यदि इन्हें परिभाषा से बाहर कर दिया गया, तो यह केवल नाम बदलना नहीं है, बल्कि कानूनी कवच हटाना है। इसका सीधा मतलब है कि इन क्षेत्रों में अब वन संरक्षण अधिनियम लागू नहीं होगा और खनन बेरोकटोक हो सकेगा।</p>
<p>पहाड़ की परिभाषा उसकी ऊँचाई से नहीं, बल्कि उसकी भूगर्भीय संरचना से होती है। एक छोटी चट्टान भी उसी टेक्टोनिक प्लेट और पर्वतमाला का हिस्सा है जो एक ऊंची चोटी है। इसे अलग करना वैज्ञानिक रूप से तर्कहीन है। अरावली थार रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकने वाली दीवार है। विशेषज्ञों की चेतावनी है कि 10 से 30 मीटर ऊंची छोटी पहाड़ियां (रिज) भी धूल भरी आंधियों को रोकने में उतनी ही कारगर होती हैं। इन छोटी पहाड़ियों को खनन के लिए खोल देने का मतलब दिल्ली और पूर्वी राजस्थान तक रेगिस्तान को खुद निमंत्रण देना है। अरावली की चट्टानी संरचना बारिश के पानी को रोकती है और उसे जमीन के भीतर भेजती है। ये पहाड़ियाँ पूरे क्षेत्र में भूजल रिचार्ज का काम करती हैं। इन्हें हटाने का मतलब पहले से ही पानी की कमी से जूझ रहे उत्तर-पश्चिम भारत में सूखे को निमंत्रण देना है। अरावली वह दीवार है जो पश्चिम से आने वाली जानलेवा 'लू' और थार रेगिस्तान को पूर्वी राजस्थान, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के उपजाऊ मैदानों में घुसने से रोकती है। यह फैसला पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि खनन माफियाओं के लिए 'रेड कार्पेट' है। थार के रेगिस्तान को दिल्ली तक जाने का निमंत्रण देकर सरकार आने वाली पीढ़ियों के साथ जो अन्याय कर रही है, उसे इतिहास कभी माफ नहीं करेगा।</p>
<p>विडंबना ये है कि सुप्रीम कोर्ट में यह सुनवाई इसलिए शुरू हुई थी ताकि अरावली को स्पष्ट रूप से पहचाना और बचाया जा सके। लेकिन केंद्र सरकार की जिस सिफारिश को कोर्ट ने माना, उसने अरावली के 90 प्रतिशत हिस्से को ही तकनीकी रूप से 'गायब' कर दिया। मैं सुप्रीम कोर्ट से आग्रह करता हूं कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को देखते हुए अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करे। यह फैसला सीधा विनाश को निमंत्रण देने वाला है।</p>
<p> </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Dec 2025 16:15:53 +0530</pubDate>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला : मंदिर का धन केवल भगवान का, कोर्ट ने कहा- इसका इस्तेमाल बैंक बचाने में नहीं किया जा सकता</title>
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                        <![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मंदिर का धन भगवान का है और इसका उपयोग खस्ताहाल बैंकों को बचाने में नहीं किया जा सकता। कोर्ट केरल के सहकारी बैंकों की उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था, जिनमें वे तिरुनेल्ली मंदिर देवस्वोम की जमा राशि लौटाने के हाईकोर्ट आदेश को चुनौती दे रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाएँ खारिज कीं और राशि वापसी के लिए समय बढ़ाने हेतु हाईकोर्ट जाने की अनुमति दी।
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/big-decision-of-the-supreme-court-the-money-of-the/article-134939"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/supreme-court--3.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि मंदिर का धन भगवान का है और इसका इस्तेमाल बैंकों को बचाने के लिए नहीं किया जा सकता है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बैंक ने ये टिप्पणी केरल के कुछ सहकारी बैंकों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए की। केरल के कुछ सहकारी बैंकों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर तिरुनेल्ली मंदिर देवस्वोम में जमा राशि वापस करने के केरल हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से पूछा कि आप मंदिर के धन का इस्तेमाल बैंक को बचाने के लिए करना चाहते हैं। कोर्ट ने कहा कि मंदिर का धन एक खस्ताहाल सहकारी बैंक में रखने की बजाय एक स्वस्थ राष्ट्रीयकृत बैंक में जाना चाहिए जो अधिकतम ब्याज दे सके।</p>
<p><strong>हाईकोर्ट के आदेश से कठिनाइयां पैदा हो रही :</strong></p>
<p>सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने कहा कि दो महीने के भीतर जमा राशि वापस करने के हाईकोर्ट के आदेश से कठिनाइयां पैदा हो रही हैं। तब कोर्ट ने कहा कि आपको लोगों के बीच अपनी विश्वसनीयता स्थापित करनी चाहिए। अगर आप ग्राहकों और जमाओं को आकर्षित करने में असमर्थ हैं, तो यह आपकी समस्या है। कोर्ट ने कहा कि बैंकों को जमा राशि की परिपक्वता पर तुरंत राशि जारी करनी थी। तब याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि बंद करने का कोई अनुरोध नहीं किया गया था और ग्राहक की ओर से कोई शिकायत नहीं थी। तब कोर्ट ने याचिकाओं को खारिज करते हुए याचिकाकर्ताओं को राशि देने के लिए समय बढ़ाने के लिए हाईकोर्ट जाने की छूट दे दी।</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Dec 2025 14:03:27 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur KD]]>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट का आदेश : डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों की जांच करेगी CBI, एक नाम पर कई SIM पर रोक की तैयारी</title>
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                        <![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने तेजी से बढ़ रहे डिजिटल अरेस्ट स्कैम को गंभीर खतरा बताते हुए इसकी जांच CBI को सौंप दी है और एजेंसी को विशेष अधिकार दिए हैं। अब CBI स्कैम में उपयोग किए गए बैंक खातों व बैंकरों की जांच कर सकेगी। कोर्ट ने सभी राज्यों व आईटी अथॉरिटीज को पूर्ण सहयोग का आदेश दिया और DoT से एक नाम पर कई सिम जारी करने पर रोक के लिए प्रस्ताव मांगा।
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/supreme-courts-order-cbi-will-investigate-cases-related-to-digital/article-134311"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/supreme-court--3.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में तेजी से बढ़ रहे डिजिटल अरेस्ट स्कैम को बेहद गंभीर खतरा मानते हुए इस पर तुरंत कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा है कि ऐसे साइबर अपराध आम लोगों को आर्थिक और मानसिक रूप से नुकसान पहुंचा रहे हैं, इसलिए इनकी जांच अब CBI करेगी। साथ ही CBI को विशेष अधिकार भी दिए गए हैं, जिनके तहत वह उन सभी बैंक खातों और संबंधित बैंकरों की जांच कर सकेगी, जिनका उपयोग डिजिटल अरेस्ट स्कैम में किया गया है।</p>
<p>सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि आईटी इंटरमीडियरी रूल्स 2021 के तहत सभी अथॉरिटीज CBI को पूरा सहयोग दें। जिन राज्यों ने अभी तक CBI को जनरल कंसेंट नहीं दी है, उन्हें भी इस मामले में अनुमति प्रदान करनी होगी, ताकि जांच पूरे देश में बिना रोकटोक के जारी रह सके। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जरूरत पड़ने पर CBI इंटरपोल अधिकारियों से मदद ले सकती है।</p>
<p>कोर्ट ने दूरसंचार विभाग (DoT) से कहा कि एक नाम पर कई सिम कार्ड जारी करने की समस्या को रोकने के लिए ठोस प्रस्ताव तैयार कर कोर्ट में पेश किए जाएं।</p>
<p> </p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 01 Dec 2025 17:06:57 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur KD]]>
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                <title>दहेज प्रथा ने विवाह को बना दिया व्यावसायिक लेन-देन, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- दहेज हत्या समाज के खिलाफ अपराध</title>
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                        <![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रथा को विवाह जैसी पवित्र संस्था को व्यावसायिक लेन-देन में बदलने वाला सामाजिक अभिशाप बताया और दहेज हत्या को समाज के खिलाफ अपराध कहा। अदालत ने विवाह के चार महीने बाद पत्नी को ज़हर देने के आरोपी की जमानत रद्द करते हुए हाईकोर्ट के निर्णय को गंभीर तथ्यों और पीड़िता के बयान की अनदेखी बताकर गलत ठहराया।
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/dowry-system-has-turned-marriage-into-a-commercial-transaction-supreme/article-134030"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/supreme-court--3.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विवाह आपसी विश्वास और सम्मान पर आधारित एक पवित्र संस्था है, लेकिन दहेज प्रथा ने इसे एक व्यावसायिक लेन-देन में बदल दिया है। कोर्ट ने कहा कि दहेज हत्या समाज के खिलाफ अपराध है। दहेज को उपहार के रूप में दिखाने की कोशिश की जाती है, जबकि यह सामाजिक प्रतिष्ठा दिखाने और भौतिक लालसा पूरी करने का माध्यम बन चुका है।</p>
<p>अदालत ने यह टिप्पणी उस आरोपी की जमानत रद्द करते हुए की, जिस पर विवाह के चार महीने बाद पत्नी को दहेज के लिए ज़हर देने का आरोप है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के जमानत देने के फैसले को गंभीर तथ्यों और पीड़िता के बयान की अनदेखी बताकर अव्यावहारिक करार दिया।</p>
<p> </p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Sat, 29 Nov 2025 12:15:03 +0530</pubDate>
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