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                <title>production - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>खाद्य तेल की खपत कम करने की पीएम मोदी की अपील का स्वागत, आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम</title>
                                    <description><![CDATA[प्रधानमंत्री की खाद्य तेल उपभोग कम करने की अपील का व्यापारिक संगठनों ने स्वागत किया है। भारत अपनी खपत का 60% आयात करता है। राजस्थान, जहाँ सरसों उत्पादन 60 लाख टन तक पहुँच चुका है, अब 120 लाख टन का लक्ष्य रखकर देश को आयात मुक्त और खाद्य तेल में आत्मनिर्भर बनाने की ओर अग्रसर है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/pm-modis-appeal-to-reduce-consumption-of-edible-oil-welcomed/article-153459"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-05/raja.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा खाद्य तेल के उपभोग को कम करने की अपील का व्यापारिक और औद्योगिक संगठनों ने स्वागत किया है। भारतीय उद्योग व्यापार मंडल के राष्ट्रीय अध्यक्ष बाबू लाल गुप्ता ने कहा कि वैश्विक संकट और बढ़ती आयात निर्भरता के दौर में देश को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ना होगा। देश में प्रतिवर्ष लगभग 255 लाख टन खाद्य तेल की खपत होती है, जिसमें से करीब 145 लाख टन तेल आयात किया जाता है। भारत में पॉम ऑयल मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से, सोयाबीन ऑयल अमेरिका और ब्राजील से तथा सनफ्लावर ऑयल रूस और यूक्रेन से आयात होता है। </p>
<p>ऐसे में वैश्विक परिस्थितियों का सीधा असर भारतीय बाजार और उपभोक्ताओं पर पड़ता है। बाबू लाल गुप्ता ने कहा कि राजस्थान ने सरसों उत्पादन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। राज्य में सरसों का उत्पादन पहले 30 लाख टन था, जो बढ़कर 60 लाख टन तक पहुंच चुका है और भविष्य में इसे 120 लाख टन तक ले जाने की क्षमता है। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि राजस्थान को “सरसों उत्पादक राज्य” के रूप में विशेष पहचान दी जाए, ताकि किसानों को प्रोत्साहन मिल सके और देश खाद्य तेल के मामले में आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ सके। उन्होंने कहा कि यदि देश में घरेलू उत्पादन को बढ़ावा दिया जाए और खाद्य तेल के अनावश्यक उपभोग को नियंत्रित किया जाए तो विदेशी आयात पर निर्भरता कम होगी तथा देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बिजनेस</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 11 May 2026 18:29:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को झटका, विनिर्माण क्षेत्र की उत्पादन वृद्धि दर 38 महीने के निचले स्तर पर</title>
                                    <description><![CDATA[एचएसबीसी पीएमआई रिपोर्ट के अनुसार, नए ऑर्डरों में सुस्ती के कारण दिसंबर में भारत का विनिर्माण सूचकांक गिरकर 55 रह गया। यह पिछले 38 महीनों में उत्पादन की सबसे धीमी वृद्धि है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/business/manufacturing-sector-output-growth-rate-at-38-month-low/article-138164"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/india&#039;s-manufacturing-pmi.png" alt=""></a><br /><p>मुंबई। नये ऑर्डरों में सुस्ती से विनिर्माण क्षेत्र की उत्पादन वृद्धि दर माह-दर-माह आधार पर दिसंबर में घटकर 38 महीने के निचले स्तर पर आ गयी। एसएंडपी ग्लोबल द्वारा शुक्रवार को जारी एचएसबीसी भारतीय विनिर्माण खरीद प्रबंधक सूचकांक (पीएमआई) रिपोर्ट में यह बात कही गयी है। भारतीय विनिर्माण क्षेत्र का पीएमआई दिसंबर में घटकर 55 रह गया। यह दो साल से ज्यादा समय में विनिर्माण क्षेत्र की गतिविधियों में सबसे सुस्त वृद्धि को दर्शाता है। नवंबर में पीएमआई 56.6 रहा था। पीएमआई का 50 से ऊपर रहना गतिविधियों में वृद्धि को और इससे कम रहना गिरावट को दर्शाता है। इसका 50 का स्तर स्थिरता का द्योतक है।</p>
<p>एसएंडपी ग्लोबल मार्केट इंटेलिजेंस में इकोनॉमिक्स एसोसिएट डायरेक्टर पॉलियाना डी लीमा ने रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, वृद्धि की रफ्तार कम पडऩे के बावजूद भारतीय विनिर्माण उद्योग का प्रदर्शन 2025 में अच्छा रहा। हम वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही में प्रवेश कर रहे हैं और ऐसे में नये कारोबार में तेज वृद्धि के कारण कंपनियों के व्यस्त रहने की उम्मीद है। मुद्रास्फीति का दबाव कम रहने से मांग ऊंची बनी रहेगी।</p>
<p>रिपोर्ट में कहा गया है कि दिसंबर में उत्पादन में 38 महीने की सबसे सुस्त बढ़ोतरी दर्ज की गयी। रोजगार लगातार 22वें महीने बढ़ा है, लेकिन रोजगार सृजन की दर 22 महीने के निचले स्तर पर रही। नये ऑर्डरों की वृद्धि दर दिसंबर 2023 के बाद सबसे कम दर्ज की गयी। ऑर्डरों में सुस्त वृद्धि का असर कंपनियों के कच्चे माल की पर भी दिखा और इसमें वृद्धि दो साल के निचले स्तर पर रही। खरीद प्रबंधकों ने साल 2026 में 2025 की तुलना में उत्पादन में वृद्धि की उम्मीद जतायी है। हालांकि कुल मिलाकर उनकी उम्मीद का स्तर साढ़े तीन साल के निचले स्तर पर दर्ज किया गया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 02 Jan 2026 17:33:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सर्कुलर इकोनॉमी हमारी पुरानी परंपरा, मास प्रोडक्शन आज हमारी महती आवश्यकता : खट्टर </title>
                                    <description><![CDATA[मास प्रोडक्शन आज हमारी महती आवश्यकता है, बदलती टेक्नोलॉजी से कई तरह का नया वेस्ट भी सामने आने लगा है, इसका रीसाइकलिंग करना हमारे लिए समय की आवश्यकता हो गई है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/circular-economy-our-old-tradition-mass-production-today-our-great/article-106168"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-03/2547rtrer.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। आरआईसी में फार्म के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए केंद्रीय शहरी विकास कार्य मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि यह भारत के लिए गौरव का विषय है कि फोरम का आयोजन जयपुर में किया जा रहा है, इससे पहले इंदौर में हुआ था। राजस्थान में बावड़िया, जोहड़ की पौराणिक परंपरा रही है, जो थ्री आर को इन्कित करती है। वेस्ट मटेरियल से किस तरह से कपड़ा बनाया जा सकता है। हालांकि यह पुरानी परम्परा रही है, खराब कपड़े से दरी बनाने का काम किया जाता था, सर्कुलर इकोनॉमी हमारी पुरानी परंपरा रही है। </p>
<p>मास प्रोडक्शन आज हमारी महती आवश्यकता है, बदलती टेक्नोलॉजी से कई तरह का नया वेस्ट भी सामने आने लगा है, इसका रीसाइकलिंग करना हमारे लिए समय की आवश्यकता हो गई है। जब प्रधानमंत्री ने शौचालय की घोषणा की थी, तो लोग उसकी मजाक उड़ाते थे कि यह पीएम के स्तर का काम है क्या ? लेकिन आज शौचालय का निर्माण एक शहरी और ग्रामीण क्षेत्र के लिए जीवन दान साबित हुआ है। फोरम के तीन दिवस आयोजन में एक जयपुर डिक्लेरेशन पारित होगा, जो देश दुनिया के लिए एक डॉक्यूमेंट बनेगा। फोरम में 120 स्पीकर  अपने विचार व्यक्त करेंगे। इस अवसर पर देश के लिए थ्री सी  अर्थात सिटीज कॉलेजियम का सर्कुलेरिटी लागू करने की घोषणा की।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Mar 2025 12:22:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वेस्ट अफ्रीका के केशू से तैयार होता है कोटा में काजू</title>
                                    <description><![CDATA[धीरे-धीरे बढ़ते हुए वर्तमान में 4 से 5 करोड़ सालाना टर्नओवर पहुंच गया है। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/cashew-is-prepared-in-kota-from-cashew-of-west-africa/article-80736"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-06/21.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। हाड़ौती का पहला ऑटोमेटिक प्लांट कोटा केशू प्रोसेसिंग। जहां वेस्ट अफ्रीका से केशू का फल आयात कर काजू निकाला जाता है। जो राजस्थान के अलावा देशभर में भेजा जा रहा है। अपने पापा जगदीश कुमार हरचंदानी से प्रेरित होकर पंकज हरचंदानी ने इस स्टार्टअप को नवंबर 2022 में शुरू किया था। इस प्लांट में करीब 22 से 25 मशीनें लगी हुई है, जिन पर डेली वेजेज पर 70 से अधिक श्रमिक काम कर हैं। इनके पास तीन सैलेरी वाले कर्मचारी भी है। जो प्रतिदिन 2 से 3 टन काजू का प्रोसेस कर रहे हैं। जबकि मशीनों की कुल क्षमता 8 टन है। कोटा केशू प्रोसेसिंग में तैयार हुआ काजू राजस्थान, कर्नाटक, गुजरात, दिल्ली, मुंबई सहित देशभर की अनेक मंडियों में व्यापारियों को उनके आर्डर के अनुसार भेजा जाता है। पंकज बताते हैं कि प्लांट की शुरुआत में वे दो मशीन जिसमें एक की कीमत 2 करोड़ और दूसरी 1 करोड़ कीमत की तमिलनाडु और गुजरात से लेकर आए थे। वहीं करीब एक करोड़ का रा-मेटेरियल मंगवाकर प्लांट में प्रोडक्शन शुरू किया था। हालांकि शुरुआत दौर में बड़ा आॅर्डर नहीं मिला। पंकज बताते हैं कि फिर भी हौसलों की उड़ान से कदम आगे बढ़ाते गए और पापा की हिम्मत से अब ऊंचाई को छू रहे हैं। पहले साल टर्नओवर एक करोड़ रुपए रहा, जो कि बहुत कम था। धीरे-धीरे बढ़ते हुए वर्तमान में 4 से 5 करोड़ सालाना टर्नओवर पहुंच गया है। </p>
<p><strong>पिता ने ही दिया था पंकज को आइडिया</strong><br />पंकज हरचंदानी बताते हैं कि वे शुरु से ही व्यापार करना चाहते थे। हालांकि पढ़ाई के दौरान उन्होंने जॉब भी की। बाद में नवंबर 2022 में बिजनैस करने की सोची और अपने सपने को साकार करने के लिए कदम उठाए। बिजनैस करने का आइडिया उन्हें अपने पिता से मिला। पंकज बताते हैं कि उनके पिता जगदीश कुमार ने ही उनको केशू से काजू बनाने का आइडिया दिया था। इसके बाद उन्होंने वेस्ट अफ्रीका में इसको लेकर संपर्क किया और स्टार्टअप शुरू किया। </p>
<p><strong>इंदौर से किया था एमबीए, वहीं पर जॉब भी</strong><br />पंकज हरचंदानी ने इंदौर, मध्यप्रदेश से एमबीए की पढ़ाई 2011 में की थी। इसके बाद इंदौर में ही बीबीए और एमबीए की पढ़ाई के दौरान ही बजाज फाइनेंस में जॉब भी की। पढ़ाई पूरी होते ही घरवालों ने शादी कर दी। पंकज बताते हैं कि उनकी शादी को करीब 12 वर्ष से ज्यादा का समय हो गया है। अब तो पापा के साथ मिलकर कंधे से कंधा मिलाकर अपने बिजनैस को ऊंचाईयों पर ले जाने में लगे हुए हैं। वे अपने इस बिजनैस को बढ़ाने के लिए हर समय नवाचार करते रहते हैं। दिनभर काम में व्यस्त रहने के बाद भी परिवार को भी वे पूरा समय देते हैं। इस बिजनैस में उनके पिता भी पूरा सहयोग कर रहे हैं। ताकि बेटा अपने कारोबार को ऊंचाईयों तक ले जा सके। उनका सपना देश ही नहीं विदेशों में भी कोटा केशू प्रोसेसिंग में तैयार हुए काजू का निर्यात करना है। ताकि कोटा की पहचान विदेशों तक काजू बनाने के उद्योग में भी बन सके।</p>
<p><strong>एक पेटी में होते हैं 20 किलो काजू</strong><br />कोटा केशू प्रोसेसिंग में तैयार किया गया काजू जयपुर, जोधपुर, दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, बैंगलोर आदि मंडियों में भेजा जाता है। पंकज बताते हैं कि कम से कम 100 किलो का आॅर्डर होता है। इससे कम का आॅर्डर बुक नहीं करते हैं। क्योंकि फिर मुनाफा नहीं मिल पाता है। वे बताते हैं कि एक पेटी में 10-10 किलो के दो पैकेट रखे जाते हैं। ताकि वजन ज्यादा न हो। अभी तक ज्यादातर माल किसी एक ही मंडी में गया हो ऐसा नहीं है। </p>
<p><strong>सबसे कम अंक का काजू सबसे महंगा</strong><br />काजू के व्यापार में नंबर गेम चलता है। जिसमें सबसे अच्छे काजू की पहचान उसके अंक से की जाती है। काजू को व्यापारी अलग-अलग ग्रेड में बांटते हैं। काजू को नंबर से ही पहचाना जाता है। सबसे अच्छा काजू का अंक 150 है। जिसकी मोटाई और लंबाई सबसे अच्छी होती है। इसके अलावा 180, 210, 240, 320 और 400 नंबर के काजू बाजार में मिलते हैं। इनमें से सबसे ज्यादा 240 व 320 काजू की बिक्री होती है। क्योंकि यह कम कीमत का होता है। काजू की कीमत उसके अंकों के आधार पर ही तय होती है। 150 अंक का काजू सबसे महंगा होने के कारण बाजार में आम लोग कम ही खरीदते हैं। वहीं 240 व 320 अंक का काजू सबसे ज्यादा मार्केट में बिकता है, इसकी कीमत सामान्यतया 600 से 800 रुपए प्रतिकिलो होती है।</p>
<p><strong>क्या है काजू का बनाने का तरीका</strong><br />पंकज हरचंदानी ने बताया कि काजू बनाने के लिए जो मशीनें लगाई गई है। उनके एक माह में 8 टन और एक साल में करीब 950 टन माल उत्पादित किया जा सकता है। वर्तमान में हम अभी इनसे एक माह में 80 टन माल तैयार कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि काजू तैयार करने के लिए रा-मेटेरियल वेस्ट अफ्रीका से केशू का फल मंगाते हैं। जिसके नीचे एक नट होता है, उसको मशीन में डालकर काजू निकाला जाता है। यह फल दिखने में एप्पल जैसा होता है। हालांकि देश में भी इसके बगीचे आंध्रपेदश, गोवा और तमिलनाडु में है। मगर वेस्ट अफ्रीका का फल ज्यादा अच्छा होने के कारण वहीं से वर्तमान में आयात कर रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 07 Jun 2024 16:00:23 +0530</pubDate>
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                <title>कम बारिश से फसलों का उत्पादन हुआ कम, नहीं निकल रही लागत</title>
                                    <description><![CDATA[किसानों का कहना हैं कि खेती करना घाटे का सौदा साबित हो रहा है। खाद बीज के बढ़ते कीमतों से किसान परेशान है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/baran/crop-production-reduced-due-to-less-rain--costs-not-covered/article-59946"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-10/kam-baarish-s-fasalo-ka-utpadn-hua-kam...rajpur,-baran-news-19-10-2023.jpg" alt=""></a><br /><p>राजपुर। आदिवासी अंचल क्षेत्र में कम बारिश होने के कारण किसानों की फसलें प्रभावित हुई हैं। तहसील क्षेत्र में सोयाबीन उपज निकलना शुरू हो गई है। किसान एक हफ्ते से मजदूर और थ्रेशर व हार्वेस्टर मशीन लगाकर उपज निकाल रहे हैं। इस वर्ष अंचल क्षेत्र  में अल्प वर्षा के कारण प्रति बीघा में दो से ढाई  क्विंटल तक सोयाबीन मक्का का उत्पादन हो रहा है। साथ ही बाजार में उपज के भाव कम मिलने से किसान परेशान हो रहे हैं। किसानों के अनुसार सोयाबीन उपज का भाव चार से साढ़े चार हजार रुपए क्विंटल ही मिल रहा है। एक बीघा में सोयाबीन फसल लगाने और उपज तैयार होने तक 15 हजार रुपए तक खर्च आता है। इतने कम भाव में तो लागत निकलना भी मुश्किल हो रहा है। साथ ही इलाके में कम बारिश होने के कारण उत्पादन भी प्रभावित होने के कारण  किसानों को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा है। किसानों का कहना हैं कि सोयाबीन उपज के भाव कम से कम सात से आठ हजार रुपए प्रति क्विंटल मिलना चाहिए।</p>
<p><strong>किसानों ने कहा- खेती घाटे का सौदा साबित</strong><br />किसानों का कहना हैं कि खेती करना घाटे का सौदा साबित हो रहा है। खाद बीज के बढ़ते कीमतों से किसान परेशान है। एक तो कभी बाढ़, कभी कोरोना महामारी तो कभी अल्प वर्षा से किसान त्रस्त है। एक तो किसानों को सरकार द्वारा तय किए गए फसलों की कीमतों का लाभ नहीं मिल पाता है। दूसरी और खाद बीज के कीमत काफी बढ़ रहा है, तथा किसानों के फसलों का उचित कीमत नहीं मिल पा रही है। सैंकड़ों किसानों ने विभिन्न बैंकों से केसीसी लोन लिया हुआ है। वहीं 30 प्रतिशत किसान, साहूकार या फिर अन्य स्रोतों से कर्ज लिए हुए हैं। फसल के ठीक नहीं होने के कारण ऐसे किसान समय पर बैंक या साहूकार को कर्ज की राशि समय पर नहीं जमा करा पाते हैं।</p>
<p>किसानों के लिए सोयाबीन की फसल की खेती काफी महंगी है। इसकी बुआई से लेकर कटाई तक काफी खर्च किसानों को लगता है, परंतु मंडी में फसल का दाम भी काफी कम हैं। ऐसे हालात में किसान कैसे खेती को लाभ का व्यवसाय बना पाएंगे। जहां फिलहाल में मंडी में सोयाबीन के जो दाम है व चार से साढ़े चार हजार के बीच हैं। किसान पवन नागर, सोनू मेहता, ओमप्रकाश, कल्याण सिंह जगदीश ने बताया ने बताया कि वास्तव में यह खेती काफी महंगी हैं। जिसका उत्पादन एक बीघा में 2 से दाई क्विंटल सोयाबीन निकल रहा हैं। लागत निकलना भी मुश्किल हो रहा हैं।</p>
<p>इस बार कम बारिश के चलते पैदावार और साल की अपेक्षा कम हुई है। ऐसे में किसानों की लागत ठीक तरीके से नहीं निकल पा रही है। महंगाई की खेती हो गई है।<br /><strong>- खेरुलाल जाटव, किसान, राजपुर।</strong></p>
<p>पैदावार ठीक नहीं निकलने से इस बार किसान मायूस है। दीपावली भी ठीक तरीके से नहीं मन पाएगी, क्योंकि जो फसल बेचकर पैसा आया। वह अब जो फसल बोएंगे। उसमें लग जाएगा। ऐसे में किसान की आमदनी अच्छी नहीं हुई है और खेती को इस साल घाटे का सौदा बता रहे है।<br /><strong>-  मनकाराम किराड़, किसान, किराड़ पहाड़ी।    </strong></p>
<p>इस बार बारिश कम हुई है लेकिन जितना किसान बता रहे हैं। उतना उनको नुकसान नहीं है। हाइब्रिड बीज आने लगा है। जिससे कम पानी में जल्दी फसल पककर तैयार होती है।<br /><strong>- नीरज शर्मा, सहायक कृषि अधिकारी, शाहाबाद।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बारां</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 19 Oct 2023 18:13:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
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                <title>15 साल से सरकारी मंडी खुलने का सपना संजोए हैं किसान </title>
                                    <description><![CDATA[मंडी के अभाव में किसानों को अपनी सब्जी बेचने के लिए 15 से 20  किमी दूर कोटा एरोड्रक फल-सब्जी मंडी जाने को मजबूर है। जो किसानों के लिए समय और धन की बर्बादी होती है। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/bundi/farmers-have-cherished-the-dream-of-opening-a-government-market-for-15-years/article-40434"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-03/15-saal-se-sarkari-mandi-khulane-ka-sapna-sanjoe-hain-kisaan...bundi-news-21-03-2023.jpg" alt=""></a><br /><p>गुड़ली। केशवरायपाटन उपखंड के गुड़ली गांव में सरकारी मंडी स्थापित करने का सपना पंद्रह साल बाद भी अधूरा है।  किसान पंद्रह सालों से मंडी स्थापना की आस लगाए हुए है। सरकारी मंडी खुलने पर यहां के किसानों की तकदीर बदल सकती है। खास बात यह है कि गुड़ली की भिण्ड़ी अच्छी क्वालिटी की देशभर के व्यापारी खरीदने गुड़ली आते है। भिण्डी ही नहीं अन्य सब्जियां भी यहां पर खूब उत्पादन किया जा रहा है। मंडी के अभाव में किसानों को अपनी सब्जी बेचने के लिए 15 से 20  किमी दूर कोटा एरोड्रक फल-सब्जी मंडी जाने को मजबूर है। जो किसानों के लिए समय और धन की बर्बादी होती है। </p>
<p><strong>भिंडी की होती है बंपर पैदावार</strong><br />गुड़ली गांव की 3 हजार की आबादी खेतीबाड़ी करते है। हर घर के लोग कृषि से जुड़े है। आसपास के गांवों में इन दिनों भिण्डी का बंपर उत्पादन हो रहा है।  जिसके चलते भिंडी उत्पादक किसानों ने बताया कि सीजन के दिनों में भिंडी बेचने और खरीदने के लिए यहां मेला सा लग जाता है। व्यापारी नरेंद्र सुमन , हेमंत सुमन, रूप शंकर सुमन, त्रिलोक सुमन  के मुताबिक भिंडी बेचने के लिए रोजाना 50 गांवों के किसान कस्बे  की गुडली मंडी में पहुंच रहे हैं। दोपहर से ही मेन रोड पर व्यापारी और विक्रेताओं की भीड़ लग जाती है। यहां के किसानों ने भिंडी उत्पादन को अपना व्यवसाय ही बना लिया है। इस बार भी करीब 200 बीघा  से अधिक में भिंडी उत्पादन किया गया है। किसान भी चाहते हैं कि सरकारी प्रयास हो जाएं तो उनकी तकदीर बदल सकती है।</p>
<p><strong>इन गांवों में होता है उत्पादन</strong><br /> लाडपुर, गुड़ली, गुडला, पटोलिया, गिरधरपुरा, केशवरायपाटन, देहित, सुवांसा, कापरेन, लाखेरी, गामछ, कणा, भवानीपुरा, चितावा, तीरथ, मेहराना समेत करीब 50 गांवों में भिंडी का उत्पादन किया जा रहा है। किसान रोजाना गुडली में भिंडी बेचने पहुंच रहे हैं। प्रत्येक गांव का किसान गुडली भिंडी मंडी को पसंद करता है। यहां शुरूआती रेट 40 से 50 प्रति किलो है।</p>
<p><strong>पूर्व मंत्री वर्मा ने मंडी बनाने की थी घोषणा</strong><br /> भिंडी मंडी के लिए भाजपा सरकार के पूर्व  राज्यमंत्री बाबूलाल वर्मा ने उनके कार्यकाल में मंडी के लिए पैसा व जमीन स्वीकृत करने के लिए कहा था, लेकिन गुडली में जमीन का अभाव है। मेन रोड पर जहां पर भी पंचायत में अतिक्रमण की चपेट में है। सरकारी जमीन पर अतिक्रमण हटाकर मंडी बनाने का प्रयास सरकार के द्वारा किया जाना चाहिए सरकार द्वारा भिंडी मंडी लग जाए तो यहां के किसान मालामाल हो सकते हैं। यहां के किसान भिंडी के अलावा अन्य सब्जियां हर सीजन में करते आ रहे है। टमाटर, मिर्ची ,गोभी, बैंगन, मेथी पालक यह सभी सब्जियां मुख्य रूप से सीजन में की जाती है इनको बेचने के लिए कोटा और पाटन जाना पड़ता है।</p>
<p><strong>गुडली भिंडी की क्वालिटी</strong><br />यहां के किसान राजेंद्र मेरोठा ,तुलसीराम मेरोठा  ने बताया कि अच्छी क्वालिटी का बीज प्रयोग में लिया जाता है जिसकी वजह से भिंडी की लंबाई मात्र 3 से 4 इंच होती है और हरा गहरा रंग होता है। भिंडी के लिए यहां का वातावरण अनुकूल है। देसी दवाइयों का भी प्रयोग किया जाता है। खाने में टेस्ट स्वादिष्ट इस  की वजह से देश की बड़ी मंडियों में पहचान बना चुकी है। </p>
<p>यहां पर किसानों को सरकारी मंडी की बहुत बड़ी जरूरत है क्यों कि यहां पर भिंडी उगाने के लिए अनुकूल वातावरण हैं। चंबल नदी पास  में होने से पानी की कमी भी नहीं रहती। जमीन  में वाटर लेवल ऊपर है। इसके कारण यहां पर किसान टमाटर,प्याज, लहसुन, हरा धनियां, चना, मैथी, पालक, गोभी,मूली आदि रोजाना उपयोग में आने वाली सब्जियां की खेती करते है। इन सब्जियों को स्थानीय स्तर पर मंडी नहीं है। इसके चलते यहां से करीब 20 किमी दूर कोटा जाने को मजबूर है। इसके कारण रेगुलर खेती करना संभव नहीं है। <br /><strong>-नंदकिशोर सुमन, किसान </strong></p>
<p><strong>इनका कहना है </strong><br />गुड़ली कस्बे में भिंडी की पैदावार के लिए यहां का वातावरण भिंडी के अनुकूल है। जिससे काफी अच्छी पैदावार होती है। यह खाने में भी स्वादिष्ट है। इसमें खाद, बीज, दवाइयों का उपयोग कम किया जाता है। किसानों को एक माह में निजी खेतों में एक बीघा में 30 से 40 हजार रुपए मिल जाता है। गुडली में सरकारी मंडी बनती है तो यहां के किसानों को सब्जियों की खेती करने में महारत हासिल है। यहां बड़ा कारोबार किया जा सकता है। ग्रामीणों को सालभर रोजगार मिल सकता है। <br /><strong>-तेजमल मेरोठा, कृषक मित्र,ग्राम पंचायत गुड़ली</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बूंदी</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 21 Mar 2023 14:36:36 +0530</pubDate>
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                <title>मानसून की मेहरबानी से बूंदी में फसलों की बंपर पैदावार </title>
                                    <description><![CDATA[इस बार औसत से कहीं ज्यादा हुई बरसात के चलते  भूजल स्तर में पर्याप्त वृद्धि देखी गई जिससे आने वाले समय मे लंबे वक्त तक पानी की उपलब्धता रहेगी। इस बार पानी पर्याप्त मिलने से धान की पैदाबार में व्यापक वृÞद्धी देखने को मिली।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/bundi/bumper-yield-of-crops-in-bundi-by-the-grace-of-monsoon/article-31705"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-12/monsoon-ki-meharbani-se-bundi-mei-faslo-ki-bumper-paidawar...bundi-news..7.12.2022.jpg" alt=""></a><br /><p> बूंदी। जिले में मानसून में इस बार मानसून मेहरबान रहा। अच्छी बरसात का असर  फसलों में साफ देखने को मिल रहा है। आंकड़ों पर नजर डाले तो गत तीन सालों की अपेक्षा में इस साल फसलों का उत्पादन भी बढ़ा है। धान की गत वर्ष की अपेक्षा अच्छी पैदावार हो रही है। साथ ही अन्य फ सलों पैदावार बढ़ रही है। धान की बंपर आवक हो रही है। और आने वाली सरसों, गेंहू की पैदावार भी अच्छी रहेगा। मंडी मे पिछले वर्ष से डेढ़ गुना अधिक धान की आवक का अनुमान है। इस साल अन्य वर्षों के मुकाबले बहुत अच्छी बारिश हुई है। वाटर लेवल अच्छा होने से मार्च, अप्रेल तक पर्याप्त पानी उपलब्ध है। अक्टूबर में बारिश होने के कारण इस बार बूंदी जिले में सरसों की थोड़ी बुवाई लेट हुई है। लेकिन गेहूं की बुवाई के लिए नमी पर्याप्त हैं, जिससे किसानों को पलेवा करने की आवश्यकता नही थी।  जिन किसानों ने थोड़ा इंतजार करना मुनासीब समझा इनके लिए यह बारिश लाभदायक सिद्ध हुई। जहां पूरे मानसून हुई अच्छी बारिश और बाद में हुई बेमौसम बरसात के चलते वर्षा जल के परम्परागत स्त्रोत लबालब हो गए। कुएं, तालाब, नदी नाले सभी में पानी पर्याप्त में एकत्र हो गए। वहीं सभी प्रकार के छोटे बड़े बांध तालाब में हुइ पानी की आवक ने सभी के मन को आल्हादित कर दिया। इस बार औसत से कहीं ज्यादा हुई बरसात के चलते  भूजल स्तर में पर्याप्त वृद्धि देखी गई जिससे आने वाले समय मे लंबे वक्त तक पानी की उपलब्धता रहेगी। इस बार पानी पर्याप्त मिलने से धान की पैदाबार में व्यापक वृÞद्धी देखने को मिली। पिछले साल के मुकाबले इस साल डेढ़ गुणा आने का अनुमान है। जिसमें से 50 फि सदी की आवक मंड़ी में हो चुकी है। बतौर कृषि अधिकारियों के पड़त खेतों में  भी बुवाई होने से रकबें मे वृद्धि हुई है। </p>
<p><strong>ये रहेगा फसलों का उत्पादन</strong><br />मानसून की अच्छी बरसात से खरीफ  की फ सल में अनाज 3 लाख 73 हजार 81.6 मैट्रिक टन, दलहन 51 हजार 675 मैट्रिक टन, तिलहन 88 हजार 559 मैट्रिक टन, अन्य खरीफ  फसलें 37 हजार 652 मैट्रिक टन उत्पादन अनुमानित है।  रबी की फसल में गेंहू 15 हजार 500 हेक्टेयर, दलहन 39 हजार हेक्टेयर, सरसों 72 हजार हेक्टेयर मिला कर कुल रबी की फसल का रकबा 2 लाख 83 हजार हेक्टेयर का अनुमान है।</p>
<p><strong>बून्दी</strong><br /><strong>विगत तीन वर्षों में जिले में हुई वर्षा </strong><br />वर्ष    वर्षा दर    औसत वर्षा    विगत 5 वर्षों की औसत दर<br />2020    3036    510.5    -<br />2021    6637    1106.2    750.54<br />2022     5979    996.5    971.78 <br />(30 सित.तक)</p>
<p><strong>कृषि उत्पादन विगत तीन वर्षों में (बुवाई)</strong><br />        2020    2021    2022 अग्रिम अनु.<br />अनाज    खरीफ    110781    85961    109253<br />    रबी    141325    141225    156000<br />दलहन    खरीफ    91160    77933    54108<br />    रबी    48167    46450    39000<br />तिलहन    खरीफ    41299    51332    67592<br />    रबी    37637    37637    73000<br />अन्य    खरीफ    5444    12767    14443<br />    रबी    14181    15895    15000<br />योग    खरीफ    248684    227993    245396<br />    रबी    241317    241207    283000</p>
<p>इस साल की बारिश का खेतों के साथ मंडी में भी देखने को मिल रहा है। अच्छी बारिश के चलते मंडी में धान की बंपर आवक हो रही है। वही आने वाले समय में सरसों, गेंहू, मक्का, चना की भी बंपर आवक होने की संभावना है। वर्तमान में 80.90 हजार बोरी धान की आवक मंडी में चल रही है, जो पिछले दिनों डेढ़ लाख बोरी थी।<br /><strong>- नाथूलाल लोकेश कुमार मंडी व्यवसायी</strong></p>
<p>इस बार हुई अच्छी बरसात का असर फ सलों में देखने को मिलेगा। फ सलों पैदावार के साथ गुणवत्ता बढ़ेगी। मंडी में पिछले वर्ष से डेढ़ गुना धान की आवक का अनुमान है। वर्तमान में धान के 50 फ ीसदी की खरीद मंडी में हो चुकी है, जो अभी और  बढ़ेगी। तीन लाख बोरी धान की आवक का अनुमान है। <br /><strong>-अमित बिरला, धान व्यापारी</strong></p>
<p>बेमौसम हुई तेज बारिश से जहां सभी जल संसाधन लबालब हैं। उसके चलते आने वाली फसलों मे बंपर पैदावार देखने को मिलेंगी। गेंहू की फ सल में इस बारिश का फ ायदा सीधा सीधा दिखेगा। धान की पैदावार में तो अच्छा असर दिख ही गया हैं।<br /><strong>-कृष्ण नारायण शर्मा,अग्रणी कृषक. बडून्दा</strong></p>
<p>बैमोसम बरसात होने से फ सलों में नुकसान तो हुआ है। लेकिन इससे फ ायदा भी है। अच्छी बरसात से रकबा बढ़ा भी है। लेकिन लेट बुवाई होने से क्षेत्र में फ सलों मे जोर कम दिखाई दे रहा हैं। वाटर लेवल अच्छा हैं, जो मार्च अप्रेल तक पर्याप्त है।<br /><strong>-प्रहलाद नागर, कृषक जैविक कृषि, भवानीपुरा</strong></p>
<p>इस साल अन्य वर्षों के मुकाबले बहुत अच्छी बारिश हुई है। वाटर लेवल अच्छा होने से मार्च अप्रेल तक पर्याप्त पानी उपलब्ध है। अक्टूबर में बारिश होने के कारण इस बार बूंदी जिले में सरसों की थोड़ी बुवाई लेट हुई है। लेकिन गेहूं की बुवाई के लिए नमी पर्याप्त हैं, जिससे किसानों को पलेवा करने की आवश्यकता नही थी। एक पानी बचाने के लिए गेहूं की बुवाई जल्दी हो गई इसलिए यूरिया की समस्या बन थी। इस मांग के तहत माहवार यूरिया का वितरण होना है। जिसके तहत दिसंबर में 20 हजार मैटिक टन, जनवरी में 20 हजार मैटिक टन यूरिया का वितरण होना निर्धारित है। असिंचित क्षेत्र में थोड़ा बुवाई जल्दी होती हैं । इस सप्ताह में असिंचित क्षेत्र 75 प्रतिशत कंप्लीट हो जाएगा। सिंचित क्षेत्र में बुवाई शुरू हो गई हैं। गेहूं की बुवाई अभी चल रही हैं। 1.50 लाख हेक्टेयर में जिले में बुवाई होती हैं 70 हजार हेक्टयर में गेहूं की बुवाई अभी बाकी हैं । 65 हजार हेक्टयर में जिले में सरसो की बुवाई हुई हैं 42 हजार हेक्टयर में चने की बुवाई हैं। धान की अच्छी पैदावार होने ेसे बंपर आवक हो रही है। और वाली सरसों, गेंहू की पैदावार भी अच्छी रहेगा।<br /><strong>- रतन लाल मीणा,उपनिदेशक, कृषि विभाग बूंदी</strong></p>
<p>वर्तमान में कीट प्रजातियों का प्रकोप फ सलों में देखा नहीं जा रहा है। चने की फ सल में लेकर संभावना है तो किसान फेरोमॉन ट्रेप का उपयोग कर सकते हैं, वही सरसों की फसल में मोयले की संभावना देखी जा सकती है। इसलिए बॉर्डर पर लगे देशी आंकड़े कटाई करने के साथ मेंथोल, फेरोमोन का उपयोग किया जा सकता है। सरसों मे गलने की शिकायत आ रही है, वहां से सिंचाई से कार्बनडाजीन वर्मी कंपोस्ट मिलाकर उपयोग कर सकते हैं। किसानों को सलाह की सरसों में 25 दिसंबर से 15 जनवरी तक सिंचाई करने से बचें, ताकि फ सल में सड़ने गलने की समस्या नहीं रहेगी। वहीं पर चनें सहित अन्य फ सलों में लट और कीट पतंगों से बचाव करने के लिए खेतों में डंडे  (बर्डपर्च) गाढ़े जा सकते हैं, ताकि परभक्षी पक्षी खेतों में मौजूद रहे और कीट, पतंगों तथा लटों आदि को चट कर सकें। गेहूं,सरसों,चना आदि में मौत का फ ायदा भी देखने को मिलेगा।<br /><strong>- डॉ हरीश वर्मा, कार्यक्रम समन्वयक कृषि विज्ञान केंद्र बून्दी</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बूंदी</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 07 Dec 2022 15:07:00 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>12.02 करोड़ टन पर पहुंचा कच्चे इस्पात का उत्पादन</title>
                                    <description><![CDATA[मंत्रालय ने संयुक्त संयंत्र समिति के हवाले से पिछले पांच वित्त वर्षों के कच्चे इस्पात की कुल क्षमता, उत्पादन और क्षमता के उपयोग के आंकड़े जारी किए। मंत्रालय द्वारा मंगलवार को जारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2021-22 में 15.40 करोड़ टन की क्षमता में से 78 प्रतिशत का उपयोग किया गया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/-draft--add-your-title/article-18653"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-08/2022_1image_08_56_363171205steel.jpg" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">नई दिल्ली</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">।</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> देश में कच्चे इस्पात का उत्पादन वित्त वर्ष </span><span style="line-height:115%;">2017-18</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> के </span><span style="line-height:115%;">10.31</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> करोड़ टन से बढ़कर वित्त वर्ष </span><span style="line-height:115%;">2021-22</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> में </span><span style="line-height:115%;">12.02</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> करोड़ टन तक पहुंच गया। </span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मंत्रालय ने संयुक्त संयंत्र समिति के हवाले से पिछले पांच वित्त वर्षों के कच्चे इस्पात की कुल क्षमता</span><span style="line-height:115%;">, </span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">उत्पादन और क्षमता के उपयोग के आंकड़े जारी किए। </span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">मंत्रालय द्वारा मंगलवार को जारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष </span><span style="line-height:115%;">2021-22</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> में </span><span style="line-height:115%;">15.40</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> करोड़ टन की क्षमता में से </span><span style="line-height:115%;">78</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> प्रतिशत का उपयोग किया गया। जबकि वित्त वर्ष </span><span style="line-height:115%;">2017-18</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> में </span><span style="line-height:115%;">13.79</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> करोड़ टन की क्षमता में </span><span style="line-height:115%;">75</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> प्रतिशत का उपयोग किया गया था। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">वित्त वर्ष </span><span style="line-height:115%;">2018-19</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> में कच्चे इस्पात की कुल क्षमता </span><span style="line-height:115%;">14.22</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> करोड़ टन थी जिसमें </span><span style="line-height:115%;">11.09</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> करोड़ टन इस्पात का उत्पादन हुआ। जो क्षमता का कुल </span><span style="line-height:115%;">78</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> प्रतिशत उपयोग है। इसी तरह वित्त वर्ष </span><span style="line-height:115%;">2019-20</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> में कुल क्षमता का </span><span style="line-height:115%;">77</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> प्रतिशत उपयोग किया गया। जिसमें क्षमता </span><span style="line-height:115%;">14.23</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> करोड़ टन और उत्पादन </span><span style="line-height:115%;">10.91</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> करोड़ टन था। </span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi">वित्त वर्ष </span><span style="line-height:115%;">2020-21</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> में कच्चा इस्पात की कुल क्षमता </span><span style="line-height:115%;">14.39</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> करोड़ टन थी। जिसमें से </span><span style="line-height:115%;">10.35</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> करोड़ टन का उत्पादन हुआ। इस दौरान क्षमता के </span><span style="line-height:115%;">72</span><span lang="hi" style="line-height:115%;font-family:Mangal, serif;" xml:lang="hi"> प्रतिशत को प्रयोग में लाया गया।</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Aug 2022 17:51:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>मानसून में भी बिजली का उत्पादन होगा कम</title>
                                    <description><![CDATA[कोयला संकट की वजह से बिजली उत्पादन की कमी ने कटौती फिर बढ़ा दी है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में सामान्य कटौती के अलावा दो से चार घंटे की अघोषित कटौती बढ़ गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/jaipur-electricity-production-will-be-less-in-monsoon/article-12502"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-06/46546546513.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। कोयला संकट की वजह से बिजली उत्पादन की कमी ने कटौती फिर बढ़ा दी है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में सामान्य कटौती के अलावा दो से चार घंटे की अघोषित कटौती बढ़ गई है। तीनों डिस्कॉम में दो करोड़ यूनिट से ज्यादा बिजली कटौती जारी है। प्रदेश की बिजली सप्लाई में फिलहाल साढेÞ 29 करोड यूनिट रोजाना की डिमांड है और साढ़े 27 करोड़ यूनिट की आपूर्ति ही हो पा रही है। राजस्थान विद्युत प्रसारण निगम लिमिटेड के आंकड़ों के अनुसार जयपुर डिस्कॉम में 54 फीडर्स, अजमेर डिस्कॉम में 46 और जोधपुर डिस्कॉम में 46 फीडर्स से कटौती जारी है। शहरी क्षेत्रों में तीनों डिस्कॉम में 37, 33 और 25 फीडर्स आधे घंटे से कम समय की कटौती कर रहे हैं। शहरी इलाकों में मेंटनेंस और फाल्ट के नाम पर बिजली गुल होने की परेशानी कई जगह बनी हुई है।</p>
<p><strong>पिछले साल से ज्यादा डिमांड</strong><br />ऊर्जा विकास निगम के आंकड़ों को देखें तो पीक आवर्स में पिछले साल की तुलना में इस बार डिमांड बढ़ गई है। पिछले साल जून में 12 हजार मेगावाट डिमांड पीक लोड पर थी तो इस बार यह साढेÞ 15 हजार मेगावाट तक पहुंच गई है। अन्य राज्यों और कम्पनियों से महंगी बिजली खरीद के बावजूद करीब 13 हजार मेगावाट ही बिजली उपलब्ध हो पा रही है। कोयला संकट की वजह से छबड़ा और सूरतगढ़ की कुछ थर्मल इकाइयां अभी भी बंद पड़ी हैं। शेष इकाइयों में कोयले की कमी से क्षमता से कम उत्पादन हो पा रहा है। ऊर्जा विभाग को फिलहाल मानसून और रबी सीजन में बडे संकट की आशंका नजर आ रही है। सूत्रों के अनुसार मानसून में बारिश का पानी खदानों में भरने से कोयला संकट आगामी तीन महीनों तक बना रह सकता है।<br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/jaipur-electricity-production-will-be-less-in-monsoon/article-12502</link>
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                <pubDate>Sat, 18 Jun 2022 10:18:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आखिर क्यों गहरा रहा है बिजली का संकट</title>
                                    <description><![CDATA[केन्द्रीय कोयला मंत्री प्रहलाद जोशी के मुताबिक 2012-22 में देश में कुल कोयला उत्पादन 8.5 फीसदी बढ़कर 77.72 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि यदि वाकई कोयले का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है, तो फिर बिजली संयंत्र कोयले की भारी कमी से क्यों जूझ रहे हैं और यदि कोयले की कमी नहीं है तो बिजली उत्पादन में गिरावट क्यों आ रही है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/fall-in-electricity-production/article-9457"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/electricity-d-copy.jpg" alt=""></a><br /><p>केन्द्रीय कोयला मंत्री प्रहलाद जोशी के मुताबिक 2012-22 में देश में कुल कोयला उत्पादन 8.5 फीसदी बढ़कर 77.72 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि यदि वाकई कोयले का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है, तो फिर बिजली संयंत्र कोयले की भारी कमी से क्यों जूझ रहे हैं और यदि कोयले की कमी नहीं है तो बिजली उत्पादन में गिरावट क्यों आ रही है। बिजली संयंत्रों तक कोयला पहुंचाने के लिए रेलगाड़ियों की कमी भी बिजली संकट गहराने का कारण बनी रही है। कोयला खदानों से पावर प्लांटों तक कोयला पहुंचाने के लिए रेलवे में रैक (डिब्बों) की कमी एक अहम कारण रहा है। षण गर्मी के बीच बिजली की तेजी से बढ़ती मांग के कारण देश के कई राज्यों में बिजली की कमी का संकट गहरा रहा है। बिजली की मांग बढ़ने के साथ ही थर्मल पावर प्लांटों में कोयले की खपत तेजी से बढ़ी है और इसी कारण कुछ राज्यों के बिजली संयंत्रों में कोयले का स्टॉक घट रहा है। दरअसल गर्मी के कारण कई बिजली कम्पनियों में बिजली की मांग में वृद्धि हुई है और जैसे-जैसे गर्मी बढ़ रही है, बिजली की मांग में भी उसी तेजी से वृद्धि हो रही है। कोरोना लॉकडाउन के बाद बड़ी मुश्किल से पटरी पर लौट रही औद्योगिक गतिविधियों के कारण उद्योगों में भी बिजली की खपत बढ़ी है, इससे भी बिजली की मांग बढ़ रही है, लेकिन मांग के अनुरूप पावर प्लांटों में कोयले का स्टॉक नहीं है। कोयले की कमी के संकट को लेकर कोल इंडिया स्वीकार चुकी है कि गर्मी शुरू होने के साथ ही देश के बिजली संयंत्रों में कोयला भंडार नौ साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया था। हालांकि संघीय दिशा-निर्देशों के अनुसार बिजली संयंत्रों में कम से कम 24 दिनों का कोयला स्टॉक होना चाहिए।</p>
<p>आंकड़े देखें तो महाराष्टÑ में करीब 28 हजार मेगावाट बिजली की मांग है, जो गत वर्ष के मुकाबले 4 हजार मेगावाट ज्यादा है। उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना इत्यादि राज्य भी इस समय कोयले की किल्लत से जूझ रहे हैं, जिस कारण कुछ राज्यों में कुछ पावर प्लांटों में तो बिजली उत्पादन ठप्प हो गया है तोे कुछ प्लांटों में बिजली उत्पादन अपेक्षाकृत कम हो पा रहा है। केन्द्रीय बिजली प्राधिकरण (सीईए) के मुताबिक देश में 173 बिजली संयंत्रों में से 155 गैर-पिथेड बिजली संयंत्र हैं, जहां पास में कोई कोयला खदान नहीं है और इनमें औसतन कोयले का करीब 28 फीसदी स्टॉक है, जबकि कोयला खदानों के पास स्थित 18 पिथेड संयंत्रों का औसत स्टॉक सामान्य मांग का 81 फीसदी है। पिछले साल अक्टूबर माह में भी बिजली की मांग करीब एक फीसदी बढ़ जाने के कारण कोयला संकट के चलते बिजली संकट गहराया था और तब यह भी स्पष्ट हुआ था कि बिजली संयंत्रों को कोयले की वांछित आपूर्ति नहीं होने के अलावा कई नीतिगत खामियां भी बिजली संकट का प्रमुख कारण हैं।</p>
<p>कोरोना काल से पहले अगस्त 2019 में देश में बिजली की खपत 106 बिलियन यूनिट थी, जो करीब 18 फीसदी बढ़ोतरी के साथ अगस्त 2021 में 124 बिलियन यूनिट दर्ज की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि मार्च 2023 तक देश में बिजली की मांग में 15.2 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है, जिसे पूरा करने के लिए कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को उत्पादन में 17.6 फीसदी वृद्धि करनी होगी। देशभर में कुल बिजली उत्पादन का 70-75 फीसदी कोयला आधारित संयंत्रों से ही होता है और कोल इंडिया द्वारा रिकॉर्ड कोयला उत्पादन भी किया जा रहा है, लेकिन फिर भी मांग और आपूर्ति का अंतर कम नहीं हो पा रहा है। देश में करीब 80 फीसदी कोयले का उत्पादन कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) द्वारा किया जाता है और उसने इस वित्त वर्ष में कोयला आपूर्ति को 4.6 फीसदी बढ़ाकर 565 मिलियन टन करने का लक्ष्य रखा है। कोल इंडिया का कहना है कि वैश्विक कोयले की कीमतों और माल ढुलाई लागत में वृद्धि से आयात होने वाले कोयले से बनने वाली बिजली में कमी आई है।<br />केन्द्रीय कोयला मंत्री प्रहलाद जोशी के मुताबिक 2012-22 में देश में कुल कोयला उत्पादन 8.5 फीसदी बढ़कर 77.72 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है।</p>
<p>ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि यदि वाकई कोयले का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है तो फिर बिजली संयंत्र कोयले की भारी कमी से क्यों जूझ रहे हैं और यदि कोयले की कमी नहीं है तो बिजली उत्पादन में गिरावट क्यों आ रही है? बिजली संयंत्रों तक कोयला पहुंचाने के लिए रेलगाड़ियों की कमी भी बिजली संकट गहराने का कारण बनी रही है। कोयला खदानों से पावर प्लांटों तक कोयला पहुंचाने के लिए रेलवे में रैक (डिब्बों) की कमी एक अहम कारण रहा है। एक बड़ी समस्या यह भी है कि कोरोना महामारी के कारण कई राज्यों की वित्तीय स्थिति खस्ता हुई है, जिससे उनके स्वामित्व वाली बिजली वितरण कम्पनियां (डिस्कॉम) बिजली उत्पादन कम्पनियों को बकाया चुकाने की स्थिति में नहीं हैं। माना जा रहा है कि केन्द्र तथा कोयला बहुल गैर-भाजपा शासित सरकारों के बीच भुगतान को लेकर तनातनी और बिजली उत्पादन कम्पनियों द्वारा सीआईएल को अदायगी में देरी कोयला खनन में ठहराव आने का एक प्रमुख कारण है। विदेशों से कोयले का आयात बंद करने से भी समस्या गहराई है। दरअसल अंतरराष्टÑीय बाजार में कोयले की कीमतें काफी बढ़ी हैं और बिजली संयंत्रों द्वारा कोयले का आयात इसीलिए बंद या बहुत कम किया जा रहा है, क्योंकि इससे उनकी उत्पादन लागत में काफी वृद्धि हो रही है। कोयले की बढ़ती मांग के कारण बिजली मंत्रालय द्वारा कोयले का आयात बढ़ाकर 36 मिलियन टन करने को कहा गया है। बहरहाल, कोयले की कमी से बार-बार उपजते बिजली संकट से निजात पाने के लिए बिजली कम्पनियों को भी कड़े कदम उठाने की दरकार है। दरअसल बिजली वितरण में तकनीकी गड़बड़ियों के कारण कुछ बिजली नष्ट हो जाती है। वितरण प्रणाली को दुरूस्त करके बेवजह नष्ट होने वाली इस बिजली को बचाया जा सकता है।                <br /><strong>- योगेश कुमार गोयल</strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong><br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 10 May 2022 10:37:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>कोयला संकट के बीच 5 उत्पादन इकाइयां ठप</title>
                                    <description><![CDATA[भीषण गर्मी के बीच बिजली संकट फिलहाल टलने के आसार नजर नहीं आ रहे। कोयले की कमी और तकनीकी कारणों से प्रदेश में 1970 मेगावाट क्षमता की पांच बिजली उत्पादन इकाइयां बंद है, जबकि शेष इकाइयों में महज चार से पांच दिन का कोयला स्टॉक है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/jaipur-5-production-units-stalled-amid-coal-crisis/article-9450"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/46565465465.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। भीषण गर्मी के बीच बिजली संकट फिलहाल टलने के आसार नजर नहीं आ रहे। कोयले की कमी और तकनीकी कारणों से प्रदेश में 1970 मेगावाट क्षमता की पांच बिजली उत्पादन इकाइयां बंद है, जबकि शेष इकाइयों में महज चार से पांच दिन का कोयला स्टॉक है। लिहाजा सभी श्रेणी उपभोक्ताओं को आगामी दिनों में भी बिजली कटौती से राहत मिलने की संभावना कम ही है। राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम की बंद पड़ी पांच इकाइयों में 600 मेगावाट की सूरतगढ़ थर्मल सुपर क्रिटिकल, 600 मेगावाट की कालीसिंध, 210 मेगावाट की कोटा थर्मल और 250 मेगावाट क्षमता की सूरतगढ़ थर्मल व छबड़ा थर्मल इकाई शामिल है। सूत्रों के अनुसार 250 मेगावाट क्षमता की सूरतगढ़ थर्मल इकाई दो-तीन दिनों में शुरू होने और 600 मेगावाट की कालीसिंध थर्मल इकाई में 15 मई तक उत्पादन शुरू होने की संभावना है।</p>
<p><strong>18 इकाइयों में भी कम उत्पादन</strong><br />विद्युत उत्पादन निगम की प्रदेश में कुल 23 उत्पादन इकाइयां हैं, जिसमें से वर्तमान में 18 इकाइयों में बिजली उत्पादन जारी है। इन इकाइयों की क्षमता महज 5610 मेगावाट है, लेकिन इनसे भी तीन से चार हजार मेगावाट उत्पादन रोजाना हो पा रहा है। इन उत्पादन इकाइयों में भी चार से पांच दिन का कोयला ही बचा है, जबकि नियमानुसार 26 दिन का स्टॉक रहना चाहिए। देशव्यापी कोयला संकट के बावजूद राजस्थान को 22 रैक कोयला मिल रहा है, लेकिन यह भी जरूरत की तुलना में कम है। <br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 10 May 2022 09:53:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>बिजली की भारी मांग के बीच अप्रैल 2022 में कोयले का कुल उत्पादन 6.62 करोड़ टन</title>
                                    <description><![CDATA[ अप्रैल में कोल इंडिया ने बिजली घरों को 4.97 करोड़ टन कोयला भेजा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/business/total-production-of-coal-in-april-2022-at-66-2-million-tonnes-amid-huge-demand-for-electricity/article-9095"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/coal.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। तेज गर्मी में बिजली की भारी मांग के बीच देश का कुल कोयला उत्पादन अप्रैल 2022 में 6.62 करोड़ टन रहा। कोयला मंत्रालय ने मंगलवार को एक बयान में कहा कि अप्रैल में देश की सबसे बड़ी कोयला कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड (सीईएल) और इसकी अनुषंगी कंपनियों ने 5.44 करोड़ टन और सिंगरेनी कोलियरीज कंपनी लिमिटेड(एससीसीएल) ने 53.23 लाख टन उत्पादन किया। कैपटिव (खुद के इस्तेमाल के लिए) खानों का उत्पादन 73.61 लाख टन रहा।    <br /><br />बयान के मुताबिक अप्रैल 2022 में कोयले का कुल उठाव 7.09 करोड़ टन रहा, जिसमें से बिजली क्षेत्र को 6.17 करोड़ टन कोयले की आपूर्ति की गयी। अप्रैल में कोल इंडिया ने बिजली घरों को 4.97 करोड़ टन कोयला भेजा। वित्त वर्ष 2021-22 में कोयले का कुल उत्पादन 8.55 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 77.70 करोड़ टन (त्वरित अनुमान) रहा जोकि इससे पिछले वित्त वर्ष में 71.60 करोड़ टन था। वित्त वर्ष 2021-22 में कोयले के उठाव में 18.43 प्रतिशत दर्ज की गयी और यह 81.80 करोड़ टन रहा, वित्त वर्ष 2020-21 में यह आंकड़ा 69.01 करोड़ टन था। कोल इंडिया ने इस बार अप्रैल में 6.02 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 5.44 करोड़ टन कोयले का रिकॉर्ड उत्पादन किया।<br /><br />कोल इंडिया का वित्त वर्ष 2021-22 में कोयले का उत्पादन 4.43 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 62.21 करोड़ टन रहा जोकि वित्त वर्ष 2020-21 में 59.60 करोड़ टन था। इस अवधि में कंपनी का कुल उठाव 66.11 करोड़ टन रहा जोकि वित्त वर्ष 2020-21 में 57.30 करोड़ टन था। एससीसीएल के कोयला उत्पादन में वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान 28.55 प्रतिशत की वृद्धि देखी गयी जोकि इस अवधि में 6.50 करोड़ टन रहा। पिछले वित्त वर्ष में कंपनी का कोयला उत्पादन 5.01 लाख टन था। कैपटिव (खुद के इस्तेमाल के लिए) खानों का कोयला उत्पादन वित्त वर्ष 2020-21 में हुए 6.90 करोड़ टन के मुकाबले वित्त वर्ष 2021-22 में 8.91 करोड़ टन रहा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बिजनेस</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 May 2022 18:44:44 +0530</pubDate>
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