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                <title>कब खत्म होगा देश में नदियों का प्रदूषण ?</title>
                                    <description><![CDATA[देश में नदियों का प्रदूषण खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। कोई एक नदी ऐसी नहीं है, जिसे शुद्ध और निर्मल नदी के रूप में जाना जाये।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/when-will-pollution-of-rivers-end-in-the-country/article-162701"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-08/111200-x-600-px)52.png" alt=""></a><br /><p>देश में नदियों का प्रदूषण खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। कोई एक नदी ऐसी नहीं है, जिसे शुद्ध और निर्मल नदी के रूप में जाना जाये। जिसे पतितपावनी और मुक्तिदायिनी कहा जाता है और जिसका जल पुण्य का सबब माना जाता है, सबसे पहले देश की उसी पुण्य सलिला, मोक्षदयिनी नदी गंगा को लें। गंगा प्रदूषण मुक्ति हेतु 42,000 करोड़ की राशि खर्च की जा चुकी है। इसके अलावा 1985 में गंगा एक्शन प्लान पर शुरुआत में ही 1200 करोड़ की राशि खर्च की गयी। लेकिन गंगा आज अपने मायके उत्तराखंड में ही साफ नहीं है। दावे कुछ भी किये जायें वह आज भी मैली है और उसका जल पुण्य का नहीं, मौत का सबब बन गया है। कैग की रिपोर्ट इसका जीता जागता सबूत है। अब देश की दूसरी प्रमुख नदी यमुना को लें, संसद में दिये आंकड़ों के मुताबिक अभी तक यमुना की सफाई पर पिछले तीन वित्तीय वर्षों में कुल 5,536 करोड़ की राशि खर्च की जा चुकी है जबकि यमुना संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण पर पहले ही लगभग 1,951 करोड़ की राशि खर्च की जा चुकी थी। इसके अलावा दिल्ली सरकार के ग्रीन बजट के तहत दिल्ली जल बोर्ड को 6485 करोड़ रुपए की राशि दी गयी और अभी हाल फिलहाल में ही दिल्ली सरकार ने यमुना की सफाई के लिए 4500 करोड़ की राशि की मंजूरी दी है लेकिन यमुना गंदगी और दुर्गंध से बजबजा रही है। वह जहरीली है। इसके अलावा देश की और दूसरी नदियों को छोड़ भी दें, केवल गंगा और उसकी सहायक नदियों की बात की जाये, तो उनपर अभीतक 21,340 करोड़ रूपये से ज्यादा की राशि स्वाहा हो चुकी है।</p>
<p><strong>प्रदूषण का दानव :</strong></p>
<p>इतनी भारी-भरकम राशि खर्च करने के बाद भी नदियां आज भी अपने ताड़नहहार की बाट जोह रही हैं कि कौन भगीरथ आयेगा जो उन्हें प्रदूषण के दानव से मुक्ति दिलायेगा? हालत तो इतनी खराब है कि उनका पानी आचमन की बात तो दीगर है, वह सीवेज और कारखानों के रासायनिक अपशिष्ट से इतना विषैला है कि प्राणी मात्र और जलजीवों की सेहत के लिए भी जानलेवा साबित हो रहा है।</p>
<p>विडम्बना देखिए कि इस बाबत देश की सुप्रीम अदालत नौ साल पहले ही आदेश दे चुकी है कि नदियों में शोधन के बगैर सीवेज न बहाया जाये। लेकिन दुखद यह है कि इसके बावजूद न राज्य सरकारों पर इसका कोई असर पड़ा और न ही सीवेज निस्तारण करने वाली एजेंसियों पर कि वह इस मामले पर कारगर कदम उठातीं। उसका नतीजा यह है कि नदियों का प्रदूषण लोगों को जानलेवा बीमारियों की सौगात देकर उन्हें मौत के मुंह में ढकेल रहा है। देखा जाये तो देश में रोजाना लगभग 73,000 मिलियन लीटर, एम एल डी सीवेज उत्पन्न होता है। इसमें से केवल 28 फीसदी हिस्से का ही शोधन हो पाता है। बाकी लगभग 72 फीसदी यानी 52,000 मिलियन लीटर से ज्यादा अनुपचारित सीवेज का गंदा पानी सीधे-सीधे देश की नदियों और दूसरे जलस्रोतों में गिर रहा है। यदि केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट की मानें तो देश के विभिन्न राज्यों में लगभग 296 प्रदूषित नदी खंड चिन्हित किये गये हैं जिसका मुख्य कारण उनमें गिरने वाला बिना शोधित किया हुआ सीवेज है। यदि सी एस ई की एक रिपोर्ट को मानें तो देश की लगभग चार सौ से भी अधिक नदियां ऐसी हैं जो प्रदूषित हैं और उसका सबसे बड़ा कारण अनुपचारित सीवेज का उनमें लगातार गिरना है। देश में नदियों में सीवेज गिराये जाने के मामले में उत्तर प्रदेश शीर्ष पर है जहां हजारों की तादाद में नाले सीवेज का गंदा पानी सीधे-सीधे नदियों में गिरा रहे हैं। यहां बिना शोधन के गंगा, यमुना, वरुणा, रोहिणी, पांडु, ईशन, सई, घाघरा, काली, गोमती, रामगंगा, कोसी, राप्ती, तमसा, सरयू, नीमा, बीटा, सेंगर, अरिंद, सरायन, करवन, काक, उल्ल जैसी नदियों में सीवेज का गंदा विषैला पानी 1385 गंदे नालों के जरिये बहाये जाने के मामले में बीते बरसों से बेतहाशा बढ़ोतरी देखी गयी है।</p>
<p><strong>नदियों की यह दुर्दशा :</strong></p>
<p>यह हालत तब है जबकि 2017 में ही सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पारित किया था कि बगैर शोधित किये सीवेज का गंदा पानी नदियों में प्रवाहित न किया जाये। उस समय तो केवल 1230 नाले ही सीवेज का गंदा पानी बिना शोधन के नदियों में बहा रहे थे। नदियों के प्रदूषण का आलम यह है कि उनका पानी कई जानलेवा बीमारियों का सबब बन रहा है। नदिया का जल सीसा, पारा, आर्सैनिक और कैडमियम जैसी विषैली धातुओं व कारखानों के विषाक्त रासायनिक अपशिष्ट लीवर के संक्रमण, आंत में सूजन, तंत्रिका तंत्र और मस्तिष्क, गुर्दे, फेफडो़ं के कैंसर, त्वचा , फाइब्रेसिस, लिवर सिरोसिस, लेप्टोस्पाइरोसिस, सार्कोप्टेस एलर्जी के घुन के लिए प्रजनन स्थल प्रदान करने के साथ साथ हैजा, पीलिया, किडनी, डर्मेटाइटिस और हड्डियों व प्रजनन सम्बंधी जानलेवा रोग के कारण बन रहे हैं। सबसे बड़ा दुख इस बात का है कि नदियों की यह दुर्दशा उस धर्मभीरू देश में है जहां नदियों की मां की तरह पूजा की जाती है, जिनके किनारे सभ्यताओं और संस्कृतियों ने जन्म लिया है, उनके किनारे कुंभ जैसे विशालकाय मेले लगते हैं जिनमें करोड़ों-करोड़ की तादाद में धर्मप्राण जनता स्नान कर खुद को धन्य मानती है।</p>
<p><strong>-ज्ञानेन्द्र रावत</strong></p>
<p><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 11:10:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कीचड़-कचरे और झाड़ियों से अटी ‘जीवन दायिनी’, नदियां पूरी तरह से हो सकती है गंदे नाले में तब्दील </title>
                                    <description><![CDATA[कभी छीपाबड़ौद की शान मानी जाने वाली नदियां आज अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाने को मजबूर है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/baran/jeevan-daayini--is-filled-with-mud--garbage-and-bushes/article-108055"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-03/news-(1)29.png" alt=""></a><br /><p>छीपाबड़ौद। कभी छीपाबड़ौद की शान मानी जाने वाली नदियां आज अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाने को मजबूर है। जिन जलधाराओं ने कभी पूरे क्षेत्र को तृप्त किया, खेतों को सिंचाई दी और हरियाली का आधार बनीं, वे अब गंदगी और कूड़े के ढेर में तब्दील हो रही हैं। स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि इन नदियों का पानी पीना तो दूर, इनके किनारे खड़ा होना भी मुश्किल हो गया है।</p>
<p><strong> पर्यावरण और स्वास्थ्य पर मंडराता खतरा</strong><br />गंदगी और कूड़े-कचरे की वजह से मच्छरों का प्रकोप बढ़ रहा है। जिससे मलेरिया, डेंगू और अन्य संक्रामक बीमारियों का खतरा बना हुआ है। बारिश के दिनों में स्थिति और विकट हो जाती है, जब गंदा पानी आसपास के इलाकों में फैलने लगता है। यह समस्या न केवल इंसानों के लिए बल्कि पशुओं और पक्षियों के लिए भी जानलेवा साबित हो रही है।</p>
<p><strong>नदियां पूरी तरह से हो सकती है गंदे नाले में तब्दील</strong><br />अगर अब भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो आने वाले कुछ वर्षों में छीपाबड़ौद की ये नदियां पूरी तरह से गंदे नाले में बदल जाएगी। सवाल यह है कि क्या हम अपनी इस अमूल्य धरोहर को बचाने के लिए आगे आएंगे, या इसे यूं ही नष्ट होने देंगे?</p>
<p><strong>समस्या का निकाले स्थायी समाधान</strong><br />अब समय आ गया है कि प्रशासन और जनता मिलकर इस समस्या का स्थायी समाधान निकालें। कुछ आवश्यक कदम जो तुरंत उठाए जाने चाहिए। कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। नदी में कूड़ा डालने वालों पर सख्त जुर्माना लगाया जाए।  नगर प्रशासन द्वारा नियमित सफाई अभियान चलाया जाए।आमजन में जागरूकता पैदा की जाए। लोगों को समझाया जाए कि नदियां हमारी धरोहर हैं और इन्हें बचाना हमारी जिम्मेदारी है।  कूड़ा कचरे का निस्तारण कराया जाए। नदी के पास कूड़ा फैंकने के बजाय उचित स्थानों पर कूड़ेदान लगाए जाएं।</p>
<p><strong>कौन जिम्मेदार? प्रशासन या जनता!</strong><br />स्थानीय नागरिकों का कहना है कि इस बदहाली के लिए सिर्फ आम लोग ही नहीं, बल्कि प्रशासन और पंचायत भी बराबर के दोषी हैं। सफाई कर्मचारियों द्वारा कस्बे का कचरा इन नदियों में फैंक दिया जाता है। घरों और दुकानों से निकलने वाला कूड़ा-कचरा भी सीधे जलधाराओं में बहा दिया जाता है। कई बार इस मुद्दे को अधिकारियों तक पहुंचाने की कोशिश की गई, लेकिन हर बार आश्वासनों के सिवा कुछ हाथ नहीं आया।</p>
<p>नदियों का पानी पीना तो दूर अब इनके किनारे खड़ा रहना भी मुश्किल हो रहा है। फैैल रही गंदगी की दुर्गंध से वातावरण दूषित हो रहा है। <br /><strong>- कन्हैयालाल, कस्बेवासी। </strong></p>
<p>कई बार इस समस्या को अधिकारियों तक पहुंचाने की कोशिश की गई, लेकिन हर बार आश्वासनों के अलावा कुछ हाथ नहीं लगा। <br /><strong>- ओमप्रकाश, कस्बेवासी। </strong></p>
<p>स्वच्छता को लेकर सरकार और प्रशासन पूरी तरह से प्रयासरत हैं, लेकिन आमजन की भागीदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कचरा इधर-उधर नहीं फै कें और अपने आसपास की सफाई बनाए रखें। यदि किसी भी ग्राम पंचायत द्वारा कचरा नदियों या अन्य जल स्रोतों में फेंका जा रहा है, तो यह गंभीर विषय है। हम इस ओर कड़ी निगरानी रखेंगे और आवश्यक कार्रवाई करते हुए संबंधित पंचायतों को पाबंद करेंगे ताकि स्वच्छता अभियान को पूरी प्रभावशीलता के साथ लागू किया जा सके। <br /><strong>- सूर्यप्रकाश जारवल, विकास अधिकारी, पंचायत समिति छीपाबड़ौद। </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बारां</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 20 Mar 2025 15:16:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>इंद्रगढ़ में नदी नालों की सफाई में हो रही खानापूर्ति</title>
                                    <description><![CDATA[नगर की प्रमुख इंद्राणी नदी कचरे से अटी पड़ी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/bundi/in-indragarh--cleaning-of-rivers-and-drains-is-being-done-only-as-a-formality/article-83406"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/u1rer-(2)3.png" alt=""></a><br /><p>इन्द्रगढ़। हाड़ौती अंचल में मानसून ने दस्तक दे दी है। हालांकि इंद्रगढ़ में अभी बारिश का दौर अभी शुरू नहीं हुआ है। मानसून शुरू होने से पहले नदी, नालों की सफाई में केवल खाना पूर्ति की जा रही है। शहर की प्रमुख इंद्राणी नदी कचरे से अटी पड़ी है। ऐसे में भारी बरसात में नदी-नाले में उफान की स्थिती होने पर जलभराव का खतरा मंडरा सकता है। गौरतलब है कि 2019 में इन्द्रगढ़ में आई बारिश ने शहर में भयंकर तबाही मचाई थी और उस समय सभी नदी नाले उफान पर थे। उस बाढ के दौरान कई पुलिया व नाले टूट कर बह गए थे। प्रशासन ने उस घटना से भी कोई सीख नही ली और घटना के 4-5 वर्ष बाद भी नदी नालों की स्थिति जस की तस बनी हुई है। </p>
<p><strong>कलक्टर के आदेश की भी पालना नहीं की</strong><br />बारिश के पहले ही जिला कलक्टर बूंदी के द्वारा इन्द्रगढ़ नगर पालिका को अवगत करवा दिया गया था कि बारिश का दौर शुरू होने से पहले ही शहर के समस्त नदी नालों की अच्छे से सफाई कर जल्द से जल्द सूचना प्रेषित करे ताकि बारिश के दौरान आने अचानक से आनी वाली समस्याओं से बचा जा सके। परंतु नगर पालिका इन्द्रगढ़ के द्वारा शहर के मुख्य नदी नालों की सफाई मेंं जिला कलक्टर के आदेशों पर भी ज्यादा रूचि नही दिखाई और सफाई के नाम से केवल औपचारिकता की गई। शहर की मुख्य इन्द्राणी नदी अभी भी गंदगी व झाड़ व कांटों के साथ कचरे से भरी पड़ी है। उसी नदी पर चंद्र बिहारी जी की धर्मशाला के पास बनी पुलिया के नीचे बने मोखो की भी अभी तक कोई साफ सफाई नही हुई है। ये मोखे भी गंदगी व कचरे से अटे पडे है। अहिंसा मार्ग पर बने नाले की भी सफाई अभी तक नही हुई है। वो भी गंदगी के साथ प्लास्टिक की थैलियों व कट्टों से भरा पडा है। प्रशासन अगर चाहे तो गर्मी के समय में इस नाले की पूर्ण साफ सफाई करवा सकता है परंतु आज दिन तक नगर पालिका के किसी भी बोर्ड के द्वारा इस समस्या को गंभीरता से नही लिया गया है। </p>
<p><strong>बारिश तेज आई तो भुगतने होंगे गंभीर परिणाम </strong><br />अगर इन्द्रगढ़ में 2019 जैसी बारिश आ जाती है तो इन नदी नालों की सफाई नही होने से शहरवासियों को प्रशासन की अनदेखी के गंभीर परिणाम भुगतने को मिल सकते है। नदी की सफाई नही होने व कचरे के कारण पानी की निकासी नही होने से नदी में आया पानी शहर में तबाही मचाएगा। इन सब के अलावा भी शहर में कई छोटे बडे नाले है जो भी गंदगी व कचरे से भरे पडे होने के कारण पानी अवरूद्ध होने की समस्या आएगी।</p>
<p><strong>आदेश पर एक पुलिया पर सफाई हुई उसमें भी खानापूर्ति </strong><br />जिला कलक्टर बूंदी के आदेश के बाद हरकत में आए पालिका प्रशासन नें मुख्य चिन्हित जगहों में से एक इन्द्रगढ़ सुमेरगंज मंडी मार्ग पर नवनिर्मित पुलिया के नीचे की सफाई की है उसमें भी मात्र खानापूर्ति की गई है। इन्द्रगढ़ सुमेरगंज मंडी मार्ग पर बनी इस नई पुलिया को बनाने के लिए इन्द्राणी नदी का बहाव रोकने के लिए पुलिया ठेकेदार द्वारा पुरानी पुलिया के मलबे को काम में लिया गया था। पुलिया बनने के बाद ठेकेदार द्वारा मलबा बीच नदी में ही छोड़ दिया गया जिसको अभी सार्वजनिक निर्माण विभाग व पालिका प्रशासन द्वारा जेसीबी मशीन लगाकर हटाना था परंतु  मलबे को नदी से बाहर निकालने की बजाय नदी में ही उसकी जगह बदल दी है। जिससे नदी में वापस मलबे का ढेर नजर आ रहा है। उक्त मलबा तेज बारिश आने पर पानी को अवरूद्ध कर देगा जिससे शहर में मुसीबत आ सकती है।</p>
<p><strong>इन्द्राणी नदी,शिवदानसागर तालाब व बावड़ियों की भी नही हुई सफाई </strong><br />शहर की प्रमुख नदी इन्द्राणी नदी ही अभी तक भी कचरे व कांटों से अटी पडी है। गर्मी में नदी व देहडा दोनों पूरी तरह से सुख जाते है अगर समय रहते प्रशासन इस पर ध्यान दे तो इनमें जेसीबी मशीन से गहराई भी करवाई जा सकती है व देहडे व नदी की चैड़ाई को भी बढ़ाया जा सकता है। नदी के किनारे पर ही इन्द्राणी उद्यान बना दिया गया है जो बारिश के आने के साथ ही स्विमिंग पूल में तब्दील हो जाता है। इसी प्रकार शिवदानसागर तालाब व शहर की प्रमुख बावडिया भी गंदगी से भरी पड़ी है इन्हे भी समय रहते साफ करवाया जाना चाहिए।</p>
<p><strong>क्या बोले शहरवासी</strong><br />शहर में बारिश के पहले साफ सफाई होना जरूरी है। मुख्य रूप से इन्द्राणी नदी की। क्योंकि बारिश का सारा पानी वहीं से आता है और पानी का मार्ग अवरूद्ध होने से भारी परेशानी हो सकती है। <br /><strong>- गोविन्द गौत्तम,निवासी इन्द्रगढ़</strong></p>
<p>हालांकि नगर पालिका द्वारा कई नदी नालों की सफाई करवा दी गई है परंतु कुछ जगह अभी बाकि है जहां सफाई होना जरूरी है। पालिका प्रशासन को बारिश के पहले सभी जगह की अच्छे से साफ सफाई करवानी चाहिए। <br /><strong>- अजय कहार, पूर्व पार्षद नगर पालिका इन्द्रगढ़</strong></p>
<p>इन्द्रगढ़ सुमेरगंज मंडी मार्ग पर बनी पुलिया का मलबा हटा कर नदी के पानी की निकासी करवा दी गई है। मलबा बाहर नही निकाला गया है वही फैला दिया गया है जिससे पानी के बहाव में किसी प्रकार की परेशानी ना हो और पानी पुलिया पर नही आए। <br /><strong>- मनोज मीना, कनिष्ठ सहायक अभियंता सार्वजनिक निर्माण विभाग इन्द्रगढ़।</strong></p>
<p> शहर के नदी नालों की सफाई के लिए जेसीबी मशीन लगाई गई है जिससे सफाई कार्य करवाया जा रहा है। बारिश के पूर्व सभी नदी नालों की सफाई करवा दी जाएगी। <br /><strong>- गजेन्द्र मीना, सहायक अभियंता नगर पालिका इन्द्रगढ़।</strong></p>
<p>नदी नालों की सफाई का कार्य वर्तमान में चल रहा है। अधिकतर जगह सफाई करवा दी गई है फिर भी कोई जगह छुट गई है तो जल्दी ही उस जगह की भी सफाई करवा दी जाएगी।<br /><strong>- बाबू लाल बैरवा , अध्यक्ष नगर पालिका इन्द्रगढ़।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बूंदी</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 02 Jul 2024 16:09:18 +0530</pubDate>
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                <title>बारिश के पानी को रोकने से बचेंगी ‘बरसाती नदियां’</title>
                                    <description><![CDATA[अनेक जिलों में बहने वाली बरसाती नदियां सूख गई]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%B6-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%8B-%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%AC%E0%A4%9A%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%80-%E2%80%98%E0%A4%AC%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%82%E2%80%99/article-1565"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-10/4.jpg" alt=""></a><br /><p><strong> जयपुर</strong>। प्रदेश के चारों तरफ अनेक छोटी-बड़ी नदियां रही हैं, जो बरसात के दिनों में ही बहती थी। बीते कुछ सालों में बरसात के कम होने, बहाव क्षेत्र में जगह-जगह अतिक्रमण और बरसाती पानी का संरक्षण नहीं होने से नदियां वक्त के साथ काल-कवलित हो गई हैं। अब तो कई नदियां ऐसी हैं, जो सिर्फ कागजों में ही जिंदा हैं। आलम है कि भूगोल के विद्यार्थी भी बड़ी मुश्किल से नदियों के नाम जानते हैं, जबकि एक दौर ऐसा भी रहा है, जब सभी नदियां बरसात के दिनों में बहा करती थी।</p>
<p><br /> <strong>क्यों दम तोड़ गई नदियां</strong><br /> आज बरसात का पानी मिट्टी काटता हुआ बह जाता है। उसे रोकने के लिए सभी लोगों को सामूहिक रूप से प्लानिंग बनाकर पानी के बहाव को रोकना पड़ेगा। ताकि ज्यादा से ज्यादा बरसाती पानी का उपयोग हो सके। यह कहना है-मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेन्द्र सिंह का। वे कहते हैं कि बरसात के पानी के तेज फ्लो को स्लो किया जाना चाहिए। आज देशभर के 72 प्रतिशत जलस्त्रोत और करीब 70 प्रतिशत नदियां सूख गई हैं। <br /> <br /> <strong>क्या हैं सुझाव</strong><br />      निजी क्षेत्र के ट्यूबवेल पर रोक। <br />     पौधरोपण के साथ सामुदायिक विके्रन्दीकरण जल प्रबंधन की आवश्यकता।<br />     राज्य सरकार नदियों के संरक्षण के लिए नए सिरे से करे विचार। <br />     नदी के बहाव क्षेत्र में अतिक्रमण को हटाना बेहद जरूरी है। <br /> <strong><br /> संकल्प लिया और बहने लगी अरवली नदी</strong><br /> एक समय में पूरी तरह सूख गई अरवली नदी में बरसात के पानी को रोकने के लिए जब संकल्प लिया गया तो सभी ने बरसात की एक-एक बूंद बचाई थी। गांव के हजारों लोगों ने प्रकृति से कम से कम लेने और अधिक से अधिक देने का ही संकल्प किया और आज अरवली नदी बह रही है।</p>
<p><br /> <strong>इनका कहना है</strong><br /> जगह-जगह ट्यूबवेल लगने और नदी के बहाव क्षेत्र में अतिक्रमण होने से नदियां सूख गई हैं। बरसात के पानी के संरक्षण की भी उचित व्यवस्था होनी चाहिए। पानी को बचाने की मानसिकता बनानी होगी।<br /> <strong>डॉ. एमएस राठौड़, निदेशक, पर्यावरण एवं विकास अध्ययन संस्थान, जयपुर </strong></p>
<p><br /> <strong>ऐसी नदियां जो कुछ जिंदा और कुछ सूख गई</strong><br /> अजमेर में साबरमती, सरस्वती,  खारी, डाई, बनास। अलवर में साबी, रूपाढेल, काली, गौरी, सोटा। बांसवाड़ा में माही, अन्नास, चैणी। बाड़मेर में लूनी, संूकड़ी। भरतपुर में चम्बल, बराह, बाणगंगा, गंभीरी, पार्वती। भीलवाड़ा में बनास, कोठारी, बेडच, मेनाली, मानसी, खारी। बूंदी में कुराल। धौलपुर में चम्बल। डूंगरपुर में सोम, माही, सोनी। श्रीगंगानगर में घग्घर। जयपुर में बाणगंगा, बांड़ी, डूंढ, मोरेल, साबी, सोटा, डाई, सखा, मासी। जैसलमेर में काकनेय, चांघण, लाठी, घऊआ, घोगड़ी। जालौर में लूनी, बांड़ी, जवाई, सूकड़ी। झालावाड़ में कालीसिंध, पर्वती, छोटी काली सिंध,  निवाज। झुंझनूं में काटली। जोधपुर में लूनी, माठड़ी, जोजरी। कोटा में चम्बल, कालीसिंध, पार्वती, आऊ निवाज, परवन। नागौर में लूनी। पाली में लीलड़ी, बांड़ी, सूकड़ी जवाई। सवाईमाधोपुर में चम्बल, बनास, मोरेल। सीकर में काटली, मंथा, पावटा, कावंट। सिरोही में पश्चिमी बनास, सूकड़ी, पोसालिया,खाती, किशनावती, झूला, सुरवटा। टोंक में बनास,मासी, बांड़ी। उदयपुर में बनास, बेडच, बाकल, सोम,जाखम, साबरमती। चित्तौड़गढ़ में बनास, बेडच, बामणी, बागली, बागन, औराई, गंभीरी, सीवान, जाखम, माही।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 10 Oct 2021 13:02:41 +0530</pubDate>
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