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                <title>तेज रफ्तार जिंदगी पर लगाम की जरूरत, सोशल मीाडिया और रील कल्चर हिला रहा दिमाग</title>
                                    <description><![CDATA[बच्चों की नहीं पैरेन्ट्स की काउंसलिंग होनी चाहिए। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-fast-paced-life-needs-to-be-curbed--social-media-and-reel-culture-are-disrupting-minds/article-129169"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/copy-of-news-(15)2.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। दैनिक नवज्योति कार्यालय में होने वाली मासिक परिचर्चा की श्रंखला में बुधवार को मानसिक स्वास्थ्य सप्ताह के तहत मानसिक स्वास्थ्य (मॉडर्न लाइफ स्टाइल एन्ड मेन्टल इनस्टेबिलिटी) विषय पर परिचर्चा की गई। परिचर्चा में हिस्सा लेने वाले प्रतिभागियों ने कहा कि यह मुद्दा भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक स्थितियों से जुड़ा मुद्दा है। तनाव, डिप्रेशन,  एंग्जाइटी,  नशा और अंत में पागलपन तक आदमी पहुंच जाता है।  संयुक्त परिवारों का विघटन ने इस समस्या को विस्तृत रूप दे दिया है। इसके साथ साथ आर्थिक असुरक्षा, प्रतिस्पर्धा, एकाकीपन, पारिवारिक तनाव, घरेलू हिंसा,और जागरुकता की कमी मुख्य कारण है। इसके साथ मॉर्डन लाइफ स्टाइल में सोशल मीडिया का रील कल्चर बड़ा कारण बन रहा है। अब बच्चा,किशोर, युवा बुजुर्ग सब एकाकीपन के शिकार होकर मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं। तेज रफ्तार जिंदगी ने सबकुछ उलट पुलट कर दिया है।   परिचर्चा में जहां सीनियर साइकेटिस्ट, न्यूरो, पीडियाट्रिक, फिजिशियन, न्यूट्रिशियन काउंसलर, डायटीशियन, रिसर्चर, आयुर्वेद, योगा,के साथ मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले ब्रहम्माकुमारी संस्थान,आर्ट आॅफ लिविंग और रामलाल जी सिहाग के संस्थान से जुडे सदस्यों ने भी हिस्सा लिया।  प्रस्तुत हैं परिचर्चा के अंश... </p>
<p><strong>एकांत में बैठकर खुद को जानने से कम होगा तनाव</strong><br />मानसिक बीमारियां व तनाव का कोई एक कारण नहीं है। परिवार के लोगों का बच्चों पर शुरुआत से ध्यान नहीं देना और उसका खान-पान सही नहीं होना। खेलने के लिए समय नहीं होने और पढ़ाई का बोझ और परिवार की बच्चों से बढ़ती अपेक्षाएं तनाव बढ़ाती है। जिससे मानसिक बीमारियां बढ़ती है। बच्चे अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर पाते हैं। जिससे गलत संगत में पढ़ने पर भी तनाव बढ़ता है। मैंटल हैल्थ पहले सरकार की प्राथमिकता में नहीं था। लेकिन अब इसे विश्व स्तर पर दिवस व सप्ताह के रूप में मानने से जागरूकता बढ़ी है। हालांकि इस तरह की बीमारियों की पहचान जितनी जल्दी हो सके उतना समय पर उपचार संभव है। वैसे एकांत में बैठकर खुद के बारे में जानने और कमियों को दूर करके भी मानसिक तनाव को कम किया जा सकता है।   <br /><strong>-डॉ. एम.एल. अग्रवाल सीनियर मेंटल हेल्थ काउंसलर , प्रेसिंडेंट होप सोसाइटी  </strong></p>
<p><strong>नींद क्वालिटी बिगड़ने से बढ़ रही मानसिक बीमारियां</strong><br />एकल परिवार होने से जहां माता पिता के पास बच्चों के लिए समय ही नहीं है। समय मिलता भी है तो वे बच्चों को डांटने के सिवाय कुछ नहीं करते। उन्हें पुचकारने वाला परिवार को कोई बड़ा सदस्य नहीं है। ऐसे में बच्चे अपना अधिकतर समय टीवी या मोबाइल पर बिताने लगे है। जिससे अधिक समय स्क्रीन पर रहने से बच्चे हो या बड़े उनकी नींद क् वालिटी बिगड़ गई है। पर्याप्त नींद नहीं ले पाने से भी मानसिक तनाव व बीमारियां बढ़ रही है। 1990 के बाद इस तरह की बीमारियों के उपचार की बेहतर दवाएं उपलब्ध हैं लेकिन लोग भ्रम के कारण उनका सेवन नहीं कर पाते हैं। मानसिक तनाव व बीमारियों को कम करने के लिए परिवार को आपस में समय देना होगा।<br /><strong>-डॉ. विनोद कुमार दड़िया आचार्य एवं विभागाध्यक्ष मनोचिकित्सा मेडिकल कॉलेज </strong></p>
<p><strong>अपेक्षा व उपेक्षा के कारण बढ़ रहा तनाव</strong><br />वर्तमान में करीब 90 फीसदी लोग मानसिक तनाव व बीमारियों से ग्रसित है। सभी के  कारण अलग-अलग हो सकते हैं। मोबाइल  समय की जरूरत है। संयुक्त परिवार और कामकाजी तनाव जैसे सभी मुद्दे तो रहेंगे। उन पर नियंत्रण कैसे किया जिससे मानसिक स्वास्थ्य पर असर नहीं पड़े। लोग अपनी अपेक्षा बच्चों पर थोपते हैं। मैं कहता हूं कि बच्चों की नहीं पैरेन्ट्स की काउंसलिंग होनी चाहिए।  इस पर बात हो लेकिन परिवार का उस पर नियंत्रण रखना होगा। उम्र बढ़ने के साथ कई बार बीमारियां बढ़ती जाती है। घर में बुजुर्ग व बच्चों से सम्पर्क बनाए रखना होगा। ऐसा करने से सभी एक दूसरे की बातें व भावनाएं व्यक्त कर सकेंगे तो उनका तनाव कम होगा और बीमारियां भी नहीं होंगी।  अपेक्षा और उपेक्षा यह दो तनाव के बड़े कारण हैं।  इन दोनों से बचकर भी तनाव व बीमारियों को कम किया जा सकता है। <br /><strong>-डॉ. एस.एन. गौतम, आचार्य एवं विभागाध्यक्ष न्यूरो सर्जरी विभाग मेडिकल कॉलेज कोटा </strong></p>
<p><strong>मानसिक स्वास्थ्य हमारे जीवन का आधार</strong><br />मानसिक स्वास्थ्य हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है। यह केवल कार्य क्षमता का विषय नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित और उपयोगी बनाने की प्रक्रिया है।  मानसिक बीमारी किसी कमजोरी का संकेत नहीं है। लगभग 50 प्रतिशत मानसिक बीमारियों की शुरूआत 15 वर्ष की उम्र तक हो जाती है, जबकि 75 प्रतिशत 24 वर्ष तक पहुँच जाती हैं। वास्तव में मानसिक विकास मां के गर्भ से ही प्रारंभ हो जाता है और किशोरावस्था इसका सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है। मानसिक स्वास्थ्य की नींव घर से रखी जाती है। आज के दौर में एकल परिवारों के बढ़ने से बच्चों को दादा-दादी या नाना-नानी का भावनात्मक सहयोग नहीं मिल पाता, जिससे वे मानसिक रूप से कमजोर हो सकते हैं।  बच्चों का मानसिक, शारीरिक, भावनात्मक और यौन स्वास्थ्य समान रूप से सशक्त होना आवश्यक है।<br /><strong>-डॉ. अविनाश बंसल, नवजात शिशु एवं किशोर स्वास्थ्य विभाग, भारत विकास परिषद चिकित्सालय, कोटा</strong></p>
<p><strong>बच्चों से मित्रवत व्यवहार करना होगा</strong><br />परिवार में माता पिता जो खुद नहीं कर सके वह अपने बच्चों से पूरी करवाना चाहते हैं। जिससे उन पर मानसिक दबाव बढ़ने से वे तनाव में रहने लगते है। बच्चे अपनी भावनाएÞं परिवार में शेयर नहीं कर पाते। उनकी इच्छाओं को दबा दिया जाता है। जिससे तनाव और तनाव से मानसिक बीमारियां बढ़ती है। बच्चों से परिजनों को मित्रवत व्यवहार करना होगा। जिससे वे अपनी बात उनसे खुलकर कह सके। पैसा नहीं बच्चे सबसे बड़ा धन हैं। जिसने इसे प्रमुखता दी वहां तनाव व मानसिक बीमारियों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। <br /><strong>-डॉ. रोशनी मिश्रा, असिस्टेंट गवर्नर रोटरी क्लब कोटा राउंड टाउन </strong></p>
<p><strong>गर्भ संस्कार से श्रेष्ठ संतान का निर्माण होता है</strong><br />चार हजार साल पहले भी हमारे ऋषि-मुनियों ने बताया था कि श्रेष्ठ संतान का निर्माण गर्भ के भीतर ही होता है। हर माता-पिता स्वस्थ और संस्कारी संतान की इच्छा रखते हैं। गर्भावस्था में मां का आहार-विहार, विचार और भावनाएं सीधे बच्चे पर असर डालते हैं। पांचवें माह में गर्भ में मन का निर्माण होता है और छठे माह में बुद्धि का विकास शुरू होता है। ऐसे में मां यदि नकारात्मक या हिंसक विचार रखती है, नशे या मारधाड़ जैसी प्रवृत्तियों में रहती है, तो उसका प्रभाव गर्भस्थ शिशु के मन पर पड़ता है। आचार्य चरक ने स्मृति नष्ट होने को प्रज्ञा अपराध कहा, जो सभी रोगों की जड़ है।  प्रकृति स्वयं सबसे बड़ी चिकित्सक है। त्योहार, आहार और परंपराएं हमारे स्वास्थ्य से जुड़ी हैं।<br /><strong>-डॉ. नित्यानंद शर्मा, प्राचार्य, आयुर्वेद योग नेचुरोपैथी महाविद्यालय, कोटा</strong></p>
<p><strong>बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए स्नेह जरूरी</strong><br />आज के व्यस्त जीवन में माता-पिता दोनों के कार्यरत होने के कारण बच्चों का अकेलापन बढ़ता जा रहा है। बच्चों को माता-पिता से संवाद, स्नेह या ध्यान नहीं मिलता, तो वे वही अपनापन घर से बाहर तलाशने लगते हैं। संयुक्त परिवार की यही विशेषता रही है कि वहां बच्चों का न सिर्फ शारीरिक, बल्कि मानसिक विकास भी संतुलित रूप से होता है। परिवार के अन्य सदस्यों के बीच रहने से बच्चे को सामाजिक व्यवहार, अनुशासन और भावनात्मक सुरक्षा मिलती है। वहीं एकल परिवारों में माता-पिता की व्यस्तता के कारण बच्चे स्क्रीन तक सीमित होते जा रहे हैं। माता-पिता को चाहिए कि जब वे घर पर हों, तो बच्चों के साथ समय बिताएं, उनसे परिवार से जुड़ी बातें करें और उनकी इच्छाओं का सम्मान करें। <br /><strong>-डॉ. मिथिलेश खींची, मनोचिकित्सक, सहआचार्य,  मेडिकल कॉलेज कोटा</strong></p>
<p><strong>विजुअलाइजेशन से बढ़ेगा कॉन्संट्रेशन, बच्चे होंगे डिप्रेशन से दूर</strong><br />आज की जनरेशन मोबाइल के ज्यादा उपयोग से पढ़ाई से भटकती जा रही है।  मोबाइल को पूरी तरह दूर करना संभव नहीं है, लेकिन विजुअलाइजेशन तकनीक से इसका समाधान निकाला जा सकता है। बच्चे आंख बंद करके अपने लक्ष्य की कल्पना करें। जैसे परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करना या इंटरव्यू में आत्मविश्वास से उत्तर देना। इससे मानसिक एकाग्रता बढ़ती है और भय दूर होता है। एक छात्र ने बताया कि लगातार सिगरेट छोड़ने की कोशिश के बाद विजुअलाइजेशन अपनाने के बाद धीरे-धीरे कम करने के बाद छोड़ दी। कई छात्रों ने इस तकनीक से मोबाइल की लत भी छोड़ दी है। कुछ ने तो विजुअलाइजेशन की मदद से अपने सपनों की फील्ड, जैसे डेंटल कॉलेज में प्रवेश भी पाया। बच्चों को सकारात्मक विजुअलाइजेशन अपनाना चाहिए, जिससे वे तनाव और डिप्रेशन से दूर रह सकें।<br /><strong>-डॉ. समर्थ उपाध्याय, फिजिशियन, यूसीएचसी, विज्ञान नगर, कोटा</strong></p>
<p><strong>अपने अंदर की शक्ति को पहचानना आवश्यक</strong><br />मनुष्य के जीवन में सबसे बड़ी शक्ति उसके अंदर ही छिपी होती है। मेडिटेशन वह माध्यम है जो हमारे अशांत मन को शांत करता है। जब मन शांत होता है, तभी हम अपने अंदर की शक्ति से जुड़ पाते हैं। यह जुड़ाव मन की चार्जिंग के समान है। यदि हमारा मन सकारात्मक विचारों से भरा होगा तो हमारे चारों ओर सकारात्मक वाइब्रेशन फैलेंगे, और यदि मन नकारात्मक रहेगा तो नकारात्मक ऊर्जा ही उत्पन्न होगी। आज डॉक्टर भी मेडिटेशन को मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक बता रहे हैं, क्योंकि मन से वाइब्रेशन निकलते हैं जो हमारे शरीर और वातावरण को प्रभावित करते हैं। जब हम पॉजिटिव थॉट्स देते हैं, तो हमारा मन मजबूत और पावरफुल बनता है।  मेडिटेशन हमें यह समझने में मदद करता है कि कब धैर्य रखना है और कब कर्म करना है—यही आत्मज्ञान की दिशा है।<br /><strong>-ब्रह्माकुमारी उर्मिला दीदी, सेवाकेंद्र प्रभारी, कोटा संभाग</strong></p>
<p><strong>मोटिवेशन के साथ मेडिटेशन जरूरी</strong><br />वर्तमान में जिस तरह की प्रतिस्पर्धा एक दूसरे में बढ़ती जा रही है। वह तनाव का बड़ा कारण है। सही खानपान नहीं होना और पर्याप्त नींद नहीं आना भी मानसिक तनाव व बीमारियों को बढ़ाने का कारण है। ऐसे में तनाव व मानसिक बीमारियों को कम करने के लिए मोटिवेशन के साथ ही मेडिटेशन भी जरूरी है। व्यक्ति के शरीर के अंदर की जो शक्ति है उसे कुंडलिनी के माध्यम से जागृत किया जाता है। जिससे एक बिन्दु पर ध्यान केन्द्रित होने पर अन्य जगह से ध्यान हटने पर तनाव व मानसिक बीमारियों से बचा जा सकता है। <br /><strong>-राजेश गौतम, प्रेस सचिव आध्यात्म विज्ञान सत्संग केन्द्र </strong></p>
<p><strong>बच्चों को चाहिए बचपन, ना कि  सुविधाएं</strong><br /> रूट कॉस्ट यानी समस्या की जड़ पर बात बहुत कम लोग करते हैं। अक्सर बच्चे घर में रहकर भी अकेलापन महसूस करते हैं। माता-पिता से दूरी बढ़ने के कारण वे बाहरी दुनिया में अपनापन तलाशने लगते हैं। बच्चों को केवल सुविधाएं नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा और ध्यान की जरूरत होती है। उन्हें रियल स्टोरी या जीवन की सच्ची घटनाओं से समझाया जाए, तो वे चीजों को बेहतर तरीके से महसूस करते हैं। पहले दादा-दादी की सीख और स्नेह बच्चों की मानसिक मजबूती का आधार थे, पर अब वह कमी साफ झलकती है। हमें समस्या के मूल पर कामकरने की जरूरत है। <br /><strong>-रिद्धिमा नरसिंघानी,  स्टूडेंट आयुर्वेद योग नेचुरोपैथी महाविद्यालय</strong></p>
<p><strong>मानसिक स्वास्थ्य में योग का महत्व</strong><br />लगातार समय की कमी, काम का दबाव और सामाजिक अपेक्षाएं व्यक्ति को मानसिक थकान और तनाव की ओर ले जाती हैं। ऐसे में योग एक अत्यंत प्रभावी और आवश्यक साधन बनकर उभरता है। योग केवल शारीरिक स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि मानसिक और भावनात्मक संतुलन भी प्रदान करता है। यह तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं को कम करने में मदद करता है और जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाता है। योग में मानसिक स्वास्थ्य के लिए कई प्राणायाम उपयोगी माने गए हैं।  नियमित अभ्यास से मानसिक शांति, ऊर्जा और समग्र स्वास्थ्य में सुधार होता है। योग आधुनिक जीवन के लिए एक सशक्त और संतुलित जीवन का आधार है।<br /><strong>-निमीषा कसेरा, योग प्रशिक्षक,कोटा </strong></p>
<p><strong>असुरक्षा मतलब मानसिक तनाव</strong><br /> बाहरी नकारात्मक परिस्थितियां केवल तभी हमारे स्वास्थ्य पर असर डालती हैं, जब हम अंदर से कमजोर होते हैं। ठीक उसी तरह जैसे पानी में तैरता जहाज तब डूबता है जब पानी उसके अंदर चला जाता है, हमारी मानसिक स्थिति भी तभी प्रभावित होती है जब हम अंदर से असुरक्षित हों। युवाओं के संदर्भ में, विशेषकर नीट और आइआइटी की तैयारी कर रहे कोटा के छात्र, माता-पिता की जिम्मेदारी अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। मानसिक स्वास्थ्य की मजबूती और सकारात्मक सोच ही बच्चों की सफलता और संतुलित जीवन की कुंजी है।<br /><strong>-दीपक शर्मा, काउंसलर एवं आर्ट आॅफ लिविंग प्रशिक्षक, कोटा</strong></p>
<p><strong>सोशल मीडिया से दूरी जरूरी</strong><br />माता-पिता दोनों के कामकाजी होने के कारण बच्चों का अधिकांश समय आया के साथ बीतता है। ऐसे में उनके भीतर सही संस्कारों का विकास होता था। न्यूक्लियरी फैमिली में बच्चों का ध्यान सोशल मीडिया की ओर अधिक बढ़ रहा है, जिससे एकाग्रता और भावनात्मक संतुलन प्रभावित हो रहा है। मानसिक शांति और संतुलन के लिए ध्यान लगाना आवश्यक है। मनुष्य के जीवन में सबसे बड़ी शक्ति उसके अंदर ही छिपी होती है। हमें अपने भीतर की पॉवर को जानना और अपनी विकृतियों को पहचानना होगा। तभी बच्चों में संस्कार मजबूत होंगे और वे मानसिक विकृतियों से दूर रहेंगे।<br /><strong>-अंशुल मेहंदीरत्ता, अधीक्षक नारी निकेतन, कोटा</strong></p>
<p><strong>प्रारम्भिक शिक्षा में शामिल हो ध्यान</strong><br />मानसिक बीमारियों का सबसे बड़ा कारण ही तनाव है। तनाव बच्चे से लेकर बड़े सभी को अलग-अलग कारणों से हो सकता है। परिवार में एक दूसरे के लिए समय नहीं है। ऐसे में लोग अपनी बात कहने के लिए दूसरों का सहारा लेते हैं। लेकिन उससे मन शांत नहीं हो सका। ध्यान व सुदर्शन क्विया मन को शांत करने के साथ ही तनाव को कम करती है। ध्यान करने से मन में अच्छे विचार आते है। जब अच्छे विचार आएंगे तो सकारात्मकता बढ़ेगी। इसलिए आवश्यक है कि ध्यान को प्रारम्भिक शिक्षा में शामिल किया जाए। <br /><strong>-योगेन्द्र हरसोरा, अपेक्स मैंबर आर्ट आॅफ लिविंग </strong></p>
<p><strong>मानसिक स्वास्थ्य पर डाइट का सीधा असर</strong><br />जैसा खाए अन्न, वैसा होय मन यह कहावत आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में और भी ज्यादा सटीक बैठती है। मानसिक स्वास्थ्य में डाइट की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।  फ्रोजन या प्रोसेस्ड फूड शरीर ही नहीं, मन पर भी असर डालता है। जब भोजन का पाचन होता है, तो न्यूरॉन्स और हार्मोन्स सक्रिय होते हैं जो खुशी का अनुभव कराते हैं। परंतु अगर भोजन असंतुलित या कृत्रिम तत्वों से भरा हो, तो यह प्रक्रिया बाधित होती है और व्यक्ति अवसाद की ओर बढ़ सकता है।  फाइबरयुक्त, हल्दी और प्राकृतिक प्रोटीन से भरपूर भोजन करें, छाछ और घर का बना खाना अपनाएं तथा बाहर का फैटी और कृत्रिम स्वाद वाला भोजन सीमित करें। यही संतुलित डाइट मन को स्वस्थ रख सकती है।<br /><strong>-डॉ. नीरजा श्रीवास्तव, प्रो.गवर्नमेंट कॉलेज, कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Oct 2025 15:21:29 +0530</pubDate>
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                <title>2 साल में 40 फीसदी बढ़ गए मनोरोगी</title>
                                    <description><![CDATA[  कोविड-19 महामारी के बाद से मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं में 30 से 40 फीसदी तक उछाल आया है। कम उम्र के लोगों में तनाव-चिंता और गंभीर स्थितियों में अवसाद की समस्या देखी जा रही है। महामारी ने मनोवैज्ञानिक तौर पर लोगों की सेहत को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है। कोविड-19 के बाद बढ़े हृदय रोग और हार्ट अटैक के मामलों के लिए भी तनाव-चिंता को प्रमुख कारक के तौर पर देखा जा रहा है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/psychopath-increased-by-40-percent-in-2-years/article-26194"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-10/2-saal-mei-40-fisdi-badh-gaye-manorogi...kota-news-11.10.2022.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा । पिछले दो साल में शहर में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं की मांग बढ़ गई। कोरोना के बाद से मनोरोगियों की संख्या में तीस से चालीस फीसदी का इजाफा हुआ है। मानसिक बीमारियों के इलाज के लिए जयपुर के बाद कोटा स्थान जहां भी प्रकार की सुविधाए होने से मानसिक रोगियों अच्छे से इलाज हो रहा है। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर न्यू मेडिकल कॉलेज में पिछले एक सप्ताह से जागरुकता अभियान चलाया जा रहा है। डॉ. एसएन गौतम ने बताया कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य एक दूसरे के पूरक हैं, इसमें से एक में भी होने वाली समस्या का असर दूसरे की सेहत को भी प्रभावित कर सकती है। कई प्रकार की गंभीर और क्रोनिक बीमारियों जैसे हृदय रोग, उच्च रक्तचाप आदि के लिए भी तनाव-चिंता जैसी मानसिक स्वास्थ्य विकारों को एक कारण माना गया है।  </p>
<p><strong>85 प्रतिशत लोग इलाज में नहीं आते आगे</strong><br />शरीर को तभी सेहतमंद और फिट रखा जा सकता है जब आप मानसिक तौर पर पूरी तरह से स्वस्थ होंगे। मानसिक स्वास्थ्य आज वैश्विक समस्या का रूप धारण कर चुका है। इसमें सबसे अधिक दिक्कत यह सामने आ रही है कि मानसिक अस्वस्थता से जूझ रहे 85 प्रतिशत लोग इलाज को आगे ही नहीं आते हैं। उन्हें तो यह तक पता नहीं होता है कि वह मानसिक अस्वस्थता के दौर से गुजर रहे हैं । इनमें से खासकर वह लोग आगे नहीं आते हैं जो मादक पदार्थों के सेवन से जुड़े विकारों से ग्रसित हैं। </p>
<p><strong>कोविड ने सिखाया मानसिक संतुलन बनाने का तरीका</strong><br />डॉ. मिथलेस खिंची ने बताया कि आत्महत्या करने वाला मरना नहीं चाहता बल्कि वह लक्षण दिखा रहा होता है कि उसे कुछ समस्या है। बच्चें को सही दिशा मिले तो वह अच्छा नागरिक बन जाता है, नहीं तो ओसामा भी बन सकता है। कोविड ने हमें सिखाया है कि व्यक्तिगत मिलने का भी महत्व होता है।  कोविड-19 महामारी के बाद से मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं में 30 से 40 फीसदी तक उछाल आया है। कम उम्र के लोगों में तनाव-चिंता और गंभीर स्थितियों में अवसाद की समस्या देखी जा रही है। महामारी ने मनोवैज्ञानिक तौर पर लोगों की सेहत को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया है। कोविड-19 के बाद बढ़े हृदय रोग और हार्ट अटैक के मामलों के लिए भी तनाव-चिंता को प्रमुख कारक के तौर पर देखा जा रहा है। मानसिक स्वास्थ्य के बारे में वैश्विक स्तर पर लोगों को शिक्षित-जागरूकता करने और सामाजिक कलंक की भावना को दूर करने के लिए हर साल 10 अक्टूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। मिर्गी आने पर जूता सुंघाने से कभी मिर्गी ठीक नहीं होती है। बुजुर्गों में तनाव अकेलेपन के कारण होने लगता है। उन्होंने कहा कि मानसिक समस्याओं के बोझ का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वर्ष 2019 में कोविड महामारी से पहले विश्व में आठ में से एक व्यक्ति मानसिक विकारों से ग्रसित है। कोविड के ठीक एक साल बाद इस संख्या में 25% का इजाफा हुआ है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्थिति बेहद गंभीर है। यूनिसेफ की 2021 की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में तकरीबन 14 फीसदी बच्चे भी अवसाद में जी रहे हैं।</p>
<p><strong>मानसिक रोगों के ये लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं</strong><br />- सिर में भारीपन, सिर दर्द, माईग्रेन, दोना आना<br />- बेहोश हो जाना, नशों का दर्द, मिर्गी, बेहोशी के दौरे पड़ना। <br />- उदास रहना, काम में मन नहीं लगना, हमेशा थकान रहना। <br />- टेंशन एवं चिड़चिडापन नींद व भूख की कमी, घबराहट, एवं चिंता। <br />- बहुत ज्यादा बोलना, लड़ाई झगड़ा करना। <br />- एक ही विचार बार बार हाथ धोना, ताले चेक करना आदि। <br />- नींद संबंधी समस्याएं, याददाश्त में कमी। <br />- हिस्टीरिया एवं देवी माता का आना। <br />- बच्चे का पढ़ाई में कमजोर होना<br />-  बिस्तर में टायलेट करना</p>
<p>पिछले दो सालों में कोविड के बाद से ही मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं में काफी इजाफा हुआ। मानसिक रोगियों की संख्या में 30 से 40फीसदी का इजाफा हुआ है। <br /><strong>- डॉ. मिथलेश खिंची, सहायक आचार्य, मनोचित्सा विभाग न्यू मेडिकल कॉलेज कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/psychopath-increased-by-40-percent-in-2-years/article-26194</link>
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                <pubDate>Tue, 11 Oct 2022 15:07:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>मेंटल हेल्थ में भी फायदा करती हैं साइकिलिंग</title>
                                    <description><![CDATA[इन दिनों हर कोई फिट रहने के बारे में सोचता है। ऐसे में रोजाना साइकिल चलाने से आपकी हेल्थ को कई तरह के फायदे मिलते हैं। अगर आप दिन भर में एक घंटा भी साइकिल चलाते हैं तो ये आपकी नींद को बेहतर बनाता है, समय बचाने में मदद कर सकता है, इम्यून सिस्टम को बूस्ट करता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/health/cycling-also-benefits-in-mental-health/article-12645"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-06/sic.jpg" alt=""></a><br /><p>इन दिनों हर कोई फिट रहने के बारे में सोचता है। ऐसे में रोजाना साइकिल चलाने से आपकी हेल्थ को कई तरह के फायदे मिलते हैं। अगर आप दिन भर में एक घंटा भी साइकिल चलाते हैं तो ये आपकी नींद को बेहतर बनाता है, समय बचाने में मदद कर सकता है, इम्यून सिस्टम को बूस्ट करता है।</p>
<p><br /><strong>मेंटल हेल्थ होती है बूस्ट</strong></p>
<p>तनाव, डिप्रेशन या चिंता की भावनाओं को कम करने में साइकिल चलाना मददगार हो सकता है। साइकिलिंग सामाजिक तौर पर भी मदद करता है।</p>
<p><strong>वेट होता है कंट्रोल</strong></p>
<p>साइकिल चलाने से मेटाबॉलिक रेट बढ़ता है। इसे करने से मांसपेशियां बनती हैं और बॉडी से फैट बर्न करने में मदद मिलती है। अगर आप हेल्दी खाने के साथ साइकिलिंग को जोड़ते हैं तो साइकिल चलाना वजन कम करने का एक अच्छा तरीका हो सकता है। कुछ रिपोर्ट्स की मानें तो एक घंटा साइकिल चलाने से 400 से 1000 कैलोरी बर्न करने में मदद मिलती है।</p>
<p><strong>बेहतर हार्ट</strong></p>
<p>रोजाना साइकिल चलाना आपको हाई ब्लड प्रेशर की परेशानी से निपटने में मदद कर सकता है और दिल से जुड़ी कई समस्याओं को दूर कर सकता है। साइकिलिंग अक्सर आपके दिल के हेल्थ को बढ़ावा देने में मदद करती है और कई बार कार्डियक अरेस्ट और इस तरह की अन्य समस्याओं के जोखिम को कम करती है। <br />फेफड़ों को करता है बूस्ट रोजाना साइकिलिंग आपके फेफड़ों के हेल्थ और सहनशक्ति को भी बढ़ा सकती है। साइकिल चलाने के दौरान, फेफड़ों को फ्रेश आॅक्सीजन मिलती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/health/cycling-also-benefits-in-mental-health/article-12645</link>
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                <pubDate>Mon, 20 Jun 2022 14:43:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे आज : सकारात्मक सोच से सुधरेगा मानसिक स्वास्थ्य</title>
                                    <description><![CDATA[आज पूरे विश्व में मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जा रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%A1-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82%E0%A4%9F%E0%A4%B2-%E0%A4%B9%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%A5-%E0%A4%A1%E0%A5%87-%E0%A4%86%E0%A4%9C---%E0%A4%B8%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%95-%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%9A-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%97%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A5%8D%E0%A4%AF/article-1567"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-10/dimag.jpg" alt=""></a><br /><p>आज पूरे विश्व में मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जा रहा है। यह दिन मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों और उससे बचने के लिए जनता को समझाने के उद्देश्य से मनाया जाता है। गत वर्ष जब विश्व में कोरोना आया तो इस दिन का महत्व उतना अधिक नजर नहीं आ रहा था जितना कि कोरोना प्रकोप के बाद हो गया है। यदि सीधी सपट कही जाए तो कोरोना ने इस दिन का महत्व इतना अधिक कर दिया है जितना की कोरोना में उपचार का महत्व था।</p>
<p> इस बात पर बहस हो सकती है कि ऐसा क्यों? सीधी सी बात है कि कोरोना से पहले हर व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के प्रति उतना जागरूक नहीं था जितना की कोरोना के बाद हुआ। कोरोना ने हमारी मेंटल स्ट्रेस पर सीधा असर डाला और इससे डिप्रेशन, डिमेंशिया, फोबिया तथा इंजायटी जैसी समस्याओं ने मानसिक बीमारियों की दर में एकदम उछाल ला दिया। वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे का महत्व गत वर्ष भी था,लेकिन तब कोरोना उतने भयावह रूप में सामने नहीं आया था जितने रूप में यह वर्ष 2021 में आया। इसके पीछे जो भी कारण थे वह अलग थे,लेकिन इस कोरोना ने हमें सोशल डिस्टेंसिंग और आइसोलेशन की दुनिया में ढकेल दिया। जब इंसान अकेला रह जाता है तो वह खुद को बीमार महसूस करता है और फिर आरंभ होता है बीमारियों का वह दौर जिसके लिए वह कभी तैयार नहीं होता। शायद इसी कारण से उसकी मेंटल हैल्थ पर बुरा प्रभाव होता है। यह कहा जा रहा है कि विश्व का हर दसवां व्यक्ति मानसिक समस्या से परेशान है,अगर यह सच है तो विश्व की दस प्रतिशत आबादी मानसिक बीमारियों का शिकार है जो हमारे भविष्य यानी इंसानी सभ्यता के लिए बड़ी चिंता का विषय है।</p>
<p><span style="background-color:#ffff99;"><span style="color:#ff0000;"><strong><br /> जरूरतों का दौर और स्वास्थ्य</strong></span></span><br /> यदि यह दौर कोरोना के विदा होने का है तो बेहतर स्वास्थ्य के साथ ही हमारी दूसरी जरूरतें भी दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। गत दो वर्ष में हर कोई आर्थिक रूप से काफी कमजोर हुआ है। महंगाई की बात छोड़ भी दें तो कोरोना जैसी बीमारी जिसने कैंसर और दूसरी गंभीर बीमारियों के उपचार में होने वाले खर्चों को भी मात देकर हर किसी को गरीबी के उस मुहाने पर पहुंचाया है,जिस पर पहुंचकर मानव का मानसिक तनाव का शिकार होना लाजिमी है। उपचार में 50 लाख रूपए तक खर्च हुए लेकिन फिर भी तमाम कोरोना पेशेंट की जान नहीं बच सकी। उन परिवारों के लिए यह घटना एक ऐसी दुर्घटना ही थी जो किसी को भी किसी भी परिस्थिति में मानसिक बीमार करने में बड़ी कारक है। जब उपचार में बड़ी राशि खर्च हो जाने के बाद भी परिवारों को राहत नहीं मिली,परिवार के कई सदस्य अपनी जान गंवा बैठे तो न जाने कितने लोग डिप्रेशन, डिमेंशिया ,फोबिया तथा इंजायटी जैसी समस्याओं के शिकार हो गए। जब कोरोना जाने को है जैसा लग रहा है तब भी अभी तक ऐसे आंकड़े सामने नहीं आए हैं कि कितने लोगों को मानसिक बीमारियों ने जकड़ा है लेकिन यह तय है कि इस समस्या से उत्पन्न बीमारियों ने ग्लोबल रूप में भारी उछाल लिया है। पर अब इस जरूरतों के दौर में स्वास्थ्य समस्याओं से कुछ निजात मिलती सी नजर आ रही है।</p>
<p><br /> <span style="background-color:#ffff99;"><span style="color:#ff0000;"><strong>चिकित्सा  का नया अध्याय</strong></span></span><br /> भारत में चिकित्सा व्यवस्था की कितनी भी बेहतर व्यवस्थाएं हो जाएं, लेकिन इनमें झोल के कारण आम आदमी हमेशा से ही अपने को दबा-कुचला महसूस करता रहा है। शायद इसका कारण यह भी हो सकता है कि हमारी जो चिकित्सा प्रणाली है वह आम जन को समझ में कम ही आती है। हेल्थ सेलिब्रिटी मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए तो तमाम सुझाव देते हैं,लेकिन आज तक कोई ऐसी बेहतर प्रणाली सामने नहीं आई जिससे एक आम जीवन जीने वाला व्यक्ति किसी भी चिकित्सालय में जाकर संतुष्ट हो जाए कि उसका उपचार सही और कम से कम खर्च में हो जाएगा।</p>
<p><br /> <strong><span style="background-color:#ffff99;"><span style="color:#ff0000;">नेशनल हेल्थ मिशन</span></span></strong><br /> सितंबर के अंतिम सप्ताह में देश में नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन के तहत यूनिक डिजिटल हेल्थ कार्ड भी बनना आरंभ हुआ है। इस कार्ड की विशेषता है कि इसमें आपकी पूर्व और अभी की बीमारियों का पूरा डेटा होगा। इससे आप देशभर में कहीं भी जाएंगे तो आपको डाक्टर को हर बात बताने की जरूरत नहीं होगी। आपका कार्ड खोलते ही सबकुछ उसमें आ जाएगा। यदि यह योजना आधार कार्ड की तरह सफल हो जाती है तो तय है कि देश की चिकित्सा व्यवस्था में बहुत बड़ा परिवर्तन हो जाएगा। किसी भी मरीज के लिए यह कार्ड एक ऐसी सुविधा होगी जो उसे उन तमाम परेशानियों से राहत दिलाएगी जो वह उपचार के दौरान झेलता है। उदाहरण के लिए यदि कोई मरीज अकेला भी चिकित्सक के पास जाता है और उसका यूनिक कार्ड चिकित्सक खोल लेगा तो मरीज की सारी कहानी उसे पता चल जाएगी जिससे वह उपचार जल्दी और बेहतर कर पाएगा। किसी भी मरीज के लिए इससे अधिक मानसिक चिंता कम होने का सरल उपाय और क्या होगा। खैर जो भी हो जब हम आज वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे मना रहे हैं तो यह सभी के लिए अच्छी खबर हो सकती है कि भारत में अब जल्दी ही चिकित्सा जगत में व्यापक बदलाव आने वाला है,जिससे हर व्यक्ति लाभाविन्त होगा।<br /> <span style="background-color:#ffff99;"><span style="color:#ff0000;"><strong><br /> अब बदलेगा चिकित्सा जगत  </strong></span></span><br /> पूरे प्रदेश में गत दो वर्षों में जिस तरह से चिकित्सा सेवाओं के लिए सरकारों ने अपने कदम बढ़ाए हैं ,उससे उम्मीद का दीया तेजी से रोशनी देता नजर आ रहा है। राजस्थान को ही लें तो यहां पर लगभग हर शहर में दूसरी लहर के बाद आक्सीजन के प्लांट लगाने का काम जारी है। माना जा रहा है अगर अब कोई लहर आती भी है तो कम से कम आक्सीजन की कमी तो नहीं होगी? इधर राजस्थान के 33 जिलों में से 30 में मेडिकल कॉलेज खुल जाने से मरीजों को राहत मिलती नजर आ रही है। हर कोई अब जयपुर या दूसरे महानगर की ओर दौड़ता नजर नहीं आएगा,यह माना जा सकता है। इससे सबसे बड़ी बात जो है वह यह है कि आम आदमी अब चिकित्सा जगत के उन शब्दों को आसानी से समझ सकेगा,दवाओं की दुनिया में अपने आप को ठहरा हुआ सा नहीं पाएगा। क्यों? क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अब मेडिकल की पढ़ाई को हिंदी में कराने की भी घोषण कर दी है। जब बच्चे हिंदी में पढ़ेंगे तो दवा आदि भी हिंदी में ही लिखेंगे। इससे आम आदमी जो मेडिकली शब्दों को नहीं समझ पाता है वह भी उसके उपचार में कौन सी दवा दी जा रही है समझ पाएगा। यह हर किसी के लिए मानसिक राहत की बात होगी। जब मानसिक रूप से राहत मिलेगी तो मानसिक बीमारियोंं में भी कमी आएगी।</p>
<p><span style="color:#ff0000;"><span style="font-size:larger;"><strong>मनोज वार्ष्णेय</strong></span></span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 10 Oct 2021 13:57:51 +0530</pubDate>
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