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                <title>rituals - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>पंचतत्व पूजन के साथ मनाया जन्मदिन संस्कार महोत्सव: एकादशी पर वैदिक विधि से मनाया जन्मदिन, पौधारोपण का लिया संकल्प</title>
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                        <![CDATA[जयपुर के गोविंद देव जी मंदिर में अखिल विश्व गायत्री परिवार द्वारा "जन्मदिन संस्कार महोत्सव" आयोजित किया गया। श्रद्धालुओं ने केक काटने के बजाय पंचकुंडीय यज्ञ, दीप प्रज्ज्वलन और मंत्रोच्चार के साथ भारतीय संस्कृति के अनुरूप अपना दिन मनाया। इस पहल का उद्देश्य समाज में सांस्कृतिक मूल्यों और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/birthday-celebrated-with-panchatattva-worship-sanskar-mahotsav-birthday-celebrated-with/article-146590"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/jai.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। चैत्र कृष्ण एकादशी  पर गोविंद देव जी मंदिर के सत्संग भवन में जन्मदिन को भारतीय संस्कृति के अनुरूप मनाने की परंपरा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अखिल विश्व गायत्री परिवार, शांतिकुंज हरिद्वार के तत्वावधान में मंदिर के महंत अंजन कुमार गोस्वामी महाराज के सान्निध्य में सत्संग भवन में “जन्मदिन संस्कार महोत्सव” का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मार्च माह में जन्मदिन वाले एक दर्जन से अधिक श्रद्धालुओं ने वैदिक विधि-विधान से अपना जन्मदिन मनाकर समाज में सांस्कृतिक जागरण का संदेश दिया।</p>
<p>महोत्सव के दौरान श्रद्धालुओं ने पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश जैसे पंचतत्वों का पूजन किया तथा दीप प्रज्ज्वलन और हवन के माध्यम से अपने जीवन को संस्कारित करने का संकल्प लिया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच संपन्न हुए इस कार्यक्रम में जन्मदिन को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और संस्कार का पर्व बनाने का संदेश दिया गया।</p>
<p>आचार्य पीठ से वर्षा गुप्ता ने कहा कि जन्मदिन केवल केक काटने का अवसर नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण, कृतज्ञता और जीवन में सद्गुणों को अपनाने का दिन है। जिस प्रकार हम भगवान और महापुरुषों की जयंती श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाते हैं, उसी प्रकार हमें अपना और अपने परिजनों का जन्मदिन भी भारतीय संस्कृति के अनुरूप मनाना चाहिए।</p>
<p>गायत्री शक्तिपीठ ब्रह्मपुरी के सह-व्यवस्थापक मणिशंकर पाटीदार के निर्देशन में भक्त भूषण वर्मा, नीलम वर्मा, वर्षा गुप्ता एवं सुमन शर्मा ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पंचकुंडीय गायत्री महायज्ञ संपन्न कराया। कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालुओं ने भविष्य में दीप प्रज्ज्वलित कर जन्मदिन मनाने और भारतीय संस्कृति की इस परंपरा को समाज में आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।</p>
<p>कार्यक्रम के दौरान कैलाश चंद्र अग्रवाल, रमेश चंद्र अग्रवाल सहित अन्य वरिष्ठजनों ने पुष्पवर्षा कर जन्मदिन मना रहे श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दिया। एकादशी के अवसर पर गीता पाठ का भी आयोजन किया गया, जिसमें श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक भाग लिया।<br /><br />महोत्सव में जिन श्रद्धालुओं का जन्मदिन था, उन्होंने संकल्प लिया कि वे अपने जीवन में जन्मदिन को भारतीय संस्कृति के अनुसार मनाएंगे तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रत्येक वर्ष कम से कम एक पौधा अवश्य लगाएंगे, ताकि समाज में संस्कारों के साथ प्रकृति संरक्षण का संदेश भी प्रसारित हो सके।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Sun, 15 Mar 2026 16:46:02 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur NM]]>
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                <title>अमरापुर स्थान पर भव्य महाशिवरात्रि महोत्सव, सामूहिक प्रार्थना और पंचाक्षर मंत्रों के उच्चारण से शुरूआत,  श्रद्धा भाव से भक्तों ने किए भोले बाबा के दर्शन </title>
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                        <![CDATA[जयपुर के श्री अमरापुर स्थान में महाशिवरात्रि पर भक्तों का सैलाब उमड़ा। विशेष बर्फ की झांकी, हवन-यज्ञ और विशाल भंडारे के आयोजन ने उत्सव को आध्यात्मिक ऊर्जा और दिव्यता से भर दिया।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/grand-mahashivratri-festival-at-shri-amrapur-place/article-143251"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/(12200-x-600-px)-(15)1.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर: गुलाबी नगरी जयपुर के पवित्र श्रद्धा स्थल श्री अमरापुर स्थान में रविवार को भव्य महाशिवरात्रि महोत्सव का आयोजन किया गया। सुबह 6 बजे से ही भक्तों का जनसैलाब उमड़ पड़ा और श्रद्धा भाव से भोले बाबा के दर्शन किए।</p>
<p>महोत्सव की शुरुआत सामूहिक प्रार्थना और पंचाक्षर मंत्रों के उच्चारण से हुई। संतों के सत्संग और भक्ति गीतों ने वातावरण को दिव्यता और आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। इसके पश्चात हवन-यज्ञ का भव्य अनुष्ठान संपन्न हुआ, जिसमें आग, घी और अन्य धार्मिक सामग्री का उपयोग कर पवित्र ऊर्जा का संचार किया गया। श्री अमरापुरेश्वर महादेव मंदिर में भोले बाबा का जल, दुग्ध, गंगाजल, बेलपत्र, आक और अन्य सामग्री से भव्य अभिषेक किया गया। भक्तों ने अपने मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना के साथ श्रद्धा भाव से पूजा अर्चना की।</p>
<p>विशेष आकर्षण के रूप में भोले बाबा की बर्फ झांकी ने सभी भक्तों को मंत्रमुग्ध कर दिया। दर्शन का समय प्रातः 6 से 12 बजे और शाम 3 से 9 बजे तक रखा गया।<br />भक्तों के लिए विशाल आम भंडारे का आयोजन भी किया गया, जिसमें उपस्थित सभी ने प्रसाद ग्रहण कर भक्ति और आनंद का अनुभव किया। आयोजन स्थल पर भक्तों की भीड़, दिव्यता और उल्लास ने महाशिवरात्रि को और भी खास बना दिया।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 15 Feb 2026 17:22:49 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur NM]]>
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                <title>हरिद्धार: कड़ाके की ठंड के बावजूद मौनी अमावस्या पर हर की पैड़ी में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब, सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम</title>
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                        <![CDATA[हरिद्वार में मौनी अमावस्या पर कड़ाके की ठंड के बीच लाखों श्रद्धालुओं ने हर की पैड़ी पर पावन स्नान किया।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/despite-the-harsh-cold-of-haridhar-a-large-number-of/article-139997"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/mauni-amavasya-2025-10.webp" alt=""></a><br /><p>हरिद्वार। उत्तराखंड के हरिद्धार में रविवार को मौनी अमावस्या के पावन अवसर पर हर की पैड़ी में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। कड़ाके की ठंड के बावजूद भक्तों की आस्था मौसम पर भारी पड़ती नजर आई। प्रात:काल से ही गंगा स्नान के लिए श्रद्धालुओं का निरंतर आगमन बना रहा।</p>
<p>वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, हरिद्वार के निर्देशन में हरिद्वार पुलिस द्वारा व्यापक सुरक्षा एवं यातायात प्रबंधन के पुख्ता इंतजाम किए गए। पुलिस बल द्वारा श्रद्धालुओं को सुरक्षित एवं सुव्यवस्थित ढंग से गंगा स्नान कराया गया तथा उन्हें सकुशल उनके गंतव्य स्थान की ओर रवाना किया गया। भीड़ प्रबंधन, यातायात नियंत्रण एवं श्रद्धालुओं की सुरक्षा को लेकर पुलिस बल पूरी मुस्तैदी के साथ तैनात रहा, जिससे किसी भी प्रकार की अव्यवस्था उत्पन्न न हो।</p>
<p>हरिद्वार पुलिस ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे प्रशासन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करें तथा व्यवस्थाओं को सुचारू बनाए रखने में पुलिस प्रशासन का सहयोग करें।</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 18 Jan 2026 17:15:33 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur]]>
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                <title>श्रद्धापूर्वक किया गया कार्य ही श्राद्ध</title>
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                        <![CDATA[श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धापूर्वक किया गया कार्य, जिससे पितरों को शांति मिलती है। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/shraddha-is-done-with-reverence/article-126729"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/_400-px)-(1)11.png" alt=""></a><br /><p>श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धापूर्वक किया गया कार्य, जिससे पितरों को शांति मिलती है। श्राद्ध की उत्पत्ति पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता से हुई है, जिसकी शुरुआत वैदिक काल से मानी जाती है। महाभारत के अनुसार सबसे पहले महर्षि निमि ने अत्रि मुनि के उपदेश से श्राद्ध किया और यह परंपरा धीरे-धीरे प्रचलित हुई। पितृ दोष होने पर व्यक्ति को कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है,इसलिए पितृपक्ष में पितरों का स्मरण और पूजन करना आवश्यक है। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष महत्व है। पितृ पक्ष को श्राद्ध पक्ष के नाम से भी जाना जाता है। पितृ पक्ष में पितरों का श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष के दौरान पितर संबंधित कार्य करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस पक्ष में विधि-विधान से पितर संबंधित कार्य करने से पितरों का आर्शावाद प्राप्त होता है।</p>
<p><strong>श्राद्धादि कर्म :</strong></p>
<p>श्राद्ध सूक्ष्म शरीरों के लिए वही काम करते हैं, जो कि जन्म के पूर्व और जन्म के समय के संस्कार स्थूल शरीर के लिए करते हैं। इसलिए शास्त्र पूर्व जन्म के आधार पर ही कर्मकाण्ड में श्राद्धादि कर्म का विधान निर्मित करते हैं। सभी संस्कारों विवाह को छोड़कर श्राद्ध ही ऐसा धार्मिक कृत्य है, जिसे लोग पर्याप्त धार्मिक उत्साह से करते हैं। विवाह में बहुत से लोग कुछ विधियों को छोड़ भी देते हैं। परन्तु श्राद्ध कर्म में नियमों की अनदेखी नहीं की जाती है, क्योंकि श्राद्ध का मुख्य उद्देश्य परलोक की यात्रा की सुविधा करना है। भाद्रपद मास की पूर्णिमा से पितृ पक्ष शुरू होकर करीब 16 दिनों तक चलने वाले श्राद्ध में अश्विन मास की अमावस्या तक पितृ पृथ्वी पर वास करेंगे। इन 16 दिनों तक पितरों को प्रसन्न करने के लिए उन्हे यज्ञ, जल से तर्पण दिया जाएगा। इस दौरान पितरों की आत्मा की शांति के लिए जगह-जगह पिंडदान, नारायण बलि, जल तर्पण आदि कर्मकांड़ों से उन्हें प्रसन्न करने की कोशिश की जाती है।</p>
<p><strong>पितृप्राण पृथ्वी पर :</strong></p>
<p>आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक ब्रह्माण्ड की ऊर्जा तथा उस उर्जा के साथ पितृप्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है। धार्मिक ग्रंथों में मृत्यु के बाद आत्मा की स्थिति का बड़ा सुन्दर और वैज्ञानिक विवेचन भी मिलता है। पुराणों के अनुसार पितृपक्ष में, जो तर्पण किया जाता है, उससे वह पितृप्राण स्वयं आप्यापित होता है। पुत्र या उसके नाम से उसका परिवार जौ तथा चावल का पिण्ड देता है। उसमें से अंश लेकर वह अम्भप्राण का ऋण चुका देता है। ठीक आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से वह चक्र उर्ध्वमुख होने लगता है। 15 दिन अपना-अपना भाग लेकर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पितर उसी ब्रह्मांडीय उर्जा के साथ वापस चले जाते हैं। इसलिए इसको पितृपक्ष कहते हैं और इसी पक्ष में श्राद्ध करने से पित्तरों को प्राप्त होता है।</p>
<p><strong>पूर्वजों के कारण :</strong></p>
<p>श्राद्ध पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता अभिव्यक्त करने तथा उन्हें याद करने के निमित्त किया जाता है। इसके पीछे मान्यता है कि जिन पूर्वजों के कारण हम आज अस्तित्व में हैं। जिनसे गुण हमें विरासत में मिलें हैं। उनका हम पर न चुकाए जा सकने वाला ऋण हैं। पितरों की आत्मा की शांति के लिए पितृ पक्ष में जो तर्पण किया जाता है। उसके पीछे धार्मिक मान्यता है कि इससे पितरों को स्वर्ग प्राप्त होता है और उनकी आत्मा को शांति मिलती है। मंदिरों और नदियों के किनारे पितरों को तर्पण देने की सदियों से चली आ रही धार्मिक परम्परा आज भी अनवरत रूप से जारी है। श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा सच्चा विश्वास और प्रेम से किया जाने वाला कर्मकांड, जो मृत पूर्वजों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए किया जाता है। यह उनके प्रति कृतज्ञता, सम्मान और स्मरण भाव को व्यक्त करने का एक तरीका है, और इसके माध्यम से उन्हें संतुष्ट कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।</p>
<p><strong>वैज्ञानिक पहलू भी :</strong></p>
<p>श्राद्ध का वैज्ञानिक पहलू भी है। वेदों में, दर्शन शास्त्रों में, उपनिषदों एवं पुराणों आदि में हमारे ऋषियों ने इस विषय पर विस्तृत विचार किया है। श्रीमद्भागवत गीता में भी स्पष्ट रूप से बताया गया है कि जन्म लेने वाले की मृत्यु और मृत्यु को प्राप्त होने वाले का जन्म निश्चित है। यह प्रकृति का नियम है। शरीर नष्ट होता है मगर आत्मा कभी भी नष्ट नहीं होती है। वह पुन: जन्म लेती है और बार-बार जन्म लेती है। इस पुन: जन्म के आधार पर ही कर्मकाण्ड में श्राद्ध कर्म का विधान निर्मित किया गया है। इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है। श्रद्धया इदं श्राद्धम, अर्थात जो श्रद्धा से किया जाए वही श्राद्ध है। श्राद्ध प्रथा वैदिक काल के बाद शुरू हुई और इसके मूल में इसी श्लोक की भावना है। उचित समय पर शास्त्र सम्मत विधि द्वारा पितरों के लिए श्रद्धा भाव से मन्त्रों के साथ जो दान-दक्षिणा आदि दिया जाय वही श्राद्ध कहलाता है।</p>
<p><strong>विधान का उल्लेख :</strong></p>
<p>पुराणों में इसके आयोजन को लेकर कई कथाएं हैं। जिसमें कर्ण के पुनर्जन्म की कथा प्रचलित है। हिन्दू धर्म में सर्वमान्य श्री रामचरित में भी श्री राम के द्वारा राजा दशरथ और जटायु को गोदावरी नदी पर जलांजलि देने का उल्लेख है। भरत के द्वारा दशरथ हेतु दशगात्र विधान का उल्लेख भरत कीन्हि दशगात्र विधाना तुलसी रामायण में हुआ है। भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण प्रमुख माने गए हैं- पितृ ऋण, देव ऋण तथा ऋषि ऋण। इनमें पितृ ऋण सर्वोपरि है। पितृ ऋण में पिता के अतिरिक्त माता तथा वे सब बुजुर्ग भी सम्मिलित हैं, जिन्होंने हमें अपना जीवन धारण करने तथा उसका विकास करने में सहयोग दिया। पितृपक्ष में हिन्दू लोग मन कर्म एवं वाणी से संयम का जीवन जीते हैं। पितरों को स्मरण करके जल चढ़ाते हैं। निर्धनों एवं ब्राह्मणों को दान देते हैं। देश में श्राद्ध के लिए हरिद्वार, गंगासागर, जगन्नाथपुरी, कुरुक्षेत्र,चित्रकूट, पुष्कर, बद्रीनाथ सहित कई स्थानों को महत्वपूर्ण माना गया है। लेकिन गया का स्थान उसमें सर्वोपरि कहा गया है।</p>
<p><strong>-रमेश सर्राफ धमोरा</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 13 Sep 2025 12:10:55 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur KD]]>
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                <title>देवछठ : मचकुंड पवित्र सरोवर में लाखों श्रद्धालुओं ने लगाई आस्था की डुबकी, मचकुंड को माना जाता है तीर्थों का भांजा</title>
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                        <![CDATA[तीर्थों का भांजा कहे जाने वाले मचकुंड के लक्खी मेले में लाखों श्रद्धालुओं ने श्रद्धा की डुबकी लगाने बड़ी संख्या में नव युगल परिवार संग मेले में पहुंचे।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/dholpur/millions-of-devotees-took-a-dip-of-faith-in-devachth/article-125229"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-08/o5er-(5).png" alt=""></a><br /><p>धौलपुर। तीर्थों का भांजा कहे जाने वाले मचकुंड के लक्खी मेले में लाखों श्रद्धालुओं ने श्रद्धा की डुबकी लगाने बड़ी संख्या में नव युगल परिवार संग मेले में पहुंचे और शादी विवाह की कलंगी व मौहरी का सरोवर में विसर्जन कर सुखद जीवन की मंगलकामना की। देवछठ के मौके पर लगने वाले मचकुंड के लक्खी मेले की मान्यता है कि देवासुर संग्राम के बाद जब राक्षस कालयवन के अत्याचार बढ़ने लगे। तब भगवान श्रीकृष्ण ने कालयवन को युद्ध के लिए ललकारा, जिस युद्ध में लीलाधर को भी हार का मुंह देखना पड़ा। तब लीलाधर ने छल से मुचकुन्द महाराज के जरिए कालयवन का वध कराया था। जिसके बाद से ही मुचकुन्द महाराज कि तपोभूमि मचकुंड में श्रद्धालु देवछठ के मौके स्नान करते आ रहे हैं। जहां इन नवविवाहित जोड़ों के सेहरे की कलंगी को सरोवर में विसर्जित कर उनके जीवन की मंगलकामना की जाती है। सरोवर में चारधाम की यात्रा करने के बाद आए श्रद्धालुओं ने भी डुबकी लगाई।</p>
<p><strong>भगवान श्री कृष्ण का लीला स्थल रहा :</strong></p>
<p>मथुरा के नजदीक होने से यह स्थान योगेश्वर श्रीकृष्ण भगवान की लीला स्थली भी रही है। महाभारत काल और श्रीमद भगवत गीता के मुताबिक भगवान श्रीकृष्ण के चरण यहां भी पड़े थे। इसका उल्लेख श्रीमद भगवत गीता और महाभारत में भी है। आज भी यहां भगवान श्रीकृष्ण के पद चिन्हों के निशान हैं और वह गुफा भी स्थित है, जहां भगवान श्रीकृष्ण ने छल युद्ध किया था। कालयवन के वध के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने यहां यज्ञ कराया, जो मुचुकंद महाराज के नेतृत्व में हुआ। यज्ञ में 33 कोटी देवता और राजा महाराजाओं ने भाग लिया। यज्ञ के बाद मुचकुन्द महाराज को भगवान श्रीकृष्ण ने वरदान दिया कि कोई भी श्रद्धालु तीर्थ करने के बाद इस कुंड में स्नान कर लेगा, तब ही उसका तीर्थ यात्रा सफल होगी। </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>धौलपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 Aug 2025 13:33:53 +0530</pubDate>
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                <title>आज से शुरू हुआ पौष माह </title>
                                    <description>
                        <![CDATA[पौष माह सोमवार से शुरू होकर 13 जनवरी तक चलेगा।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/posh-month-starts-from-today-there-is-special-importance-of/article-97804"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-12/257rtrer-(4)11.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। पौष माह सोमवार से शुरू होकर 13 जनवरी तक चलेगा। इस महीने सूर्य देव को पूजने और मंदिरों में पोष बड़ा को बाँटने की  परंपरा है।  कहा गया है कि पौष में सूर्य पूजा करने से उम्र बढ़ती है।  इस महीने में सूर्य पूजा करने का विशेष महत्व है। पौष मास में गंगा, यमुना, अलकनंदा, शिप्रा, नर्मदा, सरस्वति जैसी नदियों में, प्रयागराज के संगम में स्नान करने की परंपरा है।</p>
<p>इस महीने में तीर्थ दर्शन करने की भी परंपरा है। इस हिंदी महीने में व्रत-उपवास, दान और पूजा-पाठ के साथ ही पवित्र नदियों में नहाने का भी महत्व बताया है। इस पवित्र महीने में किए गए धार्मिक कामों से कई गुना पुण्य फल मिलता है।</p>
<p>अब मंदिरों में भी पोष बड़ा बाँटने का काम शुरू हो जाएगा । मंदिरों में आज सुबह अच्छी भीड़ रही है। </p>
<p> </p>
<p> </p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 16 Dec 2024 15:15:15 +0530</pubDate>
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                <title>शहीद सैनिक की बेटी की शादी में सीआरपीएफ जवानों ने निभाई रस्में</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[सीआरपीएफ के जवानों ने अपने साथी की बेटी के विवाह को वहां पहुंचकर यादगार बना दिया। जवानों ने दुल्हन के भाईयों की तरह पूरे विवाह रस्मों की जिम्मेदारी संभालते हुए दिख रहे है।]]>
                    </description>
                
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/alwar/crpf-soldiers-performed-rituals-in-the-marriage-of-martyred-soldiers/article-77011"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-05/photo-size-(4).png" alt=""></a><br /><p>अलवर। शहीद सैनिक की बेटी की शादी में सीआरपीएफ के जवानों ने सारी रस्में अदा की। सीआरपीएफ के जवान दुल्हन को वरमाला के लिए स्टेज तक लेकर जा रहे हैं, और विवाह की सभी रस्मों में सीआरपीएफ की टीम दिख रही है। लोगों को यह भावविभोर करने वाली फोटोज़ बहुत ही पसंद आ रही है। राजस्थान के अलवर जिले के दुबी गांव के शहीद सीआरपीएफ जवान की बेटी के विवाह  की यह फोटोज़ है।</p>
<p>दरअसल दुल्हन के पिता 168 बटालियन के सीआरपीएफ कांस्टेबल राकेश कुमार मीना 8 मई 2010 को छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में नक्सलियों से बहादुरी से लड़ते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया था।</p>
<p>सीआरपीएफ के जवानों ने अपने साथी की बेटी के विवाह को वहां पहुंचकर यादगार बना दिया। जवानों ने दुल्हन के भाईयों की तरह पूरे विवाह रस्मों की जिम्मेदारी संभालते हुए दिख रहे है।</p>
<p>सोशल मीडिया पर इस तस्वीर को इस कैप्शन के साथ शेयर किया जा रहा है कि सीआरपीएफ के जवानों ने राजस्थान के अलवर जिले के दुबी गांव में शहीद सीआरपीएफ कांस्टेबल राकेश कुमार मीना की बेटी सारिका मीना के विवाह समारोह में शामिल हुए। 168 बटालियन के सीआरपीएफ कांस्टेबल राकेश कुमार मीना ने 8 मई 2010 को छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले में नक्सलियों से बहादुरी से लड़ते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया था।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>अलवर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 May 2024 18:18:40 +0530</pubDate>
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                <title>महागौरी की विधि-विधान से करें पूजा</title>
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                        <![CDATA[मां दुर्गा को समर्पित त्योहार नवरात्रि अब समापन की ओर की है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BF-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%9C%E0%A4%BE/article-1619"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-10/mata-ji.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>मां दुर्गा</strong> को समर्पित त्योहार नवरात्रि अब समापन की ओर की है। नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है। 13 अक्टूबर को नवरात्रि का आठवां दिन है। नवरात्रि के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा की जाती है। माता का रंग अत्यंत गोरा है, इसलिए इन्हें महागौरी के नाम से पुकारते हैं। शास्त्रों के अनुसार मां महागौरी ने कठिन तप कर गौर वर्ण प्राप्त किया था। मान्यता है कि मां महागौरी भक्तों पर अपनी कृपा बरसाती हैं और उनके बिगड़े कामों को पूरा करती हैं।   माता महागौरी की पूजा करते समय पीले या सफेद वस्त्र भी धारण कर सकते हैं। महागौरी का पूजन करते समय पीले फूल अर्पित करने चाहिए। महागौरी को हलवा का भोग लगाना चाहिए। मान्यता है कि माता रानी को काले चने प्रिय हैं। <br /> <br /> <span style="background-color:#ffff99;"><span style="color:#ff0000;"><span style="font-size:larger;"><strong> पूजा-विधि </strong></span></span></span><br />     सबसे पहले सुबह उठकर स्रान आदि से निवृत्त हो जाएं। <br />     इसके बाद चौकी पर माता महागौरी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद गंगा जल से शुद्धिकरण करना चाहिए। <br />     अब चौकी पर चांदी, तांबे या मिट्टी के घड़े में जल भरकर उस पर नारियल रखकर कलश स्थापना करें।  <br />    इसके बाद चौकी पर श्रीगणेश, वरुण, नवग्रह, षोडश मातृका, सप्त घृत मातृका ,सिंदूर की बिंदी लगाएं आदि की स्थापना करें। <br />    अब महाष्टमी या दुर्गाष्टमी व्रत का संकल्प लें और मंत्रों का जाप करते हुए मां महागौरी समेत समस्त देवी-देवताओं का ध्यान लगाएं।  <br />    मां महागौरी का आवाहन, आसन, अर्ध्य,आचमन, स्रान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली,हल्दी, सिंदूर, दुर्वा,आभूषण, फूल, धूप-दीप, फल,पान,दक्षिणा,आरती, मंत्र करें। इसके बाद प्रसाद बांटें। <br />    महाष्टमी की पूजा के बाद कन्याओं को भोजन कराना उत्तम माना गया है।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 13 Oct 2021 10:28:11 +0530</pubDate>
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