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                <title>वरिष्ठ कांग्रेसी नेता राम उद्गार चौधरी का निधन, जिले में शोक की लहर</title>
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                        <![CDATA[स्वतंत्रता सेनानी और बिहार में सहकारिता आंदोलन के जनक राम उद्गार चौधरी का निधन हो गया। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के अवसान पर राजनीतिक जगत में शोक की लहर है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/death-of-senior-congress-leader-ram-udgar-chaudhary-wave-of/article-137896"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/congress-leader-death.png" alt=""></a><br /><p>समस्तीपुर। बिहार के समस्तीपुर जिला सहकारिता बैंक के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता राम उद्गार चौधरी का मंगलवार की रात शहर के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। वे करीब 101 वर्ष के थे। उनके निधन से समूचे समस्तीपुर जिले में शोक की लहर दौड़ गई है।</p>
<p>बिहार में सहकारिता आंदोलन के जनक के रूप में चर्चित राम उद्गार चौधरी ने स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई थी। उनके निधन के बाद आज उजियारपुर प्रखंड के पतैली धमुआ स्थित पैतृक गांव में विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के लोगों ने उनके पार्थिव शरीर पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की।</p>
<p>इस अवसर पर बिहार कांग्रेस के पूर्व प्रदेश महासचिव रामकलेवर प्रसाद सिंह, कांग्रेस सेवादल के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार चौधरी और जिला कांग्रेस कमिटी अध्यक्ष मोहम्मद अबू तमीम समेत कई नेताओं ने गहरी शोक संवेदना व्यक्त की। नेताओं ने कहा कि सहकारिता आंदोलन और कांग्रेस पार्टी को मजबूत करने में राम उद्गार चौधरी का योगदान हमेशा याद रखा जायेगा।</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 31 Dec 2025 14:15:43 +0530</pubDate>
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                <title>लंदन में जन्मी बेसेंट का पूरा जीवन रहा संघर्षमय</title>
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                        <![CDATA[एनी बेसेंट ने 1916 में बाल गंगाधर तिलक के साथ मिलकर आॅल इंडिया होम रूल लीग की स्थापना की और इसके लिए अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/born-in-london-besants-entire-life-was-a-struggle/article-87509"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-08/photo-size-(9)3.png" alt=""></a><br /><p>सुनने में अजीब लगता है, एक अंग्रेज महिला ने अंग्रेजों के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। इतना ही नहीं वह आजादी की लड़ाई के दौरान कांग्रेस की अध्यक्ष भी बन गई। यह सच है और ऐसा किया था एनी बेसेंट ने। एनी बेसेंट की लंदन से भारत आकर स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने की कहानी बहुत रोचक है। थियोसोफिकल सोसाइटी से लेकर होम रूल लीग आंदोलन में उनकी प्रमुख भूमिका रही थी। वे एक थियोसोफिस्ट, शिक्षाविद, महिला अधिकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता के साथ बहुत कुछ थीं। </p>
<p><strong>बचपन से ही समाज कल्याण के प्रति रुझान</strong><br />एनी वुड का जन्म लंदन में एक उच्च मध्यमवर्ग परिवार में हुआ था। आयरिश पृष्ठभूमि होने के कारण वे हमेशा ही आयरिश होम रूल की समर्थक रहीं। बचपन से ही समाज कल्याण के प्रति उनका गहरा रुझान रहा था, जो उसके साथ ताउम्र कायम रहा। बीस साल की उम्र में ही उनका विवाह पादरी फ्रैंक बेसेंट से हो गया। दो बच्चे होने के बाद भी यह विवाह सफल नहीं रहा। शादी के पांच साल बाद एनी अपनी बेटी के साथ अलग हो गई।</p>
<p><strong>एक मशहूर वक्ता और समाजसेविका</strong><br />जल्द ही एनी वैचारिक स्वतंत्रता, महिला अधिकार, सामाज कल्याण, धर्म निरपेक्षता, जनसंख्या नियंत्रण, कामगारों के अधिकार जैसे मुद्दों की पैरोकार हो गई। उन्होंने नेशनल सेक्यूलर सोसाइटी की सदस्यता भी ली, जो शासन में चर्च के दखल के खिलाफ थी। इन सबके साथ ही एनी का झुकाव धार्मिक विश्वासों को चुनौती देने का हो गया। इस दौरान वे चर्च के खिलाफ भी लिखने लगी। वे एक लोकप्रिय वक्ता के रूप में भी मशहूर होने लगी।</p>
<p><strong>थियोसोफी की ओर झुकाव</strong><br />1880 के दशक की शुरुआत में एनी बेसेंट कुछ समय तक आयरिश होम रूल आंदोलन से जुड़ीं। इसके अलावा उन्होंने मजदूरों, कामगारों और  बेरोजगारों के आंदोलनों में उनके लिए काम किया। इस दौरान उन पर मार्क्सवाद का बहुत प्रभाव रहा। 1889 में थियोसोफी धर्म के संस्थापक की किताब की समीक्षा करते समय उनका झुकाव थियोसोफी से हो गया। 1893 में जब स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म संसद में अपना मशहूर भाषण दिया तब एनी ने थियोसोफिकल सोसाइटी का प्रतिनिधित्व किया था।</p>
<p><strong>बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की स्थापना</strong><br />1911 में पंडित मदन मोहन मालवीय के साथ मिलकर उन्होंने बनारस में एक संयुक्त हिंदू यूनिवर्सिटी पर काम करना शुरू किया। साल 2017 में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की स्थापना हुई, जिसमें सेंट्रल हिंदू कॉलेज उसका हिस्सा बना। लेकिन थियोसोफिल सोसाइटी की गतिविधियों के साथ ही एनी बेसेंट राजनीतिक रूप से भी सक्रिय रहीं। उन्होंने शुरू से ही भारत में स्वराज के पक्ष में लिखा। उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध को अंग्रेजों की जरूरत को भारत के लिए एक मौका बताया। उससे पहले ही वे कांग्रेस की सदस्यता ले चुकी थीं।</p>
<p><strong>भारतीय होम रूल लीग</strong><br />एनी बेसेंट ने 1916 में बाल गंगाधर तिलक के साथ मिलकर आॅल इंडिया होम रूल लीग की स्थापना की और इसके लिए अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया। जिस पर उन्हें कांग्रेस और मुस्लिम लीग का समर्थन मिला। खुद गांधीजी ने उन्हें बसंतदेवी नाम दिया था। इसके बाद वे 1917 में वे कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं। बाद में एनी बेसेंट के कांग्रेस नेताओं से वैचारिक मतैक्य नहीं रहे और धीरे-धीरे उन्होंने कांग्रेस से दूरी तो बनाई, लेकिन वे भारतीय स्वतंत्रता की पैरोकार बनीं रही। 1931 में बीमार होने के बाद 20 सितंबर 1933 को 85 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया।</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 12 Aug 2024 10:16:36 +0530</pubDate>
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                <title>कप्तान दुर्गाप्रसाद चौधरी की 117वीं जयंती आज</title>
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                        <![CDATA[स्वतंत्रता सेनानी, समाज सेवक एवं दैनिक नवज्योति के संस्थापक संपादक कप्तान दुर्गा प्रसाद चौधरी की 117वीं जयंती पर सोमवार को दैनिक नवज्योति के जयपुर, अजमेर, कोटा, जोधपुर और उदयपुर कार्यालयों में कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/today-is-the-117th-birth-anniversary-of-captain-durga-prasad/article-64410"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-12/durga-prasad-chaudhary.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। स्वतंत्रता सेनानी, समाज सेवक एवं दैनिक नवज्योति के संस्थापक संपादक कप्तान दुर्गा प्रसाद चौधरी की 117वीं जयंती पर सोमवार को दैनिक नवज्योति के जयपुर, अजमेर, कोटा, जोधपुर और उदयपुर कार्यालयों में कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। जयपुर में जोबनेर बाग रेलवे स्टेशन रोड स्थित कार्यालय में दोपहर 12:00 बजे कार्यक्रम होगा। विभिन्न जिलों में स्थित ब्यूरो कार्यालय में भी समारोह आयोजित कर कप्तान साहब के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा की जाएगी। प्रदेश के प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी एवं निर्भीक पत्रकारों में शुमार कप्तान साहब का जन्म 18 दिसम्बर 1906 को सीकर जिले के नीमकाथाना कस्बे में हुआ था।</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 18 Dec 2023 10:18:34 +0530</pubDate>
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                <title>रामकल्याण ने सीने पर गोली खाई पर फिर भी थामे रहे तिरंगा  </title>
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                        <![CDATA[शहीद राम कल्याण बूंदी प्रजा मंडल के अध्यक्ष और बूंदी नगर पालिका में उपाध्यक्ष के पद पर निर्वाचित हुए थे। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/bundi/ramkalyan-got-shot-on-the-chest-but-still-held-the-tricolor/article-54716"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-08/kota-ram.png" alt=""></a><br /><p>बूंदी। 11 अगस्त 1947 को अंग्रेजों के सामने निकाली गई तिरंगा यात्रा पर अंग्रेजों ने अंधाधुंध फायरिंग कर दी, जिससे तिरंगा यात्रा में भगदड़ मच गई। फायरिंग के बावजूद नेतृत्व कर रहे शहीद राम कल्याण तिरंगा हाथों में लेकर भारत माता की जय के नारे लगाते रहे। अंग्रेजों की चेतावनी के बावजूद स्वतन्त्रता सैनानी राम कल्याण ने तिरंगा नहीं छोड़ा और सीने में गोली खाकर अपना बलिदान दे दिया। जहां पर यह शहीद हुए वहां इनका स्मारक बना हुआ है और मूर्ति स्थापित हैं और सर्किट हाउस से खोजा गेट वाले रोड़ का नामकरण भी शहीद राम कल्याण के नाम पर किया गया हैं।भारत देश अपनी आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। पूरे देश भर में अमृत महोत्सव को लेकर उत्साह है। जोर शोर से तिरंगा यात्रा निकाली जा रही है। घर-घर तिरंगे लगाए जा रहे हैं। देश की स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर न्योछावर होने वाले शहीदों, स्वतन्त्रता सैनानियों को याद कर रहे हैं। उन तमाम ज्ञात अज्ञात सैनानियों के त्याग और बलिदान से आने वालीं पीढ़ी को बताया जा रहा हैं। ऐसे में उन स्वतन्त्रता सैनानियों की चर्चा आवश्यक हो जाती हैं, जिनके त्याग और बलिदान को हम विस्मृत कर चुके हैं -शहीद राम कल्याण के दोहिते सौभाग्य शर्मा बताते हैं कि 1912 में जन्में शहीद राम कल्याण के पिता बून्दी के राजपरिवार के लिए खाना पकाने का काम करते थे। स्वयं मेहनत मजदूरी करते हुए पढ़ाई की और वकीलों के पास मुंशी का काम करते हुए ही वकील बने। शहीद राम कल्याण बूंदी प्रजा मंडल के अध्यक्ष और बूंदी नगर पालिका में उपाध्यक्ष के पद पर निर्वाचित हुए थे। इनके विवाह भंवरी बाई से हुआ था, जिनसे दो संताने हुई। सौभाग्य शर्मा ने बताया कि 11 अगस्त 1947 को अपनी तांगे से सुबह करीब नौ बजे घर से हिंडोली कोर्ट के लिए निकले। राम कल्याण अपनी दोनों पुत्रियों को विद्यालय छोड़कर बूंदी के नाहर चोहट्टा स्थान तक पहुंचे। जहां जानकारी मिली थी आज मोटर व्यवसाय एसोसिएशन के आंदोलन के जुलूस का नेतृत्व करने वाला कोई नहीं है। ऐसे में राम कल्याण त्वरित निर्णय लिया और अपने तांगे वाले को वापस लौटा दिया और खुद पैदल जुलूस का नेतृत्व करने के लिए निकल गए।</p>
<p>अंग्रेजी प्रशासन द्वारा शहर के परकोटे में धारा 144 लगा देने से मोटर व्यवसाय एसोसिएशन के आंदोलन के जुलूस शहर के परकोटे के बाहर निकाला गया, जिसे थोड़ा आगे बढ़ने पर अंग्रेज पुलिस ने रोक दिया गया। शहीद रामकल्याण शर्मा जुलूस में सबसे आगे तिरंगा थामे चल रहे थे। पुलिस द्वारा जुलूस रोकने के बाद जुलूस में शामिल लोगों पर हवाई फायरिंग करने से मची भगदड़ मच गई। ऐसे में बचने के लिए लोग इमली के पेड़ों पर चढ़ गए। लेकिन शहीद रामकल्याण शर्मा झंडे को लिए कुछ लोगों के साथ वही डटे रहे। अंग्रेजों द्वारा उनसे जुलूस बंद करने, झंडे को छोड़कर परिवार की दुहाई देते हुए चले जाने को कहा। लेकिन राम कल्याण ने भारतीय तिरंगे को नहीं छोड़ा और कई चेतावनी के बाद भी शहीद रामकल्याण शर्मा जीवन की परवाह किए बिना वहीं डटे रहे। आखिर में पुलिस द्वारा उन पर गोली चला दी गई और वह तिरंगे को सीने से लगाए धरती पर गिर पड़े। देखते ही देखते सारी भीड़ तीतर भीतर हो गई। गोली लगने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका और आजादी के दिवस से महज 4 दिन पूर्व उन्होंने तिरंगे की शान में अपना बलिदान दे दिया।</p>
<p><strong>आंख में गोली लगने से अभय शंकर गुजराती की रोशनी चली गई</strong><br />जिस आंदोलन में शहीद राम कल्याण ने अंग्रेजों की गोली खाकर अपना बलिदान दिया, उसी आंदोलन में पुलिस ने गोलीबारी में अभय शंकर गुजराती ने अपनी आंखों की रोशनी चली गई। गुजराती के पौत्र विकास शर्मा बताते हैं कि 11 अगस्त 1947 को हुई गोलीबारी में एक गोली उनकी आंख में लगी और गोली के कारतूस से अभय शंकर गुजराती की कलाई और जांघ घायल हो गई। इनकी आंख में लगी गोली तो डॉक्टरों ने निकाल ली लेकिन बाकी दो गोले उनके आखिरी समय तक उनके शरीर में मौजूद रहे। अभय शंकर गुजराती का जन्म 21 नवंबर 1913 को बूंदी जिले के जमींदार घराने में मूलचंद एवं भंवरी बाई उर्फ जाना बाई के घर हुआ था। लेकिन बाल्यावस्था में ही पिता की मौत के बाद मां की शिक्षा ने आजादी की लड़ाई में कूदने के लिए प्रोत्साहित किया। 12 वर्ष की उम्र से ही इनके मन में दासता से मुक्त होने की लहरें उमड़ने लगी थी। इनके स्वतंत्रता आंदोलनों में व्यस्त रहे, जिसके कारण उनकी जमीन पर कुछ लोगों ने कब्जा कर लिया ताक कछ को अंग्रेजों ने जब्त कर लिया। परिणामस्वरूप, उन्हें जीवन यापन के लिए एक ब्रिटिश इलेक्ट्रिक कंपनी में बस मैकेनिक और बस ड्राइवर की नौकरी करनी पड़ी। वर्ष 1926 में एक सभा के दौरान ब्रिटिश सेना के लाठीचार्ज में अभय शंकर गुजराती गंभीर रूप से घायल हो गये। कांग्रेस की नीति और सिद्धांत से प्रभावित जानकारी हुई तो 18 वर्ष की आयु में पार्टी के सदस्य बनकर गोष्ठियां, प्रभात फेरी आयोजित करने लगे। ऋषि दत्त मेहता, केसरी लाल कोटिया से कांग्रेस के उद्देश्यों सीखने वाले अभय शंकर गुजराती को हरावल दस्ते के रूप में जाना जाता था। देश को मिली आजाद के बाद अभय शंकर गुजराती स्वतंत्र भारत में सेनानी तो बन गए, लेकिन सरकार ने उनकी कोई कदर नहीं की। गुजराती के पुत्र मुकुट बिहारी गुजराती बताया कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान के लिए राज्य सरकार ने 2 अक्टूबर 1987 को ताम्रपत्र से सम्मानित किया और 14 नवम्बर 1987 को स्वतंत्रता सेनानी पेंशन प्रदान की। स्वतंत्रता सेनानी अभय शंकर गुजराती का निधन 3 फरवरी 2004 को हुआ था। जिनका पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।  हांलाकि इनके मन में सरकार की उदासीनता को लेकर खिन्नता भी हैं कि 750 बीघा जमीन के मालिक होने के बावजूद आराम की जिन्दगी जीने की जगह उन्होंने आजादी की लड़ाई में अपना सब कुछ लुटा दिया। </p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Wed, 16 Aug 2023 15:48:16 +0530</pubDate>
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                <title>आजादी का आंदोलन तेज करने जब पंडित नेहरू जोधपुर में महाराजा से मिले </title>
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                        <![CDATA[ पंडित नेहरू को भारत छोड़ो आंदोलन के बाद भी जेल भेजा गया और एक जून 1945 को छोड़ा गया तो मारवाड़ लोक परिषद ने उन्हें जोधपुर बुलाकर सम्मानित करने का फैसला लिया।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/intensifying-the-freedom-movement-when-pandit-nehru-met-the-maharaja/article-18509"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-08/capture1.jpg" alt=""></a><br /><p>आम तौर पर इतिहास में पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी को राजघरानों का बहुत विरोधी बताया जाता है, लेकिन राजस्थान के आजादी के इतिहास के कुछ पन्ने इस तथ्य को झुठलाते हैं। पंडित नेहरू को भारत छोड़ो आंदोलन के बाद भी जेल भेजा गया और एक जून 1945 को छोड़ा गया तो मारवाड़ लोक परिषद ने उन्हें जोधपुर बुलाकर सम्मानित करने का फैसला लिया। वे अक्टूबर में आए, लेकिन मारवाड़ में नेहरू का स्वागत करने को लोक परिषद से अधिक रजवाड़े उतावले थे। <br />पंडित नेहरू अक्टूबर में जोधपुर जाने के लिए सोजत रेलवे स्टेशन पहुंचे तो महाराजा उम्मेदसिंह के निकट संबंधी कर्नल मोहनसिंह भाटी ने महाराजा की ओर से नेहरू का स्वागत किया। महाराजा खुद नेहरू से मिलने उनके निवास स्थान पर गए। उन्होंने संध्या में नेहरू और उनके साथ गई 28 वर्षीय युवा इंदिरा के सम्मान में भोज दिया। यही नहीं, उन्होंने आजादी के आंदोलन में कांग्रेस के सहयोग के लिए 25,000 रुपए की थैली भी भेंट की।<br /><br />पंडित नेहरू और महाराजा की इस मुलाकात का असर यह पड़ा कि जोधपुर रियासत के अंग्रेज प्रधानमंत्री सर डोनाल्ड को हटा दिया गया और उनकी जगह इलाहाबाद डिविजन के कमिश्नर सीएस वेंकटाचारी को नियुक्त किया गया। इससे लोकपरिषद और महाराजा के बीच रिश्ते कुछ ठीक हुए। महाराजा उम्मेदसिंह की मृत्यु जून 1947 में माउंट आबू में न हुई होती तो जोधपुर संभवत: राजस्थान की केंद्रीय शक्ति होता। लेकिन उनके जाने के बाद हालात बदलते चले गए।</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Aug 2022 10:48:13 +0530</pubDate>
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                <title>बेमिसाल क्रांतिकारी केसरी सिंह बारहठ, जिन्होंने भाई, पुत्र और बहनोई तक को क्रांति की राह पर डाला, पुत्र प्रताप सिंह 22 की उम्र में शहीद</title>
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                        <![CDATA[क्रांति के मामले में राजस्थान में सबसे बड़ा योगदान ठाकुर केसरीसिंह बारहठ और उनके परिवार का था।  1872 में शाहपुरा भीलवाड़ा के निकट पैतृक जागीर के गांव देवपुरा में पैदा बारहठ कई भारतीय भाषाओं के ज्ञाता थे।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/unmatched-revolutionary-kesari-singh-barath-who-put-brother-son-and-brother-in-law-on-the-path-of-revolution-son-pratap-singh-martyred-at-the-age-of-22/article-18239"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-08/q-31.jpg" alt=""></a><br /><p>देश में 1857 की क्रांति तो विफल हो गई, लेकिन राजस्थान में इस क्रांति की धुरी थे शाहपुरा निवासी बारहठ केसरीसिंह, खरवा ठाकुर गोपाल सिंह,  जयपुर के अर्जुनलाल सेठी तथा ब्यावर के सेठ दामोदरदास राठी। इन्होंने राजस्थान में अभिनव भारत समिति नामक क्रांतिकारी संगठन की शाखा स्थापित की थी। इस संस्था ने क्रांति के लिए युवकों को तैयार किया। सेठी ने जयपुर में वर्द्धमान विद्यालय शुरू करवाया था। यहां से शिक्षित युवाओं को वे क्रांतिकारी कामों के व्यावहारिक ज्ञान के लिए बंगाल और देश के मशहूर क्रांतिकारी रास बिहारी बोस के पास भेजते, जहाँ उन्हें मास्टर अमीरचंद प्रशिक्षण देते।<br /> <br />क्रांति के मामले में राजस्थान में सबसे बड़ा योगदान ठाकुर केसरीसिंह बारहठ और उनके परिवार का था।  1872 में शाहपुरा भीलवाड़ा के निकट पैतृक जागीर के गांव देवपुरा में पैदा बारहठ कई भारतीय भाषाओं के ज्ञाता थे। वे डिंगल के उत्कृष्ट कवि थे। उन्होंने राजस्थान के राजाओं और जागीरदारों में राष्ट्रीय भावना भरी। वे अदभुत कवि थे। 1930 में लॉर्ड कर्जन के दरबार में भाग लेने के लिए मेवाड़ के महाराणा फतेह सिंह दिल्ली के लिए रवाना हुए तो बारहठ के चेतावनी के चूंिठयों से प्रभावित होकर वे बिना दरबार में भाग लिए ही उदयपुर लौट आए।<br /> <br />बारहठ ने अपने भाई, बहनोई और पुत्र तक को बलिदानी राह पर डाल दिया। 1912 में ब्रिटिश सरकार ने राजधानी कोलकाता से दिल्ली लाने का फैसला किया तो 23 दिसंबर 1912 को भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड हॉर्डिंग के दिल्ली में प्रवेश के समय उन्हें मारने की योजना क्रांतिकारी रास बिहारी बोस ने बनाई। इसके लिए उन्होंने बंगाल के बसंत कुमार विश्वास और राजस्थान के जोरावर सिंह तथा प्रताप सिंह को चुना। इन युवकों ने चांदनी चौक स्थित पंजाब नेशनल बैंक की इमारत से बम फेंका, जो गवर्नर जनरल पर गिरा। वह घायल तो हुआ पर मरा नहीं। उसका अंगरक्षक मारा गया।<br /> <br />प्रतापसिंह को 1917 में बनारस षड्यंत्र अभियोग में 5 वर्ष की सजा हुई। उन्हें बरेली सेंट्रल जेल में बंद रखा गया। भारत सरकार के गुप्तचर विभाग का निदेशक सर चार्ल्स क्लीवलैंड उनसे जेल में मिला और कहा कि उनकी मां उनके लिए दिन रात रोती है। अगर वह क्रांतिकारियों की गतिविधियों को रोक दें तो उन्हें तत्काल रिहा कर दिया जाएगा। प्रताप सिंह ने उत्तर दिया :  मेरी मां रोती है तो रोने दो। मैं अपनी मां को हंसाने के लिए हजारों माताओं को रुलाना नहीं चाहता। क्लीवलैंड ने अपने संस्मरण में इस घटना को याद करते हुए लिखा है : मैंने आज तक प्रताप सिंह जैसा वीर और विलक्षण बुद्धि वाला युवक नहीं देखा। उसे सताने में हमने कोई कसर नहीं रखी पर वह टस से मस नहीं हुआ। हम सब हार गए पर प्रताप सिंह जेल में अंग्रेजों की अमानुषिक यातनाओं की वजह से 27 मई 1918 को केवल 22 वर्ष की उम्र में शहीद हो गया।<br /> <br />केसरी सिंह को एक हत्याकांड में गिरफ्तार कर 20 साल की जेल की गई। पैतृक संपत्ति और जागीर जप्त कर ली गई। बिहार के हजारीबाग जेल में उन्हें सजा काटने भेजा गया। वे जब कोटा पहुंचे तो उन्हें पुत्र प्रताप सिंह के बरेली जेल में शहीद होने के समाचार मिला। उन्होंने दुखी होने के बजाय कहा : भारत माता का पुत्र उसकी मुक्ति के लिए बलिदान हो गया! यह मेरा नहीं, भारत माता का ही बेटा था। मेरे लिए यह दु:ख का नहीं, गर्व का दिन है। बारहठ आखिरी समय में हिंसा की राह छोड़कर महात्मा गांधी की राह पर आए और उन्होंने माना कि हिंसा के बजाय अहिंसा से आजादी को लाया जा सकता है। उन्होंने गांधी जी की प्रेरणा से पत्रकारिता भी की और लोगों में जागृति के लिए काम किया। </p>]]>
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                <pubDate>Mon, 08 Aug 2022 11:45:15 +0530</pubDate>
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                <title>स्वतंत्रता सेनानी अर्जुन लाल सेठी पर डाक विभाग राजस्थान परिमंडल की ओर से स्पेशल कवर जारी</title>
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                        <![CDATA[आजादी के अमृत महोत्सव के तहत जयपुर के सेठी काॅलोनी स्थित अर्जुन लाल सेठी पार्क में कार्यक्रम हुआ।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/6166b53088f11/article-1648"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-10/whatsapp-image-2021-10-13-at-15.10.01.jpeg" alt=""></a><br /><p>जयपुर | आजादी के अमृत महोत्सव के तहत जयपुर के सेठी काॅलोनी स्थित अर्जुन लाल सेठी पार्क में बुधवार को स्वतंत्रता सेनानी जयपुर के अर्जुन लाल सेठी पर डाक विभाग राजस्थान परिमंडल की ओर से स्पेशल कवर जारी हुआ | कवर उनकी पौत्रवधु कोकिला सेठी ने डाक विभाग में जयपुर सिटी की सीनियर सुपरिटेंडेंट प्रियंका गुप्ता की मौजूदगी में जारी किया | कोकिला सेठी ने इस अवसर पर कहा कि यह सम्मान समारोह स्वतंत्रता सेनानियों के लिए पर्व के समान है | इस पर्व में शामिल होकर मुझे भी गर्व है और खुशी इस बात की हो रही है कि कवर जारी करने का सौभाग्य मुझे दिया गया | ये कवर अर्जुन लाल सेठी नगर में ही स्थित पार्क में रिलीज़ हुआ है | सेठीजी ने अपना सम्पूर्ण जीवन देश की आन बान और शान को बनाए रखने में लगाया है | बंगाल के स्वदेशी आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका रही | एसएसपी जयपुर सिटी पोस्ट प्रियंका गुप्ता ने बताया कि इसी तरह अलग अलग डिविजन से कुल छह कवर सेननियों पर जारी किए हैं जिनमें कालीबाई, केसरीसिंह बारहठ, बालमुकुंद बिस्सा, मोतीलाल तेजावत, गणेशलाल व्यास है |</p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 13 Oct 2021 17:52:22 +0530</pubDate>
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