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                <title>हाड़ौती के सबसे व्यस्त बस स्टैंड पर 'मौत का साया' : 14 हजार यात्री रोज जोखिम में, प्रशासन की फाइलों में अटका सुधार</title>
                                    <description><![CDATA[कोटा आगार को 98% रेवेन्यू देने वाला नयापुरा बस स्टैंड खुद उपेक्षा का शिकार।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the--shadow-of-death--looms-over-hadoti-s-busiest-bus-stand--with-14-000-passengers-at-risk-daily--improvements-are-stuck-in-administrative-files/article-140480"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px)-(1200-x-600-px)-(1)53.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। हाड़ौती संभाग की पहचान और राजस्थान रोडवेज के सबसे व्यस्ततम केंद्रों में शुमार नयापुरा बस स्टैंड आज खुद अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। जिस बस स्टैंड से रोजाना 14,000 से अधिक यात्री अपनी मंजिलों की ओर निकलते हैं, वहां की छत से टपकता पानी और गिरता प्लास्टर यात्रियों के लिए 'कैद खाने' जैसा अहसास कराता है। स्थिति यह है कि जयपुर से रोडवेज का प्रतिनिधिमंडल सर्वे कर प्रस्ताव तो दे गया, लेकिन कोटा के स्थानीय प्रशासन (केडीए) और रोडवेज के बीच तालमेल की कमी के कारण सुधार की कोई सूरत नजर नहीं आ रही है।</p>
<p><strong>खतरनाक छत: झांकती सलाखें दे रही हैं दुर्घटना को न्योता</strong><br />नयापुरा बस स्टैंड की इमारत जर्जर हो चुकी है। बारिश के दिनों में छत से पानी का रिसाव आम बात है, लेकिन अब प्लास्टर गिरना यात्रियों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। पिलरों और छतों से झांकती लोहे की सलाखें विभाग की लापरवाही की गवाही दे रही हैं। यात्रियों को हर वक्त इस डर में रहना पड़ता है कि कहीं ऊपर से सीमेंट का कोई हिस्सा सिर पर न गिर जाए।</p>
<p><strong>रेवेन्यू में अव्वल, सुविधाओं में फिसड्डी</strong><br />कोटा शहर मे कहने को तो दो बस स्टैण्ड संचालत है। आंकड़े गवाह हैं कि कोटा आगार का 98% रेवेन्यू इसी नयापुरा बस स्टैंड से आता है। कोटा डिपो में करीब 400 कार्मिकों का अमला है, जिसमें 200 रनिंग स्टाफ शामिल है। करीब 6,000 स्क्वायर मीटर में फैले इस बस स्टैंड से 80% रोडवेज बेड़ा संचालित होता है। शहर के बीचों-बीच होने के कारण यहां से आॅटो और अन्य साधन आसानी से मिल जाते हैं, इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों के यात्री इसे ही प्राथमिकता देते हैं। विडंबना देखिए, जो बस स्टैंड विभाग की तिजोरी भर रहा है, उसे ही मूलभूत सुविधाओं के लिए तरसाया जा रहा है।<br /> <br /><strong>जयपुर से टीम आई, पर समाधान नहीं निकला</strong><br />करीब दो माह पूर्व जयपुर से रोडवेज के एसई (सिविल) दीपेश नागर और कंस्ट्रक्शन सलाहकार कंपनी 'पिडकॉर' के प्रतिनिधि कोटा पहुंचे थे। उन्होंने विभिन्न विस्तृत मॉडल और खाका तैयार कर केडीए (तत्कालीन यूआईटी) को भी चर्चा विभिन्न मॉडल्स पर हुई, लेकिन अब तक यह तय नहीं हो सका है कि निर्माण कार्य रोडवेज कराएगा या केडीए। अधिकारियों के बीच 'फाइनल निर्णय' के इंतजार में हजारों यात्रियों की सुरक्षा दांव पर लगी है।</p>
<p><strong>यात्रियों और दुकानदारों की जुबानी: डर और उम्मीद</strong><br />हजारों लोगों का आना-जाना है। बारिश में प्लास्टर कभी भी गिर जाता है। हमें यात्रियों को लगातार सावधान करना पड़ता है ताकि कोई बड़ी दुर्घटना न हो जाए।<br /><strong>-प्रकाश धामेजा (स्थानीय दुकानदार)</strong></p>
<p>हम वर्षों से इसी बस स्टैंड को जानते हैं। इसका सुधार होना केवल रोडवेज के लिए नहीं, बल्कि कोटा की पहचान के लिए जरूरी है।<br /><strong>-अरुण जैन (यात्री, अलीगढ़-उनियारा)</strong></p>
<p>पीहर से आते समय बच्चों के साथ यहीं उतरते हैं क्योंकि यहां से साधन सस्ते मिलते हैं। बस स्टैंड को विकसित करना चाहिए और महिलाओं के लिए सुविधाएं बढ़ानी चाहिए।<br /><strong>-सीमा वैष्णव (यात्री, नैनवां)</strong></p>
<p><strong>अधिकारियों की सफाई</strong><br />जयपुर से रोडवेज विभाग की टीम आई थी। विभिन्न मॉडल्स पर चर्चा की गई है, लेकिन फाइनल निर्णय उनकी (रोडवेज) तरफ से ही होना है। वर्तमान में विभागीय रूप से हमारे पास कोई नया अपडेट नहीं आया है।<br /><strong>- मुकेश चौधरी, सचिव, कोटा विकास प्राधिकरण </strong></p>
<p>दो महीने पहले सिविल विंग और सलाहकार कंपनी के साथ लोकल प्रशासन की चर्चा हुई थी। विकल्पों पर विचार किया गया है, लेकिन उसके बाद से अभी तक उच्च स्तर से कोई निर्देश या अपडेट प्राप्त नहीं हुआ है। <br /><strong>-अजय मीणा, प्रबंधक, कोटा आगार</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 22 Jan 2026 17:30:26 +0530</pubDate>
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                <title>धड़ल्ले से हो रहा पेट्रोल पम्पों पर मोबाइल का उपयोग, पेट्रोल-डीजल ज्वलनशील होने से खतरा बरकरार</title>
                                    <description><![CDATA[सिर्फ डिजिटल पेमेंट के लिए करें मोबाइल का उपयोग। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/use-of-mobile-at-petrol-pumps-is-rampant/article-102652"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-01/7819.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहर में हर पेट्रोल पम्प पर पेट्रोल व टीजल भरवाने वाले वाहन चालकों की भीड़ देखी जा सकती है। उस भीड़ में कई लोग ऐसे भी हैं जो वहीं खड़े होकर मोबाइल पर बात करने लगते है।  पेट्रोल पम्पों पर  लोगों को धडल्ले से बेफिक्र होकर बात करते हुए देखा जा सकता है। लेकिन उन्हें शायद इस बात का अंदाजा नहीं है कि पेट्रोल पम्प पर खड़े होकर मोबाइल पर बात करने का खतरा अभी कम नहीं हुआ है। देश में डिजिटल क्रांति के चलते अधिकतर काम ऑनलाइन हो गया है। जिससे पेट्रोल पम्पों पर भी मोबाइल का अधिक उपयोग होने लगा है। पेट्रोल पम्प पर मोबाइल का उपयोग सिर्फ डिजिटल पेमेंट के लिए ही किया जाना खतरनाक नहीं है। जबकि वहां खड़े होकर मोबाइल पर बात करने का खतरा अभी भी कम नहीं हुआ है। कोटा शहर में जितने भी पेट्रोल पम्प हैं उनमें से अधिकतर में अब पेट्रोल व डीजल भरवाने पर भुगतान की आॅनलाइन सुविधा कर दी गई है। जिसमें फोन पे, पेटीएम व स्वेप मशीन से होने लगा है। इन डिजिटल माध्यमों से भुगतान के लिए मोबाइल का उपयोग किया जा रहा है। इसमें ग्राहक से लेकर पेट्रोल पम्प कर्मचारी तक सभी मोबाइल लिए घंटों तक पम्पों पर खड़े रहते हैं। वह भी पम्प के इतने नजदीक कि कभी भी कोई हादसा या घटना घट सकती है। हालांकि सभी पम्प पर मोबाइल का उपयोग अधिक होने से वहां आग से सुरक्षा के इंतजाम बढ़ाए गए हैं। रेत व मिट्टी से भरी बाल्टियां व फायर इंस्टीब्यूशंस अधिक संख्या में रखे जा रहे हैं। </p>
<p><strong>पहले मोबाइल का उपयोग था वर्जित :</strong></p>
<p>डिजिटल क्रांति आने से अब अधिकतर लोग अपने पास नकद राशि कम रखते हैं। छोटे-छोटे भुगतान भी डिजिटल माध्यमों से करने लगे है। जिसमें पेट्रोल पम्प भी शामिल है। जबकि कुछ समय पहले तक लोगों को पेट्रोल पम्प पर मोबाइल ले जाना वर्जित था। यदि कोई मोबाइल लेकर जाता भी था तो उसे वहां मोबाइल निकालने और बात नहीं करने दिया जाता था। पम्प कर्मचारी ही  ग्राहकों को ऐसा करने से मना कर देते थे।  ऐसा कहा जाता था कि पेट्रोल पम्प पर मोबाइल से बात करने पर आग लगने  का खतरा हो सकता है। लेकिन अब कर्मचारी हो या ग्राहक सभी बेधड़क होकर पेट्रोल पम्प पर मोबाइल का उपयोग कर रहे हैं। </p>
<p><strong>करीब 50 फीसदी भुगतान ऑनलाइन हो रहा :</strong></p>
<p>शहर में वर्तमान में विभिन्न कम्पनियों के 39 पेट्रोल पम्प संचालित हैं। जिनसे रोजाना करीब 21 लाख लीटर पेट्रोल व डीजल की खपत हो रही है। जिसमें 8 लाख लीटर पेट्रोल और 13 लाख लीटर डीजल की खपत है। इससे करीब 21 करोड़ रुपए का लेनदेन हो रहा है। हालत यह है कि शहर के पेट्रोल पम्पों पर  रोजाना हो रहे लेनदेन में करीब 50 फीसदी भुगतान डिजिटल माध्यमों से आॅनलाइन किया जा रहा है। ऐसे में भुगतान करने वालों में कुछ लोग पम्प पर खड़े होकर मोबाइल से बात करने लगते है। इससे उन लोगों के साथ ही वहां मौजूद लोगों व आस-पास के लिए खतरनाक हैं। </p>
<p><strong>मोबाइल से निकलने वाली किरणें खतरनाक :</strong></p>
<p>मोबाइल रिपेयर करने वाले मैकैनिक सुखवीर  मेहरा का कहना है कि पेट्रोल पम्प पर मोबाइल से बात करना पहले भी खतरनाक था और अभी भी खतरनाक ही है। मोबाइल से निकलने वाली किरणें वातावरण में फेलती है। जिससे पेट्रोल व डीजल अधिक ’वलनशील पदार्थ होने से वह उसके सम्पर्क में आने से खतरनाक हो जाती है। इसलिए पेट्रोल पम्प पर मोबाइल से बात करने का खतरा जितना पहले था उतना ही अभी भी है। पम्प से एक निर्धारित दूरी पर जाकर ही मोबाइल से बात करना ही सुरक्षित है।  मोबाइल दुकानदार महेश आहूजा ने बताया कि  पेट्रोल पम्प पर मोबाइल से बात करना अधिक खतरनाक है। जबकि डिजिटल भुगतान करने में खतरा नहीं है। इसका कारण भुगतान करने में कुछ सैकंड या एक से दो मिनट का भी समय नहीं लगता। जबकि बात लम्बी चलती है। ऐसे में मोबाइल  से निकलने वाली किरणें पेट्रोल-डीजल के सम्पर्क में आने पर हादसे का कारण बन सकती है। </p>
<p><strong>पेट्रोल-डीजल ज्वलनशील होने से खतरा बरकरार :</strong></p>
<p>विज्ञान नगर निवासी कपिल शर्मा व गफ्फार मोहम्मद ने बताया कि पेट्रोल  व डीजल ’वलनशील पदार्थ होते हैं। वह मोबाइल से निकलने वाले रेडिएशन के सम्पर्क में तेजी से आते हैं। जिससे पम्प पर मोबाइल का उपयोग करना ही खतरनाक है। फिर चाहे वह डिजिटल भुगतान के लिए हो या बात करने के लिए। भुगतान के लिए भी तो नेट चालू करना होता है। ऐसा करने वाले लोगों के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। </p>
<p><strong>इनका कहना है :</strong></p>
<p>सरकार ने डिजिटल इंडिया के तहत अधिकतर भुगतान की व्यवस्था ऑनलाइन कर रखी है। ऐसे में पेट्रोल पम्प पर भी ऑनलाइन भुगतान को नकारा नहीं जा सकता। अब अधिकतर लोगों की नकद राशि रखने की आदत कम हो गई है। ऐसे में पेट्रोल पम्प संचालकों को भी ऑनलाइन भुगतान के लिए मोबाइल का उपयोग करना पड़ रहा है। पम्प पर मोबाइल से बात करना पहले भी खतरनाक था और अभी भी है। लेकिन डिजिटल पेमेंट करना खतरनाक नहीं है। सरकार ने जो सुविधा दी है उसका लोगों को उपयोग करना चाहिए दुरुपयोग नहीं। पेट्रोल पम्प पर लोग मोबाइल का उपयोग भुगतान के लिए करें बात करने के लिए नहीं। <br /><strong>- तरूमीत सिंह बेदी, अध्यक्ष पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 31 Jan 2025 16:08:58 +0530</pubDate>
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                <title>12 हजार से अधिक श्वानों का बधियाकरण, फिर भी सड़कों पर भरमार</title>
                                    <description><![CDATA[श्वानशाला पर लाखों रुपए खर्च करने के बाद भी लोगों को नहीं राहत ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/more-than-12-thousand-dogs-have-been-sterilized--still-there-is-a-lot-of-dogs-on-the-roads/article-95146"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-11/27rtrer-(5)1.png" alt=""></a><br /><p>कोटा । नगर निगम द्वारा श्वानों का बधियाकरण व टीकाकरण कराने के  बाद भी न तो इनकी संख्या में कमी नजर आ रही है और न ही इनके द्वारा  लोगों को काटने के मामलों में।  श्वानशाला बनने के बाद से अब तक कोटा दक्षिण निगम करीब 12 हजार से अधिक श्वानों का बधियाकरण करवा चुका है। उसके बावजूद लोगों को इनकी स्थायी समस्या से निजात नहीं मिल पाई है। शहर का कोई भी मौहल्ला हो या मुख्य मार्ग। संकरी गली हो या चौड़ा रास्ता। यहां तक कि नगर निगम से लेकर किसी भी सरकारी कार्यालय तक में श्वान झुंड के रूप में देखे जा सकते हैं। हालत यह है कि शहर में श्वानों की संख्या कम होने की जगह लगातार बढ़ती ही जा रही है। नतीजा श्वान राह चलते लोगों विशेष रूप से महिलाओं व बच्चों को अपना शिकार बना रहे हैं। जिससे लोगों में श्वानों के प्रति दहशत लगातार बढ़ रही है। गत दिनों भी बजरंग नगर में श्वानों द्वारा एक बालक को काटने की घटना हो चुकी है। </p>
<p><strong>निगम ने लाखों रुपए खर्च कर बनवाई श्वान शाला</strong><br />शहर में श्वानों की समस्या के समाधान की मांग लम्बे समय से की जा रही थी। इसे देखते हुए नगर निगम कोटा उत्तर व दक्षिण की ओर से लाखों रुपए खर्च कर बंधा धर्मपुरा में श्वानशाला बनवाई। कोटा उत्तर की श्वानशाला पर करीब 75 लाख रुपए और कोटा दक्षिण की श्वान शाला पर 50 लाख रुपए खर्च हुए। कोटा उत्तर की श्वानशाला में श्वानों को रखने के 125 कैनल व कोटा दक्षिण की श्वानशाला में 33 कैनल हैं।  साथ हीआॅपरेशन थियेटर भी बनाया हुआ है।  इसके बाद निगम ने एनिमल वेलफेयर सोसायटी को श्वानों को पकड़कर उनका बधियाकरण व टीकाकरण करने का टेंडर दिया। उस पर भी हर साल लाखों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। लेकिन न तो श्वानों की संख्या कम हो रही है और न ही काटने के मामले। </p>
<p><strong>आए दिन हो रहे काटने  के मामले</strong><br />शहर में श्वानों के काटने के मामले लगातार हो रहे हैं। साबरमती कॉलोनी, महावीर नगर, सब्जीमंडी,बजरंग नगर से लेकर कुन्हाड़ी सकतपुरा तक  श्वान ही श्वान सड़कों पर देखे जा सकते है।  हालत यह है कि घर के बाहर खेलते बच्चों को भी श्वान कई बार निशाना बना चुके हैं। कुछ समय पहले श्वानों ने बजरंग नगर में पूर्व पार्षद के पुत्र को गर्दन पर काट लिया था। जिससे उसकी हालत इतनी अधिक खराब हो गई थी कि उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था।  </p>
<p><strong>12 हजार 645 का किया बधियाकरण</strong><br />नगर निगम से प्राप्त जानकारी के अनुसार श्वानशाला में  कोटा दक्षिण निगम क्षेत्र से  12 हजार 645  श्वानों का बधियाकरण व टीकाकरण किया जा चुका है। बधियाकरण के बाद तीन से चार दिन श्वानों को वहां रखकर वापस उसी स्थान पर छोड़ा जा रहा है जहां से पकड़कर लाए थे। जिससे निगम के प्रयासों का जनता को लाभ ही नहीं मिल रहा है।  </p>
<p><strong>राज्य सरकार ने पहले दिया आदेश, फिर लिया वापस</strong><br />श्वानों की बढ़ती समस्या को देखते हुए रा’य सरकार ने कुछ समय पहले खतरनाक श्वानों को शहर से पकड़कर दूर जंगल में या बाड़े में छोड़ने के आदेश दिए थे। जैसे ही यह आदेश आया वैसे ही श्वान प्रेमी संगठनों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया। जिससे सरकार को बैकफुट पर आकर उस आदेश को वापस लेना पड़ा। </p>
<p><strong>शहर से बाहर हो, तभी समाधान</strong><br />शहर वासियों का कहना है कि श्वानों की समस्या गम्भीर है। इसका स्थायी समाधान होना चाहिए। भीमगंजमंडी निवासी घनश्याम नामा का कहना है कि श्वानों को बधियाकरण करके वापस छोड़ने का कोई मतलब नहीं है। इन्हें स्थायी रूप से वहीं रखा जाए। पाटनपोल निवासी घनश्याम शर्मा का कहना है कि  श्वानों का इतना अधिक डर है कि उन्हें देखते ही महिलाएं घर से बाहर निकलने में डरने लगी है। बच्चे घर के बाहर नहीं खेल पाते। निगम लाखों रुपए खर्च कर रहा है लेकिन उसका लोगों को कोई लाभ नहीं हो रहा है। श्वानों को शहर से दूर किया जाना चाहिए। </p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />श्वानों के मामले में सुप्रीम कोर्ट की गाइन लाइन की पालना करने की बाध्यता है। उसके हिसाब से ही पकड़कर बधियाकरण करने की प्रक्रिया की जा रही है  निगम श्वानों को रखने, बधियाकरण व टीकाकरण और उनके खाने पर खर्चा कर ही रहा है। श्वानों को श्वानशाला में  स्थायी रूप से रखकर वहीं खाना पीना दिया जाए तभी शहर वासियों को इससे छुटकारा मिलेगा। वरना साल में दो बार इनके बच्चे होते हैं। यदि किसी एरिया से 20 में से 15 का बधियाकरण कर भी दिया और शेष 5 रह गए तो साल में दो बार उनके बच्चे होने से संख्या कम होना मुश्किल है। साथ ही ये 5 से 6 माह में बड़े हो जाते हैं।<br /><strong>-राजीव अग्रवाल, महापौर, नगर निगम कोटा दक्षिण</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 16 Nov 2024 16:27:55 +0530</pubDate>
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                <title>मानव और पशु स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है गाजर घास </title>
                                    <description><![CDATA[गाजर घास क्षेत्र में तेजी से फैलती जा रही है।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/carrot-grass-is-dangerous-for-human-and-animal-health/article-89781"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-09/1rtrter-(4).png" alt=""></a><br /><p>सुल्तानपुर। गाजर घास बहुत ही खतरनाक खरपतवार हैं। अब इसने खेत खलियानों के साथ ही ग्रामीण घरों के आसपास की जगह पर पाँव पसारना शुरू कर दिया है। गाजर घास सब खरपतवारों में सबसे विनाशकारी खरपतवार हैं क्योंकि यह खरपतवार कई तरह की समस्याएं पैदा करता हैं। क्षेत्र में ड्रेन एवं नहरों के किनारे पर गाजर घास के मात्रा दिनों दिन बढ़ने से किसानो को खेत बंजर होने की चिंता सता रही है। गाजर घास क्षेत्र में तेजी से फैलती जा रही है। समय रहते गाजर घास की रोकथाम के लिए उपाय नहीं किए गए तो वह दिन दूर नहीं जब क्षेत्र के खेतोंं में फसल से अधिक गाजर घास  देखने को मिलेगी। गाजर घास सभी के लिए नुकसानदेह है, गाजर घास ना तो पशुओं काम आती है। नहरों के किनारे गाजर घास होने से यह पानी के साथ खेतों तक पहुंच चुकी है, इसका बीज जहरीला होता है मनुष्य के हाथ लगाने पर या त्वचा के संपर्क में आने पर खुजली पैदा करता है।   </p>
<p>मुख्य रूप से नहरों के किनारे उगने वाली गाजर घास किसानों की चिंता का कारण बनी हुई है। गाजर घास का आतंक इतना बढ़ चुका है कि नहरों में पानी छोड़ने पर पानी के साथ खेतों में पहुंचकर फसलों को नष्ट कर हो सकती है। एक पौधे से हजारों बीज उत्पन्न होते हैं जो जमीन को बंजर बना देते हैं। सीएडी प्रशासन ने समय रहते कोई उपाय नहीं किया तो गाजर घास को रोकने में समस्या आ सकती है, किसानों ने समय रहते समस्या समाधान की भी मांग की है।  <br /><strong>- जगदीश शर्मा, भारतीय किसान संघ </strong></p>
<p>नहर से होते हुए गाजर घास वर्तमान में खेतों की ड्रेन पर एवं खेतों की मेर तक पहुंच चुका है, गाजर घास जानवरों के लिए भी नुकसानदेह है साथ ही मनुष्य अगर उसे छूता है तो उसे भी खुजली हो जाती है जिसके चलते हैं किसान के साथ ही किसानों के जानवर भी गाजर घास के शिकार बन रहे हैं।<br /><strong>- बबलू शर्मा, किसान </strong></p>
<p>समय रहते अगर गाजर घास को खत्म करने का उपाय नहीं किया गया तो जमीन बंजर होने की कगार पर पहुंच जाएगी, क्योंकि वर्तमान में क्षेत्र में जगह-जगह पर गाजर घास का आतंक देखा जा रहा है। <br /><strong>- नरेंद्र दाधीच, किसान  </strong></p>
<p>गाजर घास न केवल खेतों में उगने वाली फसलों की पैदावार व गुणवता पर विपरीत असर डालते हैं। बल्कि मानव और पशु स्वास्थ्य पर भी यह घातक असर डालते हैं। गाजर घास का पौधा रेगिस्तान के अलावा कहीं भी आसानी से उग सकता है। इसकी पत्तियां गाजर की पत्तियों की तरह होती हैं जिन पर रोंयें लगे होते हैं। गाजरघास का प्रत्येक पौधा लगभग 15000 से 25000 अत्यन्त सूक्ष्म बीज पैदा करता हैं। इसके बीज हल्के होने के कारण यह दूर तक फैल सकते हैं। इसका पौधा प्रकाश एवं तापक्रम के प्रति उदासीन रहता हैं अत: यह सालभर उगता है खरपतवार को फूल आने से पहले उखाड़ कर जला देना चाहिये ताकि इसके बीज न बन पायें व न ही फैल पाए। खरपतवार को उखाड़ते समय दस्तानों का प्रयोग करना चाहिए। अनउपजाऊ भूमि पर उगी गाजर घास के ऊपर 20 प्रतिशत साधारण नमक का घोल बनाकर छिड़काव करें। गाजर घास का नियंत्रण के लिए हम इसके प्राकृतिक शत्रु मुख्यत: मैक्सिकन बीटल (जाइगोग्रामा बाईकोलोराटा) जो इस खरपतवार को बहुत मजे से खाता है इसके ऊपर छोड़ देना चाहिए। <br /><strong>- डॉ. जगमोहन सैनी, कृषि विशेषज्ञ </strong></p>
<p>सीएडी विभाग द्वारा नहरों की साइडों पर झाड़ झंकार व गाजर घास आदि होने पर नरेगा योजना के तहत मस्टरोल जारी करवाकर के साफ सफाई कराई जाती है। गर्मी के दिनों में करवाई गई थी बारिश के समय एवं सर्दी में भी ऐसी स्थिति आने पर मस्टररोल जारी करा करके शीघ्र सफाई करा दी जाएगी। माइनर पर ऐसी स्थिति होने पर नहर के अध्यक्षों द्वारा ही साफ सफाई कराई जाती है। वर्तमान में भी कुछ स्थानों पर नरेगा योजना के तहत साफ सफाई कराई जा रही है। <br /><strong>- हेमराज मीणा, एईएन  सीएडी विभाग</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 Sep 2024 17:12:08 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>जर्जर पुलिया पर मंडरा रहा खतरा </title>
                                    <description><![CDATA[जर्जर पुलिया से खतरों से भरा सफर करने को लोग मजबूर हो रहे हैं और प्रशासन भी खामोश है। जर्जर पुलिया पर आखिर आवागमन कितना सुरक्षित है इसे लेकर जिम्मेदार बेखबर हैं। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/baran/danger-looming-on-dilapidated-bridge/article-65058"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-12/jarjar-puliya-per-mandara-khatra...baran,-kawai-news-25.12.2023.png" alt=""></a><br /><p>कवाई। कोटा धरनावदा राजमार्ग पर कस्बे के समीप  अंधेरी नदी की पुलिया ऊपर से जर्जर हो चुकी हैं। जिससे हर समय हादसे का अंदेशा बना रहता है। इन दीनों  हाल यह है  की सीसी पर गिट्टी सीमेंट निकल चुका है। जिससे पुलिया के ऊपर बड़े-बड़े गड्ढे व सरिया नजर आने लगा  है। नया से रोजाना बड़ी संख्या में भारी वाहनों और लोगों का आना-जाना बना हुआ है। जर्जर पुलिया से खतरों से भरा सफर करने को लोग मजबूर हो रहे हैं और प्रशासन भी खामोश है। जर्जर पुलिया पर आखिर आवागमन कितना सुरक्षित है इसे लेकर जिम्मेदार बेखबर हैं। पुलिया के ऊपर बनी साइड में सेफ्टी दीवारों पर कहीं जगह पाइप नहीं है तो कहीं डिवाइडर ही टूटकर गिर गए और कहीं गिरने की स्थिति में खड़े हैं। </p>
<p><strong>खामियाजा भुगत रही आम जनता</strong><br />ग्रामीणों का कहना है कि इस पुलिया पर कई बार बड़े हादसे भी हो चुके हैं परंतु जिम्मेदारों कि अनदेखी के चलते हादसे होते रहते है।  एक तरफ नदी तो दूसरी तरफ पुलिया खड़े ही खड़े हो रहे हैं। कैसे सफर सुरक्षित होगा। इस पुलिया से आए दिन अधिकारी व नेता निकालते रहते हैं परंतु किसी की नजर इस पुलिया के खड़ों व साइड में बने सेफ्टी दीवारों के पिलरों में कई जगह पाइप तक नहीं लगे हुए हैं। जिस पर आज तक किसी की नजर नहीं पड़ी। जिसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।  पुलिया पर इन दीनों तार नजर आने लगे हैं साइड में बने सेफ्टी दीवारों के पिलरों में लगे पाइप भी कई डिवाइडरों में नजर नहीं आ रहे हैं जिम्मेदारों को इस पर जल्द ही ध्यान देना चाहिए। </p>
<p><strong> बरसात में हालत और भी गंभीर</strong><br />  पुलिया की हालत बेहद खस्ता है। जिसमें काफी गहरे गड्ढे हो रहे हैं और अभी तो पुलिया के ऊपर के तार भी नजर आने लगे हैं। बरसात के दिनों में तो हाल ही रहता है कि बरसात के पानी से पुलिया के गड्ढों में पानी भर जाने के बाद हादसों को दावत  देते नजर आते हैं।  पुलिया के ऊपर साइड में पिलर में कई जगह पाइप नहीं लगे हुए हैं। वहां से वाहन चालक सहित राहगीरों के साथ-साथ  मवेशियों के गिरने का भी हादसा बना रहता हैञ प्रशासन को इस पर जल्द ही ध्यान देकर इसका कार्य करवाना चाहिए। </p>
<p><strong>पुलिया मरम्मत की मांग</strong><br /> सर्दी के दिनों में कोहरा छाने के बाद पुलिया पर कुछ नजर नहीं आता इसके चलते कई बार बड़े हादसे हो चुके हैं और आगे भी होने की संभावना बनी रहती है। आमजन ने मांग की है कि प्रशासन को इस पर जल्द ही ध्यान देकर इसकी मरम्मत करवानी चाहिए।</p>
<p>इस  स्टेट हाईवे राजमार्ग से यहां पर भारी व छोटे वाहन निकलते  हैं और यहां से हजारों गांव की आवाजाही बनी रहती है। इसके चलते पुलिया पर काफी गहरे गड्ढे हैं और इस पर कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। <br /><strong>- प्रमोद सुमन, कस्बा निवासी। </strong></p>
<p>बरसात के दिनों में तो हाल ही रहता है कि बरसात के पानी से पुलिया के गड्ढों में पानी भर जाने के बाद हादसों को दावत  देते नजर आते हैं।  <br /><strong>-  धनराज सुमन, समाजसेवक। </strong></p>
<p>स्टेट हाईवे अंधेरी नदी की पुलिया पर काफी गहरे गहरे गड्ढे हो रहे हैं।  यहां पर  बड़ा हादसा होने  की संभावना बनी रहती है।     <br />  <strong>- पीयूष मित्तल, कस्बा निवासी। </strong></p>
<p>इस पुलिया से आए दिन अधिकारी व नेता निकलते रहते हैं परंतु किसी की नजर इस पुलिया की क्षतिग्रस्त हालत पर नहीं गई।<br /><strong>- सत्यनारायण सेन, ग्रामीण। </strong></p>
<p>बजट के लिए उच्च अधिकारियों को अवगत करा रखा है। जैसे ही बजट पास  होगा। वैसे ही पुलिया को दुरूस्त कराने का कार्य  कर दिया जाएगा। साइड में सेफ्टी पिलरों पर भी पाइप नहीं है तो जल्द ही लगा दिय जाएंगे।<br /><strong>- नरेंद्र कुमार एक्सईएन, छबड़ा। </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बारां</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 25 Dec 2023 21:11:34 +0530</pubDate>
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                <title>कोटा में कुत्तों के हमले जारी, जिम्मेदार मौन</title>
                                    <description><![CDATA[शहर में श्वानों इनकी मौजूदगी बढ़ती जा रही है, इसके साथ यह खूंखार भी हो रहे हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/dog-attacks-continue-in-kota-responsible-silent/article-60361"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-10/sizte--(2)4.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा।<strong> केस 1 -</strong> स्टेशन क्षेत्र में गत दिनों चार वर्षीय बालक घर के बाहर खेल रहा था। उसी दौरान दो श्वान आए और उस पर हमला कर दिया। इससे घबराकर वह रोने लगा और परिजन उसे बचाने आते तब तक श्वानों ने उसके पैर में इतने घाव कर दिए कि उसे अस्पताल में भर्ती कराया पड़ा। </p>
<p><strong>केस 2 -</strong> बालिता रोड कुन्हाड़ी क्षेत्र में कुछ समय पहले चार श्वानों ने घर के आस-पास ही दो मासूम बच्चों पर हमला कर उन्हें गम्भीर रूप से घायल कर दिया था। 12 वर्षीय राकेश के गाल पर और डेढ़ वर्षीय वंश के चेहरे पर काटने से उन्हें गम्भर हालत में एमबीएस अस्पताल में भर्ती कराया गया था। </p>
<p><strong>केस 3 -</strong> महावीर नगर थाना क्षेत्र में नगर निगम कोटा दक्षिण की भाजपा पार्षद रीता सलूजा को स्कूटी पर जाते समय उनके घर के पास ही सम्राट चौराहे पर एक श्वान ने उनका पैर पकड़ लिया और  काट लिया। जिससे वे घबरा गई और उनकी स्कूटी का संतुलन बिगड़ गया। उनके पैर में श्वान का दांत गढ़ने से कई दिन तक निशान बना रहा।</p>
<p>वाघ बकरी चाय के मालिक पराग देसाई ने सोमवार तड़के अहमदाबाद में 49 वर्ष की उम्र में दम तोड़ दिया। देसाई पर 15 अक्टूबर को स्ट्रीट डॉग के झुंड ने हमला कर दिया था। देसाई उस समय मोर्निंग वॉक के लिए घर से निकले थे। श्वानों के हमले के कारण देसाई जमीन पर गिर पड़े थे और उन्हें ब्रेन हेमरेज हो गया था। यह दर्द विदारक घटना अहमदाबाद में जरूर हुई लेकिन यह हमारे शहर कोटा के नीति नियंताओं की आंख खोलने के लिए बहुत है। हमारे शहर में भी ऐसी ही स्थिति बनी हुई है। सुबह, शाम, दोपहर रात कभी भी आप पर कहीं भी श्वान हमला कर सकते हैं। शहर में लगातार इनकी मौजूदगी बढ़ती जा रही है। इसके साथ यह खूंखार भी हो रहे हैं। यदि इन पर नियंत्रण नहीं किया गया तो देसाई जैसी एक नहीं हमारे शहर में तो कई घटनाएं हो सकती है।</p>
<p><strong>बरसों की समस्या, नहीं हुआ स्थायी समाधान</strong><br />सरस्वती कॉलोनी निवासी एडवोकेट हरीश दिनकर के पुत्र को गत दिनों श्वानों ने हमला कर दिया था। बच्चा गंभीर घायल हो गया था। दिनकर कहते हैं  श्वानों के डर के कारण लोगों ने बच्चों को घर के बाहर खेलना बंद कर दिया है। श्वानों के झुंड देखते ही लोग उधर से रास्ता बदलने लगे हैं।निगम अधिकारी  श्वानों को पकड़ने पर सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन को आधार बनाकर बचने का प्रयास करते हैं और श्वान प्रेमी निगम की कार्रवाई का विरोध करते हैं। इन दोनों के कारण श्वानों की समस्या का स्थायी समाधान नहीं होने का खामियाजा आमजन को भुगतना पड़ रहा है। <br /><strong>- पीड़ित हरीश दिनकर एडवोकेट </strong></p>
<p><strong>झुंंड को देखते ही लोग डरने लगे हैं</strong><br />कोटा दक्षिण निगम के महापौर राजीव अग्रवाल तक के बेटे को भी श्वान अपना शिकार बना चुके हैं। आए दिन आवारा श्वान(स्ट्रीट डॉग) छोटे बच्चों से लेकर महिलाओं व बुजुर्गों तक पर हमला कर उन्हें घायल कर चुके हैं। जिससे श्वानों के झुंंड को देखते ही लोग डरने लगे हैं। राह चलते व वाहन सवार लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं। नगर निगम महापौर राजीव अग्रवाल कहते हैं सुप्रीम कोर्ट के आदेश की पालना में उन्हें वापस उसी जगह पर छोड़ना मजबूरी है। श्वानों की समस्या के समाधान के लिए पूर्व में लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखा जा चुका है। निगम श्वानों को श्वानशाला में रखकर  खिलाने को भी तैयार है।  वैक्सीनेशन के बाद फिर से उन्हें उसी जगह पर छोड़ने से इनकी संख्या में कोई कमी नहीं हुई है। वरन् लोगों में डर बढ़ता ही जा रहा है। <br /><strong>- पीड़ित राजीव अग्रवाल दक्षिण निगम के महापौर</strong></p>
<p><strong>दस हजार से अधिक का वैक्सीनेशन</strong><br />नगर निगम कोटा उत्तर व कोटा दक्षिण द्वारा श्वान शाला बनने के बाद दो साल में करीब दस हजार से अधिक श्वानों का बधियाकरण व टीकाकरण किया जा चुका है। लेकिन श्वानों की समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पा रहा है। </p>
<p><strong>इनका कहना</strong><br />नगर निगम ने श्वानों की समस्या के समाधान को देखते ही श्वान शाला बनाई है। यहां श्वानों को लाकर उनका वैक्सीनेशन व बधियाकरण किया जा रहा है। लेकिन <br /><strong>- राजीव अग्रवाल, महापौर, नगर निगम कोटा दक्षिण</strong></p>
<p>श्वानों की समस्या गम्भीर है। इसके लिए निगम अपने स्तर पर जो प्रयास कर सकता है वह कर रहा है। जहां से भी शिकायत आ रही है वहां टीम भेजकर पकड़वाया जा रहा है। लेकिन उन्हें श्वानशाला में रख नहीं सकते। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की पालना के हिसाब से ही काम करना पड़ रहा है। <br /><strong>-  मेहरा, महापौर, नगर निगम कोटा उत्तर</strong></p>
<p><strong>लोगों का कहना, श्वान मुक्त हो शहर</strong><br />शहर वासियों का कहना है कि जब शहर ट्रैफिक सिग् नल लाइट फ्री हो सकता है। कैटल फ्री हो सकता है तो फिर श्वान फ्री शहर क्यों नहीं हो सकता। दादाबाड़ी निवासी रीना शर्मा का कहना है कि घर से बाहर निकलते ही श्वानों के झुंड नजर आते हैं। आए दिन श्वानों के काटने की खबरे पढ़कर उन्हें देखते ही डर लगने लगा है। स्कूटर पर जाते समय भी पीछे से  श्वानों के पैर पकड़ने व काटने का डर बना रहता है। श्वानों को शहर से दूर किया जाना चाहिए। </p>
<p>किशोरपुरा निवासी शाहिदा खान का कहना है कि उनके क्षेत्र में इतने अधिक श्वान हैं कि अब तो बच्चों को घर से बाहर खेलने भेजने तक से डर लगने लगा है। कई बच्चों को काटने की घटनाएं होने से सावधानी रखना जरूरी है। जबकि नगर निगम को चाहिए कि वह मवेशियों की तरह ही इन्हें भी पकड़कर शहर से दूर करे। बजरंग नगर निवासी मोतीलाल मालव का कहना है कि उनके मौहल्ले में श्वान कई बच्चों को काट चुके हैं। जिससे बच्चे ही नहीं महिलाएं व बुजुर्ग भी डरे हुए हैं। श्वानों की समस्या का स्थायी समाधान होना ही चाहिए। श्वान पकड़ने का विरोध करना गलत है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 24 Oct 2023 19:00:39 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>अलर्ट: एक पल में सैकड़ों को मौत की नींद सुला सकती हैं स्लीपर बसें</title>
                                    <description><![CDATA[ ग्लोबल स्टडीज से यह पता चला है कि हाईवे और ग्रामीण सड़कों पर यात्रा करते समय ड्राइवरों के सो जाने की संभावना अधिक होती है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/alert--sleeper-buses-can-put-hundreds-to-death-in-a-moment/article-51200"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-07/alert-ek-pal-me-sekdo-ko-maut-ki-nind-sula-skti-h-sleeper-buse...kota-news-08-07-2023.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। बुलढाणा हादसे के बाद स्लीपर बसों के सुरक्षित होने पर प्रश्नचिन्ह खड़े हो गए।  इनकी डिजाइन ही इतनी खतरनाक  है कि यह बसें कभी भी दुर्घटना का शिकार हो सकती हैं। छोटा सा शॉर्ट सर्किट एक पल में बस को आग का गोला बना सकता है।  पिछले दिनों बुलडाना बस हादसे के बाद इन बसों में यात्रा करने वाले यात्रियों में भय सा बैठ गया है। दूसरी तरफ बस मालिक बिना सुरक्षा इंतजामों के धडल्ले से ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने के चक्कर में इनका मन माफिक मैन्युफैक्चरिंग करवाकर यात्रियों की जान से खेल रहे हैं।  कोटा में 80 स्लीपर बसें रजिस्टर्ड हैं जब कि 150 से अधिक बसें आवागमन करती हैं। जानकार बताते हैं, 12 मीटर लंबी और 10 फीट उंची बसों का झुकाव एक तरह अधिक रहने से पलटने का खतरा अधिक रहता है। वहीं, बसों को लग्जरी रूप देने के लिए एसेसरीज का बढ़ता चलन शॉर्ट सर्किट के रूप में घातक साबित हो रहा है और आगजनी की घटनाएं बढ़ रही हैं। वहीं, बसों की फिटनेस जांचने के लिए परिवहन विभाग द्वारा प्राइवेट एजेंसी को ठेका दिया हुआ है। जिस पर सरकारी कोई नियंत्रण नहीं है। ऐसे में सांठगांठ से अनफिट बसों को भी फिटनेस सर्टिफिकेट मिलने का अंदेशा रहता है। इन सबके बीच यात्रियों की जान दांव पर लगी रहती है।</p>
<p><strong>प्राइवेट संस्था को फिटनेस जांचने का ठेका</strong><br />आरटीओ से मिली जानकारी के अनुसार कोटा में 80 स्लीपर बसें रजिस्टर्ड हैं। जिनसे परिवहन विभाग 520 रूपए प्रति सीट के हिसाब से टैक्स वसूलता है। लेकिन, खुद इन बसों की फिटनेस नहीं जांचता। परिवहन विभाग मुख्यालय ने प्रत्येक जिले में प्राइवेट संस्था को बसों की फिटनेस जांचने का ठेका दिया हुआ है, जिस पर सरकारी नियंत्रण नहीं होता। ऐसे में सांठगांठ की आशंका रहती है। हालांकि, आरटीओ रोड पर चल रही बसों की निर्धारित पैरामीटर पर जांच करते हैं। </p>
<p><strong>ड्राउजीनेस अलर्ट सिस्टम न होना </strong><br />एक्सपर्ट बताते हैं, अधिकतर स्लीपर बसों में ड्राउजीनेस अलर्ट सिस्टम नहीं होता। ड्राउजीनेस अलर्ट सिस्टम नींद आने पर ड्राइवर को अलर्ट करता है। यह सिस्टम स्टीयरिंग के विभिन्न हिस्सों में लगे सेंसर और डैशबोर्ड पर कैमरे का उपयोग करता है। चालक के नींद या झपकी में सिस्टम बीप की तेज आवाज से सो रहे ड्राइवरों को सचेत करता है। </p>
<p><strong>सर्वे में ड्राइवरों ने किया स्वीकार</strong><br />सड़क परिवहन मंत्रालय ने वर्ष 2018 में 15 राज्यों में ड्राइवरों पर एक सर्वे किया था। इस सर्वे में शामिल करीब 25 ड्राइवरों ने स्वीकार किया था कि गाड़ी चलाते समय वे सो गए थे। ग्लोबल स्टडीज से यह भी पता चला है कि हाईवे और ग्रामीण सड़कों पर यात्रा करते समय ड्राइवरों के सो जाने की संभावना अधिक होती है। साथ ही आधी रात से सुबह 6 बजे के बीच इस तरह की घटनाएं होने की संभावना ज्यादा होती है।</p>
<p><strong>चीन 11 साल पहले लगा चुका बैन </strong><br />चीन में वर्ष 2009 के बाद स्लीपर बस से जुड़े 13 हादसे हुए। इस दौरान 252 लोगों की मौत हो गई। वहीं, 2011 में हेनान प्रांत में एक स्लीपर बस में आग लगने से 41 लोगों की मौत हो गई थी। 28 अगस्त 2012 को शानक्सी प्रांत में एक हाईवे पर स्लीपर बस मेथनॉल ले जा रही टैंकर से टकरा गई। बस में आग लगने से 36 लोगों की मौत हो गई थी। इसके बाद चीन में स्लीपर बसों के नए रजिस्ट्रेशन पर बैन लगा दिया था।</p>
<p><em><strong>बॉडी मैकेनिक एक्सपर्ट ने बताई हादसों की प्रमुख वजह<br /></strong></em><br /><strong>बस में जगह की तंगी, हिलना-डुलना मुश्किल  </strong><br />स्लीपर बसें यात्रियों को सोने की सुविधा तो देती है लेकिन आने-जाने के लिए जगह बहुत कम होती है। बीच में छोटी सी गैलरी होती है। दुर्घटना के समय यात्री इसमें से निकल नहीं सकते। <br /><br />आम तौर पर स्लीपर कोच में 30 से 36 सीट होती है।  मल्टी-एक्सल कोचों में सीटों की संख्या 36-40 के बीच होती है। सभी बर्थ की लंबाई लगभग 6 फीट और चौड़ाई 2.6 फीट होती है। बस मालिक इसमें काफी फैरबदल करवा लेते हैं। जो दुर्घटना के बायस बनते हैं।</p>
<p><strong>बसों की ऊंचाई का अधिक होना</strong><br />स्लीपर बसें आमतौर पर 8 से 9 फीट ऊंची होती हैं। लेकिन, बस मालिक लगेज के लिए दो डिग्गी पैनल बनवाते हैं, जिससे बसों की उंचाई 10 से 12 फीट तक पहुंच जाती है।  हाइवे पर घुमाव के दौरान बस अचानक एक तरफ झुक जाने से पलट जाती है। </p>
<p><strong>ड्राइवर की ओवर वर्किंग</strong> <br />ज्यादातर स्लीपर बसें 300 से 1000 किमी का सफर रात में ही तय करती हैं।  लंबे रूट में ड्राइवर के थकने और झपकी आ जाने की संभावना पूरी होती है। अधिकतर हादसे रात 2 से 5 बजे के बीच ही हुए हैं। बुलढाणा हादसे में बस पर नियंत्रण खोने से पहले ड्राइवर को झपकी आने की बात भी सामने आई है। तभी बस हाइवे पर पोल से टकराई। </p>
<p><strong>शार्ट सर्किट बड़ा कारण</strong><br />स्लीपर कोच में बाडी तैयार करवाते समय मालिक मनमाने तरीके से पंखे, चार्जिंग प्वाइंट,एसी विन्डो,पंखे आदि लगा देते हैं जो शार्ट सर्किट का कारण बनते हैं। </p>
<p><strong>2020 से 2021 तक हुए बड़े हादसे</strong><br />जनवरी 2020 - यूपी के कन्नौज में स्लीपर बस में आगे से 20 यात्रियों की मौत <br />जून 2022 - कर्नाटक के कलबुर्गी जिल के कमलापुरा कस्बे के पास  हादसे में 7 लोगों की मौत । <br />अक्टूबर 2022 - यवतमाल से मुंबई जा रही स्लीपर बस के नासिक के पास ट्रेलर से टकराने के बाद आग लगी। 12 लोगों की मौत हो। आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे पर स्लीपर बस  डंपर से टकरा गई। 4 यात्रियों की मौत, 42 लोग घायल। <br />11 मार्च 2022 - बारां जिले में नेशनल हाइवे 27 पर स्लीपर कोच बस पलट गई। बस में सवार 21 यात्री गंभीर घायल हो गए। यह बस अहमदाबाद से कानपुर जा रही थी।<br />1 जुलाई 2023 - महाराष्टÑ के बुलढाणा में समृद्धि हाइवे पर देर रात डिवाइर से टकराने के बाद स्लीपर बस में आग लग गई। इससे 25 यात्री जिंदा जल गए। </p>
<p><strong>मैं सो जाता तो न जाने कितने लोग जिंदा जल जाते</strong><br /><strong>आंखों देखी </strong><br />परिवार सहित जोधपुर से कोटा आ रहा था। बस में करीब 80 से 100 यात्री सवार थे। रात 3 बजे का समय था। मैं जगा हुआ था। हमारी वोल्वो बस ब्यावर से 25 किमी दूर नेशनल हाइवे पर थी। रास्ते में ढाबा आया, वे लोग बस की ओर देखकर इशारा कर रहे थे लेकिन ड्राइवर ने ध्यान नहीं दिया।  दूसरे ट्रक चालक ने बस के पास आकर बताया कि भाई बस में आग लग रही है। आग बस के आगे के हिस्से में शोर्ट सर्किट से लगी थी। यात्रियों को खिड़कियां बजा बजा कर जगाया। तब तक आग की लपटे केबीन को चपेट में ले चुकी थी।  चीख-पुकार मचने लगी। ईश्वर की कृपा से समय रहते सभी यात्रियों को सह कुशल बाहर निकाल लिया। 5 मिनट में ही लग्जरी वोल्वो खाक में बदल गई। हादसे में बूंदी के तालेड़ा में बेटी को पेरावहनी पहनाने जा रहे एक माता-पिता का 9 तोला सोना और कपड़ों का ढेर जलकर राख हो गया। <br /><strong>- कपिल सिंह केशवपुरा सैक्टर 7 निवासी</strong></p>
<p><strong>स्लीपर बसें बंद होनी चाहिए</strong><br />मैं कोटा से जोधपुर विवाह समारोह के लिए जा रहा था। गर्मी के दिन थे। रात में बस में एसी चल रहा था। तड़के 4 बजे बिलाड़ा से पहले अचानक बस के पिछले हिस्से में किसी ने लपटें उठती देखी। बस चालक को बताया तो बस रोकी और सभी सवारियों को निकाला। कुछ ही पलों में बस खाक हो गई। केवल इनसान बचे। ऐसी बसों को अब बंद कर देना चाहिए यह बहुत खतरनाक हैं।<br /><strong>- दुर्गा शंकर पाटीदार, जय हिन्द कॉलोनी निवासी </strong></p>
<p>स्लीपर बसें सुरक्षित हैं या नहीं, इसका फैसला भारत सरकार करती है। परिवहन विभाग मुख्यालय ने बसों की फिटनेस जांचने के लिए प्राइवेट संस्था को ठेका दिया है। वहीं, आरटीओ इंस्पेक्टर भी हाइवे व शहरी सड़कों से गुजरने वाली बसों की निर्धारित मापदंड के अनुरूप बसों की फिटनेस जांचते हैं। <br /><strong>- दिनेश सिंह सागर, अतिरिक्त प्रादेशिक परिवहन अधिकारी कोटा</strong></p>
<p>गाड़ियों की आधा व एक फीट लंबाई बॉडी बिल्डर खुद बढ़ाते थे। लेकिन यह दो साल पहले तक होता था। अब यह बंद हो गया है।  सरकार पीछे की तरफ इमरजेंसी गेट बनाने की परमिशन नहीं देती है। यदि, इजाजत बने तो हम बड़ा गेट बनवाएंगे। बस पलटने व आगजनी की घटना के दौरान कांच तोड़कर या एक्जिट गेट से बाहर निकलने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। वर्ष 2017 में सरकार ने एक नियम बनाया था, जिसके तहत बॉडी बिल्डर को लिखकर देना होता था कि वह बस में क्या-क्या सामान लगा रहा है। लेकिन, यह नियम भी बंद हो गया। बस में लगाए गए मेटेरियल की क्वालिटी जांच नहीं होती।1000 किमी की दूरी पर दो ड्राइवर होते हैं और 500 से कम दूरी वाली बसों में सिंगल ड्राइवर होता है। बसों में लगातार हो रही घटनाओं के मद्देनजर एसोसिएशन की बैठक कर सुरक्षा को लेकर सभी जरूरी इंतजाम किए जाएंगे। <br /><strong>- अशोक कुमार, अध्यक्ष, कोटा ट्रेवल एसोसिएशन </strong></p>
<p>आज से करीब 5 साल पहले तक आरटीओ ट्रैक्टर-ट्रॉली की डिजाइन व उसमें लगे इलेक्ट्रिक पार्ट्स सहित अन्य मेटेरियल जांचने के लिए राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय में भेजा जाता था। यहां लैब में मेटेरियल की गुणवत्ता व स्टेबिलिटी की जांच की जाती थी लेकिन अब यह वाहन नहीं आते। आरटीओ को बॉडी बिल्डर द्वारा बनाई गई बसों की बॉडी का डिजाइन, वायरिंग, सीट कवर, स्पंच सहित अन्य हाडवेयर व वायरिंग से संबंधित मेटेरियल की टेस्टिंग करवानी चाहिए। बस के अंदर लगने वाले उपकरणों की गुणवत्ता परखी जानी बेहद जरूरी है।<br /><strong>- मनीष चतुर्वेदी, प्रोफेसर मैकेनिकल विभाग, आरटीयू</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 08 Jul 2023 12:48:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
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                <title>तापमान और भी ज्यादा होगा खतरनाक</title>
                                    <description><![CDATA[एक जलवायु घटना जिसे अल नीनो के नाम से जाना जाता है वह बढ़ेगी। इसके कारण दुनिया भर में गर्मी के नए रिकॉर्ड बन सकते हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/the-temperature-will-be-even-more-dangerous/article-44635"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-05/manoj-(630-×-400-px)-(7)7.jpg" alt=""></a><br /><p>वॉशिंगटन। संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि आने वाले महीनों में दुनिया भर में भीषण गर्मी देखने को मिल सकती है। वॉर्निंग के मुताबिक एक जलवायु घटना जिसे अल नीनो के नाम से जाना जाता है वह बढ़ेगी। इसके कारण दुनिया भर में गर्मी के नए रिकॉर्ड बन सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र के विश्व मौसम विज्ञान संगठन के मुताबिक अनुमान है कि अल नीनो के जुलाई के अंत तक विकसित होने की 60 फीसदी संभावना है। सितंबर तक इसके होने की 80 फीसदी संभावना है।  अल नीनो एक जलवायु घटना है, जिसमें मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह गर्म हो जाती है। इससे दुनिया भर के मौसम के पैटर्न पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। अल नीनो शब्द का इस्तेमाल मूल रूप से पेरू के मछुआरों की ओर से एक गर्म महासागरीय प्रवाह का वर्णन करने के लिए किया जाता है। अल नीनो के कारण दुनिया में बारिश का क्रम बिगड़ सकता है। इसके कारण कई इलाकों में भीषण बारिश तो कई में सूखा पड़ सकता है। आखिरी बार यह 2018-19 में दिखा था।</p>
<p><strong>पिछले आठ साल रहे सबसे गर्म</strong><br />हालांकि 2020 के बाद दुनिया में असाधारण रूप से ला नीना देखने को मिला। ला नीना अल नीना का विपरीत होता है, जिसमें समुद्री सतह का तापमान गिरता है। इस साल की शुरूआत में ला नीना खत्म हो गया है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि ला नीना के होने के बावजूद पिछले आठ साल अब तक के सबसे गर्म वर्षों में से एक हैं। अगर ला नीना न होता तो गर्मी और भी खतरनाक हो सकती थी। विश्व मौसम विज्ञान संगठन प्रमुख पेटेरी तालस ने एक बयान में कहा, ला नीना ने वैश्विक तापमान वृद्धि पर एक अस्थायी ब्रेक के रूप में काम किया।</p>
<p><strong>अगले साल दिखेगा असर</strong><br />उन्होंने आगे चेतावनी दी है कि अल नीनो के कारण गर्मी अब नए रिकॉर्ड बना सकती है। फिलहाल अल नीनो कितना खतरनाक होगा, इसकी जानकारी नहीं है। पिछला अल नीनो कमजोर माना जाता है। लेकिन इससे पहले 2014 से 2016 के बीच के अल नीनो को बेहद ताकतवर माना जाता है। हटड के मुताबिक 2016 सबसे गर्म वर्ष रहा। वैश्विक तापमान पर अल नीनो का असर तुरंत नहीं पड़ता, जबकि इसके उभरने के एक साल बाद यह दिखता है। यानी इसका असली प्रभाव 2024 में दिखेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 04 May 2023 10:42:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>खतरनाक मंसूबा पाले 200 से ज्यादा आतंकवादी लॉन्च पैड पर सक्रिय</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर में 200 से ज्यादा आतंकवादी घुसपैठ की फिराक में है। खुफिया रिपोर्ट के अनुसार पीओके स्थित लॉन्च पैड पर यह आतंकवादी घुसपैठ के इंतजार में हैं। एक शीर्ष अधिकारी ने खुफिया इनपुट का हवाला देते हुए कहा कि इस रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए, सीमा सुरक्षा बल और सेना की एलओसी पर पेट्रोलिंग और अधिक बढ़ा दी गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/more-than-200-terrorists-with-dangerous-intentions-active-on-the-launch-pad/article-13558"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-07/v-3.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर में 200 से ज्यादा आतंकवादी घुसपैठ की फिराक में है। खुफिया रिपोर्ट के अनुसार पीओके स्थित लॉन्च पैड पर यह आतंकवादी घुसपैठ के इंतजार में हैं। एक शीर्ष अधिकारी ने खुफिया इनपुट का हवाला देते हुए कहा कि इस रिपोर्ट को ध्यान में रखते हुए, सीमा सुरक्षा बल और सेना की एलओसी पर पेट्रोलिंग और अधिक बढ़ा दी गई है। अधिकारी ने बताया कि आतंकवादी जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ के लिए सुरंग और नदी रास्ते की योजना बना रहे हैं। इन आतंकवादियों का संबंध लश्कर-ए-तैयबा  जैश-ए-मोहम्मद (खीट) और हिजबुल मुजाहिदीन से है। पूर्व में आतंकवादियों की ओर से घुसपैठ के लिए अपनाए जाने वाले रास्तों का पदार्फाश होने की वजह से वे सुरंग और नदी इलाकों से घुसपैठ की योजना बना रहे हैं। एक अन्य अधिकारी ने बताया कि आतंकवादी अब राजौरी-पुंछ मार्ग, पीर पंजाल के दक्षिण के इलाकों से घुसपैठ की कोशिश कर रहे हैं। घुसपैठ के लिए अब इनका फोकस काफी हद तक पीर पंजाल के दक्षिण में चला गया है वहीं कश्मीर घाटी में घुसपैठ अन्य मार्गों की तुलना में कम हुई है।</p>
<p>नियंत्रण रेखा के पार इन लॉन्च पैड्स के बारे में इनपुट महत्वपूर्ण हैं क्योंकि 43 दिनों तक चलने वाली अमरनाथ यात्रा दो साल के अंतराल के बाद 30 जून को शुरू हुई है और लाखों तीर्थयात्री केंद्र शासित प्रदेश का दौरा कर रहे हैं। इस साल अब तक घाटी में नियंत्रण रेखा के पास घुसपैठ की अधिकांश कोशिशों को नाकाम कर दिया गया है। वहीं घुसपैठ के प्रयास में कई आतंकवादी मारे गए हैं। अधिकारी ने बताया कि इस साल 28 जून तक 121 आतंकवादी मारे गए और अधिकतम संख्या लश्कर (68), जेएम (29) और एचएम (16) से जुड़े ओवर ग्राउंड वर्कर्स की थी, जबकि विदेशी आतंकवादियों की संख्या लगभग शून्य थी। मारे गए 121 आतंकवादियों में से सात अज्ञात थे और एक इस्लामिक स्टेट जम्मू-कश्मीर (आईएसजेके) का था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 Jul 2022 12:59:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>दुनिया की सबसे खतरनाक सड़क भारत में... जानने के लिए पढ़े यह ख़बर</title>
                                    <description><![CDATA[दुनिया के सबसे खतरनाक रोड रूट के बारे में बताते हैं, जो भारत में ही स्थित है। जी हां, इन सड़कों को किलर से किश्तवाड़ सड़क के नाम से जाना जाता है। अगर आप ऐसी चुनौतियों का सामना करने के लिए बिल्कुल भी नहीं डरते, तो एक बार इस जगह की यात्रा जरूर करें।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/worlds-most-dangerous-road-in-india-read-this-news-to/article-13313"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-06/v-1.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>श्रीनगर।</strong> क्या आप भी एडवेंचर के लिए तरस रहे हैं? अगर हां, तो चलिए आज हम आपको दुनिया के सबसे खतरनाक रोड रूट के बारे में बताते हैं, जो भारत में ही स्थित है। जी हां, इन सड़कों को किलर से किश्तवाड़ सड़क के नाम से जाना जाता है। अगर आप ऐसी चुनौतियों का सामना करने के लिए बिल्कुल भी नहीं डरते, तो एक बार इस जगह की यात्रा जरूर करें। असल में ये सड़क काफी टूटी हुई है, साथ ही पहाड़ भी काफी नीचे की ओर झुके हुए और ये रास्ता 114 किमी लंबा है।</p>
<p><br /><strong>उबड़-खाबड़ सड़क</strong> <br />जम्मू क्षेत्र के किश्तवाड़ जिले के पूर्वी छोर पर स्थित किलार से किश्तवाड़ रोड वाला रास्ता बेहद पतला है। इस रास्ते पर आपको तेज हवा का एहसास होगा और किनारों पर किसी भी तरह की रेल भी नहीं लगी हुई है। यहां का सबसे खतरनाक हिस्सा 1000 फीट की खड़ी घाटी है।</p>
<p><br /><strong>किलर टू किश्तवाड़ रोड</strong> <br />अगर आप किल्लार से किश्तवाड़ रोड को कवर करने की प्लानिंग कर रहे हैं, तो इतनी ऊंचाई से किनारे से नीचे देखने की कोशिश भी न करें। ऐसी खड़ी ऊंचाई वाली ये सड़क देखने में ही बेहद खतरनाक है, ऐसे में अगर आप यहां से यात्रा करना चाहते हैं, तो सड़क के साइड से निकलते हुए नीचे की तरफ बिल्कुल भी न देखें।  सड़क के बारे में बताएं तो सड़क थोड़ी बजरी वाली, पथरीली और रेतीली है। साथ ही चट्टान भी इतनी झुकी हुई है कि इंसान को झुककर चलना पड़े। सबसे खतरनाक हिस्सा एक तरफ चंद्रभागा में 1000 फीट फ्रीफॉल और दूसरी तरफ एक पहाड़ी चट्टान है। सड़क पर ज्यादातर भूस्खलन की समस्या देखने को मिलती रहती है और हर समय लगभग खंडहर में रहती है। एक कारण है कि इस सड़क को कि दुनिया की सबसे खतरनाक सड़कों में से एक का खिताब दिया गया है। इसलिए प्लान करने से पहले अपनी सुरक्षा का भी ध्यान जरूर रखें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Jun 2022 16:30:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>खतरनाक लत: पबजी गेम से बच्चों पर पड़ रहा है बुरा असर</title>
                                    <description><![CDATA[ अभिभावकों की अनदेखी और बच्चों के हिंसक होने के कारण ऐसे केस देखने को मिलते हैं। इस केस ने हमें ये सोचने पर मजबूर किया है कि क्या वाकई बच्चों की गलती है या पेरेटिंग में ही कुछ कमी है। बच्चों के साथ आपको कुछ बातों को अवॉइड करना चाहिए।  ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/dangerous-addiction-pubg-game-is-having-a-bad-effect-on/article-12107"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-06/63.jpg" alt=""></a><br /><p>आज के समय में बच्चों में फोन और गेम की लत बढ़ती जा रही है इसका खामियाजा हमें समय-समय पर देखने को मिलता है और ऐसा ही एक केस लखनऊ में सामने आया जिसमें मां के बच्चे को गेम खेलने से रोके जाने पर उसने अपनी मां को मार दिया।</p>
<p><span style="color:#ff0000;"><strong>एक्सपर्ट का मानना है </strong></span></p>
<p>अभिभावकों की अनदेखी और बच्चों के हिंसक होने के कारण ऐसे केस देखने को मिलते हैं। इस केस ने हमें ये सोचने पर मजबूर किया है कि क्या वाकई बच्चों की गलती है या पेरेटिंग में ही कुछ कमी है। बच्चों के साथ आपको कुछ बातों को अवॉइड करना चाहिए।  </p>
<p>लखनऊ में हाल ही में एक केस सामने आया है जिसमें एक 16 साल के नाबालिग ने अपनी मां को इसलिए मार डाला क्योंकि उसकी मां ने पबजी गेम खेलने से मना किया था। बच्चे ने इस बात का बदला लेने के लिए मां को गोली मारकर हत्या कर दी। यही नहीं,इससे पहले भी मां और बेटे के बीच गेम की लत को लेकर बहस हो चुकी थी ,और मां ने बच्चे पर हाथ भी उठाया था और बच्चा लंबे अरसे से मां के हिंसक व्यवहार से परेशान था। इस केस के बाद मोबाइल खेलने की खतरनाक लत और पेरेंंटग पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं।  </p>
<p><span style="color:#ff0000;"><strong>अगर बच्चे को हिंसक होने से रोकना है तो आपको इन आदतों को अवॉइड करना चाहिए।</strong></span></p>
<p>आप बच्चों के सामने या उनके लिए आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग न करें, इससे बच्चों के मन पर बुरा असर पड़ता है।</p>
<p>आप बच्चे को प्यार से समझाएं और दोबारा वही काम करने पर आप उसे बार-बार टोकने से बचें, इससे वह जिद्दी बन जाते हैं। </p>
<p>आपको हर हाल में अपने बच्चे को मारने से या तेज चिल्लाने से बचना है, बच्चे अपना अपमान नहींं पाते।  </p>
<p>बच्चों को समय दें, इतने व्यस्त न हों कि बच्चे अकेला महसूस करें।</p>
<p>आप बच्चे को अन्य बच्चों से कंपेयर न करें, बच्चों की तुलना करने पर उनमें ईर्ष्या के भाव आ जाते हैं। </p>
<p><span style="color:#ff0000;"><strong>लक्षणों को नोटिस करें </strong></span></p>
<p>आपके बच्चे में कुछ अलग लक्षण नजर आएं तो उस पार गौर करें। </p>
<p>बच्चा पहले से ज्यादा जिद्दी हो जाए। </p>
<p>बच्चा बात करना कम कर दें। </p>
<p>-बात-बात पर बच्चे का रोना। </p>
<p>यादा खाने या सेवन या खाना कम लेना। </p>
<p>मिलना-जुलना बंद कर देना।</p>
<p>बात-बात पर मरने-मारने की बात करना।  </p>
<p>आज की भागती लाइफ का असर बच्चों पर पड़ रहा है।  माता-पिता बच्चों को समय नहीं दे पाते जिसके कारण वो अकेला महसूस करते हैं और अपना एंटरटेंमेंट खोजने के लिए  गेम की लत का शिकार हो जाते हैं ।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>शिक्षा जगत</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 14 Jun 2022 13:06:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अलर्ट: एक्यूआई पहुंचा 200 पर, शहर की हवा हुई खतरनाक</title>
                                    <description><![CDATA[ शहरवासियों को अब सावधान हो जाना चाहिए ।  शहर का एयर क्वालिटी इंडेक्स (वायु गुणवत्ता सूचकांक) 200 तक पहुंच गया है। यह मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक माना जाता है। यानि अब यहां की हवा काफी प्रदूषित हो चुकी है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/alert-aqi-reaches-200-city-air-becomes-dangerous/article-11808"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-06/114.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहरवासियों को अब सावधान हो जाना चाहिए ।  शहर का एयर क्वालिटी इंडेक्स (वायु गुणवत्ता सूचकांक) 200 तक पहुंच गया है। यह मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक माना जाता है। यानि अब यहां की हवा काफी प्रदूषित हो चुकी है। इसका कारण शहर में चल रहे विकास कार्य हैं। हवा के साथ उड़ रही मिट्टी व अन्य निर्माण सामग्री से वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है। पिछले कुछ दिनों से यही स्तर बना हुआ है। <br /><br /><strong>हवा में सांस लेना भी घातक</strong><br />शहर में इस समय चारों तरफ निर्माण कार्य चल रहे हैं। रोजाना सैंकड़ों वाहनों से निर्माण सामग्री का परिवहन किया जा रहा है। वहीं विभिन्न स्थानों पर निर्माण सामग्री के ढेर पड़े हुए, जो हवा के स्तर को प्रदूषित कर रहे हैं। निर्माण स्थलों पर कार्य के दौरान सामग्री के कण उड़कर हवा में मिलते रहते हैं। इससे अब हवा में सांस लेना भी घातक साबित हो रहा है। वहीं इस वर्ष शुष्क व गर्म मौसम की परिस्थितियां भी वायु के हिसाब से अनुकूल नहीं थी। अन्य वर्षों की तुलना में इस साल मार्च माह में ही गर्मी ने असर दिखाना शुरू कर दिया था। गर्म मौसम ने हवा का स्तर का भी गड़बड़ा दिया। गर्मी के मौसम में तेज हवाएं भी चली थी। जिसके कारण धूल व अन्य निर्माण सामग्री के कण हवा में घुल गए और वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ गया।<br /><br /><strong>कोरोनाकालमें शुद्ध हो गई थी हवा</strong><br />कोरोना का प्रभाव अब आबोहवा में भी खत्म होने लगा है। दो साल तक गर्मियों में धूल भरी हवा बहने के बावजूद वायु काफी हद तक स्वच्छ रही थी। हवा में सांस लेना भी आसान हो रहा था, लेकिन इस साल फिर से हवा में धूल कणों, अन्य हानिकारक गैसों और वाहनों के उत्सर्जी पदार्थों से हवा दूषित होती जा रही है। इस बार जून के प्रथम सप्ताह में वायु गुणवत्ता सूचकांक सामान्य स्तर से काफी ज्यादा बढ़ गया था। जबकि कोरोना की प्रथम लहर के समय वर्ष 2020 में एक्यूआई 100 के नीचे आ गया था। वर्ष 2021 में भी भीषण गर्मी के दौर में दूसरी लहर के समय एक्यूआई 100 के पास ही था। <br /><br /><strong>हरियाली मतलब शुद्ध हवा</strong> <br />शहर में विकास कार्यो के चलते कई क्षेत्रों से हरियाली का सफाया हो गया है। ऐसे में यहां की आबोहवा ज्यादा प्रदूषित हो रही है। चारों तरफ उड़ती धूल ने प्रदूषण का स्तर काफी बढ़ा दिया है। वहीं शहर में पेड़-पौधों से सटे क्षेत्र अभी भी प्रदूषण के स्तर को कम करने के माध्यम बने हुए हैं। अन्य क्षेत्रों के तुलना में यहां की हवा शुद्ध होती है। <br /><br /><strong>यह होता है एक्यूआई</strong><br />एक्यूआई में पार्टिकुलेट मेटर यानि धूल के कणों का मापन होता है। धूल कण 10 माइक्रोन और 2.5 माइक्रोन तक मापे जाते हैं। इसके अलावा हवा में नाइट्रोजन डाई आॅक्साइड, सल्फर डाई आॅक्साइड, कार्बन  मोनोक्साइड व ओजोन मापी जाती है। इसकी इकाई माइकोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर होती है। एक्यूआई के माध्यम से ही यह पता चलता है कि हवा में प्रदूषण का स्तर कहां तक पहुंच चुका है और इसके प्रमुख कारण क्या हैं। इसके बाद हवा के स्तर में सुधार के प्रयास किए जाते हैं। <br /><br /><strong>एक्यूआई यह देता है संकेत</strong><br /> अच्छा यानि कोई दिक्कत नहीं    0-100<br /> बाहर जाने से बचें    101-200<br /> श्वसन के मरीजों को तकलीफ    201-300<br /> लम्बे बीमार रोगियों को दिक्कत    301-400<br /> बाहर बिलकुल नहीं निकलें    401-500<br /><br />कोरोना काल में निर्माण गतिविधियां व वाहनों का संचालन बंद होने से शहर की हवा काफी शुद्ध हो गई थी। इस समय चारों तरफ निर्माण कार्य चल रहे हैं। ऐसे में निर्माण सामग्री के कण हवा में मिलकर प्रदूषण का स्तर बढ़ा रहे हैं। वहीं इस बार गर्म मौसम से भी काफी फर्क पड़ा है। ऐसे में एक्यूआई 200 तक पहुंच गया, जो सामान्य से अधिक है।<br /><strong>- अमित सोनी, संभागीय अधिकारी, राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jun 2022 14:21:17 +0530</pubDate>
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