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                <title>Space Research - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>Space Research RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>SSLV के पहले चरण के बेहतर संस्करण का सफल परीक्षण,  600 से अधिक अलग-अलग मानकों की जांच  : ISRO</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने श्रीहरिकोटा में छोटे उपग्रह प्रक्षेपण यान (एसएसएलवी) के पहले चरण (एसएस1) के उन्नत संस्करण का सफल जमीनी परीक्षण पूरा कर लिया है। इस सुधार से रॉकेट की क्षमता में लगभग 100 किलोग्राम अतिरिक्त पेलोड ले जाने की बढ़ोतरी होगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/isro-successfully-tests-improved-version-of-first-stage-of-sslv/article-162814"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-08/isro2.png" alt=""></a><br /><p>चेन्नई। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने छोटे उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने वाले रॉकेट एसएसएलवी के पहले चरण के बेहतर संस्करण का जमीनी परीक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया है। इसरो के अनुसार, यह परीक्षण 11 अगस्त को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में किया गया। परीक्षण के दौरान रॉकेट के पहले चरण में इस्तेमाल होने वाली ठोस मोटर को जमीन पर चलाकर उसके प्रदर्शन की जांच की गयी।</p>
<p>एसएसएलवी के पहले चरण एसएस1 में कई सुधार किए गए हैं। इनमें मोटर के दो हिस्सों में ईंधन के जलने की गति बढ़ाना, गर्मी से बचाने वाली सुरक्षा प्रणाली में सुधार और नोजल की निर्माण प्रक्रिया को आसान बनाना शामिल है। इसके साथ ही मोटर का वजन भी कम किया गया है। इसरो ने बताया कि परीक्षण के दौरान 600 से अधिक अलग-अलग मानकों की जांच की गयी। इनमें मोटर के शुरू होने, ईंधन के जलने, उसकी मजबूती, तापमान, कंपन और आवाज से जुड़े पहलू शामिल थे।</p>
<p>परीक्षण से मिले आंकड़ों के अनुसार मोटर का प्रदर्शन इसरो के अनुमान के काफी करीब रहा। इस परीक्षण के सफल होने के साथ एसएसएलवी के पहले चरण में किए गए सुधारों को मंजूरी मिल गयी है। इसरो के मुताबिक, बेहतर एसएस1 को एसएसएलवी में शामिल किए जाने के बाद यह रॉकेट पृथ्वी की निचली कक्षा में करीब 100 किलोग्राम अधिक वजन के उपग्रह ले जा सकेगा। एसएसएलवी को इसरो ने छोटे उपग्रहों को कम समय में और जरूरत के मुताबिक अंतरिक्ष में भेजने के लिए विकसित किया है। यह रॉकेट दो सफल विकासात्मक उड़ानें पूरी कर चुका है।</p>
<p>इसरो ने एसएसएलवी की तकनीक भारतीय कंपनियों को देने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। इसके तहत भविष्य में एसएसएलवी का बड़े पैमाने पर निर्माण किया जाएगा और छोटे उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने की सेवाएं उपलब्ध करायी जाएंगी। इसरो इस वर्ष के अंत में तमिलनाडु के कुलसेकरपट्टिनम स्थित देश के दूसरे और नये अंतरिक्ष केंद्र से पहला एसएसएलवी मिशन प्रक्षेपित करने की योजना बना रहा है। यह अंतरिक्ष केंद्र मुख्य रूप से एसएसएलवी मिशनों के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 14:20:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>इसरो ने 22-टन थ्रस्ट क्षमता के साथ क्रायोजेनिक इंजन सीई—20 का सफल परीक्षण किया, भविष्य के मिशनों में 22-टन थ्रस्ट क्षमता के साथ सीई20 इंजनों को इस्तेमाल करने की योजना</title>
                                    <description><![CDATA[इसरो ने 22-टन थ्रस्ट क्षमता वाले सीई20 क्रायोजेनिक इंजन का सफलतापूर्वक परीक्षण कर अंतरिक्ष विज्ञान में नया इतिहास रचा है। नोजल प्रोटेक्शन सिस्टम से लैस यह इंजन एलवीएम3 रॉकेट की पेलोड ले जाने की क्षमता को बढ़ाएगा। 165 सेकंड के इस परीक्षण ने भविष्य के भारी उपग्रह मिशनों के लिए भारत की शक्ति को और सुदृढ़ कर दिया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/isro-successfully-tests-cryogenic-engine-ce-20-with-22-ton-thrust-capacity/article-146420"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/isro.png" alt=""></a><br /><p>चेन्नई। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अपने क्रायोजेनिक इंजन सीई20 का 22-टन थ्रस्ट क्षमता के साथ सफल परीक्षण किया है। इसरो ने एक बयान में बताया कि क्रायोजेनिक इंजन सीई20 में नोजल प्रोटेक्शन सिस्टमÓ(एनपीएस) और एक मल्टी-एलिमेंट इग्नाइटर का उपयोग करके 10 मार्च को समुद्र तल के स्तर पर सफल परीक्षण किया गया।</p>
<p>इससे पहले, एनपीएस का उपयोग करते हुए समुद्र-स्तर पर 19-टन थ्रस्ट क्षमता वाले परीक्षण किए जा रहे थे। सीई20 क्रायोजेनिक इंजन एलवीएम3 प्रक्षेपण वाहन के ऊपरी क्रायोजेनिक चरण को शक्ति प्रदान करता है। इसरो एलवीएम3 की पेलोड ले जाने की क्षमता बढ़ाने के लिए भविष्य के मिशनों में 22-टन थ्रस्ट क्षमता के साथ सीई20 इंजनों को इस्तेमाल करने की योजना बना रहा है।</p>
<p>इसरो ने बताया कि 165 सेकेंड के पूरे परीक्षण के दौरान इंजन और परीक्षण सुविधा दोनों का प्रदर्शन उम्मीदों के अनुरूप रहा।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Mar 2026 18:03:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>नासा को मिली बड़ी कामयाबी, जेम्स वेब टेलीस्कोप से डार्क मैटर का अब तक का सबसे विस्तृत नक्शा तैयार</title>
                                    <description><![CDATA[जेम्स वेब टेलीस्कोप की मदद से वैज्ञानिकों ने डार्क मैटर का अब तक का सबसे विस्तृत नक्शा बनाया। अध्ययन से ब्रह्मांडीय संरचना और गुरुत्वीय लेंसिंग की नई समझ मिली।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/nasa-gets-a-big-success-the-most-detailed-map-of/article-141102"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px)-(12)3.png" alt=""></a><br /><p>लंदन। वैज्ञानिकों ने नासा के जेम्स वेब टेलिस्कोप की मदद से अंतरिक्ष में डार्क मैटर का अब तक का सबसे विस्तृत नक्शा तैयार किया है। यह शोध ब्रिटेन की डरहम यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की टीम ने किया है। डार्क मैटर को ब्रह्मांड की सबसे बड़ी पहेलियों में से एक माना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, ब्रह्मांड में मौजूद कुल पदार्थ का बड़ा हिस्सा डार्क मैटर ही है, लेकिन यह न तो देखा जा सकता है और न ही यह रोशनी को उत्सर्जित, परावर्तित या अवशोषित करता है। यही वजह है कि सामान्य दूरबीनों से इसे सीधे देखना संभव नहीं है।</p>
<p>डार्क मैटर का द्रव्यमान (मास) जरूर होता है और इसी कारण इसमें गुरुत्वाकर्षण शक्ति होती है। वैज्ञानिकों ने इसी गुण का उपयोग कर इसका नक्शा तैयार किया। डार्क मैटर की गुरुत्वाकर्षण शक्ति दूर स्थित आकाशगंगाओं से आने वाली रोशनी को मोड़ देती है, जिससे वे आकाशगंगाएं टेढ़ी-मेढ़ी या विकृत दिखायी देती हैं। इस प्रक्रिया को गुरुत्वीय लेंसिंग कहा जाता है।</p>
<p>लगभग 10 लाख दूरस्थ आकाशगंगाओं की आकृति और रोशनी में आए इस बदलाव को मापकर वैज्ञानिक यह पता लगाने में सफल रहे कि डार्क मैटर कहां है और उसकी मात्रा कितनी हो सकती है। डरहम विश्वविद्यालय के कम्प्यूटेशनल कॉस्मोलॉजी प्रोफेसर रिचर्ड मेसी ने कहा कि कई दूर की आकाशगंगाएं असामान्य आकार में दिखाई देती हैं और यह इस बात का संकेत है कि उनके सामने डार्क मैटर मौजूद है। उन्होंने कहा कि इसी तरीके से जेम्स वेब टेलीस्कोप डार्क मैटर को देख पाता है, भले ही वह स्वयं अदृश्य हो।</p>
<p>इस नए नक्शे से यह भी पुष्टि हुई है कि डार्क मैटर बेतरतीब ढंग से फैला नहीं है, बल्कि वह उन संरचनाओं से गहराई से जुड़ा है, जिन्हें हम ब्रह्मांड में देख सकते हैं। जिस क्षेत्र का अध्ययन किया गया है, वह सेक्सटैंस तारामंडल में स्थित है। इस हिस्से का अध्ययन पहले भी किया गया था, लेकिन इतनी बारीकी से कभी नहीं। यह क्षेत्र पृथ्वी से दिखाई देने वाले पूर्ण चंद्रमा की चौड़ाई से लगभग ढाई गुना बड़ा है।</p>
<p>डरहम विश्वविद्यालय के शोधकर्ता गैविन लिरॉय ने कहा कि पहले के नक्शे ऐसे थे जैसे धुंधले शीशे से डार्क मैटर को देखना, लेकिन जेम्स वेब टेलीस्कोप के उच्च गुणवत्ता वाले आंकड़ों से अब तस्वीर कहीं ज्यादा साफ हो गयी है। जेम्स वेब टेलीस्कोप की मदद से इस बार लगभग 10 लाख आकाशगंगाओं की पहचान की जा सकी, जो हबल टेलीस्कोप के सबसे गहरे सर्वेक्षण से भी दोगुनी है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह नक्शा भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों और ब्रह्मांड को समझने के प्रयासों के लिए एक महत्वपूर्ण आधार बनेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 28 Jan 2026 18:47:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>इसरो ने एसएसएलवी के उन्नत तीसरे चरण का सफल स्थैतिक परीक्षण किया</title>
                                    <description><![CDATA[इसरो ने SSLV के तीसरे चरण (SS3) के उन्नत संस्करण का स्थैतिक परीक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया। इस नए डिजाइन से रॉकेट की पेलोड क्षमता 90 किलोग्राम बढ़ गई है, जिससे छोटे उपग्रह प्रक्षेपण और प्रभावी होंगे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/isro-successfully-conducts-static-test-of-advanced-third-stage-of/article-137907"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-09/isro.png" alt=""></a><br /><p>चेन्नई। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने मंगलवार को छोटे उपग्रह प्रक्षेपण यान (एसएसएलवी) के तीसरे चरण (एसएस3) के उन्नत संस्करण का सफलतापूर्वक 'स्थैतिक परीक्षण' किया। यह परीक्षण श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (एसडीएससी) में हुआ। एसएसएलवी इसरो का नया रॉकेट है। यह तीन चरणों वाला पूरी तरह ठोस ईंधन से चलने वाला उपग्रह प्रक्षेपण यान है, जो 500 किलोग्राम तक का भार ले जाने में सक्षम है। इसका तीसरा (ऊपरी) चरण रॉकेट को लगभग चार किमी प्रति सेकंड की गति देता है। इसमें हल्का लेकिन मजबूत कंपोजिट मोटर केस और विशेष नोजल डिजाइन है, जिससे इसका वजन कम हो जाता है।</p>
<p>इस रॉकेट के तीसरे चरण में 'कार्बन-एपॉक्सी मोटर केस' इस्तेमाल किया गया है, जिससे इसका वजन काफी कम हुआ है और यान की पेलोड क्षमता 90 किलोग्राम तक बढ़ गयी है। साथ ही, इग्नाइटर और नोजल सिस्टम में सुधार किया गया है, जिससे प्रणाली अधिक प्रभावी और मजबूत बनी है।</p>
<p>नोजल नियंत्रण के लिए कम बिजली खपत वाली 'इलेक्ट्रो-मैकेनिकल' प्रणाली का उपयोग किया गया है। उच्च मजबूती वाला कार्बन फाइबर से बना मोटर केस विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र में तैयार किया गया, जबकि सॉलिड मोटर की ढलाई एसडीएससी में की गयी। परीक्षण के दौरान मोटर में 233 से अधिक मापक उपकरण लगाये गये थे, जिनसे दबाव, धक्का, तापमान, कंपन और नियंत्रण प्रणाली के मापदंड अंकित किये गये। 108 सेकंड के परीक्षण समय में सभी पैरामीटर अनुमान के बहुत करीब पाये गये।</p>
<p>इस सफल परीक्षण के बाद, एसएस3 मोटर का उन्नत संस्करण उड़ान में इस्तेमाल के लिए योग्य घोषित कर दिया गया है। इस वर्ष देश में सॉलिड मोटर निर्माण क्षमता बढ़ाने के लिए कई नयी सुविधाएं शुरू की गयीं। जुलाई 2025 में श्रीहरिकोटा में सॉलिड मोटर उत्पादन सुविधाएं शुरू की गयीं। इसके अलावा, सितंबर 2025 में केरल के अलुवा स्थित अमोनियम परक्लोरेट संयंत्र में दूसरी उत्पादन लाइन शुरू की गयी, जिससे सॉलिड मोटर के लिए जरूरी अमोनियम परक्लोरेट का उत्पादन दोगुना हो गया।</p>
<p>इस साल एसडीएससी में 10 टन क्षमता वाला स्वदेशी 'वर्टिकल मिक्सर' भी शुरू किया गया, जो दुनिया का सबसे बड़ा 'सॉलिड प्रोपेलेंट मिक्सिंग उपकरण है। एसडीएससी की सॉलिड मोटर उत्पादन और परीक्षण सुविधाओं में एक भारतीय स्पेस स्टार्ट-अप द्वारा विकसित प्रक्षेपण यान के पहले कक्षीय प्रक्षेपण के लिए सॉलिड मोटर भी बनायी और परखी गयी। इसरो ने उस कंपनी का नाम नहीं बताया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 31 Dec 2025 16:56:59 +0530</pubDate>
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