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                <title>Legal Challenge - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति ने की अमेरिकी अदालत से रहम की अपील: आरोपों को खारिज करने का किया अनुरोध, जानें किस आधार पर मिल सकती है राहत?</title>
                                    <description><![CDATA[वेनेजुएला के अपदस्थ राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के वकीलों ने अमेरिकी अदालत में याचिका दायर कर उनके खिलाफ मादक पदार्थ तस्करी के आरोपों को खारिज करने का अनुरोध किया है। वकीलों ने तर्क दिया कि राष्ट्राध्यक्ष के रूप में मादुरो को संप्रभु प्रतिरक्षा (Sovereign Immunity) प्राप्त है और अमेरिकी अदालत के पास अधिकार क्षेत्र नहीं है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/former-venezuelan-president-appealed-for-mercy-from-the-us-court/article-164547"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-09/nikolas-maduro.png" alt=""></a><br /><p>न्यूयॉर्क। वेनेजुएला के अपदस्थ राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के अधिवक्ताओं ने अमेरिकी अदालत से उनके मुवक्किल के खिलाफ मादक पदार्थ तस्करी के आरोपों को खारिज करने का अनुरोध किया है। अधिवक्ताओं का तर्क है कि अदालत के पास इस मामले की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र नहीं है और पूर्व वेनेजुएला नेता को एक संप्रभु राष्ट्र के प्रमुख के रूप में प्रतिरक्षा प्राप्त है। आरआईए नोवोस्ती द्वारा प्राप्त एक दस्तावेज़ में यह जानकारी दी गई है।</p>
<p>दस्तावेज़ में कहा, "अदालत के पास मादुरो के खिलाफ अभियोजन चलाने का अधिकार क्षेत्र नहीं है और उसे उनके खिलाफ दायर अभियोग को खारिज करना चाहिए।" अधिवक्ताओं के अनुसार मादुरो को राष्ट्राध्यक्ष के रूप में प्रतिरक्षा के साथ-साथ अपने आधिकारिक पद पर रहते हुए किए गए कार्यों के संबंध में भी प्रतिरक्षा प्राप्त है। गौरतलब है कि गत तीन जनवरी को अमेरिका ने वेनेजुएला की राजधानी कराकास पर एक बड़ा सैन्य हमला किया। जिसमें अमेरिकी सैनिक राष्ट्रपति मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को कथित तौर पर हिरासत में लेकर अमेरिका ले आये। तब से वे ब्रुकलिन की जेल में बंद हैं। जहां अमेरिकी कानून के तहत उन पर "नार्को-आतंकवाद" के आरोपों में मुकदमा चलाया जाना है।</p>
<p>मादुरो पर अमेरिका में भारी मात्रा में कोकीन भेजने और नार्को-टेररिज्म की साजिश रचने का गंभीर आरोप है। अमेरिकी अभियोजकों को दो अक्टूबर तक इस याचिका पर अपना जवाब देना है और 17 नवंबर को इस पर सुनवाई तय की गई है। यदि मामला खारिज नहीं होता है, तो मुकदमा एक जून 2027 से शुरू होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 11:21:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>पश्चिम बंगाल​ विधानसभा चुनाव: अधिकारियों के तबादलों को हाईकोर्ट में चुनौती, चुनाव आयोग की शक्तियों पर उठे सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[चुनाव आयोग द्वारा बंगाल के IAS और IPS अधिकारियों के तबादलों को कलकत्ता उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है। अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने आयोग के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाते हुए इसे राज्य प्रशासन में हस्तक्षेप बताया। मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ अगले सप्ताह इस जनहित याचिका पर सुनवाई करेगी, जो चुनावी निष्पक्षता और शक्तियों की सीमा तय कर सकती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/transfers-of-west-bengal-assembly-election-officers-challenged-in-high/article-147222"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/calcutta-high-court.png" alt=""></a><br /><p>कोलकाता। चुनाव आयोग द्वारा पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ अधिकारियों के तबादलों का मामला अब कलकत्ता उच्च न्यायालय पहुंच गया है। एक याचिका में चुनाव आयोग के उस अधिकार को चुनौती दी गयी है, जिसके तहत अधिकारियों को चुनाव ड्यूटी के लिए अन्य राज्यों में भेजा जा रहा है। वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने न्यायालय का ध्यान इस मुद्दे की ओर आकर्षित करते हुए कहा कि आयोग के पास इस तरह से भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) और भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारियों को राज्य से बाहर भेजने का अधिकार नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि इससे राज्य प्रशासन के सामान्य कामकाज पर असर पड़ता है।</p>
<p>इस मामले में तृणमूल कांग्रेस के अधिवक्ता अर्क नाग जनहित याचिका दाखिल करेंगे। न्यायालय से याचिका दाखिल करने की अनुमति देने की मांग करते हुए बनर्जी ने तबादला आदेशों पर रोक लगाने का आग्रह किया है। मुख्य न्यायाधीश सुजोय पाल और न्यायमूर्ति पार्थसारथी सेन की खंडपीठ ने याचिका दायर करने की अनुमति दे दी है और मामले की सुनवाई अगले सप्ताह निर्धारित की है।</p>
<p>यह विवाद चुनाव आयोग द्वारा रविवार आधी रात से लेकर गुरुवार तक किये गये बड़े प्रशासनिक फेरबदल के बाद उत्पन्न हुआ है। इसमें मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक और कोलकाता पुलिस आयुक्त समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों को उनके पदों से हटाया गया है। कई जिलों के जिलाधिकारियों का भी तबादला किया गया है और नये अधिकारियों की नियुक्ति की गयी है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि हटाये गये अधिकारियों को फिलहाल पश्चिम बंगाल में चुनाव संबंधी कोई जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी। इनमें से कई अधिकारियों को अन्य राज्यों में चुनाव पर्यवेक्षक के रूप में पहले ही प्रतिनियुक्त किया गया है।</p>
<p>तबादलों की इस कार्रवाई पर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने कड़ी आपत्ति जतायी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पत्र लिखकर आयोग के फैसलों पर सवाल उठाये हैं। अब इस मामले के उच्च न्यायालय में पहुंच जाने के बाद चुनाव आयोग की शक्तियों और अधिकार क्षेत्र की सीमा का कानूनी परीक्षण होने की संभावना है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 20 Mar 2026 18:22:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>ममता बनर्जी बनीं वकील: दीं SIR पर दलीलें; चुनाव आयोग को बताया व्हाट्सएप आयोग, SC ने मांगा चुनाव आयोग से जवाब </title>
                                    <description><![CDATA[मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में आरोप लगाया कि एसआईआर के जरिए पश्चिम बंगाल को निशाना बनाया जा रहा है, जिससे मतदाताओं के अधिकार छीने जाएंगे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/mamta-banerjee-became-lawyer-in-sc-gave-arguments-on-sir/article-141949"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/11-(700-x-400-px)-(630-x-400-px)-(11)3.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय में खुद पेश होकर आरोप लगाया कि चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के जरिये उनके राज्य को चयनात्मक रूप से निशाना बनाया जा रहा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने ईसीआई के खिलाफ सीएम बनर्जी की याचिका पर सुनवाई की। इसमें आरोप लगाया गया है कि मौजूदा एसआईआर कवायद से बड़े पैमाने पर मतदाताओं का हक छीना जायेगा। उन्होंने इसे एक अपारदर्शी, जल्दबाजी वाली, असंवैधानिक और गैरकानूनी प्रक्रिया बताया।</p>
<p>इसके बाद उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया को चुनौती देने वाली उनकी रिट याचिका पर चुनाव आयोग (ईसीआई) को नोटिस जारी कर उससे सोमवार तक जवाब देने को कहा। मामले की जैसे ही सुनवाई शुरू हुई तो वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने याचिका की गंभीरता का उल्लेख करते हुए बताया कि यह मामला आइटम संख्या 36 और 37 के रूप में सूचीबद्ध नये विषयों से संबंधित है।</p>
<p>जब न्यायालय ने संकेत दिया कि वह जल्द ही इस मामले की सुनवाई करेगा तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं पोडियम तक गयीं और पीठ को सीधे संबोधित करने का आग्रह किया। सीएम ममता बनर्जी ने तर्क दिया, यह एसआईआर प्रक्रिया केवल नाम हटाने के लिए है। उन्होंने दावा किया कि विवाह के बाद उपनाम बदलने वाली महिलाओं या निवास बदलने वाले गरीब प्रवासियों जैसी सामाजिक वास्तविकताओं के कारण होने वाली मामूली विसंगतियों के आधार पर वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं।</p>
<p>उन्होंने न्यायालय को बताया कि मतदाताओं के नाम तार्किक विसंगति के आधार पर हटा दिये गये, भले ही वह विसंगति केवल उपनाम या वर्तनी की भिन्नता मात्र थी। गरीब लोगों जो बाहर जाते हैं, उनके नाम हटा दिये गये हैं। यह निष्कासन का आधार क्यों होना चाहिए।सीएम बनर्जी ने एसआईआर प्रक्रिया के समय और इसके चयनात्मक होने पर सवाल भी उठाया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Wed, 04 Feb 2026 18:43:44 +0530</pubDate>
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                <title>संसदीय जांच समिति के गठन को चुनौती देने वाली न्यायमूर्ति वर्मा की याचिका काे उच्चतम न्यायालय ने किया खारिज, जानें पूरा मामला</title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग जांच समिति के गठन को वैध ठहराते हुए उनकी याचिका को खारिज कर दिया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/the-supreme-court-rejected-justice-vermas-petition-challenging-the-formation/article-139813"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/judge-verma.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की ओर से दायर उस रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत जांच समिति गठित करने के लोकसभा अध्यक्ष के फैसले को चुनौती दी थी।</p>
<p>यह निर्णय न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने सुनाया। उल्लेखनीय है कि न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक आवास पर कथित तौर पर बेहिसाब नकदी मिलने के बाद उनके खिलाफ शुरू किए गए महाभियोग प्रस्ताव के संबंध में यह समिति गठित की गई थी।</p>
<p>न्यायमूर्ति वर्मा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और लोकसभा सचिवालय का प्रतिनिधित्व कर रहे भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलें सुनने के बाद आठ जनवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया गया था।</p>
<p>न्यायमूर्ति वर्मा ने जांच समिति के गठन को इस आधार पर चुनौती दी थी कि महाभियोग नोटिस लोकसभा और राज्यसभा दोनों में एक ही दिन (21 जुलाई) पेश किए गए थे, फिर भी लोकसभा अध्यक्ष ने राज्यसभा सभापति के निर्णय की प्रतीक्षा किए बिना या अनिवार्य संयुक्त परामर्श किए बिना एकतरफा रूप से समिति का गठन कर दिया।</p>
<p>याचिका में तर्क दिया गया कि अपनाई गई प्रक्रिया न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3(2) के विपरीत थी। इसमें धारा 3(2) के प्रावधान का हवाला दिया गया, जो यह निर्धारित करता है कि जहाँ संसद के दोनों सदनों में एक ही दिन प्रस्ताव के नोटिस दिए जाते हैं, वहाँ कोई समिति तब तक गठित नहीं की जाएगी जब तक कि प्रस्ताव दोनों सदनों में स्वीकार न कर लिया जाए और यदि स्वीकार कर लिया जाता है, तो समिति का गठन लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति द्वारा संयुक्त रूप से किया जाना चाहिए।</p>
<p>गौरतलब है कि 21 जुलाई, 2025 को संसद के दोनों सदनों में न्यायमूर्ति वर्मा के महाभियोग की मांग करने वाले अलग-अलग प्रस्ताव पेश किए गए थे। उसी दिन, तत्कालीन राज्यसभा सभापति जगदीप धनखड़ ने अपना इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद, 11 अगस्त को राज्यसभा के उपसभापति ने उच्च सदन में पेश किए गए प्रस्ताव को खारिज कर दिया। एक दिन बाद, 12 अगस्त को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम.एम. श्रीवास्तव और वरिष्ठ अधिवक्ता बी.वी. आचार्य की सदस्यता वाली एक जांच समिति के गठन की घोषणा की।</p>
<p>सुनवाई के दौरान रोहतगी ने तर्क दिया कि चूंकि प्रस्ताव दोनों सदनों में एक साथ पेश किए गए थे, इसलिए जांच समिति केवल अध्यक्ष और सभापति द्वारा संयुक्त रूप से गठित की जा सकती थी। उपसभापति के पास राज्यसभा के प्रस्ताव को खारिज करने का अधिकार नहीं था। सॉलिसिटर जनरल ने दलील दी कि समिति का गठन राज्यसभा के प्रस्ताव के खारिज होने के बाद ही किया गया था। पीठ ने टिप्पणी की कि उपसभापति सभापति की अनुपस्थिति में उनके कार्यों का निर्वहन करने के लिए सक्षम थे।</p>
<p>अदालत ने यह भी सवाल किया कि यदि समिति के गठन में कोई प्रक्रियात्मक कमी मान भी ली जाए, तो इससे न्यायमूर्ति वर्मा को किस तरह का नुकसान हुआ है। निर्णय के आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध होने के बाद और अधिक जानकारी मिल सकेगी। </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 16 Jan 2026 16:14:27 +0530</pubDate>
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