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                <title>bird - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>bird RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>झालाना अभयारण्य में पहली बार ब्लैक हेडेड बंटिंग दिखी, प्रवासी पक्षी ने बढ़ाई जैव विविधता की पहचान</title>
                                    <description><![CDATA[झालाना वन्य जीव अभयारण्य में पहली बार काले सिर वाली गुंजन (ब्लैक हेडेड बंटिंग) दर्ज की गई है। यह प्रवासी पक्षी यूरोप और मध्य एशिया से सर्दियों में भारत आता है। वन अधिकारियों ने इसे बेहतर पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत बताया। इससे पहले यह प्रजाति जयपुर के अंबेरी और मानसागर क्षेत्रों में देखी जा चुकी है।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/black-headed-bunting-seen-for-the-first-time-in-jhalana/article-142939"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/(12200-x-600-px)-(3)10.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। झालाना वन्य जीव अभयारण्य में एक नई प्रजाति, काले सिर वाली गुंजन (ब्लैक हेडेड बंटिंग) पक्षी रिकॉर्ड किया गया है। पक्षी विशेषज्ञ रोहित गंगवाल ने बताया कि यह प्रवासी पक्षी आमतौर पर यूरोप और मध्य एशिया से सर्दियों में भारत आता है।</p>
<p><strong>विवरण : </strong>नर पक्षी का सिर काला, पीठ भूरी और पेट चमकीला पीला होता है। मादा का रंग हल्का फीका होता है।</p>
<p><strong>ऐतिहासिक रिकॉर्ड :</strong> जयपुर जिले में इससे पहले भी साल 2000 और 2015 के आसपास अंबेरी और मानसागर क्षेत्रों में यह पक्षी देखा गया था, लेकिन झालाना में यह पहली बार दर्ज हुआ है।</p>
<p><strong>महत्व : </strong>वन अधिकारियों ने इसे अभयारण्य के बेहतर पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत बताया। नई प्रजातियों का आना यह दर्शाता है कि झालना का वन क्षेत्र प्रवासी पक्षियों के लिए सुरक्षित और समृद्ध हो रहा है।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 Feb 2026 17:24:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सारसों की संख्या में होगी गिरावट</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान के भरतपुर जिले में सारसों की संख्या में भारी कमी पर्यावरणीय असंतुलन का नतीजा है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/there-will-be-a-decline-in-the-number-of-sales/article-104352"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-02/257rtrer-(2)32.png" alt=""></a><br /><p>राजस्थान के भरतपुर जिले में सारसों की संख्या में भारी कमी पर्यावरणीय असंतुलन का नतीजा है। इस सवाल ने पर्यावरणविद और वन्यजीव प्रेमियों को चिंतित कर दिया है। हाल ही हुई 42वीं सारस गणना के मुताबिक भरतपुर जिले में इस बार सारसों की संख्या घटकर 79 रह गई है, जबकि पिछले साल यह संख्या 143 थी। विशेषज्ञ इसे आर्द्रभूमियों के सिकुड़ने, जल स्रोतों की कमी और बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप से जोड़कर देख रहे हैं। माना यह भी जा रहा है कि इस बार बरसात अधिक होने से सारस पड़ोसी राज्य उत्तरप्रदेश में पलायन कर गए हैं। अगर सारसों के अनुकूल परिस्थितियां नहीं बनी तो आने वाले वर्षों में इनकी संख्या में और गिरावट आ सकती है। घना केवलादेव नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी व वन विभाग के संयुक्त प्रयास से 10 फरवरी को 42वीं सारस गणना शुरू हुई। केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में 14 सारस मिले, जबकि पूरे भरतपुर जिले में मात्र 79 सारस ही देखे गए। सारसों की गणना के लिए जिले को 17 जोन में विभाजित कर 17 टीमों को अलग-अलग स्थानों पर तैनात किया गया। इसमें महाराजा सूरजमल विश्वविद्यालय के प्राणीशास्त्र और वनस्पति विज्ञान विभाग के शोधार्थी छात्र-छात्राओं, वन्यजीव प्रेमियों, नेचर गाइड्स, रिक्शा चालकों और वन विभाग के कर्मियों सहित 300 से अधिक लोगों ने भाग लिया। विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार सारस गणना अप्रेल की बजाए फरवरी में की गई, जिससे भी संख्या में बदलाव देखने को मिला है। </p>
<p>इस साल अच्छी बरसात के कारण कई स्थानों पर जलभराव हुआ है, जिससे सारसों को भरतपुर में सीमित रहने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई और वे पास के उत्तर प्रदेश क्षेत्र की ओर पलायन कर गए। हालांकि अप्रेल तक इनकी संख्या में इजाफा होने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि सारसों की संख्या में गिरावट के पीछे कई कारण हो सकते हैं। भरतपुर और आसपास के क्षेत्रों में जल स्रोतों की कमी सारसों के आवास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही है। इस प्रकार से अगर आने वाले समय में सारसों के अनुकूल परिस्थितियां नहीं बनी तो इनकी संख्या में और गिरावट आ सकती है। बढ़ता शहरीकरण इनके प्राकृतिक आवास को नष्ट कर रहा है। साथ ही बढ़ते तापमान से प्राकृतिक संतुलन भी बिगड़ रहा है, जिससे सारसों को अनुकूल वातावरण नहीं मिल पा रहा है। केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान समेत कई आर्द्रभूमियां पानी की कमी से जूझ रही हैं, जिससे सारसों का प्रवास प्रभावित हुआ है। इस बार मानसून बेहतर रहने के कारण कई जलाशयों और आर्द्रभूमियों में पानी भरा हुआ है। इसके चलते सारसों को भरतपुर में स्थायी रूप से रहने की जरूरत नहीं पड़ी और वे पास के उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों की ओर पलायन कर गए। शहरीकरण, खेती में बदलाव और जल स्रोतों पर अतिक्रमण सारसों के प्राकृतिक आवास को नष्ट कर रहे हैं। </p>
<p>अनियमित वर्षा और बढ़ते तापमान से आर्द्रभूमियों का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है, जिससे सारसों को अनुकूल वातावरण नहीं मिल पा रहा। कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग से सारसों के लिए उपलब्ध भोजन की मात्रा भी प्रभावित हुई है। इन समस्याओं के समाधान के लिए विशेषज्ञों ने कई उपाय भी सुझाए हैं। सारसों के संरक्षण के लिए समुदाय की सक्रिय भागीदारी बेहद जरूरी है। साथ ही यह भी जरूरी है कि विशेषज्ञों के सुझाए उपायों को अतिशीघ्र अमल में लाया जाए। आर्द्रभूमियों और जल स्रोतों की रक्षा की जाए और जैविक कृषि पद्धतियों को अपनाया जाए ताकि कीटनाशकों का दुष्प्रभाव कम हो सके। इसके साथ ही, जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन को बढ़ावा दिया जाए। केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान और आसपास के क्षेत्रों में मानवीय दखल को नियंत्रित किया जाए ताकि सारस के प्राकृतिक आवास को बचाया जा सके। विशेषज्ञों के अनुसार सारस की घटती संख्या एक गंभीर चिंता का विषय है और इसके संरक्षण के लिए प्रशासन, वन विभाग और स्थानीय समुदाय को मिलकर प्रयास करने की जरूरत है, सारस के प्राकृतिक आवासों की रक्षा नहीं की गई तो आने वाले वर्षों में इनकी संख्या में और गिरावट आ सकती है, जिससे यह दुर्लभ पक्षी संकट में आ सकता है। बेहद जरूरी है कि विशेषज्ञों के सुझाए उपायों को अतिशीघ्र अमल में लाया जाए।</p>
<p><strong> -राजेश खण्डेलवाल</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 15 Feb 2025 12:22:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>चिड़ियाघर लगाएगा बर्ड फेयर : पक्षी विशेषज्ञ देंगे विभिन्न बर्ड्स की जानकारी, बच्चे करेंगे मानसागर की पाल से विभिन्न प्रजातियों का अवलोकन </title>
                                    <description><![CDATA[नाहरगढ बायोलॉजिकल पार्क के एसीएफ देवेंद्र सिंह राठौड़ ने बताया कि इस दौरान स्कूली बच्चों के लिए चित्रकला, प्रश्नोत्तरी, निबंध सहित विभिन्न प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/bird-fair-experts-will-put-various-and-go/article-103246"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-02/bird-fair.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। चिड़ियाघर की ओर से 7 और 8 फरवरी को बर्ड फेयर लगाया जाएगा। इस दौरान पक्षी विशेषज्ञों द्वारा पक्षी प्रेमियों और विभिन्न स्कूलों के बच्चों को मानसागर की पाल से विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों का अवलोकन करवाया जाएगा। </p>
<p>नाहरगढ बायोलॉजिकल पार्क के एसीएफ देवेंद्र सिंह राठौड़ ने बताया कि इस दौरान स्कूली बच्चों के लिए चित्रकला, प्रश्नोत्तरी, निबंध सहित विभिन्न प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। इसके साथ ही पक्षी विशेषज्ञों को विभिन्न बर्ड्स की जानकारियां भी दी जाएगी।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 05 Feb 2025 14:48:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दुनिया का सबसे बड़ा उड़ान भरने वाला पक्षी लुप्त होने के कगार पर</title>
                                    <description><![CDATA[अब सारस की कम होती तादाद और सिमटते आवास पर्यावरण प्रेमियों के लिए चिंता का विषय बन गए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-world-s-largest-flying-bird-is-on-the-verge-of-extinction/article-79514"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-05/duniya-ka-sbse-bada-udan-bharane-wala-pakshe-lupt-hone-ke-kagar-par...kota-news-27.05.2024.jpg" alt=""></a><br /><p>क ोटा। उड़ान भरने वाला दुनिया का सबसे बड़ा पक्षी सारस लुप्त होने की कगार पर खड़ा है। सारस पक्षियों का कुनबा दिनों-दिन घटता जा रहा है। दो दशक पहले तक कोटा संभाग में अपने कलरव से लोगों को आकर्षित करने वाले सारस अब चुनिंदा जलाशयों तक सिमट कर रह गए। जल स्रोतों पर अतिक्रमण, अवैध मतस्य आखेट, इंसानी दखल और कमजोर मानसून के चलते बदली परिस्थितियों से सारस के प्राकृतिक आवास नष्ट हो गए। गोड़ावण व गिद्धों पर पहले ही लुप्त होने का संकट गहरा रहा है, अब सारस की कम होती तादाद और सिमटते आवास पर्यावरण प्रेमियों के लिए चिंता का विषय बन गए। हालांकि, 25 साल बाद कोटा शहर में एक साथ एक ही जगह पर 50 से ज्यादा सारस नजर आए हैं। ऐसे में पक्षी प्रेमियों ने वन विभाग से इनके संरक्षण के लिए कार्य योजना बनाने की मांग उठाई है।</p>
<p><strong>साल दर साल यूं घटी संख्या</strong><br />जैदी ने बताया कि आलनिया में वर्ष 2000 से पहले 92 सारस को पूरे तालाब में देखा गया था। चम्बल के मानस गांव में पहले बीच में टापू था, जिस पर ककड़ी की खेती होती थी। उन्हीं के बीच और दूसरे किनारे पर वर्ष 2001 में 84 सारस को देखा था। उस समय वाइल्ड लाइफ देहरादून के डॉ. वीसी चौधरी भी मेरे साथ थे, जो सारस का झुंड देख खुशी जाहिर की थी लेकिन साल दर साल इनकी संख्या में तेजी से गिरावट होती गई।  </p>
<p><strong>30 से 40 साल होती है उम्र</strong><br />पक्षी विशेषज्ञ डॉ. सुरभि बतातीं हैं, पक्षियों में सारस की उम्र काफी लंबी होती है। यह पक्षी 30 से 40 साल तक जिंदा रहता है। 300 फीट ऊंचाई तक उड़ान भरता है। पानी में झाड़ियां या पेड़-पौधें के बीच घौंसला बनाते हैं, ताकि श्वान सहित अन्य जानवरों से बचा सके। </p>
<p><strong>5 सालों में नहीं बना एक भी घौंसला</strong><br />हाड़ौती नेचुरल सोसाइटी के सदस्य पिछले 34 वर्षो से इस पक्षी पर अध्ययन कर रहे हंै। सूर सागर से उम्मेदगंज तक कम से कम 6 घोसले बनते थे, वहां पिछले 5 वर्षों में एक भी नहीं बना। वर्तमान में  वर्षा कम होने के कारण अधिकतर तालाब सुख गए। गामछ के आसपास के खेतों में अवैध पम्प चल रहे हैं। वर्ष 2001 में यहां 40 से अधिक सारस का जमावड़ा नजर आया था। क्योंकि, उस समय आलनिया बांध में पानी था और पेठा कास्त भी बहुत कम थी। लेकिन वर्तमान में जल दोहन के कारण तालाब ही सूख गए। प्राकृतिक आवास नष्ट हो गए।</p>
<p><strong>वर्ष 2000 के बाद लगातार घटी संख्या</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी बताते हैं, वर्ष 2000 के बाद सारस पक्षियों की संख्या में लगातार गिरावट आई है। पिछले 25 साल पहले कोटा के जलाशयों में जितने सारस दिखाई देते थे, उतने अब नहीं दिखते। पिछले 32 वर्षों से अध्ययन रहा हूं, पहले आसपास के जलाशयों में इनके मेले लगे होते थे। युवा सारस अपने लिए जोड़े बनाते, इनकी कोल और डांस देखने को मिलता था। लेकिन अब हर वेटलैंड पर अतिक्रमण, पानी की मोटरों से जल दोहन, अवैध मतत्य आखेट, इंसानी दखल के चलते इनका प्राकृतिक आवास नष्ट होने लगा है, जो इनकी घटती संख्या के लिए जिम्मेदार है।</p>
<p><strong>दो दशक बाद नजर आए 52 सारस</strong><br />पक्षी विशेषज्ञ डॉ. सुरभि श्रीवास्तव कहतीं हैं, 25 साल बाद यह पहला मौका है, जब सारस एक ही जगह एक साथ 52 की संख्या में नजर आए। रंगपुर इलाके के खेतों में पिछले महीने देखा गया था। गंगाईचा गांव के पास चंबल नदी में इनका बसेरा है। यहा खेतों में सारस (क्रेन) की अठखेलियां पक्षी प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहती है। सुबह जल्दी खेतों में ये दाना चुगने आते हैं और इसके बाद वापस गंगाईचा गांव स्थित चंबल नदी पर चले जाते है। यहां पर पर्याप्त भोजन-पानी की उपलब्धता और समृद्ध जैव विविधता सारस के अनुकूल है। इसलिए यहां सारस आते रहते हैं। अप्रैल से जून तक यही रहते हैं। पिछले कई सालों से सारस की संख्या कम होती जा रही है, जो चिंता का विषय है।</p>
<p><strong>प्राकृतिक आवास नष्ट होना ही सबसे बड़ा कारण</strong><br />बर्ड्स रिसर्चर हर्षित शर्मा कहते हैं, सारस पर संकट के बादल छाने लगे हंै। सारस के रहवास इलाके, जलाशयों के पास मानवीय दखल, खेतों में कीटनाशकों के अधिक इस्तेमाल, अवैध खनन, अतिक्रमण, तालाबों में अवैध मतस्य आखेट से इनका प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है। जिससे यह हालात बन रहे हैं। जबकि, यह किसानों का दोस्त होता है। कीड़े-मकोड़े खाकर फसलों को बचाता है। पिछले कुछ वर्षों से पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ का खमियाजा इंसानों के साथ जीव-जंतुओं पर भी देखा जा सकता है। खेतों में कीटनाशक का उपयोग, पानी की कमी और करंट के तार भी पक्षियों की मौत के कारण बन रहे हैं। इन्हें सुरक्षित रखने के लिए वेटलैंड को बचाना जरूरी है।</p>
<p>वन्यजीव विभाग की जहां भी वनभूमि है, वहां पक्षियों के लिए वेटलैंड विकसित किए जा रहे हैं। उम्मेदगंज पक्षी विहार में तो हम चावल की फसल भी करेंगे, ताकि सारस को भोजन की उपलब्धता हो सके। वहीं, अवैध गतिविधियों पर लगाम लगा दी गई है। यहां तालाब में पानी व मछलियां पर्याप्त होने से प्राकृतिक आवास डवलप हो रहा है। पक्षियों की संख्या में इजाफा हो रहा है। इनके संरक्षण के लिए सुरक्षित रहवास की कार्य योजना पर लगातार कार्य जारी है।<br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीएफओ, वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>
<p><strong>संरक्षण के सुझाव</strong><br />पक्षी प्रेमियों ने सारस के संरक्षण के लिए विभिन्न सुझाव दिए हैं। <br />-वेटलैंड को अतिक्रमण से बचाएं।<br />-जिन इलाकों में आबादी वहां कंट्रेक्शन होने से रोका जाए।<br />-तालाबों में भू-जल दोहन के लिए लगी मोटरें बंद करवाई जाए।<br />-अवैध मतस्य आखेट, अवैध खनन, अवैध गतिविधियां रोकी जाए। <br />-वन विभाग द्वारा वेटलैंड पर चावल, मक्का, ज्वार की फसल करें ताकि इन्हें आसानी से भोजन मिल सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 May 2024 14:50:00 +0530</pubDate>
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                            </item>
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                <title>गिद्धों की संख्या में तेजी से आई गिरावट, अस्तिव की लड़ रहे है लड़ाई </title>
                                    <description><![CDATA[राज्य में सबसे पहले सफेद पीठ वाले गिद्धों की मौत का सिलसिला शुरू हुआ। बाद में अन्य प्रजाति के गिद्ध भी मौत की भेंट चढ़ने लगे। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/decline-in-the-number-of-vultures/article-39506"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-03/a-17.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राज्य में बहुतायात में दिखने देने वाले गिद्धों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है। जानवर के शव को आसमान में बहुत दूर से देखने वाले गिद्ध अपने अस्तिव की लड़ाई लड़ रहे है। राज्य में सबसे पहले सफेद पीठ वाले गिद्धों की मौत का सिलसिला शुरू हुआ। बाद में अन्य प्रजाति के गिद्ध भी मौत की भेंट चढ़ने लगे। </p>
<p><strong>गिद्ध विचरण करते थे</strong><br />भरतपुर के घना पक्षी अभ्यारण्य में वर्ष 1980 तक बड़ी संख्या में गिद्ध विचरण करते थे। वर्ष 1987 में घना में गिद्धों के करीब 302 घोंसले थे, जो वर्ष 1997 में घटकर मात्र तीन रह गए। गिद्ध विशेषज्ञ एवं आईयूसीएन के सदस्य डॉ.दाऊ लाल बोहरा ने शोध में बताया कि गिद्धों के घोंसले घटकर मात्र तीन रह गए। बोहरा का कहना है कि राज्य में 1300 से 1700 के बीच गिद्दों की संख्या है। तत्कालीन केन्द्रीय वन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने एक अन्तरराष्ट्रीय कॉफ्रेंस में हवाला दिया था कि पिछले तीन दशक में देश में गिद्धों की संख्या में तेजी से कमी आई है। देशभर में यह संख्या चार करोड़ से घटकर चार लाख से भी कम रह गई है।</p>
<p><strong>गिद्धों की मौत हो जाती हैं</strong><br />पशु जब बीमार होते हैं तो उनके इलाज के लिए पशुओं को डाइक्लोफेनिक दवा दी जाती है। जब पशु मरते हैं, तो उसे गिद्ध खाते हैं। गिद्ध जब मृत जानवर को खाते हैं तो डाइक्लोफेनिक दवा का असर गिद्धों पर बहुत की नकारात्मक होता है और गिद्धों की किड़नी खराब हो जाती है। किड़नी के खराब होने के साथ ही गिद्धों को अन्य बीमारियां हो जाती हैं और थोड़े समय में ही गिद्धों की मौत हो जाती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि दवा पशुओं की मांसपेशियों में जमा हो जाती है। जब जानवरों की मौत होती है तो गिद्ध उन्हें खाते हैं और फिर यह दवा गिद्धों के शरीर में पहुंचकर उनकी मौत का कारण बनती है। <br />- गिद्ध पेड़ों पर घोंसला बनाकर रहते हैं, जंगल के तेजी से कम होने से भी वे अपना घोंसला नहीं बना सकते हैं। <br />- पारिस्थितिकी तंत्र के गड़बड़ाने से भी हालात खराब हुए है। <br />- डाइक्लोफेनिक दवा को केवल तमिलनाडु में प्रतिबंधित किया गया है, जबकि पूरे देश में दवा चोरी-छिपते बिकती है। </p>
<p><strong>झालावाड़ में बढ़ी गिद्धों की संख्या</strong><br />प्रदेश में गिद्धों की संख्या झालावाड़ में बढ़ रही है। राज्य में पहला गिद्ध संरक्षण क्षेत्र बीकानेर के जोहदबीड़ में बनाया हुआ है। </p>
<p><strong>मृत जानवर की गंध सूंघकर भूमि पर उतरते हैं</strong><br />गिद्ध आसमान में सबसे ऊंची उड़ान उड़ते हैं और मृत जानवर की गंध सूंघकर भूमि पर उतरते हैं। गिद्ध आमतौर पर झुंड़ बनाकर रहते हैं।<br />गिद्धों की संख्या में कमी आई है। सरकार ने कई कदम उठाए हैं।<br /><strong>- अरविन्द्र तोमर, मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक, वन विभाग</strong></p>
<p>यह दुखद है कि गिद्धों की संख्या में तेजी से गिरावट हुई है। गिद्धों के संरक्षण के लिए कदम उठाए जाने चाहिए।<br /><strong>- राजपाल सिंह, प्रख्यात, वन्यजीव विशेषज्ञ, जयपुर </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Mar 2023 10:20:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>राजस्थान में पहली बार नजर आया रेड नेक्ड ग्रिब</title>
                                    <description><![CDATA[ऑस्ट्रेलिया से आए एंड्रयू दंपत्ति, जो बीजापुर लॉज में रुके थे। वन्यजीव विशेषज्ञ अनिल रोजर्स के साथ सफारी के दौरान उन्होंने दुर्लभ रेड नेक्ड ग्रीब को रिकॉर्ड किया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/necked-grib-seen-the-first-time/article-30031"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-11/46546546526.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। सर्दियों के शुरूआत के साथ ही प्रवासी पक्षियों का आना भारतीय उपमहाद्वीप की तरफ शुरू हो जाता है, जिसमें हजारों की संख्या में प्रवासी पक्षी राजस्थान के कई जलाशयों की तरफ रुख करते है। इस दौरान कई बार हमें दुर्लभ पक्षी भी देखने को मिलते है। ऑस्ट्रेलिया से आए एंड्रयू दंपत्ति, जो बीजापुर लॉज में रुके थे। वन्यजीव विशेषज्ञ अनिल रोजर्स के साथ सफारी के दौरान उन्होंने दुर्लभ रेड नेक्ड ग्रीब को रिकॉर्ड किया।</p>
<p>यह पक्षी दक्षिणी राजस्थान में पहली बार नजर आया है। इसे राजस्थान में करीब 28 साल पहले भरतपुर के केवलादेव नेशनल पार्क से रिकॉर्ड किया था। यह पक्षी एशिया और यूरोप में ब्रीड करता है और सर्दियों में भारतीय उपमहाद्वीप की ओर प्रवास करता है। इससे पहले रोजर्स ने हॉर्न्ड और ब्लैक ग्रिब भी रिकॉर्ड किया हुआ है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 18 Nov 2022 11:19:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>पेंटेड स्टॉर्क से आबाद हुआ शहर का राजपुरा </title>
                                    <description><![CDATA[पेंटेड स्टॉर्क पक्षी इन दिनों पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यह प्रवासी पक्षी हैं, राजपुरा के तालाब किनारे पेड़ों पर 500 से ज्यादा पेटेंर्ड स्टॉक बर्ड की आबादी बसी है। पक्षी प्रेमी इन्हें देखने के लिए दूर-दूर से आ रहे हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/city-s-rajpura-populated-with-painted-storks/article-21131"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-08/collector.jpeg-copy4.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। पेंटेड स्टॉर्क पक्षी इन दिनों पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। हल्के सफेद रंग पर गुलाबी व नारंगी रंग उसे और भी अधिक आकर्षक बना देता है, ऐसा लगता है कि मानो किसी पेंटर ने अपने ब्रश से बड़े करीने से रंग भर दिए हो। लंबी और पतली टांग, नुकीली लंबी चोंच उसे दूसरे पक्षियों से अलग करती है। यह पक्षी मानव से भी ज्यादा समझदार होते हैं, क्योंकि यह अपने सुरक्षा के लिए अपने आस-पास की हरियाली बचा कर रखते हैं। पेंटड स्टॉर्क अपने घोसलें को बनाने के लिए बाहर के तिनके का इस्तेमाल करते हैं। वह जिस भी पेड़ की शाखा पर बैठते हैं, उसके तिनकों का इस्तेमाल घोसला बनाने के लिए नहीं करते हैं बल्कि अन्य शाखाओं से एक-एक तिनके बटोर कर अपना घोंसला बनाते हैं। यह प्रवासी पक्षी हैं, राजपुरा के तालाब किनारे पेड़ों पर 500 से ज्यादा पेटेंर्ड स्टॉक बर्ड की आबादी बसी है। पक्षी प्रेमी इन्हें देखने के लिए दूर-दूर से आ रहे हैं। </p>
<p><strong>पेड़ों पर अठखेलियां करती है आकर्षित</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी ने बताया कि शहर से 25 किमी दूर राजपुरा के तालाब किनारे पेड़ों पर पेटेंर्ड स्टॉर्क बर्ड यानी जांघिल पक्षी घोंसले बनाने में जुटे हुए हैं। दिनभर यह पक्षी पेड़ों पर अठखेलिया करते रहते हैं। पेंटेड स्टॉर्क को नेस्टिंग के लिए ऐसे तालाब चाहिए होते हैं जिनमें छिछले पानी में कांटेदार पेड़ हो और मछलियों अधिक हो। ये पक्षी 7 सालों से यहां आ रहे हैं लेकिन गत वर्ष 250 की संख्या में यहां आए थे लेकिन कुछ दिनों बाद ही वापस लौट गए थे, जिनके जाने का कारण पता नहीं चल सका। लेकिन इस वर्ष दोगुनी संख्या में वापस लौट आए हैं, यह वंश वृद्धि का संकेत है, जो पक्षी पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। जांघिल 5 से 10 के समूह में कॉलोनी बना कर रहते हैं और आपस में एक-दूसरे की मदद करते हैं।</p>
<p><strong>घंटों एक ही मुद्रा में रहते हैं खड़े</strong><br />वन्यजीव प्रेमी सुरेश नागर बताते हैं, पक्षियों का आना अच्छा संकेत है। पेंटेड स्टॉर्क का वैज्ञानिक नाम माइकटेरिया ल्यूकोसिफाला है, जो भारत के अलावा श्रीलंका, चीन तथा दक्षिणी पूर्वी एशिया के देशों में भी पाया जाता है। पेटेंड स्टॉर्क शांत स्वभाव और एक ही मुद्रा में घंटों तक खड़े रहने के लिए जाने जाते हैं। यह बर्ड दिखने में बेहद खूबसूरत हैं, एक साथ कई प्राकृतिक रंगों को खुद में संजोये हुए हैं। प्राकृतिक सौंदर्य के बीच इनकी मौजूदगी से तालाब एक बार फिर से मुस्कुराने लगा है। बड़ी तादाद में ये पक्षी प्रजनन के लिए तिनका-तिनका इक्कठा करके पेडों पर घोंसले बना रहे हैं, जल्द ही तालाब पर जांघिल पक्षियों के बच्चे नजर आने लगेंगे, फिर 6 महीने तक यह इलाका पक्षियों की चहचहाट से गुलजार रहेगा। </p>
<p><strong>साढे तीन फीट की ऊंचाई, पंख सफेद, चोंच पीली</strong><br />पेटेंड स्टॉर्क लगभग साढ़े तीन फीट ऊंचाई के होते हैं। इनके पर सफेद होते हैं, जिन पर ऊपर की तरफ काले रंग के निशान व पट्टियां पड़ी होती हैं और पूंछ के पास मुलायम हल्के गुलाबी रंग के पर होते है। चोंच पीली होती है। इनका मुख्य भोजन मछलियां, केकड़े, मेंडक, छोटे सांप, छिपकली व कीड़े होते हैं। </p>
<p><strong>वर्ष 2001 में डाक टिकट भी जारी हुआ था</strong><br />विशेषज्ञों के मुताबिक, देश में स्टर्ष्क परिवार में सबसे आम और आकर्शक प्रजाति के रूप् पहचान बनाने वाला पेंटेड स्टॉर्क या जांघिल देखने में सबसे सुन्दर पक्षी है। इसे पेंटेड स्टर्ष्क इसलिए कहा जाता है क्योंकि एक नजर में इसे देखने पर ऐसा लगता है जैसे इसे किसी ने अलग-अलग रंगों से रंग दिया हो। अक्टूबर 2015 में राज्य सरकार द्वारा इसे डूंगरपुर जिले की पहचान देते हुए जिले का आइकन बर्ड बनाया है। भारतीय डाक विभाग द्वारा भी वर्श 2001 में इस पक्षी पर चार रुपए का एक डाक टिकट भी जारी किया गया है।</p>
<p><strong>दुर्लभ प्रजाति में आते हैं पेंटेड स्टॉर्क</strong><br />विशेषज्ञों ने बताया कि पेंटेड स्टॉर्क स्टॉर्क एक दुर्लभ प्रजाति है। इसे नियर थ्रेटेंड एक संरक्षण की स्थिति में लिया गया। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि प्रजातियों को खतरा है, लेकिन थ्रेटैंड टैक्सा में आमतौर पर कमजोर प्रजातियां शामिल होती हैं, वहीं यह प्रजाति कमजोर स्थिति में मानी जाती है।</p>
<p><strong>4 साल में पहली बार ज्यादा संख्या में दिखे जांघिल</strong><br />जैदी के मुताबिक, राजपुरा के तालाब में करीब 4 साल पहले पेंटेड स्टॉर्क की प्रजनन कॉलोनी बनी थी, इतनी बड़ी संख्या में यह पक्षी इस वर्ष ही यहां दिखाई दिए हैं। यह जोड़े में होते हैं, इनकी संख्या को देखते हुए इस बार 250 से ज्यादा घोंसले बनने का अनुमान हैं। यहां ब्रीडिंग पेंटेड स्टॉर्क की संख्या करीब 500 है। जांघिलों ने यहां पर देशी बबूल के 50 से ज्यादा पेड़ों पर घोंसले बनाए है। एक घोसलें में मादा पेंटेड स्टॉर्क तीन से चार अंडे देती है। उन्होंने कहा कि तालाब चार साल के बाद फिर से पेंटेड स्टॉर्क पक्षियों से आबाद होने लगा है। अभी तालाब के आधा दर्जन से ज्यादा पेडों पर इन जांघिल पक्षियों ने अपने जोडों के साथ डेरा डाल दिया है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 31 Aug 2022 15:15:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>पक्षी जागरूकता के तहत बर्ड रेस का हुआ आयोजन </title>
                                    <description><![CDATA[पक्षी जागरूकता कार्यक्रम के तहत बर्ड रेस का आयोजन हुआ। इसमें पक्षी प्रेमियों ने भाग लिया और जयपुर शहर तथा इसके आसपास के इलाकों में बरखेड़ा तालाब, चंदलाई तालाब, नेवता बांध, कानोता बांध, नारगढ़ का जंगल, झालाना का जंगल, वानिकी फॉरेस्ट, और अन्य सभी इलाकों में अलसुबह पक्षी दर्शन के लिए टीम में निकले।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/bird-race-under-awareness/article-5589"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-03/untitled-1-copy3.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। पक्षी जागरूकता कार्यक्रम के तहत बर्ड रेस का आयोजन हुआ। इसमें पक्षी प्रेमियों ने भाग लिया और जयपुर शहर तथा इसके आसपास के इलाकों में बरखेड़ा तालाब, चंदलाई तालाब, नेवता बांध, कानोता बांध, नारगढ़ का जंगल, झालाना का जंगल, वानिकी फॉरेस्ट, और अन्य सभी इलाकों में पक्षी दर्शन के लिए टीम में निकले।</p>
<p>इसमें 45 लोगों ने भाग लिया और 93 प्रजाति के पक्षी इबर्ड नमक पोर्टल पर अपलोड किए। शुरू किए गए जयपुर बर्ड रेस को मुंबई स्थित युहीना, इबर्ड तथा वर्ड काउंट इंडिया पोर्टल का सहयोग रहता है। जयपुर के स्थानीय गैर सरकारी संस्थान रक्षा, होप एंड बियोंड, वनाकृति नमक संस्थान का भी सहयोग मिला। इस कार्यक्रम को ईआरडीएस फाउंडेशन के तत्वाधान में आयोजित किया जाता है। कार्यक्रम के कोऑर्डिनेटर डॉ. सुमित डूकिया और डॉ. अमित कोटिया ने समन्वय और संचालित किया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/bird-race-under-awareness/article-5589</link>
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                <pubDate>Sun, 06 Mar 2022 16:36:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Administrator]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विमान से टकराया पक्षी, यात्रियों में मचा हड़कंप</title>
                                    <description><![CDATA[बाद में यात्रियों को सुरक्षित विमान से नीचे उतारा गया। इसके बाद उन्होंने राहत की सांस ली।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%9F%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%AA%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A5%80--%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AE%E0%A4%9A%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A4%95%E0%A4%82%E0%A4%AA/article-1825"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-10/viman-se-takraya-pakshi.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>जयपुर।</strong> जयपुर एयरपोर्ट पर शुक्रवार को उस समय हड़कंप मच गया। जब एक विमान से पक्षी टकरा गया। बाद में यात्रियों को सुरक्षित विमान से नीचे उतारा गया। इसके बाद उन्होंने राहत की सांस ली। जानकारी के अनुसार गो फर्स्ट की फ्लाइट मुंबई से जयपुर आई थी। फ्लाइट के टेक ऑफ के दौरान पक्षी टकरा गया। उसकी आवाज सुनकर यात्रियों में घबराहट मच गई बाद में विमान को सुरक्षित लैंड कराने के बाद यात्रियों को नीचे उतारा गया।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Fri, 22 Oct 2021 12:52:37 +0530</pubDate>
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