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                <title>Abortion Rights - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>Abortion Rights RSS Feed</description>
                
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                <title>20 हफ्ते प्रेग्नेंट नाबालिग को अबॉर्शन की इजाजत : सुप्रीम कोर्ट बोला-बलात्कार पीड़िताओं के लिए पुनर्विचार की जरूरत, डिलीवरी के लिए नहीं कर सकते मजबूर</title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार पीड़िताओं के गर्भपात कानून में बदलाव की वकालत की है। अदालत ने कहा कि नाबालिगों के लिए 20 सप्ताह की सीमा न्याय में बाधा नहीं बननी चाहिए। पीड़िता के मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनचाहा गर्भ किसी पर थोपा नहीं जा सकता और अंतिम निर्णय पीड़िता का होना चाहिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/abortion-allowed-to-20-weeks-pregnant-minor-supreme-court-said/article-152185"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-11/supreme_court__1_1.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें एक 15 वर्षीय नाबालिग के 30 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति देने वाले दो न्यायाधीशों की पीठ के एक आदेश को चुनौती दी गयी थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की पीठ ने गर्भपात की अनुमति देते हुए एम्स को प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि एम्स अपना निर्णय (कि गर्भपात नहीं किया जाना चाहिए) मां पर नहीं थोप सकता और महिला के पास निर्णय लेने का विकल्प होना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की, "अवांछित गर्भ का बोझ महिला पर नहीं डाला जा सकता।"</p>
<p>न्यायालय ने एम्स के डॉक्टरों को नाबालिग और उसके परिवार की काउंसलिंग करने तथा उन्हें प्रासंगिक मेडिकल रिपोर्ट और जानकारी साझा करने की स्वतंत्रता दी है, ताकि वे यह तय कर सकें कि गर्भावस्था को जारी रखना है या गर्भपात का विकल्प चुनना है।</p>
<p>इससे पहले 24 अप्रैल को न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने गर्भपात की अनुमति दी थी। कल बुधवार को इसी पीठ ने एम्स की समीक्षा याचिका को खारिज करते हुए कहा था, "यह अजीब है कि याचिकाकर्ता एम्स उच्चतम न्यायालय के आदेश को मानने को तैयार नहीं है और इसके बजाय नाबालिग के संवैधानिक अधिकारों को विफल करने के लिए अदालत के आदेश को ही चुनौती दे रहा है।"</p>
<p>उच्चतम न्यायालय की डांट खाने के बावजूद एम्स ने अपने कदम पीछे नहीं खींचे और मामले में उपचारात्मक याचिका दायर कर दी। इसे मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष तत्काल रखा गया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि डॉक्टर अजन्मे बच्चे पर बहुत अधिक ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, जबकि उस मां पर ध्यान नहीं दे रहे जो एक दर्द से गुजर रही है। उन्होंने कहा, "बच्चे पर बहुत अधिक ध्यान दिया जा रहा है और उस मां पर नहीं जिसने इतना कष्ट झेला है।"</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 14:08:05 +0530</pubDate>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: 30 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की दी अनुमति, कहा-नाबालिग लड़की को उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकती </title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग की इच्छा मानते हुए 30 सप्ताह गर्भ समापन की अनुमति दी, कहा महिला को गर्भ जारी रखने को मजबूर नहीं किया जा सकता।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/supreme-courts-historic-decision-to-allow-termination-of-pregnancy-at/article-142174"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/11-(700-x-400-px)-(630-x-400-px)-(7)4.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में एक नाबालिग लड़की के 30 सप्ताह के गर्भ को चिकित्सकीय रूप से समाप्त करने की अनुमति दे दी। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि कोई भी अदालत किसी महिला को, और विशेष रूप से एक नाबालिग लड़की को, उसकी इच्छा के विरुद्ध गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं कर सकती है।</p>
<p>न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने जोर देकर कहा कि गर्भवती लड़की को  बच्चे को जन्म देने  या नहीं देने के उसके अधिकार को उचित महत्व दिया जाना चाहिए, खासकर तब जब उसका मन नहीं हो कि वह बच्चे को जन्म दे और ऐसी इच्छा उसने साफ साफ शब्दों में बार बार जाहिर भी की हो। </p>
<p>पीठ ने स्पष्ट किया कि मुख्य मुद्दा यह था कि क्या एक नाबालिग को ऐसी गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर किया जा सकता है जो उसकी मर्जी के बिना है। अदालत ने कहा, अदालत किसी भी महिला को, नाबालिग बच्चे की तो बात ही छोड़एि, अपनी गर्भावस्था पूरी करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती, अगर उसका ऐसा करने का इरादा ही नहीं हो।</p>
<p>न्यायालय ने माना कि यह मामला इस पर निर्भर नहीं करता कि गर्भधारण सहमति से बने संबंधों के कारण हुआ था या दुष्कर्म से। वास्तव में फैसला इस बात से तय होगा कि नाबालिग की वह स्पष्ट इच्छा क्या है और उसका मन यही है कि वह बच्चे को जन्म न दे। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने स्वीकार किया कि हालांकि एक बच्चे का जन्म अंतत: एक जिंदगी को दुनिया में लाना है, लेकिन इस मामले में नाबालिग की स्पष्ट अनिच्छा सबसे महत्वपूर्ण कारक है।</p>
<p>उच्चतम न्यायालय ने मुंबई के जेजे अस्पताल को निर्देश दिया कि वे सभी आवश्यक चिकित्सा संबंधी उपायों का पालन करते हुए गर्भावस्था के चिकित्सकीय समापन की प्रक्रिया शुरू करें। यह फैसला भारत में गर्भपात कानून के तहत प्रजनन अधिकारों की व्याख्या में एक मील का पत्थर माना जा रहा है। कारण यह है कि 24 सप्ताह की कानूनी सीमा के बाद भी विशेष परिस्थितियों में अदालत ने इस लड़की की पसंद को प्राथमिकता दी है।</p>
<p>उल्लेखनीय है कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी संशोधन अधिनियम 2021 के अनुसार गर्भपात की समय सीमा को विभिन्न श्रेणियों में निर्धारित किया गया है। सामान्य परिस्थितियों में सभी महिलाओं के लिए 20 सप्ताह तक के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति है, मगर इसके लिए डॉक्टर की सलाह आवश्यक है।</p>
<p>विशेष श्रेणियों की महिलाओं जैसे कि दुष्कर्म का शिकार बनी लड़कियां, नाबालिग, विधवाओं, दिव्यांगों या गंभीर बीमारी से पीड़ति महिलाओं के लिए यह सीमा 24 सप्ताह तक निर्धारित है और इसके लिए दो डॉक्टरों की इजाजत अनिवार्य है। यदि गर्भ में पल रहे भ्रूण को गंभीर बीमारी है, तो राज्य स्तरीय मेडिकल बोर्ड की अनुमति के बाद 24 सप्ताह के बाद भी गर्भपात कराया जा सकता है। </p>
<p>इसके अलावा अगर गर्भवती महिला के जीवन को तत्काल कोई गंभीर खतरा हो, तो कानून की किसी भी समय सीमा के बिना आपातकालीन स्थिति में गर्भपात की अनुमति दी जाती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 Feb 2026 15:44:50 +0530</pubDate>
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