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                <title>disease - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>मलेरिया से लड़ने के नए तरीकों का इस्तेमाल करके दस लाख लोगों की जानें बचाई, जानें पूरा मामला  </title>
                                    <description><![CDATA[डब्ल्यूएचओ की नई विश्व मलेरिया रिपोर्ट के मुताबिक 2024 में उन्नत मुकाबला रणनीतियों-जैसे दोहरे सक्रिय घटक वाली मच्छरदानियां और अनुशंसित टीके की बदौलत लगभग 17 करोड़ मामले और 10 लाख मौतें टलीं। हालांकि, मच्छरों की बढ़ती दवा-प्रतिरोधक क्षमता प्रगति को चुनौती दे रही है। फिलहाल 24 देशों में नियमित मलेरिया टीकाकरण हो रहा है और 47 देश मलेरिया-मुक्त प्रमाणित हैं।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/lives-of-one-million-people-were-saved-by-using-new/article-134918"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/snnnss.png" alt=""></a><br /><p>जिनेवा। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कहा है कि पिछले साल मलेरिया से लड़ने के नए तरीकों का इस्तेमाल करके दस लाख लोगों की जानें बचाई गई, लेकिन यह प्रगति दवा के प्रति मच्छरों की बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता के कारण खतरे में है। डब्ल्यूएचओ की जारी वार्षिक विश्व मलेरिया रिपोर्ट के अनुसार, मलेरिया के खिलाफ नए तरीकों, जिनमें दोहरे सक्रिय घटक वाली मच्छरदानी और डब्ल्यूएचओ द्वारा अनुशंसित टीके शामिल हैं, के व्यापक उपयोग से 2024 में अनुमानित 17 करोड़ मामलों और दस लाख मौतों को रोकने में मदद मिली है।</p>
<p><strong>24 देशों में नियमित टीकाकरण :</strong></p>
<p>दोहरे सक्रिय घटक (एआई) वाली मच्छरदानी उन्नत मच्छरदानी हैं जिनमें दो अलग-अलग कीटनाशक (आमतौर पर एक पाइरेथ्रॉइड और क्लोरफेनेपायर या पाइरीप्रॉक्सीफेन) होते हैं। ये व्यापक कीटनाशक प्रतिरोध को दूर करने के लिए डिजाइन किए गए हैं। ये पारंपरिक मच्छरदानियों की तुलना में, विशेष रूप से अफ्रीका में, पाइरेथ्रॉइड प्रतिरोधी मच्छरों को लक्षित करके, मलेरिया से काफी बेहतर सुरक्षा (20-50 प्रतिशत अधिक प्रभावी) प्रदान करते हैं।</p>
<p><strong>47 देशों को मलेरिया-मुक्त प्रमाणित किया :</strong></p>
<p>मौसमी मलेरिया कीमोप्रिवेंशन -मलेरिया के चरम मौसम (बरसात के मौसम) के दौरान बच्चों को मलेरिया-रोधी दवाएं देने की एक प्रभावी रणनीति है, जिसमें हर 28 दिन के अंतराल पर दवा के कोर्स दिए जाते हैं, ताकि रक्त में दवा का स्तर बना रहे और मलेरिया से बचाव हो सके, खासकर पांच साल से कम उम्र के बच्चों में यह मलेरिया के मामलों और मौतों को कम करने का एक महत्वपूर्ण तरीका है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Dec 2025 11:05:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मेनिन्जाइटिस के बढ़ते मामलों पर चिंता : बच्चों में गंभीर प्रभाव; डॉक्टरों ने की जागरूकता और टीकाकरण अभियान तेज करने की मांग </title>
                                    <description><![CDATA[विशेषज्ञों ने मेनिन्जाइटिस (ब्रेन फीवर) को गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य संकट बताते हुए टीकाकरण को सबसे प्रभावी बचाव बताया। हर साल 2.5 मिलियन मामले दर्ज होते हैं, जिनमें 70% मौतें पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की होती हैं। भारत मेनिन्जाइटिस मृत्यु दर में शीर्ष देशों में है। नाइसेरिया मेनिन्जिटिडिस से संक्रमण तेजी से बढ़ रहा है, इसलिए शुरुआती पहचान और वैक्सीन जरूरी हैं।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/concern-over-increasing-cases-of-meningitis-serious-impact-in-children/article-134871"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/1200-x-600-px-(3)1.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। मेनिन्जाइटिस, जिसे आमतौर पर ब्रेन फीवर कहा जाता है, एक गंभीर बीमारी है, लेकिन इस बीमारी को टीकाकरण द्वारा रोका जा सकता है। मेनिन्जाइटिस जागरूकता पहल का उद्देश्य इस बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ाना और इसे समाप्त करने के लिए वैश्विक प्रयासों को प्रोत्साहित करना है, ताकि शुरुआती पहचान और टीकाकरण के माध्यम से इसकी रोकथाम की जीवनरक्षक क्षमता को बढ़ावा दिया जा सके। हर वर्ष दुनिया भर में 2.5 मिलियन से अधिक मामले दर्ज किए जाते हैं, जिसके कारण मेनिन्जाइटिस एक गंभीर स्वास्थ्य संकट बन गया है।</p>
<p>इस बीमारी से होने वाली कुल मौतों में लगभग 70प्रतिशत बच्चे 5 वर्ष से कम आयु के होते हैं। राजधानी जयपुर के वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. विवेक शर्मा ने बताया कि मेनिन्जाइटिस, जिसे ब्रेन फीवर भी कहा जाता है, मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी को ढकने वाली झिल्लियों (मेनिन्जीस) में सूजन होने के कारण होता है और यह आमतौर पर बैक्टीरियल, फंगल या वायरल संक्रमण से उत्पन्न होता है। मेनिन्जाइटिस के क्लिनिकल लक्षण इसके कारण, बीमारी के स्वरूप (तीव्र, उप-तीव्र या जीर्ण), मस्तिष्क में सूजन (मेनिंगो-एन्सेफलाइटिस) और अन्य शारीरिक जटिलताओं (जैसे सेप्सिस) पर निर्भर करते हैं। इसके सामान्य लक्षणों में गर्दन में अकड़न, बुखार, भ्रम या मानसिक स्थिति में बदलाव, सिरदर्द, मतली और उल्टी शामिल हैं। कम सामान्य लक्षणों में दौरे, कोमा और न्यूरोलॉजिकल समस्याए (जैसे सुनने या देखने की क्षमता में कमी, संज्ञानात्मक हानि या अंगों में कमजोरी) शामिल हैं।</p>
<p> </p>
<p>भारत, मेनिन्जाइटिस से होने वाली मृत्यु संख्या में दुनिया के शीर्ष तीन देशों में शामिल है। एक्यूट बैक्टीरियल मेनिन्जाइटिस के तीन प्रमुख रोगजनकों में से, नाइसेरिया मेनिन्जिटिडिस उपचार के बावजूद 15 प्रतिशत तक मृत्यु दर और बिना उपचार के 50 प्रतिशत तक मृत्यु दर का कारण बनता है। अध्ययनों से यह भी पता चला है कि भारतीय बच्चों, विशेषकर दो वर्ष से कम आयु के बच्चों में नाइसेरिया मेनिन्जिटिडिस जनित एक्यूट बैक्टीरियल मेनिन्जाइटिस के मामलों में वृद्धि हुई है। इसलिए टीकाकरण के जरिए इस बीमारी को रोका जाना बेहद जरूरी है।</p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Dec 2025 16:56:17 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सातलखेड़ी में 30 हजार की आबादी बूंद-बूंद पानी को तरस रही, कभी 72 घंटे तक सप्लाई रहती है पूरी तरह ठप </title>
                                    <description><![CDATA[पीएचईडी विभाग की लापरवाही से हाहाकार। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-30-000-strong-population-of-satalkhedi-yearns-for-every-drop-of-water--with-the-supply-sometimes-completely-disrupted-for-72-hours/article-127980"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(5)9.png" alt=""></a><br /><p>सातलखेड़ी। कोटा जिले का सातलखेड़ी कस्बा इन दिनों भीषण जल संकट से जूझ रहा है। करीब 30 हजार की आबादी वाला यह कस्बा पीएचईडी विभाग की लापरवाही के कारण बूंद-बूंद पानी को तरस रहा है। स्थिति यह है कि यहां कभी 72 घंटे तक सप्लाई पूरी तरह ठप रहती है और कभी नलों से सिर्फ बूंदें टपककर रह जाती हैं। कस्बे की बड़ी आबादी रोजमर्रा के कामकाज के लिए पानी पर निर्भर है। लेकिन सप्लाई बाधित होने से महिलाएं और बच्चे दूर-दूर तक पानी के लिए भटकते नजर आ रहे हैं। त्योहार और गर्मी के मौसम में हालात और गंभीर हो गए हैं।</p>
<p><strong>जिम्मेदारों के सिर्फ आश्वासन</strong><br />स्थानीय लोगों का कहना है कि विभागीय अधिकारी हर बार सप्लाई दुरुस्त करने का आश्वासन देते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई सुधार नहीं होता। बैठकों में चर्चा होती है, लेकिन आमजन के घर तक पानी नहीं पहुंच पाता। पानी की किल्लत के चलते लोग गंदे स्रोतों से पानी भरने को मजबूर हैं, जिससे बीमारियों का खतरा मंडराने लगा है। छोटे बच्चों और बुजुर्गों की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि समस्या का समाधान नहीं हुआ तो उन्हें सड़कों पर उतरकर आंदोलन करना पड़ेगा।</p>
<p><strong>क्या बोले लोग</strong><br />अजय वाडिया ने कहा कि हमारा देश विकसित भारत की ओर बढ़ रहा है, लेकिन गांव और कस्बे तो बुनियादी सुविधाओं से ही वंचित हैं। सातलखेड़ी खैराबाद पंचायत समिति का बड़ा कस्बा है और यहां मजदूर वर्ग की संख्या अधिक है। नल सप्लाई 3-4 दिन में सिर्फ 40 मिनट आती है, जिससे लोग परेशान हैं। कई बार ज्ञापन देने के बाद भी समस्या जस की तस बनी हुई है।</p>
<p>ललित सिसोदिया ने बताया कि कस्बे में नलों से कई दिनों तक पानी नहीं आता। लोग दूर-दूर से हेडपंप से पानी भरकर ला रहे हैं। अधिकारी सिर्फ आश्वासन देते हैं, समाधान कोई नहीं।</p>
<p><strong>विभाग की सफाई</strong><br />सातलखेड़ी में पानी की समस्या को दूर करने के प्रयास जारी हैं। कभी पंप खराब होने जैसी तकनीकी वजहों से सप्लाई बाधित होती है, लेकिन जल्द ही स्थिति सुधारी जाएगी।<br /><strong>- सोमेश मेहर, एक्शन, पीएचईडी विभाग। </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Sep 2025 17:42:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कोटा उत्तर वार्ड 25 - सामुदायिक भवनों में सुविधाओं का अभाव, लाइट है न पानी की व्यवस्था, लोगों की बढ़ी परेशानी</title>
                                    <description><![CDATA[इलाके में असामाजिक तत्वों की आवाजाही को रोकने के लिए कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/kota-north-ward-25-%E2%80%93-community-buildings-lack-amenities--there-is-no-electricity-or-water--increasing-public-distress/article-127750"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news30.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। नगर निगम कोटा उत्तर के वार्ड नंबर 25 की स्थिति बदहाल होती जा रही है। वार्ड में बने दो सामुदायिक भवन लोगों के लिए सुविधा केंद्र की बजाय परेशानी का कारण बन चुके हैं। इन भवनों में न तो लाइट की व्यवस्था है और न ही पानी उपलब्ध है। जिन भवनों को आमजन की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए बनाया गया था, वे आज जर्जर हालत में खड़े हैं। मरम्मत और देखरेख के अभाव में इन भवनों का उपयोग भी नहीं हो पा रहा है। वहीं संजय नगर में कचरा प्वाइंट लोगों की परेशानी बना हुआ है। नालियां खुली पड़ी हुई हैं।</p>
<p><strong>सुरक्षा व्यवस्था भी अधूरी</strong><br />वार्ड में सुरक्षा व्यवस्था की कमी है। इलाके में असामाजिक तत्वों की आवाजाही को रोकने के लिए कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है। सीसीटीवी कैमरे भी नहीं हैं, जिससे अंधेरे का फायदा उठाकर असामाजिक गतिविधियों को अंजाम देना आसान हो जाता है। वार्ड में गश्त और सुरक्षा इंतजाम पुख्ता किए जाने चाहिए।</p>
<p><strong>संजय नगर का कचरा प्वाइंट बनी बड़ी समस्या</strong><br />संजय नगर क्षेत्र में बना कचरा प्वाइंट लोगों की सबसे बड़ी समस्या बन चुका है। यहाँ कचरे का ढेर लंबे समय तक पड़ा रहता है, जिससे दुर्गंध और गंदगी फैलती है। रहवासियों का कहना है कि बार-बार शिकायत करने के बावजूद नगर निगम इस मुद्दे पर ध्यान नहीं दे रहा।</p>
<p><strong>रहवासियों की मांग, वार्ड में सुधार करे निगम</strong><br />वार्ड 25 के लोग चाहते हैं कि नगर निगम जल्द से जल्द सामुदायिक भवनों की मरम्मत कराए और उनमें लाइट व पानी की सुविधा उपलब्ध कराए। साथ ही, वार्ड में एक पार्क का निर्माण किया जाए ताकि बच्चों और बुजुर्गों को सुविधा मिल सके। कचरा प्वाइंट को व्यवस्थित किया जाए। सबसे अहम, सुरक्षा के लिए वार्ड में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएँ और पुलिस गश्त बढ़ाई जाए।</p>
<p><strong>वार्ड का एरिया </strong><br />संजय नगर, हुसैनी नगर का क्षेत्र शामिल है।</p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />द्वारा वार्ड में कई विकास कार्य करवाए गए हैं। सामुदायिक भवन के लिए कई बार अधिकारियों को लिखित व मौखिक रूप से अवगत करवाया गया, लेकिन कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। सरकार बदलने के साथ ही अधिकारियों का हमारे प्रति व्यवहार भी बदल गया है, जिसके कारण कोई सुनवाई नहीं हो पा रही है।<br /><strong>- फेजल बैग, पार्षद</strong></p>
<p><strong>जर्जर हो रहे सामुदायिक भवन </strong><br />पिछले दोÞ साल से इस वार्ड के दो सामुदायिक भवनों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। इन भवनों में न तो पर्याप्त बिजली और पानी की सुविधा है, और न ही स्वच्छ शौचालय उपलब्ध हैं। अंदर की स्थिति भी जर्जर है, जिससे ये भवन लोगों के लिए सुविधा के बजाय परेशानी का कारण बन गए हैं।<br /><strong>- गुलशन बानो, वार्डवासी </strong></p>
<p><strong>वार्ड में नहीं है पार्क की सुविधा</strong><br />बच्चों और बुजुर्गों के लिए सबसे बड़ी समस्या है पार्क की अनुपस्थिति। रहवासी बताते हैं कि वार्ड में एक भी ऐसा पार्क नहीं है जहा बच्चे खेल सकें और बुजुर्ग सुबह-शाम टहल सकें। हरियाली और खुला वातावरण न होने से लोगों को खुले में शारीरिक गतिविधियों का अवसर नहीं मिलता। इससे क्षेत्रवासियों के स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Sep 2025 14:42:33 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>असर खबर का : नवज्योति ने समाज में किया जागरूकता का संचार, स्कूलों में पहुंचा वन विभाग, कबूतरों से स्वास्थ्य नुकसान से किया रुबरु</title>
                                    <description><![CDATA[नवज्योति की खबरों को वन्यजीव विभाग ने बनाया अवेयरनेस कैम्पेन]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/impact-of-news---navjyoti-spread-awareness-in-the-society--forest-department-reached-schools--made-people-aware-of-the-health-hazards-caused-by-pigeons/article-127022"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(4)7.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कबूतरों के पंखों की फड़फड़ाहट व बीट से पनपने वाले बैक्ट्रीरिया से होने वाली जानलेवा बीमारियां को लेकर दैनिक नवज्योति ने लगातार खबरें प्रकाशित कर समाज व वन विभाग को जागरूक किया। नवज्योति में छपी खबर को  वन्यजीव विभाग कोटा ने अपना अभियान बनाकर जागरूकता कैम्पेन बना लिया। वन अधिकारी व कर्मचारी अब स्कूलों में पहुंच बच्चों को कबूतरों को दाना डालने से प्रकृति के ईको सिस्टम व स्वास्थ्य को होने वाले नुकसान से रुबरु कर रहा है।  शोर्ट मूवी, खबरों की कटिंग के माध्यम से बच्चों को बुनियादी शिक्षा से ही जागरूक किया जा रहा है। वन्यजीव विभाग के डीएफओ अनुराग भटनागर ने नवज्योति के प्रयास सामाजिक सरोकार में सराहनीय है। उन्होंने बताया कि कबूतरों के पंख व बीट में जानलेवा बैक्ट्रीरिया होते हैं, जो हवा के साथ शरीर में प्रवेश करने से फेफड़ों में मधुमक्खी के छत्ते जैसे जाले और फाइब्रोसिस के खड्ढ़े बना देता है। इस पर दवाएं भी असर नहीं करती। ऐसी स्थिति में जान बचाने का एकमात्र विकल्प लंग्स ट्रांसप्लांट ही बचता है। </p>
<p>इधर, सीनियर चेस्ट फिजिशियन डॉ. केवल कृष्ण डंग कहते हैं, कबूतर की बीट और उसके पंख में थर्मोफिलिक एक्टिनोमाइ साइटिस सहित अन्य कीटाणु होते हैं, जो फेफड़ों पर बुरा असर डालते हैं। जो लोग कबूतर पालते हैं या जिनकी बालकनी, रोशनदान में कबूतर आते हैं, उन्हें एलर्जी का न्यूमोनिया होने का खतरा अधिक रहता है। जिसे हाइपरसेंसेटिव न्यूमोनाइटिस कहते हैं। यह रोग फेफड़ों की झिल्ली और श्वास नलियां खराब करता है। जिससे सांस में तकलीफ और खांसी होती है। अगर इसका तुरंत पता नहीं लगाया जाए तो फेफड़े खत्म हो सकते हैं। शरुआती दौर में खांसी बुखार जैसे लक्षण होते हैं, जो टीबी जैसे लगते हैं। भारत में बच्चों में यह बीमारी नहीं के बराबर होती है। लेकिन गत वर्ष 10 वर्षीय बच्ची का जो केस आया, वो मैंने अपने कॅरिअर में पहला मामला देखा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Sep 2025 16:07:44 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>रहस्मयी बीमारी से अचानक गंजे होने लगे थे ग्रामीण, अब टूटने लगे नाखून, लोगों में दहशत </title>
                                    <description><![CDATA[महाराष्ट्र के बुलढाणा ज़िले के कई गाँव में एक रहस्मयी बीमारी के चलते लोगों में दहशत बढ़ गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/the-villagers-were-suddenly-getting-bald-due-to-mysterious-illness/article-111221"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-04/1122.png" alt=""></a><br /><p>मुबंई। महाराष्ट्र के बुलढाणा ज़िले के कई गाँव में एक रहस्मयी बीमारी के चलते लोगों में दहशत बढ़ गई है। कई गाँवों के लोगों के अचानक से नाखून टूटकर गिरने लगे, जिससे हर तरफ डर का माहौल बन गया है।</p>
<p>कुछ महीने पहले, महाराष्ट्र के कई गांवों में लोग अचानक गंजे होने लगे थे, जिसको एक रहस्मयी बीमारी का नाम दिया गया था। अब वहां से एक और चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले में शेगांव तालुका के चार गांवों में करीब 30 लोगों के अचानक से नाखून टूटकर गिर रहे हैं। ये 30 लोग नाखूनों की विकृति से पीड़ित हैं, सभी मरीजों की चिकित्सकीय जांच की जा रही है।</p>
<p>शेगांव तालुका से दिसंबर 2024 और इस साल जनवरी के महीने में कई लोग गंजेपन का शिकार हो गए थे। कई लोगों ने अचानक गंजेपन और बालों के तेजी से झड़ने की शिकायत की थी, जिसके चलते कुछ विशेषज्ञों ने राशन की दुकानों के जरिए बांटे जा रहे गेहूं में गड़बड़ी का दावा किया था और बताया था कि गेहूं में अधिक मात्रा में ‘सिलीनियम’ खाए जाने की वजह से ऐसा हो रहा है।</p>
<p>अब अचानक लोगों के नाखून टूटकर कर गिरने पर बुलढाणा के स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. अनिल बांकर ने कहा- शेगांव तालुका के चार गांवों में 29 लोगों के नाखून विकृत पाए गए हैं और कुछ के नाखून टूटकर गिर गए हैं। उन्हें प्राथमिक उपचार दिया जा रहा है और आगे की जांच के लिए उन्हें शेगांव के एक अस्पताल में भेजा जाएगा।</p>
<p>बांकर ने कहा कि प्रारंभिक जानकारी के अनुसार यह समस्या लोगों द्वारा खाए जाने वाले गेहूं में ‘सिलीनियम’ की मात्रा ज्यादा होना इसका परिणाम हो सकती है, क्योंकि जिन लोगों के बाल झड़ रहे हैं और उन्हें नाखून गिरने की समस्या भी हो रही है।</p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 18 Apr 2025 14:21:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>टीबी के खिलाफ तेज करनी होगी जंग</title>
                                    <description><![CDATA[भारत काफी लंबे समय से टीबी नामक बिमारी से जंग लड़ रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/war-will-have-to-be-intensified-against-tb/article-108469"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-03/257rtrer-(8)16.png" alt=""></a><br /><p>भारत काफी लंबे समय से टीबी नामक बिमारी से जंग लड़ रहा है, लेकिन अब टीबी को लेकर एक डरावनी स्टडी सामने आई है। स्टडी के मुताबिक भारत में अनुमान है कि 2021 से 2040 तक टीबी के 6 करोड़ केस और 80 लाख मौतें हो सकती है। स्टडी के मुताबिक भारत को इस बिमारी के चलते न सिर्फ जान का नुकसान होगा, बल्कि  सकल घरेलू उत्पाद को 146 अरब डॉलर से अधिक का नुकसान होने की संभावना है। लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन यूके के रिसर्चर ने कहा कि इसके चलते कम आय वाले मिडिल क्लास परिवार ज्यादा संकट में हैं। उनको स्वास्थ्य संबंधी बोझ झेलना पड़ सकता है। जबकि अमीर परिवारों को आर्थिक बोझ झेलना पड़ सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वैश्विक क्षय रोग रिपोर्ट 2024 जारी किया है। जिसमें 2024 में दुनिया की 99 प्रतिशत से अधिक आबादी और टीबी के मामलों वाले 193 देशों के डाटा की रिपोर्ट को शामिल किया गया है। यह रिपोर्ट वैश्विक, क्षेत्रीय और देश स्तर पर टीबी महामारी एवं रोग की रोकथाम, निदान और उपचार में प्रगति का व्यापक व अद्यतन मूल्यांकन प्रदान करती है। रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष के अनुसार 2023 में भारत में लगभग 25.2 लाख टीबी के मामले सामने आए थे। जो 2022 में 24.2 लाख मामलों से अधिक थे। </p>
<p>भारत और इंडोनेशिया में वर्ष 2021 से 2023 तक टीबी के वैश्विक मामलों में कुल वृद्धि 45 प्रतिशत थी। दुनिया के पांच देश भारत, इंडोनेशिया चीन, फिलीपींस, पाकिस्तान में टीबी के कुल वैश्विक मरीजों के 56 प्रतिशत थे। भारत में वर्ष 2015 से 2023 के मध्य टीबी के मामलों में 18 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा वर्ष 2025 तक 50 प्रतिशत कमी के लक्ष्य से बहुत कम है। इसी प्रकार टीबी से संबंधित मौतों में 75 प्रतिशत के लक्ष्य के मुकाबले केवल 24 प्रतिशत की कमी आई है। वैश्विक स्तर पर 2023 में 82 लाख लोगों में टीबी के नए मामलें देखे गए। यह वर्ष 1995 में डब्ल्यूएचओ द्वारा निगरानी शुरू करने के बाद से सबसे अधिक संख्या है। 2023 में टीबी कोविड-19 को पीछे छोड़ते हुए पुन प्रमुख संक्रामक रोग बन गया है। टीबी एक संक्रामक बीमारी है। जो संक्रमित लोगों के खांसने, छींकने या थूकने से फैलती है। यह आमतौर पर फेफड़ों को प्रभावित करती है। लेकिन यह शरीर के किसी भी हिस्से में फैल सकती है। इस बीमारी का इलाज तो है बशर्ते लोग नियमित रूप से दवा लें। हर वर्ष 24 मार्च को पूरे विश्व में टीबी  दिवस मनाया जाता है। इस दिन टीबी यानि तपेदिक रोग के बारे में लोगों को जागरूक किया जाता है। भारत में बहुत बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजार रही है। देश में जब तक गरीबी दूर नहीं होगी तब तक टीबी पर पूर्णतया रोक नहीं लग पाएगी। </p>
<p>एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में स्वास्थ्य सेवा का बड़ा ढांचा कमजोर है और स्वास्थ्य कर्मचारियों की भारी कमी है। इसके अलावा बीमारी का शुरुआती दौर में पता लगने में दिक्कत और सही इलाज का मिलना चुनौती बनी हुई है। विश्व में भारत पर टीबी का बोझ सबसे अधिक है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में टीबी उन्मूलन को प्राथमिकता के तौर पर लिया गया है। इसका उद्देश्य टीबी के नए मामलों में 95 प्रतिशत की कमी करना और टीबी से मृत्यु में 95 प्रतिशत की कमी लाना है। देश में जिन टीबी रोगियों का इलाज चल रहा है, उन्हें सरकार 500 रुपए प्रतिमाह नगद सहायता के रूप में दे रही हैं। टीबी माइक्रोबैक्टीरियम नामक बैक्टीरिया की वजह से होता है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में रोजाना करीब आठ सौ लोगों की मौत टीबी की वजह से हो जाती है। भारत में टीबी के करीब 10 प्रतिशत मामले बच्चों में हैं। लेकिन इसमें से केवल छह प्रतिशत मामले ही सामने आते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि भारत में टीबी के केवल 58 प्रतिशत मामले ही दर्ज होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि भारत टीबी से निपटने को लेकर गंभीर नहीं है।</p>
<p>अपनी ग्लोबल टीबी रिपोर्ट में उसने हमारे आंकड़ों पर भी सवाल उठाया है। उसके मुताबिक भारत ने टीबी के जितने मामले बताए हैं। वास्तव में मरीज उससे कहीं ज्यादा हैं। भारत के गलत आंकड़ों की वजह से इस रोग का विश्वस्तरीय आकलन सही ढंग से नहीं हो पाया है। पिछले कुछ समय से टीबी के कई नए रूप सामने आ गए हैं। कई मानसिक बीमारियां टीबी का बड़ा कारण बनकर उभरी हैं। इस बीमारी को लेकर हमे नजरिया बदलने की जरूरत है। सरकार को परम्परागत तौर-तरीके से बाहर निकलना होगा। टीबी से निपटने के लिए सरकार को निजी क्षेत्र के साथ मिलकर व्यापक योजना बनानी होगी। टीबी का संबंध पोषण से जुड़ा रहता है। भूखे पेट रोगों से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है। इसलिए टीबी की बीमारी के शिकार गरीब तबके के लोग ज्यादा होते हैं। </p>
<p>पोषण से मतलब संतुलित भोजन से माना जाना चाहिए। इसलिए यहां पर केवल टीबी का इलाज मुहैया करा भर देने से टीबी का खात्मा संभव नहीं है। यह तब मुमकिन होगा जबकि देश में लोगों को रोग प्रतिरोधक ताकत बनाए रखने के लिए संतुलित आहार भी मिले। टीबी के प्रति लोगों को सचेत करने के लिए देश भर में टीबी जागरूकता कार्यक्रम चलाने होंगे। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य केन्द्रों की संख्या बढ़ाकर ही टीबी पर काबू पाया जा सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक सरकार को इस क्षेत्र में एक ठोस अभियान शुरू करना होगा और साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इस जानलेवा बीमारी पर काबू पाने की राह में पैसों की कमी आड़े नहीं आए।  </p>
<p><strong>-रमेश सर्राफ धमोरा </strong><br /><strong>(ये लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 24 Mar 2025 11:24:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>युवाओं में पिछले साल से इस साल 10 फीसदी हार्ट अटैक बढ़े</title>
                                    <description><![CDATA[30 से 40 की उम्र के लोगों को ज्यादा आ रहा साइलेंट अटैक । 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/heart-attacks-among-youth-increased-by-10--this-year-compared-to-last-year/article-105048"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-02/257rtrer87.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। <strong>केस 1 - हॉकी खेलते आया अटैक </strong><br />शहर के वर्कशॉप के मैदान में 26 जनवरी को 30 साल के कोचिंग अध्यापक पकंज सोनी की  हॉकी खेलते समय खेल के दौरान अचानक उसकी तबीयत बिगड़ गई।  साथी खिलाड़ी उसे अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन तब तक उसकी मृत्यु हो चुकी थी। मृतक का विवाह लगभग एक वर्ष पहले ही हुआ था। </p>
<p><strong>केस 2 - पुलिस ट्रेनिंग के दौरान हुई मौत</strong><br />झालरापाटन में 18 फरवरी को  पुलिस ट्रैनिग सेंटर में प्रशिक्षण ले रहे 28 साल के जवान जितेंद्र सिंह को अचानक सीने में दर्द हुआ। दर्द बढ़ने पर अस्पताल लेकर गए वहां उसकी मौत हो गई। </p>
<p><strong>केस 3 - समय पर इलाज मिलने से बची जान</strong><br />कुन्हाडी क्षेत्र में 16 फरवरी को बाइक चलते 45 वर्षीय अधिवक्ता अश्विनी शर्मा को अचानक सीने में दर्द हुआ। उन्होंने यातायात कर्मियों से सहायता ली उन्हें भी साइलेंट अटैक आया उन्हें तुरंत सीपीआर देकर अस्पताल पहुंचाया। जिससे उनकी जान बच गई। </p>
<p><strong>केस 4 - समय पर अस्पताल पहुंचने से बची जान</strong><br />15 जनवरी को 32 साल के  राहुल बैरागी  को अचानक चक्कर आया गिर पड़ा अस्पताल लेकर गए जांच साइलेट अटैक आना बताया युवक कोलेस्टॉल बढ़ा हुआ था। इस दौरान युवक लीवर और किडनी में समस्या हो गई है। युवक इलाज चल रहा है। वहीं कुन्हाडी में एक युवक बाइक चलाने के दौरान अचानक सीने में दर्द हुआ। गाड़ी रोकर डिवाइड पर बैठ गया लोगों ने उसे अस्पताल पहुंचाया उसको साइलेट अटैक आया। यह तो एक उदाहरण है ऐसे केस रोज आठ से दस आ रहे है। खराब जीवनशैली, खानपान, शारीरिक व्यायाम की कमी और कम पौष्टिक वाले आहार के कारण युवा  में हाई कोलेस्ट्रॉल के स्तर में वृद्धि हो रही है।</p>
<p>कोटा में युवाओं में तेजी से साइलेंट अटैक के मामले बढ़ रहे। पिछले साल की अपेक्षा इस साल दस फीसदी अटैक के मामले बढ़ गए है। हर साल बड़ी संख्या में लोग इस घातक बीमारी के शिकार हो रहे हैं। दिल की बीमारियों के कारण ही हर साल बढ़ी संख्या में लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ रही है। इसका एक सबसे बड़ा कारण लाइफ स्टाइल और खराब खानपान है। इसमें हार्ट ब्लॉकेज की समस्या आम होती जा रही है। बुजुर्गों में होने वाली यह बीमारी युवाओं को भी तेजी से प्रभावित कर रही है। युवा वाहन चलाते समय, खेलते समय और कम्प्यूटर पर काम करने के दौरान अटैक के शिकार हो रहे है। हाड़ौती संभाग में पिछले कुछ महीनों से कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसमें युवाओं की संख्या ज्यादा हो गई है। शरीर में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा अधिक होने पर नींद में हार्ट अटैक या फिर ब्रेन स्ट्रोक का खतरा बढ़ रहा है। एमबीएस, नवीन चिकित्सालय अस्पताल की ओपीडी में आने वाले मरीजों में रोजाना 100 से अधिक मरीजों का कोलेस्ट्रॉल टेस्ट कराया जा रहा है। जिसमें से 75 फीसदी मरीजों को दिक्कत मिल रही है। इसमें 60 से 65 फीसदी युवा वर्ग के पुरुष व महिलाएं शामिल हैं। इसका बड़ा कारण ये सामने आ रहा है कि लोगों का लाइफ स्टाइल डिस्टर्ब हो गया है। </p>
<p>इस वजह से युवाओं में भी बढ़ रहा हार्ट अटैक का खतरा: वरिष्ठ हार्ट रोग विशेषज्ञ डॉ. हंसराज मीणा ने बताया कि आजकल युवाओं में हार्ट अटैक के केस बढ़ रहे पिछले साल की अपेक्षा इस साल दस फीसदी बढोत्तरी हुई है। हम जो भी खाना या फूड खाते हैं, उसका असर हमारी धमनियों पर पड़ता है। अधिक तला हुआ, फैट युक्त और मीठा खाना खाने से शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाता है। ये धीरे-धीरे धमनियों में जमा होकर उन्हें संकरा कर देता है। इसके कारण ब्लड सकुर्लेशन रुक जाता है। जब रक्त हृदय तक नहीं पहुंच पाता तो दिल का दौरा या स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। रक्त वाहिकाएं शरीर के तापमान को बनाए रखने के लिए अधिक मेहनत करती हैं। इससे ब्लड प्रेशर और हृदय गति बढ़ जाती है। इससे हार्ट को खून पंप करने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है। ऐसी स्थिति में हार्ट में ब्लॉकेज और अटैक का खतरा अधिक बढ़ जाता है।</p>
<p><strong>ऐसे पहचानें कि दिल का दौरा पड़ा है</strong><br />इसकी पहचान आसान है। मुट्ठी बांधकर सीने पर जहां दर्द हो वहां रखें। जहां मुट्ठी रखी है, उसके पूरे हिस्से में दर्द हो रहा है और छाती से गर्दन या बाएं हाथ की ओर बढ़ रहा है। यह दर्द 20 मिनट से ज्यादा समय रह रहा है तो हार्ट अटैक होने की आशंका अधिक रहती है। यह कई बार बैठे-बैठे होता है तो कई बार चलने पर। इसके अलावा सांस लेने में दिक्कत, पैरों में पसीना आना, चक्कर व बेहोशी महसूस होना भी इसके लक्षण हैं।</p>
<p><strong>ऐसे कर सकते बचाव</strong><br />डॉ. संजय सायर ने बताया कि हार्ट अटैक को पहले दवा से कंट्रोल किया जा सकता है और फिर उसे कम किया जा सकता है, लेकिन उन्होंने बताया कि शुरूआत में दवा जरूरी है। दवा के अलावा, रोगी के लिए भोजन और पेय पर भी पूरा ध्यान देना महत्वपूर्ण है। ऐसे फूड्स खाएं जो शरीर में खून के थक्के और रुकावटों को कम करते हैं। इसके अलावा सुनिश्चित करें कि आपके आहार में काबोर्हाइड्रेट और फैट कम हो सकता। इसके अलावा प्रोटीन और विटामिन से भरपूर फूड्स खाएं। हार्ट की हेल्थ के लिए मानसिक तनाव एक अहम योगदान देता है। ऐसे में मानसिक तनाव से बचने के लिए समय पर सोएं और समय पर उठें, शरीर को अच्छा आराम मिले और स्ट्रेस फ्री माइंड रहे। हार्ट की हेल्थ के लिए कुछ जरूर बातों का ध्यान रखना बहुत ही आवश्यक है। इससे हार्ट की हेल्थ अच्छी बनी रहती है। इसमें उचित आहार और व्यायाम से इसे काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है। समय पर ध्यान देने से दवाओं और जीवनशैली में बदलाव के साथ धमनी स्वास्थ्य में सुधार किया जा सकता है। प्रतिदिन 30-40 मिनट तेज चलना, योग और प्राणायाम करने से हार्ट मजबूत होता है। साइकिल चलाना, तैरना और हल्की दौड़ना भी लाभदायक है। इसके अलावा ध्यान और गहरी सांस लेना भी दिल के लिए अच्छा होता। रात को अच्छी नींद लें, क्योंकि कम नींद का दिल पर बुरा असर पड़ता है। </p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />एक स्वस्थ व्यक्ति के दिल की नसों में क्लॉटिंग परत जमा होती है। तनाव लेने पर बीपी बढ़ने से कई बार वह परत फट जाती है। इससे हार्ट अटैक आ जाता है। युवाओं व खिलाड़ियों को भी समय समय पर अपनी कॉर्डियक जांच अवश्य करवानी चाहिए।<br /><strong>- डॉ. हंसराज मीणा, हृदय रोग विशेषज्ञ, आचार्य कोटा मेडिकल कॉलेज</strong></p>
<p>युवाओं हार्ट अटैक के बढ़ते मामलों में सबसे ज्यादा तो अनहेल्दी लाइफ स्टाइल, लंबे समय तक बैठकर काम करना। जंकफूड्स और तैयार फूड्स का प्रयोग ज्यादा करना, जॉब को लेकर युवाओं तनाव की अधिकता, युवाओ  में स्वास्थ्य को लेकर जागरुकता की कमी है। युवा को चेस्ट समस्या होती वो इसको गैस और सीने का दर्द मानकर इंग्नोर करता है। जिससे युवाओ हार्ट अटैक के केस बढ़ रहे। <br /><strong>- डॉ. मनोज सलूजा, आचार्य विभागाध्यक्ष मेडिसन विभाग मेडिकल कॉलेज कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 21 Feb 2025 15:15:15 +0530</pubDate>
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                <title>प्रदूषण के कारकों पर चर्चा, प्रदूषण ले रहा प्रतिवर्ष 23 लाख की जान</title>
                                    <description><![CDATA[अधिकांश मौत के पीछे छिपा प्रदूषण, 70 फीसदी बीमारियों का संवाहक।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/pollution-is-taking-23-lakh-lives-every-year/article-101661"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-01/untitled-design-(1).png" alt=""></a><br /><p>कोटा। दैनिक नवज्योति के कोटा कार्यालय में प्रतिमाह आयोजित होने वाली परिचर्चा की श्रंखला के तहत मंगलवार को प्रदूषण के कारकों पर चर्चा की गई। पॉल्यूशन केन बी डेंजरस फॉर एक्जीसटेन्स ऑफ लिविंग बीइंग विषय पर आयोजित इस परिचर्चा में 17 विषय विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। इनमें प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नगर निगम,श्वांस रोग विशेषज्ञ, पर्यावरण विद, इंटेक के कन्वीनर,पर्यावरण संरक्षण कार्य में जुटी संस्थाएं, नदी संरक्षण से जुड़े सदस्य,बायो वेस्ट मैनेजमेंट, परिवहन विभाग, राजस्थान टेक्निकल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर,इनवायरमेंट साइंस,वनस्पति,जमीन,अर्थात जल, थल और नभ के प्रदूषण से बन रहे हालातों पर विशेषज्ञों ने चर्चा की और यह माना कि प्रदूषण को रोकना केवल सरकार के भरोसे नहीं हो सकता। इसकी भयावहता को लोग समझ नहीं रहे हैं। अब जागरुकता नहीं अपितु सख्ती से प्रदूषण नियंत्रण करवाने की जरूरत है अन्यता हालात खतरनाक स्थर पर पहुंच जाएंगे। आने वाली पीढ़ियां इस समस्या के कारण बन रही स्थिति का सामना तक नहीं कर पाएंगी।  प्रस्तुत है परिचर्चा के मुख्य अंश:-</p>
<p><strong>पूरे देश में सीओपीडी बीमारी में राजस्थान अव्वल</strong><br />एक-एक महीने तक खांसी ठीक नहीं होती,क्योंकि यह एलर्जी में तब्दील हो गई। जिसका मुख्य कारण पॉल्यूशन इम्पैक्ट है। कोहरे के कारण प्रदूषण के कण वायुमंडल में नहीं जा पाते और हवा में ही रहते हैं, जो सांस के साथ शरीर में प्रवेश करते हैं जो बीमारियों का कारण बनता है। धुएं में अनगिनत कैमिकल्स होते हैं, जो हवा के साथ शरीर में जाने से दमा, अस्थमा, एलर्जी, खांसी, आंखों में जलन, दिमाग, गुर्दे, फेफड़े के कैंसर, सांस का अटैक व दिल से संबंधित बीमारियों का खतरा रहता है। हालांकि, दमा बीड़ी पीने से होता है लेकिन यह रोग उन लोगों को भी होता है जो बीड़ी नहीं पीते। यह बीमारी मुख्यत: पॉल्यूशन से होती है। पूरी दुनिया में सीओपीडी बीमारी में इंडिया टॉप पर है और भारत में राजस्थान अव्वल है। इस बीमारी के मरीज पूरी दुनिया के कई देशों के मुकाबले राजस्थान में सबसे ज्यादा हैं।  मुख्य कारण 70% पॉल्यूशन है। हर साल  23 लाख मौत वायु प्रदूषण से होती है। सीओपीडी बीमारी फेफड़ों को हमेशा के लिए डेमेज कर सकती है।  <strong>- डॉ. राजेंद्र ताखर, श्वांस रोग विशेषज्ञ, मेडिकल कॉलेज कोटा </strong></p>
<p><strong>प्रदूषण नियंत्रण सरकार की प्राथमिकता में ही नहीं</strong><br />पॉल्यूशन कंट्रोल नियमों की पालना के लिए जो संसाधनों की आवश्यकता होती है वो पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड को सरकार उपलब्ध नहीं करवा रही। पर्यावरण विभाग को विकास में व्यवधान मानते हुए पर्यावरण कानून व नियमों को दिन-प्रतिदिन कमजोर करने पर तुली है। जिसके उदारहण शहरभर में देखने को मिल रहे हैं। चंबल नदी में गिरते सीवरेज, चंद्रलोही व नालों में इंडस्ट्री का कैमिकलयुक्त  वाटर गिर रहा है। सरकार पम्प स्टोरेज प्रोजेक्ट लगाकर प्रदेशभर में 4 हजार हैक्टेयर वनभूमि में फैला जंगल को तबाह करने पर तुली है। बरसों पुराना जंगल खत्म होने से इंसान ही नहीं जानवरों व पक्षियों का अस्तित्व भी संकट में आ जाएगा।<br /><strong>- तपेश्वर सिंह भाटी, पर्यावरणविद् एवं एडवोकेट</strong></p>
<p><strong>पॉल्यूशन के खिलाफ सख्ती की जरूरत</strong><br />शहर का सीवरेज बिना ट्रीटमेंट के चंबल में गिर रहा है। जिससे चंबल नदी व घड़ियाल सेंचूरी प्रदूषित हो रही है। जल प्रदूषण रोकने की दिशा में प्रभावी पहल नहीं हो पा रही, क्योंकि आम आदमी इससे कनेक्ट नहीं हो रहा। जबकि, इसे जनजागरण आंदोलन बनाकर लोगों को जागरूक करना चाहिए कि पॉल्यूशन किस तरह से हमारा जीवन बर्बाद कर रहा है। जब लोग जागरूक होंगे तो सरकारी मशीनरी प्रदूषण कंट्रोल करने को प्रभावी कदम उठाने को मज् ाबूर होगी। यह प्रयास स्वस्थ समाज के निर्माण में मील का पत्थर साबित होगा। <br /><strong>- डॉ. अमित व्यास, संयोजक चिकित्सा प्रकोष्ठ भाजपा, पूर्व अध्यक्ष आईएमए</strong></p>
<p><strong>जल-मिट्टी प्रदूषण ज्यादा घातक</strong><br />प्रदूषण का मुख्य कारण वाहनों व इंडस्ट्रीज से निकलने वाला धुआं है। अन्य कारक भी जीवन के लिए उतने ही घातक है, जितना वायु प्रदूषण। पानी और मिट्टी का पॉल्यूशन हमारी खाद्य शृंखला में शामिल हो जाते हैं, जो भोजन के रूप में शरीर में जाते हैं और कैंसर तक की बीमारियों का खतरा उत्पन्न हो जाता है। पानी के जरिए पॉल्यूशन पॉटिकल्स मिट्टी में आते हैं और फसलों के द्वारा हमारे खाद्य पदार्थ में आ जाते हैं। वायु प्रदूषण तो दिखाई देता है लेकिन जल व मिट्टी का पॉलयूशन दिखाई नहीं देता। जबकि, यह प्रदूषण शरीर के लिए ज्यादा घातक होता है। वहीं, रेडिएशन भी शरीर को कई तरह से बीमारियों के जाल में जकड़ता है। इनसे बचाव के लिए सरकार को प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है। <br /><strong>- पूनम जायसवाल, प्रोफेसर बोटनी, जेडीबी साइंस कॉलेज</strong></p>
<p><strong>वाहनों से सबसे अधिक प्रदूषण</strong><br />कोटा समेत प्रदेश के बड़े शहरों  में आईआईटी जोधपुर की टीम ने प्रदूषण को लेकर सर्वे किया था। जिसमें यह बात सामने आई कि कोटा में  सबसे अधिक वायु प्रदूषण वाहनों से हो रहा है। वैसे यहां उद्योगों से भी प्रदूषण तो हो रहा है लेकिन वह इतना अधिक नहीं है। ऐसे में सड़कों पर दौड़ रहे पुराने वाहनों पर रोक लगाने की जरूरत है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड समय-समय पर कार्रवाई करता रहता है। <br /><strong>- डॉ. रिंकु सिंघल, वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड</strong></p>
<p><strong>अस्पताल में रखे 4 रंग के वेस्ट डस्टबिन के प्रति जागरूक करना चाहिए</strong><br />अस्पताल में 4 रंग के अलग-अलग डस्टबिन रखे होते हैं, जिसमें काले रंग का डस्टबिन जनरल वेस्ट के लिए होता है और शेष नीला, पीला और सफेद रंग का डस्टबिन मेडिकल बायोवेस्ट के लिए होता है। यह बात लोगों को पता होनी चाहिए। इसके लिए जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए। अक्सर जानकारी के अभाव में तीमारदार मरीज की मरहम पट्टी, दवा, इंजेक्शन, स्केल्टर को जनरल वेस्ट के डस्टबिन में पटक देते हैं। यह वेस्ट नगर निगम के डम्पिंग यार्ड में जाता है। जहां संक्रमण का खतरा  बना रहता है। मेडिकल बायोवेस्ट के निस्तारण के लिए निर्धारित तापमान में जलाया जाता है, इसका प्लांट झालावाड़ में है। वहीं, अस्पतालों से निकलने वाला वाटर वेस्ट को ईपीपी व एसटीपी द्वारा ट्रीटमेंट किए जाने की आवश्यकता है। अब मेडिकल कॉलेज में एसटीपी का निर्माण हो चुका है। <br /><strong>- डॉ. प्रवीण कुमार, नोडल आॅफियर बायो मेडिकल वेस्ट </strong></p>
<p><strong>मौत का प्रतिशत बढ़ा रहा प्रदूषण </strong><br />चार बड़े विश्वविद्यालयों की टीम ने रिसर्च किया है। जिसमें सामने आया कि देश  में पीएम 2.5 सबसे अधिक खतरनाक स्थिति है।  देश में हर साल करीब 23 लाख लोगों की मौत हो रही है। जिसमें पीएम 2.5 के कारण मृत्यु दर 5 फीसदी बढ़ जाती है। वायु प्रदूषण का इतना अधिक खतरनाक असर होता है कि नॉन स्माकर भी रोजाना सामान्य तौर पर 3 से 4 सिगरेट का धुंआ रोजाना अपने शरीर में ले रहे है। प्रदूषण का स्तर अधिक होने पर यह  मात्रा दोगुनी तक हो जाती है। शहर में सबसे अधिक प्रदूषण चौराहों पर है। प्रदूषण के कारण कई तरह की बीमारियां लोगों में हो रही है। जिसके बारे में लोगों को पता ही नहीं है। <br /><strong>- डॉ. केवल कृष्ण डंग श्वांस व अस्थमा रोग विशेषज्ञ</strong></p>
<p><strong>इलेक्ट्रिक वाहनों का बढ़े चलन</strong><br />15 साल से अधिक पुराने वाहनों से अधिक वायु प्रदूषण होता है। इस कारण से उन वाहनों को हटाया जा रहा है। आने वाले समय में अधिकतर इलेक्ट्रिक वाहनों का ही उपयोग अधिक होगा। परिवहन विभाग के पास प्रदूषण फेलाने वाले वाहनों पर कार्रवाई के लिए 18 स् कवायर्ड वैन है। लेकिन उनमें स्टॉफ की कमी है। इसकी टीम को अन्य स्थानों पर काम में लेने से पूरी तरह से कार्रवाई नहीं  हो पाती।  <br /><strong>- राजीव त्यागी, अतिरिक्त क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी कोटा </strong></p>
<p><strong>हार्ट अटैक व स्ट्रॉक का कारण प्रदूषण</strong><br />वायु प्रदूषण मनुष्य के  लिए सबसे अधिक खतरनाक है। चौराहे पर खड़ा ट्रैफिक का सिपाही इससे सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है। प्रदूषण के कारण केवल  अस्थमा  रोग ही नहीं होता। यह जन्म लेने वाले बच्चे से लेकर युवा तक को प्रभावित कर रहा है। इन दिनों जो हष्ट पुष्ट  व सैर करने वाले लोगों की अचानक मौत हो रही है। इसमें हार्ट अटैक व स्ट्रॉक का सबसे बड़ा कारण प्रदूषण है। इसे रोकने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों का अधिक उपयोग हो। साथ ही पार्किंग स्थानों पर उनके चार्जिंग पॉइंट दिए जाएं। <br /><strong>- डॉ. सुधीर गुप्ता, नेत्र विशेषज्ञ, संयोजक हम लोग</strong></p>
<p><strong>एंटी स्मॉग गन का नियमित संचालन</strong><br />वायु प्रदूषण के कारण धूल के करण हवा में रहकर लोगों को प्रभावित करते है। इसके लिए नगर निगम के माध्यम से सबसे अधिक प्रदूषित क्षेत्रों व चौराहों पर एंटी स्मॉग गन से पानी का छिड़काव किया जा रहा है।जिससे धूल के कण नीचे बैठने से धीरे तौर पर लोगों  पर असर नहींडाल रहे। वहीं आने वाले समय मे‘कोटा में निगम के माध्यम से 100 इलेक्ट्रिक बसें आने वाली है। जिससे शहर के प्रदूषण स्तर को कम करने में मदद मिलेगी।  <br /><strong>- दीपक मेहरा, पर्यावरण विशेषज्ञ</strong></p>
<p><strong>थर्मल को बंद करना होगा</strong><br />शहर में सबसे अधिक प्रदूषण थर्मल के कारण हो रहा है। प्रदूषण नियंत्रण के लिए इसे बंद किया जाना चाहिए। जब कई बड़े शहरों में थर्मल बंद किए जा सकते है तो यहां क्योंनहीं हो सकता। इसकी इकाइयों को बार-बार बंद भी तो किया जाता है। इसके स्थान पर सौर ऊर्जा का अधिक उपयोग हो। शहरों  में ग्रीन एनर्जी का अधिक उपयोग होगा तो प्रदूषण पर कंट्रोल किया जा सकता है। वाहन इलेक्ट्रिक हों और हर पार्किंग में इसके चार्जिंग स्टेशन व पाइंट बनाए जाएं। चार्जिंग के हिसाब से उनका यूपीआई से चार्ज लिया जाएगा तो प्रदूषण पर काफी हद तक नियंत्रण किया जा सकता है। <br /><strong>- राजू गुप्ता, सेवानिवृत्त सीईओ</strong></p>
<p><strong>जागरूकता की जरुरत</strong><br />शहर में बढ़ता प्रदूषण सभी के लिए खतरनाक है। प्रदूषण से होने वाले नुकसान के बारे में जानते तो सभी है लेकिन लोगों में उससे बचने के प्रति जागरूकता की कमी है। लोग प्रदूषण की भयावयता को समझ नहीं पा रहे है। जागरूक होंगे तो प्रदूषण को रोकने व कम करने में सहयोग करेंगे।  <br /><strong>- डॉ. अभि गर्ग, वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड</strong></p>
<p><strong>पुरानी इमारतें व मॉन्यूमेंट भी प्रभावित</strong><br />शहर में प्रदूषण का कारण थर्मल है। इसे बंद किया जाना चाहिए। साथ ही इससे निकलने वाले फ्लाईएश और भी अधिक खतरनाक है। फ्लाई एश को जोराबाई तालाब में भर दिया। जिससे वहां पक्षियों का आना बंद हो गया है। मछलियों के मरने से उनकी संख्या भी कम हो गई है।  वायु प्रदूषण न केवल प्राणियों को प्रभावित कर रहा है वरन् इससे पुरानी इमारतें व मॉन्यूमेंट तक प्रदूषित हो रहे है। जिससे 500 साल तक टिकने वाली इमारतें 100 साल भी नहीं टिक रही है। उनका रंग फीका हो रहा है। प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए सभी को मिलकर प्रयास करने होंगे। <br /><strong>- नखिलेश सेठी, संयोजक, इनटेक </strong></p>
<p><strong>कोयले की जगह गैस पर बने बिजली </strong><br />थर्मल पावर प्लांट कितना प्रदूषण कर रहा है, इसके आंकड़े सार्वजनिक कर पब्लिक को बताना चाहिए। दिखने में तो पॉल्यूशन ज्यादा नजर आता है लेकिन उसके मैजरमेंट क्या आ रहे हैं, इससे लोगों को पता लगेगा कि थर्मल से कितना पॉल्यूशन हो रहा है। इसके अलावा थर्मल की जो यूनिट पुरानी हो गई है, उसे गैस से कनेक्ट किया जाए। गैस की पाइप लाइन को बॉयलर से जोड़ा जाए तो बिजली बनाने के लिए कोयले की निर्भरता खत्म होगी और प्रदूषण भी नहीं होगा। इसके लिए सरकार बजट का प्रावधान करे। वहीं, सौलर को प्रमोट करने की आवश्यकता है। लेकिन समस्या यह है कि सौलर दिन में उपलब्ध होता है, रात को नहीं। ऐसे में सरकार बिजली की रेट  दिन में कम और रात को थोड़ी ज्यादा रख दे। इससे लोग सौलर की बिजली का उपयोग करने को प्रेरित हो सकेंगे। <br /><strong>- डॉ. आनंद चतुर्वेदी, प्रोफेसर मेकैनिकल हैड इंजीनियरिंग, आरटीयू</strong></p>
<p><strong>जीवन के लिए खतरा बन रही पॉलिथीन</strong><br />सिंगल यूज्ड पॉलिथीन के उपयोग पर सरकार ने बैन लगा रखा है, लेकिन बाजार में इसका असर नहीं दिखता। जबकि, पॉलिथीन जीवन के लिए  खतरा है। मिट्टी में फेंकी गई पॉलिथीन से मृदा में रहने वाले सुक्ष्मजीवों को नुकसान पहुंचाती है। क्योंकि, इसमें ऐसे रसायन होते हैं जो मिट्टी के कणों के भीतर पौधों व जीवों के लिए जहरीले हैं और  फसलों के द्वारा यह जहर हमारे फूड चैन में शामिल हो रहा है। वहीं, पानी को भी प्रदूषित कर रही है। जिससे जीवन चक्र गंभीर बीमारियों की जद में आ गया। इसे रोकने की शुरुआत हमें घर से ही करनी होगी। <br /><strong>- प्रियंका गुप्ता, फाउंडर एंड प्रेसीडेंट अभिलाषा क्लब </strong></p>
<p><strong>सुंदरता के नाम पर शहर में लग रहे एलर्जिक पौधे </strong><br />शहर में सुदंरता के नाम पर बाहर से लाई गई विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगा दिए गए। जिनमें कोनोकार्पस, लेंटाना, पार्थेनियम हिस्टेरोपफोरस, बबूल सहित कई प्लांट शामिल हैं, जो दिखने में जितने सुंदर हैं उतने ही दुष्परिणाम भी हैं। असल में यह प्लांट एलर्जिक है। वहीं, एयर पॉल्यूशन कंट्रोल करने में इनकी भूमिका नगण्य है। इनकी जगह पीपल, आंवला, बरगद, नीम, धौंक सहित नेचुरल उगने वाले पौधे ज्यादा से ज्यादा लगाए जाना चाहिए, जो एयर पॉल्यूशन को कंट्रोल करने में कारगर होते हैं।  <br /><strong>- डॉ. मृदुला खंडेलवाल, एसोसिएट प्रोफेसर बोटनी, कोटा यूनिवर्सिटी</strong></p>
<p><strong>पौधे लगाने से पहले विशेषज्ञों की राय लेना आवश्यक</strong><br />हाड़ौती में पौधरोपण किया जाए तो नेगेटिव स्पीसीज की जगह इंडिजेन्स प्लांट ही लगाना चाहिए। एक्जोटिक प्लांट जैसे कोनोकार्पस, लेंटाना, बबूल सहित अन्य प्रजातियों के पौधे न लगाए जाए। इसके अलावा प्लांटेशन में ऐसे पौधे भी लगाए जाए, जिससे पक्षियों को भोजन  मिल सके। क्योंकि, ईको सिस्टम में पक्षियों का महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वहीं, जब भी सामाजिक वानिकी की जाए तो विशेषज्ञों की सलाह जरूर लेनी चाहिए ताकि, पौधे लगाने के उद्देश्यों की पूर्ति हो सके। <br /><strong>- डॉ. पृथ्वीपाल सिंह सिरोहिया, वनौषधि विशेषज्ञ</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Jan 2025 15:33:49 +0530</pubDate>
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                <title>पाचन की समस्याओं के कारण बढ़ सकता है पार्किंसंस रोग का खतरा, 2 दशक पहले ही दिखने लग जाते है लक्षण</title>
                                    <description><![CDATA[लेखकों ने कहा कि न्यूरोडीजेनेरेटिव डिसऑर्डर से पीड़ित रोगियों में गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याएं आम है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/risk-of-parkinsons-disease-may-increase-due-to-digestive/article-90520"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-09/6633-copy31.jpg" alt=""></a><br /><p>वॉशिगंटन। पेट की समस्याओं के कारण व्यक्ति के शरीर में पार्किंसंस रोग का खतरा बढ़ सकता है। एक अध्ययन में यह खुलासा किया गया है। नए अध्ययन के अनुसार फूड पाइप या पेट में अल्सर सहित पाचन संबंधी समस्याओं से पार्किंसंस रोग का खतरा 76 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। 9 हजार से भी अधिक रोगियों की एंडोस्कोपी रिपोर्ट का एनालिसिस किया गया। इसमें पाया गया कि अपर गैस्ट्रोइंटेस्टिनल फंक्शन वाले लोग, अल्सर या एसोफेगस, पेट या छोटी आंत के ऊपरी हिस्से की डैमेज परत वाले लोगों में बाद में पार्किंसंस रोग विकसित होने की संभावना अधिक थी। लेखकों ने कहा कि न्यूरोडीजेनेरेटिव डिसऑर्डर से पीड़ित रोगियों में गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याएं आम है। </p>
<p>अमेरिका के बेथ इजराइल डेकोनेस मेडिकल सेंटर के शोधकर्ताओं के अनुसार पार्किंसंस के मरीजों को गैस्ट्रोइंटेस्टिनल की समस्या अक्सर हाथों या पैरों में कंपन या अकड़न जैसे लक्षण 2 दशक पहले दिखाने लग जाते है। इसके कारण व्यक्ति को चलने में परेशानी का सामना करना पड़ता है। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 15 Sep 2024 11:29:34 +0530</pubDate>
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                <title>एमएमआर टीके वापस शुरू करें तो बच सकते हैं मंप्स से</title>
                                    <description><![CDATA[ वर्ष 2019 में सरकार ने राष्ट्रीय टीकाकरण की सूची में एमएमआर टीके में से एक एम यानी मंप्स को बाहर कर दिया था। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/mumps-can-be-avoided-if-mmr-vaccination-is-restarted/article-74199"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/mmr-teeke-vaps-shuru-kre-to-bch-skte-h-mumps-s...kota-news-01-04-2024.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोटा सहित पूरे देश में मंप्स के मरीजों की संख्या लगातार सामने आ रही है जिसमें छोटे  बच्चों से लेकर बड़ों तक को बीमारी अपनी चपेट में ले रही है। वहीं डॉक्टरों के मुताबिक इस बीमारी का कोई ठोस इलाज नहीं है। ये अपने आप होकर खुद से ही ठीक हो जाती है। इसके अलावा इस बीमारी की रोकथाम के लिए सरकार द्वारा पोलियो अभियान के तहत बच्चों को एमएमआर के टीके लगवाए जाते थे। जिसमें एमएमआर का मतलब मिजल्स, मंप्स और रूबेला है। लेकिन कुछ साल पहले सरकार ने मंप्स को गंभीर बीमारी की श्रेणी से बाहर रखते हुए इसके टीके लगाना बंद कर दिया था जिसके कारण ये बीमारी नए रूप में लोगों को अपना शिकार बना रही है।</p>
<p><strong>मंप्स के लिए टीका ही इलाज</strong><br />मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी जगदीश सोनी ने बताया कि मेडिकल क्षेत्र में मंप्स की बीमारी के लिए कोई ठोस इलाज नहीं है । इस बीमारी से बचने के लिए कोरोना वायरस की तरह ही सावधानियां बरतने की आवश्यकता होती है इसके अलावा ये छींकते और खांसते समय भी फैल सकता है। इसमें दूरी बनाने की जरूरत होती है। पुख्ता इलाज नहीं होने के चलते इस बीमारी का एकमात्र इलाज वैक्सीन है क्योंकि ये बीमारी स्वत: ही होती है और ठीक भी स्वत: ही होती है। लेकिन अगर ये शरीर में ज्यादा दिन रूक जाए तो इसके घातक परिणाम हो सकते हैं। ऐसे में नए परिजन अपने बच्चों को एमएमआर का टीका लगवा लें तो बेहतर होगा।</p>
<p><strong>टीका क्यों बंद किया सरकार ने</strong><br />दरअसल वर्ष 2019 में सरकार ने राष्टÑीय टीकाकरण की सूची में एमएमआर टीके में से एक एम यानी मंप्स को बाहर कर दिया था। क्योंकि सरकार के अनुसार इस बीमारी के घातक परिणाम सामने नहीं आने से टीकाकरण पर फिजूलखर्ची हो रही थी ऐसे में सरकार ने टीकाकरण को रीव्यू करते हुए मंप्स को लिस्ट से हटा दिया था। लेकिन हटाने के मात्र 5 वर्ष बाद ही इस वायरस ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए और बच्चों से लेकर बड़ों तक को अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया।</p>
<p><strong>पून: चालू करने पर सरकार कर रही विचार</strong><br />पिछले कुछ महीनों में पंप्स के बढ़ते मामलों पर संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार ने गाइडलाइन जारी की थी जिसमें लोगों से एतिहात बरतने के साथ एमएमआर टीका लगवाने का भी सुझाव दिया था। ऐसे में मंप्स की मरीजों की बढ़ती हुई संख्या को देखते हुए सरकार फिर से एमएमआर टीके को टीकाकरण अभियान में शामिल करने का विचार कर रही है। <br /><strong>- डा. राज कुमार जैन, ईएनटी विभागाध्यक्ष</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 01 Apr 2024 18:37:13 +0530</pubDate>
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                <title>चीन में रहस्यमय बीमारी ने बढ़ाई लोगों की परेशानी </title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/disease-increases-peoples-troubles-in-china/article-62766"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-11/china-flag1.png" alt=""></a><br /><p>पेइचिंग। चीन में एक और रहस्यमयी बीमारी का प्रकोप देखने को मिल रहा है। बीते कुछ समय से यहां लगातार इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इस बीमारी के बढ़ते मामलों ने एक बार फिर दुनिया में लोगों की परेशानी बढ़ा दी है। अक्टूबर के मध्य से ही यहां रहस्यमयी बीमारी का प्रकोप जारी है। मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वयं विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) इस स्थिति पर नजर बनाए हुए है। इस बीमारी को सबसे पहले उत्तरी चीन में रिपोर्ट किया गया था, जिसमें बड़ी संख्या में बच्चे शामिल थे।</p>
<p>रिपोर्ट्स के अनुसार प्रभावित क्षेत्रों के बीमारी के लक्षण वाले लोगों से अस्पताल भर गए हैं। गंभीर मामलों में कुछ मरीजों को अस्पताल में भर्ती करने की भी जरूरत पड़ रही है। इस पूरे मामले पर डब्ल्यूएचओ ने चीन से विस्तृत जानकारी की मांग की है,  ताकि वह इस बीमारी की प्रकृति और कारण को समझने और इसे प्रभावी तरीके से प्रबंधित करने में मदद कर सकें।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 24 Nov 2023 11:33:49 +0530</pubDate>
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