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                <title>us-israel-iran conflict - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>उर्वरक आपूर्ति पर मंडरा रहा संकट, पैदावार में गिरावट और खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि की आशंका</title>
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                        <![CDATA[अमरीका- इजरायल  ईरान संघर्ष का असर: नैचुरल गैस का संकट सामने दिखने भी लगा है। 
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/fertilizer-supply-crisis-looms--fears-of-declining-yields-and-rising-food-prices/article-145818"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/200-x-60-px)18.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। अमरीका इजरायल का ईरान संघर्ष के कारण तेल के अलावा, उर्वरक आपूर्ति में भारी संकट मंडरा सकता है। यदि हालात बिगड़े तो आगामी दिनों में फसलों की पैदावार में गिरावट और खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि हो सकती है। सऊदी अरब, कतर, ओमान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों सहित ईरान, यूरिया, सल्फर और अमोनिया के प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। ईरान अमोनिया का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, जो मिट्टी के पोषक तत्वों के लिए एक महत्वपूर्ण घटक है। यदि अमरीका -इजरायल ईरान संघर्ष कई महीनों तक जारी रहता है, तो खाड़ी देशों में उर्वरक उत्पादन और परिवहन में व्यवधान वैश्विक कृषि पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। आॅयल के साथ अमोनिया और नाइट्रोजन गैस की सप्लाई चैन यदि बाधित होती है तो खरीफ के समय यूरिया और फर्टिलाइजर का व्यवधान किसानों के काफी परेशान कर सकता है। आने वाले समय में किसान बुवाई के महत्वपूर्ण मौसम में प्रवेश कर रहे हों। इसका परिणाम विलंबित लेकिन गंभीर खाद्य मुद्रास्फीति जैसे हालात हो सकते हैं। इस मामले को दैनिक नवज्योति ने विषय विशेषज्ञों से बात की। प्रस्तुत हैं उसके अंश।</p>
<p><strong>क्या कहते हैं एक्सपर्ट</strong><br />उद्योग जगत से जुड़े सूत्र कहते हैं कि नैचुरल गैस का संकट सामने दिखने भी लगा है। आयल व उर्वरक की कुछ मांग को अस्थायी रूप से पूरा किया जा सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह इतनी बड़ी मात्रा है कि इसकी भरपाई करना संभव नहीं है। आपूर्ति में व्यवधान समस्या को और भी जटिल बना रहे हैं। विश्लेषकों का कहना है कि चीन द्वारा फॉस्फेट निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंध और कतर में सल्फर उत्पादन में कमी के कारण वैश्विक उर्वरक बाजार में मांग बढ़ रही है। इन सभी कारकों के संयोजन का अर्थ यह है कि कीमतों में तीव्र वृद्धि होने पर भी, नई आपूर्ति तुरंत बाजार में नहीं आ पाएगी। खाड़ी देशों से दूर स्थित कृषि क्षेत्रों में भी इसका असर दिखना शुरू हो गया है। कई देशों के किसान बढ़ती कीमतों और धीमी आपूर्ति के चलते बुवाई के मौसम से पहले उर्वरक हासिल करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कतर में संघर्ष के कारण तरलीकृत प्राकृतिक गैस की आपूर्ति बाधित होने के बाद भारतीय यूरिया उत्पादकों ने उत्पादन में कटौती शुरू कर दी है।</p>
<p><strong>इम्पैक्ट नजर आने लगा है</strong><br />इस परेशानी का इम्पैक्ट नजर आने लगा है। फर्टिलाइजर और यूरिया नैचुरल गैस से बनती है। देश के 34 प्लांट हैं जो फर्टिलाइजर व यूरिया बनाते हैं सरकार ने उन्हें 40 प्रतिशत कट के निर्देश जारी कर दिए हैं। अगर यह लम्बा चला तो चालीस फीसदी तक उत्पादन कम हो जाएगा। हालांकि सरकार अन्य रास्ते भी देख रही है लेकिन फिलहाल यही स्थिति है।<br /><strong>-वीनू मेहता, एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर व रेजीडेंट हैड डीसीएम</strong></p>
<p><strong>भारत बड़ा प्रोड्यूसर होने के साथ बड़ा कन्ज्यूमर भी</strong><br />इंडिया एग्रीकल्चर में बड़ा प्रोड्यूसर होने के साथ बड़ा कन्ज्यूमर भी है। इसलिए हमारे ऊपर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा। फिर भी हमारा फल, सब्जी और चावल के कंटेनर बंदरगाहों पर पड़े हैं। शिपिंग एजेंसियां ज्यादा पैसा मांगने लगी हैं। ऐसे में हमारी एक्सपोर्ट कोस्ट बढ़ रही है। फिलहाल स्थितियां खराब होने जैसी स्थिति नहीं है। इंडिया के पास आप्शंस बहुत हैं।<br /><strong>-डॉ.महेन्द्र सिंह, प्रसार निदेशक कृषि विश्वविद्यालय कोटा</strong></p>
<p><strong>दस से बीस फीसदी प्राइज हाइक जैसी स्थिति</strong><br />हमारा देश अब मजबूत हो चुका है। हमारी स्पॉट लाइन काफी मजबूत है। मेरा मानना है कि नैचुरल गैस और आयल जरूर इफैक्टेड हो सकते हैं। हम तीस से 40 फीसदी बाहर से मंगवाते हैं। लेकिन अब रशिया से इन्हें खरीद सकते हैं। हमारी गवर्नमेंट मल्टीपल सोर्स पर काम कर रही है। हमारी इकॉनामी डायवर्स इकॉनामी है। ऐसे में दस से बीस फीसदी प्राइज हाइक जैसी स्थिति हो सकती है।<br /><strong>-मेजर विक्रम सिंह, श्रीराम फर्टिलाइजर</strong></p>
<p>भारत में कृषि के लिये डीएपी की आपूर्ति आयात पर ही निर्भर है जो ज्यादातर पहले चाइना से आती थी। पिछले वर्षो में अफ्रीकी देशों कतर ओमान से आने लगी है । मोरक्कों ,जार्डन से रॉक फास्फेट आती है,भारत के रॉक फॉस्फेट मे 15 से 20 % तक की मात्रा में फास्फेट पाई जाती है जबकि जोर्डन, मोरक्कों से आयातित मिनरल में 30 %तक की उपलब्धता के कारण सुपर फास्फेट उत्पादन इकाइयां वहां से आयात पर निर्भर है। ऐसे में यदि आयात पर प्रभाव पड़ता है तो फिर यहां पर भी उत्पादन में असर पड़ सकता है। यह सब खेती के लिये जरूरी चीजें है ।<br /><strong>- सत्येन्द्र पाठक, कृषि उप निदेशक कृषि कोटा</strong></p>
<p>ओामान जोर्डन से पोटिशयम और फॉस्फेटिक पदार्थो का आयात किया जाता है। यदि व्यापार मार्ग रूकता है तो हमारे यहां की कृषि को दोनों तरफ से नुकसान होगा खाडी देशों में सप्लाई चेन रूकने से किसानो की उपज के दाम कम हो सकते है। वहीं इस रूट से आने वाले केमिकल या अन्य जरूरी सामान जो कृषि उत्पादन के लिये जरूरी है उनकी कमी से खेती किसानी पर प्रतिकूल प्रभाव पडेगा।<br /><strong>-अतीश शर्मा, संयुक्त निदेशक कृषि कोटा।</strong></p>]]>
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                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Mar 2026 14:51:50 +0530</pubDate>
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