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                <title>Possibility of Misuse - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>इच्छामृत्यु दुरुपयोग की आशंका कम नहीं</title>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/the-possibility-of-euthanasia-abuse-is-not-less/article-146319"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/1200-x-60-px)-(4)4.png" alt=""></a><br /><p>उच्चतम न्यायालय ने एक ऐसा ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है, जो न केवल एक व्यक्ति की लंबी पीड़ा को समाप्त करता है, बल्कि वह जीवन, मृत्यु, गरिमा और नैतिकता से जुड़े गंभीर सवालों से भी जुड़ा है। 32 वर्षीय हरीश राणा 2013 में एक इमारत से गिरने के बाद 13 वर्ष से लगातार पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट में था। उसे अब मशीनों की कैद से मुक्ति मिलेगी। पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट गंभीर मस्तिष्क क्षति के बाद उत्पन्न होने वाला एक विकार है। इसमें रोगी जागृत लगता है, लेकिन अपने परिवेश या स्वयं के प्रति पूरी तरह से अनभिज्ञ रहता है। उसमें सोचने, बात करने या प्रतिक्रिया करने की क्षमता नहीं होती। इसकी कोई विशिष्ट चिकित्सा नहीं है। देखभाल के लिए ट्यूब फीडिंग और संक्रमण से बचाव पर ध्यान दिया जाता है।</p>
<p><strong>निष्क्रिय इच्छामृत्यु :</strong></p>
<p>हरीश राणा के मामले में न्यायाधीश जे.बी पारदीवाला और के.वी विश्वनाथन की खंडपीठ ने क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन सहित सभी जीवन रक्षक चिकित्सा धीरे-धीरे बंद करने की अनुमति दी है। भारत में पैसिव यूथेनेशिया यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु का यह पहला मामला है। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 की एक अपूर्व और प्रगतिशील व्याख्या भी करता है। संविधान निर्माताओं ने जीने का अधिकार की गारंटी दी थी। अदालत ने अब गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार के रूप में इसका विस्तार किया है। हरीश राणा की स्थिति को अदालत ने अत्यंत दयनीय करार दिया। रोगी को ट्रेकियोस्टॉमी ट्यूब से सांस लेने, गैस्ट्रोस्टॉमी से भोजन ग्रहण करने और दैनिक क्रियाओं के लिए पूर्ण बाहरी सहायता की आवश्यकता थी। इस निष्कर्ष पर पहुंचा गया कि चिकित्सा व्यर्थ हो और मरीज की स्थिति में सुधार असंभव हो, तो मशीनों पर जीवन के कृत्रिम अस्तित्व को बनाए रखना न केवल पीड़ादायक है, बल्कि अमानवीय भी है। उल्लेखनीय है कि कॉमन कॉज बनाम भारत संघ, 2018 के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया को संवैधानिक वैधता प्रदान की थी।</p>
<p><strong>मेडिकल बोर्ड प्रमाणित करे :</strong></p>
<p>यदि दो मेडिकल बोर्ड प्रमाणित करे कि उपचार व्यर्थ है, तो जीवन रक्षक उपचार रोकने की अनुमति दी जा सकती है। प्राइमरी बोर्ड अस्पताल से और सेकेंडरी बोर्ड बाहरी विशेषज्ञों से बनता है। अदालत ने इस प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाने के लिए प्रशासनिक दिशानिर्देश जारी किए हैं। भारत के सरकारी और निजी अस्पतालों में बड़ी संख्या में मरीज वेंटिलेटरों, आईसीयू बेडों और अन्य जीवन रक्षक उपकरणों पर निर्भर हैं। विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट में रिकवरी की संभावना बहुत क्षीण होती है। लंबे समय तक चलने वाला उपचार केवल पीड़ा को लंबा खींचता है, कोई चिकित्सकीय लाभ नहीं देता। यह फैसला चिकित्सकों को व्यर्थ उपचार के नैतिक और कानूनी दायित्व से मुक्त करेगा। साथ ही रोगी के परिजनों को भी राहत मिलेगी। अदालत ने केंद्र सरकार को एंड ऑफ लाइफ केयर के लिए समग्र कानून लाने की अपील कर विधायी प्रक्रिया को गति दी है।</p>
<p><strong>इसके दुरुपयोग का खतरा :</strong></p>
<p>न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया है कि इसे किसी भी तरह से एक्टिव यूथेनेशिया यानी सक्रिय इच्छामृत्यु नहीं कहा जाना चाहिए। सक्रिय इच्छामृत्यु में किसी व्यक्ति के जीवन को समाप्त करने के लिए घातक इंजेक्शन दिया जाता है। हरीश के मामले में उसे वर्तमान में पीईजी ट्यूब के रूप में जो जीवन रक्षक उपचार मिल रहा है, उसे बंद कर दिया जाएगा और उसे उचित दर्दनिवारक दवाएं और आरामदेह देखभाल प्रदान की जाएगी ताकि प्रकृति अपना काम कर सके। पैसिव यूथेनेशिया कई देशों में वैध है, क्योंकि इसे उपचार रोकने का अधिकार माना जाता है, जो मरीज की इच्छा या परिवार की सहमति पर आधारित होता है। पैसिव यूथेनेशिया ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसी टर्मिनली इल,अंतिम चरण का रोगी मरीज के जीवन को बनाए रखने वाले लाइफ सपोर्ट सिस्टम या ट्रीटमेंट को हटाया या रोका जाता है। इससे व्यक्ति की प्राकृतिक मौत हो जाती है। इस फैसले के दूसरे पहलुओं पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। सबसे बड़ा खतरा इसके दुरुपयोग का है।</p>
<p><strong>प्रावधान के तहत :</strong></p>
<p>भारत में सामाजिक सुरक्षा का ढांचा बहुत कमजोर है। आर्थिक तंगी वाले परिवार बहुत जल्दबाजी में निर्णय ले सकते हैं। हरीश राणा का मामला तो स्पष्ट था। वह 13 वर्ष से पर्सिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट में था, उसकी स्थिति को लेकर सभी बोर्ड सहमत थे और परिवार ने भी सहमति जता दी थी। क्या ऐसे हर मामले में ऐसी स्पष्टता होगी, गरीब परिवार आर्थिक दबाव में निर्णय ले सकते हैं। अस्पताल भी बेड खाली कराने के लिए ऐसी रिपोर्ट बना सकते हैं। ऐसी हालत में मरीज कुछ भी कर पाने में असमर्थ होता है, निर्णय परिवार को ही करना होगा। सवाल यह है कि परिवार का निर्णय कितना दबाव मुक्त होगा, भारत में साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने लोगों को लिविंग विल बनाने की अनुमति दे दी थी, जिससे वे पैसिव यूथेनेशिया चुन सकते हैं। इसके लिए सख्त दिशा निर्देश भी जारी किए गए हैं। कानूनी प्रावधानों के बाद भी भारत में लिविंग विल अभी ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो सकी है। इसके अभाव में मरीज के परिजनों का इस बारे में फैसला लेने का अधिकार मिल जाता है। इस प्रावधान के तहत ही हरीश राणा के परिजनों ने पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी।</p>
<p><strong>-ज्ञान चंद पाटनी</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
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                <pubDate>Fri, 13 Mar 2026 11:27:50 +0530</pubDate>
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