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                <title>अमित शाह ने की नेक्स्ट जेन Dial-112 सेवा लॉन्च: 400 अत्याधुनिक वैन को हरी झंडी दिखाकर किया रवाना, एक कॉल पर मिलेगी सभी आपातकालीन सेवाएं</title>
                                    <description><![CDATA[केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रायपुर में 'नेक्स्ट जेन सीजी डायल-112' और 32 मोबाइल फॉरेंसिक वैन का शुभारंभ किया। इस सेवा के तहत 400 आधुनिक वाहन 24 घंटे आपातकालीन सहायता देंगे। 'साइंस ऑन व्हील्स' थीम पर आधारित फॉरेंसिक वैन घटनास्थल पर ही वैज्ञानिक जांच कर त्वरित न्याय सुनिश्चित करेंगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/amit-shah-launches-next-gen-dial-112-service-flags-off-400/article-154239"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-05/amit.webp" alt=""></a><br /><p>रायपुर। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने आज छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के माना पुलिस परेड ग्राउंड में राज्य पुलिस की अत्याधुनिक 'नेक्स्ट जेन सीजी डायल-112 सेवा' तथा मोबाइल फॉरेंसिक वैन का शुभारंभ किया। अमित शाह ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और विधानसभा अध्यक्ष रमन सिंह की उपस्थिति में 400 अत्याधुनिक डायल-112 वाहनों तथा 32 मोबाइल फॉरेंसिक वैन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस अवसर पर उपमुख्यमंत्री एवं गृह मंत्री विजय शर्मा, पुलिस महानिदेशक अरुण देव गौतम, विधायकगण, जनप्रतिनिधिगण तथा वरिष्ठ पुलिस अधिकारी उपस्थित थे।</p>
<p>उल्लेखनीय है कि ''एक्के नंबर, सब्बो बर'' थीम पर आधारित यह आधुनिक सेवा पुलिस, अग्निशमन और चिकित्सा सेवाओं को एकीकृत करते हुए नागरिकों को एक ही नंबर पर त्वरित आपातकालीन सहायता उपलब्ध कराएगी। इसके तहत शुरू किए गए 400 अत्याधुनिक वाहनों में स्मार्टफोन, जीपीएस, वायरलेस रेडियो, पीटीजेड कैमरा, डैश कैम, मोबाइल एनवीआर और सोलर बैकअप जैसी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। इन तकनीकों की मदद से घटनास्थल की लाइव मॉनिटरिंग, रियल-टाइम ट्रैकिंग और त्वरित संचार सुनिश्चित किया जा सकेगा।</p>
<p>यह सेवा 24 गुणा 7 संचालित होगी। इसमें जीआईएस आधारित मॉनिटरिंग, एडवांस व्हीकल ट्रैकिंग, एसआईपी ट्रंक टेक्नोलॉजी तथा स्वचालित कॉलर लोकेशन पहचान जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया गया है। राज्य के सभी 33 जिला समन्वय केंद्रों को भी इस नेटवर्क से जोड़ा गया है। नागरिक वॉयस कॉल, एसएमएस, ईमेल, वेब पोर्टल, व्हाट्सएप, चैटबॉट और एसओएस -112 इंडिया ऐप के माध्यम से भी सहायता प्राप्त कर सकेंगे।</p>
<p>''साइंस ऑन व्हील्स टूवर्ड फास्टर जस्टिस'' थीम पर आधारित 32 मोबाइल फॉरेंसिक वैन प्रदेश में अपराध अनुसंधान को नई दिशा देंगी। ''32 वैन – 32 जिले – एक संकल्प: सटीक जांच, त्वरित न्याय'' के उद्देश्य के साथ शुरू की गई यह पहल घटनास्थल पर ही प्रारंभिक वैज्ञानिक जांच की सुविधा उपलब्ध कराएगी। लगभग 65 लाख रुपये प्रति यूनिट लागत वाली इन अत्याधुनिक वैन में घटनास्थल संरक्षण किट, साक्ष्य संग्रहण एवं सीलिंग उपकरण, फिंगरप्रिंट डिटेक्शन सिस्टम, नार्कोटिक्स परीक्षण किट, डिजिटल फॉरेंसिक सपोर्ट, उच्च गुणवत्ता फोटोग्राफी व्यवस्था, बुलेट होल स्क्रीनिंग एवं बैलिस्टिक जांच किट तथा गनशॉट रेजिड्यू (जीएसआर) परीक्षण किट जैसी उन्नत सुविधाएं उपलब्ध हैं।</p>
<p>अब तक अपराध स्थल से साक्ष्य प्रयोगशालाओं तक पहुंचाने में समय लगता था, जिससे साक्ष्यों के दूषित होने की संभावना बनी रहती थी तथा रिपोर्ट आने में भी विलंब होता था। नई मोबाइल फॉरेंसिक वैन के माध्यम से घटनास्थल पर ही प्रारंभिक जांच, साक्ष्य संरक्षण, परीक्षण और डिजिटल दस्तावेजीकरण किया जा सकेगा। इससे जांच की गुणवत्ता और गति दोनों में महत्वपूर्ण सुधार होगा। राज्य सरकार का उद्देश्य वैज्ञानिक जांच को जन-जन तक पहुंचाना, साक्ष्य आधारित न्याय प्रणाली को मजबूत करना, अपराध नियंत्रण में फॉरेंसिक विज्ञान की भूमिका को बढ़ाना तथा समयबद्ध, पारदर्शी और विश्वसनीय जांच सुनिश्चित करना है। आधुनिक डायल-112 सेवा और मोबाइल फॉरेंसिक वैन के संचालन से प्रदेश में आपातकालीन सेवाओं की गुणवत्ता में व्यापक सुधार होगा, अपराध अनुसंधान को नई गति मिलेगी तथा आम नागरिकों का कानून व्यवस्था और न्याय प्रणाली पर विश्वास और अधिक सुदृढ़ होगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 18 May 2026 18:31:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष 3 : सर्जरी से पोस्टमार्टम तक कर रहीं बेटियां, मर्डर मिस्ट्री खोल दिलाया इंसाफ</title>
                                    <description><![CDATA[बरसों से पुरूषों का प्रोफेशनल माने जाने वाले चिकित्सा क्षेत्रों में महिलाएं अपना जौहर दिखा रही हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/international-women-s-day-special-3--daughters-doing-everything-from-surgery-to-post-mortem--murder-mystery-solved-and-justice-provided/article-71774"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-03/ph.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुर्दाघर, जिसका नाम सुनते ही रूह कांप उठती है। जहां चीखने-चिल्लाने और बिलखने की दर्दभरी आवाजें जब मोर्चरी के सन्नाटे को चीरती कानों से गुजरती है तो मन विचलित कर जाती है। घटना-दुर्घटना में अपनों को खोने का दर्द और मातम का विलाप आत्मा झकझौर देता है। वहीं, हादसों में कटे-फटे अंग-भंग हुए शरीर के टुकड़े देखना हर किसी के बस की बात नहीं है। लेकिन, ऐसे चुनौतियों से भरे क्षेत्र में नारी शक्ति अदम्य साहस के साथ डटी है, जो न केवल अपना फर्ज निभा रहीं बल्कि गमजदा पीड़ित परिवार को इंसाफ भी दिला रही है। दरअसल, बरसों से पुरूषों का प्रोफेशनल माने जाने वाले चिकित्सा क्षेत्रों में महिलाएं अपना जौहर दिखा रही हैं। कोटा में पहली बार मेडिकल कॉलेज के फोरेंसिक मेडिसीन टॉक्सोक्लॉजी डिपार्टमेंट में 4 महिला रेजीडेंट ने पीजी में प्रवेश लिया है। अब तक 200 से ज्यादा पोस्टमार्टम कर चुकीं हैं। साक्ष्यों के परीक्षण के आधार पर मडर मिस्ट्री सुलझाने में पुलिस की मदद कर रहीं हैं। वहीं, 22 साल में पहली बार ऑथोपेडिक विभाग में भी महिला रेजीडेंट ने पीजी में दाखिला लिया है।  </p>
<p><strong>पहली बार पोस्टमार्टम देखा तो रो पड़ी थी</strong><br />पीजी तृतीय वर्ष की छात्रा डॉ. मोनिशा राजेश्वरन बतातीं हैं, तमिलनाडू मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस किया। इंटर्नशिप के लिए हॉस्पिटल जाते तो देखते थे कि आधे से ज्यादा केसों में महिलाएं विक्टिम होती हैं, जिन्हें मेडिकल मुआयने के लिए शरीर पर आई चोट डॉक्टर को दिखानी होती हैं लेकिन महिला डॉक्टर नहीं होने से वे असहज महसूस करतीं हैं। यह देख मैंने फोरेंसिक मेडिसीन टॉक्सोक्लॉजी में आने का ठान लिया। ताऊजी ने यह कहते हुए रोका था कि यह क्षेत्र चुनौतियों से भरा है। राजनेतिक प्रेशर आएंगे, तुम से नहीं होगा लेकिन मैं अपने निर्णय पर अड़िग थी। यूजी सैंकड ईयर में पहली बार पोस्टमार्टम करते हुए देखा तो रो पड़ी थी। लेकिन जब प्रोफेसर ने इसका महत्व समझाया तो खुद को मजबूत किया। हाल ही में बीकानेर के एसपी मेडिकल कॉलेज में हुई क्रॉन्फ्रेंस में मोनिशा ने नाबालिग किशोरियों की शादी व गर्भवती होने से उत्पन्न कानूनी समस्याओं पर शोध पत्र प्रस्तुत किया था, जिसे सर्वेश्रेष्ठ शोधपत्र का पुरस्कार दिया गया। वे अब तक 70 से ज्यादा पोस्टमार्टम कर चुकीं हैं। मुनीषा डॉक्टर होने के साथ मां भी है। परिवार और काम में परिवार व पति के सहयोग से बैलेंस कर फर्ज निभा रहे हैं। </p>
<p><strong>मदद करने का जूनून ही मुझे इस फील्ड में लाया</strong><br />पीजी सैकंड ईयर की छात्रा डॉ. पारस रावल कहतीं हैं, राजकोट गुजरात से एमबीबीएस किया। मैं हमेशा से ही प्राइवेट प्रैक्टिस नहीं करना चाहती थी, लोगों को न्याय दिलाने में मदद करने का जूनून ही मुझे इस फिल्ड में लेकर आया। ऐसा मिथक बन गया है कि फोरेंसिक मेडिसीन टॉक्सोक्लॉजी में पुरूष ही काम कर सकते हैं, क्योंकि, इसमें पुलिस, कोर्ट तथा हर तरह के लोगों से डील करनी होती है लेकिन महिला ने इस सोच को गलत साबित कर दिया है। महिला हर चैलेंजिंग काम कर सकती हैं और कर रहीं हैं। डॉक्टरी के पेशे में यह सबसे न्यायसंगत पेशा है। अपने फैसले पर कभी संदेह न करें क्योंकि जहां संदेह किया वहां कोई और सदस्य आपका निर्णय बदल सकता है। मेरा छोटा भाई रेडिएशन ऑन्कोलॉजी में डॉक्टर है। मेरी काबीलियत देख उसने फोरेंसिक मेडिसीन लेने के लिए आत्मविश्वास बढ़ाया। परिवार ने भी काफी सपोर्ट किया। पारस ने अब तक 60 से ज्यादा पोस्टमार्टम कर चुकी हैं। </p>
<p><strong>बॉडी खुद अपनी कहानी  बताती है</strong><br />पीजी द्वितीय वर्ष की छात्रा डॉ. काव्या शर्मा कहतीं हैं, बचपन से ही चैलेंजिंग काम करना पसंद था। वर्ष 2015 में कोटा मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस किया। फोरेंसिक मेडिसीन टॉक्सोक्लॉजी  में भी पीजी यहीं से कर रही हूं। यह न्याय संगत क्षेत्र है। पोस्टमार्टम में जब ऐसा सुराग निकाल लेते हैं, जो पीड़ित परिवार को न्याय दिला सके, तब दिल को सुकून मिलता है। मृत शरीर खुद अपनी कहानी बयां करता है कि उसके साथ क्या घटित हुआ, बस समझने वाला होना चाहिए। हाल ही में नहर में एक महिला की लाश मिली थी। जिसे आत्महत्या का रूप दिया गया था। हमने पोस्टमार्टम किया तो कई ऐसे सुराग मिले जिससे यह पता चला कि महिला की मौत पानी में डूबने से नहीं, सिर पर चोट से हुई। हमारी रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने इंवेस्टिगेशन किया तो मडर मिस्ट्री खुली और पति ही कातिल निकला। पहले मां ने इस क्षेत्र में आने का विरोध किया लेकिन मेरा काम देख 90 वर्षीय दादी, पिता और मां अब मुझ पर गर्व करती हैं। काव्या अब तक 60 पोस्टमार्टम कर चुकी हैं। </p>
<p><strong>न्याय दिलाना ही जिंदगी का मकसद</strong><br />पीजी फर्स्ट ईयर की छात्रा डॉ. अदिती गुप्ता कहती हैं, भोपाल में एमबीबीएस करने के दौरान ही फोरेंसिक मेडिसीन टॉक्सोक्लॉजी  में मेरी रुचि जागी। जब सेकेंड ईयर में थी तब फॉरेंसिक पढ़ाया गया। उसमें होने वाले इन्वेस्टिगेशन और फॉरेंसिक एक्सपर्ट की भूमिका को देख मुझे प्रेरणा मिली। मानती हूं, इस फील्ड में ज्यादा चैलेंज हैं, लेकिन मैं कर सकती हूं, इस आत्मविश्वास के साथ मैंने फॉरेंसिक में जाने का मन बना लिया। यूजी में 15 दिन के लिए इंटर्नशिप दी जाती है, जिसमें मैंने फोरेंसिक मेडिसीन टॉक्सोक्लॉजी  चूना। कई विभत्सक केस देखें हैं, ट्रेन से कटकर शरीर के टुकड़े, बॉक्स व बोरों में भरकर लाए गए अंग शामिल हैं। तब मन में ख्याल आया कि क्या यह किसी साजिश का शिकार तो नहीं हुए। तब से ठान लिया था कि पीड़ित परिवार को न्याय दिलाऊंगी, इसी संकल्प को जिंदगी का मकसद बना लिया। पापा व रिश्तेदारों ने इस फिल्ड में जाने से मना किया था लेकिन मेरी रूचि देखते हुए मम्मी ने सपोर्ट किया। अभी फोरेंसिक मेडिसीन टॉक्सोक्लॉजी  विभाग में आए 6 माह ही हुए हैं, अब तक करीब 60 पोस्टमार्टम कर चुकी हूं। </p>
<p><strong>श्रुति ने तोड़ी धारणा, बनेगी आर्थोपेडिक सर्जन </strong><br />जयपुर निवासी पीजी प्रथम वर्ष की छात्रा डॉ. श्रुति अग्रवाल कहतीं हैं, आम तौर पर ऐसी धारणा बनी हुई है कि आर्थोपेडिक में जोखिम अधिक होता है, इसलिए इसमें पुरूष ही जाते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है, हर क्षेत्र चैलेंजिंग होता है और महिलाएं तमाम चुनौती पार कर मुकाम हासिल कर रहीं हैं। इसी आत्मविश्वास के साथ मैंने कोटा मेडिकल कॉलेज के आर्थोपेडिक विभाग में प्रवेश लिया है। श्रुति बतातीं हैं, जब मैं 10 वर्ष की थी, मेरे भाई का हाथ फे्रक्चर हो गया था, उसका इलाज के लिए मैं एसएमएस अस्पताल ले गई थी, जहां आर्थोपेडिक में एकमात्र डॉ. पूनम पाटनी ही महिला डॉक्टर थी। उनके जूनून से लबरेज आत्मविश्वास से प्रभावित हुई और वहीं से ही आथोपेडिक डॉक्टर बनने का मन बना लिया। एमबीबीएस पूरी करने के बाद मेने आथोपेडिक में जाने का इरादा घरवालों को बताया तो माता-पिता ने सपोर्ट किया लेकिन रिश्तेदारों ने डी-मोटिवेट किया और कहा-इस फिल्ड में तुम काम नहीं कर पाओगे। लेकिन मैं अपने फैसले पर अडिग थी। नीट पीजी में मेरी 6000 तथा एम्स में 600 रैंक थी। इस रैंक पर एम्स ऋषिकेश में प्लास्टिक सर्जरी और एम्स बठिंडा में आर्थो मिल गई लेकिन मैंने कोटा चुना। विभागाध्यक्ष डॉ. आरपी मीना सर ने सपोर्ट किया। मोटिवेट किया, उनके अंडर में प्रेक्टिस कर रही हूं। यहां लेटेस्ट तकनीक के साथ सीखने को बहुत कुछ है। मैं स्पाईन सर्जन बनना चाहती हूं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 Mar 2024 17:58:10 +0530</pubDate>
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                <title>पेगासस जासूसी: SC ने केंद्र को लगाई फटकार: साइबर और फॉरेंसिक विशेषज्ञों से जांच के आदेश</title>
                                    <description><![CDATA[कमेटी अगले आठ सप्ताह के अंदर अपनी अंतरिम रिपोर्ट देगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/61790567936d6/article-1926"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-10/suprim-court1.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली।  उच्चतम न्यायालय ने पेगासस जासूसी मामले में बुधवार को केंद्र सरकार को फटकार लगाते हुए पूरे मामले की जांच के लिए एक कमेटी गठित कर जांच कराने के आदेश दिए हैं। मुख्य न्यायाधीश एन वी रमन और न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर. वी. रविद्रन, पूर्व भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी आलोक जोशी तथा डॉ संदीप ओबरॉय की अगुवाई में साइबर एवं फॉरेंसिक विशेषज्ञों की तीन सदस्यों वाली एक टेक्निकल कमेटी से जांच कराने का आदेश दिया है।  आलोश जोशी 1976 बैच के आईपीएस अधिकारी है। डॉ. ओबरॉय चेयरमैन सब कमेटी  (इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन ऑफ स्टैंडरडाइजेशन/ इंटरनेशनल इलेक्ट्रो-टेक्निकल कमिशन/ जॉंइट टेक्निकल) हैं। यह कमेटी अगले आठ सप्ताह के अंदर अपनी अंतरिम रिपोर्ट देगी। पीठ ने कहा है कि टेक्निकल कमेटी के सदस्य के तौर पर आईआईटी बाम्बे के प्रोफेसर डॉ अश्विनी अनिल के अलावा विशेषज्ञ डॉक्टर नवीन कुमार चौधरी और डॉक्टर प्रबाहरण पी. सदस्य होंगे। डॉक्टर चौधरी, (साइबर सिक्योरिटी एंड डिजिटल फॉरेसिक्स), डीन- नेशनल फॉरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी, गांधीनगर गुजरात), डॉक्टर प्रबाहरण पी., प्रोफेसर (स्कूल ऑफ इंजीनियङ्क्षरग) अमृत विश्व विद्या पीठम, अमृतपुरी, केरल और डॉ अश्विनी अनिल गुमस्ते, इंस्टिट्यूट चेयर एसोसिएट प्रोफेसर (कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियङ्क्षरग) इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी मुंबई से हैं।<br /> <br /> उच्चतम न्यायालय ने कहा  है कि नागरिकों के निजता के अधिकार का हनन नहीं किया जा सकता। उनकी स्वतंत्रता को बरकरार रखने की जरूरत है।  शीर्ष अदालत इस मामले में आठ सप्ताह बाद सुनवाई करेगी। इस बीच कमेटी को अंतरिम रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया है। शीर्ष अदालत ने पेगासस जासूसी मामले में विभिन्न जनहित याचिकाओं की सुनवाई पूरी करने के बाद 13 सितंबर को अपना फैसला सुरक्षित रखा था। यह मामला इजरायल की एक निजी कंपनी के स्पाइवेयर सॉफ्टवेयर से  भारत के प्रमुख पत्रकारों, वकीलों, कई विपक्षी दलों के नेताओं के फोन के माध्यम से कथित तौर पर उसकी जासूसी करने से जुड़ा हुआ है। याचिका में आरोप लगाया गये गए हैं कि अवैध तरीके से लोगों की बातचीत एवं अन्य जानकारी ली गई है। जो उनकी निजता के अधिकार का उल्लंघन है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 Oct 2021 14:28:30 +0530</pubDate>
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