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                <title>IFD Framework - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>IFD Framework RSS Feed</description>
                
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                <title>प्रपोजल इन्वेस्टमेंट फेसिलिटेशन फॉर डेवलपमेंट के खिलाफ भारत-तुर्की आए साथ, बीजिंग को अमेरिका का सपोर्ट</title>
                                    <description><![CDATA[भारत और तुर्की ने 40 देशों के साथ मिलकर चीन समर्थित इन्वेस्टमेंट फेसिलिटेशन फॉर डेवलपमेंट (IFD) फ्रेमवर्क का विरोध किया है। WTO की बैठक में नई दिल्ली ने इसे 'डिजिटल उपनिवेशवाद' और नीतिगत स्वायत्तता के लिए खतरा बताया। विवादित प्री-इन्वेस्टमेंट अपील सिस्टम और ई-कॉमर्स प्रावधानों पर सर्वसम्मति न होने के कारण भारत ने इस पर रोक लगा दी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/india-t%C3%BCrkiye-come-together-against-the-proposal-investment-facilitation-for-development/article-147625"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/1200-x-60-px)-(7)6.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। भारत और तुर्की के रिश्ते हाल के समय में अच्छे नहीं रहे हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के साथ खड़े होने के कारण ऐसा हुआ। हालांकि, चीन के एक प्रस्ताव के खिलाफ दोनों एक साथ खड़े हुए हैं। यही नहीं, भारत और तुर्की समेत 40 देशों को इसकी चुभन महसूस हुई है। इन देशों ने इस हफ्ते हुई मंत्री-स्तरीय बैठक में चीन के समर्थन वाले एक नए फ्रेमवर्क के प्रस्ताव पर विश्व व्यापार संगठन में चिंता जताई है। इकोनॉमिक टाइम्स (ईटी) ने इस मामले से जुड़े अधिकारियों के हवाले से यह जानकारी दी। इस नए फ्रेमवर्क का नाम इन्वेस्टमेंट फेसिलिटेशन फॉर डेवलपमेंट है। यह घटनाक्रम कई मायने में महत्वपूर्ण है। कारण है कि इस प्रस्ताव के समर्थक 26 से 29 मार्च तक कैमरून में होने वाले डब्ल्यूटीओ के 14वें मंत्री-स्तरीय सम्मेलन (एमसी14) में इस पर कोई समझौता करने के लिए उत्सुक हैं।</p>
<p><strong>समझौते को 120 देशों का समर्थन</strong></p>
<p>हालांकि, इस समझौते का समर्थन करने वाले करीब 120 सदस्य देशों का दावा है कि इससे प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने और पारदर्शिता बढ़ाने में मदद मिलेगी। इससे अंतरराष्ट्रीय निवेश को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन, चिंता की बात यह है कि इसके तहत एक स्वतंत्र संस्था के जरिए निवेश की जांच के लिए प्री-इन्वेस्टमेंट अपील सिस्टम बनाया जाएगा। इससे पॉलिसी फ्लेक्सिबिलिटी सीमित हो जाएगी।</p>
<p><strong>भारत समेत विरोध करने वाले देशों की चिंता</strong></p>
<p>एक अधिकारी ने बताया कि नई दिल्ली और अन्य सदस्य देशों ने सीमित नीतिगत दायरे और गरीब देशों के लिए विशेष और अलग व्यवहार के प्रावधानों की कमी को लेकर चिंता जताई है। तुर्की ने अलग से चिंता जताते हुए कहा है कि इस प्रस्ताव में प्री-इन्वेस्टमेंट और पोस्ट इन्वेस्टमेंट प्रावधानों को लेकर स्पष्टता का अभाव है। साथ ही रक्षा और परमाणु ऊर्जा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के लिए कोई छूट नहीं दी गई है। प्रस्तावित फ्रेमवर्क में ई-कॉमर्स को भी शामिल कर लिया गया है। नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों ने भी अपनी आशंकाएं जाहिर की हैं। वे इस पहल में शामिल नहीं हैं। वहीं, अमेरिका, जो आईएफडी का सदस्य नहीं है, फिर भी इस समझौते को डब्ल्यूटीओ के ढांचे में शामिल किए जाने का समर्थन कर रहा है। भारत और दक्षिण अफ्रीका ने 2024 के मंत्री-स्तरीय सम्मेलन के दौरान आईएफडी को डब्ल्यूटीओ के ढांचे में शामिल करने के प्रयासों को रोक दिया था।</p>
<p><strong>क्या चल रहे हैं प्रयास?</strong></p>
<p>फिलहाल, इस बात के प्रयास किए जा रहे हैं कि आईएफडी समझौते को डब्ल्यूटीओ के कानूनी ढांचे के तहत संगठन के परिशिष्ट 4 में एक बहुपक्षीय समझौते के रूप में शामिल किया जाए। परिशिष्ट 4 में सूचीबद्ध बहुपक्षीय समझौते केवल उन सदस्य देशों पर लागू होते हैं, जो उनमें शामिल होते हैं। जो सदस्य शामिल नहीं होते, उन पर ये समझौते बाध्यकारी नहीं होते। किसी भी समझौते को इस परिशिष्ट में जोड़ने के लिए संगठन के सभी सदस्य देशों की सर्वसम्मति होना जरूरी है। एक अधिकारी ने बताया, जिन सदस्य देशों ने इस पहल में हिस्सा लिया है, उन्हें भी इस समझौते की परिभाषा, इसके दायरे और इसकी गतिविधियों को लेकर स्पष्टता के अभाव से जुड़ी चिंताएं हैं।</p>
<p>नई दिल्ली ने यह रुख बनाए रखा है कि व्यापार और निवेश से जुड़े किसी भी पहलू पर चर्चा डब्ल्यूटीओ के दायरे से बाहर है। कारण है कि यह कोई व्यापार समझौता नहीं है। साथ ही, संगठन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बहुपक्षीय समझौते अपवाद ही बने रहें, न कि एक सामान्य नियम बन जाएं। भारत ने इस बात पर जोर दिया है कि माराकेश समझौते के परिशिष्ट 4 में नए समझौतों को शामिल करना न केवल सदस्यों के अंतरराष्ट्रीय समझौते करने के अधिकार से जुड़ा मुद्दा है, बल्कि यह डब्ल्यूटीओ के कामकाज से भी संबंधित है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 10:56:05 +0530</pubDate>
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