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                <title>हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने के परिणाम घातक होंगे</title>
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                        <![CDATA[दुनिया में ग्लेशियरों का पिघलना समूचे प्राणी जगत के लिए संकट का सबब बन गया है। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/the-consequences-of-melting-himalayan-glaciers-will-be-fatal/article-149063"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/122200-x-60-px)-(8).png" alt=""></a><br /><p>दुनिया में ग्लेशियरों का पिघलना समूचे प्राणी जगत के लिए संकट का सबब बन गया है। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी यूनेस्को की रिपोर्ट में दुनिया में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा गया है कि यदि ग्लेशियरों के पिघलने की मौजूदा दर इसी तरह जारी रही तो इस संकट के परिणाम अभूतपूर्व और विनाशकारी होंगे। यदि समय रहते इस पर अंकुश नहीं लगा तो दुनिया की कुल 8.2 अरब आबादी में से दो अरब से भी ज्यादा लोग पानी और भोजन की गंभीर समस्या का सामना करने को विवश होंगे। यहां यह जान लेना जरूरी है कि ग्लेशियरों की धरती पर जल चक्र बरकरार रखने में महत्वपूर्ण भूमिका है। उनका पानी ही नदियों के जरिये हमारी जीवन धारा को आगे बढ़ाता है। लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लेशियरों के पिघलने से नदियों पर संकट दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। यूनेस्को के डायरेक्टर जनरल आंद्रे एंजुले का कहना है कि ग्लेशियर और पर्वतीय जलस्रोतों पर हम पूरी तरह निर्भर हैं।</p>
<p><strong>स्रोतों के अस्तित्व पर संकट :</strong></p>
<p>जलवायु परिवर्तन के चलते इनके तेजी से पिघलने से पेयजल के इन सबसे बड़े स्रोतों के अस्तित्व पर संकट है। इसलिए इन्हें बचाना समय की सबसे बड़ी जरूरत है। क्योंकि ग्लेशियर हैं तो जल है, जल है तो जीवन है और जीवन है तो हम हैं। जहां तक हिमालयी ग्लेशियरों का सवाल है, सरकार की ओर से संसद में पेश रिपोर्ट में बताया गया कि हिमालय के ग्लेशियर अलग अलग दर से तेजी से पिघल रहे हैं। जलवायु परिवर्तन की वजह से हिमालय की नदियां किसी भी समय प्राकृतिक आपदाएं ला सकती हैं। रिपोर्ट में सरकार ने स्वीकार किया कि ग्लेशियर के पिघलने से नदियों के बहाव में अंतर आयेगा और जिसके परिणाम स्वरूप आबादी का एक बड़ा हिस्सा प्रभावित होगा। गौरतलब है कि लगभग 33,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हिमालयी ग्लेशियर ध्रुवीय क्षेत्रों के अलावा दुनिया के सभी पर्वतीय क्षेत्रों में जमे ताजा पानी के सबसे बड़े भंडार हैं। इन्हीं विशेषताओं के चलते इसे एशिया की जल मीनार और दुनिया का तीसरा ध्रुव भी कहा जाता है।</p>
<p><strong>जीवाश्म ईंधन की हिस्सेदारी :</strong></p>
<p>दक्षिण एशिया के अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, चीन और म्यांमार को मिलाकर कुल आठ देशों की लगभग 160 करोड़ की आबादी आज भी इन हिमालयी नदियों के पानी पर निर्भर है। यहां से एशिया की 10 सबसे बड़ी नदियों जैसे यांग्तसी, मेनांग, गंगा और इरावदी नदियों को पानी मिलता है। इस हिमालयी पर्वत श्रृंखला में कुल लगभग 9,575 ग्लेशियर हैं। इनमें लगभग 267 का क्षेत्रफल 10 वर्ग किलोमीटर से भी ज्यादा है। एशिया की 10 प्रमुख नदियों की जलापूर्ति का आधार इन ग्लेशियरों में गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी तीन प्रमुख नदी घाटियां विभाजित हैं। बीते तीन दशकों के दौरान ये ग्लेशियर 20 से 30 फीसदी पिघले हैं। असलियत में हिमालय में वायु प्रदूषण पर जीवाश्म ईंधन के जलने का ज्यादा असर पड़ रहा है। हिमालयी अंचल में गाड़ियों की बेतहाशा कई गुणा बढ़ती तादाद हवा में जीवाश्म ईंधन की हिस्सेदारी का अहम कारण है। साथ ही हिमालय अब बस्तियों और शहरों के बढ़ते बोझ से हांफने लगा है। वहीं ग्लोबल वार्मिंग के चलते तेजी से ग्लेशियर पिघलकर बनी झीलें जल प्रलय को आमंत्रण दे रही हैं। इस मामले में इसरो की मानें तो हिमालयी क्षेत्र की 2432 ग्लेशियर झीलों में से 672 झीलों का आकार तेजी से बढ़ रहा है। इनमें से भारत में मौजूद 130 झीलों के टूटने का खतरा बना हुआ है।</p>
<p><strong>जलवायु परिवर्तन का परिणाम :</strong></p>
<p>जलवायु परिवर्तन का परिणाम है कि बीते 40 सालों में हिमालय से 440 अरब टन बर्फ पिघल चुकी है। जी बी पंत राष्ट्रीय हिमालय पर्यावरण संस्थान के निदेशक प्रो सुनील नौटियाल की मानें तो अकेले 2010 में ही 20 अरब टन हिमालय के ग्लेशियरों से पिघली है। अगर ऐसा ही रहा तो इसके गंभीर दुष्परिणाम सामने आएंगे। वैज्ञानिक शोध और अध्ययन प्रमाण हैं कि वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी से इस सदी के आखिर तक यहां के एक तिहाई ग्लेशियर गायब हो जाएंगे और तापमान में यदि 2.0 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुयी तो दो तिहाई ग्लेशियरों के गायब होने का खतरा बना रहेगा। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटारेस की चिंता का सबब भी यही है। वे वैज्ञानिकों की इस चेतावनी से भी बेहद चिंतित हैं कि इस सदी के अंत तक हिंदूकुश हिमालयी क्षेत्र के 75 फीसदी ग्लेशियर नष्ट हो जाएंगे। इसीलिये उन्होंने जीवाश्म ईंधन के युग को समाप्त करने पर बल दिया है। दरअसल हिन्दूकुश हिमालय का यह पर्वतीय क्षेत्र जलवायु परिवर्तन की गंभीर मार झेल रहा है। यहां के ग्लेशियरों के दिनोंदिन तेजी से पिघलने से पानी और पर्यावरण पर तेजी से खतरा बढ़ता जा रहा है। पर्वतीय विकास के लिए बनी अंतरराष्ट्रीय केन्द्र की हालिया रिपोर्ट तो यही चेतावनी दे रही है। रिपोर्ट के मुताबिक इस इलाके में साल 2000 के बाद ग्लेशियर पिघलने की दर दोगुनी हो गई है।</p>
<p><strong>हमारे भविष्य की जड़ें हैं :</strong></p>
<p>ग्लेशियर पिघलने से पहाड़ों के बीच बड़ी बड़ी झीलें बन जाती हैं। जब इन पर पानी का दबाव बड़ जाता है, तब यह अचानक फट जाती हैं जिसे ग्लेशियर लेक आउट बर्स्ट फ्लड कहा जाता है। इसके कारण बाढ़ और भूस्खलन का अचानक खतरा बढ़ जाता है। इसके चलते पहाड़ों पर रहने बसने वाले लोगों के लिए अब यह खतरा हर मानसून में चुनौती लेकर आता है। इस मामले में इसरो की मानें तो हिमालय क्षेत्र की 2432 ग्लेशियर झीलों में से 672 झीलों का आकार तेजी से बढ़ता जा रहा है। इनमें से भारत में मौजूद 130 झीलों के टूटने का खतरा बना हुआ है जिससे भारी तबाही की आशंका है। ऐसी विषम स्थिति में ग्लेशियरों को बचाना महज बर्फ को बचाना नहीं है बल्कि अपने भविष्य को बचाना है। यह याद रखना होगा कि ग्लेशियर मात्र बर्फीले शिखर ही नहीं हैं, वे हमारे भविष्य की जड़ें हैं। इसलिए हमें अपनी जीवनशैली में बदलाव के साथ हिमालय क्षेत्र में मानवीय दखलंदाजी पर लगाम लगानी ही होगी।</p>
<p><strong>-ज्ञानेन्द्र रावत</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]>
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                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Apr 2026 11:39:57 +0530</pubDate>
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                <title>लोहे को पिघलाकर, पसीना बहाकर, बना देते घरेलू सामग्री</title>
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                        <![CDATA[लोहा कूटकर तकदीर गढ़ते गड़िया लुहार परिवार, पीढ़िया बीती हालात नहीं सुधरे ।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/melting-iron-and-shedding-sweat-to-craft-household-essentials/article-148549"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/12200-x-60-px)5.png" alt=""></a><br /><p>कोटा । कहते हैं जीवन एक संघर्ष है, लेकिन शहर की सड़कों के किनारे, खुले आसमान के नीचे रहने वाले गड़िया लुहार परिवारों के लिए यह संघर्ष हर दिन एक नई परीक्षा जैसा है। भीषण गर्मी हो या कड़ाके की ठंड, अपनी आजीविका के लिए करीब 39 डिग्री में लोहे को पीटकर घरेलू सामान बनाने वाले इन परिवारों की जिंदगी में खुशियों के पल बहुत कम आते हैं। जब शहर के इलाके में गुजर बसर रहे परिवार की गुजर बाई ने बताया कि परिवार में मेरा बेटा सोनू व जमाई भी हमारे साथ ही रहते है और काम करते हैं। इस दौरान गुजर बाई आशियाने के बाहर लोहे को आग में तपाकर उसे आकार देने में जुटी मिली।</p>
<p><strong>भीषण गर्मी में लोहे को देते है आकार</strong><br />गुजर बाई ने बताया कि उम्र के इस पड़ाव पर भी कड़ी मेहनत कर रही हूं। उन्होंने कहा कि हमारा तो जन्म ही लोहे को पीटने के लिए हुआ है। सुबह से शाम तक आग की भट्टी के पास बैठकर लोहे को तपाते हैं, फिर जोर-जोर से हथौड़ा चलाकर उसे खुरपी, चिमटा, तवा या कड़ाही सहित अन्य आइटम का रूप देते हैं। तब जाकर कहीं दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो पाता है।</p>
<p><strong>प्लास्टिक के सामानों ने की कद्र कम </strong><br />उन्होंने कहा कि बाजार में प्लास्टिक और मशीन से बने सामानों की भरमार है, जिससे हमारे हाथ से बने मजबूत सामानों की कद्र कम हो गई है। पूरा दिन मेहनत करने के बाद भी चंद रुपये ही कमा पाते हैं। महंगाई के दौर में इतने कम पैसों में घर चलाना और बच्चों को पालना बहुत मुश्किल है।</p>
<p><strong>आजीविका का मुख्य साधन</strong><br />गुजर बाई की तरह ही कोटा शहर में विभिन्न स्थानों पर निवास करने वाले सैकड़ों गड़िया लुहार परिवार पूरी तरह से लोहे के काम पर निर्भर हैं। वे मुख्य रूप से घरेलू उपयोग की वस्तुएं बनाते है। जिनमें कड़ाही, तवा, चिमटा, संडासी, कड़छी, चाकू। वहीं खेत में काम आने वाले खुरपी, फावड़ा, दरांती। वहीं अन्य सामानों में जानवरों के गले की घंटी, कीलें, सांकल आदि बनाते और बेचते हैं।</p>
<p><strong>मूलभूत सुविधों के लिए संघर्ष करना पड़ता</strong><br />एक तरफ जहां गुजर बाई अपनी आजीविका के लिए संघर्ष कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ उनके रहने के ठिकाने भी सुरक्षित नहीं हैं। गड़िया लुहार समुदाय का इतिहास महाराणा प्रताप के समय से जुड़ा है, जब उन्होंने कसम खाई थी कि जब तक मेवाड़ आजाद नहीं हो जाता, वे घर बनाकर नहीं रहेंगे। तब से ये लोग गाड़ियों में घूमकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। कोटा में भी ये परिवार खुले मैदानों, सड़क किनारे या नालों के पास तिरपाल डालकर रहते हैं। शहर में निवास करने वाली पूजा बाई, कमला बाई, काली व किरण ने बताया कि सरकार को भी हमारे लिए कुछ अलग से विशेष योजनाएं चलानी चाहिए। जिससे हम लोगों को लाभ मिल सके।</p>
<p><strong>बारिश थमने का इंतजार </strong><br /> गाड़िया लुहार परिवार के सदस्यों ने बताया कि हम लोग पीढ़ियों से लोहे को कूटने का काम कर रहे है। और आज यानी की सोमवार को अचानक हुई बारिश से हमारा काम अभी कुछ देर के लिए रूक हैं। उसके बाद काम में जुटना हैं।</p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />हमारे लिए भी सरकार को कोई विशेष योजना बनानी चाहिए। जिससे हमको इसका लाभ मिल सके व हमारा जीवन स्तर भी सुधार सके।<br /><strong>- गुजर बाई</strong></p>
<p>हम लोग रोड पर ही लोहे के सामानों की दुकान लगाकर ब्रिकी करते हैं। कई बार हमारे सामने रोजी रोटी का संकट आ जाता हैं। जिससे विभिन्न परेशानियों का सामना करना पड़ता हैं। सरकार ने विभिन्न समुदायों के लिए योजनाएं बना रखी हैं। हमारे लिए भी कुछ करना चाहिए।<br /><strong> - कमला बाई</strong></p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 14:39:18 +0530</pubDate>
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