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                <title>लोहे को पिघलाकर, पसीना बहाकर, बना देते घरेलू सामग्री</title>
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                        <![CDATA[लोहा कूटकर तकदीर गढ़ते गड़िया लुहार परिवार, पीढ़िया बीती हालात नहीं सुधरे ।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/melting-iron-and-shedding-sweat-to-craft-household-essentials/article-148549"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/12200-x-60-px)5.png" alt=""></a><br /><p>कोटा । कहते हैं जीवन एक संघर्ष है, लेकिन शहर की सड़कों के किनारे, खुले आसमान के नीचे रहने वाले गड़िया लुहार परिवारों के लिए यह संघर्ष हर दिन एक नई परीक्षा जैसा है। भीषण गर्मी हो या कड़ाके की ठंड, अपनी आजीविका के लिए करीब 39 डिग्री में लोहे को पीटकर घरेलू सामान बनाने वाले इन परिवारों की जिंदगी में खुशियों के पल बहुत कम आते हैं। जब शहर के इलाके में गुजर बसर रहे परिवार की गुजर बाई ने बताया कि परिवार में मेरा बेटा सोनू व जमाई भी हमारे साथ ही रहते है और काम करते हैं। इस दौरान गुजर बाई आशियाने के बाहर लोहे को आग में तपाकर उसे आकार देने में जुटी मिली।</p>
<p><strong>भीषण गर्मी में लोहे को देते है आकार</strong><br />गुजर बाई ने बताया कि उम्र के इस पड़ाव पर भी कड़ी मेहनत कर रही हूं। उन्होंने कहा कि हमारा तो जन्म ही लोहे को पीटने के लिए हुआ है। सुबह से शाम तक आग की भट्टी के पास बैठकर लोहे को तपाते हैं, फिर जोर-जोर से हथौड़ा चलाकर उसे खुरपी, चिमटा, तवा या कड़ाही सहित अन्य आइटम का रूप देते हैं। तब जाकर कहीं दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो पाता है।</p>
<p><strong>प्लास्टिक के सामानों ने की कद्र कम </strong><br />उन्होंने कहा कि बाजार में प्लास्टिक और मशीन से बने सामानों की भरमार है, जिससे हमारे हाथ से बने मजबूत सामानों की कद्र कम हो गई है। पूरा दिन मेहनत करने के बाद भी चंद रुपये ही कमा पाते हैं। महंगाई के दौर में इतने कम पैसों में घर चलाना और बच्चों को पालना बहुत मुश्किल है।</p>
<p><strong>आजीविका का मुख्य साधन</strong><br />गुजर बाई की तरह ही कोटा शहर में विभिन्न स्थानों पर निवास करने वाले सैकड़ों गड़िया लुहार परिवार पूरी तरह से लोहे के काम पर निर्भर हैं। वे मुख्य रूप से घरेलू उपयोग की वस्तुएं बनाते है। जिनमें कड़ाही, तवा, चिमटा, संडासी, कड़छी, चाकू। वहीं खेत में काम आने वाले खुरपी, फावड़ा, दरांती। वहीं अन्य सामानों में जानवरों के गले की घंटी, कीलें, सांकल आदि बनाते और बेचते हैं।</p>
<p><strong>मूलभूत सुविधों के लिए संघर्ष करना पड़ता</strong><br />एक तरफ जहां गुजर बाई अपनी आजीविका के लिए संघर्ष कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ उनके रहने के ठिकाने भी सुरक्षित नहीं हैं। गड़िया लुहार समुदाय का इतिहास महाराणा प्रताप के समय से जुड़ा है, जब उन्होंने कसम खाई थी कि जब तक मेवाड़ आजाद नहीं हो जाता, वे घर बनाकर नहीं रहेंगे। तब से ये लोग गाड़ियों में घूमकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। कोटा में भी ये परिवार खुले मैदानों, सड़क किनारे या नालों के पास तिरपाल डालकर रहते हैं। शहर में निवास करने वाली पूजा बाई, कमला बाई, काली व किरण ने बताया कि सरकार को भी हमारे लिए कुछ अलग से विशेष योजनाएं चलानी चाहिए। जिससे हम लोगों को लाभ मिल सके।</p>
<p><strong>बारिश थमने का इंतजार </strong><br /> गाड़िया लुहार परिवार के सदस्यों ने बताया कि हम लोग पीढ़ियों से लोहे को कूटने का काम कर रहे है। और आज यानी की सोमवार को अचानक हुई बारिश से हमारा काम अभी कुछ देर के लिए रूक हैं। उसके बाद काम में जुटना हैं।</p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />हमारे लिए भी सरकार को कोई विशेष योजना बनानी चाहिए। जिससे हमको इसका लाभ मिल सके व हमारा जीवन स्तर भी सुधार सके।<br /><strong>- गुजर बाई</strong></p>
<p>हम लोग रोड पर ही लोहे के सामानों की दुकान लगाकर ब्रिकी करते हैं। कई बार हमारे सामने रोजी रोटी का संकट आ जाता हैं। जिससे विभिन्न परेशानियों का सामना करना पड़ता हैं। सरकार ने विभिन्न समुदायों के लिए योजनाएं बना रखी हैं। हमारे लिए भी कुछ करना चाहिए।<br /><strong> - कमला बाई</strong></p>]]>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 14:39:18 +0530</pubDate>
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