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                <title>Supreme Court - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>Supreme Court RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>वीर सावरकर मामले में राहुल गांधी को राहत: SC ने रद्द की लखनऊ कोर्ट की कार्रवाई, कहा- अदालत ने यूपी सरकार से नहीं ली जरूरी कानूनी अनुमति </title>
                                    <description><![CDATA[वीर सावरकर पर दिए बयान से जुड़े मानहानि मामले में उच्चतम न्यायालय ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को राहत देते हुए लखनऊ अदालत की आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार से अनिवार्य कानूनी मंजूरी के बिना यह कार्रवाई शुरू की गई थी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/big-relief-to-rahul-gandhi-in-veer-savarkar-case-supreme/article-162932"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-08/rahul-gandhi.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। वीर सावरकर पर कथित विवादित टिप्पणी से जुड़े मानहानि मामले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने लखनऊ की अदालत में चल रही आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि राहुल गांधी के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार से जरूरी कानूनी अनुमति नहीं ली गई थी। ऐसे में बिना अनिवार्य मंजूरी के शुरू की गई कार्रवाई को आगे जारी नहीं रखा जा सकता।</p>
<p>राहुल गांधी ने लखनऊ अदालत के समन और उनके खिलाफ शुरू हुई कार्यवाही को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। उन्होंने पूरा मामला रद्द करने की मांग की थी। यह मामला 2022 का है, जब राहुल गांधी महाराष्ट्र में भारत जोड़ो यात्रा के दौरान सावरकर को लेकर दिए गए बयान के कारण विवादों में आए थे। इसके बाद लखनऊ में उनके खिलाफ आपराधिक मानहानि की शिकायत दर्ज कराई गई थी और मजिस्ट्रेट अदालत ने उन्हें समन जारी किया था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 19:02:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>करूर भगदड़ मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, पीड़ित परिवारों को अनुकंपा नौकरी देने पर मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर रोक</title>
                                    <description><![CDATA[उच्चतम न्यायालय ने मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें करूर भगदड़ त्रासदी के पीड़ितों के परिवारों को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने के तमिलनाडु सरकार के फैसले को रद्द कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की याचिका पर नोटिस जारी करते हुए मामले में आगे की सुनवाई तय की है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/supreme-courts-big-decision-in-karur-stampede-case-stay-on/article-162930"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/superme-court.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को मद्रास उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें करूर भगदड़ त्रासदी के पीड़ितों के परिवारों को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने के तमिलनाडु सरकार के फैसले को रद्द कर दिया गया था। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली राज्य सरकार और अन्य की याचिका पर नोटिस जारी किया है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश के अमल पर अंतरिम रोक लगा दी है।</p>
<p>तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी और मुकुल रोहतगी ने संविधान के अनुच्छेद 162 के तहत करूर भगदड़ पीड़ितों के परिवारों को अनुकंपा नियुक्ति देने के राज्य के फैसले का बचाव किया। सिंघवी ने मद्रास उच्च न्यायालय के दखल पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार की नीति को किसी ने चुनौती नहीं दी थी। वहीं, एक राजनीतिक दल की ओर से पेश हुए अधिवक्ता ए. वेलन ने हितों के टकराव का आरोप लगाते हुए राज्य सरकार की इस नीति का विरोध किया।</p>
<p>सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति पारदीवाला ने इस आपत्ति पर सवाल उठाया और पूछा कि सरकार किसी पीड़ित के जीवित आश्रितों को रोजगार क्यों नहीं दे सकती, खासकर तब जब मृतक ही परिवार का एकमात्र कमाने वाला व्यक्ति रहा हो। इसके साथ ही, न्यायमूर्ति चंद्रन ने इस मामले में राजनीति को बीच में लाने से बचने की चेतावनी दी। उल्लेखनीय है कि इससे पहले मद्रास उच्च न्यायालय ने इन नियुक्तियों को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि ये संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करती हैं। उच्च न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की थी कि इस तरह के फैसले से भविष्य में ऐसे दावों की बाढ़ आ सकती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 18:24:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>प्रदर्शनकारियों की डिजिटल निगरानी का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, माकपा सांसद ए.ए. रहीम की याचिका पर सुनवाई को मिली मंजूरी</title>
                                    <description><![CDATA[उच्चतम न्यायालय ने प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों की फेशियल रिकॉग्निशन तकनीक तथा बायोमेट्रिक निगरानी को चुनौती देने वाली माकपा सांसद ए.ए. रहीम की याचिका पर सुनवाई की सहमति दी है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि निजी कंपनियों के जरिए यह डेटा संग्रह निजता के अधिकार का उल्लंघन है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/the-matter-of-digital-surveillance-of-protesters-reached-the-supreme/article-162857"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-01/supreme-court--31.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने प्रदर्शन स्थलों पर पुलिस द्वारा फेशियल रिकॉग्निशन टेक्नोलॉजी और अन्य बायोमेट्रिक निगरानी उपायों की तैनाती को चुनौती देने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के राज्यसभा सांसद ए.ए. रहीम की रिट याचिका पर सुनवाई करने पर गुरुवार को सहमति व्यक्त की। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इस याचिका को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के आयोजित हालिया छात्र विरोध-प्रदर्शनों से जुड़ी अन्य लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ने का निर्देश दिया।</p>
<p>याचिकाकर्ता ए.ए. रहीम की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मेनका गुरुस्वामी ने पीठ के समक्ष दलील दी कि यह याचिका जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की निगरानी के लिए दिल्ली पुलिस के कथित रूप से डिजिटल उपकरणों का उपयोग करने के संदर्भ में दायर की गई है। उन्होंने बताया कि पुलिस ने इस निगरानी कार्य के लिए दो निजी संस्थाओं, आदित्य इन्फोटेक लिमिटेड और डायमेंशन एनएक्सजी प्राइवेट लिमिटेड की सेवाएं ली हैं। याचिकाकर्ता के अनुसार, प्रदर्शनकारियों के डेटा का संग्रह, प्रसंस्करण और भंडारण डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के प्रावधानों का उल्लंघन करके किया गया।</p>
<p>याचिका में आरोप लगाया गया है कि दिल्ली पुलिस ने बिना किसी स्पष्ट कानूनी अधिकार के नागरिक प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों, पत्रकारों और अन्य लोगों की बायोमेट्रिक निगरानी की। इसमें दावा किया गया है कि उनकी तस्वीरों और फुटेज को एकत्र करने व प्रोसेस करने के लिए सीसीटीवी कैमरों, ड्रोन और अन्य प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल किया गया। याचिका में उच्चतम न्यायालय के 2017 के ऐतिहासिक पुट्टास्वामी फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया है कि इस तरह की निगरानी निजता के अधिकार का उल्लंघन करती है, जब तक कि इसे कानून का समर्थन प्राप्त न हो और इसे आवश्यक व समुचित न ठहराया जाए। इसके साथ ही याचिका में शामिल की गई प्रौद्योगिकियों, डेटाबेस और निजी विक्रेताओं के विवरण का खुलासा करने तथा प्रभावित व्यक्तियों को अपने डेटा तक पहुंचने और उसे हटाने की प्रणाली प्रदान करने की भी मांग की गई है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 17:25:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>'कॉकरोच जनता पार्टी' से जुड़ी गतिविधियों और फर्जी वकीलों की याचिका पर Supreme Court ने केंद्र से मांगा जवाब, CBI को नोटिस जारी</title>
                                    <description><![CDATA[उच्चतम न्यायालय ने फर्जी लॉ डिग्री, अदालती टिप्पणियों के व्यावसायिक दुरुपयोग और 'कॉकरोच जनता पार्टी' से जुड़ी गतिविधियों की सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका पर केंद्र, बीसीआई और सीबीआई को नोटिस जारी किया है। याचिका में कोर्टरूम की कार्यवाही के मीम्स और व्यावसायिक उपयोग पर कार्रवाई की मांग की गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/supreme-court-seeks-response-from-center-on-the-activities-related/article-162703"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/supreme-court2.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने फर्जी वकीलों, फर्जी लॉ डिग्री और 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) से जुड़ी गतिविधियों की केंद्रीय जांच ब्यूरो(सीबीआई) से जांच की मांग को लेकर पेश याचिका पर मंगलवार को केंद्र सरकार से जवाब मांगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने वकील राजा चौधरी की ओर से दायर जनहित याचिका पर इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय , बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) और सीबीआई को नोटिस जारी किया।</p>
<p>याचिकाकर्ता राजा चौधरी ने खुद अदालत में अपना पक्ष रखा। याचिका में गत 15 मई की अदालती कार्यवाही के दौरान की गयी मौखिक टिप्पणियों के कथित 'व्यावसायिक शोषण' और उनसे पैसे कमाने के खिलाफ कार्रवाई की भी मांग की गयी है। याचिका में कहा गया है कि कोर्टरूम में हुई बातचीत के कुछ हिस्सों को चुन-चुनकर काटा गया और बाद में मीम्स, वीडियो, मिमिक्री, राजनीतिक ब्रांडिंग और व्यावसायिक सामग्री के लिए इस्तेमाल किया गया।</p>
<p>याचिका में सक्षम अधिकारियों को उन लोगों/संस्थाओं के खिलाफ कानून के अनुसार जांच और कार्रवाई करने के निर्देश देने की मांग की गयी ,जो कथित तौर पर व्यावसायिक शोषण, ट्रेडमार्क के दुरुपयोग, पैसे कमाने के लिए प्रसार या न्यायालय के समक्ष कार्यवाही से उत्पन्न मौखिक अदालती टिप्पणियों और प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियों के अनधिकृत व्यावसायिक उपयोग में शामिल हैं तथा जिसमें सीजेपी से जुड़ी गतिविधियां भी शामिल हैं। याचिका में विवाद की जड़ 15 मई की कार्यवाही को बताया गया है, जिस दौरान अदालती प्रक्रियाओं के कथित दुरुपयोग, वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा देने और कानूनी पेशे में पेशेवर मानकों के गिरने पर चिंता जतायी गयी थी।</p>
<p>याचिका में कहा गया है कि कार्यवाही के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने मौखिक रूप से टिप्पणी की थी - "कॉकरोच जैसे युवा हैं जिन्हें इस पेशे में रोजगार नहीं मिल रहा है। कुछ सोशल मीडिया पर हैं, कुछ आरटीआई कार्यकर्ता बन जाते हैं।" उन्होंने यह भी कहा था, "समाज में पहले से ही ऐसे परजीवी मौजूद हैं जो सिस्टम पर हमला करते हैं और आप उनके साथ हाथ मिलाना चाहते हैं?" इन टिप्पणियों के बाद विवाद खड़ा हो गया, जिसके बाद मुख्य न्यायाषीश ने स्पष्ट किया कि उनकी बातें उन लोगों के लिए थीं जो फर्जी योग्यता और डिग्री के आधार पर नौकरी या प्रोफेशन में आते हैं, न कि आम तौर पर बेरोजगार भारतीय युवाओं के लिए।</p>
<p>याचिकाकर्ता ने हालांकि स्पष्ट किया कि इस जनहित याचिका का मकसद न्यायपालिका की आलोचना, लोकतांत्रिक असहमति, व्यंग्य या संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अपनी बात रखने की आज़ादी पर रोक लगाना नहीं है। मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियों पर हुए विवाद के बाद अमेरिका के बोस्टन में रहने वाले अभिजीत दिपके ने 'कॉकरोच जनता पार्टी' का गठन किया। यह ऑनलाइन प्लेटफार्म बेरोजगारी, संस्थागत जवाबदेही और मीडिया की आज़ादी जैसे मुद्दों पर टिप्पणी करने के लिए राजनीतिक व्यंग्य का इस्तेमाल करता है। इसके बाद सीजेपी ने नीट-यूजी प्रश्न पत्र लीक मामले को लेकर विरोध प्रदर्शन किया और तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की। इस आंदोलन का समापन 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर 'संसद चलो' विरोध प्रदर्शन के साथ हुआ, जिसमें पुलिस की कार्रवाई हुई और प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन के इस्तेमाल के आरोप लगे। इसके बाद श्री प्रधान ने शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 13:00:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>NEET-UG प्रदर्शन पर दिल्ली सरकार का बड़ा फैसला: छात्रों पर नहीं होगी कार्रवाई, आपराधिक रिकॉर्ड वालों पर सख्ती जारी रहेगी</title>
                                    <description><![CDATA[दिल्ली सरकार ने नीट-यूजी प्रदर्शन से जुड़े मामलों में राहत देते हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ आगे कानूनी कार्रवाई नहीं करने का फैसला किया है। प्रशासन ने कहा कि मामलों की समीक्षा के बाद पात्र प्रदर्शनकारियों की रिहाई की प्रक्रिया शुरू होगी, जबकि गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले आरोपियों पर कानूनी कार्रवाई जारी रहेगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/big-decision-of-delhi-government-on-neet-ug-protest-no-action/article-161481"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-07/rekha-gupta1.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। नीट-यूजी परीक्षा में कथित अनियमितताओं के विरोध में हुए छात्र प्रदर्शनों से जुड़े मामलों पर दिल्ली सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ आगे कोई प्रतिकूल कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी। हालांकि, जिन लोगों का आपराधिक रिकॉर्ड है या जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि दर्ज है, उन्हें इस राहत का लाभ नहीं मिलेगा। सरकार के अनुसार, 29 जुलाई 2026 तक इन प्रदर्शनों के संबंध में दिल्ली पुलिस ने 13 एफआईआर दर्ज की थीं। </p>
<p>अब इन मामलों की समीक्षा कर गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों की रिहाई की प्रक्रिया जल्द शुरू की जाएगी। यह निर्णय 28 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों के अनुरूप उपराज्यपाल की मंजूरी के बाद लिया गया है। दिल्ली सरकार ने कहा कि प्रदर्शन से जुड़े मामलों को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा और इस प्रकरण को समाप्त माना जाएगा। वहीं, आपराधिक रिकॉर्ड वाले आरोपियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई जारी रहेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
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                <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 17:49:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>SC ने उठाए पैलेट गन के इस्तेमाल के खिलाफ याचिका पर सवाल, घायल प्रदर्शनकारियों के इलाज का दिया निर्देश</title>
                                    <description><![CDATA[उच्चतम न्यायालय ने भीड़ नियंत्रण में पैलेट गन के इस्तेमाल पर रोक की मांग वाली याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए इसे स्पष्ट करने की आवश्यकता बताई। अदालत ने घायल लोगों के उचित इलाज, साक्ष्यों को सुरक्षित रखने और मामले में आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने पर संबंधित पक्षों को निर्देश दिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/delhi-high-court-raised-questions-on-the-petition-against-the/article-161423"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-02/supreme-court--3.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने भीड़ को काबू में करने के लिए कानून लागू करने वाली एजेंसियों द्वारा पैलेट गन के इस्तेमाल पर रोक लगाने वाली याचिका को 'अस्पष्ट' कहा। गौरतलब है कि मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची तथा वी. मोहना की पीठ भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के पूर्व अधिकारी यशोवर्धन आजाद और 20 जुलाई के 'संसद चलो' विरोध-प्रदर्शन के दौरान घायल हुए दो लोगों की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इन लोगों का दावा था कि त्वरित कार्रवाई बल द्वारा चलाई गई धातु की गोलियों (पैलेट) से वे घायल हुए थे।</p>
<p>पीठ ने गौर किया कि पुलिस नियम खास हालात में पैलेट गन के इस्तेमाल की इजाजत देते हैं, जबकि याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि उनके शरीर से धातु की गोलियां (पैलेट) मिली थीं। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने तर्क दिया कि पैलेट गन के इस्तेमाल से जुड़े नियम आसानी से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने केंद्र सरकार से इन नियमों को रिकॉर्ड पर लाने का निर्देश देने की मांग की ताकि याचिका में उचित बदलाव किए जा सकें।</p>
<p>उन्होंने एक घायल याचिकाकर्ता के लिए अपर्याप्त इलाज का मुद्दा भी उठाया और गोला-बारूद के रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने की मांग की। केंद्र ने अदालत को भरोसा दिलाया कि वह सहयोग करेगा और जांच के लिए जरूरी सभी सामग्री सुरक्षित रखेगा। पीठ ने कहा कि जब विरोध-प्रदर्शन हिंसक हो जाते हैं, तो पुलिस को स्थिति के हिसाब से कदम उठाने पड़ सकते हैं। पीठ ने मामले की सुनवाई टाल दी और इस बीच दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह घायल याचिकाकर्ताओं और इसी तरह प्रभावित अन्य लोगों के लिए उचित इलाज सुनिश्चित करे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 16:27:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को सशर्त दी अग्रिम जमानत : पुलिस के बुलाने पर थाने में होना होगा पेश, पढ़ें पूरा मामला </title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को असम में दर्ज मामले में अग्रिम जमानत दे दी है। अदालत ने कहा कि राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के मामलों में हिरासत में पूछताछ जरूरी नहीं है। न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी की पीठ ने गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए खेड़ा की स्वतंत्रता को सुरक्षित किया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/supreme-court-grants-conditional-anticipatory-bail-to-congress-leader-pawan/article-152334"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-05/supreme.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को असम पुलिस की ओर से दर्ज प्राथमिकी के मामले में शुक्रवार को अग्रिम जमानत दे दी। यह मामला मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा की शिकायत पर दर्ज किया गया था। पवन खेड़ा ने सीएम सरमा पर एक से अधिक पासपोर्ट रखने के आरोप लगाए थे।</p>
<p>न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने गौहाटी उच्च न्यायालय द्वारा खेड़ा की अग्रिम जमानत याचिका खारिज किए जाने को चुनौती देने वाली याचिका पर गुरूवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। यह फैसला शुक्रवार को जारी किया गया। इसमें उच्चतम न्यायालय ने कहा कि गौहाटी उच्च न्यायालय का अवलोकन "रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के उचित मूल्यांकन पर आधारित नहीं था और त्रुटिपूर्ण प्रतीत होता है, विशेष रूप से आरोपी पर बोझ डालने के मामले में।"</p>
<p>अदालत ने आगे कहा कि आरोप-प्रत्यारोप प्रथम दृष्टया राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से प्रेरित लगते हैं और हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता को उचित नहीं ठहराते। इसकी जांच मुकदमे के दौरान की जा सकती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियाँ केवल अग्रिम जमानत देने के प्रश्न तक सीमित हैं और आपराधिक कार्यवाही की योग्यता को प्रभावित नहीं करेंगी, जिसका निर्णय कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से किया जाएगा।</p>
<p>उल्लेखनीय है कि पवन खेड़ा ने इस मामले में केस दर्ज होने के बाद सबसे पहले तेलंगाना उच्च न्यायालय का रुख किया था, जिसने 10 अप्रैल को उन्हें असम की संबंधित अदालत से राहत पाने के लिए एक सप्ताह की ट्रांजिट अग्रिम जमानत दी थी। इसके बाद उच्चतम न्यायालय ने 15 अप्रैल को इस राहत पर रोक लगा दी थी, लेकिन स्पष्ट किया कि असम की सक्षम अदालत में दायर किसी भी अग्रिम जमानत याचिका पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लिया जाना चाहिए।</p>
<p>बाद में गौहाटी उच्च न्यायालय ने उनकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि मामला केवल मानहानि तक सीमित नहीं है और दस्तावेजों के स्रोत का पता लगाने के लिए हिरासत में पूछताछ आवश्यक है, जिसके बाद उन्होंने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 May 2026 15:40:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>20 हफ्ते प्रेग्नेंट नाबालिग को अबॉर्शन की इजाजत : सुप्रीम कोर्ट बोला-बलात्कार पीड़िताओं के लिए पुनर्विचार की जरूरत, डिलीवरी के लिए नहीं कर सकते मजबूर</title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार पीड़िताओं के गर्भपात कानून में बदलाव की वकालत की है। अदालत ने कहा कि नाबालिगों के लिए 20 सप्ताह की सीमा न्याय में बाधा नहीं बननी चाहिए। पीड़िता के मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनचाहा गर्भ किसी पर थोपा नहीं जा सकता और अंतिम निर्णय पीड़िता का होना चाहिए।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/abortion-allowed-to-20-weeks-pregnant-minor-supreme-court-said/article-152185"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-11/supreme_court__1_1.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें एक 15 वर्षीय नाबालिग के 30 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति देने वाले दो न्यायाधीशों की पीठ के एक आदेश को चुनौती दी गयी थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची की पीठ ने गर्भपात की अनुमति देते हुए एम्स को प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि एम्स अपना निर्णय (कि गर्भपात नहीं किया जाना चाहिए) मां पर नहीं थोप सकता और महिला के पास निर्णय लेने का विकल्प होना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की, "अवांछित गर्भ का बोझ महिला पर नहीं डाला जा सकता।"</p>
<p>न्यायालय ने एम्स के डॉक्टरों को नाबालिग और उसके परिवार की काउंसलिंग करने तथा उन्हें प्रासंगिक मेडिकल रिपोर्ट और जानकारी साझा करने की स्वतंत्रता दी है, ताकि वे यह तय कर सकें कि गर्भावस्था को जारी रखना है या गर्भपात का विकल्प चुनना है।</p>
<p>इससे पहले 24 अप्रैल को न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने गर्भपात की अनुमति दी थी। कल बुधवार को इसी पीठ ने एम्स की समीक्षा याचिका को खारिज करते हुए कहा था, "यह अजीब है कि याचिकाकर्ता एम्स उच्चतम न्यायालय के आदेश को मानने को तैयार नहीं है और इसके बजाय नाबालिग के संवैधानिक अधिकारों को विफल करने के लिए अदालत के आदेश को ही चुनौती दे रहा है।"</p>
<p>उच्चतम न्यायालय की डांट खाने के बावजूद एम्स ने अपने कदम पीछे नहीं खींचे और मामले में उपचारात्मक याचिका दायर कर दी। इसे मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष तत्काल रखा गया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि डॉक्टर अजन्मे बच्चे पर बहुत अधिक ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, जबकि उस मां पर ध्यान नहीं दे रहे जो एक दर्द से गुजर रही है। उन्होंने कहा, "बच्चे पर बहुत अधिक ध्यान दिया जा रहा है और उस मां पर नहीं जिसने इतना कष्ट झेला है।"</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 14:08:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>दिल्ली आबकारी नीति मामला : केजरीवाल के बाद मनीष सिसोदिया ने किया स्वर्णकांता की अदालत में पेश होने से इनकार, बोले-सत्याग्रह के अलावा कोई विकल्प नहीं </title>
                                    <description><![CDATA[अरविंद केजरीवाल के बाद अब मनीष सिसोदिया ने भी न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत का बहिष्कार किया है। उन्होंने पत्र लिखकर कार्यवाही में शामिल होने से इनकार करते हुए इसे 'अंतरात्मा और भरोसे' की लड़ाई बताया। सिसोदिया ने स्पष्ट किया कि निष्पक्ष न्याय की उम्मीद में वे अब सत्याग्रह का मार्ग अपनाएंगे और उच्चतम न्यायालय का रुख करेंगे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/delhi-excise-policy-case-after-kejriwal-manish-sisodia-refused-to/article-151925"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-04/manish_sisodia_630x400.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। दिल्ली आबकारी नीति मामले में अरविंद केजरीवाल के बाद अब दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने भी न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा को पत्र लिखकर सूचित किया है कि न तो वह और न ही उनके वकील उनकी अदालत में पेश होंगे। मनीष सिसोदिया ने अपने पत्र और सोशल मीडिया 'एक्स' पर एक पोस्ट में कहा कि 'पूर्ण सम्मान के साथ', उनकी अंतरात्मा उन्हें वर्तमान परिस्थितियों में न्यायमूर्ति के समक्ष कार्यवाही में भाग लेना जारी रखने की अनुमति नहीं देती है। उन्होंने लिखा, "यह किसी व्यक्ति का सवाल नहीं है, बल्कि उस भरोसे का सवाल है जिस पर न्याय व्यवस्था टिकी है कि हर नागरिक को न केवल न्याय मिलना चाहिए, बल्कि न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए।"</p>
<p>पूर्व उपमुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका और संविधान में उनकी आस्था 'अटल' है लेकिन जब मन में गंभीर संदेह पैदा होते हैं, तो केवल औपचारिक भागीदारी उचित नहीं होती। उन्होंने कहा, "इसलिए, मेरे पास सत्याग्रह के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।" यह कदम केजरीवाल द्वारा इसी तरह का रुख अपनाने के कुछ ही समय बाद आया है, जिन्होंने अपनी रिक्यूजल याचिका (न्यायाधीश को मामले से हटने की अर्जी) खारिज होने के बाद अदालत में पेश होने से इनकार कर दिया था। ये घटनाक्रम एक दुर्लभ और तीखे टकराव को दर्शाते हैं, जिसमें आम आदमी पार्टी (आप) के दोनों वरिष्ठ नेताओं ने अदालती कार्यवाही का बहिष्कार करने का फैसला किया है। साथ ही उन्होंने संकेत दिया है कि वे उच्चतम न्यायालय के समक्ष कानूनी उपाय अपनायेंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 Apr 2026 14:34:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>पवन खेड़ा को सुप्रीम कोर्ट से झटका : अदालत ने ठुकराई ट्रांजिट अग्रिम जमानत बढ़ाने की अर्जी, असम सीएम की पत्नी पर की थी आपत्तिजनक टिप्पणी</title>
                                    <description><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की ट्रांजिट अग्रिम जमानत बढ़ाने की अर्जी ठुकरा दी है। असम के मुख्यमंत्री की पत्नी पर विवादास्पद टिप्पणी और पासपोर्ट संबंधी आरोपों के मामले में खेड़ा को अब असम की अदालत में पेश होना होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह स्थानीय अदालत की कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं करेगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/shock-to-pawan-kheda-from-the-supreme-court-the-court/article-150802"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/01.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी मामले में कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को बड़ा झटका देते हुए उनकी ट्रांजिट अग्रिम जमानत बढ़ाने की अर्जी ठुकरा दी है। यह मामला असम पुलिस द्वारा असम के मुख्यमंत्री सरमा की पत्नी की शिकायत पर दर्ज की गई एक प्राथमिकी से जुड़ा है। पवन खेड़ा का आरोप था कि सीएम सरमा की पत्नी के पास अलग-अलग देशों के कई पासपोर्ट हैं।</p>
<p>पवन खेड़ा की उस अर्जी को भी अदालत ने ठुकरा दिया जिसमें उन्होंने ट्रांजिट जमानत को अगले मंगलवार तक बढ़ाने की मांग की थी ताकि वह सोमवार को असम की अदालत में पेश हो सकें। यह घटनाक्रम शीर्ष अदालत द्वारा उनकी अग्रिम जमानत पर रोक लगाने के दो दिन बाद सामने आया है। यह अग्रिम जमानत उन्हें तेलंगाना उच्च न्यायालय ने दी थी। न्यायमूर्ति जेके माहेश्वरी और अतुल एस चांदुरकर की पीठ ने टिप्पणी की कि यदि संबंधित अदालत काम नहीं कर रही है, तो मामले की सुनवाई के लिए अनुरोध किया जा सकता है, जिस पर मौजूदा चलन के अनुसार विचार किया जा सकता है।</p>
<p>उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न तो वह और न ही तेलंगाना उच्च न्यायालय असम की उस अदालत के काम में कोई दखल देगा जो पवन खेड़ा के खिलाफ मामले की सुनवाई करेगी। गौरतलब है कि 5 अप्रैल को एक संवाददाता सम्मेलन में पवन खेड़ा ने आरोप लगाया था कि सीएम सरमा के पास कई पासपोर्ट हैं और कई देशों में उनकी संपत्तियां हैं, जिनका जिक्र असम के मुख्यमंत्री ने अपने चुनावी हलफनामे में नहीं किया था। मुख्यमंत्री ने इन आरोपों को खारिज कर दिया, जिसके बाद पवन खेड़ा के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 15:01:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट ने अनिवार्य मतदान की मांग वाली याचिका खारिज की : कहा-मतदान एक संवैधानिक अधिकार और लोकतांत्रिक कर्तव्य, किसी पर थोपा नहीं जा सकता</title>
                                    <description><![CDATA[उच्चतम न्यायालय ने अनिवार्य मतदान लागू करने वाली याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में नागरिकों को वोट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता और न ही सुविधाएं रोकी जा सकती हैं। पीठ के अनुसार, मतदान एक संवैधानिक अधिकार है, जिसे जागरूकता से बढ़ावा देना चाहिए, दमनकारी नीतियों से नहीं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/supreme-court-rejected-the-petition-demanding-compulsory-voting-and-said/article-150650"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/supreme-court1.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को अनिवार्य मतदान लागू करने के निर्देश देने की मांग वाली एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता ने कहा था कि जो लोग मतदान करने से इनकार करते हैं, उन्हें सरकारी सुविधाओं से वंचित कर देना चाहिए और उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए। न्यायालय ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि चुनावों में भागीदारी को दमनकारी या बाध्यकारी उपायों से लागू नहीं कर सकते।</p>
<p>मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि लोकतंत्र में नागरिकों से मताधिकार प्रयोग करने की अपेक्षा होती है, लेकिन राज्य किसी व्यक्ति को वोट देने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। याचिकाकर्ता के वकील ने सुझाव दिया था कि अदालत चुनाव आयोग को अनिवार्य मतदान के लिए दिशानिर्देश बनाने और बिना वैध कारण वोट न देने वालों पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक समिति गठित करने का निर्देश दे। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि मताधिकार के प्रति जन जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए, लेकिन हम इसके लिए मजबूर नहीं कर सकते।</p>
<p>न्यायालय ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि उठाए गए मुद्दे नीतिगत दायरे में आते हैं और इन पर उचित विधायी और कार्यकारी अधिकारियों (संसद और सरकार) द्वारा विचार किया जाना ही सबसे बेहतर है। पीठ ने दोहराया कि मतदान एक संवैधानिक अधिकार और लोकतांत्रिक कर्तव्य है, लेकिन इसे किसी पर थोपा नहीं जा सकता।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 14:35:28 +0530</pubDate>
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                <title>असम CM हिमंता की पत्नी पर विवादित टिप्पणी मामला : सुप्रीम कोर्ट से पवन खेड़ा को बड़ा झटका, अंतरिम जमानत पर स्टे</title>
                                    <description><![CDATA[असम के मुख्यमंत्री की पत्नी पर विवादित टिप्पणी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता पवन खेड़ा की अंतरिम जमानत पर रोक लगा दी है। अदालत ने उन्हें राहत के लिए असम कोर्ट जाने का निर्देश दिया है। इस फैसले से खेड़ा की कानूनी मुश्किलें बढ़ गई हैं, जिससे राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/controversial-comment-on-assam-cm-himantas-wife-case-big-blow/article-150487"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/pawan-kheraa1.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली।  उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को ट्रांजिट अग्रिम जमानत देने के तेलंगाना उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगा दी। यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिंकी भुइयां सरमा की एक शिकायत से संबंधित है। न्यायालय का यह आदेश असम पुलिस की एक अपील पर आया है। इसमें असम पुलिस ने कहा था कि तेलंगाना उच्च न्यायालय के पास इस मामले में सुनवाई का क्षेत्राधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने यह अंतरिम आदेश पारित करते हुए स्पष्ट किया कि श्री खेड़ा असम की उचित अदालत से राहत मांगने के लिए स्वतंत्र हैं। पीठ ने कहा कि अगर श्री खेड़ा असम की अदालत में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करते हैं, तो उच्चतम न्यायालय के इस आदेश का उस आवेदन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।</p>
<p>गौरतलब है कि यह पूरा मामला गत पांच अप्रैल को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान श्री खेड़ा के लगाए उन आरोपों से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि श्रीमती सरमा के पास कई पासपोर्ट हैं और उन्होंने विदेशी संपत्तियों का खुलासा नहीं किया है। इससे पहले 10 अप्रैल को तेलंगाना उच्च न्यायालय ने खेड़ा को एक सप्ताह की अग्रिम जमानत देते हुए गुवाहाटी उच्च न्यायालय जाने का निर्देश दिया था। अब उच्चतम न्यायालय के इस पर रोक लगाए जाने के बाद श्री खेड़ा को असम की संबंधित अदालत से ही राहत लेनी होगी। फिलहाल उच्चतम न्यायालय ने इस याचिका पर नोटिस जारी कर दिया है।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 13:03:58 +0530</pubDate>
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