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                <title>Supreme Court - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>Supreme Court RSS Feed</description>
                
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                <title>ट्रिब्यूनल का बड़ा फैसला, कांग्रेस उम्मीदवार मेहताब शेख का नाम मतदाता सूची में बहाल करने का आदेश</title>
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                        <![CDATA[एसआईआर ट्रिब्यूनल ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मुर्शिदाबाद के कांग्रेस उम्मीदवार मेहताब शेख का नाम मतदाता सूची में जोड़ने का आदेश दिया है। दस्तावेजों की जांच के बाद ट्रिब्यूनल ने चुनाव आयोग को रविवार शाम तक नाम शामिल करने का निर्देश दिया। इस फैसले से शेख के लिए 6 अप्रैल को नामांकन दाखिल करने का रास्ता साफ हो गया है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/big-decision-of-tribunal-order-to-restore-the-name-of/article-149182"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/west-bengal1.png" alt=""></a><br /><p>कोलकाता। पश्चिम बंगाल में एसआईआर ट्रिब्यूनल ने अपने गठन के बाद पहले ही फैसले में कांग्रेस उम्मीदवार मेहताब शेख का नाम मतदाता सूची में बहाल करने का निर्देश दिया है। यह मामला मुर्शिदाबाद के फरक्का विधानसभा क्षेत्र से जुड़ा है। विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के दौरान शेख का नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया था, जिसके चलते वह नामांकन दाखिल नहीं कर पा रहे थे, जबकि उन्हें कांग्रेस का आधिकारिक उम्मीदवार घोषित किया जा चुका था। एसआईआर ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष. एस. शिवग्नानम , ने आदेश दिया कि शेख का नाम तुरंत प्रभाव से मतदाता सूची में फिर से जोड़ा जाए।</p>
<p>चुनाव आयोग ने 28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की थी, जिसमें 60 लाख से अधिक मतदाताओं को शामिल किया गया था। उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर न्यायिक अधिकारियों ने विवादित प्रविष्टियों की जांच और समाधान की प्रक्रिया शुरू की थी। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि जिन लोगों के नाम सूची से हटाए गए हैं, वे राहत के लिए ट्रिब्यूनल का रुख कर सकते हैं। मतदाता सूची से नाम हटने और ट्रिब्यूनल के कामकाज में देरी के कारण शुरुआत में वहां नहीं जा पाने पर, शेख ने तुरंत राहत के लिए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। अदालत के निर्देश पर उन्होंने बाद में बिजन भवन स्थित ट्रिब्यूनल में याचिका दायर की।</p>
<p>सुनवाई के दौरान शेख ने आधार कार्ड, पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस और अपने बच्चे का जन्म प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज प्रस्तुत किए, जिनमें उनका नाम दर्ज था। उनके वकील फिरदौस शमीम और सुश्री गोपा बिस्वास ने पक्ष रखा, जबकि सुश्री दिव्या मुरुगेसन ने निर्वाचन आयोग की ओर से दलीलें पेश कीं। ट्रिब्यूनल ने पाया कि शेख के पिता के विवरण से संबंधित विसंगतियों के कारण नोटिस जारी किया गया था, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि इससे शेख की पात्रता पर कोई असर नहीं पड़ता। ट्रिब्यूनल ने निर्देश दिया कि रविवार शाम 8 बजे तक उनका नाम पूरक मतदाता सूची में शामिल किया जाए।</p>
<p>इससे पहले शेख ने कलकत्ता उच्च न्यायालय का रुख किया था, लेकिन अदालत ने एसआईआर से जुड़े मामलों पर उच्चतम न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का हवाला देते हुए सुनवाई से इनकार कर दिया था। इसके बाद उच्चतम न्यायालय ने उन्हें ट्रिब्यूनल जाने की अनुमति दी और निर्वाचन आयोग को सहयोग करने का निर्देश दिया। फरक्का में मतदान के पहले चरण की तारीख नजदीक होने और नामांकन की अंतिम तिथि 6 अप्रैल तय होने के बीच, ट्रिब्यूनल के इस आदेश से श्री शेख के लिए नामांकन दाखिल करने का रास्ता साफ हो गया है।</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 05 Apr 2026 15:59:54 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur NM]]>
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            <item>
                <title>पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव: न्यायिक अधिकारियों पर हमले को लेकर हाईकोर्ट ने लगाई अधिकारियों को फ़टकार, एसआईआर से जुड़ा है मामला</title>
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                        <![CDATA[मालदा में मतदाता सूची पुनरीक्षण के दौरान न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने की घटना पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा संज्ञान लिया। मुख्य न्यायाधीश ने इसे कोर्ट के अधिकार को चुनौती और मनोबल गिराने वाला 'दुस्साहसिक प्रयास' बताया। अदालत ने निर्वाचन आयोग को भविष्य में अधिकारियों की सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों की तैनाती सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/west-bengal-assembly-election-high-court-reprimands-officials-for-attack/article-148835"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/court-hammer04.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान ड्यूटी पर तैनात न्यायिक अधिकारियों पर हुए हमले और घेराव की घटना पर कड़ा संज्ञान लेते हुए गुरुवार को इसे ड्यूटी पर तैनात अधिकारियों के मनोबल को प्रभावित करने का एक 'दुस्साहसिक प्रयास' और न्यायालय के अधिकार को चुनौती करार दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल पांचोली की पीठ ने पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के एक गाँव में न्यायिक अधिकारियों के घेराव और उन पर हुए हमले के बाद इस मामले पर तत्काल सुनवाई की, हालांकि यह मामला आज की कार्यसूची में सूचीबद्ध नहीं था।</p>
<p>न्यायालय ने राज्य में कल हुई घटनाओं के संबंध में कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से मिले खत के आधार पर इस मामले को बेहद जरूरी बताते हुए संज्ञान में लिया। पत्र के अनुसार, तीन महिला अधिकारियों सहित 7 न्यायिक अधिकारी मालदा जिले के एक गाँव में एसआईआर न्यायिक-निर्णय संबंधी कार्यों को पूरा कर रहे थे, तभी ग्रामीणों ने उन्हें घेर लिया। इन अधिकारियों को दोपहर 3:30 बजे से आधी रात तक बंधक बनाकर रखा गया और कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा राज्य प्रशासन से त्वरित कार्रवाई की अपील किए जाने के बाद ही उन्हें मुक्त कराया जा सका।</p>
<p>पीठ ने इस घटना पर गहरी निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि न्यायिक अधिकारियों की तैनाती का सभी पक्षों द्वारा स्वागत किया जाना चाहिए, क्योंकि वे तटस्थ एजेंट के रूप में कार्य करते हैं, लेकिन अब उन्हें भी हमलों से नहीं बख्शा जा रहा है। न्यायालय ने निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि वह न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय बलों की मांग करे। मुख्य न्यायाधीश ने पूर्व में यह भी टिप्पणी की थी कि पश्चिम बंगाल को छोड़कर अन्य सभी राज्यों में एसआईआर प्रक्रिया पूरी तरह सुचारू रूप से संपन्न हुई है।</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 17:46:37 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur NM]]>
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                <title>पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव: हटाए गए मतदाताओं के लिए ट्रिब्यूनल पोर्टल शुरू, चुनाव आयोग ने ऑनलाइन पोर्टल किया शुरू</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर चुनाव आयोग ने मतदाता सूची से कटे नामों की बहाली हेतु 23 जिलों में स्पेशल ट्रिब्यूनल गठित किए हैं। प्रभावित 14 लाख मतदाता अब ऑनलाइन पोर्टल या ऑफलाइन माध्यम से अपील कर सकेंगे। आयोग ने तीसरी अनुपूरक सूची जारी कर 2 लाख नए नाम जोड़े हैं, जिससे चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित होगी।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/west-bengal-assembly-elections-tribunal-portal-launched-for-deleted-voters/article-148331"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/ec.png" alt=""></a><br /><p>कोलकाता। चुनाव आयोग ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की शिकायतों के समाधान के लिए उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद एक विशेष ट्रिब्यूनल प्रणाली और ऑनलाइन पोर्टल शुरू किया है, जिसके तहत प्रभावित मतदाता रविवार से अपील दर्ज कर सकेंगे। ट्रिब्यूनल जल्द ही काम करना शुरू करेंगे, जिससे जिन मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उन्हें औपचारिक रूप से शिकायत दर्ज कराने और निवारण का अवसर मिलेगा। इससे पहले आयोग ने राज्य के 23 जिलों में ट्रिब्यूनल गठित किए थे, जिनकी देखरेख के लिए 19 पूर्व न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति की गयी है।</p>
<p>मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) कार्यालय के अनुसार, जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, वे अब ऑनलाइन या ऑफलाइन दोनों माध्यमों से राहत के लिए आवेदन कर सकते हैं। ऑनलाइन आवेदन के लिए संबंधित व्यक्ति को निर्वाचन आयोग की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर "व्यक्तियों के लिए अपील प्रस्तुत करें (निर्णयाधीन)" विकल्प पर क्लिक करना होगा। इसके बाद मोबाइल नंबर या एपिक नंबर के माध्यम से लॉगिन कर हटाए गए मतदाता का विवरण, पूर्ण पता, अपील का संक्षिप्त विवरण और अपील के आधार भरकर आवेदन जमा करना होगा।</p>
<p>इसके अलावा, ऑफलाइन आवेदन के लिए जिला मजिस्ट्रेट, अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट या उपमंडल अधिकारी के कार्यालय में आवश्यक दस्तावेजों के साथ आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है। अधिकारियों के अनुसार, ट्रिब्यूनल की कार्यवाही शीघ्र शुरू होगी और शिकायतों का समयबद्ध निपटारा सुनिश्चित किया जाएगा। यह कदम मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने को लेकर उठ रही चिंताओं के बीच उठाया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दूसरी अनुपूरक सूची से करीब 45 प्रतिशत नाम हटाए गए हैं जो लगभग 14 लाख मतदाताओं के बराबर है, जिनमें बड़ी संख्या महिलाओं और अल्पसंख्यक वर्ग की बताई जा रही है।हालांकि, आयोग ने अभी तक अंतिम मतदाता सूची के कुल विस्तृत आंकड़े जारी नहीं किए हैं।</p>
<p>इस बीच, शनिवार देर रात आयोग ने तीसरी अनुपूरक मतदाता सूची जारी की, जिसमें दो लाख से अधिक नए नाम जोड़े जाने की जानकारी है। इसके साथ ही प्रतिदिन अनुपूरक सूची जारी करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है और चौथी सूची रविवार को जारी किए जाने की संभावना है। तीसरी सूची में शामिल और हटाए गए नामों के विस्तृत आंकड़े अभी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 29 Mar 2026 15:02:19 +0530</pubDate>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विहिप ने किया स्वागत, कहा-अनुसूचित समाज के अधिकारों से समझौता नहीं, धर्मांतरण गतिविधियों पर लगेगा अंकुश</title>
                                    <description>
                        <![CDATA[विश्व हिंदू परिषद ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय का स्वागत किया है। सुरेंद्र जैन ने स्पष्ट किया कि धर्मांतरण के बाद व्यक्ति अनुसूचित जाति (SC) की श्रेणी में नहीं रहता और उसे एट्रोसिटी एक्ट का संरक्षण नहीं मिलेगा। विहिप के अनुसार, यह फैसला संवैधानिक अधिकारों के दुरुपयोग को रोकेगा और केवल हिंदू, सिख एवं बौद्ध अनुयायियों के हक की रक्षा करेगा।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/vhp-welcomed-the-decision-of-the-supreme-court-and-said/article-147829"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/supreme-court.jpg" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसले का स्वागत करते हुए इसे सामाजिक न्याय और संविधान की मूल भावना को सुदृढ़ करने वाला बताया है। विहिप के संयुक्त महामंत्री सुरेंद्र जैन ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि धर्मांतरण के बाद कोई भी व्यक्ति अनुसूचित जाति की संवैधानिक श्रेणी में नहीं आता और उसे अनुसूचित जाति एव जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत संरक्षण प्राप्त नहीं हो सकता।</p>
<p>जैन ने कहा कि यह निर्णय संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 की भावना के अनुरूप है, जिसमें केवल हिन्दू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायियों को ही अनुसूचित जाति की श्रेणी में शामिल किया गया है। उन्होंने कहा कि यह फैसला उन प्रवृत्तियों पर रोक लगाएगा, जिनमें धर्म परिवर्तन के बाद भी पूर्व जातिगत पहचान के आधार पर संवैधानिक लाभ लेने की कोशिश की जाती है। उनके अनुसार, इससे तथाकथित धर्मांतरण गतिविधियों पर भी अंकुश लगेगा।</p>
<p>डॉ. जैन ने कहा कि अनुसूचित जातियों को दिए गए अधिकारों का उद्देश्य ऐतिहासिक सामाजिक अन्याय को दूर करना है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करता है, तो वह उस सामाजिक संदर्भ से भी अलग हो जाता है, जिसके आधार पर ये विशेष अधिकार दिए गए हैं।</p>
<p>हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति पुनः हिन्दू, सिख या बौद्ध धर्म में लौटता है और समाज उसे स्वीकार करता है, तो वह दोबारा इन अधिकारों का पात्र बन सकता है। विहिप नेता ने कहा कि यह निर्णय सामाजिक समरसता, पारदर्शिता और न्याय की स्थापना की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने यह भी बताया कि संगठन देशभर में ऐसे लोगों की पहचान करेगा, जिन्होंने कथित रूप से अनुसूचित समाज के अधिकारों का दुरुपयोग किया है, ताकि वास्तविक लाभार्थियों को उनका हक दिलाया जा सके।</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 16:15:00 +0530</pubDate>
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                        <![CDATA[Jaipur NM]]>
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                <title>दर्द भरी सांसों से मिली मुक्ति: 13 साल कोमा में रहने के बाद एम्स में हरीश राणा का निधन, सुप्रीम कोर्ट से मिली थी इच्छा मृत्यु की इजाजत</title>
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                        <![CDATA[सुप्रीम कोर्ट से इच्छा मृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति पाने वाले देश के पहले व्यक्ति हरीश राणा का एम्स में निधन हो गया। 13 वर्षों तक कोमा में रहने के बाद, उनके परिवार की लंबी कानूनी लड़ाई और 'सम्मान के साथ मरने के अधिकार' की मांग को न्याय मिला। भीषण दुर्घटना के बाद से वह एम्स के डॉक्टरों की देखरेख में थे।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/got-relief-from-painful-breathing-harish-rana-died-in-aiims/article-147749"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/harish-rana1.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। 13 साल कोमा में रहने के बाद आखिरकार हरीश राणा की एम्स में मृत्यु हो गई है। इसके साथ ही उनको दर्द भरी सांसों से भी मुक्ति मिल चुकी है। हालांकि, अभी तक एम्स ने इस बात की पूरी तरह से पुष्टि नहीं की है। हरीण राणा पहले ऐसे इंसान थे जिनको सुप्रीम कोर्ट से पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की इजाजत मिली थी। भारत में हरीश राणा के मामले को राइट टू डाई विद डिग्निटी के तौर पर माना गया था।</p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार, हरीश राणा ने गाजियाबाद में एम्स के डॉक्टरों की देखरेख में अंतिम सांस ली। एक भीषण दुर्घटना के बाद हरीश राणा कोमा में चले गए थे जिसके बाद उनके परिवारजनों ने उनको सही करवाने के लिए हर मुमकिन प्रयास किए लेकिन वो सही नहीं हुए। करीब 13 साल तक अपने बच्चे को कोमा में तड़पता देखकर आखिरकार माता पिता ने सुप्रीम कोर्ट से हरीश राणा के लिए इच्छा मृत्यु की अपील की, जिसको सुप्रीम कोर्ट से स्वीकार कर लिया था और आखिरकार आज उनकी मृत्यु हो गई। </p>
<p> </p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 18:07:24 +0530</pubDate>
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                <title>सांप के जहर मामले में यूट्यूबर एल्विश यादव को बड़ी राहत : सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की प्राथमिकी, सांप के जहर का इस्तेमाल और रेव पार्टियों में शामिल होने का लगा था आरोप</title>
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                        <![CDATA[यूट्यूबर एल्विश यादव के खिलाफ सांप के जहर के इस्तेमाल का आपराधिक मामला सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि जब्त पदार्थ वैधानिक अनुसूची में नहीं था और एल्विश से कोई सीधी बरामदगी नहीं हुई। हालांकि, अधिकारियों को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत नई कानूनी कार्यवाही शुरू करने की छूट दी गई है।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/big-relief-to-youtuber-elvish-yadav-in-snake-poison-case/article-147067"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/elvish-yadav.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को यूट्यूबर एल्विश यादव के खिलाफ दर्ज उस आपराधिक मामले को खारिज कर दिया, जिसमें उन पर वीडियो शूट में सांप के जहर का इस्तेमाल करने और रेव पार्टियों में शामिल होने का आरोप लगाया गया था। न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह फैसला सुनाया।</p>
<p>न्यायालय ने कहा कि जिस पदार्थ (जहर) की बात की जा रही है, वह वैधानिक अनुसूची में शामिल नहीं है। पीठ ने इस दलील पर भी गौर किया कि एल्विश यादव के पास से व्यक्तिगत रूप से कोई बरामदगी नहीं हुई। आरोप पत्र में केवल यह दावा किया गया कि उन्होंने अपने एक सहयोगी के जरिए ऑर्डर दिया था। पीठ ने कहा कि इन कानूनी आधारों पर प्राथमिकी का आधार नहीं बनता, लेकिन उसने आरोपों के गुण-दोष पर विचार नहीं किया है। न्यायालय ने सक्षम अधिकारियों को यह छूट दी है कि वे वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 55 के तहत उचित शिकायत दर्ज करने सहित कानून के अनुसार नयी कार्यवाही शुरू कर सकते हैं।</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 19 Mar 2026 18:04:19 +0530</pubDate>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की ''पीरियड्स लीव'' की याचिका: सुनवाई से किया इंकार, कहा-मासिक धर्म अवकाश नीति बनाने के लिए याचिकाकर्ता के प्रतिवेदन पर विचार करें सरकार </title>
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                        <![CDATA[उच्चतम न्यायालय ने महिलाओं के लिए अनिवार्य सवैतनिक मासिक धर्म अवकाश की याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने चिंता जताई कि ऐसे कानून से महिलाओं के रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और नियोक्ता उन्हें काम पर रखने से कतरा सकते हैं। ]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/supreme-court-rejected-the-petition-for-periods-leave-refused-to/article-146386"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/supreme-court.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने सभी संस्थानों में महिलाओं के लिए सवैतनिक मासिक धर्म अवकाश की मांग करने संबंधी रिट याचिका शुक्रवार को खारिज कर दी। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने केंद्र सरकार से कहा कि वह सभी हितधारकों के साथ परामर्श करके मासिक धर्म अवकाश नीति बनाने के लिए याचिकाकर्ता के प्रतिवेदन पर विचार करे। अदालत ने चिंता व्यक्त की कि कानून के माध्यम से मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य करने से महिलाओं के रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।</p>
<p>शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि यह नियोक्ताओं को महिलाओं को काम पर रखने से हतोत्साहित कर सकता है, जिससे कार्यबल में उनकी भागीदारी पर बुरा असर पड़ेगा। याचिकाकर्ता चाहता था कि शीर्ष न्यायालय यह सुनिश्चित करे कि महिलाओं को, चाहे वे छात्राएं हों या कामकाजी पेशेवर, मासिक धर्म के दौरान छुट्टी दी जाए। पीठ ने याचिकाकर्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की स्थिति पर भी सवाल उठाया और इस बात की ओर इशारा किया कि किसी भी महिला ने खुद अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया है।</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Mar 2026 15:58:32 +0530</pubDate>
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                <title>इच्छामृत्यु : दुनिया के 11 देशों में सख्त शर्तों के साथ अनुमति; भारत में पैसिव यूथेनेशिया की इजाजत, अब तक लाखों लोगों ने चुना सम्मानजनक मृत्यु का विकल्प</title>
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                        <![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के एक मरीज को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति देकर 'गरिमापूर्ण मृत्यु' के अधिकार को पुनः पुष्ट किया है। भारत में लाइलाज स्थिति में लाइफ-सपोर्ट हटाना वैध है, जबकि सक्रिय इच्छामृत्यु (जहरीला इंजेक्शन) प्रतिबंधित है। नीदरलैंड और स्विट्जरलैंड जैसे 11 देशों में सक्रिय इच्छामृत्यु कानूनी है, जहाँ सालाना हजारों लोग इसे चुनते हैं।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/euthanasia-is-allowed-with-strict-conditions-in-11-countries-of/article-146174"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/1200-x-60-px)-(8).png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। दुनिया भर में इच्छामृत्यु को लेकर लगातार बहस चल रही है। एक ओर इसे असाध्य बीमारी से पीड़ित लोगों के लिए सम्मानजनक मृत्यु का विकल्प माना जा रहा है, तो दूसरी ओर कई देश इसे नैतिक और कानूनी दृष्टि से विवादित मानते हैं। इसी बीच भारत में एक बार फिर इच्छामृत्यु चर्चा में आ गई है, जब सुप्रीम कोर्ट ने 13 वर्षों से कोमा में पड़े एक मरीज को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी है।</p>
<p><strong>संविधान में जीवन का अधिकार:</strong> भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। इसे सबसे महत्वपूर्ण मौलिक अधिकारों में से एक माना जाता है। हालांकि, समय-समय पर यह सवाल उठता रहा है कि क्या किसी व्यक्ति को असहनीय पीड़ा की स्थिति में सम्मानपूर्वक मृत्यु चुनने का अधिकार भी होना चाहिए। यही कारण है कि इच्छामृत्यु का मुद्दा कानून, नैतिकता और मानवाधिकार के बीच बहस का विषय बना रहता है।</p>
<p><strong>भारत में इच्छामृत्यु को लेकर क्या कानून है?</strong></p>
<p>भारत में इच्छामृत्यु को लेकर नियम थोड़ा पेचीदा है, क्योंकि यहां पर सख्त दिशानिर्देशों के दायरे में पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की इजाजत दी जाती है। इसके तहत बीमारी से जूझ रहे ऐसे मरीजों के लाइफ-सपोर्ट सिस्टम को बंद किया जा सकता है, जिनके रिकवर होने की कोई गुंजाइश नहीं है। हालांकि, इसी के साथ भारत में एक्टिव यूथेनेशिया (सक्रिय इच्छामृत्यु) भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत अवैध है। सक्रिय इच्छामृत्यु के तहत लोगों को जहरीला इंजेक्शन लगाकर सम्मानपूर्वक मरने की इजाजत दी जाती है।</p>
<p>भारत में इच्छामृत्यु को लेकर कानूनी नींव रखने के लिए अरुणा शानबाग के केस को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। मुंबई की अरुणा शानबाग एक नर्स थीं, जो 1973 में हुए एक हमले के बाद 42 साल तक पमार्नेंट वेजिटेटिव स्टेट (चेतनाहीन अवस्था) में रहीं। उनकी इस स्थिति को देखते हुए उनकी दोस्त ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और मांग की कि अरुणा को सम्मान के साथ मरने की इजाजत दी जाए। उनकी दोस्त ने अपनी याचिका में अरुणा के फीडिंग पाइप को हटाने की इजाजत मांगी थी। इस पर 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया। </p>
<p>हालांकि, कोर्ट ने अरुणा के अस्पताल के स्टाफ की इच्छा का सम्मान करते हुए उन्हें मृत्यु देने से इनकार कर दिया था। उनकी मौत 2015 में प्राकृतिक कारणों से हुई। मगर इस केस ने इच्छामृत्यु को लेकर कानूनी नींव रखी। कोर्ट ने अरुणा के केस की सुनवाई के बाद पैसिव यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता दी। इसका मतलब है कि अगर मरीज के रिकवर होने की संभावना नहीं है या फिर वह लाइलाज हालात में है, तो उसके लाइफ-सपोर्ट सिस्टम (जैसे वेंटिलेटर या फीडिंग पाइप) को हटाया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि पैसिव यूथेनेशिया के लिए हाईकोर्ट की इजाजत होना जरूरी है और ये प्रक्रिया सिर्फ डॉक्टरों के एक पैनल की निगरानी में ही पूरी की जा सकती है।</p>
<p><strong>दुनिया के किन-किन देशों में इच्छामृत्यु की इजाजत है?</strong></p>
<p>अब यहां सवाल उठता है कि दुनिया के वो कौन-कौन से देश हैं, जहां इच्छामृत्यु की कानूनी इजाजत है। हम यहां पैसिव यूथेनेशिया नहीं, बल्कि एक्टिव यूथेनेशिया की बात कर रहे हैं, जिसमें लोगों को जहरीले इंजेक्शन के जरिए मरने की इजाजत होती है। इस लिस्ट में कुल मिलाकर 11 देश शामिल हैं। आइए इन देशों के बारे में जान लेते हैं।<br /><strong>स्विट्जरलैंड:</strong> स्विट्जरलैंड में 1942 में इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता दी गई। वह ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश बना।<br /><strong>अमेरिका: </strong>कैलिफोर्निया, न्यू जर्सी समेत अमेरिका के 10 राज्यों में इच्छामृत्यु की इजाजत है। यहां पूरे देश में इच्छामृत्यु को लेकर कानून नहीं है।<br /><strong>नीदरलैंड: </strong>यूरोप के इस देश ने 2002 में एक कानूनी लाकर इच्छामृत्यु को वैध बना दिया। यहां 12 साल के बाद नाबालिग को भी इच्छामृत्यु का अधिकार है।<br /><strong>बेल्जियम: </strong>2002 में लाइलाज बीमारी से पीड़ित लोगों और बर्दाश्त के बाहर दर्द झेल रहे मरीजों को इच्छामृत्यु की इजाजत दी गई।<br /><strong>कनाडा: </strong>कनाडा ने 2016 में चिकित्सा सहायता से मृत्यु की शुरूआत की। इस तरह यहां भी इच्छामृत्यु को कानूनी इजाजत मिली हुई है।<br /><strong>ऑस्ट्रेलिया:</strong> लाइलाज बीमारी या असहनीय पीड़ा झेल रहे लोगों इच्छामृत्यु की मांग कर सकते हैं। इसकी शुरूआत 2019 में हुई थी।<br /><strong>स्पेन:</strong> स्पेन ने 2021 में कानून बनाकर लाइलाज बीमारियों से पीड़ित लोगों को इच्छामृत्यु की इजाजत दी।<br /><strong>लक्जमबर्ग: </strong>यूरोप के इस छोटे से देश ने 2009 में गंभीर और लाइलाज बीमारियों के लिए इच्छामृत्यु को वैध कर दिया।<br /><strong>कोलंबिया:</strong> इच्छामृत्यु को वैध बनाना वाला कोलंबिया लैटिन अमेरिका का पहला देश है। 2015 में कोर्ट के आदेश के बाद यहां इच्छामृत्यु का रास्ता साफ हुआ।<br /><strong>इक्वाडोर: </strong>इक्वाडोर में 2024 में संवैधानिक अदालत के ऐतिहासिक फैसले के बाद यहां इच्छामृत्यु को वैध बनाया गया।<br /><strong>ऑस्ट्रिया:</strong> 2022 से यूरोपीय देश ऑस्ट्रिया असिस्टेड सुसाइड को कानूनी मान्यता दी गई है, जो इच्छामृत्यु का ही एक रूप है।<br />अमेरिका के 10 राज्यों में तो ऑस्ट्रेलिया के 6 राज्यों में ही इसकी इजाजत है। इसी तरह से जर्मनी और इटली जैसे देशों में भी इच्छामृत्यु को लेकर कोई कानून नहीं है, लेकिन कुछ खास परिस्थितियों में अदालत के आदेश के साथ इस प्रक्रिया का पालन किया जा सकता है।</p>
<p><strong>दुनिया में अब तक कितने लोगों को इच्छामृत्यु मिली</strong></p>
<p>हाल के विश्लेषण के अनुसार हर साल दुनिया में 30,000 से ज्यादा लोग कानूनी रूप से इच्छामृत्यु या डॉक्टर की सहायता से मृत्यु का विकल्प चुनते हैं। कुछ देशों के उदाहरण<br />कनाडा: 2023 में लगभग 11,000 मामले<br />नीदरलैंड: 2024 में लगभग 9,958 मामले<br />बेल्जियम: 2022 में लगभग 2,500 मामले<br />स्पेन, ऑस्ट्रिया, न्यूजीलैंड आदि में भी हर साल सैकड़ों मामले दर्ज होते हैं।</p>
<p><strong>कुल अनुमान </strong></p>
<p>क्योंकि कई देशों में यह कानून 20-30 साल पहले लागू हुआ और हर साल हजारों मामले सामने आते हैं, इसलिए विशेषज्ञों का अनुमान है कि अब तक दुनिया में लगभग 3 से 5 लाख लोगों को कानूनी रूप से इच्छामृत्यु अनुमति मिल चुकी है।</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 12 Mar 2026 11:32:42 +0530</pubDate>
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                <title>कौन है हरीश राणा? जिसको सुप्रीम कोर्ट ने दी इच्छामृत्यु की परमिशन, 13 सालों से पीवीएस हालत में है युवक</title>
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                        <![CDATA[सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से कोमा (PVS) में पड़े गाजियाबाद के युवक को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दे दी है। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने 'गरिमा के साथ मरने' को मौलिक अधिकार मानते हुए लाइफ सपोर्ट हटाने का आदेश दिया। कोर्ट ने पिता की याचिका पर यह फैसला सुनाया, जिससे लंबे समय से पीड़ा झेल रहे परिवार को राहत मिली।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/who-is-harish-rana-to-whom-the-supreme-court-gave/article-146106"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/harish-rana.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को गाजियाबाद के एक युवक को जीवन रक्षक प्रणाली हटाकर पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी। न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने यह फैसला सुनाया, जो न्यायालय के 2018 के कॉमन कॉज निर्णय (जिसे 2023 में संशोधित किया गया था) पर आधारित है, जिसमें गरिमा के साथ मरने को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गयी थी।</p>
<p>हरीश राणा एक इमारत से गिरने के बाद से पिछले 13 वर्षों से चेतना-शून्य अवस्था में हैं। मस्तिष्क की चोट के कारण सभी अंग पूरी तरह लकवाग्रस्त हो गये थे और वह परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट (पीवीएस) की स्थिति में चले गये थे। मेडिकल रिपोर्टों के अनुसार, पिछले 13 वर्षों में उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। वह केवल सर्जरी के माध्यम से लगाए गए पीईजी ट्यूबों द्वारा दिए जाने वाले चिकित्सकीय पोषण के सहारे जीवित हैं।</p>
<p>पीठ ने पिता की ओर से दायर उन आवेदनों पर यह आदेश पारित किया, जिसमें उन्होंने अपने बेटे को लगाये गये सभी जीवन रक्षक उपकरणों को हटाने की मांग की थी।</p>]]>
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                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 11 Mar 2026 17:38:52 +0530</pubDate>
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                <title>चीन ने ताइवान की स्वतंत्रता की मांग करने वाले अलगाववादियों को कड़ी सजा दी, &quot;अलगाव रोधी कानून&quot; का सख्ती से पालन का करने का दिया आदेश</title>
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                        <![CDATA[चीन के सुप्रीम पीपुल्स कोर्ट ने अलगाव रोधी कानून के तहत ताइवान की स्वतंत्रता की मांग करने वाले कट्टरपंथियों को सजा देने की पुष्टि की है। वार्षिक वर्क रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए यह कदम उठाया गया है। बीजिंग ने स्पष्ट किया है कि अलगाववाद भड़काने वालों के विरुद्ध शून्य सहिष्णुता अपनाई जाएगी।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/china-gave-severe-punishment-to-separatists-demanding-taiwans-independence-ordered/article-145782"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/xi-chinping.png" alt=""></a><br /><p>बीजिंग। चीन ने 2025 में ताइवान की स्वतंत्रता की मांग करने वाले कट्टर अलगाववादियों को कड़ी सजा दी है। सुप्रीम पीपुल्स कोर्ट ने सोमवार को अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी दी है। राष्ट्रीय संसद सत्र में विचार-विमर्श के लिए जमा की गई रिपोर्ट के अनुसार, चीन में अलगाव रोधी कानून को सख्ती से लागू किया गया है। </p>
<p>सुप्रीम पीपुल्स प्रोक्यूरेटोरेट ने उसी दिन समीक्षा के लिए जमा की गई अपनी वर्क रिपोर्ट में कहा कि राष्ट्रीय संप्रभुता, एकता और क्षेत्रीय अखंडता को सुरक्षित रखने के लिए अलगाववाद को भड़काने के अपराधों के लिए कट्टर ताइवान की स्वतंत्रता के अलगाववादियों को कानून के अनुसार सजा दी गई है।  </p>]]>
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                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 09 Mar 2026 13:03:19 +0530</pubDate>
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                <title>सुप्रीम कोर्ट ने लगाई NCERT को फटकार: विवादित पुस्तक पर लगाया प्रतिबंध, जानें क्या है पूरा मामला?</title>
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                        <![CDATA[उच्चतम न्यायालय ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का संदर्भ देने वाली NCERT कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान पुस्तक के पुनर्मुद्रण और डिजिटल प्रसार पर लगाया प्रतिबंध। कोर्ट ने इसे बदनाम करने की साजिश बताया। दो सप्ताह में मांगी अनुपालन रिपोर्ट।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/supreme-court-reprimands-ncert-bans-textbook-containing-chapter-on-corruption/article-144704"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/ncert-and-supreme-court.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की उस पाठ्यपुस्तक के पुनर्मुद्रण और डिजिटल प्रसार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया है, जिसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का संदर्भ दिया गया था। न्यायालय ने प्रचलन में मौजूद किताबों की प्रतियों को तुरंत जब्त करने का निर्देश दिया और इस संबंध में दो सप्ताह के भीतर अनुपालन रिपोर्ट मांगी ।</p>
<p>न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यह एनसीईआरटी के निदेशक और उन सभी स्कूलों के प्रधानाचार्यों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी होगी जहां यह किताब पहुंची है। उन्हें अपने परिसर में मौजूद किताब की सभी प्रतियों को तुरंत जब्त कर सील करना होगा। शीर्ष अदालत ने यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि संबंधित पुस्तक के आधार पर छात्रों को कोई निर्देश या शिक्षा न दी जाए। सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को इस आदेश का पालन करने और दो सप्ताह के भीतर रिपोर्ट भेजने को कहा गया है।</p>
<p>शीर्ष अदालत ने चेतावनी दी कि इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों या बदले हुए शीर्षकों के जरिए इस आदेश का उल्लंघन करने की किसी भी कोशिश को अदालत की अवमानना और निर्देशों की सीधी अवहेलना माना जाएगा। इससे पहले बुधवार को मुख्य न्यायाधीश ने पुस्तक की सामग्री पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा था कि वह किसी को भी संस्था को बदनाम करने की अनुमति नहीं देंगे। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के नेतृत्व वाली पीठ ने इसे न्यायपालिका के खिलाफ एक गहरी साजिश करार दिया। वरिष्ठ अधिवक्ताओं कपिल सिब्बल और डॉक्टर अभिषेक मनु सिंघवी ने भी अदालत के समक्ष इस पाठ्यपुस्तक की सामग्री पर चिंता जताई थी और कहा था कि यह पूरी न्यायपालिका की छवि को खराब कर रही है।</p>]]>
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                <pubDate>Thu, 26 Feb 2026 15:16:06 +0530</pubDate>
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                <title>पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव: अंतिम मतदाता सूची सामने आने से पहले हो सकती है चुनावी तारीखों की घोषणा, मतदाता सूची से 58 लाख से अधिक नाम कटे</title>
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                        <![CDATA[पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की घोषणा अंतिम मतदाता सूची से पहले भी संभव। उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुसार, 28 फरवरी के बाद चरणों में प्रकाशित सूचियां भी मान्य होंगी। बूथ पुनर्गठन की संभावना कम। राज्य में पुराने 80,681 मतदान केंद्रों के साथ ही चुनाव कराए जा सकते हैं।]]>
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                        <![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/west-bengal-assembly-elections-election-dates-may-be-announced-before/article-144520"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/west-bengal-election.png" alt=""></a><br /><p>कोलकाता। चुनाव आयोग ने संकेत दिया है कि यदि उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का पालन किया जाए तो पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा अंतिम और पूर्ण मतदाता सूची प्रकाशित होने से पहले भी की जा सकती है। आयोग के अनुसार, नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि तक प्रकाशित सभी मतदाता सूचियों को चुनाव संचालन के लिए मान्य माना जाएगा। आयोग ने स्पष्ट किया कि भले ही अंतिम मतदाता सूची का प्रकाशन चरणबद्ध तरीके से जारी रहे, चुनाव इन्हीं सूचियों के आधार पर कराए जा सकते हैं। </p>
<p>राज्य में अब तक मसौदा मतदाता सूची से 58 लाख से अधिक नाम हटाए जा चुके हैं। अंतिम सूची शुक्रवार को प्रकाशित होनी है, लेकिन अधिकारियों का कहना है कि हटाए गए नामों की तत्काल समेकित गणना संभव नहीं होगी। शीर्ष न्यायालय के आदेश के अनुसार आयोग को 28 फरवरी के बाद भी चरणों में मतदाता सूची प्रकाशित करने की अनुमति होगी और इन सभी सूचियों को अंतिम माना जाएगा। सभी सूचियों को मिलाकर ही कुल विलोपनों का आकलन किया जाएगा। </p>
<p>मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप हमें चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के लिए अंतिम मतदाता सूची के प्रकाशन की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। मतदाता सूची चरणों में प्रकाशित होगी और उसे अंतिम सूची में शामिल किया जाएगा। दोनों प्रक्रियाएं एक साथ चल सकती हैं।</p>
<p>मतदाता सूची के प्रकाशन में देरी के कारण नए मतदान केंद्रों के पुनर्गठन की योजना प्रभावित हुई है और इस चुनाव में नए बूथ स्थापित किए जाने की संभावना कम मानी जा रही है। इससे पहले आयोग ने घोषणा की थी कि जहां मतदाताओं की संख्या 1,200 से अधिक होगी, वहां नए बूथ बनाए जाएंगे। ऊंची इमारतों और अपार्टमेंट परिसरों के भीतर भी मतदान केंद्र स्थापित करने पर विचार किया गया था। आयोग ने पांच जिलों में कई अपार्टमेंट परिसरों की पहचान भी की थी, लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि मौजूदा गतिशील मतदाता सूची की स्थिति में बूथ पुनर्गठन संभव नहीं है।  </p>
<p>विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया शुरू होने से पहले मतदाता संख्या के आधार पर लगभग 14,000 अतिरिक्त बूथों की आवश्यकता जतायी गयी थी। मसौदा सूची से 58 लाख से अधिक नाम हटाए जाने के बाद आयोग ने संकेत दिया था कि बूथ पुनर्गठन पर पुनर्विचार किया जा सकता है। एसआईआर प्रक्रिया अभी पूरी न होने के कारण फिलहाल पुराने बूथ विन्यास को ही बनाए रखने का निर्णय लिया गया है। </p>
<p>अधिकारी ने कहा, हम बहुमंजिला आवास परिसरों में 60-70 अतिरिक्त बूथ स्थापित करने का अंतिम प्रयास कर रहे हैं। सब कुछ राज्य में एसआईआर प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। वर्तमान में पश्चिम बंगाल में कुल मतदान केंद्रों की संख्या 80,681 ही रहेगी। न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली उच्चतम न्यायालय की पीठ ने मंगलवार को कहा कि अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने की अंतिम तिथि 28 फरवरी होगी। पीठ ने यह भी अनुमति दी कि यदि तार्किक विसंगतियां या अनमैप्ड श्रेणी के मामलों का सत्यापन उस तिथि तक पूरा नहीं होता है, तो आयोग चरणों में सूची प्रकाशित करता रह सकता है। </p>]]>
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                <pubDate>Wed, 25 Feb 2026 13:24:03 +0530</pubDate>
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