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                <title>असर खबर का : अवैध वाहनों पर परिवहन विभाग की सख्त कार्रवाई शुरू</title>
                                    <description><![CDATA[अस्पताल परिसर में नियम उल्लंघन पर 150 वाहनों को नोटिस जारी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/bundi/impact-of-news-report--transport-department-initiates-strict-action-against-illegal-vehicles/article-156886"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-06/111200-x-600-px)-(6)2.png" alt=""></a><br /><p>बूंदी। चिकित्सालय परिसर में बिना वैध रजिस्ट्रेशन के संचालित निजी वाहनों तथा नियमों की अनदेखी कर काले शीशे लगाकर दौड़ रही निजी एंबुलेंसों के मामले में 12 जून के अंक में दैनिक नवज्योति समाचार पत्र में समाचार प्रकाशित होने के बाद जिला परिवहन विभाग ने सख्त कार्रवाई शुरू कर दी है। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन सक्रिय हो गया है और कार्रवाई तेज कर दी गई है।</p>
<p>जिला परिवहन अधिकारी सौम्या शर्मा ने बताया कि अस्पताल परिसर एवं आसपास अवैध रूप से संचालित वाहनों तथा नियमों का उल्लंघन कर चल रही एंबुलेंसों की जानकारी संज्ञान में आने के बाद विभाग ने त्वरित कदम उठाए हैं। प्रारंभिक कार्रवाई के तहत लगभग 150 वाहनों के पंजीकरण (आरसी) निरस्त करने के नोटिस जारी किए गए हैं। उन्होंने कहा कि विभाग अब केवल नोटिस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि धरातल पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। इसके लिए एक विशेष टीम गठित की जा रही है, जो अस्पताल परिसर एवं अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में औचक निरीक्षण करेगी। नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर वाहनों को मौके पर ही जब्त किया जाएगा।</p>
<p>जिला प्ररिवहन अधिकारी ने स्पष्ट किया कि बिना वैध दस्तावेजों के चल रही निजी एंबुलेंस न केवल सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचा रही थीं, बल्कि मरीजों की सुरक्षा के लिए भी गंभीर खतरा बन रही थीं। ऐसे मामलों में किसी प्रकार की ढिलाई नहीं बरती जाएगी। इस कार्रवाई के बाद अवैध वाहन संचालकों में हड़कंप मच गया है। प्रशासन का कहना है कि नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए अभियान आगे भी लगातार जारी रहेगा।</p>
<p>इस प्रकार की अनियमितता यदि पाई जाती है तो इन प्राइवेट एंबुलेंसों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। जिन गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन खत्म हो रहा है, उनके खिलाफ लगातार कार्रवाई जारी है। पूर्व में भी कई वाहनों के आरसी रजिस्ट्रेशन खारिज किए जा चुके हैं। और आज भी करीब 150 गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन खारिज करने के लिए नोटिस जारी किए हैं<br /><strong>- सौम्या शर्मा, जिला परिवहन अधिकारी, (DTO), बूंदी</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बूंदी</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 16:01:19 +0530</pubDate>
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                <title>मरीज निजी अस्पताल में भर्ती, सरकारी मशीनरी रिपोर्ट में कह रही स्वस्थ</title>
                                    <description><![CDATA[गंभीर रूप से बीमार एक मरीज का कोटा के निजी अस्पताल में इलाज चल रहा है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/patient-admitted-to-private-hospital--government-machinery-declares-him-healthy-in-report/article-155156"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-05/1111200-x-600-px)-(3)62.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। सुल्तानपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में आईवी फ्लूइड (ग्लूकोज की बोतलें) चढ़ाने से मरीजों की तबीयत बिगड़ने के मामले ने चिकित्सा विभाग में चल रही ढाँक-छुपी को फिर से उजागर कर दिया है। दरअसल सीएचसी प्रभारी डॉ. श्याम बिहारी मालव द्वारा जयपुर मुख्यालय और कोटा के उच्चाधिकारियों को भेजी गई आधिकारिक रिपोर्ट' में दावा किया है कि ग्लूकोज से प्रभावित हुए तीनों मरीज अब 'स्वस्थ' हैं। जबकि हकीकत यह है कि गंभीर रूप से बीमार एक मरीज दिनेश गोचर का कोटा के निजी अस्पताल में इलाज चल रहा है। अभी तक इस रिपोर्ट पर विभाग के अधिकारियों की तरफ से स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है।</p>
<p><strong>रिपोर्ट का सच: रात को बिगड़ी हालत, आनन-फानन में किया रेफर</strong><br />सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, डोबरली निवासी दिनेश गोचर (45) को 23 मई की रात 08:20 बजे बुखार और उल्टी की शिकायत पर भर्ती किया गया था। रात 08:30 बजे ड्यूटी डॉक्टर कमल मालव ने उन्हें मुख्यमंत्री निशुल्क दवा योजना के तहत कल्ल्न. फछ (ग्लूकोज) व अन्य इंजेक्शन लगाए। बोतल चढ़ने के महज आधा घंटे बाद रात 09:00 बजे दिनेश को तेज कंपकंपी, ठंड और खुजली के साथ उल्टियां शुरू हो गईं। हालत बिगड़ती देख डॉक्टरों ने उन्हें एंटी-एलर्जिक और जीवन रक्षक इंजेक्शन दिए।<br />रिपोर्ट में मालव खुद स्कवीकार रहे हैं कि रात 10:15 बजे मरीज को 108 एम्बुलेंस से एमबीएस अस्पताल कोटा रेफर किया गया, लेकिन परिजन उन्हें निजी अस्पताल ले गए जहां उनका इलाज जारी है। इसके बावजूद प्रभारी ने मुख्यालय को भेजे जवाब में मरीज को 'स्वस्थ' लिखा है।</p>
<p><strong>दो अन्य मरीजों की भी चढ़ाई बोतल, कांपने लगे शरीर</strong><br />रिपोर्ट में दो अन्य प्रभावित मरीजों का भी बिंदुवार ब्योरा दिया गया है जिसमें मरीज चिंटू (30), चम्पाखेड़ा निवासी है इन्हें 19 मई को दोपहर 01:00 बजे यूटीआई की शिकायत पर भर्ती किया गया। दोपहर 01:20 बजे डॉ. श्याम मालव ने इन्हें कल्ल्न. ऊठर चढ़ाया। ठीक 20 मिनट बाद मरीज को तेज ठंड, कंपकंपी और खुजली होने लगी। काउंटर ट्रीटमेंट देकर दोपहर 02:30 बजे डिस्चार्ज किया गया। वही दुसरी मरीज शबाना (34), नोताडा की है इन्हें 23 मई की रात 07:10 बजे दस्त की शिकायत पर भर्ती किया गया। रात 07:25 बजे चढ़ते ही रात 07:45 बजे शरीर कांपने लगा और उल्टियां शुरू हो गईं। इन्हें भी रात 09:00 बजे डिस्चार्ज किया गया। हालाकि इन दोनों के परिजनों से बात करने पर उन्होंने पुरी स्वस्थ होने की बात कही।</p>
<p><strong>बचाव की मुद्रा में विभाग: 'मरीजों ने लिखित में शिकायत नहीं की'</strong><br />इस पूरी रिपोर्ट में खास बात यह है कि प्रभारी ने तीनों मरीजों के कॉलम में नीचे एक जैसी लाईन लिखी है- मरीज द्वारा उक्त उपचार तथा दवा के संबंध में किसी भी प्रकार की लिखित में शिकायत प्राप्त नहीं हुई है। जानकार इसे चिकित्सा विभाग का खुद को बचाने का पैंतरा मान रहे हैं, क्योंकि जब पूरे प्रदेश में इस बैच की दवाइयों को संदिग्ध मान कर सप्लाई रोकी जा चुकी है और बची दवाएं सील की गई हैं, तो विभाग जांच के लिये लिखित शिकायत का बहाना क्यों बना रहा है?</p>
<p><strong>सवाल कागजों में 'स्वस्थ', अस्पताल के बेड पर मरीज!</strong><br />सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता देखिए कि सुल्तानपुर सीएचसी के अधिकारी ने जयपुर मुख्यालय (नोडल अधिकारी), संयुक्त निदेशक कोटा और सीएमएचओ कोटा को भेजी रिपोर्ट में यह लिख दिया कि 'मरीज वर्तमान में स्वस्थ है'। सवाल यह उठता है कि अगर मरीज पूरी तरह स्वस्थ था, तो उसे रात के 10:15 बजे सरकारी 108 एम्बुलेंस बुलाकर कोटा के हायर सेंटर क्यों रेफर करना पड़ा? और अगर वह स्वस्थ है तो आज भी निजी अस्पताल के बेड पर उसका इलाज क्यों चल रहा है? विभागीय आंकड़ों की बाजीगरी मरीजों की जान पर भारी पड़ रही है।</p>
<p> आज मिटिंग की व्यस्तता के चलते मुझे इस मामले की ज्यादा अपडेट नहीं है। हाँलाकि फेक्चुअल रिपोर्ट हमें मिल गयी है मैने अभी नहीं देखी।<br /><strong>- डॉ. घनश्याम मीणा , डिप्टी सीएमएचओ कोटा </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 27 May 2026 13:05:37 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>ब्लड सप्लाई रुकने से पैर कटने की नौबत, जयपुर के डॉक्टरों ने सर्जरी कर बचाई जिंदगी</title>
                                    <description><![CDATA[जयपुर के मणिपाल हॉस्पिटल में डॉक्टरों ने एंडोवेस्कुलर तकनीक से जटिल वैस्कुलर सर्जरी कर मरीज खातुम बानू का पैर कटने से बचा लिया। ब्लड सप्लाई रुकने से पैर की उंगलियां काली पड़ चुकी थीं। वैस्कुलर सर्जन डॉ. गोविन्द प्रसाद दुबे की टीम ने एंजियोप्लास्टी कर ब्लॉकेज हटाए और रक्त संचार बहाल किया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/due-to-stoppage-of-blood-supply-doctors-of-jaipur-saved/article-154665"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-05/manipal.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। जयपुर के सीकर रोड स्थित मणिपाल हॉस्पिटल जयपुर में डॉक्टरों ने एक जटिल वैस्कुलर सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम देकर मरीज का पैर बचाने में सफलता हासिल की। खातुम बानू को अचानक लेफ्ट पैर में ब्लड सप्लाई रुकने के कारण तेज दर्द हो रहा था और पैर की उंगलियां नीली व काली पड़ने लगी थीं। यह स्थिति क्रिटिकल लिम्ब इस्कीमिया का संकेत थी। मरीज को इमरजेंसी में भर्ती कर तुरंत सी टी एंजियोग्राफी जांच की गई, जिसमें पैर बचने की संभावना बेहद कम बताई गई। इसके बाद वैस्कुलर सर्जन डॉ. गोविन्द प्रसाद दुबे की टीम ने एंडोवेस्कुलर तकनीक से उपचार शुरू किया।</p>
<p>पहले ब्लॉकेज हटाने के लिए लिसिस प्रक्रिया की गई और अगले दिन एंजियोप्लास्टी कर ब्लड सप्लाई बहाल कर दी गई। डॉक्टरों के अनुसार अब मरीज स्वस्थ हैं, दर्द में राहत है और वह सामान्य रूप से चल पा रही हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 22 May 2026 18:31:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अरनेठा पीएचसी में डॉक्टर पद रिक्त, मरीज परेशान</title>
                                    <description><![CDATA[एक माह से स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित, नियुक्ति की मांग तेज।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/bundi/doctor-s-post-vacant-at-arnetha-phc--patients-face-hardship/article-151087"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/111200-x-600-px)-(1)26.png" alt=""></a><br /><p>अरनेठा। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र अरनेठा में पिछले एक माह से डॉक्टर का पद रिक्त होने के कारण कस्बा सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के मरीजों को उपचार में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। भीषण गर्मी के चलते मौसमी बीमारियों में बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन चिकित्सकीय सुविधा के अभाव में मरीजों को दूरस्थ अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है या निजी अस्पतालों में महंगा इलाज करवाना पड़ रहा है।</p>
<p>ग्रामीणों ने बताया कि समय पर उपचार नहीं मिलने से मरीजों की परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है। विशेषकर गरीब और जरूरतमंद वर्ग को अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर डॉक्टर की अनुपस्थिति के कारण छोटी-छोटी बीमारियों के लिए भी लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है, जिससे समय और धन दोनों की हानि हो रही है। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि जल्द से जल्द डॉक्टर की नियुक्ति कर स्वास्थ्य सेवाओं को सुचारु किया जाए, ताकि आमजन को राहत मिल सके और समय पर उपचार उपलब्ध हो सके।</p>
<p><strong> यह कहा अधिकारी ने</strong><br />  जल्द ही नए डॉक्टर की ज्वाइनिंग होने की संभावना है । साथ ही इस मामले को मुख्य चिकित्सा अधिकारी बूंदी को भी अवगत कराये, ताकि जल्द से जल्द व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी।<br /><strong>-  डॉ. जितेंद्र सहरिया, मुख्य ब्लॉक चिकित्सा अधिकारी</strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बूंदी</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 14:58:28 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>चाहे दवा का रैपर कट फट जाए, मरीज की सुरक्षा के लिए हर हाल में एक्सपायरी डेट मिले</title>
                                    <description><![CDATA[दवाओं की एक्सपायरी डेट सुनिश्चित करने के लिए क्या कोड नंबर सिस्टम होना चाहिए?]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/even-if-the-medicine-wrapper-is-cut-or-torn--the-expiry-date-should-always-be-provided-for-patient-safety/article-134006"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-11/1200-x-600-px)-(14).png" alt=""></a><br /><p>कोटा । आजकल हर घर में हल्की-फुल्की बीमारी या समस्या के लिए दवाइयां लेना सामान्य बात हो गई है। बहुत से लोग सिर दर्द या शरीर में दर्द के लिए पेन किलर हमेशा अपने पास रखते हैं। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि  दवाओं की एक्सपायरी डेट निकल चुकी होती है, जिससे व्यक्ति यह तय नहीं कर पाता कि उसे दवा लेनी चाहिए या नहीं। यह स्थिति अक्सर भ्रम और चिंता का कारण बनती है।</p>
<p><strong>रैपर पर एक्सपायरी डेट का मिटना या कटना</strong><br />दवा कंपनियां आमतौर पर दवाओं पर एक्सपायरी डेट अंकित करती हैं, लेकिन अक्सर रैपर या पैकिंग पर छपी डेट कट जाती है या मिट जाती है, जिससे यह जानना मुश्किल हो जाता है कि दवा सुरक्षित है या नहीं। इस समस्या से बचने के लिए एक सुझाव है कि दवाओं पर एक न्यूमेरिक कोड नंबर लगाया जाए, जिससे उपभोक्ता आसानी से दवा की एक्सपायरी डेट इंटरनेट पर सर्च कर के जान सकें।</p>
<p><strong>न्यूमेरिक कोड नंबर सिस्टम</strong><br />अगर दवाओं के रैपर पर यूनिफॉर्म तरीके से पूरी स्ट्रिप पर न्यूमेरिक कोड नंबर दिया जाए, तो यह उपभोक्ताओं के लिए बहुत फायदेमंद होगा। अगर रैपर फट जाए या कुछ गोलियां या एक गोली भी बच जाएं, तो भी कोड नंबर से दवा की पूरी जानकारी प्राप्त की जा सकेगी। इस कोड को इंटरनेट पर सर्च करने से दवा की मैन्युफैक्चरिंग डेट, एक्सपायरी डेट, बैच नंबर, कंपनी का नाम और यह भी पता चल सकेगा कि दवा असली है या नकली।</p>
<p><strong> इस प्रणाली के लागू होने से होंगे ये लाभ </strong><br />1. एक्सपायरी डेट की जानकारी तुरंत प्राप्त हो सकेगी, जिससे उपभोक्ता पुरानी दवाएं सेवन करने से बचेंगे।<br />2. नकली दवाओं की पहचान में मदद मिलेगी, और असली दवाओं का चुनाव करना आसान होगा।<br />3. दवाओं की सुरक्षा बढ़ेगी, और उनके उपयोग से होने वाले स्वास्थ्य जोखिम कम होंगे।<br />4. दवा संबंधी जानकारी की पारदर्शिता बढ़ेगी, जिससे उपभोक्ताओं को दवा के बारे में पूरी जानकारी मिल सकेगी।</p>
<p>इस तरह की व्यवस्था से उपभोक्ता दवाओं का सुरक्षित और सही तरीके से उपयोग कर पाएंगे और दवाओं से जुड़ी समस्याएं कम होंगी। इस विषय पर दैनिक नवज्योति ने शहर के लोगों की राय ली और उनसे जानने की कोशिश की कि उनका इस बारे में क्या कहना है।ं </p>
<p>मैं आपके सुझाव से सहमत हूं। अगर दवाइयों पर एक्सपायरी डेट के अलावा एक कोड भी होगा, तो इसका फायदा यह होगा कि यदि पुराना स्टाक रखा होता है तो दवा कम्पनियां  पुराने पैकेट को छेड़कर नई डेट चिपकाती है, तो उसे आसानी से ट्रैक किया जा सकेगा। कोड के जरिए हम यह जान सकते हैं कि दवा कब बनी थी और उसकी एक्सपायरी डेट क्या है, जिससे आम लोगों को राहत मिलेगी।<br /><strong>- महावीर प्रसाद नायक, डायरेक्टर धनलक्ष्मी प्रॉपर्टीज</strong></p>
<p>कोड नम्बर लिखने से एक्सट्रा सेफ्टी हो जाएगी। अन्यथा दवा लेने वाले को ही ध्यान रखना पड़ेगा कि रैपर शुरू करते है उसी समय देख लें एक्सपायरी डेट जिससे ध्यान रहे। दवा के रैपर पर एक-दो स्थानों पर एक्सपायरी डेट लिखी जानी चाहिए, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि यदि एक स्थान से हट जाए तो दूसरी जगह से आसानी से पता चल सके। <br /><strong>- डॉ. अरूणा अग्रवाल, वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ</strong></p>
<p>दवा पर एक कोड नंबर या बारकोड डालना चाहिए, जिससे उसकी एक्सपायरी डेट आसानी से पता चल सके। कोड को थोड़ा बोल्ड और स्पष्ट रूप से लिखा जाए ताकि विशेषकर बुजुर्ग लोग भी उसे पढ़ सकें। इसके साथ ही, एक्सपायर होने वाली तारीख भी लिखी जाए, ताकि मरीज आसानी से जान सकें कि दवा कब एक्सपायर होगी। यह कोड आॅनलाइन सर्च करने के लिए उपयोगी होगा, जिससे सारी जानकारी प्राप्त की जा सके।<br /><strong>- प्रियंका गुप्ता, संस्थापक, अभिलाषा क्लब</strong></p>
<p>दवाइयों के पैकेट पर क्यूआर कोड दिया जाए, जिससे वह स्कैन करके सारी जानकारी प्राप्त कर सकें। यदि दस गोलियों की स्ट्रिप है, तो दो जगह क्यूआर कोड होना चाहिए ताकि यदि कोई आधी स्ट्रिप लेता है तो भी उसे जानकारी मिल सके। कोड नंबर फिजिबल नहीं है पब्लिक पोर्टल इस तरह का है नहीं ऐसे में डीकोड कौन करेगा। क्यूआर कोड के जरिए मोबाइल फोन से घर बैठे ही स्कैन करने से एक्सपायरी डेट और बाकी की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। यह आम जन ता के लिए बेहद सुविधाजनक होगा।<br /><strong>- डॉ. विजय सरदाना, पूर्व प्रधानाचार्य, मेडिकल कॉलेज</strong></p>
<p>दवा के पैकेट पर एक्सपायरी डेट एक ही स्थान पर लिखी जाती है। हालांकि कई बार हम दवा गलती से उसी स्थान से निकाल लेते हैं। इसलिए, कम से कम दो-तीन स्थानों पर एक्सपायरी डेट लिखी जानी चाहिए, ताकि अगर एक स्थान से हट जाए तो दूसरी जगह से पता चल सके। इसके अलावा, कोड नंबर या बारकोड भी लिखा जा सकता है, जिससे हम स्कैन करके डेट की जानकारी प्राप्त कर सकें।<br /><strong>- महेश गुप्ता, डायरेक्टर, शिव ज्योति एज्यूकेशनल ग्रुप, कोटा</strong></p>
<p>यह एक बहुत सही मुद्दा है और सभी फार्मा कंपनियों को इसे फॉलो करना चाहिए। कई बार दवाइयां बर्बाद हो जाती हैं, या मरीज अंजाने में गलत दवाइयां ले लेते हैं। कंपनियां क्यूआर कोड या यूनिक कोड डाल सकती हैं, जिससे पूरी जानकारी स्कैन करके मिल सके। अगर ऐसा न हो सके, तो कम से कम हर गोली के पैकेट पर एक्सपायरी डेट प्रिंट की जानी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों के मरीज के लिए यह आवश्यक है, क्योंकि वह क्यूआर कोड को स्कैन करना नहीं जानता। सबसे अच्छा तो यहीं रहेगा कि सभी फार्मा कंपनी रैपर पर ही एक्सपायरी डेट मेंशन करें या दोनों विकल्प रखें कंपनी को जो यूज करना हो कर सकें।<br /><strong>- डॉ. गौरव मेहता, स्पाइन सर्जन, ईथॉस हॉस्पिटल</strong></p>
<p>कई बार जब हम दवा का रैपर खोलते हैं, तो एक्सपायरी डेट बहुत छोटे अक्षरों में लिखी होती है और स्पष्ट नहीं दिखाई देती। इस स्थिति में, एक कोड नंबर, बैच नंबर, या रैपर के फ्रंट पर एक्सपायरी डेट लिखी जानी चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि दवा एक्सपायर होने से पहले हम उसकी जानकारी प्राप्त कर सकें, और किसी भी परेशानी से बच सकेंगे।<br /><strong>- रितु बोहरा, सीए</strong></p>
<p>ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट 1940 और रूल 1945 के तहत ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि एक्सपायरी डेट दो स्थानों पर लिखी जाए। एक्सपायरी डेट एक ही स्थान पर लिखी जाती है। दवा के पैकेट पर जो जानकारी दी जाती है, जैसे कंपनी का नाम, कंपोजीशन, लाइसेंस नंबर आदि, वह सभी नियमों के तहत होती है। यदि एक्सपायरी डेट दूसरी जगह भी लिखी जाए, तो बाकी की जानकारी समायोजित नहीं हो सकेगी। एक्ट के अनुसार लेबलिंग नहीं लिखते है  तो दवा मिसब्रांडेड मानी जाती है। लेबल नहीं पाया जाएगा तो फिर वो नकली मानी जाएगी। इसलिए, यह सुनिश्चित किया जाता है कि एक ही स्थान पर सभी आवश्यक जानकारी हो।<br /><strong>- आसाराम मीना, ड्रग कंट्रोलर कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 29 Nov 2025 13:00:31 +0530</pubDate>
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                <title>असर खबर का - ऑक्सीजन समय पर नहीं मिलने से सीएचसी में महिला रोगी की मौत का मामला, एक डॉक्टर सहित चार कर्मचारियों को किया गया एपीओ</title>
                                    <description><![CDATA[इब्राहिम सामुदायिक चिकित्सालय में महिला मरीज की ऑक्सीजन सिलेंडर समय पर न लगने से मौत के बाद सीएमएचओ डॉ. साजिद खान ने निरीक्षण किया। चार कर्मचारियों को एपीओ किया गया और तीन सदस्यीय जांच समिति गठित हुई। अस्पताल में सुधार के निर्देश दिए गए, हर दो बेड के बीच ऑक्सीजन सिलेंडर लगाने का निर्णय लिया गया। पीड़ित परिवार ने FIR दर्ज कराई।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/impact-of--news---four-employees--including-a-doctor--were-suspended--a-committee-was-formed-to-investigate-the-incident/article-129731"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/y-of-news-(1)8.png" alt=""></a><br /><p>सुनेल। सुनेल के राजकीय इब्राहिम सामुदायिक चिकित्सालय में एक महिला रोगी की ऑक्सीजन सिलेंडर समय पर न लग पाने के कारण हुई मौत की खबर दैनिक नवज्योति में प्रकाशित होने के बाद सोमवार को सीएमएचओ झालावाड़ डॉ. साजिद खान ने मामले को गंभीरता से लिया और अस्पताल का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान डॉक्टर शुभम स्वामी, नर्सिंग ऑफिसर महिपाल सिंह, संविदा जीएनएम अभिषेक राठौर और गौरव नकुम को एपीओ किया गया। साथ ही मामले में हुई लापरवाही की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी गठित की गई। अस्पताल में पहले से मौजूद अव्यवस्थाओं की समीक्षा के लिए डॉ. साजिद खान और अन्य वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारियों ने नागरिकों के साथ करीब दो घंटे तक मंथन किया। निर्णय लिया गया कि अस्पताल प्रभारी के रूप में डॉ. राहुल आचोलिया नियुक्त होंगे। इसके साथ ही सभी डॉक्टर और कर्मचारी ड्रेस कोड के साथ समय पर ड्यूटी पर उपस्थित रहेंगे। अस्पताल के अधिकारी और कर्मचारी मरीजों और परिजनों के साथ उचित व्यवहार करेंगे, अन्यथा उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। हर दो बेड के बीच लगेगा एक ऑक्सीजन सिलेंडर : इसके अलावा अस्पताल में पाई गई अव्यवस्थाओं जैसे इलेक्ट्रिक प्लग, ऑक्सीजन सिलेंडर और रेगुलेटर, बेड, दवाइयां, जांच और सोनोग्राफी सहित सभी संसाधनों का सुचारू उपयोग सुनिश्चित किया जाएगा। डॉ. साजिद खान ने बताया कि जिले में हर महीने 1 से 5 तारीख के बीच नागरिकों के साथ बैठक लेकर अस्पताल की व्यवस्थाओं में कमी तुरंत दूर की जाएगी। भविष्य में ऐसी घटना न हो, इसके लिए अस्पताल में हर दो बेड के बीच एक आॅक्सीजन सिलेंडर लगाया जाएगा।</p>
<p><strong>पीड़ित परिवार की मांग </strong><br />पीड़ित परिवार ने अस्पताल की लापरवाही के कारण हुई मौत के संबंध में सुनेल थाने में प्राथमिक रिपोर्ट दर्ज करवाई और सीएमएचओ को ज्ञापन देकर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई एवं उचित मुआवजा देने की मांग की।</p>
<p><strong>निरीक्षण के दौरान ये रहे मौजूद </strong><br />निरीक्षण के दौरान वरिष्ठ नागरिक रमेश चंद पालीवाल, गोविंद धाकड़, सुरेन्द्र सोनी, नरेश गुप्ता, कमलेश पाटीदार, प्रदीप बाफना, सुरेश बैरागी, हेमंत जोशी, ईश्वर सिंह सोनगरा, ललित वाल्मीकि, ब्लॉक सीएमएचओ राहुल आचोलिया, डॉ. राम भरत मीणा सहित कई अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित रहे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 15 Oct 2025 15:16:47 +0530</pubDate>
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                <title>नहीं दिखते ट्रॉली मेन, तीमारदार खुद स्ट्रेचर खींचने को मजबूर</title>
                                    <description><![CDATA[अस्पताल में स्ट्रेचर और व्हीचेयर की कमी के कारण मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/-trolley-men-are-not-seen--attendants-are-forced-to-pull-the-stretchers-themselves/article-120046"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/882roer-(3)4.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। संभाग के सबसे बड़े अस्पताल एमबीएस की व्यवस्था बेपटरी पर चल रही है। यहां आकर मरीज अपने को असहाय महसूस करता है। पहले तो लंबी कतार में खड़े होकर पर्ची बनाने का दर्द झेलना पड़ता है। इसके बाद डॉक्टर को दिखाने से लेकर वार्ड में भर्ती होने तक उसे कई परेशानियों से दोचार होना पड़ता है। सबसे ज्यादा परेशानी तो गंभीर रूप से बीमार और घायल मरीजों को आती है। वाहन से उतार कर डॉक्टर तक ले जाने के लिए अस्पताल के गेट पर स्ट्रेचर उपलब्ध नहीं होते है। तीमारदारों  को पहले तो स्ट्रेचर ढूंढना पड़ता है, फिर मरीज को लेटाकर स्वयं ही इमजेंसी तक ले जाना पड़ता है। जबकि अस्पताल प्रशासन की ओर से अस्पताल के प्रवेश द्वार के पास ही ट्रॉली स्टैंड बना रखा है और वहां ट्रॉलीमैन की ड्यूटी भी लगा रखी है।  लेकिन स्टैंड पर ना तो ट्रॉली मिलती है ना ही ट्रॉलीमैन।  अस्पताल प्रशासन का कहना है कि तीमारदार ट्रॉली से मरीज वार्ड में ले जाने के बाद ट्रॉली वहीं छोड़ देते है। जिससे स्टैंड पर ट्रॉलियां नहीं मिलती है। जबकि ट्रॉली उपयोग करने के बाद उसे स्टैंड पर पहुंचा दें तो ुअन्य मरीजों परेशानी नहीं होगी। उधर तीमारदारों का कहना है कि अस्पताल में स्ट्रेचर और व्हीचेयर की कमी के कारण मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इमरजेंसी में आने वाले मरीजों को तीमारदार ट्रोली नहीं मिलने के कारण गोद में उठाकर ले जाते हंै। अस्पताल प्रशासन का कहना है की तीमारदार अपने मरीजों को जिस वार्ड में लेकर जाते है वहीं पर स्ट्रेचर व व्हीलचेयर को वहीं छोड़ देते है। अगर वह उनकी निर्धारित जगह पर लाकर रखते है तो जरूरत पड़ने पर इधर उधर तलाश नहीं करना पड़ता है।</p>
<p><strong>ढूंढ कर लाना पड़ता स्ट्रेचर</strong><br />स्ट्रेचर नहीं मिलने से उसे इधर उधर ढूंढना पड़ता है। मरीजों को ओटी, वार्ड और सीटी स्केन के लिए ले जाने में परेशानी का सामना करना पड़ता है। अस्पताल के वार्डो से ढूंढ कर व्हीलच्चेयर व स्ट्रेचर लाना पड़ता है। <br /><strong>-दीपक प्रजापति, तीमारदार</strong></p>
<p><strong>ट्रॉलीमैन का स्थान नहीं है निर्धारित,ढूंढना होता मुश्किल</strong><br />मेरे पड़ोसी के बीमार होने पर अस्पताल लेकर गया। डॉक्टर ने इमजेंसी में ले जाने के लिए कहा मैंने स्ट्रेचर और ट्रॉलीमैन को तलाशा लेकिन वो नहीं मिला तो मैं स्वयं ही पड़ोसी को ट्रॉली पर लेटाकर इमरजेेंंसी कक्ष में लेकर गया। अस्पताल में व्यवस्था चरमराई हुई है। अस्पताल में वार्ड में वार्ड बॉय नजर तक नहीं आते है।  वहीं ट्रॉली काउंटर पर लगाए गए कर्मचारी भी वहां नजर नहीं आते हंै। अस्पताल में इलाज के लिए आए मरीजों को तीमारदार ही चिकित्सकों के कक्ष से लेकर वार्ड तक लाते ले जाते हैं। कभी व्हीलचेयर तो कभी स्ट्रेचर स्वयं ही ले जाना मजबूरी है। <br /><strong>-मनीष सामरिया, बोरखेड़ा निवासी</strong></p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />अस्पताल में पर्याप्त मात्रा में स्ट्रेचर व व्हीलचेयर है। मरीजों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं हो इसका पूरा प्रयास किया जाता है। फिर भी स्ट्रेचर की कमी होती है तो स्टोर से उपलब्ध करा दिया जाता है। <br /><strong>-धर्मराज मीणा, अधीक्षक , एमबीएस अस्पताल कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 10 Jul 2025 15:35:30 +0530</pubDate>
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                <title>लाखेरी अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाएं चरमराई, रात को अस्पताल में नहीं मिलते डॉक्टर</title>
                                    <description><![CDATA[सरकारी अस्पताल में डॉक्टर नदारद रहते हैं और निजी चिकित्सक भी उपलब्ध नहीं होते, जिससे आपातकालीन स्थिति में मरीजों को तड़पते हुए दूसरे शहर ले जाना पड़ता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/bundi/health-services-in-lakheri-hospital-are-in-shambles/article-106205"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-03/257rtrer-(3)4.png" alt=""></a><br /><p>लाखेरी। लाखेरी सीएचसी में चिकित्सकों की कमी से  स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल स्थिति से जनता में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। रात के समय मरीजों को इलाज तक नसीब नहीं हो पाता। सरकारी अस्पताल में डॉक्टर नदारद रहते हैं और निजी चिकित्सक भी उपलब्ध नहीं होते, जिससे आपातकालीन स्थिति में मरीजों को तड़पते हुए दूसरे शहर ले जाना पड़ता है।</p>
<p><strong>रातभर भटकता रहा मरीज, लेकिन डॉक्टर नहीं मिला</strong><br />तमोलखाना क्षेत्र में हाल ही में एक परिवार में मेहमान की अचानक तबीयत बिगड़ गई। परिजन तुरंत अस्पताल पहुंचे, लेकिन लाखेरी सीएचसी पर कोई डॉक्टर उपलब्ध नहीं था। उम्मीद लेकर निजी अस्पतालों में गए, लेकिन वहां भी कोई चिकित्सक नहीं मिला। आखिरकार, मरीज को दूसरे शहर ले जाना पड़ा, जिससे बहुमूल्य समय नष्ट हो गया और मरीज की हालत और भी बिगड़ गइ। </p>
<p><strong>महिला पहुंची बच्चों को दिखाने, लेकिन सरकारी डॉक्टर ने निजी अस्पताल भेज दिया</strong><br />शहर में मरीजों को सरकारी अस्पताल से भी निजी चिकित्सकों के पास भेजने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। हाल ही में एक महिला अपने बीमार बच्चों को दिखाने के लिए सरकारी अस्पताल पहुंची, लेकिन वहां मौजूद चिकित्सक ने जांच करने के बजाय उन्हें निजी चिकित्सक के पास जाने की सलाह दे दी। यह न केवल सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल स्थिति को दर्शाता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि सरकारी डॉक्टर मरीजों को निजी अस्पतालों की ओर भेजकर अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं। इससे गरीब और जरूरतमंद मरीजों पर आर्थिक बोझ बढ़ता जा रहा है।</p>
<p><strong>पूर्व मंत्री के भाई की जान नहीं बच सकी, फिर भी प्रशासन बेखबर</strong><br />सबसे दुखद पहलू यह है कि तीन दिन पूर्व ही यहां एक पूर्व मंत्री बाबूलाल वर्मा के भाई की जान नहीं बच सकी, क्योंकि समय पर जीवन रक्षक सुविधाएं और चिकित्सक उपलब्ध नहीं थे। इतने बड़े हादसे के बाद भी प्रशासन का इस ओर ध्यान न देना शहर की जनता के लिए गहरी चिंता का विषय बन गया है। जनता का सवाल है कि अगर एक पूर्व मंत्री के परिवार को भी इलाज नहीं मिल पा रहा है, तो आम आदमी की क्या स्थिति होगी?</p>
<p><strong>दिन में डॉक्टर, लेकिन रात में भगवान ही सहारा</strong><br />शहरवासियों का कहना है कि दिन में सरकारी चिकित्सक सेवाएं देते हुए मिल जाते हैं, लेकिन रात में सरकारी और निजी, दोनों तरह के डॉक्टर नदारद रहते हैं। इसका खामियाजा गंभीर मरीजों को भुगतना पड़ता है, जिनकी हालत सही समय पर इलाज न मिलने से और बिगड़ जाती है।</p>
<p><strong>पूर्व चेयरमैन लक्ष्मी चंद महावर बोले प्रशासन सो रहा है, जनता ठगा महसूस कर रही</strong><br />लाखेरी की चिकित्सा व्यवस्था की इस बदहाली को लेकर पूर्व चेयरमैन लक्ष्मी चंद महावर ने भी नाराजगी जताई। उन्होंने बताया कि इस समस्या से प्रशासन और अधिकारियों को कई बार अवगत कराया गया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने कहा, हम खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। अगर हमारी सरकार होती, यानी कांग्रेस सरकार होती, तो जनता के साथ न्याय जरूर होता।</p>
<p><strong>लोकसभा अध्यक्ष का क्षेत्र होते हुए भी जनता को इस हालात से गुजरना पड़ रहा </strong><br />क्षेत्र की जनता ने आश्चर्य और निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि यह लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का क्षेत्र होने के बावजूद भी स्वास्थ्य सुविधाएं बदहाल हैं। जनता का कहना है कि यदि इतने बड़े पद पर बैठे जनप्रतिनिधि के क्षेत्र की यह स्थिति है, तो बाकी इलाकों का क्या हाल होगा?</p>
<p><strong>प्रशासन सो रहा कुंभकर्णी नींद, अब कैसे जगाए ?</strong><br />लाखेरी की जनता कई बार समाचार पत्रों और मीडिया के माध्यम से प्रशासन को जगाने की कोशिश कर चुकी है, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। जबकि यहां पर तीन चिकित्सक लगाए गए थे, लेकिन शायद वे भी अपनी सेवाएं कागजों में ही दे रहे हों। प्रशासन को चाहिए कि इस ओर गंभीरता से ध्यान आकर्षित करे, ताकि जनता को स्वास्थ्य सेवाओं का पूरा लाभ मिल सके।</p>
<p><strong>जनता की मांग, स्वास्थ्य सेवाओं में तत्काल सुधार किया जाए</strong><br />शहरवासियों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से इस गंभीर मुद्दे पर तत्काल कदम उठाने की मांग की है। उनका कहना है कि अगर जल्द ही स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार नहीं हुआ, तो जनता सड़कों पर उतरकर विरोध करेगी। अब सवाल यह उठता है क्या प्रशासन नींद से जागेगा, या फिर लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाएगा?</p>
<p><strong>इनका कहना है </strong><br />हमने लाखेरी सीएचसी में तीन चिकित्स नियुक्त कर रखे है।  बेहरतनी सेवाएं देने की कोशिश कर रहे है। साथ ही जिन तीन चिकित्सकों ने ज्वाइन नहीं किया है उनकी जानकारी सरकार को भेजी है। <br /><strong>- ओपी सामर, सीएमएचओ बूंदी </strong></p>
<p>सीएचसी में चिकित्सकों की कमी के बारे में उच्चाधिकारियों को अवगत करवा दिया है। अस्पताल में मरीजों की राहत देने के प्रयास किए जा रहे है। <br /><strong>- डॉ. वेदांती सक्सेना, लाखेरी सीएचसी प्रभारी</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बूंदी</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Mar 2025 15:24:02 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>मरीजों के पलंग से घर ले जा रहे बीमारियां, पलंग पर बैठने से मरीज को परेशानी</title>
                                    <description><![CDATA[तीमारदारों के बैठने की सुविधा नहीं होने से जमीन पर ही चादर बिछाकर बैठना पड़ रहा है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/taking-diseases-home-from-the-patient-s-bed/article-101940"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-01/257rtrer41.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। संभाग के सबसे बड़े एमबीएस अस्पताल के इनडोर वार्डों में मरीजों के लिए तो पलंग है। लेकिन उनके तीमारदारों के बैठने की कोई सुविधा नहीं है। जिससे अधिकतर तीमारदारों को मजबूरन मरीजों के पलंग पर ही बैठना पड़ रहा है। जिससे वे अस्पताल से अपने घर तक बीमारियों को ले जा रहे है। एमबीएस अस्पताल में जहां कोटा शहर ही नहीं दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों व रा’य  की सीमा से लगे मध्य प्रदेश के श्योपुर समेत अन्य जगहों तक के मरीज उपचार के लिए आ रहे है। उस अस्पताल में मरीजों को उनकी बीमारी के हिसाब से व ऑपरेशन के बाद भर्ती करने के लिए अलग-अलग इनडोर वार्ड बने हुए है। फिर चाहे पोस्ट आॅपरेटिव वार्ड हो या महिला सर्जीकल वार्ड। मेल सर्जिकल वार्ड हो या अस्थि वार्ड। ईएनटी वार्ड हो मेडिसिन वार्ड। इन वार्डों में मरीजों के लिए तो पर्याप्त संख्या में बैड लगे हुए है। लेकिन उन मरीजों की देखभाल के वहां रहने वाले परिजनों और तीमारदारों के बैठने के लिए वार्ड में बैंच या स्टूल तक नहीं है। ऐसे में या तो उन्हें घंटो तक खड़े रहना पड़ रहा हैया मजबूरन मरीज के पलंग पर बैठना पड़ रहा है।</p>
<p><strong>पलंग पर बैठने से मरीज को परेशानी</strong><br />मरीज के पलंग पर तीमारदारों के बैठने से जहां मरीजों को तो परेशानी होती ही है। वहीं उनका उपचार करने वाले मेडिकल स्टाफ को भी समस्या होती है।  इससे भी अधिक खतरनाक तीमारदारों का मरीज के पलंग पर बैठने से बीमारियों को अपने साथ ले जाना है। कुन्हाड़ी निवासी अनीता शर्मा ने बताया कि उनकी बेटी का आॅपरेशन होने से उसे महिला सर्जिकल वार्ड में भर्ती किया गया है। वहां उसके पास किसी न किसी का रहना जरूरी है। बीमारी की सूचना मिलने पर उसे देखने भी रिश्तेदार व परिजन आ रहे है। लेकिन वहां उनके बैठने के लिए नतो स्टूल है और न ही बैंच। लोग अधिक देर तक खड़े भी नहीं रह सकते। ऐसे में उन्हें मजबूरन मरीज के पलंग पर ही बैठना पड़ रहा है। वहीं रात को या तो जमीन पर सोना पड़ा या बेटी के पास ही पलंग पर। जिससे अस्पताल की बीमारी घर लेकर जाने से कम नहीं है। भीमगंजमंडी निवासी राधश्याम बैरवा ने बताया कि उनके पिता के पैर में फ्रेक्चर होने पर उनका आॅपरेशन हुआ है। उन्हें अस्थि वार्ड में भर्ती किया गया। लेकिन वहां तीमारदारों के बैठने की सुविधा नहीं होने से जमीन पर ही चादर बिछाकर बैठना पड़ रहा है। जबकि पहले हर पलंग के साथ बैंच व स्टूल होता था। उन सभी को हटा दिया है। </p>
<p><strong>इमरजेंसी वार्ड में हर पलंग पर बैंच</strong><br />वहीं उसी अस्पताल में इमरजेंसी वार्ड में हर पलंग के साथ बैंच लगी हुई है। जिस पर तीमारदार आराम से कुछ देर बैठ भी सकते हैं और मरीज से संबंधित सामान भी रख सकते है। लोगों ने बताया कि इसी तरह की सुविधा इनडोर वार्ड में भी होनी चाहिए। जिससे मरीज के पलंग पर नहीं बैठना पड़े। </p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />इनडोर वार्ड में मरीजों को देखने कई लोग आते है। वहां यदि बैठने की बैंच या स्टूल रखेंगे तो वे घंटी तक वहां से नहीं जाते है। जबकि वार्ड में मरीज के पास भीड़ लगाना गलत है। वार्ड के बाहर गैलेरी में बैंचे लगी हुई है। वहां बैठने की सुविधा है। जबकि इमरजेंसी में गम्भीर मरीज आते है। उनके साथ लोग भीअधिक रहते है। हालांकि वहां कुछ देर के लिए  ही मरीज रहते है। इस कारण से हवां बैंचे लगाई हुई है। हालांकि प्रयास कर रहे हैं कि अस्पताल में तीमारदारों के बैठने कीअलग से व्यवस्था की जाए। <br /><strong>- डॉ. धर्मराज मीणा, अधीक्षक एमबीएस अस्पताल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 24 Jan 2025 17:33:12 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>चांदीपुरा वायरस संक्रमण मामला, मरीज मिला तो आसपास के घरों में सर्वे-जांच होगी</title>
                                    <description><![CDATA[चिकित्सा विभाग ने जारी की एडवाइजरी डूंगरपुर में मिला था मरीज]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/if-a-patient-is-found-in-chandipura-virus-infection-case/article-86357"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-07/chandipura-virus.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राजस्थान के डूंगरपुर में चांदीपुरा वायरस के मिले एक मरीज के बाद जहां गुजरात से सटे बॉर्डर जिलों में अलर्ट जारी किया है। वहीं प्रदेशभर के लिए भी एडवाइजरी जारी कर दी है। प्रदेश में चांदीपुरा वायरस जैसे लक्षणें वाले मरीजों की जांच होगी। मरीज मिला तो उसके आसपास के पचास घरों में स्क्रीनिंग-सर्वे होगा। यह काम आशा, एएनएम, सीएचओ के द्वारा घर-घर जाकर किया जाएगा। जांच को सैंपल पुणे के नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ वायरोलॉजी में भेजे जाएंगे, क्योंकि यह वायरस जानवरों में भी फैलता है। ऐसे में मरीज के घर में अगर पालतू जानवर या कोई पशु होगा तो उसकी भी जांच की जाएगी। यह जांच पशुपालन विभाग के मार्फत होगी।</p>
<p>चिकित्सा विभाग के जनस्वास्थ्य निदेशक डॉ.रविप्रकाश माथुर ने इसकी एडवाइजरी जारी की है। उन्होंने निर्देश दिए गए हैं कि गुजरात में इसके मरीज ज्यादा पाए जाते हैं, ऐसे में बॉर्डर से सटे प्रदेश के जिलों में मक्खी-मच्छरों को नियंत्रित करने के लिए फोगिंग, डीडीटी छिड़काव करवाया जाएगा। एडवाइजरी में सभी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों को चांदीपुरा वायरस का कोई भी मरीज आने पर उसकी सूचना तुरंत मुख्यालय पर देने और उसके इलाज की हर संभावित व्यवस्था अभी से रखने के निर्देश भी दिए गए हैं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 31 Jul 2024 11:52:03 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>लापरवाही: 9 माह से मरीज सोनोग्राफी कराने से है वंचित </title>
                                    <description><![CDATA[युवाओं के लंबे आंदोलन के बाद मिली 16 लाख रुपए की मशीन का नहीं मिल रहा लाभ ।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/negligence--patient-is-deprived-of-getting-sonography-done-for-9-months/article-74427"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/transfer-(5)3.png" alt=""></a><br /><p>सुल्तानपुर। सुल्तानपुर अस्पताल में करीब 2 वर्ष पूर्व लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की पहल पर लगी सोनोग्राफी मशीन का पिछले 9 माह से मरीजों को कोई लाभ नहीं मिल रहा। सोनोलॉजिस्ट के अभाव में सोनोग्राफी रूम में पिछले 9 माह से ताला लटका हुआ है। जानकारी के अनुसार दो वर्ष पूर्व अस्पताल को मशीन मिलने के बाद कुछ दिनों तक ही व्यवस्था सुचारू रूप से चल पाई। इसके बाद पूर्व में भी सोनोलॉजिस्ट का स्थानांतरण हो जाने के कारण रोगियों को परेशानियों का सामना करना पड़ा था। वर्तमान में भी करीब 9 माह से सोनोग्राफी का लाभ लोगों को नहीं मिल पा रहा है। क्योंकि सोनोलॉजिस्ट उपलब्ध नहीं है। इस कारण महिलाओं को उपचार कराने के लिए पहले की तरह ही 40 किलोमीटर दूर कोटा शहर जाना पड़ रहा है। ब्लॉक क्षेत्र के सबसे बड़े अस्पताल मेडिकल कॉलेज कोटा के अधीन आने वाली सीएचसी सोनोग्राफी मशीन को लगाए हुए करीब 2 वर्ष का समय हो गया है। लेकिन आम जनता को कुछ समय ही सोनोग्राफी मशीन का लाभ मिल सका। उसके बाद हालात पहले की तरह ही हो गए। सोनोग्राफी की सुविधा तो उपलब्ध हो गई। लेकिन व्यवस्थागत कमियों के कारण मरीजों को इसको लाभ नहीं मिल पा रहा है। सोनोलॉजिस्ट के अभाव में सोनोग्राफी सेंटर पर ताला लगा हुआ है। अस्पताल में प्रतिदिन करीब दो दर्जन मरीज ऐसे आते हैं जिन्हें सोनोग्राफी की आवश्यकता होती है। उन्हें या तो कोटा जाना पड़ता है, या फिर निजी अस्पतालों में जाकर अपना उपचार कराना पड़ता है। जहां उनसे महंगे दाम वसूले जाते हैं। चिकित्सालय प्रशासन द्वारा इस मामले में कई बार उच्चाधिकारियों को सोनोलॉजिस्ट लगवाने के लिए अवगत करा दिया गया है। लेकिन इस ओर किसी का ध्यान नहीं है। गंभीर हालत में प्रसव के लिए भर्ती होने वाली महिलाओं को भी बिना सोनोग्राफी जांच के ही 40 किलोमीटर दूर कोटा जाना मजबूरी बन गया है।</p>
<p><strong>आंदोलन के बाद मिली थी सोनोग्राफी मशीन</strong><br />सोनोग्राफी मशीन के लिए कस्बे के युवाओं ने काफी समय तक आंदोलन किया था। युवाओं के साथ ही नगर वासियों एवं महिलाओं ने भी इसमें भागेदारी की थी। जिसके फलस्वरूप लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की पहल पर सोनोग्राफी मशीन सीएचसी में उपलब्ध करवाई गई थी। लेकिन अधिकारियों की लापरवाही से 16 लाख रुपए से अधिक की मशीन धूल खा रही है।</p>
<p><strong>सोनोलॉजिस्ट का बहाना कर अधिकारी झाड़ रहे पल्ला</strong><br />इस मामले में संबंधित अधिकारी सोनोलॉजिस्ट का रोना रोकर समस्या से अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। अधिकारियों के पास यही बहाना रहता है कि विभाग के पास सोनोलॉजिस्ट नहीं हैं। लेकिन सोनोलॉजिस्ट लगाने के लिए जनप्रतिनिधियों का भी कोई ध्यान नहीं है। जबकि सीएचसी मेडिकल कॉलेज कोटा के अधीन आता है। जहां प्रशासन और जनप्रतिनिधि चाहें तो प्रतिनियुक्ति पर ही सोनोलॉजिस्ट लगा कर नगर वासियों एवं ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले मरीजों को राहत पहुंचा सकते हैं। लेकिन अधिकारियों में इच्छा शक्ति के अभाव में मरीजों को बेजा परेशानी उठानी पड़ रही है। </p>
<p>सोनोग्राफी मशीन की सुविधा नहीं मिलने के कारण रोगियों को 40 किलोमीटर दूर कोटा जाना पड़ता है। सोनोग्राफी मशीन की सुविधा सुल्तानपुर नगर के अस्पताल में होने के बावजूद भी आपातकालीन स्थिति में भी सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाती है। जिसके कारण रोगियों को परेशानी होती है।<br /><strong>- रवि शर्मा, वार्ड पार्षद</strong></p>
<p>पूर्व में सांसद ओम बिरला द्वारा सोनोग्राफी मशीन लगा दी गई थी। लेकिन उसका संचालन सुचारु रूप से नहीं होने के कारण मरीजों को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। <br /><strong>- संदीप शर्मा, क्षेत्रवासी</strong></p>
<p>सोनोग्राफी मशीन होने के बावजूद सुल्तानपुर ब्लाक के रोगियों को या तो निजी अस्पतालों में आर्थिक खर्चा करके सोनोग्राफी करनी पड़ रही है अन्यथा उन्हें इलाज के लिए कोटा जाना पड़ता है।<br /><strong>- अजहरुद्दीन खान, क्षेत्रवासी</strong></p>
<p><strong>इनका कहना</strong><br />सुल्तानपुर चिकित्सालय में मरीजों को हरसंभव चिकित्सा सुविधा दी जा रही है। साथ ही मरीजों को निशुल्क दवाइयां देकर उपचार किया जा रहा है। सोनोलॉजिस्ट के लिए उच्च अधिकारियों को अवगत करवाया हुआ है। सोनोलॉजिस्ट का स्थानांतरण हो जाने से समस्या उत्पन्न हुई है। इस मामले में उच्चाधिकारियों को लिखित में अवगत कराया जा रहा है।<br /><strong>- डॉ. श्याम मालव, सीएचसी प्रभारी </strong></p>
<p>इस मामले में मेडिकल कॉलेज के उच्चाधिकारियों को अवगत करा दिया गया है। सोनोलॉजिस्ट का स्थानांतरण हो जाने के कारण समस्या उत्पन्न हुई है। सोनोलॉजिस्ट आने के बाद सोनोग्राफी की सुविधा चालू करा दी जाएगी।<br /><strong>- डॉ. राजेश सामर, ब्लॉक सीएमएचओ</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 04 Apr 2024 18:42:07 +0530</pubDate>
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                <title>ब्रेन से निकला 12cm बड़ा ट्यूमर, रोगी पूर्णत स्वस्थ</title>
                                    <description><![CDATA[बेहोशी की हालत में महिला पहुंची हॉस्पिटल, तुंरत जांच और सर्जरी से बची जान ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/12cm-big-tumor-removed-from-brain-patient-completely-healthy/article-65413"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-12/mmd-(1)4.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। भगवान महावीर कैंसर हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के चिकित्सकों की टीम की ओर से 40 वर्षीय महिला की सर्जरी कर सिर से 12 से.मी. बड़ी गांठ निकाली गई। न्यूरो ऑन्कोलोजिस्ट डॉ नितिन द्विवेदी एंड टीम की ओर से की गई यह सर्जरी, गांठ के आकार और स्थान के कारण काफी चुनौतीपूर्ण थी। तीन घंटे चली इस सर्जरी के बाद रोगी पूर्ण रूप से स्वस्थ है और ऑपरेशन के दूसरे दिन से रोगी चलने में सक्षम हो पाया है। </p>
<p>डॉ द्विवेदी ने कहा कि विजयनगर निवासी भगवती बेहोशी की हालत में हॉस्पिटल पहुंची। घर के सदस्यों ने बताया कि सर में दर्द, उल्टी और चक्कर आने की परेशानी कुछ दिनों से चल रही थी। ऐसे में महिला की ब्रेन एमआरआई करवाई गई जिसमें ट्यूमर पाया गया। जिसमें दिखा कि ट्यूमर ब्रेन के अगले हिस्से में है और नाक एवं ब्रेन को जोडने वाली हड्डी में तक जा रहा है। ऐसे में तुंरत ऑपरेषन करने का निर्णय लेकर सर्जरी कर ट्यूमर को हटाया गया। सर के अंदर इतने बड़े ट्यूमर को हटाते हुए आस-पास की नसों को सुरक्षित रखना इस सर्जरी में सबसे बड़ी चुनौती थी।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Fri, 29 Dec 2023 14:52:01 +0530</pubDate>
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