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                <title>Judicial Ruling - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>Judicial Ruling RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>मोटर दुर्घटना मामलों में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : देरी से क्लेम अब नहीं होंगे खारिज, न्याय का उद्देश्य पीड़ितों को राहत देना है, न कि अधिकारों को सीमित करना </title>
                                    <description><![CDATA[छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि देरी के आधार पर मोटर दुर्घटना क्लेम खारिज नहीं होंगे। न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने स्पष्ट किया कि तकनीकी कारणों से पीड़ितों को न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने ट्रिब्यूनल को सुनवाई जारी रखने का निर्देश देकर सैकड़ों परिवारों को बड़ी उम्मीद दी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/big-decision-of-the-high-court-in-motor-accident-cases/article-149824"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-04/court-hammer04.jpg" alt=""></a><br /><p>बिलासपुर। मोटर दुर्घटना दावा मामलों में उच्च न्यायालय ने पीड़ित परिवारों के हित में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। गुरुवार को हुई इस सुनवाई में अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल आवेदन में देरी होने के आधार पर क्लेम को शुरुआती स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता, उक्त जानकारी आज अदालत ने दी। न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने यह आदेश पारित करते हुए कहा कि पीड़ितों को सिर्फ तकनीकी कारणों के चलते न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता। इस फैसले से प्रदेश के उन सैकड़ों परिवारों को राहत मिली है, जो किसी कारणवश तय समय सीमा के भीतर दावा प्रस्तुत नहीं कर सके थे।</p>
<p>दरअसल, बजाज आलियांज, टाटा एआईजी, ओरिएंटल, मैग्मा एचडीआई और इफको टोक्यो जैसी बीमा कंपनियों के साथ कुछ वाहन मालिकों ने 40 से अधिक सिविल रिवीजन याचिकाएं दायर की थीं। इनमें तर्क दिया गया था कि मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 166(3) के तहत समय सीमा समाप्त होने के बाद ट्रिब्यूनल को ऐसे मामलों की सुनवाई का अधिकार नहीं है। हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि न्याय का उद्देश्य पीड़ितों को राहत देना है, न कि तकनीकी आधार पर उनके अधिकारों को सीमित करना।</p>
<p>हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बीमा कंपनियां और संबंधित पक्ष सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले के अंतिम निर्णय को ट्रिब्यूनल के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। अदालत ने सभी मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल्स को निर्देश दिया है कि वे इन मामलों की सुनवाई कानून के अनुसार जारी रखें। साथ ही यह भी कहा गया है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट से अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक ट्रिब्यूनल कोई अंतिम आदेश पारित नहीं करेंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 11:54:08 +0530</pubDate>
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                <title>कर्नाटक हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : शिक्षण संस्थान में वंदे मातरम् का गायन अनिवार्य नहीं, जनहित याचिका ख़ारिज</title>
                                    <description><![CDATA[कर्नाटक उच्च न्यायालय ने स्कूलों में वंदे मातरम के सभी छह छंदों के गायन के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि केंद्र की सलाह अनिवार्य नहीं है, क्योंकि इसमें 'सकते हैं' (May) शब्द का प्रयोग हुआ है। पीठ ने कहा कि राष्ट्रीय गीत के लिए कोई वैधानिक बाध्यता नहीं है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/big-decision-of-karnataka-high-court-singing-of-vande-mataram/article-149746"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/karnataka.png" alt=""></a><br /><p>बेंगलुरु। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने गुरुवार को उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें स्कूलों में राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' के सभी छह छंदों को गाने की केंद्र सरकार के परामर्श को चुनौती दी गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि केंद्र का यह निर्देश अनिवार्य नहीं है। मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और न्यायमूर्ति सीएम पूनाचा की पीठ ने इस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। पीठ ने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्रालय की सलाह में 'सकते हैं' (मे) शब्द का प्रयोग किया गया है, जो यह दर्शाता है कि शिक्षण संस्थान इसे मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रीय गीत के गायन को लेकर कोई वैधानिक अनिवार्यता नहीं है।</p>
<p>पीठ ने राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत के बीच के अंतर को भी स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि जहाँ राष्ट्रगान स्थापित कानूनी और नियामक प्रावधानों के दायरे में आता है, वहीं राष्ट्रीय गीत किसी वैधानिक ढांचे के अधीन नहीं है। इसके अलावा, अदालत ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अरविंद कामथ की उन दलीलों पर भी गौर किया, जिसमें बताया गया कि इसी तरह की एक याचिका को उच्चतम न्यायालय द्वारा पहले ही खारिज किया जा चुका है।</p>
<p>अधिवक्ता सोमशेखर राजवंशी द्वारा दायर इस जनहित याचिका में केंद्र के फरवरी 2026 के परामर्श को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि यह सलाह सरकारी स्कूलों के छात्रों को 'वंदे मातरम' के सभी छह छंद गाने के लिए मजबूर करती है, जिसमें हिंदू देवी-देवताओं के संदर्भ वाले हिस्से भी शामिल हैं। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि गीत के शुरुआती छंद व्यापक रूप से देशभक्ति के रूप में स्वीकार किए जाते हैं, लेकिन विस्तृत संस्करण में देवी दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के संदर्भ हैं। स्कूलों में इसके दैनिक गायन को अनिवार्य करना धर्मनिरपेक्षता, समानता और अंतरात्मा की स्वतंत्रता के संवैधानिक गारंटियों का उल्लंघन है। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के कार्यकारी निर्देश सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों में छात्रों पर धार्मिक तत्व नहीं थोप सकते।</p>
<p>हालांकि, उच्च न्यायालय ने इन दलीलों पर विचार करने के बाद कहा कि वह इस मामले की विस्तृत जांच करने का इरादा नहीं रखता क्योंकि यह सलाह बाध्यकारी नहीं है। पीठ ने टिप्पणी की कि किसी गैर-अनिवार्य निर्देश पर न्यायिक समय खर्च करना उचित नहीं होगा और इसी के साथ याचिका खारिज कर दी गई।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 17:28:36 +0530</pubDate>
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