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                <title>ancestral tradition - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>ठठेरा बाजार के कुछ परिवार आज भी जिंदा रखे हैं पुश्तैनी परंपरा, त्योहारों पर रहती है हाथ से बने बर्तनों की मांग </title>
                                    <description><![CDATA[रामपुरा की गलियों से गायब हो रहे हाथ के कारीगर, अब बचे सिर्फ दो कारखाने।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/families-in-thathera-bazaar-keep-ancestral-tradition-alive/article-152082"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/111200-x-600-px)-(3)39.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहर के रामपुरा स्थित ठठेरा गली की वह ऐतिहासिक 'टक-टक' की गूंज, जो कभी इस बाजार की पहचान हुआ करती थी, आधुनिक मशीनी युग के शोर में मानों कहीं गायब सी हो गई है। लेकिन इस मशीनी दौर के बावजूद ठठेरा बाजार के कुछ परिवारों ने अपनी पारंपरिक विरासत और पुश्तैनी व्यवसाय को आज भी जिंदा रखा हुआ है। ये परिवार आज भी इसी हुनर के जरिए अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं।</p>
<p><strong>ठठेरा बाजार में सालों पहले करीब 40 कारीगर हुआ करते थे</strong><br />आज के मशीनी युग के कारण हाथ से बने बर्तन काफी महंगे पड़ते हैं, जिसके चलते इनकी मांग कम रहती है। यही वजह है कि जिस ठठेरा बाजार में सालों पहले करीब 40 कारीगर हुआ करते थे, अब वहां केवल दो ही परिवार रह गए हैं। हालांकि, आज भी त्योहारों और विशेष आयोजनों के मौके पर इन कारीगरों के हाथ से बने बर्तनों की खास मांग बनी रहती है। संतोष की बात यह है कि इन परिवारों की युवा पीढ़ी भी इस पुश्तैनी काम को पूरी लगन से सीख रही है।रामपुरा ठठेरा बाजार के रघुनंदन कसेरा ने बताया कि उनके कारखाने को 150 साल से भी अधिक समय हो गया है और वर्तमान में उनकी चौथी पीढ़ी इस काम को संभाल रही है। आज बाजार में केवल दो ही ऐसे कारखाने संचालित हैं जो पूरी तरह हाथ से बर्तन तैयार करते हैं।</p>
<p><strong>बाहर से मंगवाकर बेच रहे बर्तन </strong><br />जबकि अधिकांश लोगों ने अब बर्तन की दुकानें खोल ली हैं और वे बाहर से मशीन निर्मित बर्तन मंगवाकर बेचते हैं। चूंकि हाथ से बने बर्तनों की लागत अधिक आती है, इसलिए आम ग्राहक अक्सर उनका सही दाम नहीं दे पाते और कम कीमत वाले मशीनी बर्तनों को चुन लेते हैं। लेकिन विशिष्ट धार्मिक आयोजनों के लिए लोग आज भी इन्हीं के पास आते हैं। वहीं दुकानदार मुरलीमनोहर ने बताया कि उनकी दुकान पर पुराने बर्तनों की मरम्मत और पॉलिश का कार्य भी किया जाता है।</p>
<p><strong>पीतल और तांबे के बर्तनों का क्रेज </strong><br />दुकानदार गौरव ठठेरा ने बताया कि बाजार में खासकर पीतल, तांबा, कांसा और जस्ते के बर्तन बनाने की परंपरा रही है, हालांकि बीते कुछ वर्षों में जस्ते के बर्तनों का चलन बंद हो गया है। अब लोगों की मांग पीतल के बर्तनों की ज्यादा है। दुकानदार गौरव ठठेरा के अनुसार, वर्तमान में तांबे के बर्तनों की मांग भी काफी है क्योंकि इनमें रखे पानी को पीने और खाना बनाने से शरीर को पोषक तत्व मिलते हैं।</p>
<p><strong>मंदिर की पूजन सहित अन्य सामग्री भी बनाते </strong><br />इसके अलावा पूजा-पाठ के बर्तन, मंदिरों के लिए भोलेनाथ के कवच और मूर्तियां भी पीतल से तैयार की जा रही हैं। बाजार में भोलेनाथ के कवच के साथ-साथ कलश, भगोनी, लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियों और तांबे की आकर्षक आकृतियों सहित हनुमान जी की गदा जैसे विशेष आॅर्डरों की काफी मांग रहती है। इसके अलावा तांबे से बनी विभिन्न आकर्षक आकृतियां और हनुमान जी की गदा जैसे विशेष उत्पाद भी श्रद्धा का केंद्र बने हुए हैं।</p>
<p><strong>चौथी पीढ़ी संभाल रही विरासत </strong><br />दुकानदार रघुनंदन ठठेरा ने बताया कि उनके दादा के समय से चली आ रही इस दुकान और विरासत को अब उनके बेटे गौरव, सोमू और विजय भी सीख रहे हैं, ताकि पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा यह हुनर आने वाले समय में भी जीवित रहे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 15:01:30 +0530</pubDate>
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