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                <title>smiling face - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>45 डिग्री तापमान की लू में 8 रूपए की बचत के लिए 26 किमी. का संघर्ष, पसीने से 'किस्त' चुका रहा गिग वर्कर</title>
                                    <description><![CDATA[पसीने की हर बूंद एक कहानी कह रही है, बेहतर भविष्य के लिए झुलसते वर्तमान की। 
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/a-26-kilometer-struggle-in-45-degree-heat%E2%80%94all-to-save-8-rupees/article-153685"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-05/1111200-x-600-px)-(5)18.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। जब आप अपने स्मार्टफोन पर एक क्लिक करके खाना या ग्रोसरी मंगवाते हैं, तो आपके दरवाजे पर पहुंचने वाली उस मुस्कान के पीछे मेहनत का एक ऐसा गणित छिपा है, जो रूह कंपा देता है। 5-10 मिनट की देरी पर हम लोग गुस्सा करने लगते है,सारे शहर मेंं ट्रेफिक में दौड़धूप करके वो क्लाईन्ट तक पार्सल पहुंचाते है। जिनकी आंखे हमेशा मोबाईल की स्क्रीन पर ही रहती है। कंक्रीट के इन तपते जंगलों में, 8 रूपए बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालना कोई 'आजादी' नहीं है। यह उस मेहनत के पीछे छुपी मौन चीख है जिसे हम सिर्फ एक ट्रैकिंग आईडी' समझते हैं।</p>
<p><strong>तीन  महीने बंधक, सिक्योरिटी इंसेंटिव का डर</strong><br />गिग वर्कर्स के लिए काम शुरू करना भी आसान नहीं है। कई कंपनियों में स्थाई सिक्योरिटी जमा कराई जाती है। नियम यह है कि 3 महीने काम करने पर ही यह वापस मिलेगी। यदि कोई वर्कर इस भीषण गर्मी में बीमार पड़ जाए या काम छोड़ना चाहे, तो उसकी जमा पूंजी डूबने का खतरा रहता है।</p>
<p><strong>पेनल्टी की मार, कमाई का कड़वा गणित</strong><br />गर्मी या बरसात के कारण कही भी ब्रेक लिया तो इंसेंटिव कटता है, और सुरक्षा राशि वापस न मिलने का डर उन्हें झुलसाने वाली धूप में भी सड़क पर दौड़ते रहने को मजबूर करता है। कोटा की सड़कों पर दौड़ रहे इन वर्कर्स की जेब में आखिर बचता क्या है? डिलीवरी पार्टनर बताते है कि शहर के एयरोड्राम चौराहा से सुखाड़िया तक 13 किलोमीटर का ऑर्डर पूरा करने पर मुझे 60 रूपये मिले। मेरी बाइक 2 रूपये प्रति किलोमीटर का पेट्रोल पीती है। जाना और आना मिलाकर 26 किलोमीटर हुआ, यानी 52 रूपये का पेट्रोल जल गया। 45 डिग्री की लू में 1 घंटा तपने के बाद मेरी जेब में सिर्फ 8 रूपये बचे।</p>
<p><strong>इंसेंटिव को तो पेट्रोल पी जाता है</strong><br />ट्रैफिक और रेस्टोरेंट में वेटिंग टाइम के कारण समय बहुत बर्बाद होता है। 13 ङट की दूरी पर 70 रूपये का इंसेंटिव तो मिलता है, पर वापसी का पेट्रोल खर्च खुद उठाना पड़ता है, जिससे बचत 18 रूपये ही रह जाती है। शहर के आस पास रानपुर कैथून बड़गांव सुखाड़िया तक के आर्डर आते है। जिनमें ज्यादातर खाने पीने के आर्डर ज्यादा होते है। आजकल महिलायें सब्जियां व ग्रोसरी भी मंगा रही है। ऐसे में 17 ङट की दूरी पर160 रूपये दिए जाते हैं। 25 ङट से ऊपर 300 रूपये तक का इंसेंटिव दिया जाता है, लेकिन इसमें बाइक की सर्विसिंग और टायर घिसने का भारी खर्च शामिल नहीं होता। 30 ङट की दूरी पर 215 रूपये मिलते हैं।</p>
<p><strong>मल्टी-स्टोरी बिल्डिंग में वक्त का नुकसान</strong><br />मल्टी-स्टोरी अपार्टमेंट्स में लिफ्ट का इंतज़ार और चौथी-पांचवीं मंजिल तक डोर-स्टेप डिलीवरी करने में 15-20 मिनट अतिरिक्त लग जाते हैं। इसका अलग से कोई पैसा नहीं मिलता। यदि एक ही ग्राहक एक ही समय पर एक ही पते के लिए दो अलग-अलग ऑर्डर कर देता है, तो डिलीवरी पार्टनर को नुकसान उठाना पड़ता है क्योंकि सिस्टम इसे एक ही ट्रिप मानकर भुगतान करता है।</p>
<p><strong>साइकिल पर 'सपनों' रात में डिलीवरी खतरों से कम नहीं</strong><br />कोटरी निवासी हिमांशु की दिनचर्या संघर्ष की मिसाल है। दोपहर में पढ़ाई करने के बाद, हिमांशु शाम 4 से रात 2 बजे तक एक कंपनी में ग्रोसरी सप्लाई का काम करते हैं। वे कोटरी से लैंडमार्क तक रोजाना 6 किमी साइकिल चलाकर आते हैं ताकि पेट्रोल के पैसे बचा सकें। हिमांशु के पिता लोडिंग ऑटो पर हेल्पर हैं, इसलिए घर की माली हालत सुधारने के लिए उन्होंने यह रास्ता चुना है। रात के अंधेरे में साइकिल से ऑर्डर पहुँचाने में ज़रा भी देरी होने पर उन्हें मैनेजमेंट की डांट और आर्थिक पेनल्टी दोनों झेलनी पड़ती है। हिमांशु कहते हैं, "साइकिल से मेहनत बहुत होती है, लेकिन बचत भी तो करनी है।" यह कहानी कोटा के उस कड़वे सच को दर्शाती है जहाँ एक छात्र को शिक्षा के लिए अपनी रातों की नींद और सुकून दांव पर लगाना पड़ रहा है।</p>
<p><strong>गर्मी में ज्यादा परेशानी</strong><br />सड़क सुरक्षा के नियमों के तहत सुरक्षा के लिए हेलमेट जरूरी होता है। लेकिन इस धूप में यह कूकर की तरह बन जाता है। पसीने की बूंदें आंखों में जाने लगती है। पर हर सेकण्ड़ एक्सीलेटर पर जमा हाथ व सामने लगे मोबाईल की स्क्रीन पर चल रहा पर हाथ हैंडल नहीं छोड़ सकते क्योंकि 'रेटिंग' गिरने का खतरा रहता है।</p>
<p><strong>जहां छांव व पानी मिले वही ऑफिस</strong><br />शहर की कंक्रीट की सड़के तो क्या हवा भी आग के गोले जैसी लगती है। पेड़ की छांव ही इनका एकमात्र ऑफिस है, शहर की गली नुक्कड पर लगे पानी के प्याऊ और पीने के पानी के लिए भी इन्हें ग्राहकों या होटलों पर निर्भर रहना पड़ता है।<br />राजस्थान ने गिग वर्कर्स एक्ट 2023 बना तो दिया लेकिन धरातल पर उसकी कोई प्रभावी सुरक्षा दिशा में कदम तो बढ़ाया है, लेकिन धरातल पर सुधार तब दिखेगा जब कंपनियां 'पेट्रोल खर्च' और 'वेटिंग टाइम' का उचित मुआवजा देंगी।<br /><strong>- महेन्द्र सुमन , डिलीवरी मैन</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 13 May 2026 15:21:51 +0530</pubDate>
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