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                <title>industrial oil - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title> कोटा के फेफड़ों को चाट रहा थर्मल का काला धुंआ, पांच किलो मीटर तक बुरा असर</title>
                                    <description><![CDATA[वर्ल्ड क्लास स्टैंडर्ड के सामने लाचार हुई कोटा थर्मल की पुरानी तकनीक, सीपीसीबी मानकों के आसपास भी नहीं ।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/thermal-plant-s-black-smoke-ravages-kota-s-lungs/article-154945"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-05/1111200-x-600-px)-(3)56.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोटा में थर्मल से उड़ती राख और धुंए का तांडव जारी है। हजारों लोग दिन रात खतरनाक प्रदूषित हवा फेफड़ों में भर रहे हैं। लेकिन जहरीली सल्फर को रोकने वाले एफजीडी सिस्टम के लिए अभी भी 2027 तक शहर का दम घुटता रहेगा। चंबल नदी के मुहाने पर स्थित कोटा सुपर थर्मल पावर स्टेशन से निकलने वाला जहरीला धुआं और 'फ्लाई ऐश' यहां की आबोहवा में लगातार जहर घोल रही है।हाल ही में लगातार उठते घने धुएं के बाद राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीम ने मई के पहले सप्ताह में ही प्लांट का औचक निरीक्षण किया। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की क्षेत्रीय अधिकारी और थर्मल प्रबंधन से हुई बातचीत में जो सच सामने आया है, वह डराने वाला है।</p>
<p><strong>मॉडिफिकेशन महंगा, चिमनियों से उगलता रहेगा जहर</strong><br />प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, कोटा थर्मल की अधिकांश इकाइयां पुरानी तकनीक पर आधारित हैं । उनमें मॉडिफिकेशन करना तकनीकी रूप से असंभव हो चुका है। आज के समय में भारत सरकार और सीपीसीबी के पर्यावरण मानक अत्यधिक सख्त और विश्व स्तरीय हो चुके हैं। यही वजह है कि थर्मल की पुरानी इकाइयां चाहकर भी इन कड़े पैरामीटर्स को अचीव नहीं कर पा रही हैं,और लगातार तय मानकों से अधिक धुआं और राख उगल रही हैं।</p>
<p><strong>ईएसपी सिस्टम हुआ फेल</strong><br />यूनिट 1-4 में लगे इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर हवा में धूल रोकने के लिए बनाए गए थे, लेकिन वे केवल 150ेॅ प्रतिघन मीटर उत्सर्जन के हिसाब से ही डिजाइन हैं। जबकि नया सरकारी नियम100 ेॅ/क्यूबीक मीटर का है। इसकी डेडलाइन 31 दिसंबर 2020 को ही खत्म हो चुकी है।</p>
<p><strong>चंबल पर तापीय प्रहार</strong><br />कोटा बैराज से हर घंटे 1,20,000 घन मीटर पानी खींचने वाली यूनिट 1 से 5 में आज भी 'ओपन साइकिल कूलिंग प्रणाली' चल रही है। बिना ठंडा किए उबला हुआ गर्म पानी और कारखाने का तेल चंबल में मिलने से घड़ियालों और मछलियों का दम घोट रहा है। इसी लापरवाही पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (ठॠळ) भी भारी जुर्माना लगा चुका है।</p>
<p><strong>प्रदूषण को रोकने के लिए चल रहे दो बड़े प्रोजेक्ट्स की लाइव स्टेटस </strong><br />चंबल नदी में जाने वाले गंदे और गर्म पानी को रिसाइकल करने के लिए बन रहे ईटीपी प्लांट का इंस्टॉलेशन लगभग पूरा हो चुका है। प्रदूषण बोर्ड के अनुसार, इसी चालू महीने में इसकी कमीशनिंग पूरी हो जाएगी, जिससे पानी के प्रदूषण में कुछ कमी आएगी। 'फ्लू गैस डीसल्फराइजेशन' या 'धुंआ गैस गंधक-मुक्ति' कहा जाता है।<br />यह एक प्रमुख प्रदूषण नियंत्रण तकनीक है जिसका उपयोग थर्मल पावर प्लांट (कोयला आधारित बिजली संयंत्रों) की चिमनी से निकलने वाली गैसों से जहरीली सल्फर डाइऑक्साइड गैस को हटाने के लिए किया जाता है। महत्वपूर्ण एफजीडी प्लांट का काम बेहद कछुआ गति से चल रहा है। जो काम साल 2022 में पूरा होना था। अधिकारियों के अनुसार उसे पूरी तरह चालू होने में अब साल 2027 तक का लंबा समय लगेगा। यानी एक साल से ज्यादा समय तक शहर को सल्फर के धुएं से राहत नहीं मिलने वाली।</p>
<p><strong>हवा का लाइव एक्स-रे मानक से ढाई गुणा तक ज्यादा</strong><br />विगत वर्षों के प्रदूषण का वार्षिक विश्लेषण प्रदूषण बोर्ड के लाइव एयर मॉनिटरिंग स्टेशनों (फायर स्टेशन, श्रीनाथपुरम) से मिले ये आधिकारिक आंकड़े कोटा की हवा का कड़वा सच बयां कर रहे हैं। सीपीसीबी के अनुसार हवा में सबसे खतरनाक तत्वों का सुरक्षित राष्ट्रीय वार्षिक मानक नाइट्रोजन डाइऑक्साइड महज होना चाहिए, लेकिन कोटा की हकीकत नीचे दी गई तालिका में साफ देखी जा सकती है। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (ठड2) 40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के मुकाबले 30 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है जो 2017 में 24.11 से संवेदनशील गति से लगातार बढ़ रहा है।वहीं हवा में पार्टिकुलेट मैटर 147 के आसपास दर्ज किया गया है। जो कि वर्ष 2017 के मुकाबले सुधरा है लेकिन अभी भी मानक 60 के मुकाबले ढाई गुणा ज्यादा है। वही हवा में लगातार सल्फर डाई आक्साईड की मात्रा भी बढ रही है। 2017 में यह 6.5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से बढकर अप्रेल मई में तक 8माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया है।</p>
<p><strong>पांच किलो मीटर तक बुरा असर</strong><br />कोटा थर्मल का प्रदूषण करीब पांच किलोमीटर तक बुरा असर डालता है। विकसित देशों में थर्मल बंद कर दिए गए हैं हालांकि विकासशील देशों में यह चल रहे है। स्टडी के अनुसार कोटा में प्रदूषण का सबसे बड़ा कारक क्लीयर कट थर्मल है। इसके बाद इंडस्ट्री और तीसरे नम्बर पर व्हीकल से पॉल्यूशन फैल रहा है। जब जब स्टडी की गई पांच किलोमीटर में पीएम का स्तर 2.5 मिला है।<br /><strong>-डा. केवल कृष्ण डंग विशेषज्ञ चिकित्सक अस्थमा केयर</strong></p>
<p><strong>अब बंद करने का ही विकल्प</strong><br />केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (उएअ) सीपीसीबी ने पहले ही कहा हैकि कोटा थर्मल की यूनिट 1 से 5 पूरी तरह अक्षम हो चुकी हैं। जिन्हें चरणबद्ध तरीके से बंद करना चाहिए।<br /><strong>- तपेश्वर सिंह भाटी पर्यावरण एक्टीविस्ट,अधिवक्ता।</strong></p>
<p>छतों पर बैठना और सोना तो दूर कपडे तक सुखाना बंद कर दिया है। घर के रोशनदानों में आठ दिन में ही काली परतें जम जाती है। लोगों की मजबुरी है कि मेहनत से बसाये आशियानों को छोडकर कहीं जा भी नहीं सकते।<br /><strong>-शिवराज सिंह यदुवंशी</strong></p>
<p>दमें से परेशानी होती है थर्मल का धुंआ जिस दिन हमारे आशियाने की और हो जाता है उस रात तो मानों सांसे पुरी तरह उखड़ जाती है। आस पडौस में हर कोई खांसता नजर आता है।<br /><strong>-जमील मोहम्मद अंसारी रिटायर्ड डिप्टी डायरेक्टर पशुपालन विभाग</strong></p>
<p>हमारी टीम हमेशा मॉनिटरिंग करती रहती है। अभी मई के प्रथम सप्ताह में भी हमने सेम्पलिंग की थी। यह बात तो है कि थर्मल की इकाईयां पुरानी है।<br /><strong>-योग्यता सिंह क्षेत्रीय अधिकारी प्रदुषण बोर्ड</strong></p>
<p>प्रति युनिट फाईन देने से बढिया है कि पुरानी हो चुकी इकाइयों को बन्द करके कोटा के पर्यावरण को बर्बाद होने से बचाया जाए। क्लाईमेंट चैंज के लिये कोयला आधारित प्लान्ट ही सबसे बडा कारण है। 2026 तक यहां के प्रशासन ने थर्मल की पुरानी दो युनिटों को बन्द करने का आश्वासन दिया था अब इसे पुरा करें।<br /><strong>- डॉ. सुधीर गुुप्ता पर्यावरण एक्टीविस्ट हम लोग</strong></p>
<p> हमारे यहां सभी मानको के आधार पर प्लान्ट चलाये जाते है। यहां पर ईटीपी प्लान्ट तैयार हो गया है जल्द ही इसे कमीशनिंग कर दिया जायेगा। 2027 तक एफजीडी का काम भी पुरा होने की संभावना है। जिससे पर्यावरण को काफी लाभ मिलेगा।<br /><strong>- शिखा अग्रवाल चीफ इंजिनियर कोटा थर्मल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 25 May 2026 15:25:46 +0530</pubDate>
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