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                <title>बॉटनीकल गार्डन में फायर लाइन के नाम पर 38 लाख का घोटाला, जानें पूरा मामला </title>
                                    <description><![CDATA[कोटा वनमंडल के अधिकारियों ने मिलीभगत से सरकारी धन का किया गबन।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/38-lakh-scam-in-botanical-garden-under-the-guise-of--fire-lines/article-155836"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-06/8888.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोटा वन मंडल द्वारा 40 हैक्टेयर में बनाए गए बॉटनिकल गार्डन में फायर लाइन के नाम पर 38 लाख रुपए खर्च का सनसनीखेज मामला सामने आया है। जमीन पर फायर लाइन बनी ही नहीं लेकिन कागजों में बनाकर बजट उठा लिया गया। इतना ही नहीं ठेकेदारों को भुगतान करना भी बता दिया गया।दरअसल, बॉटनिकल गार्डन लाडपुरा रेंज की सकतपुरा वनखंड में आता है, जो पूर्णत: पठारी पथरीला क्षेत्र है। यहां कुछेक ही ऊंचे वृक्ष मौजूद हैं, शेष संपूर्ण क्षेत्र नंगी चट्टानें और घास फूस और कंटीली झाड़ियां ही है। हालांकि, यहां बिजली पावर ग्रिड भी हैं, जिनके नीचे व आसपास पाथ-वे बने हुए, जिन पर गिट्टियां व ग्रेवल बिछा हुआ है। यदि, पावर ग्रिड से चिंगारी भी गिरे तो आग लगने की संभावना नहीं रहती है। वहीं, पूर्व में बड़ी आगजनी घटना की कोई हिस्ट्री भी नहीं रही है। वन विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे पठारी नंगी चट्टानी क्षेत्र में फायर लाइन का निर्माण करने का निर्णय ही तकनीकी मापदंडों का उल्लंघन है। जबकि, पूरे गार्डन में लंबे चौड़े निरीक्षण पथ बने हुए हैं, जो स्वत: ही फायर लाइन का काम करते हैं।</p>
<p><strong>कागजों में फायर लाइन, धरातल से गायब</strong><br />नवज्योति के हाथ लगे दस्तावेजों के अनुसार, वन मंडल की लाडपुरा रेंज के सकतपुरा वनखंड में 134.50 लाख की लागत से बोटनीकल गार्डन का निर्माण किया गया। जिसमें 28 प्रकार के कार्य करवाए जाना बताया गया है। गार्डन में मौजूद पेड़-पौधों को आग से बचाने के लिए झाड़-झाड़ियां साफ कर फायर लाइन (अग्नि रोक मार्ग) बनाया जाना बताया गया है। जबकि, बॉटनीकल गार्डन में पीछे व चौकीदार रूम की तरफ बड़ी मात्रा में सूखी झाड़ियां है, जिन्हें न तो साफ करवाया गया और न ही उनके बीच फायर लाइन बनाई गई। जबकि, यहां 6 निरीक्षण पथ यानी पाथ-वे (रास्ते) 3 मीटर चौड़े बने हुए हैं। जिस पर कई जगहों पर ग्रेवल तो कहीं जगहों पर गिट्टियां बिछी है। असल, में फायर लाइन सिर्फ कागजों में है और धरातल से गायब है।</p>
<p><strong>इस तरह से हुआ 38 लाख का गबन</strong><br />वित्तिय वर्ष 2025-26 की समाप्ति तक कोटा डीएफओ द्वारा सीसीएफ को लिखे पत्र में कागजों में बॉटनीकल गार्डन में कुल 38 लाख की लागत से तीन स्तर पर फायर लाइन बनवाना बताया है। इनमें झाड़-झाड़ियों की सफाई कर फायर लाइन बनाने के लिए कुल 28 लाख रुपए चार्ज किए हैं। जिसमें से मार्च माह तक 20 लाख 24 हजार 264 रुपए का भुगतान संवेदक को किया जाना बताया है। जबकि, शेष 7 लाख 75 हजार 736 रुपए का भुगतान करने के लिए विभाग से बजट मांगा है। वहीं, कंट्रेक्शन आॅफ फायर लाइन-1 वर्क-करवाने के नाम पर 5 लाख रुपए का भुगतान करना भी दर्शाया है। जबकि, कंट्रेक्शन आॅफ फायर लाइन-2 वर्क करवाने के 5 लाख का भुगतान करना शेष बताया है। इस तरह से फायर लाइन के नाम पर दो माह पहले तक कुल 25,24264 रुपए का भुगतान कर दिया और शेष 12 लाख 75 हजार 736 रुपए का भुगतान के लिए बजट मांगा।</p>
<p><strong>40 हैक्टेयर को ही फायर लाइन बना दें तो भी खर्च नहीं होते 38 लाख</strong><br />नाम न छापने की शर्त पर आईएफएस ऑफिसर्स ने बताया कि हर काम के लिए सरकार ने बीएसआर दर तय की हुई है। जिसमें फायर लाइन की दर 4.55 रुपए प्रति स्क्वायर मीटर है। यदि, पूरे 40 हैक्टेयर के बॉटनीकल गार्डन को सपाट मैदान बना दिया जाए तो भी 38 लाख रुपए की लागत से फायर लाइन नहीं बन सकती। क्योंकि, 40 हैक्टेयर में 4 लाख स्क्वायर मीटर होता हैं, जिसे बीसीआर रेट 4.55 रुपए प्रति स्क्वायर मीटर से गुणा करें तो 18 लाख 20 हजार रुपए का ही खर्चा होगा, तब भी 38 लाख रुपए खर्च नहीं होंगे।</p>
<p><strong>क्या होती है फायर लाइन</strong><br />जंगल में फायर लाइन एक चौड़ा कच्चा रास्ता या बड़ी पगडंडी को कहते हैं, जो आग रोकने के लिए बनाई जाती है। वन भूमि पर मौजूद सभी वनस्पतियों, झाड़ियों को साफ करके जमीन को खुला छोड़ दिया जाता है। इस लाइन के दो फायदे होते हैं, पहला ये कि जंगल में भीषण आग लगने के दौरान ये एक हिस्से से दूसरे हिस्से में आग फैलने नहीं देती और दूसरा ये कि इसी चौड़े रास्ते (फायर लाइन) के सहारे दमकल विभाग और वनकर्मी आग बुझाने वाले उपकरणों के साथ अंदर प्रवेश कर सकते हैं।</p>
<p><strong>क्या कहते हैं विशेषज्ञ</strong><br />फायर लाइन घने जंगल में पेड़ों को आग से बचाव के लिए बनाया जाता है। यदि बॉटनीकल गार्डन में पहले से ही निरीक्षण पथ बने हुए हैं तो यहां फायर लाइन बनाने की आवश्यकता नहीं होती। क्योंकि, निरीक्षण पथ (रास्ते) ही फायर लाइन का ही काम कर रहे होते हैं।<br /><strong>-सतीश कुमार, रिटायर्ड एसीएफ वन विभाग</strong></p>
<p>अभेड़ा बॉटनिकल गार्डन में वैसे तो फायर लाइन बनाई ही नहीं गई, केवल कागजों में बताकर 38 लाख का भुगतान उठाया गया है। जबकि, वन अफसर 1200 रनिंग मीटर लंबी और 3 मीटर चौड़ी फायर लाइन बनाने की बात कह रहे हैं, जिसे भी मान लिया जाए तो भी यह अधिकतम 3600 स्क्वायर मीटर की होगी, जिसकी लागत लागू बीएसआर दर 4.55 रुपए प्रति स्क्वायर मीटर के हिसाब से 20 हजार रुपए से अधिक की नहीं हैं। इसके बावजूद सरकार की आंखों में धूल झौंक लाखों का गबन कर दिया गया। आश्चर्य तो यह है, यहां पहले से ही पाथ-वे बने हुए हैं, जो सम्पूर्ण 40 हैक्टेयर के क्षेत्र को कई भागों में विभाजित करने के साथ फायर लाइन का काम भी करते हैं। असल में खेल पाथ-वे को ही फायर लाइन बताकर 38 लाख रुपए का राजकोष से भुगतान कर गबन किया गया, यह राशि संबधित अधिकारियो से वसूलनीय हैं।<br /><strong>-तपेश्वर सिंह भाटी, पर्यावरणविद् एवं एडवोकेट</strong></p>
<p>मेरे समय वित्तिय वर्ष 23-24 में ही बॉटनिकल गार्डन में निरीक्षण पथ, पौधे लगाने के लिए ब्लॉक व इको टेल बना लिए गए थे।<br /><strong>- कुंदन सिंह, तत्कालीन रेंजर लाडपुरा रेंज</strong></p>
<p>बोटनीकल गार्डन 40 हैक्टेयर में बनाया गया है। जहां 1200 रनिंग मीटर लंबी फायर लाइन बनाई गई है। इसकी लागत के बारे में तो डीएफओ की परमिशन के बिना नहीं बता सकते। यहां पाथ-वे भी बने हुए हैं, जिसका उपयोग पौधों को पानी पिलाने के लिए वाहनों के आने-जाने के लिए होता है।<br /><strong>-अनिरुद्ध कुमार, सहायक वन संरक्षक, कोटा वनमंडल</strong></p>
<p>गार्डन में 1200 रनिंग मीटर लंबी और 3 मीटर चौड़ी फायर लाइन बनाई गई है, जो करीब 5 लाख रुपए की लागत से बीएसआर रेट के अनुसार बनाई गई है। पाथे-वे यानी निरीक्षण पथ भी फायर लाइन का ही काम करते हैं। हालांकि, पहले 2100 से 2200 रनिंग मीटर बनानी थी लेकिन बजट नहीं मिलने के कारण जितना बजट उपलब्ध था, उतने में ही यह फायर लाइन बनाई।<br /><strong>-इंदे्रश सिंह यादव, क्षेत्रिय वन अधिकारी रेंज लाडपुरा</strong></p>
<p>मैं अभी छुट्टी पर हूं, बिना देखे कुछ कह नहीं सकता। इस संबंध में आप सहायक वन संरक्षक (एसीएफ) से बात करते हैं, अभी उनके पास चार्ज है।<br /><strong>-अपूर्व कृष्ण श्रीवास्तव, डीएफओ कोटा वन मंडल</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 14:27:37 +0530</pubDate>
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