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                <title>अमिताभ बच्चन का खुलासा : काम की वजह से सो नहीं पाते अभिनेता, कहा- संगीत से मिलता है सुकून</title>
                                    <description><![CDATA[अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग में नींद की समस्या और काम के दबाव पर खुलकर बात की। जिम्मेदारियों के चलते वह अक्सर पूरी रात जागते, डॉक्टर 7 घंटे नींद की सलाह देते हैं। बिग बी ने काम को प्राथमिकता दी, शांति के लिए क्लासिकल म्यूजिक को राहत बताया।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/movie-fun/amitabh-bachchan-reveals-that-he-is-unable-to-sleep-due/article-153550"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-05/1111200-x-600-px)-(3)24.png" alt=""></a><br /><p>मुंबई। बॉलीवुड अभिनेता अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग में देर रात तक जागने और नींद की समस्या को लेकर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि काम के दबाव के कारण वह अक्सर पूरी रात जागते रहते हैं, जबकि डॉक्टर अच्छी सेहत के लिए कम से कम 7 घंटे की नींद लेने की सलाह देते हैं।</p>
<p>बिग बी ने मंगलवार सुबह करीब 4:14 बजे ब्लॉग लिखते हुए कहा कि उनके लिए काम नींद से ज्यादा महत्वपूर्ण है, भले ही मेडिकल साइंस इसे सही न मानता हो। उन्होंने लिखा कि शरीर की मरम्मत और विकास नींद के दौरान होता है, लेकिन जिम्मेदारियों के कारण वह आराम नहीं कर पाते।</p>
<p>इस बेचैनी से राहत पाने के लिए अमिताभ क्लासिकल म्यूजिक सुनते हैं। उन्होंने स्लाइड गिटार और सितार की मधुर धुनों को आत्मा के लिए सबसे बड़ा सुकून बताया। उनके अनुसार, संगीत इंसान को भीतर से शांति और ईश्वर से जुड़ाव का एहसास कराता है।</p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>मूवी-मस्ती</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 12 May 2026 15:09:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
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                <title>जयपुर में MINI Cooper S 'विक्ट्री एडिशन' का भव्य आगाज़: BMW इंडिया 1 अप्रैल से बढ़ाएगा 2 प्रतिशत तक दाम</title>
                                    <description><![CDATA[BMW ग्रुप इंडिया ने जयपुर से MINI विक्ट्री एडिशन को राष्ट्रीय स्तर पर लॉन्च किया है। CEO हरदीप सिंह बराड़ ने स्टाइल और परफॉरमेंस के इस बेजोड़ संगम का अनावरण किया। साथ ही, कंपनी ने 1 अप्रैल से अपनी पूरी रेंज की कीमतों में 2% बढ़ोतरी की घोषणा की है, जिससे लग्जरी कारों के शौकीनों पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/grand-launch-of-mini-cooper-s-victory-edition-in-jaipur/article-147078"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/bmw.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। लग्जरी कार निर्माता कंपनी BMW ग्रुप इंडिया ने गुरुवार को प्रदेश की राजधानी जयपुर में अपनी प्रतिष्ठित ब्रांड MINI के विशेष 'विक्ट्री एडिशन' (Victory Edition) को राष्ट्रीय स्तर पर लॉन्च किया। इस लॉन्च के साथ ही प्रतिष्ठित मिनी ब्रांड ने राजस्थान के बाजार में अपनी भव्य उपस्थिति दर्ज कराई है।</p>
<p>जयपुर में BMW ग्रुप इंडिया के प्रेसिडेंट और CEO  हरदीप सिंह बराड़ ने नई MINI Cooper S विक्ट्री एडिशन का अनावरण किया। उन्होंने बताया कि यह एडिशन न केवल अपनी परफॉर्मेंस के लिए जाना जाता है, बल्कि यह स्टाइल और आधुनिकता का एक बेजोड़ संगम है। बराड़ ने कहा, "राजस्थान हमारे लिए एक उभरता हुआ महत्वपूर्ण बाजार है और जयपुर से इस नेशनल लॉन्चिंग की शुरुआत करना हमारे लिए बेहद खास है।"</p>
<p><strong>ग्राहकों की जेब पर बढ़ेगा बोझ</strong></p>
<p>लॉन्च के साथ ही कंपनी ने ग्राहकों के लिए एक महत्वपूर्ण घोषणा भी की है। BMW इंडिया आगामी 1 अप्रैल 2026 से भारत में अपने संपूर्ण मॉडल रेंज की कीमतों में 2 फीसदी तक की बढ़ोतरी करने जा रही है। कंपनी के अनुसार, बढ़ती इनपुट लागत और परिचालन खर्चों के कारण यह निर्णय लिया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जो ग्राहक लग्जरी कार खरीदने की योजना बना रहे हैं, उनके लिए मार्च का महीना खरीदारी का सबसे सही समय साबित हो सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बिजनेस</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 19 Mar 2026 18:10:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>तेज रफ्तार जिंदगी पर लगाम की जरूरत, सोशल मीाडिया और रील कल्चर हिला रहा दिमाग</title>
                                    <description><![CDATA[बच्चों की नहीं पैरेन्ट्स की काउंसलिंग होनी चाहिए। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-fast-paced-life-needs-to-be-curbed--social-media-and-reel-culture-are-disrupting-minds/article-129169"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/copy-of-news-(15)2.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। दैनिक नवज्योति कार्यालय में होने वाली मासिक परिचर्चा की श्रंखला में बुधवार को मानसिक स्वास्थ्य सप्ताह के तहत मानसिक स्वास्थ्य (मॉडर्न लाइफ स्टाइल एन्ड मेन्टल इनस्टेबिलिटी) विषय पर परिचर्चा की गई। परिचर्चा में हिस्सा लेने वाले प्रतिभागियों ने कहा कि यह मुद्दा भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक स्थितियों से जुड़ा मुद्दा है। तनाव, डिप्रेशन,  एंग्जाइटी,  नशा और अंत में पागलपन तक आदमी पहुंच जाता है।  संयुक्त परिवारों का विघटन ने इस समस्या को विस्तृत रूप दे दिया है। इसके साथ साथ आर्थिक असुरक्षा, प्रतिस्पर्धा, एकाकीपन, पारिवारिक तनाव, घरेलू हिंसा,और जागरुकता की कमी मुख्य कारण है। इसके साथ मॉर्डन लाइफ स्टाइल में सोशल मीडिया का रील कल्चर बड़ा कारण बन रहा है। अब बच्चा,किशोर, युवा बुजुर्ग सब एकाकीपन के शिकार होकर मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं। तेज रफ्तार जिंदगी ने सबकुछ उलट पुलट कर दिया है।   परिचर्चा में जहां सीनियर साइकेटिस्ट, न्यूरो, पीडियाट्रिक, फिजिशियन, न्यूट्रिशियन काउंसलर, डायटीशियन, रिसर्चर, आयुर्वेद, योगा,के साथ मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले ब्रहम्माकुमारी संस्थान,आर्ट आॅफ लिविंग और रामलाल जी सिहाग के संस्थान से जुडे सदस्यों ने भी हिस्सा लिया।  प्रस्तुत हैं परिचर्चा के अंश... </p>
<p><strong>एकांत में बैठकर खुद को जानने से कम होगा तनाव</strong><br />मानसिक बीमारियां व तनाव का कोई एक कारण नहीं है। परिवार के लोगों का बच्चों पर शुरुआत से ध्यान नहीं देना और उसका खान-पान सही नहीं होना। खेलने के लिए समय नहीं होने और पढ़ाई का बोझ और परिवार की बच्चों से बढ़ती अपेक्षाएं तनाव बढ़ाती है। जिससे मानसिक बीमारियां बढ़ती है। बच्चे अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर पाते हैं। जिससे गलत संगत में पढ़ने पर भी तनाव बढ़ता है। मैंटल हैल्थ पहले सरकार की प्राथमिकता में नहीं था। लेकिन अब इसे विश्व स्तर पर दिवस व सप्ताह के रूप में मानने से जागरूकता बढ़ी है। हालांकि इस तरह की बीमारियों की पहचान जितनी जल्दी हो सके उतना समय पर उपचार संभव है। वैसे एकांत में बैठकर खुद के बारे में जानने और कमियों को दूर करके भी मानसिक तनाव को कम किया जा सकता है।   <br /><strong>-डॉ. एम.एल. अग्रवाल सीनियर मेंटल हेल्थ काउंसलर , प्रेसिंडेंट होप सोसाइटी  </strong></p>
<p><strong>नींद क्वालिटी बिगड़ने से बढ़ रही मानसिक बीमारियां</strong><br />एकल परिवार होने से जहां माता पिता के पास बच्चों के लिए समय ही नहीं है। समय मिलता भी है तो वे बच्चों को डांटने के सिवाय कुछ नहीं करते। उन्हें पुचकारने वाला परिवार को कोई बड़ा सदस्य नहीं है। ऐसे में बच्चे अपना अधिकतर समय टीवी या मोबाइल पर बिताने लगे है। जिससे अधिक समय स्क्रीन पर रहने से बच्चे हो या बड़े उनकी नींद क् वालिटी बिगड़ गई है। पर्याप्त नींद नहीं ले पाने से भी मानसिक तनाव व बीमारियां बढ़ रही है। 1990 के बाद इस तरह की बीमारियों के उपचार की बेहतर दवाएं उपलब्ध हैं लेकिन लोग भ्रम के कारण उनका सेवन नहीं कर पाते हैं। मानसिक तनाव व बीमारियों को कम करने के लिए परिवार को आपस में समय देना होगा।<br /><strong>-डॉ. विनोद कुमार दड़िया आचार्य एवं विभागाध्यक्ष मनोचिकित्सा मेडिकल कॉलेज </strong></p>
<p><strong>अपेक्षा व उपेक्षा के कारण बढ़ रहा तनाव</strong><br />वर्तमान में करीब 90 फीसदी लोग मानसिक तनाव व बीमारियों से ग्रसित है। सभी के  कारण अलग-अलग हो सकते हैं। मोबाइल  समय की जरूरत है। संयुक्त परिवार और कामकाजी तनाव जैसे सभी मुद्दे तो रहेंगे। उन पर नियंत्रण कैसे किया जिससे मानसिक स्वास्थ्य पर असर नहीं पड़े। लोग अपनी अपेक्षा बच्चों पर थोपते हैं। मैं कहता हूं कि बच्चों की नहीं पैरेन्ट्स की काउंसलिंग होनी चाहिए।  इस पर बात हो लेकिन परिवार का उस पर नियंत्रण रखना होगा। उम्र बढ़ने के साथ कई बार बीमारियां बढ़ती जाती है। घर में बुजुर्ग व बच्चों से सम्पर्क बनाए रखना होगा। ऐसा करने से सभी एक दूसरे की बातें व भावनाएं व्यक्त कर सकेंगे तो उनका तनाव कम होगा और बीमारियां भी नहीं होंगी।  अपेक्षा और उपेक्षा यह दो तनाव के बड़े कारण हैं।  इन दोनों से बचकर भी तनाव व बीमारियों को कम किया जा सकता है। <br /><strong>-डॉ. एस.एन. गौतम, आचार्य एवं विभागाध्यक्ष न्यूरो सर्जरी विभाग मेडिकल कॉलेज कोटा </strong></p>
<p><strong>मानसिक स्वास्थ्य हमारे जीवन का आधार</strong><br />मानसिक स्वास्थ्य हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है। यह केवल कार्य क्षमता का विषय नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित और उपयोगी बनाने की प्रक्रिया है।  मानसिक बीमारी किसी कमजोरी का संकेत नहीं है। लगभग 50 प्रतिशत मानसिक बीमारियों की शुरूआत 15 वर्ष की उम्र तक हो जाती है, जबकि 75 प्रतिशत 24 वर्ष तक पहुँच जाती हैं। वास्तव में मानसिक विकास मां के गर्भ से ही प्रारंभ हो जाता है और किशोरावस्था इसका सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है। मानसिक स्वास्थ्य की नींव घर से रखी जाती है। आज के दौर में एकल परिवारों के बढ़ने से बच्चों को दादा-दादी या नाना-नानी का भावनात्मक सहयोग नहीं मिल पाता, जिससे वे मानसिक रूप से कमजोर हो सकते हैं।  बच्चों का मानसिक, शारीरिक, भावनात्मक और यौन स्वास्थ्य समान रूप से सशक्त होना आवश्यक है।<br /><strong>-डॉ. अविनाश बंसल, नवजात शिशु एवं किशोर स्वास्थ्य विभाग, भारत विकास परिषद चिकित्सालय, कोटा</strong></p>
<p><strong>बच्चों से मित्रवत व्यवहार करना होगा</strong><br />परिवार में माता पिता जो खुद नहीं कर सके वह अपने बच्चों से पूरी करवाना चाहते हैं। जिससे उन पर मानसिक दबाव बढ़ने से वे तनाव में रहने लगते है। बच्चे अपनी भावनाएÞं परिवार में शेयर नहीं कर पाते। उनकी इच्छाओं को दबा दिया जाता है। जिससे तनाव और तनाव से मानसिक बीमारियां बढ़ती है। बच्चों से परिजनों को मित्रवत व्यवहार करना होगा। जिससे वे अपनी बात उनसे खुलकर कह सके। पैसा नहीं बच्चे सबसे बड़ा धन हैं। जिसने इसे प्रमुखता दी वहां तनाव व मानसिक बीमारियों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। <br /><strong>-डॉ. रोशनी मिश्रा, असिस्टेंट गवर्नर रोटरी क्लब कोटा राउंड टाउन </strong></p>
<p><strong>गर्भ संस्कार से श्रेष्ठ संतान का निर्माण होता है</strong><br />चार हजार साल पहले भी हमारे ऋषि-मुनियों ने बताया था कि श्रेष्ठ संतान का निर्माण गर्भ के भीतर ही होता है। हर माता-पिता स्वस्थ और संस्कारी संतान की इच्छा रखते हैं। गर्भावस्था में मां का आहार-विहार, विचार और भावनाएं सीधे बच्चे पर असर डालते हैं। पांचवें माह में गर्भ में मन का निर्माण होता है और छठे माह में बुद्धि का विकास शुरू होता है। ऐसे में मां यदि नकारात्मक या हिंसक विचार रखती है, नशे या मारधाड़ जैसी प्रवृत्तियों में रहती है, तो उसका प्रभाव गर्भस्थ शिशु के मन पर पड़ता है। आचार्य चरक ने स्मृति नष्ट होने को प्रज्ञा अपराध कहा, जो सभी रोगों की जड़ है।  प्रकृति स्वयं सबसे बड़ी चिकित्सक है। त्योहार, आहार और परंपराएं हमारे स्वास्थ्य से जुड़ी हैं।<br /><strong>-डॉ. नित्यानंद शर्मा, प्राचार्य, आयुर्वेद योग नेचुरोपैथी महाविद्यालय, कोटा</strong></p>
<p><strong>बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए स्नेह जरूरी</strong><br />आज के व्यस्त जीवन में माता-पिता दोनों के कार्यरत होने के कारण बच्चों का अकेलापन बढ़ता जा रहा है। बच्चों को माता-पिता से संवाद, स्नेह या ध्यान नहीं मिलता, तो वे वही अपनापन घर से बाहर तलाशने लगते हैं। संयुक्त परिवार की यही विशेषता रही है कि वहां बच्चों का न सिर्फ शारीरिक, बल्कि मानसिक विकास भी संतुलित रूप से होता है। परिवार के अन्य सदस्यों के बीच रहने से बच्चे को सामाजिक व्यवहार, अनुशासन और भावनात्मक सुरक्षा मिलती है। वहीं एकल परिवारों में माता-पिता की व्यस्तता के कारण बच्चे स्क्रीन तक सीमित होते जा रहे हैं। माता-पिता को चाहिए कि जब वे घर पर हों, तो बच्चों के साथ समय बिताएं, उनसे परिवार से जुड़ी बातें करें और उनकी इच्छाओं का सम्मान करें। <br /><strong>-डॉ. मिथिलेश खींची, मनोचिकित्सक, सहआचार्य,  मेडिकल कॉलेज कोटा</strong></p>
<p><strong>विजुअलाइजेशन से बढ़ेगा कॉन्संट्रेशन, बच्चे होंगे डिप्रेशन से दूर</strong><br />आज की जनरेशन मोबाइल के ज्यादा उपयोग से पढ़ाई से भटकती जा रही है।  मोबाइल को पूरी तरह दूर करना संभव नहीं है, लेकिन विजुअलाइजेशन तकनीक से इसका समाधान निकाला जा सकता है। बच्चे आंख बंद करके अपने लक्ष्य की कल्पना करें। जैसे परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करना या इंटरव्यू में आत्मविश्वास से उत्तर देना। इससे मानसिक एकाग्रता बढ़ती है और भय दूर होता है। एक छात्र ने बताया कि लगातार सिगरेट छोड़ने की कोशिश के बाद विजुअलाइजेशन अपनाने के बाद धीरे-धीरे कम करने के बाद छोड़ दी। कई छात्रों ने इस तकनीक से मोबाइल की लत भी छोड़ दी है। कुछ ने तो विजुअलाइजेशन की मदद से अपने सपनों की फील्ड, जैसे डेंटल कॉलेज में प्रवेश भी पाया। बच्चों को सकारात्मक विजुअलाइजेशन अपनाना चाहिए, जिससे वे तनाव और डिप्रेशन से दूर रह सकें।<br /><strong>-डॉ. समर्थ उपाध्याय, फिजिशियन, यूसीएचसी, विज्ञान नगर, कोटा</strong></p>
<p><strong>अपने अंदर की शक्ति को पहचानना आवश्यक</strong><br />मनुष्य के जीवन में सबसे बड़ी शक्ति उसके अंदर ही छिपी होती है। मेडिटेशन वह माध्यम है जो हमारे अशांत मन को शांत करता है। जब मन शांत होता है, तभी हम अपने अंदर की शक्ति से जुड़ पाते हैं। यह जुड़ाव मन की चार्जिंग के समान है। यदि हमारा मन सकारात्मक विचारों से भरा होगा तो हमारे चारों ओर सकारात्मक वाइब्रेशन फैलेंगे, और यदि मन नकारात्मक रहेगा तो नकारात्मक ऊर्जा ही उत्पन्न होगी। आज डॉक्टर भी मेडिटेशन को मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक बता रहे हैं, क्योंकि मन से वाइब्रेशन निकलते हैं जो हमारे शरीर और वातावरण को प्रभावित करते हैं। जब हम पॉजिटिव थॉट्स देते हैं, तो हमारा मन मजबूत और पावरफुल बनता है।  मेडिटेशन हमें यह समझने में मदद करता है कि कब धैर्य रखना है और कब कर्म करना है—यही आत्मज्ञान की दिशा है।<br /><strong>-ब्रह्माकुमारी उर्मिला दीदी, सेवाकेंद्र प्रभारी, कोटा संभाग</strong></p>
<p><strong>मोटिवेशन के साथ मेडिटेशन जरूरी</strong><br />वर्तमान में जिस तरह की प्रतिस्पर्धा एक दूसरे में बढ़ती जा रही है। वह तनाव का बड़ा कारण है। सही खानपान नहीं होना और पर्याप्त नींद नहीं आना भी मानसिक तनाव व बीमारियों को बढ़ाने का कारण है। ऐसे में तनाव व मानसिक बीमारियों को कम करने के लिए मोटिवेशन के साथ ही मेडिटेशन भी जरूरी है। व्यक्ति के शरीर के अंदर की जो शक्ति है उसे कुंडलिनी के माध्यम से जागृत किया जाता है। जिससे एक बिन्दु पर ध्यान केन्द्रित होने पर अन्य जगह से ध्यान हटने पर तनाव व मानसिक बीमारियों से बचा जा सकता है। <br /><strong>-राजेश गौतम, प्रेस सचिव आध्यात्म विज्ञान सत्संग केन्द्र </strong></p>
<p><strong>बच्चों को चाहिए बचपन, ना कि  सुविधाएं</strong><br /> रूट कॉस्ट यानी समस्या की जड़ पर बात बहुत कम लोग करते हैं। अक्सर बच्चे घर में रहकर भी अकेलापन महसूस करते हैं। माता-पिता से दूरी बढ़ने के कारण वे बाहरी दुनिया में अपनापन तलाशने लगते हैं। बच्चों को केवल सुविधाएं नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा और ध्यान की जरूरत होती है। उन्हें रियल स्टोरी या जीवन की सच्ची घटनाओं से समझाया जाए, तो वे चीजों को बेहतर तरीके से महसूस करते हैं। पहले दादा-दादी की सीख और स्नेह बच्चों की मानसिक मजबूती का आधार थे, पर अब वह कमी साफ झलकती है। हमें समस्या के मूल पर कामकरने की जरूरत है। <br /><strong>-रिद्धिमा नरसिंघानी,  स्टूडेंट आयुर्वेद योग नेचुरोपैथी महाविद्यालय</strong></p>
<p><strong>मानसिक स्वास्थ्य में योग का महत्व</strong><br />लगातार समय की कमी, काम का दबाव और सामाजिक अपेक्षाएं व्यक्ति को मानसिक थकान और तनाव की ओर ले जाती हैं। ऐसे में योग एक अत्यंत प्रभावी और आवश्यक साधन बनकर उभरता है। योग केवल शारीरिक स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि मानसिक और भावनात्मक संतुलन भी प्रदान करता है। यह तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याओं को कम करने में मदद करता है और जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाता है। योग में मानसिक स्वास्थ्य के लिए कई प्राणायाम उपयोगी माने गए हैं।  नियमित अभ्यास से मानसिक शांति, ऊर्जा और समग्र स्वास्थ्य में सुधार होता है। योग आधुनिक जीवन के लिए एक सशक्त और संतुलित जीवन का आधार है।<br /><strong>-निमीषा कसेरा, योग प्रशिक्षक,कोटा </strong></p>
<p><strong>असुरक्षा मतलब मानसिक तनाव</strong><br /> बाहरी नकारात्मक परिस्थितियां केवल तभी हमारे स्वास्थ्य पर असर डालती हैं, जब हम अंदर से कमजोर होते हैं। ठीक उसी तरह जैसे पानी में तैरता जहाज तब डूबता है जब पानी उसके अंदर चला जाता है, हमारी मानसिक स्थिति भी तभी प्रभावित होती है जब हम अंदर से असुरक्षित हों। युवाओं के संदर्भ में, विशेषकर नीट और आइआइटी की तैयारी कर रहे कोटा के छात्र, माता-पिता की जिम्मेदारी अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। मानसिक स्वास्थ्य की मजबूती और सकारात्मक सोच ही बच्चों की सफलता और संतुलित जीवन की कुंजी है।<br /><strong>-दीपक शर्मा, काउंसलर एवं आर्ट आॅफ लिविंग प्रशिक्षक, कोटा</strong></p>
<p><strong>सोशल मीडिया से दूरी जरूरी</strong><br />माता-पिता दोनों के कामकाजी होने के कारण बच्चों का अधिकांश समय आया के साथ बीतता है। ऐसे में उनके भीतर सही संस्कारों का विकास होता था। न्यूक्लियरी फैमिली में बच्चों का ध्यान सोशल मीडिया की ओर अधिक बढ़ रहा है, जिससे एकाग्रता और भावनात्मक संतुलन प्रभावित हो रहा है। मानसिक शांति और संतुलन के लिए ध्यान लगाना आवश्यक है। मनुष्य के जीवन में सबसे बड़ी शक्ति उसके अंदर ही छिपी होती है। हमें अपने भीतर की पॉवर को जानना और अपनी विकृतियों को पहचानना होगा। तभी बच्चों में संस्कार मजबूत होंगे और वे मानसिक विकृतियों से दूर रहेंगे।<br /><strong>-अंशुल मेहंदीरत्ता, अधीक्षक नारी निकेतन, कोटा</strong></p>
<p><strong>प्रारम्भिक शिक्षा में शामिल हो ध्यान</strong><br />मानसिक बीमारियों का सबसे बड़ा कारण ही तनाव है। तनाव बच्चे से लेकर बड़े सभी को अलग-अलग कारणों से हो सकता है। परिवार में एक दूसरे के लिए समय नहीं है। ऐसे में लोग अपनी बात कहने के लिए दूसरों का सहारा लेते हैं। लेकिन उससे मन शांत नहीं हो सका। ध्यान व सुदर्शन क्विया मन को शांत करने के साथ ही तनाव को कम करती है। ध्यान करने से मन में अच्छे विचार आते है। जब अच्छे विचार आएंगे तो सकारात्मकता बढ़ेगी। इसलिए आवश्यक है कि ध्यान को प्रारम्भिक शिक्षा में शामिल किया जाए। <br /><strong>-योगेन्द्र हरसोरा, अपेक्स मैंबर आर्ट आॅफ लिविंग </strong></p>
<p><strong>मानसिक स्वास्थ्य पर डाइट का सीधा असर</strong><br />जैसा खाए अन्न, वैसा होय मन यह कहावत आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में और भी ज्यादा सटीक बैठती है। मानसिक स्वास्थ्य में डाइट की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।  फ्रोजन या प्रोसेस्ड फूड शरीर ही नहीं, मन पर भी असर डालता है। जब भोजन का पाचन होता है, तो न्यूरॉन्स और हार्मोन्स सक्रिय होते हैं जो खुशी का अनुभव कराते हैं। परंतु अगर भोजन असंतुलित या कृत्रिम तत्वों से भरा हो, तो यह प्रक्रिया बाधित होती है और व्यक्ति अवसाद की ओर बढ़ सकता है।  फाइबरयुक्त, हल्दी और प्राकृतिक प्रोटीन से भरपूर भोजन करें, छाछ और घर का बना खाना अपनाएं तथा बाहर का फैटी और कृत्रिम स्वाद वाला भोजन सीमित करें। यही संतुलित डाइट मन को स्वस्थ रख सकती है।<br /><strong>-डॉ. नीरजा श्रीवास्तव, प्रो.गवर्नमेंट कॉलेज, कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-fast-paced-life-needs-to-be-curbed--social-media-and-reel-culture-are-disrupting-minds/article-129169</link>
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                <pubDate>Thu, 09 Oct 2025 15:21:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>स्वस्थ भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम</title>
                                    <description><![CDATA[सितंबर माह भारत में राष्ट्रीय पोषण माह के रूप में मनाया जाता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/an-important-step-towards-healthy-india/article-125794"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/(630-x-400-px)-(15).png" alt=""></a><br /><p>सितंबर माह भारत में राष्ट्रीय पोषण माह के रूप में मनाया जाता है, और इस वर्ष के 8वें राष्ट्रीय पोषण माह के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 79वें स्वतंत्रता दिवस का संदेश विशेष रूप से प्रासंगिक हो गया है। प्रधानमंत्री की चेतावनी महज एक राजनीतिक बयान नहीं है, बल्कि यह कठोर वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि बदलती जीवनशैली, उच्च कैलोरी वाले आहार और निष्क्रिय व्यवहार मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी गैर-संचारी बीमारियों की एक खतरनाक लहर पैदा कर रहे हैं। इस चेतावनी की गंभीरता राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आंकड़ों से स्पष्ट होती है, जिसके अनुसार 24 प्रतिशत भारतीय महिलाएं और 23 प्रतिशत पुरुष अब अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त हैं। ये आंकड़े पिछले सर्वेक्षण की तुलना में बढ़े हुए हैं, जो दिखाता है कि यह समस्या तेजी से बढ़ रही है और इसका समाधान तत्काल आवश्यक है।</p>
<p><strong>समस्या पूरे देश में :</strong></p>
<p>इस स्वास्थ्य संकट की व्यापकता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह वृद्धि केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण मोटापे की दरें भी अब शहरी आंकड़ों के बराबर पहुंच रही हैं। यह दर्शाता है कि उच्च कैलोरी आहार और कम शारीरिक गतिविधि की समस्या पूरे देश में फैल गई हैं, जिससे भारत की पारंपरिक स्वस्थ जीवनशैली खतरे में पड़ गई है। मधुमेह भारत में महामारी का रूप ले रहा है, और इसकी जड़ें गलत खान-पान की आदतों में गहराई से जमी हुई हैं। समस्या यहीं नहीं रुकती, बल्कि यह हमारी भावी पीढ़ियों को भी प्रभावित कर रही है। एम्स के विभिन्न अध्ययनों में स्कूली बच्चों में 5 से 14 प्रतिशत तक मोटापा देखा गया है, जो भविष्य के लिए एक गंभीर चेतावनी है और दिखाता है कि यह समस्या अगली पीढ़ी में और भी गंभीर रूप ले सकती है। इस संकट की गंभीरता को समझते हुए, प्रधानमंत्री ने एक अत्यंत व्यावहारिक और मापने योग्य समाधान प्रस्तुत किया है घरेलू खाना पकाने के तेल की खपत में 10 प्रतिशत की कटौती।</p>
<p><strong>संतुलन पर जोर :</strong></p>
<p>यह सुझाव इसलिए वैज्ञानिक रूप से सही है क्योंकि पोषण विशेषज्ञ लंबे समय से अत्यधिक तेल के सेवन, विशेष रूप से संतृप्त और ट्रांस वसा से भरपूर रिफाइंड तेलों को वजन बढ़ने,कोलेस्ट्रॉल बढ़ने और हृदय संबंधी जोखिमों से जोड़ते रहे हैं। हमारे पूर्वजों की आहार बुद्धि ने हमेशा संतुलन पर जोर दिया था, जिसमें अनाज, दालों, सब्जियों और मौसमी फलों को मिलाकर पौष्टिक भोजन तैयार करना शामिल था। वे भाग नियंत्रण और अतिरिक्त वसा के बजाय स्वाद के लिए न्यूनतम तेल और मसालों के उपयोग के महत्व को गहराई से समझते थे, और इन सिद्धांतों पर वापस लौटकर हम प्राचीन ज्ञान के साथ आधुनिक स्वास्थ्य चुनौतियों का प्रभावी समाधान कर सकते हैं। हालांकि, केवल आहार परिवर्तन से मोटापे का संकट पूरी तरह हल नहीं होगा, इसीलिए प्रधानमंत्री ने भारतीयों से दैनिक शारीरिक गतिविधि को अनिवार्य बनाने का भी आग्रह किया है। उनकी सिफारिशों में योग, पैदल चलना, साइकिल चलाना और घरेलू व्यायाम शामिल हैं, जो इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आधुनिक जीवनशैली में शारीरिक गतिविधि का अभाव मोटापे और संबंधित बीमारियों का सबसे बड़ा कारण बन गया है।</p>
<p><strong>जीवनशैली में बदलाव :</strong></p>
<p>विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार गैर-संचारी बीमारियां भारत में कुल मृत्यु दर का 65 प्रतिशत हिस्सा हैं, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इनमें से अधिकांश को उचित आहार और जीवनशैली में बदलाव से रोका जा सकता है। इस संदर्भ में आर्थिक प्रभाव भी आश्चर्यजनक हैं क्योंकि मोटापे से संबंधित बीमारियों का इलाज जीवनशैली संशोधन के माध्यम से उन्हें रोकने से कहीं अधिक महंगा है, जो दिखाता है कि रोकथाम न केवल स्वास्थ्य बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी समझदारी है। इसी कारण मोटापे के खिलाफ लड़ाई को व्यक्तिगत और राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर एक मिशन के रूप में मानना होगा, और जैसा कि प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया है,केवल सरकारी नीतियों से यह समस्या हल नहीं हो सकती बल्कि हर परिवार और व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। मोटापे का समाधान वास्तव में घर से शुरू होता है, जहां खाना पकाने के तरीकों, खाद्य विकल्पों और दैनिक गतिविधियों के बारे में सचेत निर्णय लेने होंगे।</p>
<p><strong>यह समझना होगा :</strong></p>
<p>शारीरिक गतिविधि के मामले में भी हमें यह समझना होगा कि इसके लिए महंगे उपकरण या जिम की सदस्यता की आवश्यकता नहीं है। सुबह या शाम की सैर, घर पर योग, सीढ़ियों का उपयोग लिफ्ट के बजाय और छत पर या पार्क में हल्का व्यायाम जैसी सरल गतिविधियां अत्यधिक प्रभावी हो सकती हैं। इन गतिविधियों को और भी प्रभावी बनाने के लिए सामुदायिक भागीदारी आवश्यक है, जैसे पड़ोसियों के साथ सुबह की सैर के लिए समूह बनाना, स्थानीय योग कक्षाओं में भाग लेना, और परिवार के साथ खेल गतिविधियों में शामिल होना। ये गतिविधियां न केवल शारीरिक स्वास्थ्य बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी हैं और सामाजिक बंधन को मजबूत बनाने में भी सहायक हैं।</p>
<p><strong>इलाज महंगा है :</strong></p>
<p>स्वस्थ जीवनशैली अपनाना केवल स्वास्थ्य का मामला नहीं है, बल्कि यह आर्थिक बुद्धिमानी भी है, क्योंकि मोटापे से संबंधित बीमारियों का इलाज महंगा है और परिवारों पर भारी वित्तीय बोझ डालता है। रोकथाम हमेशा इलाज से सस्ती होती है, और घर में स्वस्थ भोजन बनाना रेस्तरां के खाने या पैकेज्ड फूड खरीदने से कम खर्चीला है। तेल की खपत कम करने से महीने भर में महत्वपूर्ण बचत हो सकती है, जबकि शारीरिक गतिविधि के लिए महंगे उपकरण की आवश्यकता नहीं है क्योंकि पैदल चलना, सीढ़ियों का उपयोग और घरेलू काम भी प्रभावी व्यायाम के रूप में काम करते हैं। प्रधानमंत्री के संदेश का सबसे प्रेरणादायक हिस्सा,आइए हम अगली पीढ़ी को एक स्वस्थ राष्ट्र देने का संकल्प लें, जहां फिटनेस को त्योहारों की तरह मनाया जाएगा।</p>
<p><strong>-डॉ सुनिधि मिश्रा</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 04 Sep 2025 11:58:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur KD]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बदलती जीवनशैली और बढ़ता तनाव बना पाचन तंत्र का दुश्मन : फैटी लिवर के बढ़े मामले, गैस्ट्रो विशेषज्ञों से जानिए कारण, रोकथाम और उपचार</title>
                                    <description><![CDATA[आज की तेज़ रफ्तार जीवनशैली, अनियमित भोजन और बढ़ता तनाव हमारे पाचन तंत्र और लिवर को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/changing-lifestyle-and-increasing-stress-created-enemies-of-the-digestive/article-110750"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-04/257rtrer-(2)38.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। आज की तेज़ रफ्तार जीवनशैली, अनियमित भोजन और बढ़ता तनाव हमारे पाचन तंत्र और लिवर को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं। भारत में हर दूसरा व्यक्ति किसी न किसी पेट की समस्या से परेशान है। चाहे वह एसिडिटी, गैस, पेट फूलना, या भूख न लगना हो, लेकिन अक्सर लोग इन लक्षणों को मामूली समझ कर अनदेखा कर देते हैं, जबकि यह गंभीर स्थितियों जैसे गैस्ट्रोएसोफेजियल रिफ्लक्स डिज़ीज और फैटी लिवर डिज़ीज का संकेत हो सकते हैं।</p>
<p><strong>गैस्ट्रिक समस्याएँ : सिर्फ गैस नहीं, एक संकेत </strong></p>
<p>गैस्ट्रिक एसिड रिफ्लक्स, जिसमें पेट का अम्ल भोजन नली में लौट आता है, एक बेहद आम समस्या बन चुकी है। इससे सीने में जलन, खट्टी डकारें, गले में खराश, और रात को नींद में खलल जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। शेल्बी हॉस्पिटल के डॉ. विमल गुप्ता ने बताया कि अगर हफ्ते में दो या अधिक बार आपको सीने में जलन महसूस होती है या लगातार खट्टी डकारें आती हैं, तो यह एक चेतावनी है। इसे केवल घरेलू उपायों या ऐंटासिड से दबाना सही नहीं है, सही निदान और उपचार आवश्यक है।</p>
<p><strong>गैस्ट्रिक समस्याओं से बचाव कैसे करें?</strong></p>
<p>-भोजन के बाद तुरंत लेटना नहीं चाहिए।<br />-तली-भुनी, मसालेदार और बहुत अधिक चाय-कॉफी से बचें।<br />-भोजन समय पर करें और धीरे-धीरे चबाकर खाएं।<br />-धूम्रपान और शराब से पूरी तरह बचें।</p>
<p><strong>फैटी लिवर क्या है?</strong></p>
<p>फैटी लिवर डिज़ीज एक ऐसी स्थिति है, जिसमें लिवर में वसा जम जाती है और यह अक्सर बिना लक्षणों के धीरे-धीरे बढ़ती है। शुरुआत में यह कोई परेशानी नहीं देती, लेकिन समय के साथ यह लिवर सिरोसिस और लीवर फेलियर जैसी गंभीर स्थितियों का कारण बन सकती है।</p>
<p>डॉ. अनभ्र शर्मा बताते हैं कि भारत में मोटापा, डायबिटीज और जंक फूड की आदत के चलते फैटी लिवर एक ‘साइलेंट एपीडेमिक’ बन गया है। लोग सोचते हैं कि यह केवल शराब पीने वालों को होता है, जबकि अब गैर-अल्कोहलिक फैटी लिवर तेजी से बढ़ रहा है।</p>
<p><strong>फैटी लिवर के संकेत क्या हैं?</strong></p>
<p>-पेट के ऊपरी दाएँ हिस्से में भारीपन या हल्का दर्द<br />-थकान और शरीर में सुस्ती<br />-भूख में कमी या वजन कम होना<br />-त्वचा और आँखों का पीला पड़ना (गंभीर मामलों में)</p>
<p><strong>बचाव और इलाज :</strong></p>
<p>-वजन को नियंत्रित रखें, शरीर का 5-10% वजन कम करने से लिवर को बड़ा फायदा मिलता है।<br />-डाइट में फाइबर, प्रोटीन और हेल्दी फैट शामिल करें (जैसे फल, हरी सब्जियाँ, ओट्स, नट्स)।<br />-मीठे पेय, जंक फूड और प्रोसेस्ड फूड से दूरी बनाएँ।<br />-हर दिन कम से कम 30 मिनट व्यायाम करें।<br />-लिवर फंक्शन टेस्ट और अल्ट्रासाउंड जैसे जांच समय-समय पर कराएं।</p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 14 Apr 2025 17:40:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>गलत जीवनशैली, मोटापा और पर्यावरण प्रदुषण से युवाओं में बढ़ रहा कैंसर</title>
                                    <description><![CDATA[नेशनल कैंसर जागरूकता दिवस विशेष]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/health/%E0%A4%97%E0%A4%B2%E0%A4%A4-%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A4%B6%E0%A5%88%E0%A4%B2%E0%A5%80--%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%9F%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A4%BE-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A4%A3-%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B7%E0%A4%A3-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%93%E0%A4%82-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AC%E0%A5%9D-%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A5%88%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%B0/article-2149"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-11/kensar.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। गलत जीवनशैली, मोटापा और प्रदुषण के चलते आज देश में कैंसर रोगियों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। युवा भी इस बीमारी की गिरफ्त से दूर नहीं है। प्रदेश सहित देशभर में 20 से 35 उम्र के युवाओं में कैंसर के केसेज तेजी से बढते जा रह है। भगवान महावीर कैंसर हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के डायरेक्टर डॉ अजय बापना ने बताया कि युवाओं में कैंसर का प्रमुख कारण गलत जीवनशैली के साथ ही जेनेटिक भी है। <br /> <span style="background-color:#ffff99;"><span style="color:#ff0000;"><strong><br /> युवा अवस्था में यह कैंसर के अधिक </strong></span></span><br /> डॉ बापना ने बताया कि ओरल कैंसर, लंग कैंसर, कॉलोन (मलाशय) कैंसर, पुरूषों में प्रोस्टेट और महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के केसेज युवाओं में तेजी से बढ रहे हैं। आमतौर पर इन कैंसर के रोगी 40 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों में देखे जाते थे, लेकिन पिछजे कुछ सालों 20 से 35 वर्ष के युवाओं में इन कैंसर के केसेज सामने आ रहे है। <br /> <br /> <span style="background-color:#ffff99;"><span style="color:#ff0000;"><strong><br /> 20 प्रतिशत तेजी से बढ रहा कैंसर</strong></span></span><br /> इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर)-नेशनल सेंटर फॉर डिज़ीज़ इंफोर्मेटिक्स एंड रिसर्च (एनसीडीआईआर) की ओर से नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम रिपोर्ट में देशभर में कैंसर के आंकडों में तेज वृद्वि बताई गई। रिपोर्ट में सामने आया कि 2020 में कैंसर के 13.9 लाख मामले सामने आए। ऐसे में 2025 में बढ़कर 15.7 लाख तक पहुंचने की संभावना है। इनमें ओरल, लंग, ब्रेस्ट कैंसर के केसेज युवाओं में देखे बढ़ रहे है। <br /> <br />  </p>
<p><span style="font-size:larger;"><span style="background-color:#ffff99;"><span style="color:#ff0000;"><strong><br /> -    जीवनशैली में आए परिवर्तन और बढ़तेे पर्यावरण प्रदूषण के चलते युवा कैंसर रोगियों की संख्या में हो रहा इजाफा <br /> -    प्रदेश के युवाओं में मुंह, गले, फेफडे और स्तन कैंसर की बढ रही समस्या</strong></span></span></span><br /> <br /> <span style="background-color:#ffff99;"><span style="color:#ff0000;"><strong>इन लक्षणों को पहचानें </strong></span></span><br /> सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ अनिल गुप्ता ने बताया कि मुँह या गले में न भरने वाला छाला, कुछ निगलने में दिक्कत होना या आवाज में परिवर्तन, शरीर के किसी भी भाग में गांठ, स्तन में गांठ या आकार में परिवर्तन, लंबे समय तक खांसी या कफ में खून, मलद्वार, मूत्रद्वार से असामान्य खून आना, मासिक धर्म के अलावा या रजोनिवृति के बाद असामान्य रक्तस्त्राव, शौच की आदत में परिवर्तन। यह सभी लक्षण कैंसर के शुरूआती लक्षणों में शामिल है। इन लक्षणों को नजर अंदाज न करें एवं चिकित्सक को समय पर दिखाकर लक्षणों के कारण की पहचान करवाएं है।<br /> <span style="background-color:#ffff99;"><span style="color:#ff0000;"><strong><br />   कैंसर से बचाव है संभव </strong></span></span><br />   तंबाकू (बीडी, सिगरेट, गुटखा) एवं गलत जीवनषैली (जैसे व्यायाम नहीं करना, ज्यादा तेल, मसाले का    भोजन का सेवन) को छोड दिया जाए तो कैंसर की रोकथाम संभव है। सरवाईकल कैंसर का टीकाकरण (6 माह के अंतराल में) करवाकर महिलाएं इस रोग से खुद को बचा सकती है, अपने चिकित्सक से इसके बारे में सलाह लें। 40 की उम्र के बाद महिलाओं को स्तन कैंसर की जांच के लिए मैमोग्राफी और बच्चेदानी के मुंह के कैंसर की जांच के लिए पैप स्मीयर (20 वर्ष की आयु के बाद) हर वर्ष करवानी चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Nov 2021 15:08:12 +0530</pubDate>
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