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                <title>animals - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>सांभर और हिरणों की जिंदगी निगल गई पॉलीथिन : 6 वन्यजीवों की दर्दनाक मौत, सांभर व हिरणों के पेट से निकली 10 से 15 किलो पॉलीथिन</title>
                                    <description><![CDATA[पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा : भूख व बीमारी से नहीं पॉलीथिन से हुई वन्यजीवों की मौत।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/polythene-swallowed-the-lives-of-sambar-and-deer--6-animals-died-a-painful-death--10-to-15-kg-of-polythene-was-found-in-the-stomachs-of-sambar-and-deer/article-138859"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px)-(2)1.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहरवासियों की लापरवाही और बढ़ता प्लास्टिक कचरा अब जंगल के प्राणियों पर मौत बनकर टूट रहा है। पिछले दिनों सैन्य क्षेत्र और रेलवे स्टेशन के आसपास से रेस्क्यू किए सांभर व हिरणों की दर्दनाक मौत हो गई। इनका चिड़ियाघर रेस्क्यू सेंटर में पोस्टमार्टम किया गया तो भयानक मंजर देखने को मिला। प्रत्येक वन्यजीव के पेट से 10 से 15 किलो पॉलीथिन निकला। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आया कि इन मासूस वन्यजीवों की मौत भूख या बीमारी से नहीं, बल्कि प्लास्टिक निगलने से हुई है।</p>
<p><strong>पॉलीथिन ने ब्लॉक किया पाचन तंत्र</strong><br />सैन्य व रेलवे स्टेशन क्षेत्र में कुछ दिनों पहले 6 सांभर व हिरण मृत अवस्था में मिले थे। जिन्हें वन विभाग की टीम रेस्क्यू कर कोटा चिड़ियाघर आई। जहां वन्यजीव चिकित्सक द्वारा पोस्टमार्टम किया। जिसमें चौंकाने वाला खुलासा हुआ। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार, सभी हिरणों के पाचन तंत्र में भारी मात्रा में प्लास्टिक आधारित कचरा जमा था। प्रत्येक मृत वन्यजीव के पेट से करीब 10 से 15 किलो प्लास्टिक कचरा निकला। जिससे पाचन तंत्र पूरी तरह ब्लॉक हो गया। जिसकी वजह से उनकी मौत हो गई।</p>
<p><strong>आंतों में सूजन, अंदरुनी अंगों को गंभीर नुकसान </strong><br />वन्यजीव विभाग के एसीएफ पंकज सिंह मीणा ने बताया कि सैन्य व स्टेशन क्षेत्र में सांभर व हिरणों का हैबीटेट है। लोग खाद्यय साम्रगी को प्लास्टिक की थैलियों में बांधकर फैंक देते हैं। जिसे भोजन की तलाश में विचरण कर रहे वन्यजीव निगल लेते हैं। जिससे भोजन के साथ पॉलीथिन भी शरीर में जाकर आंतों में फंस जाती है, जो पेट में प्लास्टिक की गांठ बनकर आंतों को गंभीर नुकसान पहुंचाती है। नतीजन, भूख न लगना, कमजोरी, सूजन और आंतरिक अंगों को गंभीर नुकसान पहुंचता है। यह परिस्थितियां धीरे-धीरे उन्हें मौत की तरफ धकेल देती है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आया कि मृत वन्यजीवों की पॉलीथिन के कारण आंतों में सूजन थी और अंदरुनी अंगों को गंभीर नुकसान पहुंचा, जो उनकी मौत का कारण बनी।</p>
<p><strong>प्लास्टिक से वन्यजीवों पर गंभीर असर</strong><br />एसीएफ मीणा ने बताया कि प्लास्टिक निगलने से हिरणों में पोषक तत्वों की पूर्ति रुक जाती है। वजन तेजी से घटता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है। माइक्रोप्लास्टिक रुमेन की प्राकृतिक प्रक्रिया को बाधित करता है, जिससे ऊर्जा उत्पादन कम होता है। साथ ही प्लास्टिक से निकलने वाले रसायन हार्मोन असंतुलन और प्रजनन संबंधी समस्याएं भी पैदा करते हैं। उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी मात्रा में पॉलीथिन मिलना क्षेत्र में गंभीर प्लास्टिक प्रदूषण की ओर इशारा करता है। यह खतरा केवल सांभर तक सीमित नहीं है, बल्कि चीतल सहित अन्य शाकाहारी वन्यजीव भी इसकी चपेट में आ सकते हैं।</p>
<p><strong>सैन्य व स्टेशन क्षेत्र को प्लास्टिक मुक्त करने की जरूरत</strong><br />वन्यजीव संरक्षण से जुड़े संगठनों ने सैन्य क्षेत्र और रेलवे स्टेशन के आसपास के इलाकों को प्लास्टिक मुक्त क्षेत्र घोषित करने की मांग की है। साथ ही सिंगल यूज प्लास्टिक पर सख्त प्रतिबंध, नियमित सफाई अभियान और प्रभावी कचरा प्रबंधन प्रणाली लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया। वहीं, वन क्षेत्रों में देशी पौधों का रोपण कर हिरणों के लिए सुरक्षित प्राकृतिक भोजन स्रोत विकसित किया जाए ताकि वन्यजीव की जान बच सके।</p>
<p><strong>जैव विविधता के लिए खतरा</strong><br />शाकाहारी जीवों की मृत्यु से पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित होता है। उनकी संख्या घटने से शिकारी जीवों के लिए भोजन की कमी और मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ सकता है। माइक्रोप्लास्टिक मिट्टी और पौधों को भी नुकसान पहुंचाकर जैव विविधता को खतरे में डालता है। यह उसी क्षेत्र में भोजन तलाश करने वाले अन्य वन्यजीवों के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।</p>
<p><strong>हबीर्वोर का करेंगे पुनर्वास</strong><br />सैन्य व स्टेशन क्षेत्रों से कुछ सांभर व हिरणों का रेस्क्यू किया गया था। पोस्टमार्टम कराने पर सामने आया कि उनके पेट से करीब 15 किलो पॉलीथिन निकली, जो उनकी दर्दनाक मौत का कारण बनी। इस संबंध में सैन्य अधिकारियों को पत्र लिख वन्यजीवों को ट्रैंकुलाइज कर सुरक्षित वनक्षेत्र में शिफ्ट करने की परमिशन ली जाएगी। साथ ही उनके एरिया में भोजन सामग्री को पॉलीथिन में बांधकर न फैंकने के लिए जागरूक किया जाएगा। वहीं, घरों से निकलने वाली खाद्य सामग्री को फेंकने के लिए कचरा पात्र रखने व जगह-जगह साइन बोर्ड लगाने का आग्रह करेंगे।<br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 08 Jan 2026 15:10:27 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>टाइगर-लॉयन को मल्टी विटामिन तो भालू खा रहा अंडे-पिंड खजूर, सर्दियां आते ही अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में वन्यजीवों का बदला डाइट प्लान</title>
                                    <description><![CDATA[शाकाहारी वन्यजीवों की मौज, ताजी हरी सब्जियों के साथ मौसमी फलों का उठा रहे लुत्फ।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/tigers-and-lions-are-getting-multivitamins--while-bears-are-eating-eggs-and-dates--the-diet-plan-for-wildlife-at-abheda-biological-park-changes-with-the-arrival-of-winter/article-138237"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/tiger-or-lion-multivitamins-to-bhalu-kha-raha-ande-pind-khajoor,-sardiyan-ate-he-abheda-biological-park-mein-vanyajeevon-ka-badala-diet-plan...kota-news-03.01.2026.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। सर्दी के तेवर तीखे होने के साथ ही अभेड़ा बायॉलोजिकल पार्क में वन्यजीवों के रहन-सहन व डाइट प्लान भी बदल गया है। सुबह-शाम हो रही गलन व सर्द हवाओं के झौंके से बचाव के लिए वन्यजीव विभाग ने विशेष इंतजाम किए हैं। एनक्लोजर व पिंजरों में वन्यजीवों को गमार्हाट देने के लिए जहां एक ओर हीटर लगाए हैं वहीं, चावल की पराल बिछाई गई है। साथ ही इंफेक्शन से बचाव के लिए हल्दी का छिड़काव भी किया जा रहा है। खुराक भी बढ़ा दी गई है। दरअसल, सर्दियों की दस्तक के साथ ही प्रदेशभर के चिड़ियाघर और बायोलॉजिकल पार्क में वन्यजीवों के डाइट प्लान में बदलाव किया जाता है। जिसके तहत ही सर्दियों का शेड्यूल लागू किया जाता है, जो फरवरी तक जारी रहता है।</p>
<p><strong>शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीवों की हो रही मौज</strong><br />सर्दियों का शेडयूल लागू होते ही अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीवों की मौज हो गई। उन्हें वीआईपी ट्रीटमेंट दिया जा रहा है। मांसाहारियों को मांस के साथ अंडे, मल्टीविटामिन, मल्टी मिनरल्स, कैल्शियम परोसा जा रहा है। जबकि, शाकाहारी ताजी सब्जियों के साथ पशुआहार, मौसमी फल, गुड़ व अजवाइन का लुफ्त उठा रहे हैं। वहीं, भालू दूध, दलिया, फल, शहद और पिंडखजूर की दावत उड़ा रहे हैं ।</p>
<p><strong>बायोलॉजिकल पार्क में हैं 86 वन्यजीव</strong><br />बायलॉजिकल पार्क में मांसाहारी व शाकाहारी मिलाकर कुल 86 वन्यजीव हैं। मांसाहारी में लॉयनेस- 1, बाघिन- 1, भेड़िया-2, सियार-4, भालू-2, लेपर्ड-4, जरख-4 हैं। इसी तरह शाकाहारी में नीलगाय-16, चिंकारा-2, चितल 39, ब्लैक बक 27 है।</p>
<p><strong>मांसाहारियों के नाइट शेल्टर में लगाए हीटर</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के वनकर्मियों ने बताया कि सर्दियों की शुरूआत के साथ ही शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीवों के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं। सभी वन्यजीवों के नाइट शेल्टरों में पर्दें लगवा दिए गए हैं। लॉयनेस, टाइग्रेस, जरख, सियार, भेडिया व भालू के नाइट शेल्टर से 10 फीट की दूरी पर हीटर लगाए गए हैं। साथ ही खिड़कियों पर पर्दे लगाए गए हैं ताकि, सर्द हवाओं से बचाव हो सके।</p>
<p><strong>मांसाहारी वन्यजीवों का डाइट प्लान- </strong>लॉयनेस व टाइगे्रस को 10 किलो मांस के साथ मल्टी विटामिन<br />लॉयनेस व बाघ-बाघिन को 8 किलो पाड़ा मांस और 1 मुर्गा (प्रति एनिमल) दिया जा रहा है। इसके अलावा मल्टी विटामिन, मल्टी मिनरल्स व लीवर टॉनिक व कैल्शियम अलग से दिए जा रहे हैं। यह सप्लीमेंट्स 10 एमएल परडे मांस के टुकड़ों पर मिलाकर दिया जा रहा है। इससे शरीर में ऊर्जा का संचार बेहतर होने के साथ पाचन तंत्र भी मजबूत रहता है।<br /><strong>भेडिया :</strong> 2 किलो प्रति पाड़ा मांस, 1 अंडा सहित मल्टी विटामिन व मिनरल्स दिए जा रहे हैं।<br /><strong>सियार :</strong> 1.25 किलो मांस प्रति सियार, 1 अंडा व सप्लीमेंट्स<br /><strong>जरख :</strong> 3 किलो प्रति एनिमल्स, 1 अंडा व सप्लीमेंट्स</p>
<p><strong>3.5 किलो मांस के साथ कैल्शियम खा रहा पैंथर</strong><br />बायोलॉजिकल पार्क में मांसाहारी वन्यजीवों की डाइट में हैल्दी पोषक तत्व शामिल किए हैं। यहां 4 लेपर्ड हैं। मेल लेपर्ड को 3.5 किलो व फिमेल लेपर्ड को 2.5 किलो मांस प्रतिदिन दिया जा रहा है। इसके अलावा 1-1 अंडा व मल्टी विटामिन व कैल्शियम दिया जा रहा है। इसी तरह सभी 4 सियार को 1.25 किलो के हिसाब से प्रतिदिन 5 किलो मांस परोसा जा रहा है। वहीं, प्रत्येक भेड़िए को 2 किलो के हिसाब से 4 किलो तथा चारों हायना को 3 किलो के हिसाब से 12 किलो मीट प्रतिदिन खिलाया जा रहा है।</p>
<p><strong>ढाई लीटर दूध के साथ अंडे और खजूर खा रहा भालू</strong><br />सर्दियों में सबसे ज्यादा मजे भालू के हैं। यहां 2 भालू हैं, जिसे डाइट में प्रतिदिन 2.5 लीटर दूध के साथ 1 किलो चावल, 1.75 किलो दलिया, 2 अंडे, 200 ग्राम गुड़, 200 ग्राम शहद, 200 ग्राम शहद प्रतिदिन डाइट में दिए जा रहे हैं। साथ ही मल्टीविटामिन, कैल्शियम व मिनरल्स भी दिए जाते हैं।</p>
<p><strong>इंफेक्शन से बचाव के भी किए उपाए</strong><br />बायॉलोजिकल पार्क में तैनात कर्मचारियों ने बताया कि शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीवों के एनक्लोजर और नाइट शेल्टरों में हल्दी का छिड़काव किए गए हैं। हल्दी की तासीर गर्म होने के साथ एंटी बायटिक भी रहती है। यदि, उनके शरीर पर कोई चोट लग जाए तो हल्दी लगने से इंफेक्शन नहीं होगा। सर्दियों में वन्यजीवों की साइटिंग होने से पर्यटक रोमांचित हो रहे हैं।</p>
<p><strong>एनक्लोजर में बिछाई पराल</strong><br />शाकाहारियों के नाइट शेल्टर में पराल बिछाई गई है। ताकि, एनिमल के चलने फिरने व बैठने पर फर्श ठंडा न लगे। पराल से शेल्टर में गमार्हाट बनी रहती है। इसके अलावा एनक्लोजर की जालियों व पिंजरों को ग्रीन नेट से कवर किया गया है। ताकि, सर्द हवाओं के झौंकों से बच सके।</p>
<p><strong>हरी सब्जियों के साथ नमक का भी चख रहे स्वाद</strong><br />मांसाहारी वन्यजीवों के मुकाबले शाकाहारियों का डाइट प्लान बड़ा है। उन्हें गाजर, मूली, खीरा, टमाटर, ककड़ी, गोभी, लौकी, पालक, पत्ता गोभी सहित मौसमी सब्जियां, हरा चारा, पशु आहार, फल-फू्रट, गुड़, आजवाइन के साथ मल्टीविटामिन व न्यूट्रिशियन दिए जा रहे हैं। शाकाहारी वन्यजीवों का डाइट चार्ट एक ही है लेकिन डाइट की मात्रा अलग-अलग है। हैल्दी डाइट से सभी वन्यजीव सर्दियों में तंदरुस्त रहेंगे।</p>
<p>सर्दी की शुरूआत होने के साथ ही बायोलॉजिकल पार्क में मौजूद सभी वन्यजीवों की डाइट में परिवर्तन कर दिया है। इन दिनों वन्यजीवों की खुराक बढ़ जाती है। डाइट में जरूरी पोषक तत्वों को शामिल कर जरूरत के मुताबिक उनकी मात्रा में बढ़ोतरी की गई है। वहीं, सर्द हवाओं से बचाव के लिए मांसाहारी वन्यजीवों के नाइट शेल्टर के पास हीटर व शाकाहारियों के शेल्टरों में पराल बिछाई गई है और खिड़कियों पर पर्दे लगाए गए हैं। वैसे तो वन्यजीवों को इस तरह की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि जंगल में तो वह अपने हिसाब से अपना हैबीटाट जैसे-गुफाएं, पेड़ों के नीचे, धूप में बैठकर सर्दी से खुद का बचाव करते हैं। वहीं, अलग-अलग तरह के जानवरों का शिकार करते हैं, जिससे वैराइटिज आॅफ फूड मिल जाता है लेकिन चिड़ियाघरों में इनका एरिया सीमित होता है। इसलिए यह सुविधाएं उपलब्ध करवानी पड़ती है।<br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 03 Jan 2026 16:31:13 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>मोखापाड़ा पशु चिकित्सालय: सोनोग्राफी मशीन पर जमी धूल, काफी समय से खराब होने से नहीं हो रहा उपयोग </title>
                                    <description><![CDATA[पशु चिकित्सालय में रोज 80 से 100 तक पशु उपचार के लिए लाए जाते हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/mokhapaada-veterinary-hospital--sonography-machine-covered-in-dust--unused-for-a-long-time-due-to-being-out-of-order/article-138233"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px-(1)7.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहर के मोखापाड़ा स्थित राजकीय पशु चिकित्सालय में सोनोग्राफी मशीन काफी समय से बंद पड़ी हुई है। आधुनिक जांच सुविधा के अभाव में चिकित्सकों को बीमार पशुओं का उपचार केवल लक्षणों और अनुभव के आधार पर करना पड़ रहा है। इससे न सिर्फ उपचार की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है, बल्कि कई जटिल मामलों में पशुओं की जान पर भी जोखिम बढ़ गया है। पशु चिकित्सालय में रोजाना 80 से 100 तक पशु उपचार के लिए लाए जाते हैं। इनमें बड़ी संख्या दुधारू गाय-भैंसों, गर्भवती पशुओं और प्रजनन संबंधी समस्याओं वाले मामलों की होती है। सोनोग्राफी मशीन के जरिए गर्भ की स्थिति, भ्रूण का विकास, आंतरिक सूजन, ट्यूमर, चोट या संक्रमण की सटीक जानकारी मिलती है। सोनोग्राफी मशीन बंद होने से गर्भ जांच पूरी तरह प्रभावित हो गई है।</p>
<p><strong>निजी जांच केंद्रों का ही सहारा</strong><br />सरकारी अस्पताल में सोनोग्राफी सुविधा नहीं मिलने से पशुपालकों को निजी क्लीनिकों और जांच केंद्रों की ओर रुख करना पड़ रहा है। निजी स्तर पर सोनोग्राफी कराने पर 800 से 1500 रुपऐ तक खर्च आ रहा है, जो छोटे और मध्यम पशुपालकों के लिए बड़ी रकम है। कई पशुपालक आर्थिक तंगी के कारण जांच नहीं करा पा रहे हैं, जिससे बीमारी समय पर पकड़ में नहीं आ रही। चिकित्सकों के अनुसार सोनोग्राफी के बिना कई बार बीमारी की सही वजह स्पष्ट नहीं हो पाती। इससे इलाज ट्रायल-बेस पर करना पड़ता है, दवाइयों की अवधि बढ़ जाती है और पशु के स्वस्थ होने में अधिक समय लगता है। दुधारू पशुओं के मामलों में दूध उत्पादन घटने से पशुपालकों को सीधा आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है।</p>
<p><strong>नई मशीन की मांग, लेकिन अब तक इंतजार</strong><br />पशु चिकित्सालय प्रशासन की ओर से कई माह पहले ही नई सोनोग्राफी मशीन की मांग उच्च अधिकारियों को भेज दी गई है। बजट और प्रक्रिया का हवाला देते हुए मामला लंबित बताया जा रहा है। चिकित्सकों का कहना है कि आधुनिक मशीन मिलने से न सिर्फ जांच सटीक होगी, बल्कि रेफर के मामलों में भी कमी आएगी। स्थानीय पशुपालकों ने विभाग से मांग की है कि मोखापाड़ा पशु चिकित्सालय में जल्द से जल्द नई सोनोग्राफी मशीन उपलब्ध कराई जाए। ताकि क्षेत्र के हजारों पशुपालकों को राहत मिल सके और पशुओं का समय पर, सटीक और प्रभावी उपचार सुनिश्चित हो सके।</p>
<p>सरकारी अस्पताल में सोनोग्राफी सुविधा नहीं होने से हमें निजी जगह जांच करानी पड़ती है। खर्च ज्यादा आता है, ऊपर से समय भी बर्बाद होता है। गरीब पशुपालकों के लिए यह बड़ी समस्या है।<br /><strong>-रामलाल, पशुपालक</strong></p>
<p>पशु चिकित्सालय में सोनोग्राफी मशीन खराब पड़ी हुई है। नई मशीन के लिए डिमांड भेज रखी है। नई मशीन मिलने के बाद उपचार की गुणवत्ता काफी बेहतर हो सकेगी।<br /><strong>-डॉ. भंवर सिंह, उपनिदेशक, राजकीय पशु चिकित्सालय</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 03 Jan 2026 15:21:43 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>सलमान प्रकरण के बाद थमा गया था वन्य जीवों का शिकार : शिकारी फिर उठाने लगे सिर, 10 वर्ष में 300 पहुंचा हिरण शिकार का आंकड़ा </title>
                                    <description><![CDATA[कुछ छोटी जातियों से जुड़े लोग लालच में आकर भी इस अवैध गतिविधि में शामिल हो रहे हैंए जिससे वन्य जीव संरक्षण को लगातार नुकसान पहुंच रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/after-the-salman-incident-hunting-of-wild-animals-had-stopped/article-136990"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/6622-copy67.jpg" alt=""></a><br /><p>जोधपुर। फिल्म अभिनेता सलमान खान हिरण शिकार प्रकरण के बाद कुछ वर्षों तक वन्य जीवों के शिकार की घटनाओं में कमी जरूर देखने को मिली थी, लेकिन बीते एक दशक में एक बार फि र यह सिलसिला तेज होता नजर आ रहा है। आंकड़ों के अनुसार पिछले 10 वर्षों में हिरण शिकार के करीब 300 से अधिक मामले सामने आ चुके हैंए जो वन्य जीव संरक्षण के लिए गंभीर चिंता का विषय है।सलमान खान पर जब हिरण शिकार के आरोप लगे थेए उस समय बिश्नोई समाज ने इस मुद्दे को जिस गंभीरता के साथ उठायाए उसने पूरे देश का ध्यान इस ओर खींचा। बिश्नोई समाज के विरोध और जागरूकता के चलते यह मामला अदालत तक पहुंचा और अभिनेता को सजा भी हुई, जो अब न्यायालय में विचाराधीन है। इसके बाद कुछ समय तक हिरण शिकार की घटनाओं में गिरावट दर्ज की गई थी।</p>
<p>हालांकि अब हालात फिर से बदलते दिख रहे हैं। सामने आए मामलों में यह स्पष्ट हुआ है कि आदिवासी समुदाय के कुछ लोग परंपरागत कारणों से जबकि कुछ अन्य लोग शौकिया तौर पर हिरणों का शिकार कर रहे हैं। इसके अलावा कुछ छोटी जातियों से जुड़े लोग लालच में आकर भी इस अवैध गतिविधि में शामिल हो रहे हैंए जिससे वन्य जीव संरक्षण को लगातार नुकसान पहुंच रहा है।</p>
<p><strong>जागरूकता ओर सख्त कदम उठाने की जरूरत</strong><br />इस विषय पर जोधपुर के जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के वाइल्डलाइफ रिसर्च सेंटर के निदेशक हेमसिंह गहलोत का कहना है कि बिश्नोई समाज ने सदियों से अपने जीवन को वन्य जीवों की रक्षा के लिए समर्पित किया है और आज भी वे पूरी तत्परता से इस कार्य में लगे हुए हैं। उनका कहना है कि समाज की जागरूकता के साथ.साथ प्रशासनिक स्तर पर भी सख्त कदम उठाने की जरूरत हैए ताकि हिरण शिकार जैसी घटनाओं पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                            <category>जोधपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Dec 2025 15:21:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>टाइगर से चीते तक के खून से सने हाईवे और रेलवे ट्रेक, जंगल में तीन तरफ से मौत का जाल</title>
                                    <description><![CDATA[रफ़्तार की बली चढ़ रहे शेड्यूल - 1 के वन्यजीव:  मुकुंदरा व रामगढ़ टाइगर रिजर्व के वन्यजीवों को ट्रक और ट्रेनो ने रौंदा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/highways-and-railway-tracks-stained-with-the-blood-of-animals-from-tigers-to-cheetahs--a-death-trap-surrounding-the-forest-on-three-sides/article-136384"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/etws-(1200-x-600-px)-(16).png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा और रामगढ़ टाइगर रिजर्व से गुजरते नेशनल हाइवे और रेलवे ट्रेक वन्यजीवों की अकाल मौत का कारण बन रहे हैं। भोजन-पानी की तलाश में जंगल से बाहर निकलते ही बेजुबान जानवर सड़कों पर तेज रफ्तार ट्रकों और पटरियों पर दौड़ती ट्रेनों की चपेट में आ रहे हैं। हालात इतने भयावह हैं कि बीते पांच वर्षों में यहां 51 से ज्यादा वन्यजीव अकाल मौत का शिकार हो चुके हैं। इतना ही नहीं, लापरवाही का आलम यह है कि हाल ही में मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क से निकले चीते की बारां जिले से गुजर रहे आगरा-मुंबई हाइवे के शिवपुरी लिंक रोड पर अज्ञात कार की टक्कर से दर्दनाक मौत हो गई। इसके बावजूद बेजुबान वन्यजीवों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम कागजों से आगे नहीं बढ़ पाए। जबकि, अकाल मृत्यु के शिकार हुए वन्यजीवों में अधिकतर शेड्यूल वन श्रेणी के हैं। इन वन्यजीवों को भी सुरक्षा का उतना ही अधिकार प्राप्त है, जितना टाइगर को। इसके बावजूद वन अधिकारियों द्वारा इनकी सुरक्षा में कोताही बरती जा रही है।</p>
<p><strong>51 से ज्यादा वन्यजीवों को ट्रेन-ट्रकों ने कुचला</strong><br />मुकुंदरा व रामगढ़ टाइगर रिजर्व में वर्ष 2019 से 2025 तक टाइगर, पैंथर, भालू व मगरमच्छ, हायना सहित 50 से ज्यादा वन्यजीवों की सड़क व रेल दुर्घटनाओं में दर्दनाक मौत हो चुकी है। वहीं, वन्यजीव विभाग के अधीन सेंचुरी में भी वन्यजीव सुरक्षित नहीं है। यहां वर्ष 2023 व 24 में मगरमच्छ व मादा नील गाय को हाइवे पर बेलगाम दौड़ते भारी वाहन कुचल गए। बेजुबानों की दर्दनाक मौत के बावजूद वन अधकारियों द्वारा सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए। अकाल मृत्यु में सर्वाधिक संख्या पैंथर की है।</p>
<p><strong>इधर, ट्रेन से कटा टाइगर, उधर कार ने कुचला चीता</strong><br />मुकंदरा टाइगर रिजर्व के दरा रेंज से गुजर रही रेलवे ट्रेक वन्यजीवों के लिए मौत का ट्रैक बनती जा रही है। वर्ष 2003 में रणथम्भौर से चलकर मुकुंदरा आया ब्रोकन टेल टाइगर की ट्रेन की टक्कर से मौत हो गई थी। वहीं, हाल ही में एनक्लोजर से बाहर निकली कनकटी भी कुछ मिनटों के लिए दरा रेलवे ट्रेक पर आ गई थी। इसके बाद वह पूरी रात ट्रेक के पास झाड़ियों में बैठी रही। जिससे उसकी जान को खतरा था। इधर, आठ दिन पहले गत 7 दिसम्बर को बारां जिले से गुजर रहे आगरा-मुंबई हाइवे के शिवपुरी लिंक रोड पर कूनो नेशनल पार्क से आया चीते को कार कुचल गई। इससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई।</p>
<p><strong>11 केवी लाइन गिरी, करंट से लेपर्ड परिवार खत्म</strong><br />मुकुंदरा व रामगढ़ टाइगर रिजर्व के बीच डाबी के डसालिया वनखंड से गुजर रही 11 केवी बिजली का तार टूटकर गिर गया। करंट की चपेट में आने से लेपर्ड का पूरा परिवार खत्म हो गया। यहां नर व मादा लेपर्ड के साथ दो शावकों की भी मौत हो गई थी। वहीं, 4 नेवलों की भी करंट की चपेट में आने से मुत्यु हो गई। इसी तरह 12 दिसम्बर 2023 को नेशनल हाइवे 148-डी पर अज्ञात भारी वाहन ने 1 वर्षीय मादा पैंथर को रौंद दिया।</p>
<p><strong>ट्रेन की टक्कर से भालू के हो गए दो टुकड़े</strong><br />12 जनवरी 2020 को मुकुंदरा में दिल्ली-मुंबई रेलवे लाइन पर ट्रेन से कटकर 12 वर्षीय नर भालू की दर्दनाक मौत हो गई थी। ट्रेन की रफ्तार से भालू के शरीर के दो टुकड़े हो गए थे। यह दुर्घटना कमलपुरा स्टेशन के पास रेलवे लाइन पर डॉट के मोखे के ऊपर हुआ था।</p>
<p><strong>यह वन्यजीव हुए अकाल मौत के शिकार</strong><br /><strong>मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व :</strong> ब्रोकन टेल टाइगर, पैंथर, नर व मादा भालू, जरख, सियार, मगरमच्छ, मादा नील गाय, सांभर, चीतल, मोर, जंगली बिल्ली सहित अनेक जानवरों की ट्रेन व भारी वाहनों की टक्कर से मौत हो गई। इनमें से अधिकतर जानवरों की मौत पटरी पार करते हुए ट्रेन की चपेट में आने से हुई है।<br /><strong>रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व :</strong> पैंथर, जंगली सूअर, नर व मादा नील गाय (बच्चा), मोर, मादा सांभर, सियार, चीतल शामिल हैं। यह तो वो एनीमल हैं, जिनकी मौत रिकॉर्ड में दर्ज हैं, इसके अलावा कई एनीमल तो ऐसे हैं, जिनकी मौत का कोई रिकॉर्ड ही नहीं है।<br /><strong>वाइल्ड लाइफ कोटा : </strong>वन्यजीव विभाग के अधीन अभयारणयों से मगरमच्छ व मादा नील गाय की मौत हुई है। यहां जंगलों से सटकर निकल रहे नेशनल, स्टेट व मेगा हाइवे गुजर रहे हैं। जिन्हें पार करते हुए मौत के शिकार हो गए।</p>
<p><strong>आंकड़ों में देखिए, ट्रेन से पैंथरों की दर्दनाक मौत</strong><br />- 5 मार्च 2023 को रामगढ़ टाइगर रिजर्व में भीमलत के पास बूंदी-चित्तौड़गढ़ रेलवे लाइन पर नर पैंथर की ट्रेन की चपेट में आने से मौत हो गई थी।<br />- 22 जनवरी 2021 को भीमलत के पास जालंधरी-श्रीनगर स्टेशन के बीच मादा पैंथर ट्रेन की चपेट में आ गई थी। जिससे उसका दम टूट गया।<br />- 11 मार्च 2021 को भीमलत के जंगलों में सीताकुंड वनक्षेत्र के जैतपुरा बांध के पास नर पैंथर की मौत हो गई।<br />- 30 अक्टूबर 2019 को भारी वाहन ने 7 माह के पैंथर शावक को हाइवे पर कुचल दिया।<br />-15 दिसम्बर 2025 : कोटा चित्तौड़ नेशनल हाइवे पर अज्ञात वाहन ने 4 वर्षीय मादा पैंथर को कुचल दिया। स्थिति नाजुक बनी हुई है।</p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />रामगढ़ टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों के लिए पर्याप्त भोजन-पानी की व्यवस्था नहीं है। ऐसे में जंगल से बाहर निकलने पर रेलवे ट्रैक पार करते वक्त ट्रेन या हाइवे पार करते समय भारी वाहनों की चपेट में आने से जान गंवा बैठते हैं। बिजौलिया से करोंदी टोल के पास भालू की दुर्घटना में मौत होती रहती है। कई जगह से रिजर्व की दीवारें टूटी हुई हैं। यहां प्रोपर गश्त नहीं होती। जिसकी वजह से वनकर्मियों को वन्यजीवों की मौत का पता ही नहीं लग पाता। इनका मुखबिर तंत्र भी कमजोर है। फोरस्ट अधिकारियों को स्थानीय लोगों को साथ लेकर बेजुबानों की जान बचाने के प्रयास करना चाहिए।<br /><strong>-विट्ठल सनाढ्य, वन्यजीव विशेषज्ञ बूंदी</strong></p>
<p>जब भी फोरेस्ट की तरफ से रेलवे ट्रैक के आसपास वन्यजीव के मूवमेंट की जानकारी मिलती है तो ट्रेनों की स्पीड कम कर दी जाती है। पटरियों के पास व पीछे की ओर क्रेश बेरियर वॉल बनाई गई है। हालांकि, कुछ जगहों पर छुटी हुई है। लेकिन, मथूरा से नागदा तक क्रेश बेरियर वॉल का काम चल रहा है।<br /><strong>-सौरभ जैन, सीनियर डीसीएम रेलवे कोटा</strong></p>
<p>वाइल्ड लाइफ में नए प्रोजेक्ट पर कई कंडीशन लगाते हैं, जिसमें एलीवेटेड रोड व टनल बने, अंडर पास बने। वहीं, लोकल सर्विस रोड की मरम्मत की मंजूरी के दौरान अधिक ब्रेकर बनवाते हैं, जिससे वाहनों की गति कम रहे और वन्यजीव को सड़क पार करने को समय मिल सके। इसके अलावा जहां कहीं इस तरह की घटनाएं होती है तो उसके संबंध में हाई आॅथोरिटी से बात कर उचित उपाए करवाएंगे।<br /><strong>-सुगनाराम जाट, सीसीएफ मुकुंदरा टाइगर रिजर्व</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 18 Dec 2025 16:53:01 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>पशु पालकों के आवास खाली : शहर में डाल रखा डेरा, केडीए आवंटियों को आवासों में करवाएगा पुनर्वास</title>
                                    <description><![CDATA[इसमें आवासों के अलावा पशुओं के  लिए बाड़े, बच्चों के लिए स्कूल व  चिकित्सा केन्द्र बनाए गए। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/animal-herders--houses-are-vacant--they-are-camping-in-the-city--kda-will-rehabilitate-all-the-allottees-in-the-housing/article-132710"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-11/12111.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। बंधा धर्मपुरा स्थित देव नारायण पशु पालक आवासीय योजना में एक तरफ तो मकानों का आवंटन होने के बाद भी वे खाली पड़े हुए हैं। वहीं दूसरी तरफ कई पशु पालक अभी भी शहर में ही डेरा डाले हुए हैं। एसे सभी पशु पालकों को केडीए अधिकारी अव आवासों में पुनर्वास करवाएंगे।  तत्कालीन नगर विकास न्यास की ओर से पशु पालकों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए बंधा धर्मपुरा में देव नारायण के नाम से आवासीय योजना का निर्माण कराया गया था। करीब 300 करोड़ रुपए की लागत से बनी इस योजना में आवासों के अलावा पशुओं के  लिए बाड़े, पशु आहार के लिए गोदाम, बच्चों के लिए स्कूल व उपचार के लिए चिकित्सा केन्द्र तक बनाए गए। </p>
<p>तत्कालीन कांग्रेस सरकार के समय में बनी इस योजना में पहले चरण में 12 सौ से अधिक आवासों की योजना थी। जिनमें से करीब 738 आवासों का निर्माण किया गया। वहीं 474 को आवंटन पत्र जारी कर दिए थे। लेकिन उनमें से करीब आधे ही पशु पालक योजना में शिफ्ट हो पाए थे।  हालत यह है कि जो पशु पालक योजना में चले भी गए थे लेकिन वे कुछ समय बाद वापस शहर में विभिन्न स्थानों पर बाड़े बनाकर रहने लगे। </p>
<p><strong>15 हजार पशुओं के लिए बाड़े</strong><br />योजना में एक ओर जहां  पशु पालकों के रहने के लिए आवासों का निर्माण किया गया। वहां उनके लिए गोबर गैस प्लांट की स्थापना की गई। जिससे पशुओं के गोबर का उपयोग कर उसी से गैस बनाई जा सके। साथ ही दूध का उपयोग करने के लिए डेरी का निर्माण किया गया। वहीं पशु पालकों के पशुओं को ध्यान में रखते हुए करीब 15 हजार पशुओं के लिए भी बाड़े बनाकर व्यवस्था की गई। आवास व बाड़े पशुओं की संख्या के आधार पर ही आवंटित किए गए। </p>
<p><strong>शहर से पुनर्वास करने की थी योजना</strong><br />शहर में पशुओं के कारण आए दिन होने वाले हादसों को देखते हुए कैटल फ्री शहर की कल्पना के तहत इस योजना को तैयार किया गया था। जिससे पशुओं को शहर से दूर किया जा सके। साथ ही पशु पालकों को भी उनके रहने के लिए अच्छे मकान दिए जा सके। जिससे उनका रहन-सहन व जीवन स्तर बेहतर हो सके। यह योजना तत्कालीन न्यास अधिकारियों द्वारा पशु पालकों व पशुओं के सर्वे के आधार पर तैयार की गई। जिसमें स्वयं के बाड़े वाले और अतिक्रमण कर बाड़े बनाकर रहने वाले सभी को शामिल किया गया था। </p>
<p><strong>35 सौ भृूखंडों की फेज दो योजना</strong><br />देव नारायण एकीकृत योजना फेज दो में करीब 35 सौ भूखंड हैं। इन थूखंडों का लॉटरी से आवंटन किया जा चुका है। जिनके कब्जा पत्र दिए जाने हैं। जैस-जैसे वहां सड़क, बिजली व अन्य सुविधाएं होती जाएंगी वैसे-वैसे वहां कब्जे देते रहेंगे। </p>
<p><strong>आवंटन हो चुका, कब्जा पत्र जारी होंगे</strong><br />गत दिनों केडीए सचिव समेत संबंधित अधिकारियों ने योजना का निरीक्षण किया था। इस दौरान वहां   खाली आवास व  बायो गैस प्लांट समेत अन्य व्यवस्थाओं को देखा था। उसके बाद अधिकारियों ने संबंधित को योजना में खाली आवासों के कब्जे देने व पशु पालकों का शहर से पुनर्वास करवाने के निर्देश दिए थे।  केडीए के अधिशाषी अभियंता पवन शर्मा ने बताया कि पशु पालकों को आवासों का आवंटन तो किया जा चुका है। जिनमें से आधे पशु पालक वहां रहने भी लगे है। मकान खाली नहीं हैं आवंटन सभी का हो चुका है लेकिन कब्जा पत्र जारी नहीं हुए थे। अब धीरे-धीरे कब्जा पत्र जारी किए जा रहे है। कुछ ही पशु पालक ऐसे हैं जिन्हें कब्जा पत्र दिए जाने हैं। कब्जा पत्र मिलने के साथ ही आवंटी बिजली व पानी के कनेक् शन के लिए आवेदन करेगा। जैसे ही सभी सुुविधाएं चालू हो जाएंगी तो उन्हें उन आवासों में शिफ्ट करवा दिया जाएगा। </p>
<p>शर्मा ने बताया कि जब पशु पालकों को आवास आवंटित हो जाएंगे तो उन्हें शहर से हटने के लिए कहा जाएगा। कब्जा मिलने के बाद भी यदि कोई पशु पालक शहर में रहता है तो उसके खिलाफ नियमानुसार जो भी कार्रवाई होगी की जाएगी। </p>
<p><strong>दूरी के कारण वापस आए शहर में</strong><br />पशु पालकों का कहना है कि योजना तो अच्छी है। लेकिन शहर से दूर होने और कई सुविधाओं का अभाव होने के कारण उन्हें वापस शहर में आना पड़ा। किरण लांगरी ने बताया कि पशु पालकों को दूध बेचने के लिए शहर में आना पड़ रहा है। साथ ही शुरुआत में वहां के लिए परिवहन साधनों का भी अभाव था। जिससे कई  पशु पालक वापस शहर  में आकर रहने लगे। योजना में सफाई की भी समस्या रहती है। लांगरी ने बताया कि केडीए की ओर से शेष पशु पालकों को आवंटन पत्र जारी किए जा रहे हैं। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Nov 2025 17:30:46 +0530</pubDate>
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                <title>झूलते बिजली तार बने हादसे का खतरा, ग्रामीणोंं की मांग जल्द हो समस्या का समाधान </title>
                                    <description><![CDATA[बहुत से तारों पर कट लगा हुआ है जिनके ऊपर कोई कवरिंग नहीं हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jhalawar/dangling-electric-wires-pose-a-risk-of-accidents--villagers-demand-a-quick-solution-to-the-problem/article-131169"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-11/y-of-news-(3).png" alt=""></a><br /><p> खानपुर।  खानपुर स्टेट बैंक की गली जो की एक निजी विद्यालय की तरफ जाती है, गली के बीच में रोड पर लाइट के तारों का जंजाल बना हुआ है। यह तार इतने नीचे झूल रहे हैं कि कभी भी किसी की जान ले सकते हैं। इन तारों में बहुत से तारों पर तो कट लगा हुआ है जिनके ऊपर कोई कवरिंग नहीं है कभी भी खतरे का सामना हो सकता है। निजी विद्यालय से आने वाले छात्र व छात्राओं के लिए भी यह एक मार्ग है, इस मार्ग से उनका आना-जाना लगा रहता है और स्टेट बैंक से इस गली में आने वालों को भी कई परेशानी का सामना करना पड़ता है। आए दिन जानवर तो इससे चिपक जाते हैं इन तारों की समस्या का समाधान नहीं किया गया तो कभी भी कोई बड़ा हादसा हो सकता है । ग्रामीणोंं ने मांग की है कि जल्द से जल्द झूलते बिजली के तारों की समस्या का समाधान किया जाए । </p>
<p>हमारे मोहल्ले वासियों के लिए यह एक मुख्य मार्ग माना जाता है इस मार्ग से ही हमारा बाजार आना वह जाना लगा रहता है तथा इस मार्ग से ही पूरे मोहल्ले वासियों का आवागमन होता है इन तारों पर ध्यान दिया जाए। <br /><strong>- उदय लाल मालव, ग्रामीण </strong></p>
<p>हमने विद्युत विभाग को कई बार अवगत भी कर दिया है लेकिन इसका कोई समाधान नहीं हुआ।<br /><strong>- राजा राम मेघवाल, कस्बेवासी</strong></p>
<p>खानपुर के स्टेट बैंक की गली वह एक निजी स्कूलों की गली दोनों का मुख्य मार्ग है यह रोड जिस पर तार झूल हुए हैं, यह झूले हुए विद्युत के तारों से कभी भी हादसा हो सकता है। <br /><strong>-सोहन मेघवाल, कस्बेवासी </strong></p>
<p>इन लाइट के तारों से कस्बेवासी परेशान है। विद्युत विभाग को भी अवगत करा दिया गया है, लेकिन विद्युत पोल लगाने में परेशानी आ रही है। <br /><strong>-सत्तू मालव, कस्बेवासी</strong></p>
<p>पहले भी विद्युत विभाग द्वारा नया विद्युत पोल लगाने गए थे लेकिन मोहल्ले में कुछ व्यक्ति को पोल लगाने से आपत्ति है, यदि मोहल्ले में किसी को आपत्ति नहीं रहती है तो नया विद्युत पोल लगा दिया जाएगा। <br /><strong>-महेश कुमार नागर, कनिष्क अभियंता विद्युत विभाग खानपुर</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>झालावाड़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Nov 2025 16:21:29 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>राजस्थान के अंतिम गांव के हालात : 78 साल बाद भी बिस्लाई गांव में नहीं पहुंचा नल का पानी, ग्रामीण दूषित पानी पीने को मजबूर</title>
                                    <description><![CDATA[जहां मवेशी स्नान करते हैं वहीं मृत जानवरों को किनारे फेंक देते है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/baran/the-situation-in-rajasthan-s-last-village--even-after-78-years--bislai-village-has-not-received-tap-water/article-127339"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/_4500-px)-(31).png" alt=""></a><br /><p>छीपाबड़ौद। छीपाबड़ौद तहसील क्षेत्र की सहजनपुर ग्राम पंचायत का बिस्लाई गांव आज भी बदहाली की दास्तां कह रहा है। आजादी के 78 साल बाद भी यहां पेयजल की सुविधा नहीं है। ग्रामीणों को अब भी नदी से पानी ढोकर लाना पड़ता है। महिलाएं हर रोज कई किलोमीटर दूर नदी तक जाती हैं और सिर पर मटकी रखकर परिवार के लिए पानी लाती हैं। वही नदी, जहां मवेशी स्नान करते हैं और मृत जानवरों को किनारे फेंक दिया जाता है। मजबूरी में ग्रामीण दूषित पानी पीने को विवश हैं। ग्रामीणों का कहना है कि नल-जल योजना, ट्यूबवेल और टैंकर की घोषणाएं केवल कागजों में सिमट गईं। सरपंच से लेकर विधायक-सांसद तक गुहार लगाने के बावजूद हालात जस के तस हैं। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि हर चुनाव में नेताओं ने वादे किए, लेकिन चुनाव जीतने के बाद कोई इस गांव की सुध लेने तक नहीं आया। ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आंदोलन का सहारा लेना पड़ेगा।</p>
<p><strong>नेता व प्रशासन की प्रतिक्रिया</strong><br />बिस्लाई गांव की तस्वीरें साफ दिखा रही हैं कि सरकार और प्रशासन ने यहां की समस्याओं की अनदेखी की है। 78 साल बाद भी अगर ग्रामीणों को नदी से पानी ढोना पड़ रहा है तो यह सरकार की नाकामी है।<br /><strong>-  प्रेम सिंह मीणा, कांग्रेस नेता</strong></p>
<p>इस मामले का जल्द संज्ञान लिया जाएगा। <br /><strong>- अभिमन्यु सिंह कुंतल, उपखंड अधिकारी छीपाबड़ौद।</strong></p>
<p><strong>ग्रामीणों का दर्द उनके ही शब्दों में</strong></p>
<p>आजादी को 78 साल हो गए, लेकिन हमारे गांव में आज तक नल का पानी नहीं आया। जानवर जिस नदी में नहाते हैं, उसी से हमें पीने का पानी भरना पड़ता है। .<br /><strong>- घनश्याम बैरवा, ग्रामीण</strong></p>
<p>जनप्रतिनिधियों से लेकर अधिकारियों तक सबको कहा, लेकिन किसी ने नहीं सुना। गंदा पानी पीने से बच्चों और बुजुर्गों में बीमारियां फैल रही हैं। <br /><strong>- राम भरोस, ग्रामीण</strong></p>
<p>सुबह से दोपहर तक नदी से पानी लाना हमारी मजबूरी है। बारिश में स्थिति और भी विकट हो जाती है। <br /><strong>- नीलू बाई, महिला ग्रामीण </strong></p>
<p>बरसों से सुन रहे हैं कि नल-जल योजना आएगी, पाइप लाइन डलेगी, लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ।<br /><strong>- सूखना बाई, महिला ग्रामीण</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बारां</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Sep 2025 17:48:34 +0530</pubDate>
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                <title>गौशाला में चिकित्सा सुविधाओं का अभाव</title>
                                    <description><![CDATA[कम्पाउंडरों के भरोसे ही बीमार व कमजोर पशुओं का उपचार किया जा रहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/lack-of-medical-facilities-in-the-cowshed/article-125574"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/1ne1ws-(630-x-400-px)-(3)1.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। नगर निगम कोटा दक्षिण की बंधा धर्मपुरा स्थित गौशाला इन दिनों गंभीर समस्याओं से जूझ रही है। यहां हजारों की संख्या में लावारिस हालत में पकड़कर लाए गए पशु रखे गए हैं, लेकिन सुविधा के नाम पर हालात बेहद चिंताजनक हैं। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इतनी बड़ी संख्या में गौवंश के लिए गौशाला में अब तक पशु चिकित्सालय तक संचालित नहीं हो पाया है। कम्पाउंडरों के भरोसे ही बीमार व कमजोर पशुओं का उपचार किया जा रहा है।</p>
<p><strong>ग्रीनबेल्ट पर खर्च, जरूरी काम अधूरे</strong><br />सिंह ने यह भी आरोप लगाया कि निगम की ओर से गौशाला में जो आवश्यक निर्माण कार्य हैं, वे तो अधूरे पड़े हैं। इसके उलट लाखों रुपए खर्च कर ग्रीनबेल्ट विकसित की गई है। लेकिन बीमार पशुओं के लिए चिकित्सा सुविधा और रहने के लिए शेड जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं हुई हैं।</p>
<p><strong>निगम का पक्ष</strong><br />इधर नगर निगम कोटा दक्षिण के अधिकारियों का कहना है कि गौशाला में निर्माण कार्यों की टेंडर प्रक्रिया जारी है। जल्द ही पशुओं के लिए शेड व अन्य सुविधाओं का विकास किया जाएगा।</p>
<p><strong>कायन हाउस की स्थिति और खराब </strong><br />सिंह ने बताया कि किशोरपुरा स्थित कायन हाउस की स्थिति तो और भी खराब है। वहां तो चिकित्सा केन्द्र तक मौजूद नहीं है। कम्पाउंडरों से ही काम चलाया जा रहा है। शहर में निजी स्तर पर करीब दो दर्जन पशु चिकित्सा केन्द्र संचालित हो रहे हैं, लेकिन निगम की गौशालाओं में मूलभूत सुविधा तक नहीं मिल रही है। इससे बीमार पशुओं की देखभाल में कठिनाई आती है।</p>
<p><strong>डॉक्टर आते हैं सप्ताह में एक-दो बार</strong><br />गौशाला समिति के अध्यक्ष जितेन्द्र सिंह ने बताया कि यहां लाए जाने वाले अधिकांश गौवंश बीमार और कमजोर स्थिति में होते हैं। उन्हें लगातार चिकित्सा सुविधा की जरूरत रहती है। लेकिन निगम की ओर से यहां स्थायी पशु चिकित्सक तैनात नहीं है। बोरावास व मंडाना से सप्ताह में केवल एक-दो बार ही डॉक्टर आते हैं। ऐसे में आपात स्थिति में समय पर उपचार न मिल पाने से कई बार गंभीर परेशानी खड़ी हो जाती है। फिलहाल एक रिटायर्ड डॉक्टर को निगम की ओर से नियुक्त किया गया है, जिनसे काम चल रहा है।</p>
<p><strong>टेंडर तक नहीं हुए</strong><br />समिति अध्यक्ष जितेन्द्र सिंह का कहना है कि निगम अधिकारियों को कई बार कहा गया, लेकिन अब तक शेड लगाने का काम शुरू नहीं हुआ। कई कार्यों के तो टेंडर तक जारी नहीं हुए हैं। इससे गौवंश की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर लगातार खतरा बना हुआ है।</p>
<p><strong> बरसात व धूप में खुले में रहने को मजबूर पशु</strong><br />गौशाला परिसर में एक और बड़ी समस्या टीनशेड की कमी है। मानसून में भारी बारिश और गर्मी में तेज धूप से बचाने के लिए शेड जरूरी है, लेकिन निगम अभी तक यह काम भी शुरू नहीं कर पाया है। इस कारण अधिकतर पशु खुले में ही खड़े रहने को मजबूर हैं। बारिश में गीली जमीन पर खड़े रहने और धूप में तपते रहने से उनकी सेहत और बिगड़ रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 02 Sep 2025 16:38:48 +0530</pubDate>
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                <title>कोटा उत्तर वार्ड 68 - ऊंचे डिवाइडर, खुले नालों में गिरते पशु </title>
                                    <description><![CDATA[मुख्य सड़कों पर घूमते रहते पशु राहगीरों की बने मुसीबत]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/kota-north-ward-68---high-dividers--animals-falling-in-open-drains/article-123910"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-08/1ne1ws-(5)20.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहर के कोटा उत्तर नगर निगम वार्ड 68 में समस्याओं का अंबार लगा हुआ है। इस वार्ड में नाले भी खुले पड़े हुए है। गार्डन की दीवारें भी क्षतिग्रस्त है। रहवासियों के अनुसार खुले नाले में कई बार पशु भी गिरकर घायल भी हुए है। यहां की मुख्य सड़कों के डिवाइडर भी बहुत ऊंचे है, जिसके चलते राहगीरों को काफी परेशानी होती है। यहां सीवरेज के चैम्बर व सड़क का लेवल सही नहीं है। इस वार्ड में पानी की भी समस्या है। कम दबाव के चलते घरों में पानी के लिए मोटरों का सहारा लेना पड़ता है। यहां के पार्षद भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि खुले नाले व गार्डन की टूटी हुई दीवार के लिए केडीए सचिव, नगर निगम महापौर को कई बार अवगत करवाया लेकिन समस्या जस की तस है। सामाजिक कार्यक्रम के लिए इस वार्ड में सामुदायिक भवन भी नहीं है। हनुमान मंदिर के थोड़ा आगे कचरा प्वाइंट भी बना हुआ है। यहां बनी नालियों की साफ-सफाई के अभाव के चलते सारे दिन दुर्गन्ध का सामना करना पड़ता है। वार्डवासियों के अनुसार यहां मुख्य सड़क पर डिवाइडर बड़े बने हुए है। वहीं कॉलोनियों में खुले नाले होने से पशुओं के गिरने की आशंका हमेशा बनी रहती है। बारिश के दिनों में नालियां ओवर फ्लो हो जाती है। बापू बस्ती क्षेत्र में कचरा प्वाइंट व कई आवाराद पशु घूमते रहते है। कचरा प्वाइंट पर कचरा इधर-उधर बिखरा रहता है। रहवासियों ने कई बार जनप्रतिनिधियों को अवगत भी करवाया है।</p>
<p><strong>वार्ड का एरिया</strong><br />इस वार्ड में शीतला माता मंदिर, गोरी आश्रम, हरिजन बस्ती एवं बापू बस्ती का क्षेत्र शामिल है।</p>
<p><strong>खुले पड़े बिजली के तार, पेयजल संकट</strong><br />वार्ड की कुछ कॉलोनियों में स्विच बॉक्स खुले है। वहीं बिजली के तार भी खुले है। इस कारण हादसे की आशंका भी बनी रहती है। कुछ कॉलोनियों में पेयजल का संकट भी है। यहां कम दबाव से पेयजल आपूर्ति होने लोग काफी परेशान है। <br /><strong>- सुरज केवट, वार्डवासी</strong></p>
<p><strong>खाली प्लॉट बन रहे कचरा पाइंट</strong><br />खाली पड़े प्लॉट कचरा प्वांइट बने हुए है। यहां कचरे की गाड़ी तो रोजाना आती है लेकिन समय निर्धारण नहीं है। वार्डवासी खाली पड़े प्लॉटों में भी कचरा फेंक देते हैं। बारिश के दिनों दुर्गन्ध की समस्या ज्यादा रहती है।<br /><strong>- गंगा, वार्डवासी</strong></p>
<p><strong>नहीं होती नियमित सफाई</strong><br />यहां नाले व नालियां कचरे से अटे पड़े है। इस कारण निकासी व्यवस्था भी सही नहीं है। पानी आगे नहीं जाने से कई बार नालियां ओवर फ्लो भी हो जाती है। यहां नाले खुले होने से कई बार पशु भी गिर जाते है।<br /><strong>-अनिता, वार्डवासी</strong></p>
<p>वार्ड की समस्याओं के लिए कई बार केडीए सचिव व नगर निगम महापौर से पत्राचार भी किया था। कई बार अधिकारी मौके पर भी आकर गए है, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है। वार्ड में सामुदायिक भवन भी नहीं है। जनप्रतिनिधियों की समस्याओं को सुनते है।      <br /><strong>- मोहनलाल मेघवाल, पार्षद  कांग्रेस, वार्ड 68 </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 18 Aug 2025 15:48:35 +0530</pubDate>
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                <title>हाड़ौती में चीतों की एंट्री शेरगढ़ व भैंसरोडगढ़ अभयारण्य से होगी</title>
                                    <description><![CDATA[गांधी सागर और कुनो में रखे गए चीते अभी एनक्लोजर में हैं। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-entry-of-cheetahs-in-hadauti-will-be-from-shergarh-and-bhainsrodgarh-sanctuaries/article-122623"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-08/oer-(3)1.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मध्यप्रदेश के बाद हाड़ौती में चीतों की एंट्री शेरगढ़ व भैंसरोडगढ़ अभयारणय से होगी। लेकिन, चीते बसाने से पहले दोनों सेंचुरी में उनके भोजन (प्रे-बेस) बढ़ाना होगा। जिसके लिए कोटा वन्यजीव विभाग द्वारा मुख्यमंत्री बजट घोषणा के तहत शेरगढ़ व भैंसरोडगढ़ सेंचुरी में करोड़ों की लागत से प्रेबेस एनक्लोजर बनाए जाएंगे। जिनमें चीतल व चिंकारा रख इनकी संख्या बढ़ाई जाएगी। मध्य प्रदेश की चीता लैंडस्केप में 12 जिलों की सीमाएं लगती हैं, जिसमें कोटा और बारां जिले की सेंचुरी की सीमाएं भी शामिल हैं। </p>
<p><strong>हाड़ौती में  कर रहे भोजन का इंतजाम</strong><br />वन विभाग के मुताबिक, मध्य प्रदेश के गांधी सागर और कुनो में रखे गए चीते अभी एनक्लोजर में हैं। जबकि, गांधीसागर का जंगल भैंसरोडगढ़ से जुड़ा है। ऐसे में यहां जब भी उन्हें हार्ड रिलीज किया जाएगा तो उनकी एंट्री सबसे पहले भैसरोड़गढ़ सेंचुरी में होने की संभावना अधिक रहेगी।  पहले भी तीन बार चीते बारां के जंगल तक आ चुके हैं। इसलिए उनके आने से पहले प्रे-बेस का इंतजाम किया जा रहा है। ताकि उन्हें यहां पर्याप्त भोजन मिल सके।</p>
<p><strong>ह्यूमन फ्रेंडली एनिमल है चीता</strong><br />उन्होंने बताया कि चीता ह्यूमन फ्रेंडली एनिमल है। आज तक के इतिहास में कभी भी ऐसा मामला कभी नहीं आया कि चीता ने किसी इंसान के ऊपर अटैक किया हो या मारा हो। चीता किसी पर गुर्रा नहीं सकता और ना ही पेड़ों पर चढ़ता है। यह जमीन पर रहता है। चीता दो से तीन दिनों तक पानी भी नहीं पीता। वह जिस एनिमल का शिकार करता है उसको खाता है उसी से अपने पानी की पूर्ति कर लेता है।</p>
<p><strong>एक साल में बढ़ेगी हिरणों की संख्या</strong><br />भैंसरोडगढ़ व शेरगढ़ में 20-20 हैक्टेयर के एनक्लोजर बनाए जाएंगे। जिसमें चीतल व चिंकारा रखे जाएंगे। इनमें 40 फीमेल और 10 मेल का रेशो रखा जाएगा। एक  साल में 50 से 80 तक उनकी संख्या बढ़ जाएगी। एनक्लोजर लैपर्ड प्रूफ होगा और इसमें भोजन पानी की पर्याप्त व्यवस्था होगी। जब हिरणों को उनके अनूकूल वातावरण मिलेगा तो ब्रीडिंग होगी और उनकी संख्या में वृद्धी हो सकेगी। </p>
<p><strong>करोड़ों की लागत से बनेंगे प्रे-बेस एनक्लोजर </strong><br />डीएफओ अनुराग भटनागर ने बताया कि प्रे-बेस बढ़ाने के लिए एनक्लोजर बनाए जाएंगे। जिसके लिए विभाग को 5 करोड़ रुपए का बजट भी आवंटित किया गया है। यह कदम न केवल चीतों के संरक्षण में मददगार होगा, बल्कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को भी कम करने में सहायक साबित होगा।</p>
<p><strong>चीता बड़े जीव का नहीं कर पाता शिकार</strong><br />डीएफओ अनुराग भटनागर ने बताया चीते बड़े एनिमल नीलगाय, सांभर का शिकार नहीं कर पाते हैं। अगर चीते ग्रामीण क्षेत्रों में भेड़ बकरी का शिकार कर भी लेता है तो वन विभाग के द्वारा उसका एक-दो दिन में भुगतान कर दिया जाएगा ताकि ग्रामीण आक्रोश नहीं होंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 Aug 2025 16:54:54 +0530</pubDate>
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                <title>कोटा उत्तर वार्ड 69 - साहब! वार्ड में अतिक्रमण की भरमार, नहीं सुन रहे जनप्रतिनिधि हमारी पुकार</title>
                                    <description><![CDATA[आवारा श्वान बने मुसीबत,  क्षतिग्रस्त सड़कों से जूझ रहे लोग ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/kota-north-ward-69---sir--there-is-a-lot-of-encroachment-in-the-ward--public-representatives-are-not-listening-to-our-calls/article-122358"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-08/1ne1ws6.png" alt=""></a><br /><p>कोटा।  <strong>दृश्य-1</strong> पार्क में जंगली घास उगी हुई है तथा पार्क के बाहर लगी ट्रांसफार्मर की डिपी भी खुली है। पार्क के चारों तरफ साफ-सफाई के अभाव में गदंगी फैली हुई है। यहां से गुजरने वाले राहगीर भी परेशान है। रात के समय श्वान वाहनचालकों के पीछे भागते हैं जिससे चालकों के गिरने का भी डर बना रहता है।</p>
<p><strong>दृश्य-2 </strong>नालों में पानी की निकासी नहीं होने के कारण पास स्थित खाली प्लाट में पानी जा रहा है। वहीं नाले पर भी अतिक्रमण है। वहां बने सामुदायिक भवन के बाहर अतिक्रमण होने से सड़क संकरी हो गई है। मुख्य सड़क पर लगी सब्जीमंडी के कारण पशुओं का विचरण रहता है जिसके कारण वहां से गुजर रहे वाहन चालकों के चोटिल होने का खतरा बना रहता है। </p>
<p>शहर में स्थित नगर निगम कोटा उत्तर के 69 वार्ड में बदहाली का आलम है। वार्ड की मुख्य सड़क पर सब्जी मंडी लगने से सड़क संकरी हो गई है तथा शाम को जाम की स्थिति बन जाती है। कोई भी शहर जब तक स्मार्ट नहीं बन सकता जब तक वार्डों की दशा नहीं सुधर जाती। वार्डों में बने नालों पर अतिक्रमण हो रखा है। हालात यह हैं, वार्ड की नालियों की समय से सफाई नहीं होने से जाम हो गई, खाली पड़े प्लॉट में जलभराव की स्थिति बनी हुई है। जमा पानी में  खतरनाक बीमारियों का लार्वा पनपने का खतरा बना रहता है। वहीं संक्रमण फैलने का खतरा भी बना रहता है। कॉलोनी में कचरा संग्रहण डिपर आने के बावजूद भी कचरा सड़क पर फैला रहता है।  वहीं, गली मोहल्लों की सड़कों पर बेसहारा मवेशियों व श्वानों का जमावड़ा भी रहता है। कुछ जगह कम दबाव से हो रही जलापूर्ति से लोग परेशान हैं। कोटा उत्तर नगर निगम के वार्ड 69 के लोग मूलभूत सुविधाओं को तरस रहे हैं। वार्ड में दो पार्क बने हुए है। एक में तो जंगली घास उगी हुई है तथा रहवासियों ने उसे कचरा घर बना रहता है। पार्क के चारों तरफ कचरा फैला हुआ है। वहां पर बनी ट्रांसफार्मर की डिपी के तार भी खुले पड़े है। वार्ड में बनी सीसी रोड में दरारें आ रखी है। वार्ड में बने सामुदायिक भवन के पास लोगों ने अतिक्रमण करके पक्की झोंपड़िया बना रखी हैं तथा उसमें खुलेआम बिजली चोरी कर टेलीविजन देख रहे हैं।</p>
<p>कॉलोनी में पानी की समस्या भी बनी हुई है। धीमी गति से हो रही जलापूर्ति से लोग परेशान हैं। अलसुबह ही मध्यम गति से जलापूर्ति होती है लेकिन 9 बजे बाद से प्रेशर डाउन हो जाता है। मोटर के बिना नलों में पानी नहीं आता। जरूरत के मुताबिक पानी एकत्रित करने के लिए दिनभर मोटर चलानी पड़ती है, जिससे बिजली का बिल बढ़ रहा है। वार्डवासी दोहरी समस्या से गुजर हैं। <br /><strong>- संतोष परिहार, वार्डवासी</strong></p>
<p>वार्ड में सब्जीमंडी है, जहां मवेशियों का जमावड़ा लगा रहता है। कई कॉलोनियों में श्वानों की समस्या अधिक हैं। शाम ढलते ही कॉलोनियों की सड़कों पर वाहनचालकों के पीछे भागते रहते है। इनसे बचने के चक्कर में कई बार गिरकर चोटिल भी हो जाते हैं। वहीं सड़कों के बीच मवेशी घूमते रहते है। जिससे वाहन चालकों को आने-जाने में परेशानी होती है। वहीं, सड़कों के किनारे नाले अटे पड़ है। <br /><strong>- सीताराम अग्रवाल, वार्डवासी</strong></p>
<p> हमारे वार्ड मों नालों का निर्माण चल रहा है। जल्द ही पार्कों की सफाई भी करवाकर उसमें बच्चों के खेलने के लिए झूले भी लगवाने का प्रयास कर रहे है। कचरे उठाने के डिपर भी दो बार आ रहे है। पार्क के पास ट्रांसफार्मर की डिपी में खुले तार के लिए अधिकारियों को बता रखा है। <br /><strong>- ममता कंवर, पार्षद वार्ड 69</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 Aug 2025 13:01:48 +0530</pubDate>
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