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                <title>इनसाइड स्टोरी : पूरी रात रेलवे ट्रैक के पास पर बैठी रही बाघिन  कनकटी, टला ब्रोकन टेल जैसा हादसा</title>
                                    <description><![CDATA[हाइवे एनएच-52  व रेलवे  ट्रैक पास होने से टाइग्रेस की जान को था खतरा। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/inside-story--tigress-kanakati-sat-near-the-railway-track-all-night--averting-a-broken-tail-like-accident/article-135729"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/1200-x-600-px)25.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा टाइगर रिजर्व से बाहर निकली बाघिन एमटी-8 बुधवार को पूरी रात नेशनल हाइवे और रेलवे ट्रैक के पास झाड़ियों में बैठी रही। ऐसे में दोनों तरफ से उसकी जान जोखिम में थी। लेकिन, कनकटी की सुरक्षा में लगे एक दर्जन वनकर्मियों की सतर्कता से संभावित खतरा टल गया। जबकि, एनएच-52 से झालावाड़ की ओर से बड़े वाहन स्पीड से गुजरते हैं। वहीं, रेलवे ट्रैक पर लंबी दूरी की ट्रेनों का लगातार आवागमन रहता है। ऐसे में ब्रोकन टेल जैसा हादसे की आशंका बनी हुई थी। इस पर मुकुंदरा प्रशासन व वनकर्मियों ने वाहनों की गति पर नियंत्रण रखा और रेलवे प्रशासन को मामले से अवगत कराकर ट्रेन की रफ्तार घटाई। जिससे संभावित खतरे को टाला जा सका।</p>
<p><strong>ग्रामीण बोले-तीन दिन खेत तक नहीं देखे</strong><br />बटवाड़ा व दरा गांव के प्रहलाद, सुरेंद्र, महेंद्र कुमार का कहना था कि गांव और जंगल के बीच सिर्फ एक रोड का फासला है। जब बाघिन एनक्लोजर से बाहर निकली तो वनकर्मियों ने उन्हें रात और दिन में अकेले घर से बाहर नहीं निकलने की हिदायत दी। ऐसे में स्थिति कशमशभरी थी। एक ओर बाघिन के हमले का खतरा तो दूसरी ओर खेतों में फसलों को वन्यजीवों द्वारा नुकसान पहुंचाए जाने का डर सता रहा था। हालात यह है कि तीन दिन खेतों तक नहीं जा पाए।</p>
<p><strong>बाघिन और इंसान दोनों की जान को था खतरा</strong><br />बाघिन को जहां रेलेव ट्रेक व वाहनों से खतरा था, वहीं पास ही के दरा गांव के लोगों को बाघिन के हमले का डर सता रहा था। क्योंकि, दरा गांव में करीब एक दर्जन घर है। ऐसे में बाघिन का गांव की ओर मूवमेंट की आशंका से लोग भयभीत थे। वहीं, ट्रैकमेन व होम गार्ड की जान को भी खतरा था। क्योंकि, वाहनों व ट्रेन के शोर से बाघिन स्ट्रेस में थी। इधर,बटवाड़ा के ग्रामीणों का कहना है कि मंगलवार को बाघिन की दहाड़ सुनाई देने से गांव में हड़कम्प मच गया था। लोग डरे हुए थे। वनकर्मियों की टीमें लोगों को सतर्क रहने को कह रहे थे। यह बाघिन रणथम्भौर में एक बच्चे सहित दो जनों को मार चुकी है। ऐसे में उसके हमले का डर सता रहा था। इधर, वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि बाघिन रेलवे व हाइवे से सटे नाले के पास झाड़ियों में बैठी थी। यदि, वह सड़क या ट्रेक पर आ जाती तो बड़ा हादसा होने का खतरा बना रहता।</p>
<p><strong>अप-डाउन रेलवे लाइन पर आई नजर आई थी कनकटी</strong><br />सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, बुधवार देर रात कोटा-रामगंजमंडी रेल खंड स्थित दरा घाटी में दिल्ली-मुंबई रेलवे ट्रैक पर दो ट्रैकमैनों और साथ रहे होमगार्ड को कनकटी बाघिन दिखाई दी। गश्त कर रहे ट्रैकमैन बलजीत सिंह और हेमंत नागर, होमगार्ड को यह बाघिन रात करीब 12:40 बजे अबली मीणी महल के पास अप और डाउन लाइन पर मूवमेंट करती दिखाई दी थी। करीब 2 मिनट तक यह नजारा देखने के बाद ट्रैकमेन बलजीत और हेमंत ने मामले की सूचना तुरंत दरा स्टेशन सुपरवाइजर और कोटा कंट्रोल रूम को दी। सूचना पर बाघिन की तलाश कर रही वन विभाग की टीमें कुछ ही देर में मौके पर पहुंच गई थी। लेकिन तब तक बाघिन गायब हो चुकी थी।</p>
<p><strong>ट्रेन की टक्कर से ब्रोकन टेल की हो चुकी मौत</strong><br />दरा घाटी से गुजर रही रेलवे लाइन पर वर्ष 2003 में रणथम्भौर से आए बाघ ब्रोकन टेल की तेज रफ्तार ट्रेन की टक्कर से मौत हो चुकी है। इसकी पूंछ कटी हुई थी। इसलिए इसे ब्रोकन टेल नाम दिया गया था। यह बाघ रणथंभौर टाइगर रिजर्व से निकलकर लगभग 160 किलोमीटर की यात्रा कर मुकुंदरा दरा के जंगलों में पहुंचा था। बाघ के अलावा भालू, लैपर्ड सहित कई वन्यजीव ट्रेन की चपेट में आने से अकाल मौत के शिकार हो चुके हैं। इसके बावजूद वन विभाग द्वारा रेलवे लाइन व हाइवे पर वन्यजीवों को आने से रोकने व उनकी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं कर सका।</p>
<p>बाघिन का मूवमेंट कई बार रेलवे लाइन तथा कोटा-झालावाड़ राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच-52 ) के नजदीक रहा, जो बाघिन और आमजन दोनों के लिए जोखिमपूर्ण हो सकता था। हालांकि, फील्ड टीमें 24 घंटे अलर्ट पर रहीं जो बाघिन के मूवमेंट की निगरानी रेडियो टेलीमेट्री से निरंतर कर रहे थे।<br /><strong>-सुगनाराम जाट, सीसीएफ मुकुंदरा टाइगर रिजर्व</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Dec 2025 16:51:24 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>पर्यटकों का बायोलॉजिकल पार्क के प्रति घटता रुझान : बड़े वन्यजीवों की कमी और टूटते झूलों से मोह हुआ भंग, न टाइगर न लॉयन, पर्यटक और राजस्व में भारी गिरावट </title>
                                    <description><![CDATA[वर्ष 2024 से 31 अक्टूबर 2025 तक के आंकड़ों से हुआ खुलासा।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/tourists--interest-in-the-biological-park-is-declining--the-lack-of-large-wildlife-and-broken-swings-have-dissipated-their-attraction--neither-tigers-nor-lions-have-been-seen--resulting-in-a-sharp-decline-in-tourist-arrivals-and-revenue/article-132707"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-11/111-(1)25.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। देश-विदेश के पयर्टकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क अपनी चमक खोता जा रहा है। पर्यटकों से गुलजार रहने वाला राजस्थान का सबसे बड़ा पार्क अब वीरान सा नजर आने लगा है। जहां कद्रदानों की महफिलें सजा करती थी वहां आज पर्यटकों की बेरुखी देखने को मिल रही है। जिसका असर, राजस्व में भारी गिरावट के रूप देखने को मिला। गत वर्ष की तुलना में इस वर्ष 31 अक्टूबर तक करीब तीन हजार से ज्यादा पर्यटकों की संख्या घटी है। वहीं, एक लाख रुपए राजस्व का घाटा हुआ है। यह खुलासा वर्ष 2024 व 2025 के 10 माह के आंकड़ों से हुआ है। </p>
<p><strong>3 हजार पर्यटक व 1 लाख से ज्यादा राजस्व घटा</strong><br />वर्ष 2024 व 2025 के जनवरी से अक्टूबर तक के तुल्नात्मक आंकड़ों के विश्लेषण में सामने आया कि वर्ष 2024 के मुकाबले 2025 में पर्यटकों की संख्या में करीब 3 हजार तथा  1  लाख से ज्यादा के राजस्व में गिरावट दर्ज हुई है।  वन्यजीव विभाग से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, गत वर्ष जनवरी से अक्टूबर तक करीब 66 हजार 886 पर्यटक बायोलॉजिकल पार्क में वन्यजीवों के दीदार को पहुंचे थे। जबकि, वर्ष 2025 में 31 अक्टूबर तक यह संख्या घटकर 63 हजार 225 ही रह गई। वहीं, पर्यटकों से होने वाली आय की बात करें तो गत वर्ष अक्टूबर तक करीब 25 लाख 33 हजार से ज्यादा का राजस्व प्राप्त हुआ था। वहीं, अक्टूबर 2025 तक 24 लाख 28 हजार 220 ही हुआ है। </p>
<p><strong>जनवरी के बाद अर्श से फर्श पर पहुंची कमाई </strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के लिए जनवरी माह ही कमाई का होता है। पूरे साल में इसी माह में सबसे ज्यादा पर्यटक घूमने आते हैं। वर्ष 2024 की जनवरी में 13 हजार 356 पर्यटक वन्यजीवों की दुनिया निहारने पहुंचे थे। उनसे पार्क को 4 लाख 96 हजार 740 रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ था। वहीं, वर्ष 2025 में पर्यटकों में 2764 की बढ़ोतरी हुई। साथ ही 1 लाख 7 हजार 730 रुपए का राजस्व ज्यादा प्राप्त हुआ। इस तरह इस वर्ष की जनवरी में कुल 6,04470 रुपए की आय हुई। लेकिन इसके बाद के महीनों में पर्यटकों व राजस्व के आंकड़े अर्श से फर्श पर पहुंच गए।  अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क से मिली जानकारी के अनुसार, गत वर्ष 2024 में मार्च में कुल 7,796 पर्यटक पार्क की सैर पर आए थे। जबकि, वर्ष 2025 के मार्च में घटकर पर्यटकों की संख्या मात्र 4, 628 ही रह गई। यानी गत वर्ष के मुकाबले इस वर्ष 3,168 पर्यटक घट गए। </p>
<p>वनकर्मियों का कहना है कि गर्मी के कारण पर्यटक दिन में नहीं आते। लेकिन, शाम को आते हैं। वर्ष 2024 के मार्च माह में पर्यटकों से बायोलॉजिकल पार्क को 2 लाख 67 हजार 580 रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ था, जिसके मुकाबले इस वर्ष के मार्च में 1 लाख 62 हजार 770 रुपए ही राजस्व एकत्रित हुआ। यानी, गत वर्ष की अपेक्षा इस वर्ष के मार्च में 1 लाख 4 हजार 810 रुपए राजस्व का नुकसान हुआ है। जानकारों का मानना है कि पर्यटक व राजस्व में गिरावट का कारण गर्मी से ज्यादा बड़े एनिमल की कमी है। यहां टाइगर-लॉयन, मगरमच्छ, घड़ियाल जैसे बड़े एनिमल की कमी है। जिसकी वजह से पर्यटकों का रुझान घटा है। </p>
<p><strong>अप्रेल : 1540 पर्यटक घटे व 65 हजार का नुकसान</strong><br />बायोलॉजिकल पार्क में वर्ष 2024 के अप्रेल माह में भीषण गर्मी के बावजूद 3 हजार 484 पर्यटक घूमने आए थे। जबकि, इस वर्ष के अप्रेल में पर्यटकों की संख्या तेजी से घटती हुई 1944 ही रह गई। जबकि, अभी पिछले साल के मुकाबले गर्मी का पारा भी कम रहा। गत वर्ष अप्रेल माह के मुकाबले इस वर्ष 1944 पर्यटकों की संख्या दर्ज की गई। वहीं, राजस्व की बात करें तो 80240 रुपए की आय हुई। यानी, गत वर्ष के मुकाबले इस वर्ष 64370 राजस्व का नुकसान हुआ। </p>
<p><strong>पर्यटकों को अखर रहा टिकट का पैसा </strong><br />बायोलॉजिकल पार्क में शाकाहारी व मांसाहारी मिलाकर कुल 70 से ज्यादा वन्यजीव हैं। यहां आने वाले पर्यटक 55 रुपए खर्च करने के बावजूद बब्बर शेर, टाइगर, मगरमच्छ, घड़ियाल, अजगर सहित अन्य बडेÞ वन्यजीवों का दीदार नहीं कर पाने से निराश होकर लौट रहे हैं। हालांकि, यहां उम्र दराज बाघिन   महक व लॉयनेस सुहासिनी ही दिखाई देती है। लेकिन, भेडिए, पैंथर, जरख एनक्लोजर में उगी झाड़ियों में छिपे रहने से दिखाई नहीं देते। वहीं, कैफेटेरिया नहीं होने से लोगों को चाय-नाश्ते के लिए परेशान होना पड़ता है। इसके अलावा पर्यटकों के बैठने के लिए छायादार शेड व वाटरकूलर भी पर्याप्त नहीं है। पानी के लिए भी भटकना पड़ता है। </p>
<p><strong>गर्मी से ज्यादा बड़े एनीमल की कमी बड़ा कारण</strong><br />वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि कोटा अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क क्षेत्रफल की दृष्टि से प्रदेश का सबसे बड़ा पार्क है। इसके बावजूद यह सुविधाओं व बजट की कमी से जूझ रहा है। यहां पर्यटकों व राजस्व में गिरावट का मुख्य कारण गर्मी से ज्यादा बड़े एनिमल की कमी है।  बजट नहीं होने के कारण बायोलॉजिकल पार्क में पिंजरे यानी एनक्लोजर नहीं बन पा रहे। वहीं, टाइगर-लॉयन जैसे बड़े एनिमल्स की कमी है। जबकि, चिड़ियाघर में  मगरमच्छ, घड़ियाल, अजगर सहित दो दर्जन से अधिक  पक्षी है। यदि, एनक्लोजर बने तो इनकी शिफ्टिंग से पर्यटकों का रुझान बढ़ेगा। जिसका असर राजस्व की बढ़ोतरी के रूप में नजर आएगा।</p>
<p><strong>चिड़ियाघर से वन्यजीवों की नहीं हो पा रही शिफ्टिंग  </strong><br />बायोलॉजिकल पार्क के निर्माण के दौरान 44 एनक्लोजर बनने थे लेकिन प्रथम चरण में मात्र 13 ही बन पाए। जबकि, 31 एनक्लोजर अभी बनने बाकी हैं। जब तक यह एनक्लोजर नहीं बनेंगे तब तक पुराने चिड़ियाघर में मौजूद अजगर, घड़ियाल, मगरमच्छ, बंदर व कछुए सहित एक दर्जन से अधिक वन्यजीव बायलॉजिकल पार्क में शिफ्ट नहीं हो पाएंगे।</p>
<p><strong>द्वितीय चरण में यह होने हैं कार्य </strong><br />पार्क में द्वितीय चरण के तहत 25 करोड़ की लागत से करीब 17 एनक्लोजर, स्टाफ क्वार्टर, कैफेटेरिया, वेटनरी हॉस्पिटल, इंटरपिटेक्शन सेंटर, पर्यटकों के लिए आॅडिटोरियम हॉल, छांव के लिए शेड, कुछ जगहों पर पथ-वे सहित अन्य कार्य शामिल हैं। </p>
<p><strong>पर्यटक बोले-न कैफेटेरिया न लॉयन टाइगर, क्या देंखे</strong><br />परिवार के साथ पार्क घूमने आए बोरखेड़ा निवासी अजय कुश्वाह, राहुल प्रजापति व उस्मान अली ने बताया कि यहां बड़े एनिमल नहीं है, जो है वो भी झाड़ियों में छिपे रहते हैं। साइटिंग नहीं होने से बच्चे भी मायूस हो जाते हैं। टिकट का पैसा अखर रहा है। </p>
<p><strong>झूले टूटे, बच्चे होते मायूस</strong><br />बजरंग नगर निवासी अखिलेश शर्मा व खेड़ली फाटक के सूर्य प्रकाश मेहरा का कहना था कि यहां कुछ झूले लगे हुए हैं, जो भी टूट चुके हैं। कुछ तो टेडे हो गए। जिनमें बच्चों के गिरने का खतरा रहता है। वहीं, वाटरकूलर भी कम ही जगहों पर लगे हैं। शाकाहारी जानवरों के पिंजरों की तरफ कम है। पानी के लिए परेशान होना पड़ता है। </p>
<p>टाइगर-लॉयन लाने के प्रयास लगातार जारी है। हमने यहां प्राकृतिक जंगल, जैव विविधता विकसित की है। पर्यटकों के लिए सुविधाएं विकसित करने का पूरा प्रयास कर रहे हैं। <br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
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                <pubDate>Mon, 17 Nov 2025 15:55:24 +0530</pubDate>
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                <title>वन विभाग की कार्रवाई : अवैध खनन के चलते 10 वाहन जब्त, पेड़ों की कटाई कर के कर रहे थे अवैध रूप से परिवहन </title>
                                    <description><![CDATA[ हरे पेड़ों की कटाई करके अवैध रूप से परिवहन करते हुए 2 वाहनों को जब्त किया गया।  ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/forest-department-action-10-vehicles-seijed-due-to-illegal-mining/article-131249"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-11/6622-copy24.jpg" alt=""></a><br /><p>अलवर। जिले के राजगढ़ वन विभाग ने सुबह अवैध खनन के चलते 10 वाहनों को जब्त किया। क्षेत्रीय वन अधिकारी राहुल फौजदार ने बताया कि राजगढ़ रेंज में नाका सदर एवं डोरोली से अवैध खनन निर्गमन पर रोकथाम के लिए प्रभावी कार्रवाई करके 6 ट्रैक्टर ट्रॉलियों को जब्त करके रेंज कार्यालय परिसर में खड़ा किया गया। </p>
<p>इससे पहले 2 ट्रैक्टर ट्रॉली का अवैध खनन एवं परिवहन करने पर जब्त की गई। इसके अलावा हरे पेड़ों की कटाई करके अवैध रूप से परिवहन करते हुए 2 वाहनों को जब्त किया गया। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 02 Nov 2025 17:33:10 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>चीता लाने से पहले शेरगढ़ सेंचुरी में जैव विविधता का होगा वैज्ञानिक विश्लेषण, सेंचुरी में कीट-पतंगों से दीमक तक पर होगी रिसर्च </title>
                                    <description><![CDATA[ यह अध्ययन तय करेगा कि आने वाले वर्षों में यहां के जंगल को किस दिशा में विकसित किया जा सकता है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/before-bringing-in-cheetahs--a-scientific-analysis-of-the-biodiversity-will-be-conducted-in-shergarh-sanctuary--and-research-will-be-carried-out-on-everything-from-insects-to-termites-in-the-sanctuary/article-130683"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/y-of-news-(4)12.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शेरगढ़ सेंचुरी में अब जंगल की हर धड़कन को समझने की तैयारी शुरू हो गई है। राज्य सरकार ने यहां के जंगल, वन्यजीवों और पारिस्थितिकी तंत्र की गहराई से वैज्ञानिक अध्ययन शुरू करवा रही है। यहां लंबे समय से चीता पुनर्वास की मांग की जा रही है, ऐसे में चीता लाने से पहले जंगल की जैव विविधिता का बारीकी से अध्ययन कर डेटा बेस तैयार किए जाने की तैयारी की जा रही है। यह पहला मौका है जब इस अभ्यारण्य के हर हिस्से, घने पेड़-वनस्पतियां, दुर्लभ पक्षियों, प्राकृतिक जल स्रोतों, कीट-पतंगों से लेकर मिट्टी में रहने वाले दीमक तक का गहराई से अध्ययन किया जा रहा है। रिसर्च कार्य के लिए वन्यजीव विभाग कोटा ने वर्कआॅर्डर भी जारी कर दिया है। </p>
<p><strong>10 हजार हैक्टेयर में होगा अनुसंधान </strong><br />वाइल्ड लाइफ कोटा के डीएफओ अनुराग भटनागर ने बताया कि शेरगढ़ में करीब 10 हजार हेक्टेयर के जंगल में डीप रिसर्च की जाएगी। इससे विभाग को न केवल आॅथेंटिक डाटा मिलेगा बल्कि जंगल के उचित प्रबंधन और पर्यावरण की प्लानिंग में भी सकारात्मक मदद मिल सकेगी। नतीजन, भविष्य में चीता पुनर्वास योजना जैसी संभावनाओं पर ठोस निर्णय लिए जा सकेंगे।</p>
<p><strong>इन 11 बिंदुओं पर होगी स्टडी</strong><br />- टरमाइट और टरमेटोरियम की गिनती: जंगल में कितनी तरह की दीमक प्रजातियां हैं और कितने बाम्बी (टरमेटोरियम) मौजूद है। यदि, अधिक बाम्बी मिलती है तो इसका मतलब होगा कि जंगल स्वस्थ है। <br />मधुमक्खियों की प्रजातियां: शेरगढ़ सेंचुरी में कितनी तरह की मधुमक्खियां हैं, किस पेड़ पर छत्ते बनते हैं और कितने छत्ते मौजूद हैं।<br />- शिकारी पक्षी (रैपटर्स): यहां कौन-कौन से शिकारी पक्षी हैं, वे किन पेड़ों पर रहते हैं और उनकी संख्या कितनी है।<br />- प्राकृतिक जल स्रोत: जंगल में कितने जल स्रोत हैं और किन स्थानों पर प्राकृतिक रूप से पानी भरता है।<br />- सूखे पेड़ों की संख्या: मृत पेड़ों की गणना होगी, जिनमें कई जीव अपना घोंसला बनाते हैं।<br />- डेन ट्री या गुफा वाले पेड़: पेड़ों के खोखले हिस्सों की पहचान की जाएगी, जिनमें मॉनिटर लिजर्ड या सियार जैसे जीव रहते हैं। <br />- पुराने विशाल पेड़ : जंगल में 200-300 वर्ष पुराने पेड़ों की पहचान की जाएगी। <br />- पुनरुत्थान: स्वत: पनपने वाले पेड़ों की गिनती और विदेशी प्रजातियां जैसे लेंटाना या सूबबुल से हो रहे प्रभाव का भी किया जाएगा।  <br />- वाइल्ड फ्रूट्स: जंगल में कौन-कौन से जंगली फल हैं और कौन से जानवर उनका सेवन करते हैं।<br />-  पक्षियों का विश्राम व्यवहार: कौन से पक्षी दिन में और कौन से रात में किस पेड़ पर विश्राम करते हैं। <br />- पक्षियों का विश्राम व्यवहार: कौन से पक्षी दिन में और कौन से रात में किस पेड़ पर विश्राम करते हैं। <br />- कीट-पतंगे, मच्छर और मक्खियां: कौन से फूलों वाले पौधों के आसपास यह पाए जाते हैं और किन समयों पर सक्रिय होते हैं।</p>
<p><strong>90 दिन जंगल में रहकर अध्ययन करेगी रिसर्च टीम </strong><br />डीएफओ भटनागर ने बताया कि इस पूरी प्रक्रिया के लिए 10 लाख रुपए का बजट जारी किया गया है। जिसमें से 8.5 लाख रुपए का वर्क आॅर्डर जारी हुआ है।  टीम के 10 सदस्य 90 दिन तक जंगल में रहकर वैज्ञानिक अध्ययन करेंगे। उन्हें आवश्यक संसाधन भी वहीं उपलब्ध कराए जाएंगे ताकि वे लगातार काम कर सकें। यह अध्ययन न केवल शेरगढ़ की जैव विविधता का साइंटिफिक डेटा तैयार करेगा बल्कि यह भी तय करेगा कि आने वाले वर्षों में यहां के जंगल को किस दिशा में विकसित किया जा सकता है।</p>
<p><strong>वैज्ञानिक जर्नल में प्रकाशित होने पर रिसर्च को मिलेगी मान्यता</strong><br />उन्होंने बताया कि रिसर्च के लिए बायोलॉजिस्ट की टीम तैयार की गई है, जो पेड़-पौधे, पक्षियों, प्राकृतिक जल स्रोतों, कीट-पतंगों से दीमक तक का अनुसंधान करेगी।  हालांकि, इस स्टडी के डाटा को तभी मान्यता मिलेगी जब यह किसी प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल में प्रकाशित होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो संबंधित एजेंसी की सिक्योरिटी राशि जब्त कर ली जाएगी।</p>
<p><strong>वैज्ञानिक डेटा से होगा भविष्य की प्लानिंग</strong><br />यह रिसर्च न केवल शेरगढ़ अभ्यारण्य की पर्यावरणीय स्थिति को समझने में मदद करेगी बल्कि भविष्य में चीता या अन्य वन्यजीव पुनस्थापन योजनाओं की दिशा भी तय करेगी। राजस्थान के लिए यह महत्वपूर्ण प्रयास है, जिससे वैज्ञानिक आधार पर जंगल के प्रबंधन की दिशा तय होगी। शेरगढ़ में जैव विविधता की डीप स्टडी कार्य किया जा रहा है।  <br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग कोटा  </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Oct 2025 16:04:07 +0530</pubDate>
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                <title>पुलिस से वन विभाग तक लाखों का पानी बिल बकाया, विभागों को नोटिस जारी होने के बाद भी जमा नहीं करवाए बिल राशि </title>
                                    <description><![CDATA[जलदाय विभाग के राजस्व वसूली लक्ष्य में सरकारी विभाग सबसे बड़ा अडंगा]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/water-bills-worth-lakhs-are-pending--from-the-police-to-the-forest-department--despite-notices-issued-to-the-departments--the-bills-remain-unpaid/article-128058"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(3)21.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। जलदाय विभाग को हर साल करोड़ों का राजस्व वसूली का लक्ष्य मिलता है लेकिन विभाग वित्तीय वर्ष की समाप्ति तक भी पूरा नहीं कर पाता। नतीजन, 40% टारगेट अधूरा रह जाता है। जिसकी बड़ी वजह सरकारी डिपार्टमेंट है। जलदाय विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, कोटा में सेंट्रल गवर्नमेंट व स्टेट गवर्नमेंट के डिपार्टमेंट को मिलाकर कुल 15.56 करोड़ रुपए बकाया चल रहा है। वहीं, जिले में 1.80 लाख उपभोक्ता है, जिन पर भी बड़ी संख्या में पुराना व नया बिल बकाया है। अधिकारियों का कहना है कि यदि सरकारी विभाग बकाया बिल जमा करवा दे तो 90% टारगेट पूरा हो सकता है। </p>
<p><strong>दादाबाड़ी पुलिस थाने पर 14 लाख बकाया</strong><br />जलदाय विभाग से मिले आंकड़ों के अनुसार, दादाबाड़ी पुलिस थाने पर 14 लाख रुपए का पानी का बिल बकाया चल रहा है, जो कई वर्षों से जमा नहीं करवाया गया। वहीं, किशोरपुरा पुलिस थाने पर 2 लाख रुपए बकाया चल रहा है। विभाग द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बावजूद बकाया बिल जमा नहीं हुए।</p>
<p><strong>60% से कम टारगेट तो जेईईएन-एईईएन को नोटिस </strong><br />नाम न छापने की शर्त पर जल अधिकारियों ने बताया कि जिले में 6 सब डिवीजन कार्यालय है। प्रत्येक सब डिजीवन पर एक एईएन होता है। जिनके अधीन करीब 2-2 जेईएन होते हैं। लेकिन वर्तमान में जेईएन के पद रिक्त होने से अधिकतर सब डिवीजन में 1-1 ही जेईएन कार्यरत हैं। ऐसे में राजस्व वसूली  लक्ष्य के अनुरूप कर पाना चूनौतिपूर्ण हो जाता है। यदि, 60% से कम वसूली होने पर उच्चाधिकारियों द्वारा प्रत्येक एईएन व जेईएन को कारण बताओ नोटिस थमा दिया जाता है। दिन-रात दौड़ने के बावजूद नोटिस के रूप में तनाव झेलना पड़ता है। </p>
<p><strong>सरकारी विभागों ने नहीं भरा 15.56 करोड़ का बिल</strong><br />जिले में सरकारी विभागों पर वर्तमान में 15 करोड़ 56 लाख रुपए का बिल बकाया चल रहा है। इनमें केंद्रीय विभागों पर 56 लाख तथा राज्य सरकार के विभागों पर 15 करोड़ रुपए पानी का बिल कई वर्षों से पेडिंग चल रहा है। केंद्रीय विभागों में नारकोटिक्स डिपार्टमेंट, प्रोजेक्ट इंजीनियर इंस्टूमेंशन, मैनेजर सेंट्रल हाउस, नेशनल सीड्स कॉपरेशन, रीको सहित कई विभागों पर बकाया है। </p>
<p><strong>बिल जमा करवाने में एमबीएस अव्वल</strong><br />जानकारी के अनुसार, जिले के बड़े सरकारी अस्पतालों में बकाया पानी के बिल जमा करवाने के मामले में महाराव भीम सिंह अस्पातल अव्वल रहा है। एमबीएस का वर्तमान में मात्र 1500 रुपए का बिल बकाया चल रहा है। जबकि, राजकीय जिला अस्पताल रामपुरा पर 66 हजार और जेकेलोन चिकित्सालय पर 24 हजार 178 रुपए बकाया चल रहा है। </p>
<p><strong>1.80 लाख उपभोक्ता </strong><br />जल अधिकारियों ने बताया कि कोटा जिले में कुल 1 लाख 80 हजार उपभोक्ता हैं। इनमें से अधिकतर उपभोक्ताओं पर भी बड़ी संख्या में बिल राशि बकाया चल रही है।  हालांकि, हर दो माह में बिल भेजा जाता है। जिसे वसूलने के  लिए कर्मचारी घर-घर दस्तक दे रहे हैं। वहीं, आॅनलाइन प्लेटफार्म भी उपलब्ध करवा रखा है। </p>
<p>सरकारी विभागों पर करोड़ों रुपए का पानी का बिल बकाया चल रहा है। जिसे वसूलने के लिए नोटिस भेज दिए गए हैं। पहले भी भेजे गए थे। शत-प्रतिशत वसूली के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। <br /><strong>- जीवनधर राठौर, एक्सईएन जलदाय विभाग खंड प्रथम</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 27 Sep 2025 16:21:58 +0530</pubDate>
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                <title>चार साल से 25 करोड़ का इंतजार, न कैफेटेरिया बना, न एनक्लोजर</title>
                                    <description><![CDATA[अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क का अब तक शुरू नहीं हुआ द्वितीय चरण का काम।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/waiting-for-25-crores-since-four-years--neither-cafeteria-nor-enclosure/article-121875"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/news74.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। राजस्थान का सबसे बड़ा अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क 4 साल से बजट को तरस रहा है। 25 करोड़ के बजट के अभाव में सुविधाएं विकसित नहीं हो पा रही। वहीं, रियासतकालीन चिड़ियाघर से वन्यजीवों की शिफ्टिंग भी अटकी पड़ी है। यहां न तो कैफेटेरिया है और न ही बड़े वन्यजीवों को रखनेके लिए एनक्लोजर। ऐसे में यहां आने वाले पर्यटकों को टिकट का पैसा अखर रहा है और वन विभाग को कोसते हुए मायूस लौट रहे हैं।  दरअसल, अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में द्वितीय चरण के विकास कार्यों के लिए तत्कालीन सरकार में जायका प्रोजेक्ट के तहत 25 करोड़ रुपए दिए जाने थे,जो अब तक नहीं मिले। इसके बाद वर्तमान सरकार में हाल ही में मुख्यमंत्री बजट घोषणा में 25 करोड़ बजट दिए जाने की घोषणा हुई लेकिन राशि नहीं मिला। हालांकि, कार्य की डीपीआर तैयार करने के लिए मात्र 20 लाख रुपए की राशि मिली है। जिसमें से वन्यजीव प्रशासन ने 5 लाख टेंडर कर 11 एनक्लोजर की डिजाइन ड्राइंग बनवा ली है। अब काम शुरू करने के लिए बजट राशि मिलने का इंतजार हो रहा है।  </p>
<p><strong>30 करोड़ से बना था बायोलॉजिकल पार्क </strong><br />वन्यजीव विभाग के उप वन संरक्षक अनुराग भटनागर ने बताया कि वर्ष 2017 में 30 करोड़ की लागत से बायोलॉजिकल पार्क का निर्माण कार्य शुरू हुआ था। जिसे 2019 में पूरा किया जाना था लेकिन कोविड के 2 साल के कारण काम समय पर पूरा नहीं हो सका। इसके बाद 21 नवंबर 2021 को प्रथम चरण का काम पूरा हुआ था। </p>
<p><strong>प्रथम चरण में यह हुए कार्य </strong><br />बायोलॉजिकल पार्क में कुल 35 एनक्लोजर बनने थे। जिसमें से प्रथम चरण में 8 मांसाहारी, 5 शाकाहारी तथा 5 पक्षियों के बनाए गए हैं। शेष एनक्लोजर बजट के अभाव में नहीं बन पाए। जिसकी वजह से चिड़ियाघर   के दो दर्जन से अधिक वन्यजीव शिफ्ट नहीं हो सके। </p>
<p><strong>आॅपरेशन या पोस्टमार्टम के लिए 16 किमी का चक्कर</strong><br />बायोलॉजिकल पार्क में तैनात वनकर्मियों ने बताया कि वेटनरी हॉस्पिटल नहीं होने से वन्यजीवों के इलाज में परेशानी होती है। इलाज के संबंधित कुछ उपकरण बायोलॉजिकल पार्क में तो कुछ चिड़ियाघर में हैं। वन्यजीवों को यदि दवाइयां देनी हो तो यहां से दे देते हैं लेकिन आॅपरेशन या पोस्टमार्टम करना हो तो उसे करीब 16 किमी दूर चिड़ियाघर लाना होता है। ऐसे में कई बार वन्यजीवों को समय पर इलाज मुहैया करवाना काफी चुनौतिपूर्ण हो जाता है। </p>
<p><strong>द्वितीय चरण में यह होने हैं कार्य </strong><br />पार्क में द्वितीय चरण के तहत 25 करोड़ की लागत से करीब 17 एनक्लोजर, स्टाफ क्वार्टर, कैफेटेरिया, वेटनरी हॉस्पिटल, इंटरपिटेक्शन सेंटर, पर्यटकों के लिए आॅडिटोरियम हॉल, छांव के लिए शेड, कुछ जगहों पर पथ-वे सहित अन्य कार्य शामिल हैं। </p>
<p><strong>चिड़ियाघर से नहीं हो पा रही शिफ्टिंग  </strong><br />बायोलॉजिकल पार्क के निर्माण के दौरान 44 एनक्लोजर बनने थे लेकिन प्रथम चरण में मात्र 13 ही बन पाए। जबकि, 31 एनक्लोजर अभी बनने बाकी हैं। जब तक यह एनक्लोजर नहीं बनेंगे तब तक पुराने चिड़ियाघर में मौजूद अजगर, घड़ियाल, मगरमच्छ, बंदर व कछुए सहित एक दर्जन से अधिक वन्यजीव बायलॉजिकल पार्क में शिफ्ट नहीं हो पाएंगे।</p>
<p><strong>पर्यटकों में नाराजगी, अखर रहा टिकट का पैसा </strong><br />वर्तमान में बायोलॉजिलक पार्क में शाकाहारी व मांसाहारी मिलाकर करीब 70 से ज्यादा वन्यजीव हैं। यहां आने वाले पर्यटक 55 रुपए खर्च करने के बावजूद बब्बर शेर, टाइगर, लोमड़ी, मगरमच्छ, घड़ियाल, अजगर सहित अन्य बड़े वन्यजीव का दीदार नहीं कर पाने से निराश होकर लौट रहे हैं। वहीं, कैफेटेरिया सुविधा नहीं होने से लोगों को चाय-नाश्ते के लिए परेशान होना पड़ता है। इसके अलावा र्प्यटकों के बैठने के लिए छायादार शेड भी र्प्याप्त नहीं हैं।  </p>
<p><strong>पर्यटक बोले-न टाइगर न लॉयन, समय होता बर्बाद </strong><br />बोरखेड़ा निवासी अजय कुश्वाह ने बताया कि गत गुरुवार को परिवार के साथ बायोलॉजिकल पार्क गए  थे। यहां प्रत्येक सदस्य के 55 रुपए टिकट लेने के बावजूद अंदर कोई बड़ा वन्यजीव नहीं दिखा। लॉयन व टाइगर नहीं होने से बच्चे मायूस हो गए। पैंथर है लेकिन वह भी पेड़ की आड़ में ही बैठा रहता है।बड़े एनिमल नहीं होने से पैसे और समय की बर्बादी है। वहीं, कुन्हाड़ी निवासी हरमित सांखला व प्रमोद कुमार कहना है कि पार्क के नाम पर वन विभाग पर्यटकों की जेब काट रहा है। पैसा खर्च करने के बावजूद बब्बर शेर, टाइगर, मगरमच्छ, घड़ियाल, अजगर सहित अन्य बडेÞ वन्यजीव देखने को नहीं मिले।  दादाबाड़ी निवासी कैशव दत्ता, रामगोपाल शर्मा, हेमलता कंवर, प्रियंका नंदवाना का कहना था कि यहां गिनती  के जानवर हैं और बैठने के लिए पर्याप्त बैंच भी नहीं है। कुछ झूले लगे हैं, उनमें से भी कुछ खराब हो रहे। एनीमल के साथ प्ले जॉन में सुविधाएं बढ़ानी चाहिए। </p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के द्वितीय चरण के विकास कार्य के लिए मुख्यमंत्री बजट घोषणा में 25 करोड़ का बजट स्वीकृत हुआ है। डीपीआर तैयार करवाने के लिए ही 20 लाख रुपए की राशि मिली है। जिसमें से 5 लाख रुपए का टेंडर कर 11 एनक्लोजर की ड्रॉइंन डिजाइन बनवा ली है लेकिन कार्य बजट राशि प्राप्त होने पर हो सकेंगे। हालांकि बजट राशि के लिए उच्चाधिकारियों को पत्र लिखा है। जल्द बजट मिलने की उम्मीद है। <br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 28 Jul 2025 15:21:58 +0530</pubDate>
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                <title>जहां 4 बाघों का मूवमेंट, वहां ट्रकों में भरवा रहे थे लकड़ियां </title>
                                    <description><![CDATA[विशेषज्ञों ने वन्यजीवों के शिकार व तस्करी की जताई आशंका । 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/where-4-tigers-move--trucks-were-being-loaded-with-wood/article-117548"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-06/254687.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। रामगढ़ टाइगर रिजर्व के कोर एरिया में ट्रकों में लकड़ियां भरवाकर बेचे जाने के मामले में रविवार को चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। मेज नदी किनारे जिस वनक्षेत्र में ट्रक में बंबूल की लकड़ियां भरवाई जा रही थी, वह जगह क्रिटिकल टाइगर हेबीटाट है। इस क्षेत्र में 4 टाइगर का मूवमेंट रहता है। वहीं, कुछ माह पहले इसी इलाके में बाघिन आरवीटीआर-2 का कंकाल मिला था। जिसकी खाल गायब थी, उसका आज तक सुराग नहीं लगा। इधर, वन्यजीव विशेषज्ञों ने कोर एरिया में जिम्मेदार वन अधिकारियों व कर्मचारियों की मिलीभगत से हो रहे अवैध परिवहन के दौरान तस्करी की आशंका जताई है। वहीं, वन विभाग ने अपनी प्राथमिक जांच रिपोर्ट में लकड़ियों के अवैध परिवहन में एक से अधिक स्टाफ की संलिप्ता स्वीकारी है। </p>
<p><strong>टाइगर मॉनिटरिंग व ट्रैकिंग टीम की गश्त पर उठे सवाल</strong><br />वन्यजीव प्रेमी विट्ठल सनाढ्य ने बताया कि रामगढ़ टाइगर रिजर्व की जेतपुर रेंज के पापड़ा चौक में ट्रक में लकड़िया लोड़ हो रही थी। यहां से एक से डेढ़ किमी दूरी पर बांदरा पोल, रामगढ़ महल है। जहां 4 टाइगर्स का मूवमेंट है। जिनकी मॉनटिरिंग व ट्रैकिंग के लिए वनकर्मियों की टीम गश्त करती है। ऐसे में सवाल उठता है कि बाघों की टेरिटरी में दिनदहाड़े ट्रक लकड़ियां भरकर ले जाते हैं और वनकर्मियों की टीम को दिखाई नहीं दे, ऐसा संभव नहीं है। कर्मचारियों की मिलीभगत  से पिछले ढाई माह से ट्रकों में लकड़ियों का अवैध परिवहन हो रहा है, जो न केवल टाइगर की सुरक्षा से खिलवाड़ है बल्कि वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 का भी सीधा उल्लंघन है। अवैध गतिविधियों से वन सुरक्षा खतरे में पड़ गई। </p>
<p><strong>संलिप्तता स्वीकारी, विस्तृत जांच के आदेश जारी</strong><br />नवज्योति द्वारा खबर प्रकाशित करने के बाद रामगढ़ टाइगर रिजर्व प्रशासन ने जांच कमेटी बनाकर मामले की प्राथमिक जांच करवाई। जिसकी रिपोर्ट में उच्चाधिकारियों ने कोर एरिया में ट्रकों में लकड़ियों के अवैध परिवहन में एक से अधिक स्टाफ की मिलीभगत  स्वीकारी है। हालांकि, डीएफओ अरविंद कुमार झा ने मामले की विस्तृत जांच के आदेश जारी कर दिए हैं। </p>
<p>जेतपुर रेंज में तैनात नाकेदार, फोरेस्टर, फोरेस्ट गार्ड व रेंजर के बयान लिए जा रहे हैं। मामले की विस्तृत जांच की जा रही है। जिसकी रिपोर्ट जल्द ही उच्चाधिकारियों को सौंपेंगे। <br /><strong>-नवीन नारायण, एसीएफ रामगढ़ टाइगर रिजर्व </strong></p>
<p>पापड़ा चौक में जिस जगह ट्रक में बम्बूल की लकड़ियां लोड करवाई जा रही थी, उस जगह से ब्रांदापोल,  रामगढ़ महल, टाइगर रिलोकेशन एनक्लोजर काफी नजदीक है। जबकि, बांद्रापोल के 5 किमी के रेडियस  में नर बाघ आरवीटीआर-1 तथा मादा शावकों का मूवमेंट रहता है। वहीं, महल के पीछे 30 बीघा का एनक्लोजर है, जहां अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क से लाए गए नर शावक को रखा गया है। इसके अलावा रिलोकेशन एनक्लोजर में बाहर से लाए जाने वाले टाइगर्स को शिफ्ट किया जाता है। ऐसे सेंसेटिव इलाके में अवैध परिहव निश्चित रूप से बाघों की बसावट के लिए गंभीर खतरा है। यहां अप्रेल माह से ही वन अधिकारियों व कर्मचारियों की मिलीभगत से लकड़ियों का अवैध परिवहन हो रहा है।            <br /><strong>- विट्ठल सनाढ्य, वन्यजीव प्रेमी बूंदी</strong></p>
<p>क्रिटिकल टाइगर हेबीटाट में ट्रकों व बाहरी व्यक्तियों का प्रवेश और वनसम्पदा की चोरी गंभीर प्रवृति का अपराध है। यह न केवल टाइगर की सुरक्षा में भारी चूक है बल्कि वन्यजीवों के स्वच्छंद विचरण में व्यधान होने के साथ वन संरक्षण अधिनियम 1972 का सीधा उल्लंघन है। मामले की निष्पक्ष जांच करवाई जानी चाहिए और माफियाओं से मिलीभगत करने वाले कर्मचारियों व अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो।<br /><strong>- पृथ्वीराज सिंह राजावत, वन्यजीव विशेषज्ञ बूंदी</strong></p>
<p>प्राथमिक जांच रिपोर्ट में जब वन सम्पदा की चोरी करवाने में वन स्टाफ की संलिप्ता मानी गई है तो संबंधित स्टाफ  को निलंबित किया जाना चाहिए ताकि, आगे की जांच किसी भी तरह से प्रभावित न हो। <br /><strong>- तपेश्वर सिंह भाटी, एडवोकेट एवं पर्यावरणविद्</strong></p>
<p>प्रारंभिक जांच रिपोर्ट आ गई है। जिसमें मौके पर गड़बड़ियों के साक्ष्य मिले हैं। टाइगर रिजर्व के कोर एरिया में ट्रकों  में लकड़ियां भरकर ले जाए जाने में एक से अधिक स्टाफ की संलिप्ता से इंकार नहीं किया जा सकता। नियमानुसार विस्तृत जांच शुरू करवा दी है। सक्षम अधिकारी जांच कर रहे हैं, रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।<br /><strong>- अरविंद कुमार झा, डीएफओ रामगढ़ टाइगर रिजर्व</strong></p>
<p>डीएफओ से तथ्यात्मक रिपोर्ट मिल गई है। इसमें स्टाफ की मिलीभगत प्रतीत होना माना है। इसकी जांच के आदेश दे दिए हैं। रिपोर्ट आने के बाद नियमानुसार कार्रवाई  की जाएगी। <br /><strong>- सुगनाराम जाट, संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक, वन्यजीव </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 16 Jun 2025 16:23:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पृथ्वी दिवस पर एफटीआई में वृक्षारोपण, सहायक वन संरक्षक ने वृक्षों के महत्व पर दिया जोर </title>
                                    <description><![CDATA[ पृथ्वी दिवस के अवसर पर मंगलवार को वन प्रशिक्षण संस्थान (FTI) परिसर में दोपहर 1:30 बजे सहायक वन संरक्षक (ACF) प्राची चौधरी और अन्य वन अधिकारियों द्वारा वृक्षारोपण किया गया]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/plantation-assistant-forest-conservator-in-fti-on-earth-day-emphasized/article-111634"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-04/5541.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। पृथ्वी दिवस के अवसर पर मंगलवार को वन प्रशिक्षण संस्थान (FTI) परिसर में दोपहर 1:30 बजे सहायक वन संरक्षक (ACF) प्राची चौधरी और अन्य वन अधिकारियों द्वारा वृक्षारोपण किया गया। </p>
<p>इस पहल का उद्देश्य परिसर में हरियाली बढ़ाना और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना है। प्राची चौधरी ने वृक्षों के महत्व पर जोर दिया और सभी से पर्यावरण संरक्षण में योगदान करने का आग्रह किया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 22 Apr 2025 14:05:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बूंदी में तीसरी बार फिर से वनभूमि पर बनी सड़क</title>
                                    <description><![CDATA[14 माह में बूंदी वनमंडल की 3 रेंजों में बन चुकी सड़कें]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/road-built-on-forest-land-for-the-third-time-in-bundi/article-111328"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-04/rtrer2.png" alt=""></a><br /><p>कोटा।  बूंदी जिले में लगातार वन संरक्षण अधिनियम 1980 कानून की जमकर धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। वन अफसरों की मौन स्वीकृति से वन क्षेत्रों में धड़ाधड़ सड़कें बनवाई जा रही हैं। मामले का खुलासा होने के बावजूद वन विभाग का टॉप मैनेजमेंट कार्रवाई की बजाए मूक दर्शक बनकर तमाशा देख रहा है। इसी का नतीजा है कि 14 माह में ही बूंदी वनमंडल की तीन अलग-अलग रेंजों में तीन सड़कें बन गई, लेकिन कार्रवाई एक में भी नहीं हुई। नतीजा है कि सवा साल में ही तीसरी बार फिर से भारत सरकार के एफसीए कानून का उल्लंघन कर सरकारी एजेंसी पीडब्ल्यूडी ने रक्षित वनक्षेत्र में दिनदहाड़े डामर सड़क बना दी। दरअसल, नैनवां रैंज का जजावर-बी वनखंड में पीडब्ल्यूडी ने 100 मीटर लंबी डामर सड़क बना दी। नवज्योति मौके पर पहुंची तो मामले का चौंकाने वाला खुलासा हुआ और वन अधिकारियों और पीडब्ल्यूडी की मिलीभगत के गठजोड़ का भांडा फूटा। </p>
<p><strong> सड़क के दोनों ओर880 वर्गमीटर वनभूमि की नष्ट</strong><br />सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, रोड निर्माण के लिए पीडब्ल्यूडी ने सड़क के दोनों ओर करीब 880 वर्गमीटर वनभूमि खुर्द-बुर्द कर दी गई है। सड़क की एक तरफ 2 मीटर तथा दूसरी तरफ 3 मीटर चौड़ाई में वनभूमि खोदी गई। जिससे पेड़-पौधे, झाड़ियां नष्ट होने से छोटे वन्यजीवों का प्राकृतिक रहवास बर्बाद हो गया।  असल में, पीडब्ल्यूडी ने कागजों में सड़क की 3.75 मीटर चौड़ाई एप्रोच की हुई है लेकिन मौके पर 3.80 मीटर में डामरीकरण किया हुआ है।</p>
<p><strong>100 मीटर लंबी, 3.80मीटर चौड़ी बनी डामर सड़क</strong><br /> बूंदी वन मंडल की नैनवां रेंज के जजावर वनखंड-बी में पीडब्ल्यूडी ने मार्च के प्रथम सप्ताह में 100 मीटर लंबी और 3.80 मीटर चौड़ी डामर सड़क बना दी। इसके बावजूद वन अफसर खामौश रहे। 3 मार्च को दैनिक नवज्योति के पास नवनिर्मित सड़क की जीपीएस कोर्डिनेट के साथ फोटो आने पर मामले की पड़ताल की तो वन अफसरों की पीडब्ल्यूडी के साथ मिलीभगत का गठजोड़ खुला। असल में, जजावर-बी वनखंड नैनवां रेंज में आती है, यहां रेंजर से वनरक्षक तक स्टाफ तैनात रहता है। फिर भी फोरेस्ट लैंड में सड़क बनना वन अफसरों की पीडब्ल्यूडी के साथ मिलीभगत प्रतित होती है।  पीडब्ल्यूडी द्वारा जजावर से कोढ़ी गांव तक 3 किमी डामर सड़क बनाई जानी थी। जिसमें से 700 मीटर रास्ता फोरेस्ट लैंड है।</p>
<p>पीडब्ल्यूडी वनभूमि पर डामर सड़क बना दे और वन अधिकारियों व कर्मचारियों को पता न चले, यह संभव नहीं है। जजावर वनखंड नैनवां रेंज में आता है, ऐसे में यहां एक दर्जन से ज्यादा वनकर्मियों की तैनाती रहती है। यह सड़क वन अफसरों के इशारे पर बनी है। इससे पहले भी बूंदी वनमंडल के जंगलों मे दो बार सड़कें बन चुकी हैं। वन विभाग के उच्चाधिकारी मामले की जांच करवाकर दोषी अफसरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। <br /><strong>-तपेश्वर सिंह भाटी, पर्यावरणविद् एवं एडवोकेट</strong></p>
<p><strong>यह बोले-पीडब्ल्यूडी अधिकारी</strong><br />हमने जजावर वनखंड-बी (वनभूमि) पर कोई सड़क नहीं बनाई है। नेशनल हाइवे 148-डी से 200 मीटर लंबी डामर सड़क बनाई है, जो रेवन्यू लैंड में है। <br /><strong>-मुकेश कुमार, एक्सईएन पीडब्ल्यूडी नैनवां</strong></p>
<p>जजावर वनभूमि पर डामर सड़क बनाए जाने का मामला मेरी जानकारी में नहीं है। इस संबंध में एक्सईएन से बात की जा सकती है। हम एफसीए का उल्लंघन  नहीं करते हैं, जहां की परमिशन मिलती है, वहीं सड़क बनाते हैं। <br /><strong>-इंद्रजीत सिंह मीणा, एसई पीडब्ल्यूडी बूंदी </strong></p>
<p><strong>यह बोले वन अधिकारी</strong><br />जजावर वनखंड-बी (वनभूमि) पर कोई सड़क नहीं बनी है। रेवन्यू लैंड में बनी है। पीडब्ल्यूडी अधिकारियों को नोटिस देकर पाबंद किया है। पटवारी व हमारे सर्वेयर द्वारा सर्वे कर पंचनामा बनवाया है। फोरेस्ट लैंड में सड़क नहीं बनी है।<br /><strong>-भंवर सिंह, जजावर वनखंड नाका प्रभारी</strong></p>
<p>जजावर वनखंड-बी की वनभूमि पर 100 मीटर सड़क बनी है, जो मेरे पदस्थापन से 3 माह पहले बनी थी। मैंने 20 फरवरी को ज्वाइन किया था। दूसरी सड़क की एनओसी के लिए जब सर्वे किया तब यहां सड़क बन जाने का मामला संज्ञान में आया था। डीएफओ द्वारा पीडब्ल्यूडी को कार्रवाई के लिए लिखा है। <br /><strong>-कविता जाट, रेंजर नैनवां रेंज बूंदी वनमंडल</strong></p>
<p>फोरेस्ट लैंड में 100 मीटर सड़क बनी है। कार्यकारी एजेंसी को नोटिस दे दिया है। वन संरक्षण अधिनियम 1980 का उल्लंघन तो हुआ है। आगे की कार्रवाई  की जा रही है। वहीं, शेष वनभूमि पर सड़क बनाने से एजेंसी को रोक दिया गया है। <br /><strong>-देवेंद्र सिंह भाटी,डीएफओ बूंदी वनमंडल </strong></p>
<p>मामला संज्ञान में आया है। वनभूमि पर 100 मीटर सड़क बनी है। बूंदी डीएफओ से तत्थात्मक रिपोर्ट मांगी है, जिसके आने के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। वहीं, इस मामले में संबंधित वन कर्मचारी को डीएफओ द्वारा कारण बताओ नोटिस दिया गया है। <br /><strong>-सोनल जोरिहार, संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक कोटा</strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 19 Apr 2025 14:44:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>असर खबर का - रेंजर सहित तीन वनकर्मियों को मिली चार्जशीट</title>
                                    <description><![CDATA[सरकार ने माना मिलीभगत से बनी सड़क व प्लोटिंग। 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/impact-of-news---three-forest-workers-including-the-ranger-got-chargesheet/article-111183"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-04/2567rtrer2.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोटा वनमंडल की लाडपुरा रेंज के लखावा प्लांटेशन-8 में अवैध सीसी सड़क व आवासीय प्लोटिंग कटने के मामले में सरकार ने रेंजर सहित तीन वनकर्मियों के खिलाफ चार्जशीट दिए जाने की कार्रवाई की है। दैनिक नवज्योति में लगातार खबरें प्रकाशित होने के बाद वन विभाग ने मामले की जांच की थी।  जिसमें  तत्कालीन लाडपुरा रेंजर कुंदन सिंह माली, सहायक वनपाल धर्मराज बैरवा तथा वन रक्षक मनोज गैनन को अतिक्रमियों के साथ मिलीभगत कर वनभूमि में अवैध सीसी सड़क बनवाने व आवासीय प्लोटिंग कटवाने का आरोपी मानते हुए चार्जशीट देने की कार्रवाई की। </p>
<p><strong>अधिकारियों व कर्मियों की भू माफियों से संलिप्ता मानी</strong><br />सरकार ने लखावा प्लांटेशन-8 में सीसी सड़क व आवासीय प्लोटिंग कटवाने में रेंजर सहित तीनों वनकर्मियों की भू-माफियाओं के साथ मिलीभगत व संलिप्ता मानी है। चार्जशीट में बताया गया कि वनभूमि में अवैध प्लोटिंग कटने तथा सीसी सड़क बनने से रोकना इन वनकर्मियों का दायित्व था। साथ ही भू-माफियाओं के खिलाफ पुलिस में मुकदमा दर्ज करवाना था लेकिन इन्होंने अपने दायित्व का निर्वाहन न करते हुए प्लोटिंग व सीसी सड़क बनने दी। जिससे इनकी भू-माफियाओं के साथ संलिप्ता स्पष्ट होती है। वही, वनभूमि पर अतिक्रमण कर प्लांटेशन नष्ट करने पर अवैध प्लोटिंगकर्ताओं के विरुद्ध किसी भी तरह की फौजदारी कार्रवाई अमल में नहीं लाई गई।</p>
<p><strong>इन्हें मिली चार्जशीट </strong><br />संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक सोनल जोरिहार ने लाडपुरा रेंज के तत्कालीन रेंजर कुंदन सिंह माली व सहायक वनपाल धर्मराज बैरवा को 16सीसी तथा वनरक्षक मनोज गैनन को 17 सीसी की चार्जशीट दी है। </p>
<p><strong>नवज्योति ने खोली थी वन अधिकारियों की माफियाओं से सांठगांठ</strong><br />दैनिक नवज्योति ने 23 मई 2024 को खबर प्रकाशित कर लखावा प्लांटेशन-8 में अवैध प्लोटिंग कटवाने व सीसी सड़क बनवाने में वन अधिकारियों की भू-माफियाओं के साथ गठजोड़ उजागर की थी। वृक्षारोपण के नाम पर लाखों रुपयों का भ्रष्टाचार भी खोला था। इसके बाद ही वन विभाग के टॉप मैनेजमेंट ने मामले की जांच शुरू करवाई।  हालांकि, तत्कालीन डीएफओ, सीसीएफ व एसीएफ के खिलाफ चार्जशीट दिए जाने की कार्रवाई प्रक्रियाधीन है। </p>
<p><strong>गबन करने वाले अधिकारियों को बचाने का प्रयास</strong><br />जांच अधिकारी तत्कालीन कोटा सीसीएफ ने अपनी रिपोर्ट में प्लांटेशन में अवैध प्लॉटिंग व सीसी सड़क बनवाने वाले अधिकारियों को दोषी मानते हुए उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई (चार्जशीट) दिए जाने की अनुशंसा कर दी। जिसके आधार पर सरकार ने तत्कालीन वन अधिकारियों व कर्मचारियों को चार्जशीट देने के आदेश जारी कर दिए। लेकिन, जांच अधिकारी ने इसी प्लांटेशन में हुए 21.42 लाख के भ्रष्टाचार को गौण कर दिया और पौधों की झूठी संख्या बताकर फर्जी दस्तावेज तैयार कर सरकारी धन का गबन करने वाले भ्रष्ट अधिकारियों को बचा लिया। भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई में दोहरे मापदंड अपनाए जा रहे हैं। जिससे करप्शन को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा मिल रहा है।</p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />लखावा प्लांटेशन-8 में अवैध सीसी सड़क व प्लोटिंग कटने के मामले में लाडपुरा रेंज के तत्कालीन रेंजर कुंदन सिंह माली, सहायक वनपाल धर्मराज बैरवा व वन रक्षक मनोज गैनन को चार्जशीट दी गई है। <br /><strong>- सोनल जोरिहार, सीसीएफ कोटा</strong><br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 18 Apr 2025 17:03:33 +0530</pubDate>
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                <title>विदेशी तकनीक का उपयोग करें तो बुझ सकती है जंगल की आग, एआई तकनीक का भी हो सकता है उपयोग</title>
                                    <description><![CDATA[पुराने संसाधन व निगम की दमकलों के भरोसे ही आग पर काबू पाने के प्रयास किए जा रहे हैं]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/forest-fire-can-be-extinguished-if-foreign-technology-is-used/article-110191"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-04/257rtrer36.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कैली फार्निया, अमेजोन और आस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी आग को काबू पाने के लिए वहां जिस तरह से फिक्सड विंग एयरप्लेन व हैली कॉप्टर वाटर बम का उपयोग किया जा रहा है। उसी तरह से कोटा के आस-पास के जंगलों में लग रही आग पर काबू पाने के लिए भी उन विदेशी तकनीक का उपयोग किया जा सकता है। जंगल में आग लगने पर इन तकनीक का इस्तेमाल किया जाए तो स्थायी रुप से आग से निजात मिल सकती है। हाल ही में एमेजोन व आस्ट्रेलियां के जंगलों में विशाल आग लगी थी। हालांकि आस्ट्रेलिया के जंगल में तो आग अभी भी लगी हुई है। यह काफी बड़े एरिया में फेल चुकी है। यहां आग से कई इलाके तबाह होने के साथ ही कई लोगों की जान तक जा चुकी है। उसके बावजूद वहां की सरकार व प्रशासन द्वारा आग को काबू करने के लिए हवाई तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। जिससे न तो वाहनों के जंगल में पहुंचने की समस्या है और न ही दमकलों के धंसने व फंसने की समस्या है। काफी ऊंचाई से पानी की बौछार कर आग पर आसानी से काबू पाया जा सकता है। इसी तरह से कैलीफार्नियां के जंगल में भी आग काफी बड़े एरिया में फेली थी। जिसे काबू पाने के लिए हैली कॉप्टर तकनीक का उपयोग किया गया था। साथ ही ड्रोन सिस्टम से पानी की बौछार कर आग पर काबृू पाजा जा सका था। उसी तरह की तकनीक व संसाधनों का कोटा व आस-पास के इलाकों के जंगल में लग रही आग को बुझाने में भी किया जा सकता है। लेकिन हालत यह है कि कोटा के लाड़पुरा और मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व का हजारों बीघा वन क्षेत्र होने के बावजूद वन विभाग के पास आग बुझाने के आधुनिक संसाधन तक नहीं है। अभी भी पुराने संसाधन व निगम की दमकलों के भरोसे ही आग पर काबू पाने के प्रयास किए जा रहे हैं। </p>
<p><strong>यहां आए दिन खतरा</strong><br />शहर में हाल ही में मुकुन्दरा विहार क्षेत्र के जंगल में, जवाहर सागर डेम के जंगल में,झालीपुरा के फोरेस्ट एरिया में, कोलीपुरा घाटी के पास जंगल क्षेत्र में, जगपुरा समेत अन्य क्षेत्रों में आग लग रही है। जिसे बुझाने के लिए कोटा शहर से नगर निगम की दमकलों को भेजा जा रहा है। लेकिन वन क्षेत्र अंदरूनी इलाका होने से वहां तक दमकलों को पहुंचने में ही समस्या हो रही है। कई दमकलें रास्ते में धंस रही है तो किसी के टावर फट रहे है। कोई दमकल रास्ते में ही खराब हो रही है तो किसी जगह पर दमकलों से लम्बे पाइप के जरिय आग बुझाने का प्रयास किया जा रहा है। </p>
<p><strong>एआई तकनीक का भी हो सकता है उपयोग</strong><br />जिस तरह से वर्तमान में हर जगह एआई तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। उसी तरह से आग बुझाने के संसाधनों के रूप में भी एआई तकनीक का उपयोग किया सकता है। इस तकनीक से आग पर जल्दी और समय रहते काबू पाने में अधिक मदद मिल सकती है। </p>
<p><strong>गर्मी में रोजाना लग रही आग</strong><br />शहर में जिस तरह से तापमान 40 डिग्री से अधिक और 44 डिग्री के पार पहुंच चुका है। ऐसे में शहर के आस-पास चाहे रावतभाटा रोड हो या झालावाड़ रोड के नजदीकी जंगल व वन क्षेत्र की सूखी झाड़ियों में भीषण आग लग रही है। आग फेलने का कारण तेज हवा चलना भी है। सूखी घास व झाड़ी में आग तेजी से फेलने के साथ ही हवा से वह काफी बड़े एरिया तक फेल भी रही है। जिसे काबू पाना वन विभाग के अलावा नगर निगम के फायर अनुभाग के लिए भी चुनौती बनता जा रहा है। साथ ही आग बुझाने में समस्याओं का सामना भी करना पड़ रहा है। </p>
<p><strong>आधुनिक तकनीक हो तो सुविधाजनक</strong><br />कोटा में दो तरह का फोरेस्ट एरिया है। एक वाइल्ड लाइफ व दूसरा टेरीटोरियल। लाड़पुरा रैंज में टेरीटोरियल एरिया है। जहां सीमित संसाधनों से आग बुझाने का प्रयास किया जाता है। साथ ही निगम की दमकलों से आग पर काबू पाया जाता है। वहीं आग को बढ़ने से रोकने के लिए जगह-जगह पर जेसीबी से गड्ढ़े किए जाते है। जंगल में आग लगने पर उसे बुझाने के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग तो हो सकता है लेकिन यह उच्च स्तर का मामला है। तकनीकी का उपयोग करने से आग बुझाना सुविधा जनक हो जाएगा। <br /><strong>- इंद्रेश यादव, आरओ लाड़पुरा</strong></p>
<p><strong>सज्जनपुरा व हिमाचल में हैली कॉप्टर का उपयोग</strong><br />जंगल में आग बुझाने जाने में कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इसके  लिए वन विभाग को अपने यहां आधुनिक संसाधनों का उपयोग करना चाहिए। जिस तरह से हिमाचल व उत्तराखंड के जंगल में आग लगने पर और उदयपुर के सज्जनपुरा की  पहाड़ी में आग लगने पर उसे बुझाने के लिए हैली कॉप्टर का उपयोग किया गया था। कोटा में भी विदेशी व आधुनिक तकनीक का उपयोग जंगल की आग बुझाने में किया जा सकता है। फोरेस्ट एरिया में वाटर लाइन सिस्टम बनाया जा सकता है। जिससे आग को फेलने से रोकने में मदद मिलेगी। <br /><strong>- राकेश व्यास, सीएफओ नगर निगम दक्षिण</strong></p>
<p><strong>वन विभाग को जुटाने होंगे संसाधन</strong><br />फोरेस्ट एरिया में आग लगने पर निगम की दमकलों के भरोसे रहते हैं। जबकि दमकलों के पहुंचने में दिक्कत आती है। कोटा के जंगलों में अधिकतर ग्राउंड एरिया में आग लगती है। ऐसे में यहां हैली कॉप्टर तकनीक का उपयोग नहीं किया जा सकता। उससे हवा चलने पर आग फेलने का खतरा रहता है। कई साल पलहे सुझाव दिया था कि हर पंचायत मुख्यालय पर ट्रेैक्टर टैंकर रखा जाए। जिसके खेत व जंगल में धंसने की समस्या भी नहीं रहती । ट्रेक्टर आसानी से किसी भी एरिया में जा सकता है। साथ ही आधुनिक फायर वाटर सिस्टम का उपयोग कर जंगल की आग को बुझाया जा सकता है। <strong> - संजय शर्मा, सेवानिवृत्त सीएफओ </strong></p>
<p><strong>कोटा में भी आधुनिक संसाधनों की दरकार</strong><br />कोटा के आस-पास वन क्षेत्र और मुकुन्दरा के फोरेस्ट एरिया में आग लगने पर उसे बुझाने के लिए विभाग की टीम लगी हुई है। फिलहाल आग को बढ़ने से रोकने के लिए आग वाली जगह से 50 से 60 फीट की दूरी  पर गड्ढ़े कर आग को ब्रेक किया जाता है। जिससे वह आगे नहीं फेल सके। उसके अलावा विभाग के फायर फाइटर्स सिस्टम का भी उपयोग किया जाता है। वैसे विभाग के पास थर्मल ड्रोन है जिसकी मदद से रात के समय भी फोरेस्ट में आग लगने पर उसका पता लगाया जा सकता है। जिससे टीम को वहां पहुंचने में सुविधा होती है। वैसे विदेशी व आधुनिक तकनीक का कोटा में जंगल की आग बुझाने में उपयोग हो सकता है। इसके लिए उच्च स्तर पर निर्णय लिया जा सकता है। लेकिन हैली कॉप्टर का उपयोग अधिकतर क्राउन फायर में किया जाता है। जिसमें आग पेड़ से अधिक ऊंचाई तक हो। जबकि कोटा व राजस्थान में इस तरह की आग नहीं होकर अधिकतर ग्राउंड की आग लगती है। <br /><strong>- मुथु एस. डीएफओ मुकुन्दरा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 09 Apr 2025 14:41:04 +0530</pubDate>
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                <title>असर खबर का - अब पानी में ही मगरमच्छ को दबोचेगा वन्यजीव विभाग</title>
                                    <description><![CDATA[नवज्योति की खबरों के बाद जागा वन विभाग।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/effect-of-news---now-the-wildlife-department-will-catch-the-crocodile-in-the-water-itself/article-109619"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-04/257rtrer-(1)8.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। अब तक आपने सूना होगा कि पानी में मगरमच्छ से बैर नहीं ले सकते, लेकिन अब यह संभव है। जी हां, कोटा वन्यजीव विभाग न केवल पानी में मगरमच्छ से बैर ले रहा बल्कि उसे पानी में ही दबोचने की कवायद में जुट गया है। इसके लिए वन्यजीव विभाग ने ऑस्ट्रेलियाई तकनीक से प्रदेश का पहला फ्लोटिंग क्रोकोडाइल केज तैयार किया है। राजस्थान में कोटा पहला ऐसा जिला है, जिसके पास पानी में तैरता पिंजरा है। जिसकी मदद से वन्यजीव विभाग नदी, तालाबों व नहरों में से भी हिंसक मगरमच्छों को पकड़ सकेगा। दरअसल, सीवी गार्डन के तालाब में पिछले साल से दो मगरगच्छों ने ढेरा जमा रखा है। जिसकी वजह से मॉर्निंग वॉकर्स दहशत में है। दैनिक नवज्योति ने लगातार खबरें प्रकाशित की थी, इसके बाद वन्यजीव विभाग ने मगरमच्छ को पकड़ने के लिए पानी में तैरता पिंजरा तैयार करवाया। </p>
<p><strong>ऑस्ट्रेलिया में नदियों से होता है मगरमच्छ का रेस्क्यू</strong><br />वन्यजीव विभाग के डीएफओ अनुराग भटनागर ने बताया कि वर्ष 2024 में सहायक वनपाल प्रेम कंवर शक्तावत मगरमच्छ रेस्क्यू प्रशिक्षण के लिए ऑस्ट्रेलिया गई थी। वहां हिंसक हो चुके मगरमच्छों को नदी-तालाबों से रेस्क्यू किया जाता है। इसके लिए ऑस्ट्रेलिया में पानी में तैरते पिंजरों का उपयोग किया जाता है। ऐसे में प्रेम कंवर ने वहां पिंजरों को बनाने की टेक्निक समझी और उनके सुझाव पर हमने कोटा में फ्लोटिंग क्रोकाइल केज तैयार करवाया। जिसके निर्माण में करीब 1.15 लाख रुपए की लागत आई।</p>
<p><strong>एल्यूमिनियम के गोल पाइपों पर टिका पिंजरा</strong><br />डीएफओ भटनागर ने बताया कि फ्लोटिंग कैज करीब 10 फीट लंबा और 5 फीट चौड़ा है। इसे रखने के लिए अलग से ट्रॉली भी बनाई गई है। जिसके सहारे पिंजरे को नदी, तालाब व नहरों में आसानी से लगाया जा सकता है। पिंजरे के दोनों ओर एल्यूमिनयम के गोल पाइप लगाए गए हैं, जिससे पिंजरा पानी में नहीं डूबता बल्कि तैरता  है। पिंजरे की लागत 65 हजार तथा ट्रॉली निर्माण में 50 हजार रुपए का खर्चा आया है। </p>
<p><strong>हादसों का रहता खतरा </strong><br />सीवी गार्डन के बोटिंग व जॉय ट्रेन कॉन्ट्रेक्टर शिव शर्मा ने बताया कि गार्डन के तालाब में मगरमच्छ लंबे समय है। जबकि, इसी तालाब में पैदल बोटिंग करवाई जाती है। वहीं, जॉय ट्रेन भी यहीं हैं। ऐसे में लोगों व बच्चों की मौजूदगी अधिक रहती है। ऐसे में हादसे का खतरा बना रहता है। मगरमच्छ रेस्क्यू को लेकर हमने वन विभाग के अधिकारियों को कई बार पत्र लिखे थे। लेकिन उन्होंने ध्यान नहीं दिया। इस पर दैनिक नवज्योति ने लगातार खबरें प्रकाशित की। जिसकी बदौलत ही वन विभाग के अधिकारियों ने पानी में तैरता पिंजरा बनवाकर मगरमच्छ को पकड़ने में गंभीरता दिखाई। </p>
<p><strong>मगरमच्छ को ट्रैप करने के लिए बांधा 5 किलो मांस</strong><br />सहायक वनपाल प्रेम कंवर ने बताया कि सीवी गार्डन के तालाब में फ्लोटिंग क्रोकोडाइल केज लगा दिया है। जिसमें मगरमच्छ को ट्रैप करने के लिए करीब 5 किलो  मांस भी बांधा है। जैसे ही मगरमच्छ मांस खाने की कोशिश करेगा, वैसे ही वह पिंजरे में कैद हो जाएगा। पिंजरे व मगरमच्छ के मूवमेंट की नियमित मॉनिटरिंग की जा रही है। उम्मीद है, जल्द ही मगरमच्छ को ट्रैप कर लिया जाएगा। </p>
<p><strong>मॉर्निंग वॉकर्स में दहशत, बतखों पर कर चुका हमला </strong><br />सीवी गार्डन में बोटिंग व जॉय ट्रेन संचालन में लगे कर्मचारियों ने बताया कि गत वर्ष 9 दिसम्बरको तालाब में छिपा मगरमच्छ ने बतखों पर हमला कर दिया था। बतखों के जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज सुन स्टाफ व पर्यटक सकते में आ गए थे। मौके पर जाकर देखा तो मगरमच्छ बतखों पर हमला कर रहा था। एक बतख को तो खा गया और दूसरी को लहुलूहान कर दिया। लोगों की आवाजाही होने से मगरमच्छ वापस पानी में  चला गया। घटना के बाद से ही लोगों में दहशत है। </p>
<p><strong>इनका कहना</strong><br />अब तक पानी में मगरच्छ का रेस्क्यू संभव नहीं था लेकिन  फ्लोटिंग क्रोकोडाइल केज तैयार होने के बाद अब यह संभव है। हमने सीवी गार्डन में मगरमच्छ को पकड़ने के लिए तालाब में पिंजरा लगा दिया है और उसमें करीब 5 किलो मांस भी बांधा गया है। वन्यजीव विभाग की टीम नियमित मॉनिटरिंग कर रही है। जल्द ही प्रदेश में पहली बार पानी में मगरमच्छ को रेस्क्यू करने में हमें सफलता मिलेगी। <br /><strong>- अनुराग भटनागर, उप वन संरक्षक, वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 04 Apr 2025 13:57:28 +0530</pubDate>
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