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                <title>मैं चंबल गार्डन हूं... कभी कोटा का दिल था, आज टूटे सपनों का मंजर हूं मैं, क्या फिर लौटेंगे मेरे सुनहरे दिन?</title>
                                    <description><![CDATA[कभी मेरी हरियाली, लक्ष्मण झूला और चंबल की लहरें लोगों को मोह लेती थीं ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/i-am-chambal-garden----i-was-once-the-heart-of-kota--today--i-am-a-scene-of-shattered-dreams--will-my-golden-days-ever-return/article-160210"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-07/1200-x-600-px)-(1)65.png" alt=""></a><br /><p>कोटा । मैं चंबल गार्डन हूं । कभी कोटा का दिल था,आज टूटे सपनों का मंजर हूं मैं । इसीलिए आज मैं अपनी ही बदहाली की कहानी सुनाने जा रहा हूं। आज मेरी हालत उस घायल व्यक्ति जैसी हो गई है, जो सड़क दुर्घटना के बाद अस्पताल के बिस्तर पर इलाज का इंतजार कर रहा हो। फर्क सिर्फ इतना है कि उस मरीज के पास डॉक्टर पहुंच जाते हैं, लेकिन मुझे अब तक कोई ऐसा डॉक्टर नहीं मिला जो मेरी टूटी हुई खूबसूरती को फिर से संवार सके। एक समय था जब कोटा आने वाला हर पर्यटक कहता था कि यदि चंबल गार्डन नहीं देखा तो मानो कोटा देखा ही नहीं। परिवार, बच्चे, बुजुर्ग, नवविवाहित जोड़े और दूर-दराज से आने वाले पर्यटक सबसे पहले मेरी ओर ही कदम बढ़ाते थे। मेरी हरियाली, रंग-बिरंगे फूल, सजे हुए लॉन, ठंडी हवाएं और मेरे पास से बहती चंबल नदी हर किसी का मन मोह लेती थी। मेरे किनारे बहती चंबल नदी मेरी सबसे बड़ी पहचान रही है। नदी की कल-कल करती लहरें और शाम के समय पड़ती सुनहरी किरणें मेरी सुंदरता में चार चांद लगा देती थीं। लोग घंटों बैठकर इस नजारे को अपनी आंखों में कैद करते थे। बच्चों की खिलखिलाहट, बुजुर्गों की सैर और परिवारों की हंसी मेरे अस्तित्व की सबसे बड़ी ताकत थी। </p>
<p>फिर बात आती थी मेरे सबसे खास आकर्षण लक्ष्मण झूले की। जब उस पर कोई चलता था तो उसे हरिद्वार की याद आ जाती थी। हवा के साथ झूले का हल्का कंपन लोगों के चेहरे पर रोमांच और खुशी ले आता था। कितने ही पर्यटक यहां फोटो खिंचवाकर अपने सफर को यादगार बनाते थे। यह झूला केवल लोहे और तारों का पुल नहीं था, बल्कि मेरी पहचान का सबसे मजबूत प्रतीक था। मेरे म्यूजिक सिस्टम की मधुर धुनें भी लोगों को अपनी ओर खींचती थीं। शाम ढलते ही जब संगीत की स्वर लहरियां वातावरण में गूंजती थीं तो लगता था जैसे पूरा गार्डन जीवंत हो उठा हो। बच्चे दौड़ते थे, युवा तस्वीरें लेते थे और बुजुर्ग सुकून के पल बिताते थे। मेरे फव्वारे, सुंदर कुंज, बैठने की जगहें और सजे-संवरे रास्ते लोगों को घंटों रोक लेते थे।</p>
<p><strong>आज मेरी बदहाली देखकर हर कोई हो जाता है मायूस</strong><br />आज मेरी हालत ऐसी हो गई है कि जो लोग मुझे देखने आते हैं, वे मेरी सुंदरता की नहीं, बल्कि मेरी दुर्दशा की चर्चा करते हैं। उनके सवाल मुझे चीर देते है। मैं उनकी आंखों में निराशा साफ देखता हूं। कितनी ही फिल्मों, एल्बमों, प्री-वेडिंग शूट और पारिवारिक तस्वीरों का मैं गवाह रहा हूं। कितने ही बच्चों ने मेरे आंगन में दौड़ना सीखा और कितने ही परिवारों ने यहां अपने जीवन के खूबसूरत पल बिताए।</p>
<p><strong>अब मुझे नया जीवन चाहिए, ताकि फिर लौटे मेरी पुरानी रौनक</strong><br />आज सिर्फ मरम्मत नहीं, बल्कि नए जीवन की जरूरत है। जैसे किसी गंभीर घायल मरीज को अनुभवी डॉक्टर, बेहतर इलाज और देखभाल की आवश्यकता होती है, वैसे ही मुझे भी संवेदनशील योजना, नियमित रखरखाव और आधुनिक सुविधाओं की जरूरत है। यदि समय रहते मेरा उपचार नहीं हुआ तो आने वाली पीढ़ियां केवल मेरी पुरानी तस्वीरें देखकर ही अंदाजा लगा पाएंगी कि कभी मैं कितना सुंदर हुआ करता था। मैं प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और शहरवासियों से सिर्फ इतना कहना चाहता हूं कि मुझे फिर से वही पहचान लौटा दीजिए। मेरी हरियाली फिर महके, मेरे रास्ते फिर मुस्कुराएं, मेरा लक्ष्मण झूला फिर रोमांच जगाए, मेरे संगीत की धुनें फिर गूंजें और चंबल नदी के किनारे फिर परिवारों की हंसी सुनाई दे। मैं आज भी उसी चंबल नदी के किनारे खड़ा हूं, लेकिन अब मेरी आंखें उस दिन का इंतजार कर रही हैं जब कोई मेरी ओर देखकर यह नहीं कहेगा कि यह गार्डन बदहाल हो गया है, बल्कि गर्व से कहेगा—यही है कोटा का चंबल गार्डन... हाड़ौती की धड़कन, शहर की असली पहचान और हर पर्यटक की पहली पसंद।</p>
<p><strong>पर्यटकों की जुबानी: चंबल गार्डन को फिर चाहिए नई पहचान</strong><br />बचपन से चंबल गार्डन को देखता आया हूं। पहले यहां परिवार के साथ पूरा दिन निकल जाता था। हरियाली, संगीत, फव्वारे और लक्ष्मण झूला इसकी खास पहचान थे। अब यहां पहले जैसी रौनक नजर नहीं आती। अगर इसका आधुनिक तरीके से पुनर्विकास हो जाए तो यह फिर से कोटा का सबसे बड़ा पर्यटन केंद्र बन सकता है।<br /><strong>-माेहित गौतम, निवासी नांता, कोटा</strong></p>
<p>जब भी हमारे रिश्तेदार बाहर से आते थे तो सबसे पहले उन्हें चंबल गार्डन घुमाने लेकर जाते थे। लेकिन अब उन्हें यहां लाकर वैसी खुशी महसूस नहीं होती जैसी पहले होती थी। यह सिर्फ एक पार्क नहीं, बल्कि कोटा की पहचान है। प्रशासन को इसकी सुंदरता लौटाने के लिए प्राथमिकता से काम करना चाहिए।<br /><strong>-स्वाति जैन, निवासी सरस्वती कॉलोनी, कोटा</strong></p>
<p>हम बचपन में कई बार पिकनिक मनाने चंबल गार्डन आते थे। उस समय यहां की खूबसूरती देखते ही बनती थी। लंबे समय बाद दोबारा आया तो काफी बदलाव की उम्मीद थी, लेकिन बदहाली देखकर निराशा हुई। अगर इसे अच्छी तरह विकसित किया जाए तो बूंदी और आसपास के जिलों के लोग भी बड़ी संख्या में यहां घूमने आएंगे।<br /><strong>-प्रदीप मेघवाल, निवासी बूंदी</strong></p>
<p>सोशल मीडिया और लोगों से चंबल गार्डन की बहुत तारीफ सुनी थी, इसलिए परिवार के साथ घूमने आई हू। चंबल नदी का प्राकृतिक सौंदर्य आज भी आकर्षित करता है, लेकिन गार्डन वेसा बिल्कुल नहीं जैसा सुना और बताया गया था। यह जगह राष्ट्रीय स्तर का पर्यटन स्थल बनने की क्षमता रखती है। यदि सुविधाएं और सौंदर्यीकरण बेहतर हो जाए तो मध्यप्रदेश से भी बड़ी संख्या में पर्यटक यहां आएंगे।<br /><strong>-मुस्कान, निवासी मध्यप्रदेश</strong></p>
<p><strong>इनका कहना</strong><br />यहां कार्यभार संभाले करीब ढाई वर्ष हो चुके हैं। इस दौरान उन्होंने कई बार उच्च अधिकारियों को गार्डन की जर्जर होती स्थिति, रखरखाव की कमी और आवश्यक मरम्मत कार्यों के संबंध में अवगत कराया, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। सभी महत्वपूर्ण फैसले उच्च अधिकारियों के स्तर से ही होते हैं। ऐसे में हम चाहकर भी अपनी ओर से कोई बड़ा कदम उठाने में असमर्थ हैं। हांलाकि हमारे द्वारा ढाई साल के अंदर यहां पर कोई विकास कार्य नहीं किया गया, यह भी सत्य है।<br /><strong>-गोविंद दिलावर, अधीक्षक चंबल गार्डन</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 15:01:04 +0530</pubDate>
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