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                <title>जानें राज-काज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[सूबे की ब्यूरोक्रेसी की नजरें 31 जनवरी पर टिकी हैं। इस दिन ब्यूरोक्रेसी को नया मुखिया जो मिलेगा। ब्यूरोक्रेसी में चर्चा नए मुखिया को लेकर कम, लेकिन इस समय वाले मुखिया को लेकर ज्यादा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/61e51d742d482/article-4027"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-01/rajkaj.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>नजरें 31 की तरफ</strong><br /> सूबे की ब्यूरोक्रेसी की नजरें 31 जनवरी पर टिकी हैं। इस दिन ब्यूरोक्रेसी को नया मुखिया जो मिलेगा। ब्यूरोक्रेसी में चर्चा नए मुखिया को लेकर कम, लेकिन इस समय वाले मुखिया को लेकर ज्यादा है। हर कोई लंच केबिनों में बतियाता है कि पाली वाले आर्य साहब को जो भी नई जिम्मेदारी मिलेगी, उससे राज में रोल ज्यादा ही रहेगा। भाई साहब की फितरत भी भीड़भाड़ में रहने की है, जो राज भी उनकी इस वर्किंग स्टाइल को सतोलते हुए सीएमओ में ही ठिकाना देने का मानस बना चुका है। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि निरंजनजी को पब्लिक ग्रीवंस को सुनकर उनका निराकरण का जिम्मा मिलने के चांस कुछ ज्यादा ही है।</p>
<p><br /> <strong>माथापच्ची सूची बनाने की</strong><br /> आजकल राज का काज करने वाले भाई लोग एक सूची बनाने में जुटे हैं। लेकिन सूची में तीन-चार से ज्यादा नाम नहीं जुड़ पा रहे। काज निपटाने वाले लंच क्लब में इस सूची पर रोज कवायद कर रहे हैं। सूची भी छोटे-मोटों की नहीं, बल्कि राज करने वाले बेदाग और साफ छवि वाले लोगों की है। केवल 30 लोगों की सूची में से दस को छांटना भी मुश्किल हो रहा है। अब तो वे दूसरे वर्गों की मदद भी ले रहे हैं। हर आने वालों से पूछ रहे हैं कि ऐसे दस मंत्रियों के नाम बताओ, जिनकी बेदाग और साफ छवि है।</p>
<p><br /> <strong>वर्कर्स का दुखड़ा</strong><br /> इन दिनों दोनों तरफ वर्कर्स की कोई पूछ नहीं है। उनकी कोई सुनने वाला भी नहीं है, सो अपनी मन की बात चाय की दुकानों पर एक दूसरे को कह कर संतोष लेते हैं। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के दफ्तर तो दु:खड़ा रोने का अंदाज ही कुछ अलग है। वर्कर बोलने लगे हैं कि राज में तो पूछ है नहीं, हमारे तो केवल पुण्यतिथि और जयंतियों के मौके पर फूल चढ़ाने तक सीमित कर दिया। गुजरे जमाने में सरकार के आने पर वर्कर्स का रैळा आता था, अब तो केवल फोटो खिंचवाने वाले चंद चेहरे ही नजर आते हैं। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में भगवा के ठिकाने में भी दास्तान कुछ इसी तरह की है।</p>
<p><br /> <strong>याद बीते दिनों की </strong><br /> आजकल खाकी वालों पर शनि की दशा कुछ ज्यादा ही है। शनि के दोष से कभी चौराहे पर तो कभी गली में पिट रहे हैं। और तो और चूड़ियों वाली तक हाथ पैर चला जाती है। बेचारे खाकी वाले भी क्या करे, उनको अपने ऊपर वालों पर भरोसा नहीं है, कब इंक्वायरी बिठा दे। सो पिटने में ही अपनी भलाई समझते हैं। करे भी तो क्या पुलिस का इकबाल जो खत्म हो गया। अब टाइगर और लॉयन तक दहाड़ मारना भूल गए। पीटर और गामाज के बारे में सोचना तो बेईमानी होगी। विक्टर की मजबूरी जगजाहिर है। उनके काम में खलल की किसी में दम नजर नहीं आ रहा। अब तो खाकी वाले भाई लोग ऊपर वालों से प्रार्थना कर रहे हैं कि कोई उनके बीते दिन लौटा दे ताकि खाकी का इकबाल कायम रहे।</p>
<p><br /> <strong>चर्चा में सियासत</strong><br /> सियासत तो सियासत ही होती है, इसे किए बिना कई भाई लोगों की पार भी तो नहीं पड़ती है। कई नेता तो ऐसे हैं कि उनकी बिना किसी मुद्दे के भी सियासत करना उनकी मजबूरी बन जाती है। सियासत करने के मामले में भगवा वालों के साथ ही हाथ वाले भाई लोग भी कम नहीं हैं। सिर्फ वे मौका तलाशने में रात-दिन गुजार देते हैं। अब देखो ना मत्स्य क्षेत्र में एक घटना को लेकर इतनी सियासत हो गई कि नेताओं को खुद समझ नहीं आ रहा कि आखिर माजरा क्या है। वो तो भला हो खाकी वाली कप्तान का, जिसने अपना मुंह खोल दिया, जिससे कइयों के सपनों पर पानी फिर गया, वरना तैयारी तो सूबे को बंद कराने तक की थी। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में चटकारे लेकर बतियाते हैं कि बेचारे नेताओं का कोई कसूर नहीं है, ठाले बैठने पर पब्लिक उनको नेता भी तो नहीं मानती है।</p>
<p><br /> <strong>एक जुमला यह भी</strong><br /> सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि कोरोना को लेकर है। यह जुमला हर गली-चौराहों पर पब्लिक की जुबान आ गया है। जुमला है कि कोरोना सूबे के राज के लिए लाइफ लाइन बन गया है। जब भी दिल्ली से जोधपुर वाले भाई साहब पर कोई प्रेशर आता है, कोरोना लाइफ लाइन बन कर आए बिना नहीं रहता।<br />  </p>
<p><strong>        एल. एल. शर्मा<br /> </strong></p>
<p><strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं) </strong></p>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Mon, 17 Jan 2022 14:33:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Administrator]]></dc:creator>
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                <title>जानें राज-काज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[तीखे तेवर मैडम के]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B8/article-3902"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-01/rajkal1.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>तीखे तेवर मैडम के</strong><br />जब से दिल्ली वाली मैडम के तेवर तीखे हुए हैं, तब से हाथ वाले कई भाइयों के चेहरे की हवाइयां उड़ी हुई हैं। इस कड़ाके की ठण्ड में भी भाई लोगों के पसीने आ रहे हैं। खासतौर से उनके, जिन्होंने इधर-उधर हाथ पैर मारे हैं। दस जनपथ की चिट्ठी मिलने के बाद रोजाना भगवान के प्रसाद चढ़ाने वालों की लाइनें लंबी होने लगी हैं। चिट्ठी भी ऐसी वैसी नहीं, बल्कि बड़ी टेढ़ी है। उसमें लिखे एक एक अक्षर के मायने हैं। कुर्सी को जागीर नहीं समझे वाली लाइन तो बोल्ड में है। अब उन एक दर्जन रत्नों की हालत पतली है, जिन्होंने कार्यकर्ताओं को अपने पास फटकने तक नहीं दिया। भ्रष्टाचार के आरोपों में फंसे पांचों रत्न तो अब भाई साहब के भरोसे है।</p>
<p><strong><br />मैडम क्यों बिफरी</strong><br />राजधानी की एक महापौर मंच से क्या बिफरी, कइयों की चूलें हिल गई। चूलें भी उनकी हिलीं, जो पहली महिला की मंडली में शामिल हैं। खुलेआम राज की कमी को गिनाने में मैडम ने कोई कंजूसी नहीं की। सीएमओ को मिली सच्चाई की राज का काज करने वालों में चर्चा जोरों पर है। मोदियों के चौक और मिश्र राजाजी के रास्ता में बनी कोठियों को लेकर अचानक बिफरने के पीछे का माजरा समझ में आया तो सिविल लाइन्स भाईसाहब की भी चिंता बढ़ गई। लाखों के इस खेल से कोटा वाले भाईसाहब ने पल्ला झाड़ लिया, तो जोधपुर वाले साहब को बीच में आना पड़ा। </p>
<p><br /><strong>साफगोई गोविन्दजी की</strong><br />हाथ वाले गोविन्दजी भाईसाहब की साफगोई से राज के साथ काज करने वालों की भी नींद उड़ गई है। पीसीसी चीफ के कुर्सी संभालने के बाद भाईसाहब बिना लाग लपेट की बातों को लेकर पहले भी कई बार सुर्खियों में आ चुके हैं। मगर इस बार की साफगोई राज के भी गले नहीं उतर रही। अब उनको कौन समझाए कि 2013 के दंश के झेल चुके गोविन्द जी भाईसाहब ने वो कहा, जो उनके पास अपने ही लोगों का फीड बैक है। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि डोटासरा साहब की साफगोई कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए स्वच्छ राजनीति का प्रतीक भी है।</p>
<p><br /><strong>भाग्य तीसरे मोर्चे का</strong><br />पड़ोसी सूबे में चुनाव जंग की हुंकार यहां तक सुनाई देने लगी है। तीसरे मोर्चे के बातें करने वाली छकड़ी की नजर भी यूपी चुनाव पर टिकी है। छकड़ी का तर्क है कि मरु प्रदेश में तीसरा मोर्चे का भाग्य अखिलेश के रिजल्ट पर टिका है, तब तक सोचना भी बेकार है। छकड़ी को चिन्ता सता रही है कि अगर मुलायम वाले अखिलेश ने हाथ वालों से हाथ मिला लिया, तो सारे किए धरे पर पानी फिर जाएगा। दो हफ्ते से छकड़ी रात दिन यूपी जंग में ही डूबी हुई है।</p>
<p><br /><strong>दो पाटन के बीच</strong><br />इन दिनों दारू वाले महकमे के साहब लोगों की रातों की नींद और दिन का चैन उड़ा हुआ है। उनके चेहरों पर चिन्ता की लकीरें साफ दिखाई देने लगी हैं। राज का काज करने वाले लंच केबिन में बतियाते हैं कि राज की दो तरह की नीतियों में वे में घनचक्करी बने हुए हैं। एक मद्य निषेध नीति है, जो सुरा प्रमियों पर लगाम लगाती है। दूसरी आबकारी नीति है, जो सुरा बिक्री को बढ़ावा दे रही है। और तो और एक कमाया, पांच का नुकसान अलग से है। स्टेट इनकम का दुरुपयोग भी थमने का नाम नहीं ले रहा, सो बेचारे टारगेट पूरा करने के लिए भी जाड़ों के मौसम में पसीने बहा रहे हैं। </p>
<p><br /><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />राज का काज करने वालों में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा मोटा नहीं, बल्कि बड़े साहबों का अचानक दिल्ली प्रेम से जुड़ा है। सूबे के दो दर्जन से ज्यादा बड़े साहबों को दिल्ली से प्रेम हो गया। वे दिल्ली के लिए हाथ पैर भी मारने के साथ जोड़ तोड़ भी बिठा रहे हैं। हमने भी पता लगाया तो माजरा समझ में आया कि कई बड़े साहब किसी न किसी बहाने अभी से मैडम से नजदीकियां बनाने के जुगाड़ में हैं। इसके लिए दिल्ली सबसे बढ़िया जगह है। अभी डेपुटेशन करा कर दिल्ली में बैठो और डेढ़ साल तक मेल मुलाकात करो। बाद में डेढ़ साल बाद वापस आकर मनमाफिक कुर्सी के मजे लो।</p>
<p>        </p>
<p><strong>                एल.एल. शर्मा<br />    (यह लेखक के अपने विचार हैं) </strong></p>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Mon, 10 Jan 2022 11:06:36 +0530</pubDate>
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                <title>जानें राज-काज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[राजकाज से जाने प्रदेश की अंदर की बातें........]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B8/article-3751"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-01/rajkal.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>चर्चा बड़बोले रत्नों की</strong><br /> सूबे इन दिनों राज के बड़बोले रत्नों की चर्चा जोरों पर है। रत्नों का भी कोई सानी नहीं, कब और किस समय तथा कौनसे स्थान पर अपना मुंह खोले दे, पता नहीं है। उनका बोलने का अंदाज भी निराला है, कई बार तो राज की मौजूदगी में एक-दूसरे को नीचा दिखाए बिना नहीं रहते। अब देखो ना कई रत्न तो खुद को बैलगाड़ी वालों से भी ज्यादा समझ कर गलतफहमी पालते हैं, जिन्होंने इस बार तो राज को भी ब्लेकमेल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। राज का काज करने वाले भी लंच केबिनों में बतियाते हैं कि कई बार तो राज करने वाले भी अपने इन बड़बोले रत्नों की वजह से परेशानी में पड़े बिना नहीं रहते। अब ईमानदारी का पाठ पढ़ाने वाले इन रत्नों को कौन समझाए कि यह पब्लिक है, सब जानती है।</p>
<p><strong><br /> बहाने राजनीति के</strong><br /> सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर बहानों की राजनीति काफी चर्चा में हैं। चर्चा है कि राजनीति के कई बहाने होते हैं, इसमें जो माहिर होता है, वह घाटे से सौ कोस दूर रहता है। दोस्त और दुश्मन को बदलने के लिए कोई न कोई बहाना होता है। अब देखो ना, जो दशरथ फूटी आंख नहीं सुहाता था, उसकी आड़ में सत्ता के लिए अटल के बहाने संघ से नजदीकियां बढ़ने लगी थी। अब 13 साल तक अटलजी को भूल चुके भाई लोग फिर हैप्पी बर्थ डे की राग अलाप रहे हैं।</p>
<p><strong><br /> शेखावाटी में नई तलाश</strong><br /> भगवा भाई लोगों की नजर अब शेखावाटी के तीन जिलों पर टिकी है। मैडम के झुंझनूं में पगफेरे  के बाद से नए समीकरण की जोरों से तलाश है। गुजरे जमाने में छाया की तरह साथ रहने वाले बन्नाजी के साथ कई छुटभयै भी अब साइड में होते नजर आ रहे हैं। मैडम की इस यात्रा के भी भाई लोग अपने अपने हिसाब से मायने निकाल रहे हैं। भाई लोगों के साथ दिल्ली वालों के भी समझ में आ गया कि गुटबाजी कभी खत्म होने वाली नहीं है, सो अपने हिसाब से ही राजनीति करने में भलाई है।</p>
<p><br /> <strong>तलाश पेशेवरों की</strong><br /> इतिहास गवाह है कि कोई भी राज पेशेवरों और बुद्धिजीवियों के बिना नहीं चल सकता। अब यह उन पर निर्भर करता है कि वे राज को किस रास्ते पर चलाते हैं। उनसे राय लेने का भी राज का अलग ही अंदाज होता है। यह राज भी मीडिया, वन, पर्यावरण, खान और उद्योग के क्षेत्रों में प्रबुद्ध और विशेषज्ञों की तलाश में जुटा है। अब जिन लोगों को यह जिम्मा सौंपा है, वो समझ नहीं पा रहे हैं कि राज को किस लाइन के लोगों की जरूरत है।</p>
<p><strong><br /> चर्चा एनआरआईज की</strong><br /> आजकल सूबे में दोनों तरफ की राजनीति को लेकर चिंतन मंथन हो रहा है। एनआरआईज को लेकर चिंतकों में बहस जोरों पर है। हाथ वालों ने अपने पहले राज में राजस्थानियों को बुलाकर जो प्रस्ताव बनाए थे, उनको भगवा वालों ने किनारे कर दिया था, तो रिसर्जेंट के नाम पर 169000 करोड़ के आए प्रस्तावों को भुला कर हाथ वालों ने चक्रवर्ती ब्याज समेत बदला ले लिया था। अब इस पर दोनों तरफ से बोलती बंद है। चिंतकों में बहस इस बात की है कि आखिर कब तक एनआरआईज के साथ मजाक चलती रहेगी।</p>
<p><strong><br /> एक जुमला यह भी</strong><br /> नए साल में पिंकसिटी में होने वाली समिट की चर्चा जोरों पर है। राज के साथ काज करने वाले भी मेहमानों की खातिरदारी में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। इसके लिए मीनू और वेन्यू बार बदल रहे हैं। बड़ी चौपड़ पर चर्चा है कि राज को भव्यता नहीं, बल्कि दिव्यता दिखाने की आवश्यता है। 22 को शनि महाराज का दिन है, सो लालबत्ती के हर चौराहे पर चार-चार शनि के सेवकों की फौज के सामने सब तैयारियां फीकी हैं।</p>
<p><strong>     एल. एल. शर्मा<br /> (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Mon, 03 Jan 2022 13:14:32 +0530</pubDate>
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                <title>राजकाज</title>
                                    <description><![CDATA[जानें राज-काज में क्या है खास]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C/article-3562"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-12/rajkal2.jpg" alt=""></a><br /><p>गानों के मायने</p>
<p>    जब से छोटे पायलट ने 51 साल पुरानी राजकपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर का गाना गाया है, जबसे हाथ वाले कई भाई लोग इसके मायने निकालने में रात-दिन एक कर रहे हैं। छोटे साहब ने भी यह गाना यॅूं ही नहीं गाया, बल्कि सोच समझकर गाया है। इसके लिए उनको कई महीनों से मौके की तलाश थी। अब देखो ना इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के ठिकाने पर आने वाला हर वर्कर इस गाने के तार सियासी संकट से जोडेÞ बिना नहीं रहता। अब इन भाई लोगों को कौन समझाए कि यह तो 51 सदाबहार गाना है, इसे कोई भी गा सकता है। जब साहब इस गाने को गा रहे थे, तो उसी से एक फर्लांग दूर हाथ वाले कुछ भाई लोगों की मौजूदगी में एक नेताजी उसी फिल्म के गाने के बोल जाने कहां गए वो दिन गुनगुना रहे थे।</p>
<p>बदले-बदले से साहब<br />     ब्यूरोक्रेसी में एक बड़े साहब की अचानक बदली बॉडी लेंग्वेज को देखकर कइयों का माथा ठनका हुआ है। सचिवालय में हर कोई आने वाला अफसर भी इस बदली बॉडी लेंग्वेज की चर्चा किए बिना नहीं रहते। तुला राशि वाले साहब भी इलाहाबाद से ताल्लुकात रखते हैं और सीनियरटी में टॉप हैं। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि राज करने वालों ने 16 महीने पहले हुई चूक को ठीक करने के मानस को भांप कर कुछ साहब लोग इसे बाहर तक फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। जब से यह चर्चा आठ नंबर से निकल सचिवालय के गलियारों तक पहुंची है, तब से साहब की बॉडी लेंग्वेज बदली-बदली सी नजर आने लगी है। चर्चा तो यहां तक है कि राज ने भी साहब को आठ महीने अपनी मुराद पूरी करने पक्का आश्वासन दे दिया है, लेकिन तीन मोहतरमाओं के फेर में खुलकर नहीं बोल पा रहे हैं।</p>
<p><br /> यह पब्लिक है, सब जानती है<br />     खादी वालों का कोई सानी नहीं है। हर बात को अपने हिसाब से लेते हैं, चाहे वह पब्लिक के फायदे की हो या नुकसान की। अब देखो ना गुजरे संडे को पिंकसिटी में बन्नाओं ने एकजुटता तो अपने समाज के लिए दिखाई थी, लेकिन दोनों दलों के नेता अपने-अपने हिसाब से मायने निकालने में जुट गए हैं। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि मारवाड़ से ताल्लुकात रखने वाले एक भगवाधारी नेता ने तो दिन में ही कुर्सी के सपने देखना शुरू कर दिया। शेखावाटी की धरा में पैदा हुए हाथ वाले नेता उनसे भी एक कदम आगे निकले और खुद को बड़ा नेता मानने में कोई कंजूसी नहीं की। अब इन दोनों तरफ के नेताओं को कौन समझाए कि यह पब्लिक है, सब जानती है, अंदर क्या है, बाहर क्या है, सब पहचानती है।</p>
<p><br /> मंत्री का हिन्दी प्रेम<br />     राज में सबसे बुजुर्ग रत्न के हिन्दी प्रेम के आगे काज करने वाले भी बेबस हैं। फोरेस्ट डवलपमेंट के मामले में काज करने वालों ने अंग्रेजी में नोट क्या लिखा, शामत मोल ले ली। हिन्दी प्रेमी मंत्री की जोरदार लताड़ के आगे सबकी सिटीपिटी गुम हो गई। बाद में हिन्दी में नोट तैयार कर बताने पर 73 साल के बाबा के तेवर थोडेÞ बहुत ढीले पडेÞ। असलियत जानने वाले नुमाइंदे बाहर आकर अपनी हंसी को नहीं रोक पाते।</p>
<p><br /> मुंह खोलने से नींद उड़ी<br />     जोधपुर वाले भाईसाहब ने करप्शन को लेकर अपना मुंह क्या खोल दिया, राज का काज करने वालों की नींद उड़ गई। नींद उड़ना भी लाजमी है, चूंकि मामले का ताल्लुक धन से है। लंच केबिन में चर्चा है कि जोधपुर वाले अशोक जी का इशारा कहीं उन रिचेस्ट ब्यूरोक्रेट्स की तरफ तो नहीं है, जो कई सालों से हिट लिस्ट में हैं। लेकिन ब्यूरोक्रेसी के सामने सब बौने हैं, कायदे कानून वहीं बनते, सो गली भी वहीं निकलती है। एडल्ट बच्चों की आड़ में मंत्रियों के तरह वो भी बच निकलने में पीछे नही रहेंगे।</p>
<p><br /> उल्टा-पुल्टा<br />     इन दिनों पीसीसी चीफ ने भारती भवन वालों की नींद उड़ा रखी है। उड़े भी क्यू नहीं, किसान पुत्र होने के बाजजूद लक्ष्मणगढ़ वाले डोटासरा साहब ने भाई साहबों की तर्ज पर कैडर को फॉलो कर हाथ वाली पार्टी में जान फूंकने में लगे हैं। कुंभ राशि वाले साहब की इस नई शुरुआत से हाथ वालों को फायदा मिलने के गणित में उलझे भारती भवन वालों के चेहरों पर चिंता की लकीरें इस बात को लेकर है कि किसान पुत्र होकर भी कैडरबेस कार्यकर्ता तैयार करने के पीछे कोई न कोई राज तो है ही।</p>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Mon, 27 Dec 2021 12:51:28 +0530</pubDate>
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                <title>जानें राज-काज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[जानिए प्रदेश की वो खबरें जो सुर्खियों से गायब हो जाती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B8/article-2958"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-12/rajkal.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>चर्चा में फिर बड़े साहब</strong><br />सूबे की ब्यूरोक्रेसी में बड़े साहब एक बार फिर चर्चा में है। चर्चा का सब्जेक्ट भी छोटी-मोटी नहीं बल्कि अजयमेरु में स्थित अफसरों का सलेक्शन करने वाली बड़ी कुर्सी से ताल्लुकात रखता है, जो अभी 29 जनवरी तक टेम्परेरी भरी गई है। कुर्सी को टेम्परेरी भरने के बाद बड़ी चौपड़ से सचिवालय तक चर्चा है कि जोधपुर वाले अशोकजी भाई साहब ने सोच समझ कर इस कुर्सी को वृश्चिक राशि वाले साहब के लिए टेम्परेरी रखा है, जो चार जनवरी को षष्ठीपूर्ति कर रहे हैं। वैसे तो पाली की धरती से ताल्लुकात रखने वाले साहब भी तकदीर के धनी हैं, अब तक उनकी हर मुराद पूरी हुई है। उनकी कुंभ राशि वाली अर्द्धांगनि पहले से ही अजयमेरु में आसीन हैं, जो अपने साहब के लिए कुर्सी छोड़ने में एक पल भी नहीं गवारा नहीं करेंगी। </p>
<p><strong><br />पीछा नहीं छोड़ रहा बगावत का भूत</strong><br />हाथ वाले कुछ भाई लोग राज में कुर्सी मिलने के बाद भी परेशान हैं। परेशानी का कारण और कोई नहीं, बल्कि बगावत का भूत है, जो सारे टोने-टोटके करने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ रहा। डेढ़ साल से झेल रहे इस भूत का इलाज लालकिले वाले नगरी में बड़े देवरे से भी कराया गया, मगर भूत है कि पीछा छोड़ने का नाम ही ले रहा। अब देखो ना जब हाथ वाले भाई लोग एक जाजम पर बैठते हैं, तो बगावत का भूत जाग जाता है, और उनकी जुबान पर आ जाता है। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि दूसरों पर मूठ छोड़ने के लिए बुलाए स्याणै कभी उल्टे भी पड़ जाते हैं। जब सामने वाले पर चिरमी, आलपिन और भभूत का असर नहीं पड़ता है, तो बुलाने वाले पर ही स्याणपत दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। डेढ़ साल पहले लगा बगावत का यह भूत भी भाई लोगों पर पूरे दो साल असर दिखाए बिना नहीं रहेगा।</p>
<p><strong><br />हिसाब रेस ए वेटिंग सीएम का</strong><br />पिछले तीन साल से ठाले बैठे भगवा वाले भाई लोग भी खुद को बिजी रखने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। और तो और अपनी पार्टी के वेटिंग सीएम को लेकर जोड़-बाकी और गुणा-भाग करने में ही खुद को इतना व्यस्त कर लिया कि घर वालों के भी सगे नहीं हैं। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा के ठिकाने पर आने वाले विजिटर्स को भी अपनी गणित के हिसाब से समझाने की कोशिश किए बिना नहीं रहते। अब उनकी गणित की मानें तो दो महीने पहले तक कुर्सी की दौड़ में आगे चल रहे दोनों बन्ना पीछे हो गए और अब एक महिला सांसद और आमेर वाले भाईसाहब रेस में हैं। लेकिन इनके भी दौड़ से आउट होने के बाद में क्या होगा, उसे जानते तो सब हैं, मगर अनजान डर की वजह से चुप रहने में ही अपनी भलाई समझते हैं। अब समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।</p>
<p><strong><br />कुछ तो गड़बड़ है</strong><br />हाथ वाले भाई लोग भी बड़े अजीब हैं। कब क्या कर बैठें, उनको भी पता नहीं रहता। लग जाए तो तीर वरना तुक्का तो है ही। अब देखो ना भाई लोगों ने 16 महीने तक दो-दो हाथ करने के बाद हाथ तो मिला लिए, मगर बीच में गैप रखे बिना नहीं रहे। गैप भी ऐसा कि मन में आए जब हाथ खींचने में जोर नहीं आए। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने पर खुचरफुसर है कि टूटे दिलों को जोड़ना इतना आसान नहीं है, जितना ऊपरवाले सोच रहे हैं। रस्सी जल गई, मगर बल नहीं निकला, तभी तो जुबानी जंग थमने का नाम ही नहीं ले रही। और तो और किसी न किसी बहाने अड़ंगा लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। हाथ वाले भाई लोगों में सब कुछ ठीक नहीं है, कुछ तो गड़बड़ है।</p>
<p><br /><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />पिंकसिटी में शनि की रात से एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि कॉमनमैन को टच करने को लेकर है। कॉमनमैन को टच करने की कला हर किसी को नहीं आती। अब देखो ना, शनि की रात को भगवा वाली मैडम ने गुलाबीनगरी में चांदपोल वाले हनुमानजी के ढोक देने के बाद जो कॉमनमैन को टच किया, उसको लेकर धुरविरोधी भी तारीफ किए बिना नहीं रहे। चाहे मैडम की इस कला से उनकी रातों की नींद और दिन का चैन ही उड़ रहा हो।</p>
<p>  <strong>    एल. एल. शर्मा<br />(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Mon, 06 Dec 2021 12:34:36 +0530</pubDate>
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                <title>सतरंगी सियासत</title>
                                    <description><![CDATA[देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के नेताओं की ओर से तीखी और बेसुरी बयानबाजी हो रही। सलमान खुर्शीद और राशिद अल्वी के बयानों के मायने क्या? मतलब यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी पारा चढ़ रहा। कोई कम नहीं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/india-gate/%E0%A4%B8%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%A4/article-2413"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-11/qutub-minar,delhi,india1.jpg" alt=""></a><br /><p>देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के नेताओं की ओर से तीखी और बेसुरी बयानबाजी हो रही। सलमान खुर्शीद और राशिद अल्वी के बयानों के मायने क्या? मतलब यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी पारा चढ़ रहा। कोई कम नहीं। सलमान खुर्शीद की पुस्तक ‘सनराइज ओवर अयोध्या: नेशनहुड इन आवर टाइम्स’ आजकल चर्चा में। उन्होंने आरएसएस एवं हिन्ुत्व के बहाने आतंकी संगठन बोको हराम और आईएसआईएसआई का जिक्र कर डाला। सीधा कहें तो तुलना कर डालीं। सो, चुनावी सियासत में उबाल आना ही है। साल 1984 के सिख विरोधी दिल्ली दंगों के बाद उनके द्वारा लिखी एक पुस्तक के कुछ पन्ने भी आजकल चर्चा में। इसके बाद एक और पार्टी नेता राशिद अल्वी ने जय श्रीराम बोलने वालों को राक्षस बता डाला। मतलब दोनों ही ओर से चुनाव में ध्रुवीकरण की साफ कोशिश! यानी आ गए वहीं के वहीं। उसी की गर्मीं दिल्ली से लेकर सभी ओर बढ़ रही। लेकिन क्या इसका फायदा किसी को मिलेगा? हां, नुकसान किसका होगा, यह बताने की जरुरत नहीं।</p>
<p><br /> <strong>कितनी चर्चा बाकी?</strong><br /> राजस्थान में मंत्रिमंडल विस्तार और राजनीतिक नियुक्तियों का मसला एक बार फिर चर्चा में। सीएम गहलोत और पूर्व डिप्टी सीएम पायलट पार्टी आलाकमान से खुलकर गुफ्तगू जो कर चुके। हां, अभी शायद राहुल गांधी से चर्चा बाकी। ऐसे संकेत। इस बारे में प्रियंका गांधी भी जोर आजमाइश कर चुकीं। फिर केसी वेणुगोपाल एवं अजय माकन तो कई बार दिल्ली से लेकर जयपुर तक दौड़ लगा चुके। गहलोत एवं पायलट कांग्रेस आलाकमान का निर्णय मोनेंगे। ऐसा दावा। वैसे, पंजाब में कैप्टन अमरिन्दर सिंह भी सोनिया गांधी से वार्ता होने के बाद बाहर आकर यही बोले थे। बाद में रायता इतना फैला कि संभाले नहीं संभल रहा। हालांकि मरुधरा में फिलहाल ऐसी कोई संभावना नहीं। फिर भी भविष्य में क्या होगा? इसे लेकर कोई आश्वस्त नहीं। हां, हर दिन नए-नए कयास, चर्चाएं, बातें, फार्मूले। मतलब सभी चकरघन्नी हुए जा रहे। अब कौन किसकी फिरकी ले रहा। आशार्थियों की समझ से परे। फिर भी उनकी उम्मीदें कायम। यही राजनीति। पिुर भी एक ही सवाल। और कितनी चर्चा बाकी?</p>
<p><br /> <strong>भारत का रूआब..</strong><br /> भारत का दुनियां के फलक पर कूटनीतिक रूआब लगातार बढ़ रहा। अफगानिस्तान के मसले पर हालिया ‘दिल्ली डायलॉग’ इसका पुख्ता संकेत एवं संदेश। दुनियां की बड़ी ताकतें अब भारत की पहल को नजरअंदाज करने की हैसियत में नहीं। रूस के एनएसए की मौजूदगी इसका प्रमाण। जबकि चीन ने भी इसमें हिस्सा लेने से सीधे इनकार नहीं किया। हां, पाक से उम्मीद भी क्या? लेकिन ईरान के एनएसए ने ‘दिल्ली डायलॉग’ में भाग लेकर भारत के सामने पाक को जरुर उसकी हैसियत बता दी। बची खुची कसर तालिबान ने पूरी कर दी। कहा, कोई आपत्ति नहीं, भारत का प्रयास अच्छा। उसे भारत से मदद की आस। फिर पांच मध्य एशियाई देशों की चर्चा में उपस्थिति भारत के प्रभाव की बानगी एवं प्रमाण। फिर इन सभी का पीएम मोदी से शिष्टाचार भेंट करना। अपने आप में नई कहानी बता रहा। वैसे भी अगुवाई अगर अजित डोभाल करें। तो कहीं शक की कोई गुंजाईश नहीं। बात सुरक्षा एवं आतंकवाद की ही नहीं। भारत की कूटनीतिक आभा की भी।</p>
<p><strong><br /> बढ़ रहा सियासी कद!</strong><br /> जब से योगीजी यूपी के सीएम बने। अपने अभिनव कामों से वह राष्ट्रीय सुर्खियां बटोरते रहे। खासकर उन्होंने कानून व्यवस्था के मामले में जो नजीर पेश की। उसके कई कायल। अब संगठन के भीतर भी उनका कद बढ़ रहा। पार्टी में उन्हें भविष्य का नेता बताया जा रहा। हालांकि उनकी तमाम चर्चाओं पर विराम लगाने की कोशश। कहा, उनकी कोई राष्टÑीय महत्वाकांक्षा नहीं। वह यूपी में ही काम करके ही खुश। लेकिन परिस्थितियां कहां किसी के रोकने से रूकतीं। हालात अपने आप बदलते चले जाते। दिल्ली में हाल में संपन्न बीजेपी की राष्टÑीय कार्यकारिणी में सीएम योगी आदित्यनाथ ने राजनीतिक प्रस्ताव पेश किया। कहा जा रहा योगीजी पीएम मोदी की राह पर। करीब दो दशक पहले मोदीजी ने भी ऐसे ही राजनीतिक प्रस्ताव रखा था। सो, इसके मायने निकाले जा रहे। क्योंकि ऐसी बैठकों में यह काम पार्टी के राष्टÑीय नेता करते रहे। लेकिन योगीजी को इस काम के लिए आगे करना। अपने आप में संकेत। यानी योगीजी भाजपा की टॉप लीडरशिप में शुमार।</p>
<p><br /> <strong>क्यों हो रहे लाल-पीले?</strong><br /> महामहिम सत्यपाल मलिक आजकल खासे लाल पीले हो रहे? इसी फेर में संवैधानिक पद की मर्यादा भी लांध रहे। लेकिन महत्वाकांक्षा क्या से क्या न करवाए! वह कैसी भी हो सकती है। ऐसा लग रहा, कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना। यूपी चुनाव नजदीक। और किसान आंदोलन के नेता टिकैत भी उसी क्षेत्र के निवासी जहां से मलिक। फिर दोनों ही जाट समुदाय से। मलिक की पृष्ठभूमि समाजवादी। तिस पर कश्मीर के राज्यपाल रह चुके। सो, सरकार और पीएम मोदी को घुड़की देते नहीं मान रहे। लेकिन इन सबमें असल बात क्या? हां, वह कभी लोकसभा सांसद रह चुके। राज्यसभा की भी शोभा बढ़ा चुके। कहीं ऐसा तो नहीं? राजभवन में अब मन नहीं लग रहा हो। यदि परेशान होकर सरकार ही पद से हटा दे तो शहीद कहलाएंगे। इसीलिए सरकार भी बर्दाश्त कर रही! आखिर ऐसी बयानबाजी का क्या मतलब? लेकिन लाल पीले होने से भी तो बात नहीं बनेगी न। किसान आंदोलन अपनी जगह। आखिर संवैधानिक पद और उसकी मर्यादा का क्या?</p>
<p><strong><br /> एक चर्चा यह भी!</strong><br /> बस कयास, सुगबुगाहट, आशंका, अनुमान...! राजस्थान में भाजपा के फिर से सक्रिय होने की चर्चा। असल में, कांग्रेस सरकार में संभावित बदलाव के बाद विधायकों में बगावत की आशंका जताई जा रही। सो, भाजपा फिर से ताक में! यानी ‘ऑपरेशन लोटस पार्ट टू’। पिछले साल भी भाजपा ने कोशिश की थी। ऐसा आरोप कांग्रेस का। जबकि भाजपा ने इससे इनकार किया था। पर अफवाह कब सच हो जाए। कोई कुछ नहीं कह सकता। प्रभारी प्रदेश भी तफरी लेने आए बताए। लेकिन बात कहां तक पहुंचेगी। अभी भविष्य के गर्भ में। आखिर इन सबमें कौन लाभ में? जिनको पद प्रतिष्ठा चाहिए वह या जो इसे रोके हुए। फिर इधर का हाल भी उपचुनाव के बाद ठीक नहीं। हो सकता है उसकी कसर अब पूरी हो जाए। इस बार चूकने का मौका भी दोनों ओर से नहीं रहेगा। आखिर इधर-उधर तैरती चर्चाओं को कौन रोके? धुंआं भी तभी उठता। जब कहीं आग लगती है। लेकिन यह लगी किधर है? इसका भी इंतजार किया जाना चाहिए!     <strong>-दिल्ली डेस्क</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>इंडिया गेट</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 15 Nov 2021 16:48:47 +0530</pubDate>
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