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                <title>environment - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>environment RSS Feed</description>
                
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                <title>ग्रेट निकोबार द्वीप के आदिवासी प्रमुखों ने की राहुल गांधी से मुलाकात: ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का जताया कड़ा विरोध, बताया जीवन-यापन के तरीके और द्वीप के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर खतरा</title>
                                    <description><![CDATA[ग्रेट निकोबार के आदिवासी प्रमुखों ने राहुल गांधी से मिलकर प्रस्तावित मेगा प्रोजेक्ट का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने इसे द्वीप के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र और जनजातीय अस्तित्व के लिए खतरा बताया। राहुल गांधी ने उनके अधिकारों की रक्षा का आश्वासन दिया, जबकि सोनिया गांधी ने इसे आदिवासियों के खिलाफ एक "सुनियोजित दुस्साहस" करार दिया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/tribal-chiefs-of-great-nicobar-island-met-rahul-gandhi-expressed/article-147069"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/rahul-gandhi3.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। ग्रेट निकोबार द्वीप के आदिवासी प्रमुखों के एक प्रतिनिधिमंडल ने गुरुवार को लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मुलाकात की। इस मौके पर आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया के साथ ग्रेट निकोबार द्वीप के आदिवासी प्रमुखों ने श्री गांधी से मुलाकात की। आदिवासी प्रमुखों ने प्रस्तावित ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का कड़ा विरोध जताते हुए कहा कि यह उनके जीवन-यापन के तरीके और द्वीप के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर खतरा है। उन्होंने यह भी बताया कि परियोजना की मंजूरी के दौरान उनकी सहमति भी उचित तरीके से नहीं ली गई। </p>
<p>कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया कि कांग्रेस पार्टी उनके साथ मजबूती से खड़ी रहेगी और उनके अधिकारों एवं हितों की रक्षा के लिए उनकी चिंताओं को उठाएगी। उल्लेखनीय है कि, कांग्रेस संसदीय दल अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को सुनियोजित दुस्साहस बताते हुए इसका विरोध जताया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि यह परियोजना स्थानीय शोम्पेन और निकोबारी जनजातियों के अस्तित्व को खत्म कर देगी, एक अखबार में लिखे लेख के जरिए सोनिया गांधी ने इसे आदिवासी अधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं का उल्लंघन करार दिया था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 19 Mar 2026 16:00:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने की चैत्र नवरात्र स्थापना पर पूजा-अर्चना: प्रदेशवासियों के स्वस्थ, सुखी एवं समृ़द्ध जीवन की प्रार्थना की; वृक्षों पर पक्षियों के लिए परिंडे भी बांधें</title>
                                    <description><![CDATA[मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर सपरिवार राज राजेश्वरी मंदिर में विधि-विधान से पूजा-अर्चना और घट स्थापना की। उन्होंने प्रदेश की सुख-समृद्धि की कामना करते हुए जीव-जंतुओं के प्रति करुणा का संदेश दिया और बढ़ती गर्मी को देखते हुए पक्षियों के लिए परिंडे बांधे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/chief-minister-bhajan-lal-sharma-performed-puja-on-the-occasion/article-147021"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/cm-bhajanlal1.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने गुरूवार को चैत्र नवरात्र के प्रथम दिन मुख्यमंत्री निवास स्थित राज राजेश्वरी मंदिर में सपत्नीक विधिवत पूजा-अर्चना कर घट स्थापना की तथा मां दुर्गा की आराधना की। </p>
<p>शर्मा ने मां दुर्गा से प्रदेशवासियों के स्वस्थ, सुखी एवं समृ़द्ध जीवन की प्रार्थना की। मुख्यमंत्री ने इस दौरान आगामी गर्मी के मौसम को देखते हुए वृक्षों पर पक्षियों के लिए परिंडे भी बांधें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 19 Mar 2026 12:39:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जनसंख्या और पर्यावरण में ट्रेड-ऑफ नीति बनाना जरूरी, 2060 तक 20 से 30 करोड़ बढ़ेगी जनसंख्या</title>
                                    <description><![CDATA[जनसंख्या बढ़ेगी तो प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा और पर्यावरण प्रभावित होगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/a-trade-off-policy-between-population-and-the-environment-is-essential/article-142560"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/(12200-x-600-px)-(7)1.png" alt=""></a><br /><p>कोटा । जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरण के बीच संतुलन आज की सबसे बड़ी वैश्विक चुनौतियों में से एक बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार, भारत की जनसंख्या आने वाले 30-40 वर्षों में लगभग 150 करोड़ से बढ़कर 170 करोड़ (1.5 अरब से 1.7 अरब) तक पहुँच सकती है, आने वाले 30-40 वर्षों में भारत की जनसंख्या में लगभग 20 से 30 करोड़ की वृद्धि होगी। यह वृद्धि तब हो रही है जब फर्टिलिटी रेट और प्रतिस्थापन दर, (रिप्लेसमेंट रेट) दोनों में गिरावट आ चुकी है। इसके बावजूद जनसंख्या का बढ़ना डेमोग्राफिक इनरशिया का परिणाम है, जिसके बाद जनसंख्या स्थिर होने की संभावना है। जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरणीय दबाव के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए ट्रेड-ऑफ अनिवार्य हो गया है। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ेगी, मानवीय आवश्यकताएँ  जैसे पानी, भोजन, ऊर्जा और आवास भी बढ़ेंगी, जो प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। इन संसाधनों की अत्यधिक खपत पर्यावरण पर दबाव डालती है। इसलिए, हमें यह तय करना होगा कि संसाधनों का उपयोग कितनी सीमा तक करें, ताकि पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखा जा सके। भविष्य में इंसान को इस संतुलन को बनाए रखने के लिए कठोर ट्रेड-आॅफ करने होंगे।</p>
<p><strong>ट्रेड-ऑफ कैसे करना होगा?</strong><br />- जनसंख्या बढ़ने के साथ आवास की मांग भी बढ़ेगी। इसके लिए शहरीकरण की प्रक्रिया तेज होगी, लेकिन इस प्रक्रिया में वृक्षों की कटाई और भूमि का अत्यधिक उपयोग हो सकता है। इस समस्या का समाधान वर्टिकल कंस्ट्रक्शन और ग्रीन बिल्डिंग जैसे उपायों में है। इस तरह, कम जमीन में अधिक लोग समा सकते हैं और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण किया जा सकता है।<br />- बढ़ती जनसंख्या के लिए अधिक खाद्य उत्पादन की आवश्यकता होगी, जिसके लिए अधिक रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक इस्तेमाल किए जाएंगे। हालांकि, इनका अत्यधिक उपयोग मिट्टी की उर्वरता को कम कर सकता है और जल स्रोतों को प्रदूषित कर सकता है। इसका हल जैविक खेती औरड्रिप इरिगेशन और इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट, जो भूमि और जल पर दबाव कम करने में मदद करते हैं।<br />- बढ़ती जनसंख्या के साथ जल और ऊर्जा की मांग भी बढ़ेगी। जल संकट से निपटने के लिए वर्षा जल संचयन और जल पुनर्चक्रण की प्रणालियाँ अपनाई जा सकती हैं। आबादी बढ़ने के साथ बिजली की माँग तेजी से बढ़ेगी जिसे पूरा करने के लिए कोयले पर पूरी तरह निर्भर रहना पर्यावरण के लिए नुकसानदेह होगा।<br />सोलर एनर्जी को बढ़ावा देकर इस दबाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इससे कोयले का उपयोग पूरी तरह खत्म तो नहीं होगा, लेकिन प्रदूषण और पर्यावरणीय दबाव को संतुलित करते हुए ऊर्जा की बढ़ती मांग के साथ एक व्यावहारिक ट्रेड-ऑफ संभव होगा।<br />- औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के कारण प्रदूषण बढ़ेगा, जो जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य समस्याएँ और पारिस्थितिकी तंत्र की हानि का कारण बनेगा। इस समस्या से निपटने के लिए हरित प्रौद्योगिकी और सतत कचरा प्रबंधन के उपायों को अपनाना आवश्यक होगा। कचरे का पुनर्चक्रण, कचरा पृथक्करण, और प्लास्टिक मुक्त समाज की दिशा में कदम बढ़ाने से प्रदूषण को कम किया जा सकता है।<br />- जनवरों के संरक्षण के लिए ट्रेड-ऑफ करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि मानव विकास और जैव विविधता के बीच संतुलन जरूरी है। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ेगी, शहरीकरण और खेती के लिए भूमि का उपयोग बढ़ेगा, जिससे जानवरों के आवास नष्ट होंगे। इसके लिए, सतत शहरीकरण और वन संरक्षण क्षेत्रों का विस्तार आवश्यक है। कृषि भूमि बढ़ाने से भी जानवरों को खतरा होता है, इसलिए जैविक खेती और स्मार्ट कृषि प्रौद्योगिकियाँ अपनानी चाहिए, जो भूमि की उर्वरता और जानवरों के आवास दोनों को संरक्षित करें। साथ ही, जंगली जानवरों के लिए वाइल्डलाइफ कॉरिडोर बनाए जाएं ताकि वे मानव बस्तियों से दूर रहें।</p>
<p><strong>ट्रेड-ऑफ कहाँ तक कर सकते हैं?</strong><br />जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरणीय दबाव को ध्यान में रखते हुए, हमें विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। वर्तमान में प्रदूषण और संसाधनों का संकट गहरा है, और बढ़ती जनसंख्या इसे और कठिन बना देगी। इसलिए, जनसंख्या नियंत्रण ही समाधान है। सरकार को स्पष्ट और सख्त ट्रेड-ऑफ पॉलिसी बनानी होगी, जो मानवीय आवश्यकताओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन तय करे। संसाधन सीमित हैं, और हमें ट्रेड-आॅफ तब तक करना होगा जब तक हम प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक शोषण और जैव विविधता को नष्ट न करें। इसके लिए तकनीकी नवाचार और हरित प्रौद्योगिकियों को अपनाना जरूरी होगा, ताकि हम सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ सकें। बढ़ती जनसंख्या और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए क्या ट्रेड आॅफ करना पड़ेगा? इस विषय पर लोगों की राय को जाना।</p>
<p>तेजी से बढ़ती आबादी और विकास के नाम पर हो रहे अनियंत्रित निर्माण कार्य पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। आबादी बढ़ने के साथ जंगलों, वन भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है, जिससे पर्यावरणीय असंतुलन गहराता जा रहा है। आने वाले समय में 170 करोड़ की आबादी को खाद्य सुरक्षा देना एक बड़ी चुनौती होगी। जब 170 करोड़ होंगे तब पर्यावरण का सिर्फ शब्द ही बचेगा पर्यावरण नहीं बचेगा।निर्माण कार्यों में इस्तेमाल होने वाला सीमेंट, बजरी, गिट्टी, बिटुमिन और खनिज पूरी तरह प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। सड़क निर्माण, शहरी विस्तार और औद्योगिक विकास के कारण इन संसाधनों का अत्यधिक दोहन हो रहा है। इसके साथ ही वन भूमि पर हो रहा अवैध खनन पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। हालांकि वैधानिक खनन के लिए नियम और मानक तय हैं, लेकिन अवैध खनन इन सभी नियमों को दरकिनार कर देता है। लीगल और इललीगल माइनिंग के बीच का अंतर पर्यावरण को सबसे अधिक नुकसान पहुंचा रहा है। केवल ट्रेड-ऑफ नीति से समस्या का समाधान संभव नहीं है, क्योंकि प्राकृतिक संसाधनों की अपनी सीमाएं हैं।यदि सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण को लेकर समय रहते सख्त और प्रभावी निर्णय नहीं लिए, तो भविष्य में हालात और भी गंभीर हो सकते हैं।<br /><strong>-तपेश्वर सिंह भाटी, पर्यावरणविद एवं वन्य जीव विशेषज्ञ</strong></p>
<p>जल, जंगल और जमीन का संरक्षण नहीं हुआ तो आने वाले वर्षों में, विशेष रूप से 2050 तक, यह हमारे लिए एक बड़ी चुनौती बन जाएगा। सस्टेनेबिलिटी का अर्थ है प्राकृतिक संसाधनों का ऐसा उपयोग करना कि वे हमारी भावी पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रहें। यदि वर्तमान में हम सस्टेनेबिलिटी को ध्यान में रखकर जल, जंगल और जमीन का उपयोग नहीं करेंगे, तो बढ़ती जनसंख्या के साथ प्राकृतिक संसाधनों में भारी गिरावट आएगी। डिजिटल एरा एक्सपोनेंशियली आगे ग्रोथ कर रहा है, जिससे तकनीक पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है। इसके परिणामस्वरूप ई-वेस्ट में वृद्धि हो रही है, जो पर्यावरण को गंभीर रूप से प्रदूषित कर रहा है। यह हमारे सामने एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। सरकार को अभी से ट्रेड-ऑफ पॉलिसी लागू करनी होगी। साथ ही भावी पीढ़ियों को पानी, बिजली बचाने और अनावश्यक डिजिटल उपयोग से बचने की समझ देना अत्यंत आवश्यक है।<br /><strong>- प्रो. रीना दाधीच, कंप्यूटर विज्ञान विभाग, कोटा विश्वविद्यालय</strong></p>
<p>जनसंख्या इतनी तेजी से बढ़ रही है कि अब हमें हर स्तर पर ट्रेड-ऑफ करना पड़ेगा। आज लोगों का व्यवहार ऐसा हो गया है कि वे यह सोचे बिना चीजें मंगाते जा रहे हैं कि वे वास्तव में आवश्यक हैं या नहीं। यदि हम जरूरत पर रुकना सीखें, तो यह उपभोग चक्र कहीं न कहीं धीमा हो सकता है। तकनीकी उत्पादों का अत्यधिक उपयोग हो रहा है, लेकिन अंतत: वे रीसायकल नहीं होते और कचरे में बदलकर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते हैं। इसलिए टिकाऊ और लंबे समय तक उपयोग होने वाली वस्तुओं को अपनाना जरूरी है। नई-नई चीजें बार-बार मंगाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, जिससे पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। यदि हम आवश्यकता के अनुसार ही उपयोग करें, तो ओवरऑल कंजम्पशन अधिक विचारशील होगा। इसके लिए हमें जीवन की गति को थोड़ा धीमा करना होगा और अपनी वास्तविक जरूरतों को समझना पड़ेगा।<br /><strong>-डॉ. रचना पटेल,आई सर्जन, राजस्थान आई हॉस्पिटल</strong></p>
<p>पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने के लिए लोगों को अपनी आदतों में परिवर्तन लाना अत्यंत आवश्यक है। आज लोग घरों के सामने, नालियों में कूड़ा डालते हैं और सड़कों पर चारा फेंकते हैं। जंगलों की कटाई लगातार बढ़ रही है और पहाड़ों को बचाना भी जरूरी हो गया है। भावी पीढ़ियों के लिए प्रकृति का संरक्षण करना हम सभी की जिम्मेदारी है। पानी, बिजली और जंगलों का दुरुपयोग हो रहा है, जिससे पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ रहा है। वायु प्रदूषण के कारण बीमारियाँ बढ़ रही हैं और औद्योगिक प्रदूषण गंभीर समस्या बन चुका है। कई उद्योग जहरीली गैसें हवा में छोड़ रहे हैं, जिससे लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। उद्योगों का कचरा नदियों और नालों में मिलाया जा रहा है, जिससे तालाब और नदियाँ गंदी हो रही हैं। औद्योगिक अपशिष्ट जल का रीसायकल होना चाहिए। पौधारोपण केवल नाम के लिए नहीं, बल्कि पौधों को बचाना जरूरी है। प्लास्टिक थैलियों का उपयोग बंद होना चाहिए। इन सभी समस्याओं के समाधान के लिए समाज की मानसिकता में परिवर्तन बेहद आवश्यक है।<br /><strong>- डॉ. सुषमा आहूजा,लायंस इंटरनेशनल, संभागीय अध्यक्ष</strong></p>
<p>संसाधान सीमित है ऐसे में ट्रेड ऑफ करना पड़ेगा। साथ ही बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण भी जरूरी होगा। सरकार को सीमित संसाधनों को बढ़ाने के लिए भी प्रयास करना होगा। संसाधनों का पुनर्चक्रण और संरक्षण करने पर भी जोर देना होगा। बढ़ती जनसंख्या के बावजूद अगर संसाधनों का समझदारी से उपयोग किया जाए तो पर्यावरण पर कम दबाव पड़ेगा।<br /><strong>-सचिन मंगल, सीए</strong></p>
<p>जनसंख्या पर नियंत्रण करना अब अनिवार्य हो गया है। लगातार बढ़ती जनसंख्या के कारण जंगल तेजी से समाप्त हो रहे हैं, इसलिए वनों की कटाई को रोकने पर विशेष ध्यान देना होगा। प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव भविष्य को चुनौतीपूर्ण बना रहा है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्ष और अधिक कठिन होंगे। जनसंख्या नियंत्रण के लिए चीन जैसी सख्त और प्रभावी नीति लाने की आवश्यकता है, जिससे जनता जागरूक हो और इस विषय की गंभीरता को समझ सके। ऐसी नीति बनाई जानी चाहिए जो समाज को जिम्मेदारी का एहसास कराए और संतुलित विकास को बढ़ावा दे। तभी हम पर्यावरण, संसाधनों और भविष्य की पीढ़ियों को सुरक्षित रख पाएंगे।<br /><strong>- लोकेश शर्मा, बिजनैसमैन</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 10 Feb 2026 12:04:52 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>असर खबर का : एनजीटी ने माना, कोटा के लखावा प्लांटेशन में पौधों के नाम पर सरकारी धन का हुआ दुरूपयोग</title>
                                    <description><![CDATA[प्रधान मुख्य वन संरक्षक (हॉफ) को दिए  दोषी  अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई करने के निर्देश , राजस्थान वन विभाग को जारी किए नोटिस।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/impact-of-the-news--ngt-acknowledges-misuse-of-government-funds-in-the-name-of-saplings-at-lakhavva-plantation-in-kota/article-141155"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px)-(1200-x-600-px)-(1)67.png" alt=""></a><br /><p>कोटा । कोटा वन मंडल के लखावा प्लांटेशन में हुए करोड़ों के भ्रष्टाचार को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की भोपाल पीठ ने गंभीर पर्यावरणीय अपराध मानते हुए राजस्थान वन विभाग को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने प्रधान मुख्य वन संरक्षक (हॉफ) को स्वयं जांच कर दोषी वन अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने व 400 हैक्टेयर वन भूमि पर दोबारा प्लांटेशन करवाने के आदेश दिए हैं। यह आदेश पर्यावरणीय अधिवक्ता तपेश्वर सिंह भाटी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति श्यो कुमार सिंह व विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार चतुवेर्दी की बैंच ने दिए। याचिका में सामने आया कि कोटा बाइपास स्थित मेटिगेटिव मेजर्स के लखावा 1 से 8 तक के प्लांटेशन में सरकारी धन का दुरूपयोग किया गया। जिससे 400 हैक्टेयर का प्लांटेशन विफल हो गया। इससे पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचा।</p>
<p><strong>एनजीटी में जांच रिपोर्टों से खुलासा</strong><br />एनजीटी में सुनवाई के दौरान लखावा प्लांटेशन में भ्रष्टाचार का खुलासा अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन सुरक्षा) के सी मीना, मूल्यांकन एवं प्रबोधन कोटा डीएफओ व सीसीएफ उड़नदस्ते की जांच रिपोर्ट से हुआ। अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक ने अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा कि लखावा प्लांटेशन के पूरे इलाके में मुश्किल से 100 पौधे भी जीवित नहीं मिले, जबकि कागजों में यहां 8- 8 हजार पौधे लगना बताया गया है। कई जगह तो एक भी पुराना पौधा नहीं बचा। जहां पौधे दिखे, वे भी हाल ही में दिखावे के लिए लगाए गए थे। वहीं लखावा 8 प्लांटेशन में 21 लाख रुपए के गबन किया जाना बताया गया। रिपोर्ट में बताया गया कि पौधों के रखरखाव के नाम पर 21.42 लाख रुपए खर्च दिखाया गया जबकि, मौके पर कोई संधारण कार्य नहीं हुआ।</p>
<p><strong>25.72 करोड़ जमा, लेकिन जंगल गायब</strong><br />पर्यावरणीय अधिवक्ता तपेश्वर सिंह भाटी ने बताया कि कोटा में एनएच-27 के निर्माण के लिए जब 111.637 हैक्टेयर वन भूमि का उपयोग किया गया था, तब राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने पर्यावरणीय क्षति की भरपाई व हाईवे के दोनों ओर जंगल (प्लांटेशन) विकसित करने के लिए 25.72 करोड़ रुपए जमा कराए थे। इस राशि से प्लांटेशन की सुरक्षा के लिए पत्थर की दीवारें बननी थीं, लखावा 1 से 8 तक के 400 हैक्टेयर प्लांटेशन में पौधे लगाकर बाइपास के दोनों किनारे हरित पट्टी विकसित करनी थी, जो तत्कालीन व वर्तमान कोटा वन मंडल के अधिकारियों के भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए। नतीजन, अधिकारियों ने करोड़ों का बजट उठाया और कागजों में जंगल खड़ा कर दिया। जबकि, धरातल से जंगल गायब है।</p>
<p><strong>नवज्योति ने उजागर किया था भ्रष्टाचार</strong><br />दैनिक नवज्योति ने 23 मार्च 2024 को न पौधे न चौकीदार, किसकी सुरक्षा में खर्च किया लाखों रुपए, शीर्षक से समाचार प्रकाशित कर लखावा प्लांटेशन में भ्रष्टाचार उजागर किया था। इस पर तत्कालीन अतिरिक्त वन सचिव अर्पणा अरोरा के निर्देश पर जयपुर से अतिरिक्त मुख्य प्रधान वन संरक्षक (वन सुरक्षा) के सी मीणा व उप वन संरक्षक पीके पांडे जांच के लिए 26 मई 2024 को कोटा आए थे और 27 मई 2024 को लखावा प्लाटेशन का निरीक्षण किया। मौके के हालात देख जांच टीम भी दंग रह गई। टीम को यहां 100 पौधे भी नहीं मिले थे। जबकि वन अधिकारी 8000 पौधों को पानी पिलाने निराई गुड़ाई करने सुरक्षा मेंटेनेंस के नाम पर लाखों रुपए के फर्जी बिल बनाकर सरकारी धन का गबन करते रहे। मीना ने अपनी रिपोर्ट में नवज्योति को आई ओपनर कहते हुए बताया कि यदि नवज्योति यह खबर प्रकाशित नहीं करता तो इतना बड़ा भ्रष्टाचार कभी उजागर नहीं होता।</p>
<p><strong>एनजीटी का सख्त रुख </strong><br />- एनजीटी ने मामले में पर्यावरण व जंगल को गंभीर नुकसान मानते हुए प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख हॉफ जयपुर को नोटिस जारी कर निर्देश दिए हैं कि वे स्वयं इस मामले की जांच करें।<br />- दोषी वन अधिकारियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई करें।<br />- पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई के लिए<br />- 400 हैक्टेयर क्षेत्र (लखावा 1 से 8 तक) में ही नया वृक्षारोपण यानी प्लांटेशन कराएं।<br />- दोषी अधिकारियोें पर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट एवं पुन: करवाए जाने वाले वृक्षारोपण की कार्य योजना अगली सुनवाई 16 मार्च से पहले अधिकरण (एनजीटी) में प्रस्तुत करें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 29 Jan 2026 15:00:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>दिल्ली एनसीआर में कोहरे और प्रदूषण की दोहरी मार, एक्यूआई 'बहुत खराब' श्रेणी में</title>
                                    <description><![CDATA[तेज हवाओं के बावजूद दिल्ली की वायु गुणवत्ता रविवार को 361 तक पहुंच गई। रोहिणी और आनंद विहार सबसे प्रदूषित रहे, जिससे निवासियों को सांस लेने में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/double-blow-of-fog-and-pollution-in-delhi-ncr-air/article-138318"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/delhi-pollution.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। दिल्ली के कई इलाकों में रविवार सुबह वायु गुणवत्ता बहुत खराब श्रेणी में दर्ज की गई जबकि तेज हवाएं चलती रहीं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीबीसीबी) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, आज सुबह नौ बजे तक कई निगरानी केंद्रों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) का स्तर बहुत खराब बना रहा। रोहिणी में एक्यूआई 361, आनंद विहार में 351, चांदनी चौक में 357, वजीरपुर में 343, पंजाबी बाग में 327, आर के पुरम में 320 और आईटीओ में 309 दर्ज किया गया। 301 से 400 के बीच का एक्यूआई बहुत खराब श्रेणी में आता है और इससे सांस लेने में दिक्कत हो सकती है।</p>
<p>तेज हवाएं चलने के बावजूद राजधानी के कई इलाकों में वायु गुणवत्ता खराब बनी हुई है। सुबह में हवाओं से प्रदूषण में थोड़ी कमी आई लेकिन यह कमी एक्यूआई को मध्यम स्तर तक लाने में मददगार साबित नहीं हुई। मौसम विज्ञान विभाग ने कहा, रविवार सुबह न्यूनतम तापमान 7.4 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया जबकि दिन में अधिकतम तापमान लगभग 17 डिग्री सेल्सियस रहने की उम्मीद है।</p>
<p>सबसे कम दृश्यता सफदरजंग एवं पालम में दर्ज की गई, जहां दृश्यता गिरकर 1,300 मीटर रह गयी। इस बीच, अधिकारियों ने शुक्रवार से प्रदूषण नियंत्रण प्रतिबंधों में ढील दी और वायु गुणवत्ता में अस्थायी सुधार होने के बाद श्रेणीबद्ध प्रतिक्रिया कार्य योजना को बंद कर दिया।</p>
<p>पर्यावरण मंत्रालय ने कहा कि स्थिति में सुधार होने के मद्देनजर जीआरएपी पर सीएक्यूएम उप-समिति ने एनसीआर में तत्काल प्रभाव से सभी कार्रवाइयों को रद्द करने का निर्णय लिया है। हालांकि पहले और दूसरे चरण के उपाय लागू रहेंगे। अधिकारियों ने कहा है कि वे स्थिति पर नजदीकी से निगाह बनाए रखे हुए हैं क्योंकि मौसम की स्थिति एवं प्रदूषण का स्तर लगातार बदल रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 04 Jan 2026 14:18:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कांग्रेस निकोबार परियोजना: कांग्रेस का गंभीर आरोप, पारिस्थितिकी की अनदेखी कर सरकार चला रही है विकास परियोजना </title>
                                    <description><![CDATA[जयराम रमेश ने अरावली और निकोबार में पर्यावरण अनदेखी का आरोप लगाते हुए कहा कि 72,000 करोड़ की मेगा-प्रोजेक्ट पारिस्थितिकी और आदिवासियों के लिए विनाशकारी है। उन्होंने इसे "विश्वासघात" करार दिया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/congress-nicobar-project-is-a-serious-allegation-of-congress-that/article-138138"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/great-nicobar-project.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। कांग्रेस ने अरावली में सरकारी नीतियों के कारण प्रदूषण संकट पर सवाल उठाने के साथ कहा है कि निकोबार में भी सरकार पारिस्थितिकी की परवाह किये बिना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली परियोजनाएं चला रही है जो विकास के नाम पर पारिस्थितिकी तंत्र को ध्वस्त करने वाली हैं।</p>
<p>कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी ने कुछ माह पहले 'ग्रेट निकोबार मेगा-इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट' को अनावश्यक बताते हुए कहा था कि इस परियोजना पर सरकार 72,000 करोड़ रुपये खर्च कर गलत कर रही है। उनका कहना था कि यह परियोजना द्वीप के मूल आदिवासी समुदायों के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा करती है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे तथा राहुल गांधी ने भी इस परियोजना को पारिस्थितिकी के लिए खतरनाक बताया था। </p>
<p>शुक्रवार को पार्टी के संचार विभाग के प्रभारी जयराम रमेश ने फिर यह मुद्दा उठाया और सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि ग्रेट निकोबार जैसे पारिस्थितिक रूप से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में सरकार ने विकास के नाम पर हजारों करोड़ रुपये की आक्रामक परियोजनाओं को जिस लालच और नासमझी के चलते जल्दबाजी से मंजूरी दी है, वह पूरे इलाके के लिए एक खतरनाक और दीर्घकालिक त्रासदी साबित होने वाली है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि ये परियोजनाएँ न सिर्फ वहां की नाजुक पारिस्थितिकी को अपूरणीय नुकसान पहुँचाएंगी, बल्कि आदिवासी समुदायों के अस्तित्व को भी योजनाबद्ध तरीके से हाशिये पर धकेलेंगी। यह पूरा इलाका पहले से ही जलवायु आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है, जहां प्राकृतिक संतुलन से जरा-सी भी छेड़छाड़ विनाशकारी परिणाम ला सकती है। इसके बावजूद सरकार ने चेतावनियों, वैज्ञानिक आकलनों और स्थानीय वास्तविकताओं को नजरअंदाज करते हुए चंद कॉरपोरेट के मुनाफ़े के लालच में इन परियोजनाओं को आगे बढ़ाया है।</p>
<p>कांग्रेस नेता ने कहा कि पंकज सेखसरिया द्वारा संकलित 'ग्रेट निकोबार: कहानी विश्वासघात की' कई शोधपरक, तथ्यात्मक और प्रासंगिक लेखों के माध्यम से इस पूरे मामले में सरकार की भूमिका, नीतिगत लापरवाहियों और आदिवासी अधिकारों के साथ किए जा रहे समझौतों की समीचीन पड़ताल करती है। यह संकलन इस बात का जीता-जागता दस्तावेजी साक्ष्य है कि कैसे विकास के नाम पर एक पूरे क्षेत्र और उसके लोगों के भविष्य को दांव पर लगा दिया गया है। रमेश ने इसके साथ ही इस पुस्तक का लिंक भी सोशल मीडिया पर साझा किया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 02 Jan 2026 15:49:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अरावली मुद्दे पर पर्यावरण मंत्री का स्पष्टीकरण संदेहास्पद : भ्रामक है आंकड़े, जयराम रमेश ने कहा- बुनियादी चिंता को कर रहे नजरअंदाज </title>
                                    <description><![CDATA[अरावली के वास्तविक क्षेत्र को आधार माना जाए, तो 0.19 प्रतिशत का आंकड़ा बहुत कम आकलन साबित होगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/environment-ministers-explanation-on-aravalli-issue-is-suspiciously-misleading-figures/article-136931"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-05/jairam-ramesh-2-(2).png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। कांग्रेस ने कहा है कि अरावली को लेकर केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने जो स्पष्टीकरण दिया है, उससे कई और सवाल खड़े होते हैं तथा पूरे मुद्दे को गहरे संदेह में ले जाते हैं। कांग्रेस संचार विभाग के प्रभारी जयराम रमेश ने मंगलवार को जारी बयान में कहा कि अरावली मुद्दे पर पर्यावरण मंत्री का स्पष्टीकरण अस्पष्ट है और इसमें जो आंकड़े दिए गए हैं, वह भ्रामक है और उससे कई सवाल और संदेह होते हैं। केंद्रीय मंत्री के अनुसार अरावली के 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में से फिलहाल केवल 0.19 प्रतिशत हिस्सा ही खनन पट्टों के अंतर्गत है, लेकिन यह भी लगभग 68,000 एकड़ है, जो अपने आप में एक बहुत बड़ा क्षेत्र है। हालांकि 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर का आंकड़ा भ्रामक है। इसमें चार राज्यों के 34 अरावली जिलों का पूरा भौगोलिक क्षेत्र शामिल कर लिया गया है। यह एक गलत आधार है, क्योंकि सही आधार तो इन जिलों के भीतर वास्तव में अरावली के अंतर्गत आने वाला भूभाग होना चाहिए। यदि अरावली के वास्तविक क्षेत्र को आधार माना जाए, तो 0.19 प्रतिशत का आंकड़ा बहुत कम आकलन साबित होगा।</p>
<p>रमेश ने आरोप लगाया कि तीन चार राज्यों के 34 जिलों में से जिन 15 जिलों के लिये आंकड़े सत्यापित किए जा सकते हैं, उनमें अरावली क्षेत्र पूरे भूभाग का लगभग 33 प्रतिशत है। नयी परिभाषा के तहत इन अरावली क्षेत्रों में से कितना हिस्सा बाहर कर दिया जाएगा और खनन तथा अन्य विकास कार्यों के लिए उपलब्ध कराया जाएगा-इस बारे में किसी भी तरह की स्पष्टता नहीं है। उनका कहना था कि अगर पर्यावरण मंत्री के सुझाव के अनुसार स्थानीय प्रोफाइल को आधार बनाया जाता है, तो 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली कई पहाड़ियां भी संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगी। संशोधित परिभाषा के बाद दिल्ली-एनसीआर में अरावली की अधिकांश पहाड़ी इलाके रियल एस्टेट विकास के लिए खोल दी जाएँगी, जिससे पर्यावरण पर दबाव और बढ़ेगा।</p>
<p>रमेश ने कहा कि खनन की अनुमति देने के उद्देश्य से सरिस्का टाइगर रिजर्व की सीमाओं को फिर से परिभाषित करने की अगुवाई कर रहे यादव इस बुनियादी चिंता को नजरअंदाज कर रहे हैं कि मूल रूप से आपस में जुड़े हुए पारिस्थितिकी तंत्र का विखंडन उसके पारिस्थितिकी मूल्य को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाता है और इसके दुष्परिणाम देश के अन्य हिस्सों में पहले से ही देखे जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि अरावली हमारी प्राकृतिक धरोहर का हिस्सा हैं और उनका पारिस्थितिकीय महत्व अमूल्य है। उसे व्यापक पुनस्र्थापन और ठोस संरक्षण की आवश्यकता है। आखिर मोदी सरकार उन्हें फिर से परिभाषित करने पर क्यों तुली हुई है। किस उद्देश्य से, किसके लाभ के लिए और वन सर्वेक्षण ऑफ इंडिया जैसी पेशेवर संस्था की सिफारिशों को जानबूझकर नजरअंदाज कर क्यों किनारे किया जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Dec 2025 15:53:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने की 'अरावली बचाओ' अभियान में शामिल होने की अपील, केंद्र सरकार पर लगाया लापरवाह नीतियों का आरोप</title>
                                    <description><![CDATA[समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने दिल्लीवासियों से ‘अरावली बचाओ’ अभियान में शामिल होने की अपील की। उन्होंने कहा कि अरावली का विनाश पर्यावरण, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था के लिए घातक होगा। उन्होंने भाजपा पर लापरवाह नीतियों का आरोप भी लगाया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/sp-chief-akhilesh-yadav-attacks-central-government-and-appeals-to/article-136685"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/save-arawli.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दिल्ली के निवासियों से'अरावली बचाओ' अभियान में शामिल होने की भावुक अपील की है। अखिलेश यादव ने चेतावनी दी है कि अरावली पर्वतमाला के विनाश का शहर के पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और जीवन की गुणवत्ता पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा।</p>
<p>समाजवादी पार्टी अध्यक्ष ने कहा, अरावली पर्वतमाला दिल्ली का प्राकृतिक सुरक्षा कवच और इसकी पारिस्थितिक जीवनरेखा है। अगर हमने अरावली को नहीं बचाया, तो दिल्ली रहने के लायक नहीं रहेगी। यहाँ की हवा सांस लेने लायक नहीं होगी, पानी पीने लायक नहीं रहेगा और तापमान असहनीय हो जाएगा। </p>
<p>अखिलेश यादव ने दिल्ली के निवासियों, विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों पर प्रदूषण के विनाशकारी प्रभाव पर जोर दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि अरावली पर्वतमाला की रक्षा नहीं की गई, तो चिकित्सा पर्यटन, वाणिज्य और संस्कृति के केंद्र के रूप में शहर की प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति होगी। </p>
<p>उन्होंने आरोप लगाया, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की लापरवाह नीतियां दिल्ली को प्रदूषण का केंद्र बना देंगी, जिससे व्यवसाय, निवेश और पर्यटक यहाँ से दूर चले जाएंगे। हमें अरावली को बचाने के लिए एकजुट होना होगा और भाजपा की गंदी राजनीति को नकारना होगा।</p>
<p>अखिलेश यादव की यह अपील खनन और निर्माण गतिविधियों के कारण अरावली पर्वतमाला के तेजी से हो रहे क्षरण पर चिंताओं के बीच आई है। दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान तक फैली यह पर्वतमाला इस क्षेत्र के पारिस्थितिक संतुलन और जैव विविधता को बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। 'अरावली बचाओ'अभियान को पर्यावरण कार्यकर्ताओं, व्यापारिक नेताओं और नागरिक समाज संगठनों सहित विभिन्न क्षेत्रों से समर्थन मिल रहा है। </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 21 Dec 2025 13:03:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सुप्रीम कोर्ट की कमेटी ने माना, कोनोकार्पस स्वास्थ्य व पर्यावरण के लिए खतरनाक </title>
                                    <description><![CDATA[कमेटी ने की देश के सभी राज्यों में कोनोकार्पस को बैन करने की सिफारिश ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-supreme-court-committee-acknowledged-that-conocarpus-is-dangerous-to-health-and-the-environment/article-128517"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-10/1116.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी-सीएसी ने कोनोकार्पस इरेक्ट्स पेड़-पौधे को मानव स्वास्थ्य, जैव विविधता व पर्यावरण के लिए खतरनाक माना है।  कमेटी ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में सौंपी 40 पेजों की रिपोर्ट में इसके गंभीर दुष्प्रभावों का उल्लेख किया है। वहीं, देशभर में कोनोकार्पस  के आयात, नर्सरी में उत्पादन पर बैन लगाने की सिफारिश की है। साथ ही जहां यह पेड़ लगे हुए हैं, उनको हटाकर स्थानीय प्रजातियों के पौधों लगवाए जाने का सुझाव दिया है।  गौरतलब है कि दैनिक नवज्योति ने सोमवार के अंक में जिस पौधे को 4 राज्यों ने बैन किया उसे चंबल रिवर फ्रंट और आॅक्सीजोन में जमकर लगाया....शीर्षक से समाचार प्रकाशित कर इसके दुष्प्रभावों पर प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया था।  पढ़िए, सुप्रीम कोर्ट की कमेटी की रिपोर्ट के प्रमुख अंश...</p>
<p><strong>बच्चों व बुजुर्गों सांस और हड्डियों से संबंधित बीमारियां मिली</strong><br />वन्यजीव विभाग के डीएफओ अनुराग भटनागर ने कहा कि  सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि कोनोकार्पस के परागकणों से बच्चों व बुजुर्गों  में कई तरह की श्वांस से जुड़ी बीमारियां हो जाती है। जिसमें अस्थमा, एलर्जी , दमा, सांस लेने में दिक्कत सहित हड्डियों से संबंधित बीमारियां पाई गई है। जब रिपोर्ट में सामने आया कि इस पेड़ के परागकणों से बहुत एलर्जी होती है तो वर्ष 2025 में तमिलनाडू  सरकार ने इस वृक्ष पर पूरी तरह से बैन लगा दिया। </p>
<p><strong>पत्तों में रसायन, मिट्टी की बदल जाती संरचना</strong><br />कमेटी में रिपोर्ट में बताया कि कोनोकार्पस के एलोपैथिक इम्पैक्ट भी है। इसके पत्तों में रसायन होता है, जो टूटकर  जमीन पर गिरते हैं तो वह मिट्टी की संचरना को बदल देता है, जिससे हमारे स्थानीय पेड़-पौधों की वृद्धि रुक जाती है। जिससे पूरा ईको सिस्टम गड़बड़ा जाता है। </p>
<p><strong>जड़ें खतरनाक, इमारतों की नींव तक हिला डाली</strong><br />कमेटी ने कहा कि इसकी जड़ें काफी खतरनाक होती है। वह जमीन के नीचे काफी गहराई तक जाती है। अहमदाबाद एवं हैदराबाद जैसे शहरों में इसकी जड़ों ने फुटपाथ, अंडरग्राउंड पाइप लाइन, आॅप्टीकल फायबर कैबलें और इमारतों की नींव पर बहुत बुरा प्रभाव डाला है। वहीं, भू-जल को खींच लेती है, जिससे स्थानीय प्रजाती के पेड़-पौधे पानी के अभाव में विलुप्त होने लगते हैं।</p>
<p><strong>कमेटी की रिपोर्ट के प्रमुख अंश </strong><br />- सीएसी कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट से निवेदन किया है कि कोनोकार्पस वृक्ष को देश के सभी राज्यों में इनवेसिव घोषित किया जाए। <br />- सभी राज्यों में कोनोकार्पस के आयात व नर्सरियों में पौध तैयार करने पर बैन लगाए जाए ।<br />- मिशन मोड अप्रोच पर जहां कहीं भी कोनोकार्पस पेड़ लगे हैं उसे हटाकर स्थानीय पेड़-पौधे लगाए जाए। <br />- गुजरात सरकार ने वर्ष 2023 में कोनाकार्पस को नर्सरी में तैयार करने पर पूर्णत: प्रतिबंध लगा दिया। <br />- तमिलनाडू सरकार ने जनवरी 2025 में वन भूमि व गैर वन भूमि पर लगे कोनोकार्पस को हटाने के आदेश जारी किए हैं। <br />- आंध्र प्रदेश गवर्नमेंट ने काकीनाड़ा में 35000 से ज्यादा कोनोकार्पस पेड़ों को कटवाया है। <br />- तेलंगाना ने वर्ष 2022 में एक सरकुर्लर जारी यह पौधे नहीं लगाने और हैदराबाद में पहले से लगे इन वृक्षों को हटाने के निर्देश दिए हैं। <br />-असम की गुवाहाटी हाईकोर्ट ने असम सरकार को कोनोकार्पस नहीं लगाने निर्देश दिए हैं। इसी तरह कर्नाटक में वर्ष 2024 में वन विभाग ने यह पौधे नहीं लगाए जाने के आदेश हुए। <br />- वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 की धारा 62-ए केंद्र को इनवेसिव (अतिक्रमी प्रजाति के वृक्षों) के लिए नियम बनाने की शक्ति देती है। <br />-  नेशनल बायोडायवसिटी स्टेÑटजी एंड एक्शन प्लान (2024-23) भी इनवेसिव प्रजातियों के पौधें जैसे-कोनोकार्पस, लेंटाना, सूबबूल, विलायती बबूल को जैव विविधता की हानि के लिए मुख्य कारण माना है। लेकिन इस प्लान की आज भी क्रियांविती नहीं हो पा रही है। <br />- वर्तमान में आज भी राष्टÑीय स्तर पर इनवेसिव प्रजातियों के लिए कोई मॉनिटरिंग या रेगुलेटरी गाइड लाइन नहीं है। <br />- राजस्थान में कोनोकार्पस खूब मात्रा में लगाया जा रहा है। </p>
<p><strong>कमेटी की प्रमुख सिफारिशें :</strong> भारत में प्रसार, आयात और नर्सियों में बिक्री पर प्रतिबंध लगाया जाए<br />बायोडायवर्सिटी रिसर्च एंड डवलपमेंट सोसायटी के जिला कोर्डिनेटर बॉटनिस्ट सोनू कुमार ने बताया कि कमेटी की प्रमुख सिफारिशें इस प्रकार है। <br />- कोनोकार्पस के रोपण को तुरंत रोका जाए और इसे आक्रामक प्रजाति के रूप में अधिसूचित किया जाए।<br />- पूरे भारत में इसके प्रसार, आयात और पौधों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया जाए।<br />-पहले से लगाए गए पौधों को हटाकर उनकी जगह देशज (स्थानीय) प्रजातियों का रोपण मिशन मोड कार्यक्रम के तहत किया जाए।<br />-आक्रामक विदेशी प्रजातियों से निपटने के लिए और अधिक मजबूत नियामक एवं कानूनी ढांचे तैयार किए जाएं।<br />- आक्रामक पौधों, जीव-जंतुओं और सूक्ष्मजीवों के साक्ष्य-आधारित प्रबंधन के लिए अनुसंधान प्रणाली स्थापित की जाए।<br />- वन, उद्यानिकी और शहरी हरियाली विभागों को सक्रिय कर देशज विकल्पों के साथ प्रतिस्थापन कार्य प्रारंभ करें।</p>
<p>सुप्रीम कोर्ट की सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने कोनोकार्पस को स्वास्थ्य व पर्यावरण के लिए खतरनाक माना है। कमेटी ने कोर्ट में सौंपी 40 पेजों की रिपोर्ट में इसके गंभीर दुष्प्रभाव का उल्लेख किया है। हमारी ओर से जिला प्रशासन व संबंधित विभागों के अधिकारियों को पत्र लिख इसके प्रति जागरूक किया जाएगा। वहीं, शहर में इसके रोपण पर रोक लगाने व प्रभावी कदम उठाने का आग्रह करेंगे। वन विभाग इस तरह के पौधे नहीं लगाता है।<br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Oct 2025 15:07:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>4 राज्यों ने किया बैन : जिस पौधे को चंबल रिवर फ्रंट में जमकर लगाया, बिना जांच के सार्वजनिक स्थानों पर लगाए खतरनाक पौधे</title>
                                    <description><![CDATA[कोनोकार्पस इरेर्क्ट्स पौधा दिखने में जितना खूबसूरत है, उतना ही मानव स्वास्थ्य व बायोडायवर्सिटी के लिए घातक है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/a-plant-banned-by-four-states-was-planted-extensively-on-the-chambal-river-front-and-oxygen-zone/article-128345"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/copy-of-news-(2)42.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोनोकार्पस इरेर्क्ट्स पौधा दिखने में जितना खूबसूरत है, उतना ही मानव स्वास्थ्य व बायोडायवर्सिटी के लिए घातक है। इसके बावजूद केडीए ने बिना जांच परख के शहर की सड़कों, डिवाइडर, पार्कों एवं सार्वजनिक स्थानों पर सैकड़ों कोनोकार्पस पौधे लगा दिए। जबकि, इस पौधें के दुष्प्रभाव को देखते हुए देश के 4 बड़े राज्यों ने इसे बैन कर दिया है। क्योंकि, इन पौधों के फूलों से निकलने वाले परागरण एलर्जिक हैं, जो अस्थमा जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं। इतना ही नहीं, अस्थमा मरीजों को सम्पर्क में आने अटैक का खतरा बढ़ जाता है। यह पौधा न केवल पर्यावरण के लिए नुकसानदायक हैं बल्कि मानव स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक हैं। इसके बावजूद आंखें मूंद कर इन्हें लगाने की परमिशन दी जा रही है। इसके नकारात्मक प्रभावों को देखते हुए राजस्थान बायोडायवर्सिटी बोर्ड ने भी प्रदेश में कोनोकार्पस को बैन करने की सिफारिश  की है। </p>
<p><strong>पक्षी भी नहीं बनाते घौंसला, भूजल का  दोहन </strong><br />जेडीबी कॉलेज में बोटनी प्रोफेसर डॉ. पूनम जायसवाल ने बताया कि इस पौधे पर तो पंछी भी घोंसला नहीं बनाते। श्वांस संबंधी बीमारियों के साथ भूजल भी अधिक सोखते हैं।  जिससे आसपास उगने वाली स्थानीय प्रजाति के पेड़-पौधों को पानी नहीं मिल पाता और वह सूखकर मर जाते हैं।  </p>
<p><strong>चंबल रिवर फ्रंट व ऑक्सीजोन में लगे पौधे </strong><br />केडीए ने चंबल रिवर फ्रंट व ऑक्सीजोन पार्क में भी बड़ी संख्या में कोनोकार्पस पौधे लगा दिए। वर्तमान में यह पौधे पेड़ बन गए। यहां बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं, ऐसे में वह जाने-अनजाने में श्वांस से संबंधित गंभीर बीमारियों की जद में आ रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि केडीए के अधीन होर्टिकल्चर विभाग भी कार्यरत हैं, जहां इंजीनियरों के साथ बोटनी से जुड़े प्रोफेशनल्स भी कार्यरत होते हैं। इसके बावजूद  बिना जांच-परख और वन अधिकारियों से बिना सलाह के खतरनाक प्लांट्स लगा दिए। </p>
<p><strong>इन 4 राज्यों ने लगाया कोनोकार्पस पर प्रतिबंध</strong><br />वन्यजीव विभाग के उप वन संरक्षक अनुराग भटनागर ने बताया कि सड़कों से सार्वजनिक स्थानों पर बड़ी मात्रा में कोनाकार्पस लगा दिए, जो मनुष्य व बायोडायवर्सिटी के लिए भी हानिकारक है। इसके नकारात्मक प्रभावों को देखते हुए देश के 4 बड़े राज्यों ने इसे लगाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। इनमें गुजरात, आंधप्रदेश, महाराष्ट्र के बाद अब तेलंगाना सरकार ने भी इस पौधे को बैन कर दिया है। </p>
<p><strong>शहर में यहां लग रहे यह खतरनाक पेड़-पौधे</strong><br />शहर में चंबल रिवर फ्रंट, ऑक्सीजोन पार्क, गणेश उद्यान,  डीसीएम रोड स्थित डिवाइडर, संजय नगर चौराहा, माला फाटक, डीसीएम चौराहा, सीएडी रोड स्थित डिवाइडर, सीवी गार्डन, नयापुरा स्टेडियम के सामने डिवाइडर्स सहित कई प्रमुख इलाकों व जागरूकता के अभाव में लोगों ने अपने घरों व फॉर्म पर भी कोनोकार्पस पेड़-पौधे लगे हैं। तितलियों में इंफेक्शन तक का खतरा रहता है। </p>
<p><strong>विशेषज्ञ बोले-मानव स्वास्थ्य व ईको सिस्टम के लिए घातक है कोनोकार्पस</strong><br />कोनोकार्पस पौधा एक्जोटिक (विदेशी) मैंग्रोव प्रजाति का है। वैज्ञानिक रिसर्च में सामने आया कि इस पौधे से सांस संबंधी बीमारियां, खांसी, अस्थमा और एलर्जी का कारण बनता है। साथ ही  पर्यावरण व जैव विविधता के लिए भी घातक है।  वायु की गुणवत्ता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। गुजरात में हुए वैज्ञानिक अध्ययन सामने आया है कि कोनोकार्प्स के रोपण से ग्रीन डेजर्ट जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। इसे गुजरात, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र सरकार ने वन और गैर-वन क्षेत्रों  में लगाने पर बैन कर दिया है। <br /><strong>-डॉ. पूनम जायसवाल, प्रोफेसर बॉटनी जेडीबी साइंस कॉलेज</strong></p>
<p>बायोडायवर्सिटी के लिए खतरनाक कोनोकार्पस पेड़  इको फ्रेंडली नहीं है। जमीन के अंदर का सारा पानी सोंख लेता है, आसपास के पेड़ों को पनपने नहीं देता है। शहर से इसे नहीं हटाया तो भू-जल खत्म कर देगा।  जिन्हें तत्काल हरियाली चाहिए, वो इसे लगाते हैं। इस पेड़ की बड़ी आबादी ने वाष्पीकरण की प्रक्रिया को तेज कर दिया है और इसकी जड़ें जल निकासी पाइपों को अवरुद्ध कर देती हैं।  बायोडायवर्सिटी के लिए बेहद खतरनाक है। <br /><strong>-एएच जैदी, पर्यावरणविद् </strong></p>
<p>इसके पराग आंखों में जलन, सर्दी, खांसी एलर्जी, अस्थमा जैसी सांस से संबंधित बीमारियां उत्पन्न करता है। इसकी जड़े पाइपलाइन, सीवर और दूरसंचार केबल को नुकसान पहुंचा सकती हैं। भूमि की नमी को सोखती है, जिससे भूमि जल संकट पैदा होता है। विदेशी प्रजाति होने से स्थानीय पौधों को नुकसान पंहुचाता है। जिससे स्थानीय जैव विविधता प्रभावित होती है। इस पर पंछी भी घौंसला भी नहीं बनाते। इनकी जगह नीम, करंज,जंगल जलेबी,कचनार जैसे पर्यावरण के अनुकूल पेड़-पौधे लगा सकते हैं।<br /><strong>-डॉ. नीरजा श्रीवास्तव, प्रोफेसर बॉटनी, गवर्नमेंट कॉलेज कोटा </strong></p>
<p>इसके नकारात्मक प्रभाव को देखते हुए 4 राज्यों ने कोनोकार्पस के रोपण पर पूर्णत: प्रतिबंध लगा दिया है। वहीं, राजस्थान बायोडायवर्सिटी बोर्ड ने भी इसे प्रदेश में बैन करने की बात की है। इसकी जड़े अंडर वाटर को खत्म करती है। फूलों से जो परागण निकलते हैं वो मानव स्वास्थ्य के लिए घातक है। अस्थमा से पीड़ित व्यक्ति यदि इनके सम्पर्क में आते हैं तो उन पर अटैक का खतरा अधिक रहता है। यह ज्यूलीफ्लोरा से भी घातक है।<br /><strong>-सोनू कुमार, जिला कोर्डिनेटर, बायोडायवर्सिटी रिसर्च एंड डवलपमेंट सोसायटी भारत </strong></p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />यदि ऐसा है तो इसका जांच व अध्ययन करवाकर स्थानीय पौधों से रिप्लेस करवाएंगे।<br /><strong>-मुकुेश चौधरी, सचिव केडीए </strong></p>
<p>कोनोकार्पस पर काफी रिसर्च हुई है। जिसमें सामने आया कि यह एलर्जिक है और अस्थमा जैसी बीमारियों का कारण बनता है। यह न केवल मानव स्वास्थ्य के लिए बल्कि ईको सिस्टम के लिए भी घातक है। कोनोकार्पस दिखने में खूबसूरत है लेकिन उतना ही घातक भी है। लोगों को इसके दुष्प्रभाव के बारे में जागरूक किया जाएगा। <br /><strong>-सुगनाराम जाट, संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक मुकुंदरा </strong></p>
<p>कोनोकार्पस न केवल मानव स्वास्थ्य के लिए बल्कि बायोडायवर्सिटी के लिए भी हानिकारक है। इसके परागण हवा के साथ उड़कर सांस में जाते हैं तो अस्थमा, लंग्स और हड्डियों में दर्द संबंधित बीमारियों का कारण बनता है। इसकी जड़े इतनी गहरी होती है कि सारा भूजल सोख लेता है और अपने आसपास लगे स्थानीय पौधों को पानी नहीं मिलने से मर जाते हैं। इसकी लकड़ी सूखी होती है, जिससे आगजनी का खतरा रहता है। इसके फूलों में मकरंद (पक्षियों के लिए अमृत)नहीं होता, जिससे  पक्षियों को न्यूट्रिशन नहीं मिलता। कोई भी पक्षी इस पर घौंसला नहीं बनाता। वन विभाग इस तरह के पौध नहीं लगाता है। हमारी ओर से जिला प्रशासन सहित अन्य डिपार्टमेंट को इसके रोपण पर रोक लगाने को लिखा जाएगा।<br /><strong>-अनुराग भटनागर, उप वन संरक्षक वन्यजीव विभाग </strong></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Sep 2025 18:54:42 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>विसर्जन के बाद भी तालाब में तैरती रही गणपति की मूर्तियां, जगह-जगह बिखरी पड़ी पूजन सामग्री</title>
                                    <description><![CDATA[ कोटा शहर की गलियों और सड़कों पर गणेश विसर्जन के बाद एक अजीब नजारा देखने को मिल रहा है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/even-after-immersion--idols-of-ganpati-kept-floating-in-the-pond/article-126230"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-09/untitled-design-(2)3.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोटा शहर की गलियों और सड़कों पर गणेश विसर्जन के बाद एक अजीब नजारा देखने को मिल रहा है। गणपति महोत्सव के समापन और बप्पा के विसर्जन के बाद श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाई गई पूजन सामग्री जगह-जगह बिखरी पड़ी है। जहां पिछले 10 दिनों से ढोल-नगाड़ों और भक्ति भजनों के साथ शहर गणपति बप्पा के जयकारों से गूंज रहा था, अब उन्हीं मार्गों पर नारियल, माला, फूल, कपड़े और अन्य सामग्री कचरे के ढेर का रूप लेती नजर आ रही है। आयोजन समिति को भी चाहिए कि श्रद्धा और जिम्मेदारी के बीच संतुलन साधते हुए ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिससे आस्था भी बनी रहे और पर्यावरण के साथ जलीय जीव भी सुरक्षित रहे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजन सामग्री पवित्र मानी जाती है, लेकिन इसे कचरे में डालना आस्था का अपमान है। साथ ही पॉलिथीन, कपड़े और नारियल तालाबों को प्रदूषित कर रहे हैं, जिससे जलीय जीवों पर भी खतरा ना मंडराए। भीतरी कुण्ड व किशोर सागर तालाब में विसर्जन के बाद भी मूर्तियां पानी में तैरती नजर आई। </p>
<p><strong>पूजा की सामग्री को इधर-उधर फेंकना गलत</strong><br />बप्पा के विसर्जन के लिए श्रद्धालु बड़ी संख्या में भीतरी कुंड, किशोर सागर तालाब और चंबल बैराज तक पहुंचे। जहां श्रद्धा और भावनाओं के साथ गणेश प्रतिमाओं का जल में विसर्जन हुआ, वहीं दूसरी ओर पूजन सामग्री विसर्जन स्थलों के आसपास ही छोड़ दी। लोग समझते हैं कि बप्पा को विदाई देकर उनका कर्तव्य पूरा हो गया, लेकिन उसी वक्त वे यह भी भूल जाते हैं कि पूजा की सामग्री को इधर-उधर छोड़ने से भगवान की आराधना से जुड़े प्रतीकों का अनादर होता है धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजा में प्रयुक्त सामग्री पवित्र मानी जाती है। इसे किसी भी स्थिति में अपवित्र स्थान पर फेंकना या गंदगी में मिलाना उचित नहीं है। लेकिन शहर के हालात इसके विपरीत दिखाई दे रहे हैं। विसर्जन स्थलों के आसपास नारियल के छिलके, कपड़े, फूल और प्रतिमाओं के साथ रखी गई वस्तुएं गंदगी का ढेर बना रही हैं। इस स्थिति से आस्था के साथ भगवान की प्रतिमा का भी अनादर होता है। वहीं नारियल, कपड़े और पॉलिथीन को भी पानी में फेंका गया है इससे तालाबों और नदियों का पानी दूषित होता है और जलीय जीवों पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है।</p>
<p><strong>मूर्ति विसर्जन में लगी रही श्रद्धालुओं की होड़</strong><br />अनंतचतुर्दशी के दिन किशोर सागर तालाब, भीतरी कुण्ड में विनायक की मूर्ति विसर्जन करने के दौरान श्रद्धालुओं में होड़ लगी रही। हम विनायक के लिए एक साल इंतजार करते है उसके बाद गणेश चतुर्थी रूपी विशेष दिन में पांडालों, घरों में व मंदिरों में बिठाते हैं। दस दिन तक सेवा-पूजन करने बाद श्रद्धालुओं में विसर्जन करने के लिए होड़ लग जाती है। इस कारण उनके साथ आने वाली पूजन सामग्री को भी व्यवस्थित नहीं रखकर इधर उधर या पानी में फेंक दी जाती है। इस तरह उनका अनादर भी होता है।</p>
<p><strong>विसर्जन के बाद भी मूर्तियां तैरती रही </strong><br />अनंतचतुर्दशी के दिन हजारों श्रद्धालुओं ने गणपति का विसर्जन किया। किशोर सागर तालाब में रविवार को भी गणपति विसर्जन के बाद मूर्तियां तैरती रही। इस तालाब में छोटी से लेकर बड़ी गणेश मूर्तियों का भी विसर्जन हुआ। इनमें अधिकांश मिट्टी की थी जो पानी में आसानी से समाहित हो गई, वहीं कुछ मूर्तियां ऐसी रही जो विसर्जन के बाद भी तालाब में समाहित नहीं हो पाई।</p>
<p><strong>सफाई कर्मियों की बढ़ी परेशानी</strong><br />विसर्जन के बाद श्रद्धालुओं के द्वारा गणेश विसर्जन के बाद पूजन सामग्री, फूल माला इधर-उधर फेंकने के बाद सफाईकर्मियों के आफत बन जाती है जिसके कारण सुबह से शाम तक इसी काम में लगे रहते है। वहीं नगर निगम को भी चाहिए कि विसर्जन के दौरान पूजन सामग्री के लिए  रखने के लिए अलग से व्यवस्था करनी चाहिए। ताकि बाद में सफाईकर्मियों के लिए परेशानी ना बनें।</p>
<p><strong>धार्मिक संस्थाएं, समाजसेवी संगठन को आगे आना होगा</strong><br />भूरिया गणेश के मुख्य पुजारी सुशील गौतम  ने बताया कि गणेश विसर्जन के बाद श्रद्धालुओं की जिम्मेदारी यहीं खत्म नहीं हो जाती कि वे सामग्री विसर्जन के बाद के नीचे रखकर चले जाएं। बल्कि जरूरत है इसे सम्मानजनक तरीके से निस्तारित करने की है। तालाबों और कुण्डो में मूर्तियों के साथ आस्था रूपी पूजन सामग्री को फेंकना भी गलत है। वहीं गली-मोहल्लों तथा सड़कों पर इस तरह की सामग्री से बिखरी मिलने से उस सामग्री का अपमान होता है। धार्मिक संस्थाएं, समाजसेवी संगठन और प्रशासन संयुक्त रूप से मिलकर इस समस्या का हल निकाल सकते है। लोगों को भी समझना होगा कि भगवान की मूर्ति का सम्मान तब है जब उसका विसर्जन शास्त्रसम्मत और पर्यावरण के अनुकूल हो। आस्था के नाम पर की गई लापरवाही से भगवान की मूर्ति का भी अनादर होता है।</p>
<p><strong>यह कहते हैं पुजारी</strong><br />गणपति विसर्जन के बाद श्रद्धालुओं को उनकी पूजन सामग्री का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए। गणपति विसर्जन के दौरान उनके साथ आने वाली पूजन सामग्री को इधर-उधर नहीं फेंकना चाहिए। वहीं पानी में उनकी सामग्री को नहीं डालकर अलग व्यवस्थित स्थान पर रखना चाहिए। वहीं पर्यावरण संरक्षक, आयोजन समिति व धार्मिक संस्थाओं को भी इसको लेकर अलग से व्यवस्था बनानी होगी। श्रद्धालुओं को चाहिए कि गणपति वंदना के साथ हमें उनकी पूजन सामग्री का भी ध्यान रखना होगा। हजारों-लाखों श्रद्धालुओं के साथ  गणपति विसर्जन के दौरान आने वाली पूजन सामग्री को इधर-उधर फेंकने के बाद लोगों के पैरों व वाहनों या इधर-उधर बिखरी रहती है तो आस्था का भी अनादर होता है। अत: इसके लिए गणपति बिठाने वाले श्रद्धालुओं को भी ध्यान देना होगा।<br /><strong>- सुशील गौतम, भूरिया गणेश मंदिर, सिंहपोलद्वार, कोटा</strong></p>
<p>श्रद्धालुओं को मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमा का ही उपयोग करना चाहिए ताकि विसर्जन के बाद उसमें समाहित हो जाए। पीओपी की मूर्तियों को तालाब में न डालकर प्रशासन द्वारा बनाई गई जगह पर रखनी चाहिए ताकि पानी में मूर्ति तैरती हुई नहीं मिले तथा जल के अंदर जीवों को नुकसान भी ना पहुंचे। वहीं प्रतिमाओं के साथ आने वाली पूजन सामग्री को भी इधर-उधर न डालकर व्यवस्थित स्थानों पर ही रखना चाहिए ताकि सड़क या इधर-उधर बिखराव ना हो। इसके लिए श्रद्धालुओं को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। इसके लिए पर्यावरण तथा जल प्रदूषण ज्यादा ना हो। आयोजन समितियों को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। पूजन सामग्री का विसर्जन के बाद अनादर ना हो।<br /><strong>- पं. मुकेश बोहरा,  मनसापूर्ण गणेश, पाटनपोल, कोटा</strong></p>
<p>गणेश चतुर्थी के विशेष दिन हम घरों, पांडालों में गणपति को बिठाते है तथा दस दिनों तक लगातार भजन-कीर्तन करते है। सुबह शाम रोजाना महाआरती करते है। अनंतचतुर्दशी के दिन महाआरती के बाद विसर्जन के लिए ले जाते है। गणपति विसर्जन के बाद उनके साथ आने वाली पूजन सामग्री का भी अपमान या अनादर नहीं होना चाहिए। इसके लिए श्रद्धालुओं को भी इसका ध्यान रखना होगा। गणपति विसर्जन के बाद हम उनकी पूजन सामग्री की तरफ ध्यान ही नहीं देते है। तथा इधर-उधर फेंक देते हैं। इसके लिए प्रशासन के द्वारा बनाई गई व्यवस्थाओं का पालन करने के साथ तय की निर्धारित जगह पर रखना चाहिए।<br /><strong>- पं. हर्षवधन गौतम, गणेशपाल, बूंदी रोड, कोटा</strong></p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />किशोर सागर तालाब पर घूमने गए श्याम गर्ग ने बताया कि हम गणपति की दस दिनों तक धूमधाम से पूजा-अर्चना करते है। अनंतचतुर्दशी के दिन हम गली-मौहल्लों, पांडालों में पूजा-अर्चना तथा महाआरती के बाद गणपति विसर्जन के लिए झांकियां रूपी शोभायात्रा में शामिल होकर भीतरी कुण्ड तथा किशोर सागर तालाब पर पहुुंचते है, उस दौरान हमें उनके साथ आने वाली पूजन सामग्री का भी ध्यान रखना चाहिए। इधर-उधर नहीं फेंक कर अलग से व्यवस्था करनी चाहिए। ताकि विसर्जन के बाद आस्था का अनादर ना हो।</p>
<p>भीतरी कुण्ड के बाहर मिले रवि गौड ने बताया कि विसर्जन के दौरान पूजन सामग्री का विशेष ध्यान रखना चाहिए। हजारों श्रद्धालु आते है लेकिन जिनका हमने दस दिन तक पूजन किया है उनकी पूजन सामग्री व अन्य चीजे प्रशासन द्वारा तय की स्थानों पर रखना चाहिए ताकि वो किसी के पैरों में ना आए। इसके लिए पर्यावरण संरक्षक, आयोजन समिति व प्रशासन को संयुक्त विचार करके अलग से व्यवस्था बनानी होगी ताकि पूजन सामग्रीरूपी आस्था किसी के पैरों में ना आए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 08 Sep 2025 18:00:14 +0530</pubDate>
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                <title>कोयले की बिजली से पर्यावरण को गहरा जख्म</title>
                                    <description><![CDATA[थर्मल इंजीनियरिंग ऊर्जा उत्पादन, ऊर्जा प्रबंधन इत्यादि विभिन्न क्षेत्रों में उपयोगी होती है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/coal-electricity-deep-wounds-environment/article-121580"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-07/news62.png" alt=""></a><br /><p>थर्मल इंजीनियरिंग ऊर्जा उत्पादन, ऊर्जा प्रबंधन इत्यादि विभिन्न क्षेत्रों में उपयोगी होती है। थर्मल इंजीनियरिंग उन अवस्थाओं के अध्ययन और उपयोग को समझने में सहायक होती है, जहां ऊष्मा, ऊर्जा और उसकी व्यवस्था का विशेष महत्व होता है। थर्मल इंजीनियरिंग मैकेनिकल इंजीनियरिंग का ही एक विशेष उप-विषय है, जो ऊष्मा ऊर्जा की गति और स्थानांतरण से संबंधित है। ऊर्जा को दो माध्यमों के बीच स्थानांतरित किया जा सकता है अथवा ऊर्जा के अन्य रूपों में परिवर्तित किया जा सकता है। एक थर्मल इंजीनियर का कार्य यांत्रिक प्रणालियों का रखरखाव, निर्माण या मरम्मत करना है, जिसमें ऊर्जा के अन्य रूपों में ऊष्मा हस्तांतरण प्रक्रिया शामिल होती है। थर्मल इंजीनियर विश्लेषण करता है कि यांत्रिक ऊष्मा स्रोत विभिन्न भौतिक और औद्योगिक प्रणालियों के साथ कैसे इंटरैक्ट करते हैं। घरों तथा गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाले एयरकंडीशनर तथा रेफ्रिजरेटरों में थर्मल इंजीनियरिंग का इस्तेमाल होता है। थर्मल इंजीनियरिंग के जरिये इंजीनियर ऊष्मा को अलग-अलग माध्यमों में उपयोग करने के अलावा ऊष्मीय ऊर्जा को दूसरी ऊर्जा में भी परिवर्तित कर सकते हैं।</p>
<p><strong>थर्मल पावर स्टेशन :</strong></p>
<p>थर्मल इंजीनियर ऊष्मीय ऊर्जा को केमिकल, मैकेनिकल या विद्युतीय ऊर्जा में परिवर्तित करने के लिए विभिन्न प्रकार की मशीनें तैयार करते हैं, जिनके जरिये वे ऊष्मा को नियंत्रित करते हैं। हमारे घरों या दफ्तरों में इस्तेमाल होने वाली बिजली इसी ऊष्मीय ऊर्जा से बनती है और यह बिजली बनाने का काम करते हैं थर्मल पावर स्टेशन। ऊष्मीय शक्ति संयंत्र या ताप विद्युत केन्द्र के नाम से भी जाने जाने वाले थर्मल पावर स्टेशन ऐसे विद्युत उत्पादन संयंत्र होते हैं, जिनमें प्रमुख टरबाइनें भाप से चलाई जाती हैं और यह भाप कोयला, गैस इत्यादि को जलाकर पानी को गर्म करके प्राप्त की जाती है। पानी गर्म करने के लिए ईंधन का प्रयोग किया जाता है, जिससे उच्च दाब पर भाप बनती है और बिजली पैदा करने के लिए इसी भाप से टरबाइनें चलाई जाती हैं। थर्मल पावर स्टेशनों में ऊष्मीय ऊर्जा को बिजली में परिवर्तित किया जाता है और इसके लिए भाप से चलने वाली टरबाइनों का इस्तेमाल किया जाता है। भाप बनाने के लिए पानी को उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है, जिसके लिए कोयला, सोलर हीट, न्यूक्लियर हीट, कचरा तथा बायो ईंधन उपयोग किया जाता है।</p>
<p><strong>पर्यावरणीय खतरे :</strong></p>
<p>दुनिया के कई देशों में अभी भी बिजली पैदा करने के लिए भाप से चलने वाली टरबाइनों का उपयोग किया जाता है किन्तु पर्यावरणीय खतरों को देखते हुए अब धीरे-धीरे बिजली पैदा करने के लिए सौर ऊर्जा तथा पवन ऊर्जा जैसे अक्षय ऊर्जा के अन्य स्रोतों को ही महत्व दिया जाने लगा है। भारत में इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ाए जा रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में हजारों मेगावाट क्षमता की कुछ अत्याधुनिक मेगा सौर ऊर्जा परियोजनाएं शुरू भी की गई हैं। हजारों मेगावाट के कुछ सोलर प्लांट पहले से ही ऊर्जा उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान दे भी रहे हैं। दरअसल थर्मल पावर स्टेशनों में भाप पैदा करने के लिए कोयला जलाने से पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंचती है क्योंकि इस प्रक्रिया में निकलने वाली हानिकारक गैसें हवा में मिलकर पर्यावरण को बुरी तरह प्रदूषित करती हैं, साथ ही कोयला या अपशिष्ट जलाने के बाद बचने वाले अवशेषों के निबटारे की भी बड़ी चुनौती मौजूद रहती है।</p>
<p><strong>ऊर्जा के अन्य स्रोत :</strong></p>
<p>हालांकि भारत में थर्मल पावर स्टेशनों में बिजली पैदा करने के लिए कोयले के अलावा ऊर्जा के अन्य स्रोतों का भी इस्तेमाल किया जाता है किन्तु अधिकांश बिजली कोयले के इस्तेमाल से ही पैदा होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कोयले को जलाया जाना और इससे होने वाली गर्मी, पारे के प्रदूषण का मुख्य कारण है। वैसे बिजली पैदा करने के लिए भले ही ऊर्जा के किसी भी स्रोत का इस्तेमाल किया जाए, प्रत्येक थर्मल पावर प्लांट में इसके लिए बॉयलर का इस्तेमाल होता है, जिसमें ईंधन को जलाकर ऊष्मीय ऊर्जा पैदा की जाती है, जिससे पानी को गर्म कर भाप बनाई जाती है, जो टरबाइनों को चलाने में इस्तेमाल होती है। वायु प्रदूषण आज दुनियाभर में एक बड़े स्वास्थ्य संकट के रूप में उभर रहा है और इस समस्या के लिए थर्मल पावर प्लांटों से निकलने वाला उत्सर्जन भी एक बड़ा कारण है।</p>
<p><strong>अक्षय ऊर्जा का लक्ष्य :</strong></p>
<p>इस समस्या से निपटने के लिए एक दशक से भी अधिक समय से उत्सर्जन मानकों को पूरा करने और नए कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को रोककर अक्षय ऊर्जा की तरफ कदम बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट भी इन उत्सर्जन मानकों को पूरा करने के लिए समय सीमा निर्धारित करता रहा है किन्तु थर्मल पावर प्लांट के लिए उत्सर्जन मानकों को लागू करने का मामला वर्षों से अधर में लटका है। पर्यावरण पर कार्यरत कुछ संस्थाओं द्वारा निरंतर मांग की जा रही है कि पर्यावरण मंत्रालय उत्सर्जन मानकों का पालन कराते हुए थर्मल पावर प्लांटों को प्रदूषण के लिए उत्तरदायी बनाए और अक्षय ऊर्जा के लक्ष्य को हासिल करने के लिए नए थर्मल पावर प्लांटों का निर्माण रोका जाए। समय के साथ अब जरूरत इसी बात की है कि हम अक्षय ऊर्जा की ओर तेजी से कदम बढ़ाएं और बिजली बनाने के लिए चरणबद्ध तरीके से ऊर्जा के इन्हीं सुरक्षित स्रोतों के इस्तेमाल को बढ़ावा दें।</p>
<p><strong>-योगेश कुमार गोयल</strong><br /><strong>यह लेखक के अपने विचार हैं।</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/opinion/coal-electricity-deep-wounds-environment/article-121580</link>
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                <pubDate>Fri, 25 Jul 2025 12:01:04 +0530</pubDate>
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