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                <title>environment - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>environment RSS Feed</description>
                
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                <title>पीएम मोदी की अपील पर दिल्ली सरकार का बड़ा फैसला: एक साल तक कोई मंत्री नहीं करेगा विदेशी दौरा, सरकारी कर्मचारी 2 दिन करेंगे वर्क फ्रॉर्म होम</title>
                                    <description><![CDATA[प्रधानमंत्री मोदी की अपील पर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने दिल्ली में बड़े सुधार लागू किए हैं। अब सरकारी कर्मचारी सप्ताह में दो दिन वर्क फ्रॉम होम करेंगे। ईंधन और बिजली बचाने के लिए कार्यालयों के समय में बदलाव किया गया है और मंत्रियों के विदेश दौरों पर एक साल तक पूर्ण रोक लगा दी गई है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/big-decision-of-delhi-government-on-pm-modis-appeal-no/article-153833"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/rekha-guprta.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। देश में बढ़ते ऊर्जा संकट और ईंधन बचत को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया अपील के बाद दिल्ली सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने सरकारी कामकाज में ऊर्जा बचत और खर्चों में कटौती के लिए कई अहम घोषणाएं की हैं। दिल्ली सरकार के अनुसार अब सरकारी कर्मचारी सप्ताह में दो दिन “वर्क फ्रॉम होम” करेंगे, ताकि कार्यालयों में बिजली और संसाधनों की खपत कम की जा सके। इसके साथ ही सरकारी कार्यालयों के समय में भी बदलाव किया गया है। नई व्यवस्था के तहत दफ्तरों का टाइम टेबल चरणबद्ध तरीके से बदला जाएगा, जिससे ट्रैफिक दबाव और ईंधन की खपत कम हो सके। इसके साथ ही दिल्ली सरकार ने कहा है कि अब से आने वाले एक साल तक कोई भी मंत्री विदेश दौरा नहीं करेगा।</p>
<p>सरकार ने कर्मचारियों के लिए विशेष बस सेवा शुरू करने का भी फैसला लिया है। इससे निजी वाहनों का उपयोग घटेगा और प्रदूषण नियंत्रण में मदद मिलेगी। वहीं खर्चों में कटौती के तहत दिल्ली सरकार के किसी भी मंत्री को अगले एक साल तक विदेश दौरे की अनुमति नहीं होगी। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों से ऊर्जा बचत, आत्मनिर्भरता और संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग की अपील की थी। दिल्ली सरकार उसी दिशा में यह कदम उठा रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 14 May 2026 16:11:38 +0530</pubDate>
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                <title>भजनलाल सरकार का बड़ा फैसला: बांसवाड़ा, सिरोही और उदयपुर में विकसित होंगे चंदन वन, अधिकारियों को निर्देश जारी</title>
                                    <description><![CDATA[मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने पर्यावरण संरक्षण के लिए बांसवाड़ा, सिरोही और उदयपुर में चंदन के वन विकसित करने के निर्देश दिए हैं। उच्च गुणवत्ता वाले पौधारोपण और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया है। इस पहल का उद्देश्य राज्य के वन क्षेत्र का विस्तार करना और पारिस्थितिकी संतुलन को मजबूत बनाना है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/big-decision-of-bhajanlal-government-instructions-issued-to-sandalwood-forest/article-152555"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-05/bhajanlal.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने राज्य में वन क्षेत्र के विस्तार और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए बांसवाड़ा, सिरोही और उदयपुर में चंदन के वन विकसित करने के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री ने रविवार को मुख्यमंत्री निवास पर वन एवं पर्यावरण विभाग की समीक्षा बैठक लेते हुए कहा कि इन क्षेत्रों में चंदन के पौधों का चयन उच्च गुणवत्ता का हो और उनकी सुरक्षा व उचित रखरखाव सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि पौधारोपण अभियान की सभी तैयारियां समय पर पूरी कर ली जाएं, ताकि निर्धारित समय पर प्रभावी ढंग से अभियान संचालित किया जा सके।</p>
<p>बैठक में मुख्यमंत्री ने वन संरक्षण के साथ-साथ हरित क्षेत्र बढ़ाने के प्रयासों को और तेज करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए वृक्षारोपण और वन विकास अत्यंत आवश्यक है। बैठक में वन एवं पर्यावरण विभाग के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे, जबकि वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संजय शर्मा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़े।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 03 May 2026 18:35:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कांग्रेस का हमला: ग्रेट निकोबार परियोजना में पर्यावरण, आदिवासी अधिकार और पारदर्शिता नदारद, इन विषयों पर जवाब देने में वह विफल रही सरकार</title>
                                    <description><![CDATA[जयराम रमेश ने ग्रेट निकोबार विकास परियोजना को पारिस्थितिक आपदा करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने लेदरबैक कछुओं के आवास, आदिवासी अधिकारों और पारदर्शिता को दरकिनार किया है। राहुल गांधी की यात्रा के बाद, कांग्रेस ने पेड़ों की कटाई और पर्यावरणीय मंजूरी में हितों के टकराव पर सरकार से जवाब मांगा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/congress-attacks-government-fails-to-respond-on-issues-like-environment/article-152514"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/jairam-ramesh1.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना में मोदी सरकार ने पर्यावरण, आदिवासियों के अधिकार, वित्तीय व्यवहार्यता और पारदर्शिता को पूरी तरह नजरअंदाज किया है और इन चिंताओं का जवाब देने में वह विफल रही है। कांग्रेस संचार विभाग के प्रभारी जयराम रमेश ने रविवार को सोशल मीडिया एक्स पर एक बयान में कहा कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की गत 28 अप्रैल की ग्रेट निकोबार यात्रा से सरकार विचलित हुई है, इसलिए उसने एक मई को प्रेस विज्ञप्ति जारी कर ध्यान भटकाने की कोशिश की है। सरकार संभावित पर्यावरणीय संकट से ध्यान हटाने का प्रयास कर रही है।</p>
<p>जयराम रमेश ने कहा कि ग्रेट निकोबार द्वीप पारिस्थितिकी दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील और विशिष्ट क्षेत्र है। वहां गत पांच वर्षों में पक्षियों, सांपों, गिको (छिपकली) और केकड़ों सहित लगभग 50 नयी प्रजातियां खोजी गई हैं। गैलाथिया खाड़ी, जहां बंदरगाह प्रस्तावित है, तटीय विनियमन क्षेत्र-1-ए में आती है और यह लेदरबैक कछुओं का प्रमुख प्रजनन स्थल है। उन्होंने आरोप लगाया कि पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रिया में भारतीय वन्यजीव संस्थान और भारतीय प्राणी सर्वेक्षण जैसी संस्थाओं पर दबाव डाला गया और बाद में इन्हीं को परियोजना से जुड़े कार्य सौंपे गए, जिससे हितों के टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है।</p>
<p>कांग्रेस नेता ने कहा कि पेड़ों की कटाई के आंकड़ों को लेकर सरकार के अलग-अलग दावे सामने आए हैं और अब तक इसमें स्पष्टता नहीं है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग समय पर भिन्न आंकड़े दिए जाने से स्थिति संदिग्ध हो जाती है। उन्होंने प्रतिपूरक वनीकरण के प्रस्ताव को पर्यावरणीय दृष्टि से अव्यावहारिक बताते हुए कहा कि निकोबार जैसे समृद्ध पारिस्थितिक क्षेत्र की भरपाई भिन्न भौगोलिक क्षेत्र में वृक्षारोपण से नहीं की जा सकती और यह पर्यावरणीय सिद्धांतों के विपरीत है। उन्होंने कहा कि गैलाथिया खाड़ी को पहले वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया था, लेकिन बाद में परियोजना के लिए इसे अधिसूचना से हटाकर इसकी श्रेणी बदली गई।</p>
<p>आदिवासी अधिकारों के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि निकोबारी समुदाय ने परियोजना को लेकर चिंता जताई है और शोंपेन जैसे संवेदनशील समुदाय की सहमति की प्रक्रिया पर भी प्रश्न उठ रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत अधिकारों की प्रक्रिया जल्दबाजी में पूरी की गई। परियोजना की वित्तीय व्यवहार्यता पर सवाल उठाते हुए श्री रमेश ने कहा कि प्रस्तावित हवाई अड्डे और परियोजना के अन्य दावे अव्यावहारिक प्रतीत होते हैं और इससे जुड़े कई व्यावहारिक प्रश्न अनुत्तरित हैं। उन्होंने पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाते हुए कहा कि परियोजना से जुड़े कई महत्वपूर्ण दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किए गए हैं और सूचना के अधिकार के तहत भी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जा रही है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि इसे परियोजना से जोड़ना उचित नहीं है और इस पर संसद में व्यापक चर्चा होनी चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 03 May 2026 17:59:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>लद्दाख का विकास स्थानीय हितों के अनुरूप हो : राहुल गांधी का आरोप, बोले-लोकतांत्रिक अधिकारों को दबाने का हो रहा प्रयास </title>
                                    <description><![CDATA[विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने लद्दाख में लोकतांत्रिक अधिकारों के हनन पर चिंता जताई है। उन्होंने आरोप लगाया कि क्षेत्र को 'पुलिस राज' में बदल दिया गया है और उद्योगपतियों के लाभ के लिए नाजुक पर्यावरण से समझौता हो रहा है। उन्होंने गृह मंत्री से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार और भूमि संरक्षण सुनिश्चित करने की अपील की।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/development-of-ladakh-should-be-in-accordance-with-local-interests/article-152228"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/rahul-gandhii.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा है कि लद्दाख में लोकतांत्रिक अधिकारों को दबाने का प्रयास हो रहा है और वहां के लोगों की आवाज़ को दबाया जा रहा है। राहुल गांधी ने गुरुवार को सोशल मीडिया एक्स पर लिखा कि लद्दाख के युवाओं ने उन्हें बताया है कि किस तरह से उनके क्षेत्र को एक तरह के 'पुलिस राज' में बदल दिया गया है। वहां लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन हो रहा है और स्थानीय लोगों की आवाज़ को दबाया जा रहा है। उन्होंने यह भी लिखा कि लद्दाख की ज़मीन और नाज़ुक पर्यावरण को कथित रूप से बड़े उद्योगपतियों के हितों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, जिससे स्थानीय लोगों में चिंता बढ़ी है।</p>
<p>राहुल गांधी ने स्पष्ट किया कि लद्दाख के लोग विकास के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि वे ऐसा विकास चाहते हैं जो स्थानीय समुदाय को रोज़गार और आर्थिक लाभ पहुंचाए। उन्होंने उम्मीद जताई कि गृह मंत्री अमित शाह अपने प्रस्तावित दौरे में क्षेत्र की वास्तविक स्थिति को समझेंगे और वहां के लोगों की चिंताओं पर ध्यान देंगे। गौरतलब है कि लद्दाख में हाल के वर्षों में राजनीतिक अधिकारों, ज़मीन और विकास मॉडल को लेकर असंतोष बढ़ा है। जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 के बाद केंद्र शासित प्रदेश बनने से वहां विधानसभा नहीं है, जिससे स्थानीय लोग अपने अधिकार सीमित होने की बात कहते हैं। इसके साथ ही वहां के लोग बाहरी निवेश और बड़े प्रोजेक्ट्स को लेकर ज़मीन, रोज़गार और नाज़ुक पर्यावरण पर इसके असर की आशंका भी जता रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 17:32:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>जयपुर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट बना वाटर पॉजिटिव, जल संरक्षण में नई मिसाल</title>
                                    <description><![CDATA[जयपुर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट ने 1.37 लाख किलोलीटर पानी बचाकर राजस्थान का पहला "वाटर पॉजिटिव" एयरपोर्ट बनने का गौरव हासिल किया है। पुनर्चक्रण और रेन वाटर हार्वेस्टिंग के जरिए एयरपोर्ट ने उपभोग से अधिक जल संचयन किया। ब्यूरो वेरिटाज द्वारा प्रमाणित यह मॉडल मरूस्थलीय प्रदेश में सतत विकास की नई मिसाल है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/jaipur-international-airport-becomes-a-new-example-in-water-positive/article-151998"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-02/airport.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। मरुस्थलीय प्रदेश राजस्थान में जल संरक्षण की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। जयपुर स्थित जयपुर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट अब आधिकारिक रूप से “वाटर पॉजिटिव एयरपोर्ट” की श्रेणी में शामिल हो गया है। यह उपलब्धि हासिल करने वाला यह राजस्थान का पहला और देश के चुनिंदा एयरपोर्ट्स में शामिल हो गया है। एयरपोर्ट ने अप्रैल, 2025 से मार्च 2026 के बीच कुल 1.03 लाख किलोलीटर पानी का उपभोग किया, जबकि इसी अवधि में जल संरक्षण और पुनर्भरण उपायों के जरिए 1.37 लाख किलोलीटर पानी की बचत दर्ज की गई। यानी एयरपोर्ट ने जितना पानी इस्तेमाल किया, उससे कहीं अधिक पानी को पुनर्चक्रित और संरक्षित किया गया।</p>
<p>इस उपलब्धि के लिए ग्लोबल कंसल्टिंग फर्म ब्यूरो वेरिटाज ने एयरपोर्ट को आधिकारिक एक्रेडिटेशन प्रदान किया है। एयरपोर्ट परिसर में जल संरक्षण के लिए 18 गहरे एक्वाफर रिचार्ज पिट बनाए गए हैं, जिनके माध्यम से वर्षा जल का संग्रहण कर भूजल स्तर बढ़ाने का कार्य किया जा रहा है। इसके अलावा रेन वाटर हार्वेस्टिंग, जल पुनर्चक्रण और भूजल पुनर्भरण जैसी योजनाओं पर लगातार काम किया जा रहा है। पानी की कमी वाले क्षेत्र में स्थित होने के बावजूद एयरपोर्ट प्रशासन ने सतत प्रयासों से जल प्रबंधन का सफल मॉडल प्रस्तुत किया है। विशेषज्ञों के अनुसार यह उपलब्धि अन्य संस्थानों और एयरपोर्ट्स के लिए भी प्रेरणा बनेगी और जल संरक्षण के क्षेत्र में नई दिशा प्रदान करेगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 Apr 2026 17:49:02 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>कांग्रेस का केंद्र पर निशाना : जनजातीय अधिकारों और पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के उल्लंघन का लगाया आरोप, जयराम ने कहा-सरकार कराए निष्पक्ष जांच</title>
                                    <description><![CDATA[कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने ओडिशा के सिजीमाली खनन प्रोजेक्ट में जनजातीय अधिकारों और पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन का गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने विरोध कर रहे आदिवासियों पर पुलिसिया बल प्रयोग की स्वतंत्र जांच की मांग की। रमेश ने जोर दिया कि पेसा (PESA) और वन अधिकार अधिनियम की अनदेखी कर परियोजनाओं को जबरन थोपना असंवैधानिक है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/congress-targets-center-accuses-it-of-violating-tribal-rights-and/article-151919"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/jairam-ramesh.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने मंगलवार को ओडिशा के रायगड़ा और कालाहांडी जिलों में प्रस्तावित बॉक्साइट खनन परियोजना के संबंध में जनजातीय अधिकारों और पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के गंभीर उल्लंघन का आरोप लगाया। उन्होंने क्षेत्र में हाल ही में हुई अशांति की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है। जयराम रमेश ने सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि ओडिशा में सार्वजनिक प्रतिरोध का एक लंबा इतिहास रहा है, खासकर तब जब पारिस्थितिक परिणामों वाली खनन परियोजनाओं को संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों का पालन किए बिना 'जबरन थोपा' जाता है। उन्होंने सिजीमाली में प्रस्तावित परियोजना को इसी 'निराशाजनक गाथा' का हिस्सा बताया।</p>
<p>कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि जनजातीय और वनवासी समुदायों की सुरक्षा के लिए बनाए गए प्रमुख कानून, जिनमें पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (पेसा), 1996 और वन अधिकार अधिनियम, 2006 शामिल हैं, उनकी अनदेखी की गई है। जयराम रमेश ने दावा किया कि जब हाल के दिनों में विरोध प्रदर्शन शुरू हुए, तो कानून प्रवर्तन एजेंसियों ने 'अत्यधिक बल' का प्रयोग किया, जिसमें विशेष रूप से अनुसूचित जनजाति समुदायों और महिलाओं को निशाना बनाया गया। उन्होंने कहा कि इस तरह की कार्रवाइयां अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 का उल्लंघन हैं।</p>
<p>राजनीतिक संदर्भ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ओडिशा के मुख्यमंत्री और केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री दोनों इसी राज्य से आते हैं, इसलिए उन्हें इस मुद्दे को संभालने में अधिक संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। उन्होंने केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री से सिजीमाली अशांति की स्वतंत्र जांच के आदेश देने और यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि पेसा और वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों को पारदर्शी और सहभागी प्रक्रिया के माध्यम से 'अक्षरशः' लागू किया जाए। ये आरोप दक्षिणी ओडिशा के कुछ हिस्सों में चल रहे तनाव के बीच आए हैं, जहाँ जनजातीय समुदाय विस्थापन, पर्यावरणीय क्षरण और पारंपरिक अधिकारों के नुकसान की चिंताओं को लेकर अक्सर खनन परियोजनाओं का विरोध करते रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>Top-News</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 Apr 2026 13:58:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>ग्रेट निकोबार द्वीप के आदिवासी प्रमुखों ने की राहुल गांधी से मुलाकात: ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का जताया कड़ा विरोध, बताया जीवन-यापन के तरीके और द्वीप के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर खतरा</title>
                                    <description><![CDATA[ग्रेट निकोबार के आदिवासी प्रमुखों ने राहुल गांधी से मिलकर प्रस्तावित मेगा प्रोजेक्ट का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने इसे द्वीप के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र और जनजातीय अस्तित्व के लिए खतरा बताया। राहुल गांधी ने उनके अधिकारों की रक्षा का आश्वासन दिया, जबकि सोनिया गांधी ने इसे आदिवासियों के खिलाफ एक "सुनियोजित दुस्साहस" करार दिया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/tribal-chiefs-of-great-nicobar-island-met-rahul-gandhi-expressed/article-147069"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/rahul-gandhi3.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। ग्रेट निकोबार द्वीप के आदिवासी प्रमुखों के एक प्रतिनिधिमंडल ने गुरुवार को लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मुलाकात की। इस मौके पर आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया के साथ ग्रेट निकोबार द्वीप के आदिवासी प्रमुखों ने श्री गांधी से मुलाकात की। आदिवासी प्रमुखों ने प्रस्तावित ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का कड़ा विरोध जताते हुए कहा कि यह उनके जीवन-यापन के तरीके और द्वीप के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र के लिए गंभीर खतरा है। उन्होंने यह भी बताया कि परियोजना की मंजूरी के दौरान उनकी सहमति भी उचित तरीके से नहीं ली गई। </p>
<p>कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया कि कांग्रेस पार्टी उनके साथ मजबूती से खड़ी रहेगी और उनके अधिकारों एवं हितों की रक्षा के लिए उनकी चिंताओं को उठाएगी। उल्लेखनीय है कि, कांग्रेस संसदीय दल अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को सुनियोजित दुस्साहस बताते हुए इसका विरोध जताया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि यह परियोजना स्थानीय शोम्पेन और निकोबारी जनजातियों के अस्तित्व को खत्म कर देगी, एक अखबार में लिखे लेख के जरिए सोनिया गांधी ने इसे आदिवासी अधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं का उल्लंघन करार दिया था।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 19 Mar 2026 16:00:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने की चैत्र नवरात्र स्थापना पर पूजा-अर्चना: प्रदेशवासियों के स्वस्थ, सुखी एवं समृ़द्ध जीवन की प्रार्थना की; वृक्षों पर पक्षियों के लिए परिंडे भी बांधें</title>
                                    <description><![CDATA[मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर सपरिवार राज राजेश्वरी मंदिर में विधि-विधान से पूजा-अर्चना और घट स्थापना की। उन्होंने प्रदेश की सुख-समृद्धि की कामना करते हुए जीव-जंतुओं के प्रति करुणा का संदेश दिया और बढ़ती गर्मी को देखते हुए पक्षियों के लिए परिंडे बांधे।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/chief-minister-bhajan-lal-sharma-performed-puja-on-the-occasion/article-147021"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-03/cm-bhajanlal1.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने गुरूवार को चैत्र नवरात्र के प्रथम दिन मुख्यमंत्री निवास स्थित राज राजेश्वरी मंदिर में सपत्नीक विधिवत पूजा-अर्चना कर घट स्थापना की तथा मां दुर्गा की आराधना की। </p>
<p>शर्मा ने मां दुर्गा से प्रदेशवासियों के स्वस्थ, सुखी एवं समृ़द्ध जीवन की प्रार्थना की। मुख्यमंत्री ने इस दौरान आगामी गर्मी के मौसम को देखते हुए वृक्षों पर पक्षियों के लिए परिंडे भी बांधें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 19 Mar 2026 12:39:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जनसंख्या और पर्यावरण में ट्रेड-ऑफ नीति बनाना जरूरी, 2060 तक 20 से 30 करोड़ बढ़ेगी जनसंख्या</title>
                                    <description><![CDATA[जनसंख्या बढ़ेगी तो प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा और पर्यावरण प्रभावित होगा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/a-trade-off-policy-between-population-and-the-environment-is-essential/article-142560"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/(12200-x-600-px)-(7)1.png" alt=""></a><br /><p>कोटा । जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरण के बीच संतुलन आज की सबसे बड़ी वैश्विक चुनौतियों में से एक बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार, भारत की जनसंख्या आने वाले 30-40 वर्षों में लगभग 150 करोड़ से बढ़कर 170 करोड़ (1.5 अरब से 1.7 अरब) तक पहुँच सकती है, आने वाले 30-40 वर्षों में भारत की जनसंख्या में लगभग 20 से 30 करोड़ की वृद्धि होगी। यह वृद्धि तब हो रही है जब फर्टिलिटी रेट और प्रतिस्थापन दर, (रिप्लेसमेंट रेट) दोनों में गिरावट आ चुकी है। इसके बावजूद जनसंख्या का बढ़ना डेमोग्राफिक इनरशिया का परिणाम है, जिसके बाद जनसंख्या स्थिर होने की संभावना है। जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरणीय दबाव के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए ट्रेड-ऑफ अनिवार्य हो गया है। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ेगी, मानवीय आवश्यकताएँ  जैसे पानी, भोजन, ऊर्जा और आवास भी बढ़ेंगी, जो प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। इन संसाधनों की अत्यधिक खपत पर्यावरण पर दबाव डालती है। इसलिए, हमें यह तय करना होगा कि संसाधनों का उपयोग कितनी सीमा तक करें, ताकि पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखा जा सके। भविष्य में इंसान को इस संतुलन को बनाए रखने के लिए कठोर ट्रेड-आॅफ करने होंगे।</p>
<p><strong>ट्रेड-ऑफ कैसे करना होगा?</strong><br />- जनसंख्या बढ़ने के साथ आवास की मांग भी बढ़ेगी। इसके लिए शहरीकरण की प्रक्रिया तेज होगी, लेकिन इस प्रक्रिया में वृक्षों की कटाई और भूमि का अत्यधिक उपयोग हो सकता है। इस समस्या का समाधान वर्टिकल कंस्ट्रक्शन और ग्रीन बिल्डिंग जैसे उपायों में है। इस तरह, कम जमीन में अधिक लोग समा सकते हैं और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण किया जा सकता है।<br />- बढ़ती जनसंख्या के लिए अधिक खाद्य उत्पादन की आवश्यकता होगी, जिसके लिए अधिक रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक इस्तेमाल किए जाएंगे। हालांकि, इनका अत्यधिक उपयोग मिट्टी की उर्वरता को कम कर सकता है और जल स्रोतों को प्रदूषित कर सकता है। इसका हल जैविक खेती औरड्रिप इरिगेशन और इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट, जो भूमि और जल पर दबाव कम करने में मदद करते हैं।<br />- बढ़ती जनसंख्या के साथ जल और ऊर्जा की मांग भी बढ़ेगी। जल संकट से निपटने के लिए वर्षा जल संचयन और जल पुनर्चक्रण की प्रणालियाँ अपनाई जा सकती हैं। आबादी बढ़ने के साथ बिजली की माँग तेजी से बढ़ेगी जिसे पूरा करने के लिए कोयले पर पूरी तरह निर्भर रहना पर्यावरण के लिए नुकसानदेह होगा।<br />सोलर एनर्जी को बढ़ावा देकर इस दबाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इससे कोयले का उपयोग पूरी तरह खत्म तो नहीं होगा, लेकिन प्रदूषण और पर्यावरणीय दबाव को संतुलित करते हुए ऊर्जा की बढ़ती मांग के साथ एक व्यावहारिक ट्रेड-ऑफ संभव होगा।<br />- औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के कारण प्रदूषण बढ़ेगा, जो जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य समस्याएँ और पारिस्थितिकी तंत्र की हानि का कारण बनेगा। इस समस्या से निपटने के लिए हरित प्रौद्योगिकी और सतत कचरा प्रबंधन के उपायों को अपनाना आवश्यक होगा। कचरे का पुनर्चक्रण, कचरा पृथक्करण, और प्लास्टिक मुक्त समाज की दिशा में कदम बढ़ाने से प्रदूषण को कम किया जा सकता है।<br />- जनवरों के संरक्षण के लिए ट्रेड-ऑफ करना महत्वपूर्ण है, क्योंकि मानव विकास और जैव विविधता के बीच संतुलन जरूरी है। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ेगी, शहरीकरण और खेती के लिए भूमि का उपयोग बढ़ेगा, जिससे जानवरों के आवास नष्ट होंगे। इसके लिए, सतत शहरीकरण और वन संरक्षण क्षेत्रों का विस्तार आवश्यक है। कृषि भूमि बढ़ाने से भी जानवरों को खतरा होता है, इसलिए जैविक खेती और स्मार्ट कृषि प्रौद्योगिकियाँ अपनानी चाहिए, जो भूमि की उर्वरता और जानवरों के आवास दोनों को संरक्षित करें। साथ ही, जंगली जानवरों के लिए वाइल्डलाइफ कॉरिडोर बनाए जाएं ताकि वे मानव बस्तियों से दूर रहें।</p>
<p><strong>ट्रेड-ऑफ कहाँ तक कर सकते हैं?</strong><br />जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरणीय दबाव को ध्यान में रखते हुए, हमें विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। वर्तमान में प्रदूषण और संसाधनों का संकट गहरा है, और बढ़ती जनसंख्या इसे और कठिन बना देगी। इसलिए, जनसंख्या नियंत्रण ही समाधान है। सरकार को स्पष्ट और सख्त ट्रेड-ऑफ पॉलिसी बनानी होगी, जो मानवीय आवश्यकताओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन तय करे। संसाधन सीमित हैं, और हमें ट्रेड-आॅफ तब तक करना होगा जब तक हम प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक शोषण और जैव विविधता को नष्ट न करें। इसके लिए तकनीकी नवाचार और हरित प्रौद्योगिकियों को अपनाना जरूरी होगा, ताकि हम सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ सकें। बढ़ती जनसंख्या और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए क्या ट्रेड आॅफ करना पड़ेगा? इस विषय पर लोगों की राय को जाना।</p>
<p>तेजी से बढ़ती आबादी और विकास के नाम पर हो रहे अनियंत्रित निर्माण कार्य पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। आबादी बढ़ने के साथ जंगलों, वन भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है, जिससे पर्यावरणीय असंतुलन गहराता जा रहा है। आने वाले समय में 170 करोड़ की आबादी को खाद्य सुरक्षा देना एक बड़ी चुनौती होगी। जब 170 करोड़ होंगे तब पर्यावरण का सिर्फ शब्द ही बचेगा पर्यावरण नहीं बचेगा।निर्माण कार्यों में इस्तेमाल होने वाला सीमेंट, बजरी, गिट्टी, बिटुमिन और खनिज पूरी तरह प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं। सड़क निर्माण, शहरी विस्तार और औद्योगिक विकास के कारण इन संसाधनों का अत्यधिक दोहन हो रहा है। इसके साथ ही वन भूमि पर हो रहा अवैध खनन पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। हालांकि वैधानिक खनन के लिए नियम और मानक तय हैं, लेकिन अवैध खनन इन सभी नियमों को दरकिनार कर देता है। लीगल और इललीगल माइनिंग के बीच का अंतर पर्यावरण को सबसे अधिक नुकसान पहुंचा रहा है। केवल ट्रेड-ऑफ नीति से समस्या का समाधान संभव नहीं है, क्योंकि प्राकृतिक संसाधनों की अपनी सीमाएं हैं।यदि सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण और पर्यावरण संरक्षण को लेकर समय रहते सख्त और प्रभावी निर्णय नहीं लिए, तो भविष्य में हालात और भी गंभीर हो सकते हैं।<br /><strong>-तपेश्वर सिंह भाटी, पर्यावरणविद एवं वन्य जीव विशेषज्ञ</strong></p>
<p>जल, जंगल और जमीन का संरक्षण नहीं हुआ तो आने वाले वर्षों में, विशेष रूप से 2050 तक, यह हमारे लिए एक बड़ी चुनौती बन जाएगा। सस्टेनेबिलिटी का अर्थ है प्राकृतिक संसाधनों का ऐसा उपयोग करना कि वे हमारी भावी पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित रहें। यदि वर्तमान में हम सस्टेनेबिलिटी को ध्यान में रखकर जल, जंगल और जमीन का उपयोग नहीं करेंगे, तो बढ़ती जनसंख्या के साथ प्राकृतिक संसाधनों में भारी गिरावट आएगी। डिजिटल एरा एक्सपोनेंशियली आगे ग्रोथ कर रहा है, जिससे तकनीक पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है। इसके परिणामस्वरूप ई-वेस्ट में वृद्धि हो रही है, जो पर्यावरण को गंभीर रूप से प्रदूषित कर रहा है। यह हमारे सामने एक बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। सरकार को अभी से ट्रेड-ऑफ पॉलिसी लागू करनी होगी। साथ ही भावी पीढ़ियों को पानी, बिजली बचाने और अनावश्यक डिजिटल उपयोग से बचने की समझ देना अत्यंत आवश्यक है।<br /><strong>- प्रो. रीना दाधीच, कंप्यूटर विज्ञान विभाग, कोटा विश्वविद्यालय</strong></p>
<p>जनसंख्या इतनी तेजी से बढ़ रही है कि अब हमें हर स्तर पर ट्रेड-ऑफ करना पड़ेगा। आज लोगों का व्यवहार ऐसा हो गया है कि वे यह सोचे बिना चीजें मंगाते जा रहे हैं कि वे वास्तव में आवश्यक हैं या नहीं। यदि हम जरूरत पर रुकना सीखें, तो यह उपभोग चक्र कहीं न कहीं धीमा हो सकता है। तकनीकी उत्पादों का अत्यधिक उपयोग हो रहा है, लेकिन अंतत: वे रीसायकल नहीं होते और कचरे में बदलकर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते हैं। इसलिए टिकाऊ और लंबे समय तक उपयोग होने वाली वस्तुओं को अपनाना जरूरी है। नई-नई चीजें बार-बार मंगाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, जिससे पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। यदि हम आवश्यकता के अनुसार ही उपयोग करें, तो ओवरऑल कंजम्पशन अधिक विचारशील होगा। इसके लिए हमें जीवन की गति को थोड़ा धीमा करना होगा और अपनी वास्तविक जरूरतों को समझना पड़ेगा।<br /><strong>-डॉ. रचना पटेल,आई सर्जन, राजस्थान आई हॉस्पिटल</strong></p>
<p>पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखने के लिए लोगों को अपनी आदतों में परिवर्तन लाना अत्यंत आवश्यक है। आज लोग घरों के सामने, नालियों में कूड़ा डालते हैं और सड़कों पर चारा फेंकते हैं। जंगलों की कटाई लगातार बढ़ रही है और पहाड़ों को बचाना भी जरूरी हो गया है। भावी पीढ़ियों के लिए प्रकृति का संरक्षण करना हम सभी की जिम्मेदारी है। पानी, बिजली और जंगलों का दुरुपयोग हो रहा है, जिससे पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ रहा है। वायु प्रदूषण के कारण बीमारियाँ बढ़ रही हैं और औद्योगिक प्रदूषण गंभीर समस्या बन चुका है। कई उद्योग जहरीली गैसें हवा में छोड़ रहे हैं, जिससे लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। उद्योगों का कचरा नदियों और नालों में मिलाया जा रहा है, जिससे तालाब और नदियाँ गंदी हो रही हैं। औद्योगिक अपशिष्ट जल का रीसायकल होना चाहिए। पौधारोपण केवल नाम के लिए नहीं, बल्कि पौधों को बचाना जरूरी है। प्लास्टिक थैलियों का उपयोग बंद होना चाहिए। इन सभी समस्याओं के समाधान के लिए समाज की मानसिकता में परिवर्तन बेहद आवश्यक है।<br /><strong>- डॉ. सुषमा आहूजा,लायंस इंटरनेशनल, संभागीय अध्यक्ष</strong></p>
<p>संसाधान सीमित है ऐसे में ट्रेड ऑफ करना पड़ेगा। साथ ही बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण भी जरूरी होगा। सरकार को सीमित संसाधनों को बढ़ाने के लिए भी प्रयास करना होगा। संसाधनों का पुनर्चक्रण और संरक्षण करने पर भी जोर देना होगा। बढ़ती जनसंख्या के बावजूद अगर संसाधनों का समझदारी से उपयोग किया जाए तो पर्यावरण पर कम दबाव पड़ेगा।<br /><strong>-सचिन मंगल, सीए</strong></p>
<p>जनसंख्या पर नियंत्रण करना अब अनिवार्य हो गया है। लगातार बढ़ती जनसंख्या के कारण जंगल तेजी से समाप्त हो रहे हैं, इसलिए वनों की कटाई को रोकने पर विशेष ध्यान देना होगा। प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव भविष्य को चुनौतीपूर्ण बना रहा है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्ष और अधिक कठिन होंगे। जनसंख्या नियंत्रण के लिए चीन जैसी सख्त और प्रभावी नीति लाने की आवश्यकता है, जिससे जनता जागरूक हो और इस विषय की गंभीरता को समझ सके। ऐसी नीति बनाई जानी चाहिए जो समाज को जिम्मेदारी का एहसास कराए और संतुलित विकास को बढ़ावा दे। तभी हम पर्यावरण, संसाधनों और भविष्य की पीढ़ियों को सुरक्षित रख पाएंगे।<br /><strong>- लोकेश शर्मा, बिजनैसमैन</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 10 Feb 2026 12:04:52 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>असर खबर का : एनजीटी ने माना, कोटा के लखावा प्लांटेशन में पौधों के नाम पर सरकारी धन का हुआ दुरूपयोग</title>
                                    <description><![CDATA[प्रधान मुख्य वन संरक्षक (हॉफ) को दिए  दोषी  अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई करने के निर्देश , राजस्थान वन विभाग को जारी किए नोटिस।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/impact-of-the-news--ngt-acknowledges-misuse-of-government-funds-in-the-name-of-saplings-at-lakhavva-plantation-in-kota/article-141155"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px)-(1200-x-600-px)-(1)67.png" alt=""></a><br /><p>कोटा । कोटा वन मंडल के लखावा प्लांटेशन में हुए करोड़ों के भ्रष्टाचार को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की भोपाल पीठ ने गंभीर पर्यावरणीय अपराध मानते हुए राजस्थान वन विभाग को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने प्रधान मुख्य वन संरक्षक (हॉफ) को स्वयं जांच कर दोषी वन अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने व 400 हैक्टेयर वन भूमि पर दोबारा प्लांटेशन करवाने के आदेश दिए हैं। यह आदेश पर्यावरणीय अधिवक्ता तपेश्वर सिंह भाटी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति श्यो कुमार सिंह व विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार चतुवेर्दी की बैंच ने दिए। याचिका में सामने आया कि कोटा बाइपास स्थित मेटिगेटिव मेजर्स के लखावा 1 से 8 तक के प्लांटेशन में सरकारी धन का दुरूपयोग किया गया। जिससे 400 हैक्टेयर का प्लांटेशन विफल हो गया। इससे पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचा।</p>
<p><strong>एनजीटी में जांच रिपोर्टों से खुलासा</strong><br />एनजीटी में सुनवाई के दौरान लखावा प्लांटेशन में भ्रष्टाचार का खुलासा अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन सुरक्षा) के सी मीना, मूल्यांकन एवं प्रबोधन कोटा डीएफओ व सीसीएफ उड़नदस्ते की जांच रिपोर्ट से हुआ। अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक ने अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा कि लखावा प्लांटेशन के पूरे इलाके में मुश्किल से 100 पौधे भी जीवित नहीं मिले, जबकि कागजों में यहां 8- 8 हजार पौधे लगना बताया गया है। कई जगह तो एक भी पुराना पौधा नहीं बचा। जहां पौधे दिखे, वे भी हाल ही में दिखावे के लिए लगाए गए थे। वहीं लखावा 8 प्लांटेशन में 21 लाख रुपए के गबन किया जाना बताया गया। रिपोर्ट में बताया गया कि पौधों के रखरखाव के नाम पर 21.42 लाख रुपए खर्च दिखाया गया जबकि, मौके पर कोई संधारण कार्य नहीं हुआ।</p>
<p><strong>25.72 करोड़ जमा, लेकिन जंगल गायब</strong><br />पर्यावरणीय अधिवक्ता तपेश्वर सिंह भाटी ने बताया कि कोटा में एनएच-27 के निर्माण के लिए जब 111.637 हैक्टेयर वन भूमि का उपयोग किया गया था, तब राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने पर्यावरणीय क्षति की भरपाई व हाईवे के दोनों ओर जंगल (प्लांटेशन) विकसित करने के लिए 25.72 करोड़ रुपए जमा कराए थे। इस राशि से प्लांटेशन की सुरक्षा के लिए पत्थर की दीवारें बननी थीं, लखावा 1 से 8 तक के 400 हैक्टेयर प्लांटेशन में पौधे लगाकर बाइपास के दोनों किनारे हरित पट्टी विकसित करनी थी, जो तत्कालीन व वर्तमान कोटा वन मंडल के अधिकारियों के भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए। नतीजन, अधिकारियों ने करोड़ों का बजट उठाया और कागजों में जंगल खड़ा कर दिया। जबकि, धरातल से जंगल गायब है।</p>
<p><strong>नवज्योति ने उजागर किया था भ्रष्टाचार</strong><br />दैनिक नवज्योति ने 23 मार्च 2024 को न पौधे न चौकीदार, किसकी सुरक्षा में खर्च किया लाखों रुपए, शीर्षक से समाचार प्रकाशित कर लखावा प्लांटेशन में भ्रष्टाचार उजागर किया था। इस पर तत्कालीन अतिरिक्त वन सचिव अर्पणा अरोरा के निर्देश पर जयपुर से अतिरिक्त मुख्य प्रधान वन संरक्षक (वन सुरक्षा) के सी मीणा व उप वन संरक्षक पीके पांडे जांच के लिए 26 मई 2024 को कोटा आए थे और 27 मई 2024 को लखावा प्लाटेशन का निरीक्षण किया। मौके के हालात देख जांच टीम भी दंग रह गई। टीम को यहां 100 पौधे भी नहीं मिले थे। जबकि वन अधिकारी 8000 पौधों को पानी पिलाने निराई गुड़ाई करने सुरक्षा मेंटेनेंस के नाम पर लाखों रुपए के फर्जी बिल बनाकर सरकारी धन का गबन करते रहे। मीना ने अपनी रिपोर्ट में नवज्योति को आई ओपनर कहते हुए बताया कि यदि नवज्योति यह खबर प्रकाशित नहीं करता तो इतना बड़ा भ्रष्टाचार कभी उजागर नहीं होता।</p>
<p><strong>एनजीटी का सख्त रुख </strong><br />- एनजीटी ने मामले में पर्यावरण व जंगल को गंभीर नुकसान मानते हुए प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख हॉफ जयपुर को नोटिस जारी कर निर्देश दिए हैं कि वे स्वयं इस मामले की जांच करें।<br />- दोषी वन अधिकारियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई करें।<br />- पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई के लिए<br />- 400 हैक्टेयर क्षेत्र (लखावा 1 से 8 तक) में ही नया वृक्षारोपण यानी प्लांटेशन कराएं।<br />- दोषी अधिकारियोें पर की गई कार्रवाई की रिपोर्ट एवं पुन: करवाए जाने वाले वृक्षारोपण की कार्य योजना अगली सुनवाई 16 मार्च से पहले अधिकरण (एनजीटी) में प्रस्तुत करें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 29 Jan 2026 15:00:23 +0530</pubDate>
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                <title>दिल्ली एनसीआर में कोहरे और प्रदूषण की दोहरी मार, एक्यूआई 'बहुत खराब' श्रेणी में</title>
                                    <description><![CDATA[तेज हवाओं के बावजूद दिल्ली की वायु गुणवत्ता रविवार को 361 तक पहुंच गई। रोहिणी और आनंद विहार सबसे प्रदूषित रहे, जिससे निवासियों को सांस लेने में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ा।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/double-blow-of-fog-and-pollution-in-delhi-ncr-air/article-138318"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/delhi-pollution.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। दिल्ली के कई इलाकों में रविवार सुबह वायु गुणवत्ता बहुत खराब श्रेणी में दर्ज की गई जबकि तेज हवाएं चलती रहीं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीबीसीबी) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, आज सुबह नौ बजे तक कई निगरानी केंद्रों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) का स्तर बहुत खराब बना रहा। रोहिणी में एक्यूआई 361, आनंद विहार में 351, चांदनी चौक में 357, वजीरपुर में 343, पंजाबी बाग में 327, आर के पुरम में 320 और आईटीओ में 309 दर्ज किया गया। 301 से 400 के बीच का एक्यूआई बहुत खराब श्रेणी में आता है और इससे सांस लेने में दिक्कत हो सकती है।</p>
<p>तेज हवाएं चलने के बावजूद राजधानी के कई इलाकों में वायु गुणवत्ता खराब बनी हुई है। सुबह में हवाओं से प्रदूषण में थोड़ी कमी आई लेकिन यह कमी एक्यूआई को मध्यम स्तर तक लाने में मददगार साबित नहीं हुई। मौसम विज्ञान विभाग ने कहा, रविवार सुबह न्यूनतम तापमान 7.4 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया जबकि दिन में अधिकतम तापमान लगभग 17 डिग्री सेल्सियस रहने की उम्मीद है।</p>
<p>सबसे कम दृश्यता सफदरजंग एवं पालम में दर्ज की गई, जहां दृश्यता गिरकर 1,300 मीटर रह गयी। इस बीच, अधिकारियों ने शुक्रवार से प्रदूषण नियंत्रण प्रतिबंधों में ढील दी और वायु गुणवत्ता में अस्थायी सुधार होने के बाद श्रेणीबद्ध प्रतिक्रिया कार्य योजना को बंद कर दिया।</p>
<p>पर्यावरण मंत्रालय ने कहा कि स्थिति में सुधार होने के मद्देनजर जीआरएपी पर सीएक्यूएम उप-समिति ने एनसीआर में तत्काल प्रभाव से सभी कार्रवाइयों को रद्द करने का निर्णय लिया है। हालांकि पहले और दूसरे चरण के उपाय लागू रहेंगे। अधिकारियों ने कहा है कि वे स्थिति पर नजदीकी से निगाह बनाए रखे हुए हैं क्योंकि मौसम की स्थिति एवं प्रदूषण का स्तर लगातार बदल रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 04 Jan 2026 14:18:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>कांग्रेस निकोबार परियोजना: कांग्रेस का गंभीर आरोप, पारिस्थितिकी की अनदेखी कर सरकार चला रही है विकास परियोजना </title>
                                    <description><![CDATA[जयराम रमेश ने अरावली और निकोबार में पर्यावरण अनदेखी का आरोप लगाते हुए कहा कि 72,000 करोड़ की मेगा-प्रोजेक्ट पारिस्थितिकी और आदिवासियों के लिए विनाशकारी है। उन्होंने इसे "विश्वासघात" करार दिया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/congress-nicobar-project-is-a-serious-allegation-of-congress-that/article-138138"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/great-nicobar-project.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। कांग्रेस ने अरावली में सरकारी नीतियों के कारण प्रदूषण संकट पर सवाल उठाने के साथ कहा है कि निकोबार में भी सरकार पारिस्थितिकी की परवाह किये बिना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली परियोजनाएं चला रही है जो विकास के नाम पर पारिस्थितिकी तंत्र को ध्वस्त करने वाली हैं।</p>
<p>कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी ने कुछ माह पहले 'ग्रेट निकोबार मेगा-इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट' को अनावश्यक बताते हुए कहा था कि इस परियोजना पर सरकार 72,000 करोड़ रुपये खर्च कर गलत कर रही है। उनका कहना था कि यह परियोजना द्वीप के मूल आदिवासी समुदायों के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा करती है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे तथा राहुल गांधी ने भी इस परियोजना को पारिस्थितिकी के लिए खतरनाक बताया था। </p>
<p>शुक्रवार को पार्टी के संचार विभाग के प्रभारी जयराम रमेश ने फिर यह मुद्दा उठाया और सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि ग्रेट निकोबार जैसे पारिस्थितिक रूप से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में सरकार ने विकास के नाम पर हजारों करोड़ रुपये की आक्रामक परियोजनाओं को जिस लालच और नासमझी के चलते जल्दबाजी से मंजूरी दी है, वह पूरे इलाके के लिए एक खतरनाक और दीर्घकालिक त्रासदी साबित होने वाली है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि ये परियोजनाएँ न सिर्फ वहां की नाजुक पारिस्थितिकी को अपूरणीय नुकसान पहुँचाएंगी, बल्कि आदिवासी समुदायों के अस्तित्व को भी योजनाबद्ध तरीके से हाशिये पर धकेलेंगी। यह पूरा इलाका पहले से ही जलवायु आपदाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है, जहां प्राकृतिक संतुलन से जरा-सी भी छेड़छाड़ विनाशकारी परिणाम ला सकती है। इसके बावजूद सरकार ने चेतावनियों, वैज्ञानिक आकलनों और स्थानीय वास्तविकताओं को नजरअंदाज करते हुए चंद कॉरपोरेट के मुनाफ़े के लालच में इन परियोजनाओं को आगे बढ़ाया है।</p>
<p>कांग्रेस नेता ने कहा कि पंकज सेखसरिया द्वारा संकलित 'ग्रेट निकोबार: कहानी विश्वासघात की' कई शोधपरक, तथ्यात्मक और प्रासंगिक लेखों के माध्यम से इस पूरे मामले में सरकार की भूमिका, नीतिगत लापरवाहियों और आदिवासी अधिकारों के साथ किए जा रहे समझौतों की समीचीन पड़ताल करती है। यह संकलन इस बात का जीता-जागता दस्तावेजी साक्ष्य है कि कैसे विकास के नाम पर एक पूरे क्षेत्र और उसके लोगों के भविष्य को दांव पर लगा दिया गया है। रमेश ने इसके साथ ही इस पुस्तक का लिंक भी सोशल मीडिया पर साझा किया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 02 Jan 2026 15:49:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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