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                <title>Disqualification Petition TMC - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>Disqualification Petition TMC RSS Feed</description>
                
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                <title>दलबदल कानून के तहत टीएमसी के 20 बागी सांसदों को नोटिस, लोकसभा सचिवालय ने सात दिन में मांगा जवाब</title>
                                    <description><![CDATA[लोकसभा सचिवालय ने अभिषेक बनर्जी की याचिका पर दलबदल विरोधी कानून के तहत तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों को औपचारिक नोटिस जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद, सचिवालय ने इन सांसदों से सात दिनों के भीतर अपनी टिप्पणी और जवाब दाखिल करने को कहा है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/leads/notice-to-20-rebel-tmc-mps-under-anti-defection-law-lok/article-163947"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-08/tmc2.png" alt=""></a><br /><p>नई दिल्ली। लोकसभा सचिवालय ने दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता की याचिकाओं पर तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों को औपचारिक नोटिस जारी किये हैं। सूत्रों के मुताबिक सचिवालय ने सांसदों से सात दिनों के भीतर जवाब मांगा है। गत 25 अगस्त को जारी ये नोटिस तृणमूल कांग्रेस और उसके लोकसभा सांसदों के बागी गुट के बीच जारी राजनीतिक एवं कानूनी विवाद में अहम कदम हैं। बागी सांसद पार्टी से अलग होकर सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) से जुड़ गये हैं।</p>
<p>यह घटनाक्रम तृणमूल कांग्रेस के नेता और पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी की याचिका पर उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के एक दिन बाद सामने आया है। अभिषेक बनर्जी ने बागी सांसदों के खिलाफ 18 जून को दी गयी अयोग्यता याचिकाओं पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की ओर से हो रही देरी और निष्क्रियता को चुनौती दी थी। लोकसभा सचिवालय के नोटिस के अनुसार, सांसदों से 'लोकसभा के सदस्य (दलबदल के आधार पर अयोग्यता) नियम, 1985' के नियम 7(3) के तहत अपनी टिप्पणी देने को कहा गया है। ये नोटिस इसी नियम के नियम छह के तहत शुरू हुई कार्यवाही में जारी किये गये हैं।</p>
<p>नोटिस में कहा गया है, " लोकसभा अध्यक्ष के विचार के लिए, इस पत्र के मिलने के सात दिनों के भीतर संबंधित नियम 7(3) के तहत याचिका पर अपनी टिप्पणी दें।" अभिषेक बनर्जी की याचिकाओं में नामजद सांसदों को ये नोटिस जारी किये गये हैं। इनमें तृणमूल के वरिष्ठ नेता सुदीप बंद्योपाध्याय और काकोली घोष दस्तीदार के साथ-साथ पूर्व क्रिकेटर से राजनेता बने युसूफ पठान और अन्य शामिल हैं। विवाद का मुख्य बिंदु बागी सांसदों का वह दावा है, जिसमें उन्होंने कहा है कि वे त्रिपुरा की नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) से जुड़े एक अलग संसदीय गुट में कानूनी रूप से शामिल हो गये हैं और राजग के साथ आ गये हैं। वहीं, तृणमूल कांग्रेस ने इस दावे को खारिज कर दिया है। उसका कहना है कि सांसदों ने स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है, इसलिए संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत वे अयोग्य ठहरते हैं।</p>
<p>दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) तय परिस्थितियों में विधायकों व सांसदों को अयोग्य ठहराने का प्रावधान करती है। इसमें वह स्थिति भी शामिल है, जब कोई सदस्य उस राजनीतिक दल की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ देता है, जिसके टिकट पर वह चुनाव जीता था। इसमें विलय से जुड़े नियम भी हैं, जिनके तहत संवैधानिक शर्तों को पूरा करने पर विलय को अयोग्यता से संरक्षण मिलता है। इसलिए अध्यक्ष के सामने चल रही इस कार्यवाही में मुख्य सवाल यही रहेगा कि बागी सांसदों का यह नया गठजोड़ कानूनी रूप से सही विलय है या तृणमूल से दलबदल।</p>
<p>सूत्रों का कहना है कि नोटिस जारी करने का मतलब यह नहीं है कि सांसदों को दलबदलू या अयोग्य मान लिया गया है। यह एक प्रक्रियात्मक कदम है, जो याचिकाओं पर निर्णय लेने से पहले सांसदों को अध्यक्ष के सामने अपना पक्ष रखने का मौका देता है। यह नया घटनाक्रम इसलिए बेहद अहम है, क्योंकि दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता के मामलों पर निर्णय लेने की अध्यक्ष की शक्ति अदालती जांच के दायरे में आती रही है, खासकर तब जब याचिकाओं के निपटारे में देरी के आरोप लगते हैं।</p>
<p>अभिषेक बनर्जी ने उच्चतम न्यायालय का रुख करते हुए आरोप लगाया था कि 20 सांसदों के खिलाफ दी गयी अयोग्यता याचिकाओं पर तय समय में कार्रवाई नहीं हुई है। न्यायालय के हस्तक्षेप ने इस मुद्दे और याचिकाओं को निपटाने में अध्यक्ष की संवैधानिक व प्रक्रियात्मक जिम्मेदारी की ओर ध्यान खींचा है। तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने इन नोटिसों के जारी होने का स्वागत किया है। उन्होंने इसे संस्थागत देरी के बाद एक महत्वपूर्ण कदम बताया है।</p>
<p>घोष ने 'एक्स' पर लिखा, "उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद आखिरकार लोकसभा अध्यक्ष ने 20 'गद्दारों' को नोटिस जारी कर दिया। संविधान के खुले उल्लंघन के लिए इन 20 गद्दारों को अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए।" तृणमूल कांग्रेस लगातार यह तर्क दे रही है कि बागी सांसदों का यह कदम उस पार्टी को खुलेआम छोड़ना है, जिसके चुनाव चिह्न पर उन्होंने चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। पार्टी का कहना है कि किसी अन्य राजनीतिक संगठन के साथ जुड़ जाने या विलय का दावा कर देने मात्र से दलबदल विरोधी नियम खत्म नहीं हो जाते। दूसरी तरफ, बागी सांसदों का कहना है कि उनके राजनीतिक बदलाव का कानूनी आधार है और एनसीपीआई एवं राजग के साथ उनके जुड़ाव को दसवीं अनुसूची के विलय प्रावधानों के तहत देखा जाना चाहिए।</p>
<p>इस विवाद का असर लोकसभा के राजनीतिक समीकरणों और संख्या बल पर भी पड़ेगा। अगर ये 20 सांसद अयोग्य घोषित होते हैं तो तृणमूल की सदस्य संख्या और सदन के शक्ति-संतुलन पर प्रभाव पड़ सकता है। वास्तविक परिणाम हालांकि अध्यक्ष के अंतिम फैसले और संभावित अदालती कार्यवाही पर निर्भर करेंगे। फिलहाल, अगला कदम यही है कि 20 बागी सांसद लोकसभा सचिवालय की ओर से दी गयी सात दिनों की समय सीमा के भीतर अपना जवाब दाखिल करें। अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने से पहले अध्यक्ष इन जवाबों का अध्ययन करेंगे। इस पूरी कार्यवाही पर करीब से नजर रखी जा रही है, क्योंकि यह न केवल 20 सांसदों के भविष्य से जुड़ी है, बल्कि दलबदल विरोधी कानून की व्याख्या, विलय के नियमों के दायरे और दलबदल के दावों पर निर्णय लेने में लोकसभा अध्यक्ष की संवैधानिक भूमिका से भी जुड़ी है।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Wed, 26 Aug 2026 19:00:04 +0530</pubDate>
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