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                <title>Manuscripts - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>असर खबर का : डिजिटल अवतार में नजर आएंगे दुर्लभ ग्रंथ</title>
                                    <description><![CDATA[शोधकर्ताओं के लिए विरासत को सुरक्षित रखने की कवायद।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/impact-of-the-report--rare-texts-to-appear-in-digital-format/article-163977"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-08/1200-x-60-px)-(youtube-thumbnail)-(4)5.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। सदियों पुरानी लिखावट, राजवंशों का इतिहास, धर्म-दर्शन से जुड़ा साहित्य, ज्योतिष और आयुर्वेद का ज्ञान... कभी ये सब नाजुक कागजों और पांडुलिपियों के पन्नों में बंद रहा करता था। समय के साथ कागज के खराब होने, स्याही के धुंधली पड़ने और पुराने दस्तावेजों के नष्ट होने का खतरा बढ़ता गया। अब इसी विरासत को डिजिटल रूप देकर लंबे समय तक सुरक्षित रखने की दिशा में काम किया जा रहा है। कोटा में सुरक्षित ऐतिहासिक दस्तावेजों और पांडुलिपियों को डिजिटल माध्यम से संरक्षित करने की प्रक्रिया ने शहर की ऐतिहासिक विरासत को नई पहचान दी है। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के डिजिटलीकरण कार्यक्रम के तहत राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, कोटा में 9,716 पांडुलिपियों के पृष्ठों का डिजिटलीकरण शुरू कर दिया गया है। यह काम राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के तहत चार चरणों में पूरा होगा।</p>
<p><strong>पांडुलिपियों को पढ़ सकेंगे आॅनलाइन</strong><br />राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान की पांडुलिपि संपदा केवल धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं है। संस्थान के संग्रह में संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और राजस्थानी सहित विभिन्न भाषाओं की पांडुलिपियां मौजूद हैं। इनमें वेद-वेदांग, धर्मशास्त्र, दर्शन, इतिहास-पुराण, आयुर्वेद, ज्योतिष, तंत्र-मंत्र और शिल्प जैसे विषयों से संबंधित सामग्री शामिल है। प्रतिष्ठान के उपलब्ध विवरण के अनुसार उसके मुख्यालय और सात शाखा भंडारों में कुल 1,24,126 पांडुलिपियां दर्ज हैं। इनमें कोटा शाखा में 9,966 पांडुलिपियों का संग्रह बताया गया है। इस लिहाज से कोटा की पांडुलिपि शाखा केवल स्थानीय इतिहास ही नहीं, बल्कि राजस्थान की साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। अब कोटा केन्द्र सहित पूरे प्रदेश में इन दुर्लभ ग्रंथों को डिजिटल अवतार में ढालने में काम तेज गति से शुरू कर दिया गया है।</p>
<p><strong>एक-एक पन्ने की बनेगी डिजिटल तस्वीर</strong><br />पुराने दस्तावेजों के लिए डिजिटलीकरण का सबसे बड़ा फायदा यह है कि मूल पांडुलिपि को बार-बार हाथ लगाने की आवश्यकता कम हो जाती है। शोधकर्ता डिजिटल प्रति के माध्यम से सामग्री का अध्ययन कर सकते हैं, जबकि मूल दस्तावेज को सुरक्षित परिस्थितियों में संरक्षित रखा जा सकता है। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के अनुसार देशभर में अब तक लाखों पांडुलिपियों के करोड़ों पृष्ठों का डिजिटलीकरण किया जा चुका है। मिशन का उद्देश्य डिजिटल सामग्री को अधिक खोज योग्य और शोध के लिए उपयोगी बनाना भी है। कोटा की ऐतिहासिक विरासत सिर्फ पांडुलिपियों तक सीमित नहीं है। राजस्थान राज्य अभिलेखागार की कोटा शाखा में 1675 से 1948 तक के अभिलेख सुरक्षित बताए गए हैं। इन रिकॉर्ड में हाड़ौती, अंग्रेजी और उर्दू भाषाओं में लिखी सामग्री शामिल है।</p>
<p><strong>रिक्त पद भरने के लिए भेजा रिमांइडर</strong><br />राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के कोटा केंद्र में वर्तमान में केवल एक लिपिक और एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के भरोसे व्यवस्था चल रही है। कई पद पहले से खाली हैं और कर्मचारियों के सेवानिवृत्त होने के साथ समस्या और गंभीर होती जा रही है। पूर्व में यहां पर एक वरिष्ठ अधिकारी, दो लिपिक, जिल्दसाज, चौकीदारी और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद थे। अब पुरातत्व विभाग कोटा की ओर से रिक्त पदों पर नियुक्ति के लिए जयपुर कार्यालय में रिमांइडर भेजा गया है। आचार संहिता हटने के बाद यहां पर अधिकारियों और कर्र्मचारियों की नियुक्ति होने की उम्मीद जताई जा रही है। इसके अलावा अब दुर्लभ विरासत को आॅनलाइन करने का कार्य भी शुरू कर दिया गया है।</p>
<p><strong>नवज्योति ने प्रमुखता से उठाया था मामला</strong><br />राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के कोटा केंद्र संसाधनों और कर्मचारियों की कमी के सम्बंध में 20 अगस्त को दैनिक नवज्योति में प्रमुखता से समाचार प्रकाशित किया गया था। इसमें बताया था कि नयापुरा क्षेत्र के बृजविलास भवन में संचालित इस प्रतिष्ठान में करीब दस हजार हस्तलिखित एवं दुर्लभ ग्रंथों का अनमोल संग्रह मौजूद है, लेकिन इतनी बड़ी विरासत के संरक्षण, रखरखाव और शोधार्थियों को सुविधा उपलब्ध कराने के लिए पर्याप्त मानव संसाधन नहीं हैं। ऐसे में सदियों पुरानी ज्ञान-संपदा के संरक्षण को लेकर चिंता बढ़ रही है। नियमित निरीक्षण, वैज्ञानिक संरक्षण, सूचीकरण, डिजिटलीकरण और सुरक्षित भंडारण भी जरूरी है। अब इन दुर्लभ ग्रंथों को आॅनलाइन करने का कार्य शुरू कर दिया है।</p>
<p>राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान में मौजूद दुर्लभ ग्रंथों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के तहत डिजिटलाइजेशन कार्य का शुरू कर दिया गया है। वहीं रिक्त पदों के सम्बंध में भी जयपुर कार्यालय को रिमांडर पत्र भेजा है।<br /><strong>-हेमेन्द्र कुमार, अधीक्षक, पुरातत्व एंव संग्रहालय विभाग</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 27 Aug 2026 14:06:45 +0530</pubDate>
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