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                <title>wildlife - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>मौसम का साथ मिला तो बायलॉजिकल पार्क में खिला ट्यूरिज्म, 20 लाख राजस्व</title>
                                    <description><![CDATA[जिन्हें कहानी -  किताबों में देखा उन्हें नजदीक से देख रोमांचित हुए बच्चे।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/favorable-weather-boosts-tourism-at-the-biological-park--%E2%82%B920-lakh-in-revenue-generated/article-162937"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-08/111200-x-600-px)-(3)34.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। काली संग गणेश की उछलकूद, राजा बाबू की लुकाछुपी, कदमों की आहट के बीच सुहासिनी की दहाड़ से भेड़ियों में मची हलचल तो एनक्लोजर में चक्कर लगाती महक की झलक और अठखेलियां करते वन्यजीवों के खूबसूरत लम्हों का साक्षी रहा अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क सुहाने मौसम के बीच पर्यटकों से गुलजार रहा।<br />बच्चों के लिए पार्क में वन्यजीवों का दीदार किसी कहानी की किताब के पन्नों से निकलकर हकीकत में सामने आने जैसा रहा। किड्स प्ले जोन में झूलों पर मस्ती और दूसरी ओर एनक्लोजर में वन्यजीवों की उछल कूद के बीच परिवारों ने बुधवार को पिकनिक और जंगल सफारी जैसा अनुभव लिया। सुबह से शाम तक गो-कार्ट भी दौड़ती रही।</p>
<p><strong>221 दिनों में 50 हजार पर्यटकों ने देखा वन्यजीवों का संसार</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी से 9 अगस्त तक 221 दिनों में करीब 50 हजार पर्यटक पार्क पहुंचे। इनसे सरकार को 20 लाख 68 हजार 700 रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ। पार्क में बढ़ती पर्यटकों की आवाजाही से पार्क शहरवासियों के लिए वन्यजीवों के दीदार के साथ परिवार के साथ समय बिताने का पसंदीदा डेस्टिनेशन बनता जा रहा है।</p>
<p><strong>जनवरी में सर्वाधिक पहुंचे पर्यटक</strong><br />साल की शुरुआत पार्क के लिए सबसे अच्छी रही। जनवरी में करीब 17 हजार पर्यटक अभेड़ा पहुंचे, जो इस अवधि में किसी एक महीने में सबसे अधिक संख्या रही। इन पर्यटकों से सरकार को 6 लाख 85 हजार 500 रुपए का राजस्व मिला।</p>
<p><strong>जुलाई में 3.63 लाख की आय</strong><br />जनवरी के बाद जुलाई में पार्क को सबसे अधिक राजस्व मिला। इस माह में करीब 6200 पर्यटक पार्क पहुंचे और उनसे 3 लाख 63 हजार 450 रुपए की आय हुई। वहीं, फरवरी में 7400 पर्यटक आने के बावजूद राजस्व 2 लाख 56 हजार रुपए रहा। हालांकि, इसका कारण जून से प्रवेश शुल्क में बढ़ोतरी रही।</p>
<p><strong>टाइग्रेस-लॉयनेस को देख रोमांचित हुए बच्चे</strong><br />जिन्हें कहानियों-किताबों में देखा-सुना, उन्हें खुली आंखों से अपने सामने देख बच्चे रोमांच से रोमांचित हो उठे। तार फेंसिंग पर चढ़ते फिर ऊंचाई से छलांग लगाते भालू गणेश के करतब ने पर्यटकों को आनंदित कर दिया। बच्चों को नील गाय व हिरणों का झूंड खूब भा रहाहै। बुधवार को बारिश के बीच बड़ी संख्या में शहरवासी परिवार संग बायोलॉजिकल पार्क पहुंचे और जंगल की खामोशी के बीच चहकता जानवरों के संसार में सुकून महसूस किया।</p>
<p><strong>किड्स प्ले जोन ने बढ़ाई परिवारों की खुशी</strong><br />विज्ञान नगर निवासी अशफाक अहमद और फुरकान अंसारी ने बताया कि वे पहली बार अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क आए हैं। बच्चों के लिए बनाए गए किड्स प्ले जोन में नए झूले आकर्षण का केंद्र हैं। बजरंग नगर से आए मुकेश, कुमकुम, कुलवंती और अभिलाषा तथा संजय नगर निवासी राकेश नामा, प्रियंक और आशा ने बताया कि टाइग्रेस, लॉयनेस, पैंथर, भालू और हिरणों को नजदीक से देखकर बच्चों को काफी रोमांच हुआ।</p>
<p><strong>रविवार को लगा मेला, 1400 से ज्यादा पर्यटक पहुंचे</strong><br />अवकाश के दिन रविवार को भी पार्क पर्यटकों से गुलजार रहा। सुबह से शाम तक शहरवासी परिवारों के साथ बायोलॉजिकल पार्क पहुंचे। एक ही दिन में 1400 से अधिक पर्यटकों ने पार्क का भ्रमण किया, जिससे करीब 75 हजार रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ। बारिश और सुहाने मौसम ने पार्क की रौनक को और बढ़ा दिया।</p>
<p>बायोलॉजिकल पार्क में टाइगर का नया जोड़ा लाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसके लिए जयपुर के नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क प्रशासन को पत्र लिखा है। जल्द ही टाइगर जोड़ा आने की उम्मीद है। बच्चों के मनोरंजन के लिए किड्स प्ले जोन विकसित किया गया है, जिसमें आकर्षक झूले लगाए गए हैं। पर्यटकों को बेहतर सुविधाएं देने पर विशेष ध्यान है। आगामी दिनों में पार्क के विस्तार के साथ पर्यटक सुविधाओं में और भी इजाफा किया जाएगा।<br /><strong>-प्रमोद कुमार धाकड़, डीएफओ, वन्यजीव विभाग, कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 15:10:44 +0530</pubDate>
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                <title> मुकुंदरा के बोराबास में इसी माह शुरू होगी नई जंगल सफारी, पर्यटकों को ऐतिहासिक धरोहरों व वन्यजीवों का मिलेगा रोमांच</title>
                                    <description><![CDATA[एंट्री गेट, साइन बोर्ड और सफारी ट्रैक तैयार, सुरक्षा रेलिंग व वॉच टावर का काम अंतिम चरण में।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/a-new-jungle-safari-will-launch-this-month-at-borabas-in-mukundara--offering-tourists-the-thrill-of-exploring-historical-heritage-sites-and-wildlife/article-161671"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-08/111200-x-600-px)-(1)2.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। शहरवासियों को अब जल्द ही मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में एक ओर जंगल सफारी की सौगात मिलने जा रही है। एमएचटीआर प्रशासन अगस्त माह से बोराबांस रेंज में सफारी शुरू करने की तैयारी में जुटा है। अब पर्यटकों को शहर से 48 किमी दूर दरा सेंचुरी के लिए लंबा चक्कर नहीं काटना पड़ेगा। यहां दौलतगंज स्थित चौकी में पर्यटकों के लिए 10 लाख की लागत से एंट्री गेट व 16 मीटर लंबा सफारी रुट बनकर तैयार कर लिया गया है। हालांकि, कुछेक काम बाकी है, जिसे इसी माह में पूरे करवाकर सफारी शुरू किया जाना है। सफारी शुरू होने पर पर्यटकों को कोटा की ऐतिहासिक विरासत, चंबल घाटियों और वन्यजीवों के अद्भुत नजारों के साथ वाइल्ड लाइफ ट्यूरिज्म को भी नई पहचान मिलेगी।</p>
<p><strong>दौलतगंज से मिलेगी एंट्री और एग्जिट</strong><br />मुकुंदरा प्रशासन से मिली जानकारी के अनुसार, पर्यटकों को दौलतगंज स्थित डायवर्जन चैनल के पास चौकी से ही पर्यटकों को एंट्री मिलेगी। यहां से चंबल नदी के किनारे होते हुए कोटिया भील महल, अकेलगढ़ का पुराना किला, चंबल व्यू प्वाइंट, गरड़िया व्यू प्वाइंट, न्यू गरड़िया प्वाइंट होते हुए वापस दौलतगंज से ही एग्जिट दी जाएगी। यह रुट्स गत वर्ष अक्टूबर माह में ही तय किया गया था।</p>
<p><strong>10 लाख से बनेगा वॉच टावर, दिखेगा विहंग्म नजारा</strong><br />बोराबास के घने जंगलों के बीच सफारी रुट्स पर मुकुंदरा प्रशासन 10 लाख की लागत से तीन वॉच टावर बनाएगा। वन अधिकारियों ने बताया कि सफारी रूट पर कुछ जगहों पर सेल्फी प्वाइंट बनाए जा रहे हैं। जिसका कार्य किया जा रहा है। पर्यटकों की सुरक्षा को देखते हुए चंबल किनारे चट्टानों पर सुरक्षा रेलिंग लगाई जाएगी। यह काम भी अगले सप्ताह तक पूरा हो जाएगा।वहीं, जगह-जगह साइन बोर्ड लगा दिए गए हैं।</p>
<p><strong>सफारी के रूट में यह मिलेंगे व्यू प्वाइंट</strong><br />16 किमी लंबे सफारी रूट में पर्यटकों को कोट्या भील फोर्ट, न्यू चंबल प्वाइंट, न्यू गरड़िया प्वाइंट, भंवरकुंज, अकेलगढ़ फोर्ट, चंबल किनारे दो मंजिला वॉच टावर, सेल्फी प्वाइंट, प्रकृति का विहंग्म नजारा, वन्यजीवों की साइटिंग सहित प्रकृति के अद्भुद नजारें देखने को मिलेंगे।</p>
<p><strong>बोराबास में पैंथर व भालू की संख्या अधिक</strong><br />वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि बोराबांस के जंगल में टाइगर को छोड़कर सभी वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास है। यहां लैपर्ड व भालूओं की बड़ी संख्या में मौजूदगी है। इसके अलावा भेडिए, हायना, लोमड़ी, सियार, हिरण, नीलगाय, जंगली बिल्ली सहित कई एनिमल शामिल हैं।</p>
<p>मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व की बोराबास रेंज में इसी माह पर्यटकों के लिए जंगल सफारी शुरू कर दी जाएगी। अभी तक यहां चौकी, सफारी एंट्री गेट, सफारी रूट्स व साइन बोर्ड सहित कई सौंदर्यीकरण कार्य पूरे हो गए हैं। हालांकि, कुछेक कार्य ही बाकी हैं, जो जल्द ही पूरे हो जाएंगे।<br /><strong>-मूथु एस, उप वन संरक्षक मुकुंदरा टाइगर रिजर्व</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 14:26:18 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>2 साल से फाइलों में अटका अभेड़ा कंजरर्वेशन रिजर्व, जानें पूरा मामला </title>
                                    <description><![CDATA[अभेड़ा स्थित 1100 हैक्टेयर वनभूमि को कोटा वन्यजीव में शामिल करने का मामला।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/abheda-conservation-reserve-project-stalled-in-paperwork-for-two-years/article-159921"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-07/1200-x-600-px)-(1)44.png" alt=""></a><br /><p>कोटा में वाइल्ड लाइफ सफारी शुरू करने के लिए अभेड़ा कंजरर्वेशन रिजर्व बनाने की योजना 2 साल बाद भी कागजों से बाहर नहीं निकल सकी। वन्यजीव विभाग द्वारा भेजे गए प्रस्ताव फाइलों में ही दबकर रह गए। जबकि, इसके लिए उच्चाधिकारियों को प्रस्ताव भेजे जा चुके हैं। इसके बावजूद ट्यूरिज्म बढ़ाने को लेकर उच्चाधिकारियों द्वारा सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया।<br />दरअसल, बायोलॉजिकल पार्क के सामने वन विभाग की जमीन है, जिसकी सीमा अभेड़ा से ग्रीन फिल्ड एयरपोर्ट के सामने हाइवे से पहले तक है, यह 1100 हैक्टयर वनभूमि है, जिसमें से करीब 900 हैक्टयर कोटा वनमंडल की है और लगभग 200 हैक्टयर भूमि बूंदी वनमंडल में आती है। जिसे वन्यजीव विभाग में शामिल करने के लिए वाइल्ड लाइफ डीएफओ ने दोनों डिविजन को प्रस्ताव भेजे थे, जिसमें से कोटा वनमंडल ने सहमति दे दी लेकिन बूंदी से अब तक सहमति नहीं मिली। इस वजह से यह प्रोजेक्ट अटका हुआ है। बता दें, वन्यजीव विभाग ने गत 20 जुलाई 2024 को विधानसभा सत्र-2 में विधायक संदीप शर्मा द्वारा लगाए सवालों के जवाब में इस योजना की जानकारी दी थी।</p>
<p><strong>अभेड़ा से एयरपोर्ट तक सफारी चढ़ी परवान</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क से सटा वनक्षेत्र, प्रस्तावित कोटा ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट शंभुपुरा तक 1100 हैक्टेयर में फैला हुआ है। इसमें बड़ी संख्या में शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीवों की मौजूदगी है। कंजरर्वेशन रिजर्व बनने से यह वनक्षेत्र संरक्षित हो जाएगा और जंगली-जानवरों व जंगल का प्रोटेक्शन भी बढ़ जाएगा। हालांकि, अभेड़ा से ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट तक वाइल्ड लाइफ सफारी शुरू किए जाने की योजना परवान नहीं चढ़ सकी।</p>
<p><strong>जयपुर की तर्ज पर यहां भी शुरू हो लेपर्ड सफारी</strong><br />वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि सकतपुरा वनखंड में भालू और लेपर्ड की संख्या अधिक है। इसके अलावा भेड़िया, चिंकारा, जैकाल, फॉक्स, नीलगाय, जंगली खरगोश, जंगली बिल्ली, जंगली सूअर, सिवेट, मोनिटर लिजार्ड सहित कई वन्यजीवों का बड़ी संख्या में बसेरा है। ऐसे में इस वनक्षेत्र में जयपुर के झलाना की तर्ज पर लेपर्ड सफारी शुरू की जा सकती है। जिससे न केवल सरकार के राजस्व में वृद्धि होगी बल्कि जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा भी मजबूत हो सकेगी। लेकिन, यह अधिकारियों की इच्छा शक्ति से ही संभव हो सकेगा।</p>
<p><strong>अभेड़ा तालाब में 250 प्रजातियों के पक्षियों का बसेरा</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी ने बताया कि अभेड़ा तालाब में 250 से ज्यादा प्रजातियों के पक्षियों का बसेरा है। जिनमें मुख्य रूप से पेन्टेड स्टार्क, बार हैडेगूज, स्टेपी ईगल, हैरीयर सहित कई तरह के पक्षियों का बसेरा है। उपयुक्त वैटलैंड होने से यहां सर्दी-गर्मी में बड़ी संख्या में देसी-विदेशी पक्षियों का कलरव गूंजता है। इधर, वन्यजीव प्रेमियों ने इस क्षेत्र को संरक्षित करने के लिए कन्जरर्वेशन रिजर्व घोषित किए जाने के वन्यजीव विभाग के प्रयास को सराहा है।</p>
<p><strong>अवैध गतिविधियां रुकेगी, वन्यजीवों की सुरक्षा बढ़ेगी</strong><br />बायोलॉजिस्ट रवि नागर का कहना है कि यदि, इस वनक्षेत्र में अभेड़ा कंजरर्वेशन रिवर्ज बन जाता है तो यह संरक्षित हो जाएगा। क्योंकि, चारों ओर सुरक्षा दीवार का निर्माण होगा, जिससे अवैध खनन, संदिग्ध घुसपैठ व अवैध चराई जैसी गतिविधियों पर लगाम लगेगी। जिससे वहां ग्रासलैंड विकसित होगा। जिसका असर वन्यप्राणियों का प्राकृतिक आवास सुरक्षित होगा और शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या में बढ़ोतरी होगी। जिससे फू्रड चैन व पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत होगा।</p>
<p>अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क स्थित कोटा वनमंडल के सकतपुरा वनखंड व बूंदी वनमंडल की 1100 हैक्टेयर वनक्षेत्र को वन्यजीव विभाग में शामिल किए जाने के प्रयास किए। इस क्षेत्र में चिंकारा,इंडियन वुल्फ सहित अन्य शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीवों का मूवमेंट है। यहां वाइल्ड लाइफ सफारी शुरू किए जाने ट्यूरिज्म के साथ रोजगार भी बढ़ेगा। इसको लेकर पूर्व में दोनों फोरेस्ट डिविजन को प्रस्ताव भेजे थे, जिसमें से कोटा वनमंडल द्वारा अपनी जमीन वन्यजीव विभाग में शामिल किए जाने की सहमति दे दी है लेकिन बूंदी से अब तक सहमति नहीं मिली है।<br /><strong>-अनुराग भटनागर, निर्वमान उप वन संरक्षक, वन्यजीव विभाग</strong></p>
<p>ट्यूरिज्म बढ़ाने की दिशा में यह अच्छा प्रयास है। कोटा डीएफओ की ओर से सहमति मिल चुकी है लेकिन बूंदी से आना बाकी है। जैसे ही सहमति मिलती है तो प्रस्ताव बनाकर हैडक्वार्टर भेजा जाएगा।<br /><strong>-सुगनाराम जाट, मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक कोटा मुकुंदरा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 15 Jul 2026 14:48:48 +0530</pubDate>
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                <title>प्रकृति को बचाने के लिए प्रोजेक्ट हरा-भरा 8.0 के अंतर्गत किया बीजारोपण </title>
                                    <description><![CDATA[ईको रेस्क्यूर्स और शरण्या फाउंडेशन ने जयपुर के झालाना लेपर्ड रिजर्व में 'प्रोजेक्ट हरा-भरा 8.0' के तहत धामण घास के बीजों का रोपण किया। सेवानिवृत्त वन अधिकारी महेश विजयवर्गीय के मार्गदर्शन में 65 वॉलिंटियर्स और बच्चों ने भाग लिया। इसका मुख्य उद्देश्य जंगली जानवरों के लिए पर्याप्त चारा उपलब्ध कराना और हरियाली बढ़ाना है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/to-save-nature-seeds-were-planted-under-project-hara-bhara-80/article-158301"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-06/jhalana.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। ईको रेस्क्यूर्स फाउंडेशन एवं शरण्या फाउंडेशन की ओर से झालाना लेपर्ड रिजर्व क्षेत्र, जयपुर में 'प्रोजेक्ट हरा-भरा 8.0' के अंतर्गत धामण घास के बीजों की टिकड़ी का बीजारोपण किया गया। जिससे जंगली जानवरों को पर्याप्त मात्रा में घास उपलब्ध हो सके। संस्था का उद्देश्य जंगलों में खत्म होती हुई हरियाली को वापस लाना है। कार्यक्रम की जानकारी देते हुए संस्था के सचिव डॉ गौरव ने बताया कि बीजारोपण किस तरह किया जाता है, इसकी पूरी जानकारी सेवानिवृत्ति वन अधिकारी महेश विजयवर्गीय ने सभी वॉलिंटियर्स को दी। इस कार्यक्रम में 40 बच्चों सहित लगभग 65 वॉलिंटियर्स ने भाग लिया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 28 Jun 2026 15:33:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तहसील ने भी कर दी नियम विरुद्ध रजिस्ट्री, डीएफओ ने कलक्टर से लगाई कार्रवाई की गुहार</title>
                                    <description><![CDATA[वन्यजीव अधिनियम की धारा-20 लागू होने के बावजूद खाते चढ़ा दी जमीन]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/tehsil-office-executed-registration-in-violation-of-rules/article-158219"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-06/12200-x-600-px)4.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व के संवेदनशील कोर एरिया में 3 हैक्टेयर जमीन की खरीद-फरोख्त और सरकारी रजिस्ट्री का सनसनीखेज मामला सामने आया है। जिस क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत जमीन की खरीद-बिक्री पूरी तरह प्रतिबंधित है, वहीं डाबी उप तहसील ने बाहरी व्यक्ति के नाम न केवल रजिस्ट्री कर दी गई बल्कि राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण (इंतकाल) कर खाते भी चढ़ा दी गई। चौंकाने वाली बात यह है कि यह पूरा मामला करीब दो वर्षों तक वन विभाग की नजरों से ओझल रहा। मामला तब उजागर हुआ, जब खरीदार निर्माण की अनुमति लेने मुकुंदरा कार्यालय पहुंचा। इसके बाद वन विभाग में हड़कंप मच गया और उप वन संरक्षक (डीएफओ) ने बूंदी जिला कलक्टर को पत्र लिखकर रजिस्ट्री निरस्त कर कार्रवाई की मांग की।</p>
<p>वन अधिकारियों का कहना है कि संबंधित भूमि जवाहर सागर अभयारण्य की अधिसूचित सीमा में स्थित है, जहां वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा-20 प्रभावी है। इसके बावजूद डाबी उप तहसील में रजिस्ट्री और बाद में नामांतरण तक कर दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने वन एवं राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि भूमि खातेदारी है, लेकिन वह अभयारण्य की अधिसूचित सीमा में आती है।</p>
<p><strong>जवाहर सागर सेंचुरी की सीमा में है विवादित जमीन</strong><br />मामला, बूंदी जिले के धनेश्वर गांव का है, जो मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व की जवाहर सागर सेंचुरी के अंतर्गत आता है। संबंधित खसरा संख्या 905 वन्यजीव अभयारणय की अधिसूचित सीमा तथा मुकुंदरा के अंबारानी ब्लॉक में स्थित है। वहीं, जवाहर सागर को अभयारण्य घोषित करने का गजट नोटिफिकेशन 9 अक्टूबर 1975 को जारी किया जा चुका है। ऐसे में नियमानुसार सेंचुरी क्षेत्र में जमीन की खरीद-फरोख्त पर पूर्ण प्रतिबंध है।</p>
<p><strong>धारा-20 प्रभावी, बेचना तो दूर खाते भी नहीं चढ़ सकती जमीन</strong><br />वन अधिकारियों के अनुसार, जवाहर सागर अभयारणय की नोटिफाइड सीमा के अंदर आने वाली भूमि पर वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 की धारा-20 लागू है, जिसके तहत किसी क्षेत्र को अभयारण्य घोषित किए जाने के बाद वहां नए भूमि अधिकार नहीं दिए जा सकते। हालांकि, अधिसूचना से पहले यह किसी की निजी जमीन थी तो भी वह केवल उत्तराधिकार (विरासत) के जरिए ही आगे बढ़ सकती है लेकिन किसी तीसरे (बाहरी) व्यक्ति बेचा नहीं जा सकता। इसलिए, यह रजिस्ट्री नियमों के विरूद्ध होने से गैर कानूनी है।</p>
<p><strong>21 में से 17 बीघा 6 बिस्वा बिकी जमीन</strong><br />रेवन्यू विशेषज्ञों के अनुसार, धनेश्वर गांव के खसरा संख्या 905 की जमाबंदी में भूमि मालिक के नाम कुल 21 बीघा 6 बिस्वा खाते की जमीन दर्ज थी। जिसमें से 17 बीघा 6 बिस्वा भूमि झालावाड़ निवासी खातेदार को बेच दी गई। बाद में खातेदार ने 28 अगस्त 2024 को इस जमीन में से 13 बीघा 1 बिस्वा अपने नाम तथा 4 बीघा 5 बिस्वा अपने पुत्र के नाम रजिस्ट्री करवाई। इसके बाद उप तहसील डाबी ने इंतिकाल खोलकर राजस्व अभिलेखों में जमीन उनके नाम दर्ज कर दी गई। रिकॉर्ड के अनुसार, खातेदार पिता के नाम 20 नवंबर 2023 को तथा पुत्र के नाम 18 जून 2024 को जमीन, खाते चढ़ाई गई, यानी नामांतरण की गई।</p>
<p><strong>डीएफओ ने कलक्टर से लगाई कार्रवाई की गुहार</strong><br />मुकुंदरा टाइगर रिर्जव के डीएफओ मूथू एस ने 18 मई 2026 को बूंदी जिला कलक्टर को पत्र भेज रजिस्ट्री रद्द कर कार्रवाई की मांग की। डीएफओ ने पत्र में लिखा कि जवाहर सागर सेंचुरी में स्थित भूमि की खरीद-फरोख्त व रजिस्ट्री नियम विरुद्ध की गई है। यह कृत्य वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 की धारा-20 का उल्लंघन है। इस धारा के अनुसार, नोटिफाइड एरिया में जमीन खरीद-फरोख्त प्रतिबंधित है।</p>
<p>हमारे पास ऐसा कोई गजट नोटिफिकेशन नहीं है कि यह खसरा सेंचूरी में है, वहीं धनेश्वर गांव की भूमि फोरेस्ट में होने की कोई इंफोर्मेशन नहीं है। हमारे यहां जो खातेदारी जमीन जमाबंदी में दर्ज है, उसकी रजिस्ट्री तभी नहीं की जाती जब कोर्ट का स्टे आॅर्डर हो या वन विभाग का गजट नोटिफिकेशन होता है। लेकिन, उक्त खसरा हमारे रिकॉर्ड में राजस्व भूमि है। खाते की जमीन है।<br /><strong>-अनिल धाकड़, नायब तहसीलदार उप तहसील डाबी</strong></p>
<p>ऐसी कई जमीन हैं, जो फोरेस्ट रिकॉर्ड के अनुसार वन विभाग में आती है और रेवन्यू रिकॉर्ड में राजस्व की होती है। इसी कारण रजिस्ट्रियां हो जाती है। मेरे सामने मामला आया तो मैंने बूंदी जिला कलक्टर को लिखा है कि सेंचूरी की सीमा में आने वाली भूमि की रजिस्ट्री नहीं होनी चाहिए। उन्होंने ने भी तालेड़ा एसडीएम व तहसीलदार को जांच कर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।<br /><strong>-मूथू एस, डीएफओ मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व</strong></p>
<p>मामला संज्ञान में आया है। डीसीएफ को विधिक कार्रवाई के लिए निर्देशित किया है। हालांकि, मुकुंदरा डीएफओ ने इस संबंध में बूंदी जिला कलक्टर से पत्राचार भी किया है। सेंचूरी की सीमा में आने वाली जमीन की खरीद-फरोख्त नहीं हो सकती। नियमानुसार रजिस्ट्री गलत है।<br /><strong>-सुगनाराम जाट, संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक मुकुंदरा</strong></p>
<p>वन विभाग अपने डॉक्यूमेंट खसरें वाइज हमें दें, तभी हम यह तय कर पाएंगे कि किस भूमि को रजिस्ट्री से रोकनी है या नहीं। मुंकुदरा प्रशासन ने इस संबंंध में अभी तक न तो कोई डिटेल दस्तावेज और नहीं गजट नोटिफिकेशन उपलब्ध करवाया है, जिससे हमें यह पता लग सके कि पर्टिकूलर यह खसरे हैं, जिसे फोरेस्ट अपना मानकर चल रहा है।<br /><strong>-बनवारी लाल शर्मा, तहसीलदार तालेड़ा</strong></p>
<p>अभयारण की अधिसूचना जारी होने के बाद उसमें आने वाली राजस्व भूमि सिर्फ उत्तराधिकारी वसीयत के आधार पर ही ट्रांसफर हो सकती हैं, बेचान पर इंतकाल खोलना वन्यजीव अधिनियम का खुला उल्लंघन है। जिम्मेदार यह कह कर बच नहीं सकते की उनके पास इंतकाल नहीं खोलने के आदेश या नोटिफिकेशन नहीं थे।<br /><strong>-तपेश्वर सिंह, एडवोकेट एवं पर्यावरणविद्</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/tehsil-office-executed-registration-in-violation-of-rules/article-158219</link>
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                <pubDate>Sat, 27 Jun 2026 15:07:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वन्यजीव संरक्षण को मिलेगा CSR का संबल: सवाई माधोपुर में होगा राज्य स्तरीय कॉन्क्लेव ; वन विभाग और कॉर्पोरेट जगत मिलकर तलाशेंगे संरक्षण, पर्यावरण संवर्धन और समुदाय विकास के नए रास्ते</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान वन विभाग द्वारा 22-23 जून को सवाई माधोपुर में राज्य स्तरीय CSR कॉन्क्लेव का आयोजन किया जाएगा। इसका उद्देश्य रणथम्भौर और सरिस्का जैसे संरक्षित क्षेत्रों में वन्यजीव संरक्षण, पर्यावरण संवर्धन और स्थानीय समुदायों के विकास के लिए कॉर्पोरेट जगत और वन विभाग के बीच सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) को मजबूत करना है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/sawai-madhopur/wildlife-conservation-will-get-the-support-of-csr-state-level/article-157638"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-06/image1.jpg" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राजस्थान वन विभाग की पहल पर सवाई माधोपुर में 22 और 23 जून को राज्य स्तरीय CSR कॉन्क्लेव का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम का उद्देश्य कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के माध्यम से वन एवं वन्यजीव संरक्षण, पर्यावरण संवर्धन और स्थानीय समुदायों के सतत विकास को बढ़ावा देना है। कॉन्क्लेव में विभिन्न कॉर्पोरेट संस्थानों, सार्वजनिक उपक्रमों, उद्योग समूहों, गैर-सरकारी संगठनों, संरक्षण विशेषज्ञों और वन अधिकारियों की भागीदारी रहेगी।</p>
<p>डीसीएफ मानस सिंह ने बताया कि कार्यक्रम में रणथम्भौर, सरिस्का, केवलादेव, मुकुंदरा सहित प्रदेश के प्रमुख संरक्षित क्षेत्रों में CSR के जरिए किए जा सकने वाले कार्यों और नवाचारों पर विस्तृत चर्चा होगी। साथ ही सफल परियोजनाओं के अनुभव साझा किए जाएंगे तथा वन विभाग और कॉर्पोरेट क्षेत्र के बीच सहयोग के नए अवसर तलाशे जाएंगे। यह पहल प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, वन्यजीव सुरक्षा और स्थानीय समुदायों के सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>सवाई माधोपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 21 Jun 2026 12:24:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वन्यजीव संरक्षण: राजस्थान में 51 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ संख्या 721,  8 प्रतिशत की वृद्धि</title>
                                    <description><![CDATA[नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान में तेंदुओं की संख्या 51.5% बढ़कर 721 हो गई है। सरिस्का और रणथंभौर जैसे अभयारण्य इस वृद्धि के प्रमुख केंद्र रहे। देशभर में तेंदुओं की कुल आबादी अब 13,874 तक पहुँच गई है, जो सफल वन्यजीव प्रबंधन और संरक्षण प्रयासों का एक सुखद परिणाम है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/the-number-of-leopards-increased-in-india-with-a-51/article-152522"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-05/समवख्चंतक.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर।  फरवरी 2024 में जारी 'भारत में तेंदुओं की स्थिति, 2022 रिपोर्ट' ने वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में उत्साहजनक तस्वीर पेश की। देशभर में तेंदुओं की संख्या 2018 के 12,852 से बढ़कर 2022 में 13,874 हो गई। जो करीब 8 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है। इस सूची में मध्य प्रदेश 3,907 तेंदुओं के साथ शीर्ष स्थान पर है, जबकि महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु भी प्रमुख राज्यों में शामिल हैं।  राजस्थान की बात करें तो यहां तेंदुओं की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2018 में जहां यह संख्या 476 थी, वहीं 2022 में बढ़कर 721 हो गई। यानी करीब 51.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई।</p>
<p>रिपोर्ट के अनुसार सरिस्का टाइगर रिजर्व में 167, रणथंभौर में 87, मुकुंदरा हिल्स में 49 और रामगढ़ विषधारी में 19 तेंदुए पाए गए हैं। इसके अलावा उदयपुर क्षेत्र में 56 और जयपुर के झालाना व आमागढ़ में 40 तेंदुओं की मौजूदगी दर्ज की गई।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 03 May 2026 13:39:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भीषण गर्मी में वन्यजीवों को राहत: झालाना, आमागढ़ और बीड पापड़ में रोज ट्यूबवेल से भर रहे जलस्रोत; वन्यजीव गणना की तैयारियां भी तेज </title>
                                    <description><![CDATA[जयपुर के झालाना, आमागढ़ और बीड पापड़ लेपर्ड रिजर्व में वन्यजीवों के लिए विशेष जल प्रबंधन किया गया है। भीषण गर्मी के बीच 40 से अधिक वाटर प्वाइंट्स को रोजाना ट्यूबवेल से भरा जा रहा है। वन विभाग ने अगले महीने होने वाली वन्यजीव गणना के लिए भी इन जलस्रोतों पर निगरानी तेज कर दी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/relief-to-wildlife-in-the-scorching-heat-water-sources-are/article-151485"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/jhalana.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। तेज गर्मी के बीच वन विभाग ने जंगलों में रहने वाले वन्यजीवों के लिए विशेष इंतजाम शुरू कर दिए हैं। झालाना लेपर्ड रिजर्व, आमागढ़ लेपर्ड रिजर्व और बीड पापड़ लेपर्ड रिजर्व में लेपर्ड, हायना, नीलगाय सहित कई प्रजातियों के लिए बनाए गए वाटर प्वाइंट्स इन दिनों जीवनरेखा बने हुए हैं। वन विभाग की टीम रोजाना ट्यूबवेल के जरिए इन जलस्रोतों को भर रही है, ताकि भीषण गर्मी में वन्यजीवों को पानी की कमी का सामना न करना पड़े। जानकारी के अनुसार झालाना के तीन जोन में करीब 17, आमागढ़ में 11 और बीड पापड़ लेपर्ड रिजर्व में 7 से 8 वाटर प्वाइंट्स बनाए गए हैं।</p>
<p>अधिकारियों का कहना है कि तापमान बढ़ने के साथ जल स्रोतों की नियमित मॉनिटरिंग की जा रही है। इससे वन्यजीवों की आवाजाही भी इन क्षेत्रों में बनी रहती है और उनका स्वास्थ्य बेहतर रहता है। वहीं, अगले महीने प्रस्तावित वन्यजीव गणना को लेकर भी विभाग ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। वाटर प्वाइंट्स के आसपास गतिविधियों पर नजर रखकर आंकड़े जुटाने की योजना बनाई जा रही है, जिससे वन्यजीवों की सटीक संख्या और स्थिति का आकलन किया जा सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 16:51:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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                <title>वन्यजीवों के अन्तिम संस्कार के लिए बनाया यंत्र, पर्यावरण की दृष्टि से भी सुरक्षित</title>
                                    <description><![CDATA[ प्रदेश के पहले मिनी शवदाह गृह से रुकेगी अंग तस्करी , अवशेषों की खाद से महकेगी विभाग की नर्सरी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/device-developed-for-the-dignified-cremation-of-wildlife%E2%80%94also-environmentally-safe/article-149692"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/1200-x-600-px)-(2)3.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। क्षेत्रीय वन्य जीव मंडल ने वन्यजीवों के सम्मानजनक निस्तारण की दिशा में एक अनूठी पहल की है। जिले में अब घायल वन्यजीवों और पक्षियों की मृत्यु के बाद उनके शवों को जमीन में दफनाने की पारंपरिक मजबूरी खत्म होगी। विभाग ने एक विशेष 'ओवननुमा शवदाह गृह' तैयार किया है, जो न केवल पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित है, बल्कि वन्यजीवों के अंगों की तस्करी को रोकने में भी अभेद्य कवच साबित होगा।</p>
<p><strong>विभाग ने बनाया प्रदेश का पहला मिनी शवदाह गृह</strong><br />प्रदेश में पहली बार अन्तिम संस्कार के लिए बने यंत्र से अंतिम संस्कार होगा। नयापुरा स्थित क्षेत्रीय वन्य जीव कार्यालय कोटा ने इसे बनाकर तैयार कर लिया है। जिसमें जिले भर से लाये गये घायल व इलाज के दौरान दम ताेड़ने वाले जानवराें, पक्षीयों का अंतिम संस्कार किया जा सकेगा। कोटा मेें इस पहल की शुरूआत जल्द ही होने वाली है।</p>
<p><strong>अहमदाबाद से मिली प्रेरणा से बनाया मिनिएचर</strong><br />डीसीएफ (वाइल्डलाइफ) अनुराग भटनागर ने बताया कि गुजरात दौरे के दौरान उन्होंने देखा कि वहां हाथियों जैसे बड़े जानवरों के लिए विशाल शवदाह गृह बने हुए हैं। जिनमें वाहन से लाये गये बड़े से बड़े जानवर को सीधे ही रखा जा सकता है। राजस्थान में फिलहाल इसके लिए अलग से बजट उपलब्ध नहीं था। इसलिए कोटा टीम ने उसी तकनीक का एक मिनिएचर मॉडल स्थानीय स्तर पर तैयार करवाया। नयापुरा स्थित वन्य जीव कार्यालय में जमीन की कमी और बारिश में दुर्गंध की समस्या को देखते हुए यह कदम उठाया गया है।</p>
<p><strong>गैस आधारित कम खर्चीला व सुरक्षित</strong><br />इसे बनाने में विभाग के एडेप्टिव स्कीम से बचे पैसे से कुल 3.25 लाख रूपये की लागत में ही इसे तैयार कर लिया। इस शवदाह यंत्र की बनावट बेहद मजबूत है। जिसे आधुनिक और वैज्ञानिक मापदंडों पर तैयार किया गया है। इसमें अन्य छोटे जीवो के अलावा भेड़िया ,लोमड़ी ,बन्दर , व्यस्क चिंकारा , हिरण जैसे जानवरों का निस्तारण किया जा सकेगा। गैस आधारित संचालन प्रक्रिया को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए इसमें तीन गैस कनेक्शन का आवेदन किया गया है, ताकि शव को पूरी तरह भस्म किया जा सके।</p>
<p><strong>6 एमएम की लोहे की चादर से निर्मित</strong><br />विशाल आकार यह ओवननुमा यंत्र करीब 9 फीट लंबा, पौने चार फीट चौड़ा और साढ़े चार फीट ऊंचा है। इसका ढ़ांचा मोटी चद्दर की दोहरी परत से बनी हैं, जिससे इसकी कुल मोटाई 4 इंच हो जाती है। जिसमे एक साथ 6 बर्नर से ऐ साथ गैस ड़ाली जाती है यह संरचना उच्च तापमान को बर्दाश्त करने में सक्षम है।</p>
<p><strong>पर्यावरण संरक्षण तस्करी पर रोक</strong><br />परंपरागत रूप से जानवरों को जमीन में दफन करने पर हड्डीयों व अंगों की चोरी या दुरुपयोग का जोखिम बना रहता है। इस मशीन में शव पूरी तरह राख में तब्दील हो जाएगा, जिससे तस्करी की संभावनाएं शून्य हो जाएंगी। साथ ही, बारिश के मौसम में जमीन से आने वाली दुर्गंध और संक्रमण का खतरा भी टल जाएगा।</p>
<p><strong>वेस्ट टू वेल्थ हड्डियों के पाउडर से बढ़ेगी वन भूमि की उर्वरता</strong><br />चिड़ियाघर और बायोलॉजिकल पार्क में मांसाहारी वन्यजीवों के भोजन के बाद रोजाना करीब 80 से 85 किलो हड्डियां बचती हैं। पर्यावरण नियमों के तहत इन्हें बाहर नहीं फेंका जा सकता। अब इन हड्डियों को इस भट्टी में जलाने के बाद क्रशर मशीन से पीसा जाएगा। इस पाउडर का उपयोग विभाग की नर्सरी और वन भूमि में खाद के तौर पर होगा, जिससे पौधों को प्राकृतिक पोषण मिलेगा और जानवरों के अवशेषों का कोई दुरुपयोग नहीं हो सकेगा।</p>
<p>बजट की कमी के बावजूद हमने वन्यजीवों के वैज्ञानिक निस्तारण के लिए यह यंत्र तैयार करवाया है। इससे न केवल स्वच्छता रहेगी, बल्कि बहुमूल्य वन्यजीव अंगों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।<br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीसीएफ वाइल्डलाइफ, कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 15:16:39 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>सावधान: मधुमक्खियों का छत्ता तोड़ा तो 3 साल की जेल</title>
                                    <description><![CDATA[शेरगढ़ सेंचुरी सहित जंगलों में मधुमक्खियों को नुकसान पहुंचाने पर होगी कार्रवाई।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/caution--breaking-a-beehive-could-lead-to-3-years-in-jail/article-149402"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/122200-x-60-px)-(1)14.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। जंगल में मधुमक्खियों का छत्ता तोड़ना अब महंगा पड़ सकता है। ऐसा करने वालों को सीधे जेल की हवा खानी पड़ सकती है, क्योंकि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत मधुमक्खियां भी संरक्षित वन्यजीवों में शामिल हैं। वन विभाग ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि मधुमक्खियों के छत्ते को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी, जिसमें 3 साल तक की सजा का प्रावधान है। दरअसल, वन्यजीव विभाग ने शेरगढ़ सेंचुरी में तेजी से घट रही मधुमक्खियों की संख्या को बढ़ाने के लिए निगरानी तंत्र मजबूत किए हैं। सेंचुरी व जंगलों में मधुमक्खियों के छत्ते को तोड़ने व नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने की वनकर्मियों को निर्देश जारी किए हैं।</p>
<p><strong>सेंचुरी व जंगल में मधुमक्खियों का छत्ता तोड़ना अपराध</strong><br />डीएफओ अनुराग भटनागर ने बताया कि जंगल, केवल शेर, बाघ, पैंथर, भालू या हिरण का ही घर नहीं है, बल्कि चींटी से लेकर मधुमक्खी तक हर जीव का प्राकृतिक आवास है और सभी को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम में संरक्षण प्राप्त है। इसके बावजूद कई लोग चोरी-छिपे जंगलों में जाकर मधुमक्खियों के छत्ते तोड़ देते हैं, जो कि गंभीर वन अपराध की श्रेणी में आता है। हालांकि, यह एक्ट केवल सेंचूरी व जंगलों में ही प्रभावी होगा।</p>
<p><strong>3 से 7 साल तक की सजा का प्रावधान</strong><br />उन्होंने बताया कि शेरगढ़ सेंचुरी सहित अन्य वन क्षेत्रों में यदि कोई व्यक्ति मधुमक्खियों का छत्ता तोड़ता है तो यह वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 का उल्लंघन की श्रेणी में आता है। इस पर वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 29 के तहत 3 साल तक की सजा का प्रावधान है। वहीं, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को नुकसान पहुंचाने, वन्यजीवों को परेशान करने और छेड़छाड़ करने जैसी धाराओं में मामला दर्ज कर न्यायालय में चालान पेश किया जाएगा। उन्होंने कहा कि कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि जंगल में रहने वाले किसी भी छोटे या बड़े जीव को नुकसान पहुंचाना वन्यजीव संरक्षण कानून का गंभीर उल्लंघन है।</p>
<p><strong>पर्यावरण व खाद्य श्रृंखला की महत्वपूर्ण कड़ी मधुमक्खी</strong><br />वैज्ञानिकों का मानना है कि मधुमक्खियां पर्यावरण और खाद्य श्रृंखला की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। यदि मधुमक्खियां नहीं रहेंगी तो परागण नहीं होगा, फसलें नहीं उगेंगी और धीरे-धीरे जीवन संकट में पड़ जाएगा। यदि मधुमक्खियां नहीं रहेंगी तो फसलों का उत्पादन प्रभावित होगा और पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ जाएगा। इसलिए मधुमक्खियों की रक्षा करना केवल कानून का पालन नहीं, बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा भी है।</p>
<p><strong>एक छत्ते में 50 हजार मधुमक्खियां व उनके अंडे होते हैं</strong><br />उन्होंने बताया कि पहले के लोग मधुमक्खी का छत्ता टेक्निक से तोड़ते थे। वो केवल ऊपर ऊपर से शहद निकालते थे और रानी मक्खी को नहीं मारते थे। आजकल शहद निकालने के लिए लोग पूरे छत्ते को तोड़ देते है। एक छत्ते में 50 हजार मधुमक्खियां व उनके अंडे होते हैं। छत्ता तोड़ने से सभी मर जाते हैं। हम शेरगढ़ अभ्यारण के अलावा भैंसरोडगढ़ सेंचुरी, अभेडा बायोलॉजिकल पार्क व कोटा जू में भी मधुमक्खियों के बॉक्स लगाने के प्रयास कर रहे हैं।</p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />सेंचुरी के अंदर कोई भी मधुमक्खियों के छत्ते को तोड़ता है या उनके प्राकृतिक आवास को नुकसान पहुंचाता है तो उसके खिलाफ वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 की धारा-29 के तहत कार्रवाई की जाएगी जिसमें तीन साल तक की सजा का प्रावधान है।<br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 14:46:19 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>कागजों में दफन 80 लाख की सोलर फैंसिंग और 50 लाख का इलैक्ट्रिक शवदाह गृह</title>
                                    <description><![CDATA[अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में शाकाहारी वन्यजीवों व वन कर्मियों पर मंडराया मांसाहारी जानवरों के हमले का खतरा।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/solar-fencing-worth-80-lakh-and-an-electric-crematorium-worth-50-lakh-remain-buried-in-paperwork/article-143055"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/(12200-x-600-px)-(4)11.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क को मांसाहारी जानवरों के हमले से सुरक्षित बनाने के लिए 80 लाख की लागत से सौलर फेंसिंग का सुरक्षा कवच बनाया जाना था, जो एक साल बाद भी नहीं बन सका। जबकि, पार्क के चारों ओर घना जंगल है, जहां लेपर्ड, हाइना व भालुओं की मौजूदगी से शाकाहारी वन्यजीवों व रात्रि गश्त पर तैनात वन कर्मियों की जान पर संकट बना रहता है।वहीं, मृत जानवरों के खुले में अंतिम संस्कार से इंफेक्शन, बैक्टीरिया व संक्रमण का खतरा टालने को 50 लाख का इलेक्ट्रिक शवदाह गृह का निर्माण भी कागजों में दफन होकर रह गया।</p>
<p>दरअसल, मुख्यमंत्री बजट घोषणा 2025-26 के तहत अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में सेकंड फेस के विकास कार्यों के लिए 40 करोड़ के बजट की घोषणा की गई थी। जिसमें 80 लाख से पार्क की सम्पूर्ण दीवार पर सौलर फेंसिंग करवाने व 50 लाख से इलेक्ट्रिक शवदाह गृह के निर्माण के लिए वन्यजीव विभाग ने कुल 1.30 करोड़ का प्रस्ताव बनाकर उच्चाधिकारियों को भेजे थे, जो बजट के अभाव में स्वीकृत नहीं हुए।</p>
<p><strong>5 हजार मीटर सुरक्षा दीवार पर लगनी थी फेंसिंग</strong><br />वन्यजीव विभाग के उप वन संरक्षक अनुराग भटनागर ने बताया कि अभेड़ा बायोलॉजिकल की सुरक्षा दीवार 5 हजार रनिंग मीटर लंबी है। वर्तमान में यह दीवार 10 फीट ऊंची है, जिस पर करीब 4 फीट ऊंची सीलर फेंसिंग लगाई जाएगी, जो सौलर से कनेक्ट रहेगी और चार्ज होने के साथ उसमें निर्धारित मात्रा में विद्युत करंट प्रवाहित होता रहेगा। इससे बाहर का कोई भी वाइल्ड एनिमल खास तौर पर लेपर्ड दीवार फांद पार्क के अंदर नहीं आ सकेगा। जिससे शाकाहारी वन्यजीव व गश्त करते वनकर्मियों पर मांसाहारी जानवरों के हमले का खतरा टल सकेगा। इस सौलर फेंसिंग से पूरा बायोलॉजिकल पार्क कवर्ड रहेगा। इसमें करीब 80 लाख रुपए का खर्चा आएगा। इसके प्रस्ताव बनाकर उच्चाधिकारियों को भेज दिए हैं।</p>
<p><strong>पिंजरे में घुसकर लेपर्ड कर चुका ब्लैकबक का शिकार</strong><br />बायोलॉजिकल पार्क में वर्ष 2023 में 29 अप्रैल की रात लेपर्ड ने बाहर से बायोलॉजिकल पार्क की 10 फीट ऊंची दीवार फांद परिसर में कूद गया था और ब्लैक बक के एनक्लोजर में घुसकर हमला कर दिया। जिसमें ब्लैक बक के शावक की मौत हो गई। घटना के बाद से वनकर्मी रात्रि गश्त के दौरान खुद की सुरक्षा को लेकर चिंतित हो गए।</p>
<p><strong>इलैक्ट्रिक शवदाह गृह बने तो टले बैक्टीरिया व संक्रमण का खतरा</strong><br />बायोलॉजिकल पार्क में 50 लाख की लागत से इलेक्ट्रिक शवदाह गृह बनवाया जाना है। इससे मृत जानवरों के शव का सुगमता से डिस्पोजल हो सकेगा। अब तक शव का अंतिम संस्कार करने के लिए जलाया जाता है, जिससे लकड़ियों की खपत बढ़ती है और धुएं से हवा में प्रदूषण भी बढ़ता है। ऐसे में इलेक्ट्रिक शवदाह गृह बनने से लकड़ियों की खपत रुकेगी और वायुमंडल में प्रदूषण भी नहीं फैलेगा। इसके अलावा इंफेक्शन, बैक्टीरिया व संक्रमण का खतरा भी टलेगा। लेकिन विभाग की अनदेखी के कारण प्रस्ताव कागजों से बाहर नहीं निकल सके।</p>
<p>बायोलॉजिकल पार्क में 40 करोड़ की लागत से द्वितीय चरण के विकास कार्य करवाए जाने हैं। जिसमें 80 लाख की लागत से सोलर फेंसिंग और 50 लाख से इलेक्ट्रिक शवदाह गृह बनाना है। जिसके प्रस्ताव बनाकर उच्चाधिकारियों को भेजे गए हैं, जैसे ही बजट प्राप्त होगा वैसे ही कार्य शुरू करवा दिया जाएगा।<br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Feb 2026 16:30:03 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>कॉर्बेट नेशनल पार्क में दिखा दुर्लभ और खूबसूरत पक्षी''लॉन्ग टेल मिनिवेट'',पक्षी प्रेमियों में उत्साह</title>
                                    <description><![CDATA[रामनगर के कॉर्बेट नेशनल पार्क में दुर्लभ लॉन्ग टेल मिनिवेट पक्षी देखा गया। इसकी मौजूदगी क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता और सुरक्षित वन्य आवास का संकेत मानी जा रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/rare-and-beautiful-bird-long-tail-minivet-seen-in-corbett/article-141099"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px)-(10)3.png" alt=""></a><br /><p>रामनगर। उत्तराखंड के रामनगर में कॉर्बेट नेशनल पार्क में एक बेहद आकर्षक और  दुर्लभ पक्षी ''लॉन्ग टेल मिनिवेट' देखा गया है, जिसने पक्षी प्रेमियों और पर्यटकों का ध्यान खींचा है। वन्य जीव प्रेमी संजय छिम्वाल बताते हैं कि कॉर्बेट और इसके आसपास के जंगलों में अब तक करीब 600 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ दर्ज की जा चुकी हैं। यह क्षेत्र पक्षी अवलोकन के लिए बेहद खास माना जाता है। उन्होंने बताया कि हाल ही में जो पक्षी देखा गया है, वह लॉन्ग टेल मिनिवेट है, जो अपनी खूबसूरती और रंगों के कारण अलग पहचान रखता है।</p>
<p>संजय के अनुसार लॉन्ग टेल मिनिवेट आमतौर पर पेड़ों की ऊँची चोटियों पर रहना पसंद करता है और जमीन पर बहुत कम उतरता है। इसका मुख्य भोजन कीड़े-मकोड़े होते हैं, जिससे यह जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने बताया कि इस पक्षी में सेक्सुअल डाइमॉफरजिम स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है, यानी नर और मादा के रंग-रूप में फर्क होता है। नर लॉन्ग टेल मिनिवेट चटक लाल रंग का होता है, जबकि मादा हल्के पीले-हरे रंग की दिखाई देती है। आमतौर पर पक्षियों में नर का रंग ज्यादा चमकीला होता है, ताकि वह मादा को आकर्षित कर सके, और यही विशेषता इस पक्षी में भी देखने को मिलती है।</p>
<p>संजय ने आगे बताया कि कॉर्बेट क्षेत्र में कई पक्षी दुर्लभ श्रेणी में आते हैं, जिनकी विशेष सूची (वॉचर लिस्ट) तैयार की जाती है। इस सूची में हॉर्नबिल, बार्बेट और वुडपेकर जैसे पक्षियों के साथ-साथ मिनिवेट भी शामिल है। उन्होंने कहा कि ऐसे पक्षियों का दिखना इस बात का संकेत है कि कॉर्बेट का जंगल आज भी जैव विविधता के लिए सुरक्षित और समृद्ध है। कॉर्बेट में लॉन्ग टेल मिनिवेट का दिखना न केवल पक्षी प्रेमियों के लिए बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से भी एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 28 Jan 2026 17:55:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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