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                <title>wildlife - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <description>wildlife RSS Feed</description>
                
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                <title>भीषण गर्मी में वन्यजीवों को राहत: झालाना, आमागढ़ और बीड पापड़ में रोज ट्यूबवेल से भर रहे जलस्रोत; वन्यजीव गणना की तैयारियां भी तेज </title>
                                    <description><![CDATA[जयपुर के झालाना, आमागढ़ और बीड पापड़ लेपर्ड रिजर्व में वन्यजीवों के लिए विशेष जल प्रबंधन किया गया है। भीषण गर्मी के बीच 40 से अधिक वाटर प्वाइंट्स को रोजाना ट्यूबवेल से भरा जा रहा है। वन विभाग ने अगले महीने होने वाली वन्यजीव गणना के लिए भी इन जलस्रोतों पर निगरानी तेज कर दी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/relief-to-wildlife-in-the-scorching-heat-water-sources-are/article-151485"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/jhalana.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। तेज गर्मी के बीच वन विभाग ने जंगलों में रहने वाले वन्यजीवों के लिए विशेष इंतजाम शुरू कर दिए हैं। झालाना लेपर्ड रिजर्व, आमागढ़ लेपर्ड रिजर्व और बीड पापड़ लेपर्ड रिजर्व में लेपर्ड, हायना, नीलगाय सहित कई प्रजातियों के लिए बनाए गए वाटर प्वाइंट्स इन दिनों जीवनरेखा बने हुए हैं। वन विभाग की टीम रोजाना ट्यूबवेल के जरिए इन जलस्रोतों को भर रही है, ताकि भीषण गर्मी में वन्यजीवों को पानी की कमी का सामना न करना पड़े। जानकारी के अनुसार झालाना के तीन जोन में करीब 17, आमागढ़ में 11 और बीड पापड़ लेपर्ड रिजर्व में 7 से 8 वाटर प्वाइंट्स बनाए गए हैं।</p>
<p>अधिकारियों का कहना है कि तापमान बढ़ने के साथ जल स्रोतों की नियमित मॉनिटरिंग की जा रही है। इससे वन्यजीवों की आवाजाही भी इन क्षेत्रों में बनी रहती है और उनका स्वास्थ्य बेहतर रहता है। वहीं, अगले महीने प्रस्तावित वन्यजीव गणना को लेकर भी विभाग ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। वाटर प्वाइंट्स के आसपास गतिविधियों पर नजर रखकर आंकड़े जुटाने की योजना बनाई जा रही है, जिससे वन्यजीवों की सटीक संख्या और स्थिति का आकलन किया जा सके।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 16:51:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>वन्यजीवों के अन्तिम संस्कार के लिए बनाया यंत्र, पर्यावरण की दृष्टि से भी सुरक्षित</title>
                                    <description><![CDATA[ प्रदेश के पहले मिनी शवदाह गृह से रुकेगी अंग तस्करी , अवशेषों की खाद से महकेगी विभाग की नर्सरी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/device-developed-for-the-dignified-cremation-of-wildlife%E2%80%94also-environmentally-safe/article-149692"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/1200-x-600-px)-(2)3.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। क्षेत्रीय वन्य जीव मंडल ने वन्यजीवों के सम्मानजनक निस्तारण की दिशा में एक अनूठी पहल की है। जिले में अब घायल वन्यजीवों और पक्षियों की मृत्यु के बाद उनके शवों को जमीन में दफनाने की पारंपरिक मजबूरी खत्म होगी। विभाग ने एक विशेष 'ओवननुमा शवदाह गृह' तैयार किया है, जो न केवल पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित है, बल्कि वन्यजीवों के अंगों की तस्करी को रोकने में भी अभेद्य कवच साबित होगा।</p>
<p><strong>विभाग ने बनाया प्रदेश का पहला मिनी शवदाह गृह</strong><br />प्रदेश में पहली बार अन्तिम संस्कार के लिए बने यंत्र से अंतिम संस्कार होगा। नयापुरा स्थित क्षेत्रीय वन्य जीव कार्यालय कोटा ने इसे बनाकर तैयार कर लिया है। जिसमें जिले भर से लाये गये घायल व इलाज के दौरान दम ताेड़ने वाले जानवराें, पक्षीयों का अंतिम संस्कार किया जा सकेगा। कोटा मेें इस पहल की शुरूआत जल्द ही होने वाली है।</p>
<p><strong>अहमदाबाद से मिली प्रेरणा से बनाया मिनिएचर</strong><br />डीसीएफ (वाइल्डलाइफ) अनुराग भटनागर ने बताया कि गुजरात दौरे के दौरान उन्होंने देखा कि वहां हाथियों जैसे बड़े जानवरों के लिए विशाल शवदाह गृह बने हुए हैं। जिनमें वाहन से लाये गये बड़े से बड़े जानवर को सीधे ही रखा जा सकता है। राजस्थान में फिलहाल इसके लिए अलग से बजट उपलब्ध नहीं था। इसलिए कोटा टीम ने उसी तकनीक का एक मिनिएचर मॉडल स्थानीय स्तर पर तैयार करवाया। नयापुरा स्थित वन्य जीव कार्यालय में जमीन की कमी और बारिश में दुर्गंध की समस्या को देखते हुए यह कदम उठाया गया है।</p>
<p><strong>गैस आधारित कम खर्चीला व सुरक्षित</strong><br />इसे बनाने में विभाग के एडेप्टिव स्कीम से बचे पैसे से कुल 3.25 लाख रूपये की लागत में ही इसे तैयार कर लिया। इस शवदाह यंत्र की बनावट बेहद मजबूत है। जिसे आधुनिक और वैज्ञानिक मापदंडों पर तैयार किया गया है। इसमें अन्य छोटे जीवो के अलावा भेड़िया ,लोमड़ी ,बन्दर , व्यस्क चिंकारा , हिरण जैसे जानवरों का निस्तारण किया जा सकेगा। गैस आधारित संचालन प्रक्रिया को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए इसमें तीन गैस कनेक्शन का आवेदन किया गया है, ताकि शव को पूरी तरह भस्म किया जा सके।</p>
<p><strong>6 एमएम की लोहे की चादर से निर्मित</strong><br />विशाल आकार यह ओवननुमा यंत्र करीब 9 फीट लंबा, पौने चार फीट चौड़ा और साढ़े चार फीट ऊंचा है। इसका ढ़ांचा मोटी चद्दर की दोहरी परत से बनी हैं, जिससे इसकी कुल मोटाई 4 इंच हो जाती है। जिसमे एक साथ 6 बर्नर से ऐ साथ गैस ड़ाली जाती है यह संरचना उच्च तापमान को बर्दाश्त करने में सक्षम है।</p>
<p><strong>पर्यावरण संरक्षण तस्करी पर रोक</strong><br />परंपरागत रूप से जानवरों को जमीन में दफन करने पर हड्डीयों व अंगों की चोरी या दुरुपयोग का जोखिम बना रहता है। इस मशीन में शव पूरी तरह राख में तब्दील हो जाएगा, जिससे तस्करी की संभावनाएं शून्य हो जाएंगी। साथ ही, बारिश के मौसम में जमीन से आने वाली दुर्गंध और संक्रमण का खतरा भी टल जाएगा।</p>
<p><strong>वेस्ट टू वेल्थ हड्डियों के पाउडर से बढ़ेगी वन भूमि की उर्वरता</strong><br />चिड़ियाघर और बायोलॉजिकल पार्क में मांसाहारी वन्यजीवों के भोजन के बाद रोजाना करीब 80 से 85 किलो हड्डियां बचती हैं। पर्यावरण नियमों के तहत इन्हें बाहर नहीं फेंका जा सकता। अब इन हड्डियों को इस भट्टी में जलाने के बाद क्रशर मशीन से पीसा जाएगा। इस पाउडर का उपयोग विभाग की नर्सरी और वन भूमि में खाद के तौर पर होगा, जिससे पौधों को प्राकृतिक पोषण मिलेगा और जानवरों के अवशेषों का कोई दुरुपयोग नहीं हो सकेगा।</p>
<p>बजट की कमी के बावजूद हमने वन्यजीवों के वैज्ञानिक निस्तारण के लिए यह यंत्र तैयार करवाया है। इससे न केवल स्वच्छता रहेगी, बल्कि बहुमूल्य वन्यजीव अंगों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।<br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीसीएफ वाइल्डलाइफ, कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 15:16:39 +0530</pubDate>
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                <title>सावधान: मधुमक्खियों का छत्ता तोड़ा तो 3 साल की जेल</title>
                                    <description><![CDATA[शेरगढ़ सेंचुरी सहित जंगलों में मधुमक्खियों को नुकसान पहुंचाने पर होगी कार्रवाई।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/caution--breaking-a-beehive-could-lead-to-3-years-in-jail/article-149402"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-04/122200-x-60-px)-(1)14.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। जंगल में मधुमक्खियों का छत्ता तोड़ना अब महंगा पड़ सकता है। ऐसा करने वालों को सीधे जेल की हवा खानी पड़ सकती है, क्योंकि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत मधुमक्खियां भी संरक्षित वन्यजीवों में शामिल हैं। वन विभाग ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि मधुमक्खियों के छत्ते को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी, जिसमें 3 साल तक की सजा का प्रावधान है। दरअसल, वन्यजीव विभाग ने शेरगढ़ सेंचुरी में तेजी से घट रही मधुमक्खियों की संख्या को बढ़ाने के लिए निगरानी तंत्र मजबूत किए हैं। सेंचुरी व जंगलों में मधुमक्खियों के छत्ते को तोड़ने व नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने की वनकर्मियों को निर्देश जारी किए हैं।</p>
<p><strong>सेंचुरी व जंगल में मधुमक्खियों का छत्ता तोड़ना अपराध</strong><br />डीएफओ अनुराग भटनागर ने बताया कि जंगल, केवल शेर, बाघ, पैंथर, भालू या हिरण का ही घर नहीं है, बल्कि चींटी से लेकर मधुमक्खी तक हर जीव का प्राकृतिक आवास है और सभी को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम में संरक्षण प्राप्त है। इसके बावजूद कई लोग चोरी-छिपे जंगलों में जाकर मधुमक्खियों के छत्ते तोड़ देते हैं, जो कि गंभीर वन अपराध की श्रेणी में आता है। हालांकि, यह एक्ट केवल सेंचूरी व जंगलों में ही प्रभावी होगा।</p>
<p><strong>3 से 7 साल तक की सजा का प्रावधान</strong><br />उन्होंने बताया कि शेरगढ़ सेंचुरी सहित अन्य वन क्षेत्रों में यदि कोई व्यक्ति मधुमक्खियों का छत्ता तोड़ता है तो यह वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 का उल्लंघन की श्रेणी में आता है। इस पर वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 29 के तहत 3 साल तक की सजा का प्रावधान है। वहीं, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को नुकसान पहुंचाने, वन्यजीवों को परेशान करने और छेड़छाड़ करने जैसी धाराओं में मामला दर्ज कर न्यायालय में चालान पेश किया जाएगा। उन्होंने कहा कि कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि जंगल में रहने वाले किसी भी छोटे या बड़े जीव को नुकसान पहुंचाना वन्यजीव संरक्षण कानून का गंभीर उल्लंघन है।</p>
<p><strong>पर्यावरण व खाद्य श्रृंखला की महत्वपूर्ण कड़ी मधुमक्खी</strong><br />वैज्ञानिकों का मानना है कि मधुमक्खियां पर्यावरण और खाद्य श्रृंखला की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। यदि मधुमक्खियां नहीं रहेंगी तो परागण नहीं होगा, फसलें नहीं उगेंगी और धीरे-धीरे जीवन संकट में पड़ जाएगा। यदि मधुमक्खियां नहीं रहेंगी तो फसलों का उत्पादन प्रभावित होगा और पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ जाएगा। इसलिए मधुमक्खियों की रक्षा करना केवल कानून का पालन नहीं, बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा भी है।</p>
<p><strong>एक छत्ते में 50 हजार मधुमक्खियां व उनके अंडे होते हैं</strong><br />उन्होंने बताया कि पहले के लोग मधुमक्खी का छत्ता टेक्निक से तोड़ते थे। वो केवल ऊपर ऊपर से शहद निकालते थे और रानी मक्खी को नहीं मारते थे। आजकल शहद निकालने के लिए लोग पूरे छत्ते को तोड़ देते है। एक छत्ते में 50 हजार मधुमक्खियां व उनके अंडे होते हैं। छत्ता तोड़ने से सभी मर जाते हैं। हम शेरगढ़ अभ्यारण के अलावा भैंसरोडगढ़ सेंचुरी, अभेडा बायोलॉजिकल पार्क व कोटा जू में भी मधुमक्खियों के बॉक्स लगाने के प्रयास कर रहे हैं।</p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />सेंचुरी के अंदर कोई भी मधुमक्खियों के छत्ते को तोड़ता है या उनके प्राकृतिक आवास को नुकसान पहुंचाता है तो उसके खिलाफ वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 की धारा-29 के तहत कार्रवाई की जाएगी जिसमें तीन साल तक की सजा का प्रावधान है।<br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 14:46:19 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>कागजों में दफन 80 लाख की सोलर फैंसिंग और 50 लाख का इलैक्ट्रिक शवदाह गृह</title>
                                    <description><![CDATA[अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में शाकाहारी वन्यजीवों व वन कर्मियों पर मंडराया मांसाहारी जानवरों के हमले का खतरा।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/solar-fencing-worth-80-lakh-and-an-electric-crematorium-worth-50-lakh-remain-buried-in-paperwork/article-143055"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-02/(12200-x-600-px)-(4)11.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क को मांसाहारी जानवरों के हमले से सुरक्षित बनाने के लिए 80 लाख की लागत से सौलर फेंसिंग का सुरक्षा कवच बनाया जाना था, जो एक साल बाद भी नहीं बन सका। जबकि, पार्क के चारों ओर घना जंगल है, जहां लेपर्ड, हाइना व भालुओं की मौजूदगी से शाकाहारी वन्यजीवों व रात्रि गश्त पर तैनात वन कर्मियों की जान पर संकट बना रहता है।वहीं, मृत जानवरों के खुले में अंतिम संस्कार से इंफेक्शन, बैक्टीरिया व संक्रमण का खतरा टालने को 50 लाख का इलेक्ट्रिक शवदाह गृह का निर्माण भी कागजों में दफन होकर रह गया।</p>
<p>दरअसल, मुख्यमंत्री बजट घोषणा 2025-26 के तहत अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में सेकंड फेस के विकास कार्यों के लिए 40 करोड़ के बजट की घोषणा की गई थी। जिसमें 80 लाख से पार्क की सम्पूर्ण दीवार पर सौलर फेंसिंग करवाने व 50 लाख से इलेक्ट्रिक शवदाह गृह के निर्माण के लिए वन्यजीव विभाग ने कुल 1.30 करोड़ का प्रस्ताव बनाकर उच्चाधिकारियों को भेजे थे, जो बजट के अभाव में स्वीकृत नहीं हुए।</p>
<p><strong>5 हजार मीटर सुरक्षा दीवार पर लगनी थी फेंसिंग</strong><br />वन्यजीव विभाग के उप वन संरक्षक अनुराग भटनागर ने बताया कि अभेड़ा बायोलॉजिकल की सुरक्षा दीवार 5 हजार रनिंग मीटर लंबी है। वर्तमान में यह दीवार 10 फीट ऊंची है, जिस पर करीब 4 फीट ऊंची सीलर फेंसिंग लगाई जाएगी, जो सौलर से कनेक्ट रहेगी और चार्ज होने के साथ उसमें निर्धारित मात्रा में विद्युत करंट प्रवाहित होता रहेगा। इससे बाहर का कोई भी वाइल्ड एनिमल खास तौर पर लेपर्ड दीवार फांद पार्क के अंदर नहीं आ सकेगा। जिससे शाकाहारी वन्यजीव व गश्त करते वनकर्मियों पर मांसाहारी जानवरों के हमले का खतरा टल सकेगा। इस सौलर फेंसिंग से पूरा बायोलॉजिकल पार्क कवर्ड रहेगा। इसमें करीब 80 लाख रुपए का खर्चा आएगा। इसके प्रस्ताव बनाकर उच्चाधिकारियों को भेज दिए हैं।</p>
<p><strong>पिंजरे में घुसकर लेपर्ड कर चुका ब्लैकबक का शिकार</strong><br />बायोलॉजिकल पार्क में वर्ष 2023 में 29 अप्रैल की रात लेपर्ड ने बाहर से बायोलॉजिकल पार्क की 10 फीट ऊंची दीवार फांद परिसर में कूद गया था और ब्लैक बक के एनक्लोजर में घुसकर हमला कर दिया। जिसमें ब्लैक बक के शावक की मौत हो गई। घटना के बाद से वनकर्मी रात्रि गश्त के दौरान खुद की सुरक्षा को लेकर चिंतित हो गए।</p>
<p><strong>इलैक्ट्रिक शवदाह गृह बने तो टले बैक्टीरिया व संक्रमण का खतरा</strong><br />बायोलॉजिकल पार्क में 50 लाख की लागत से इलेक्ट्रिक शवदाह गृह बनवाया जाना है। इससे मृत जानवरों के शव का सुगमता से डिस्पोजल हो सकेगा। अब तक शव का अंतिम संस्कार करने के लिए जलाया जाता है, जिससे लकड़ियों की खपत बढ़ती है और धुएं से हवा में प्रदूषण भी बढ़ता है। ऐसे में इलेक्ट्रिक शवदाह गृह बनने से लकड़ियों की खपत रुकेगी और वायुमंडल में प्रदूषण भी नहीं फैलेगा। इसके अलावा इंफेक्शन, बैक्टीरिया व संक्रमण का खतरा भी टलेगा। लेकिन विभाग की अनदेखी के कारण प्रस्ताव कागजों से बाहर नहीं निकल सके।</p>
<p>बायोलॉजिकल पार्क में 40 करोड़ की लागत से द्वितीय चरण के विकास कार्य करवाए जाने हैं। जिसमें 80 लाख की लागत से सोलर फेंसिंग और 50 लाख से इलेक्ट्रिक शवदाह गृह बनाना है। जिसके प्रस्ताव बनाकर उच्चाधिकारियों को भेजे गए हैं, जैसे ही बजट प्राप्त होगा वैसे ही कार्य शुरू करवा दिया जाएगा।<br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 13 Feb 2026 16:30:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कॉर्बेट नेशनल पार्क में दिखा दुर्लभ और खूबसूरत पक्षी''लॉन्ग टेल मिनिवेट'',पक्षी प्रेमियों में उत्साह</title>
                                    <description><![CDATA[रामनगर के कॉर्बेट नेशनल पार्क में दुर्लभ लॉन्ग टेल मिनिवेट पक्षी देखा गया। इसकी मौजूदगी क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता और सुरक्षित वन्य आवास का संकेत मानी जा रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/bharat/rare-and-beautiful-bird-long-tail-minivet-seen-in-corbett/article-141099"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/1200-x-600-px)-(10)3.png" alt=""></a><br /><p>रामनगर। उत्तराखंड के रामनगर में कॉर्बेट नेशनल पार्क में एक बेहद आकर्षक और  दुर्लभ पक्षी ''लॉन्ग टेल मिनिवेट' देखा गया है, जिसने पक्षी प्रेमियों और पर्यटकों का ध्यान खींचा है। वन्य जीव प्रेमी संजय छिम्वाल बताते हैं कि कॉर्बेट और इसके आसपास के जंगलों में अब तक करीब 600 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ दर्ज की जा चुकी हैं। यह क्षेत्र पक्षी अवलोकन के लिए बेहद खास माना जाता है। उन्होंने बताया कि हाल ही में जो पक्षी देखा गया है, वह लॉन्ग टेल मिनिवेट है, जो अपनी खूबसूरती और रंगों के कारण अलग पहचान रखता है।</p>
<p>संजय के अनुसार लॉन्ग टेल मिनिवेट आमतौर पर पेड़ों की ऊँची चोटियों पर रहना पसंद करता है और जमीन पर बहुत कम उतरता है। इसका मुख्य भोजन कीड़े-मकोड़े होते हैं, जिससे यह जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने बताया कि इस पक्षी में सेक्सुअल डाइमॉफरजिम स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है, यानी नर और मादा के रंग-रूप में फर्क होता है। नर लॉन्ग टेल मिनिवेट चटक लाल रंग का होता है, जबकि मादा हल्के पीले-हरे रंग की दिखाई देती है। आमतौर पर पक्षियों में नर का रंग ज्यादा चमकीला होता है, ताकि वह मादा को आकर्षित कर सके, और यही विशेषता इस पक्षी में भी देखने को मिलती है।</p>
<p>संजय ने आगे बताया कि कॉर्बेट क्षेत्र में कई पक्षी दुर्लभ श्रेणी में आते हैं, जिनकी विशेष सूची (वॉचर लिस्ट) तैयार की जाती है। इस सूची में हॉर्नबिल, बार्बेट और वुडपेकर जैसे पक्षियों के साथ-साथ मिनिवेट भी शामिल है। उन्होंने कहा कि ऐसे पक्षियों का दिखना इस बात का संकेत है कि कॉर्बेट का जंगल आज भी जैव विविधता के लिए सुरक्षित और समृद्ध है। कॉर्बेट में लॉन्ग टेल मिनिवेट का दिखना न केवल पक्षी प्रेमियों के लिए बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से भी एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 28 Jan 2026 17:55:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पाकिस्तान के रास्ते होते हुए हजारों किलोमीटर का सफर तय कर बीकानेर पहुंचे कई देशों से 10,000 गिद्ध</title>
                                    <description><![CDATA[बीकानेर के जोहड़बीड़ में रूस, मंगोलिया और कजाकिस्तान से करीब 10,000 प्रवासी गिद्ध पहुंचे हैं। पिछले पांच वर्षों में इन पक्षियों की संख्या दोगुनी हो गई है, जिससे यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय आकर्षण बन गया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/bikaner/10000-vultures-from-many-countries-reached-bikaner-after-traveling-thousands/article-138488"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/bikaner.png" alt=""></a><br /><p>बीकानेर। राजस्थान में इस समय कुछ ऐसे मेहमानों ने डेरा डाला हुआ है, जो कि 10-20 किलोमीटर का सफर तय करके नहीं आएं बल्कि 10,000 किलोमीटर का सफर तय करके आए हैं। हम बात कर रहे हैं दुनिया के अलग अलग देशों से आए हुए गिद्धों के बारे में, जिन्होंने आजकल राजस्थान के बीकानेर को अपना डेरा बनाया हुआ है। बता दें कि ये पक्षी रूस, आर्मेनिया, पाकिस्तान, मंगोलिया और कजाकिस्तान के रास्ते होते हुए यहां पहुंचे हैं।</p>
<p>एक्सपर्ट की मानें तो पिछले पांच सालों में राजस्थान में आने वाले विदेशी पक्षियों की संख्या में इजाफा हुआ है। साल 2020 में राजस्थान में करीब 4-5 हजार गिद्ध आए थे, लेकिन इस बार ये संख्या सीधे 10,000 पर पहुंच गई।</p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बीकानेर</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 05 Jan 2026 18:40:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>टाइगर-लॉयन को मल्टी विटामिन तो भालू खा रहा अंडे-पिंड खजूर, सर्दियां आते ही अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में वन्यजीवों का बदला डाइट प्लान</title>
                                    <description><![CDATA[शाकाहारी वन्यजीवों की मौज, ताजी हरी सब्जियों के साथ मौसमी फलों का उठा रहे लुत्फ।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/tigers-and-lions-are-getting-multivitamins--while-bears-are-eating-eggs-and-dates--the-diet-plan-for-wildlife-at-abheda-biological-park-changes-with-the-arrival-of-winter/article-138237"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/tiger-or-lion-multivitamins-to-bhalu-kha-raha-ande-pind-khajoor,-sardiyan-ate-he-abheda-biological-park-mein-vanyajeevon-ka-badala-diet-plan...kota-news-03.01.2026.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। सर्दी के तेवर तीखे होने के साथ ही अभेड़ा बायॉलोजिकल पार्क में वन्यजीवों के रहन-सहन व डाइट प्लान भी बदल गया है। सुबह-शाम हो रही गलन व सर्द हवाओं के झौंके से बचाव के लिए वन्यजीव विभाग ने विशेष इंतजाम किए हैं। एनक्लोजर व पिंजरों में वन्यजीवों को गमार्हाट देने के लिए जहां एक ओर हीटर लगाए हैं वहीं, चावल की पराल बिछाई गई है। साथ ही इंफेक्शन से बचाव के लिए हल्दी का छिड़काव भी किया जा रहा है। खुराक भी बढ़ा दी गई है। दरअसल, सर्दियों की दस्तक के साथ ही प्रदेशभर के चिड़ियाघर और बायोलॉजिकल पार्क में वन्यजीवों के डाइट प्लान में बदलाव किया जाता है। जिसके तहत ही सर्दियों का शेड्यूल लागू किया जाता है, जो फरवरी तक जारी रहता है।</p>
<p><strong>शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीवों की हो रही मौज</strong><br />सर्दियों का शेडयूल लागू होते ही अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीवों की मौज हो गई। उन्हें वीआईपी ट्रीटमेंट दिया जा रहा है। मांसाहारियों को मांस के साथ अंडे, मल्टीविटामिन, मल्टी मिनरल्स, कैल्शियम परोसा जा रहा है। जबकि, शाकाहारी ताजी सब्जियों के साथ पशुआहार, मौसमी फल, गुड़ व अजवाइन का लुफ्त उठा रहे हैं। वहीं, भालू दूध, दलिया, फल, शहद और पिंडखजूर की दावत उड़ा रहे हैं ।</p>
<p><strong>बायोलॉजिकल पार्क में हैं 86 वन्यजीव</strong><br />बायलॉजिकल पार्क में मांसाहारी व शाकाहारी मिलाकर कुल 86 वन्यजीव हैं। मांसाहारी में लॉयनेस- 1, बाघिन- 1, भेड़िया-2, सियार-4, भालू-2, लेपर्ड-4, जरख-4 हैं। इसी तरह शाकाहारी में नीलगाय-16, चिंकारा-2, चितल 39, ब्लैक बक 27 है।</p>
<p><strong>मांसाहारियों के नाइट शेल्टर में लगाए हीटर</strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के वनकर्मियों ने बताया कि सर्दियों की शुरूआत के साथ ही शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीवों के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं। सभी वन्यजीवों के नाइट शेल्टरों में पर्दें लगवा दिए गए हैं। लॉयनेस, टाइग्रेस, जरख, सियार, भेडिया व भालू के नाइट शेल्टर से 10 फीट की दूरी पर हीटर लगाए गए हैं। साथ ही खिड़कियों पर पर्दे लगाए गए हैं ताकि, सर्द हवाओं से बचाव हो सके।</p>
<p><strong>मांसाहारी वन्यजीवों का डाइट प्लान- </strong>लॉयनेस व टाइगे्रस को 10 किलो मांस के साथ मल्टी विटामिन<br />लॉयनेस व बाघ-बाघिन को 8 किलो पाड़ा मांस और 1 मुर्गा (प्रति एनिमल) दिया जा रहा है। इसके अलावा मल्टी विटामिन, मल्टी मिनरल्स व लीवर टॉनिक व कैल्शियम अलग से दिए जा रहे हैं। यह सप्लीमेंट्स 10 एमएल परडे मांस के टुकड़ों पर मिलाकर दिया जा रहा है। इससे शरीर में ऊर्जा का संचार बेहतर होने के साथ पाचन तंत्र भी मजबूत रहता है।<br /><strong>भेडिया :</strong> 2 किलो प्रति पाड़ा मांस, 1 अंडा सहित मल्टी विटामिन व मिनरल्स दिए जा रहे हैं।<br /><strong>सियार :</strong> 1.25 किलो मांस प्रति सियार, 1 अंडा व सप्लीमेंट्स<br /><strong>जरख :</strong> 3 किलो प्रति एनिमल्स, 1 अंडा व सप्लीमेंट्स</p>
<p><strong>3.5 किलो मांस के साथ कैल्शियम खा रहा पैंथर</strong><br />बायोलॉजिकल पार्क में मांसाहारी वन्यजीवों की डाइट में हैल्दी पोषक तत्व शामिल किए हैं। यहां 4 लेपर्ड हैं। मेल लेपर्ड को 3.5 किलो व फिमेल लेपर्ड को 2.5 किलो मांस प्रतिदिन दिया जा रहा है। इसके अलावा 1-1 अंडा व मल्टी विटामिन व कैल्शियम दिया जा रहा है। इसी तरह सभी 4 सियार को 1.25 किलो के हिसाब से प्रतिदिन 5 किलो मांस परोसा जा रहा है। वहीं, प्रत्येक भेड़िए को 2 किलो के हिसाब से 4 किलो तथा चारों हायना को 3 किलो के हिसाब से 12 किलो मीट प्रतिदिन खिलाया जा रहा है।</p>
<p><strong>ढाई लीटर दूध के साथ अंडे और खजूर खा रहा भालू</strong><br />सर्दियों में सबसे ज्यादा मजे भालू के हैं। यहां 2 भालू हैं, जिसे डाइट में प्रतिदिन 2.5 लीटर दूध के साथ 1 किलो चावल, 1.75 किलो दलिया, 2 अंडे, 200 ग्राम गुड़, 200 ग्राम शहद, 200 ग्राम शहद प्रतिदिन डाइट में दिए जा रहे हैं। साथ ही मल्टीविटामिन, कैल्शियम व मिनरल्स भी दिए जाते हैं।</p>
<p><strong>इंफेक्शन से बचाव के भी किए उपाए</strong><br />बायॉलोजिकल पार्क में तैनात कर्मचारियों ने बताया कि शाकाहारी व मांसाहारी वन्यजीवों के एनक्लोजर और नाइट शेल्टरों में हल्दी का छिड़काव किए गए हैं। हल्दी की तासीर गर्म होने के साथ एंटी बायटिक भी रहती है। यदि, उनके शरीर पर कोई चोट लग जाए तो हल्दी लगने से इंफेक्शन नहीं होगा। सर्दियों में वन्यजीवों की साइटिंग होने से पर्यटक रोमांचित हो रहे हैं।</p>
<p><strong>एनक्लोजर में बिछाई पराल</strong><br />शाकाहारियों के नाइट शेल्टर में पराल बिछाई गई है। ताकि, एनिमल के चलने फिरने व बैठने पर फर्श ठंडा न लगे। पराल से शेल्टर में गमार्हाट बनी रहती है। इसके अलावा एनक्लोजर की जालियों व पिंजरों को ग्रीन नेट से कवर किया गया है। ताकि, सर्द हवाओं के झौंकों से बच सके।</p>
<p><strong>हरी सब्जियों के साथ नमक का भी चख रहे स्वाद</strong><br />मांसाहारी वन्यजीवों के मुकाबले शाकाहारियों का डाइट प्लान बड़ा है। उन्हें गाजर, मूली, खीरा, टमाटर, ककड़ी, गोभी, लौकी, पालक, पत्ता गोभी सहित मौसमी सब्जियां, हरा चारा, पशु आहार, फल-फू्रट, गुड़, आजवाइन के साथ मल्टीविटामिन व न्यूट्रिशियन दिए जा रहे हैं। शाकाहारी वन्यजीवों का डाइट चार्ट एक ही है लेकिन डाइट की मात्रा अलग-अलग है। हैल्दी डाइट से सभी वन्यजीव सर्दियों में तंदरुस्त रहेंगे।</p>
<p>सर्दी की शुरूआत होने के साथ ही बायोलॉजिकल पार्क में मौजूद सभी वन्यजीवों की डाइट में परिवर्तन कर दिया है। इन दिनों वन्यजीवों की खुराक बढ़ जाती है। डाइट में जरूरी पोषक तत्वों को शामिल कर जरूरत के मुताबिक उनकी मात्रा में बढ़ोतरी की गई है। वहीं, सर्द हवाओं से बचाव के लिए मांसाहारी वन्यजीवों के नाइट शेल्टर के पास हीटर व शाकाहारियों के शेल्टरों में पराल बिछाई गई है और खिड़कियों पर पर्दे लगाए गए हैं। वैसे तो वन्यजीवों को इस तरह की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि जंगल में तो वह अपने हिसाब से अपना हैबीटाट जैसे-गुफाएं, पेड़ों के नीचे, धूप में बैठकर सर्दी से खुद का बचाव करते हैं। वहीं, अलग-अलग तरह के जानवरों का शिकार करते हैं, जिससे वैराइटिज आॅफ फूड मिल जाता है लेकिन चिड़ियाघरों में इनका एरिया सीमित होता है। इसलिए यह सुविधाएं उपलब्ध करवानी पड़ती है।<br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 03 Jan 2026 16:31:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बहराइच में जंगली हाथियों का आतंक, नेपाली महिला हुई शिकार</title>
                                    <description><![CDATA[कतर्नियाघाट जंगल में हाथियों के झुंड ने एक नेपाली महिला को कुचलकर मार डाला। सीमावर्ती इलाकों में हाथियों के बढ़ते आतंक से ग्रामीणों में दहशत है और फसलें भी तबाह हो रही हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/nepali-woman-becomes-victim-of-wild-elephant-terror-in-bahraich/article-138143"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2026-01/elephant.png" alt=""></a><br /><p>बहराइच। उत्तर प्रदेश के बहराइच में नेपाल सीमा पर कतर्नियाघाट जंगल क्षेत्र में हाथियों के आतंक के बीच एक नेपाली महिला की मौत का मामला सामने आया है। नेपाल के 10 नंबर करमोहनी राजापुर गांव निवासी 47 वर्षीय बालिका सेन बुधवार को खेतों में काम करने गई थीं, जहां लौटते समय हाथियों के झुंड के हमले में उनकी जान चली गई।</p>
<p>प्रत्यक्षदर्शी महिलाओं के अनुसार, बालिका सेन अन्य महिलाओं के साथ खेतों में काम कर रही थीं। शाम के समय लौटते वक्त अचानक हाथियों का एक झुंड जंगल की ओर से निकल आया। झाड़यिों को पार कर जैसे ही महिलाएं आगे बढ़ीं, बालिका सेन हाथियों के बीच घिर गईं। हाथियों ने उन्हें सूंड में फंसाकर कई बार जमीन पर पटका। जान बचाने के लिए अन्य महिलाएं मौके से भाग निकलीं।   </p>
<p>महिला को मारने के बाद हाथियों का झुंड वहां से आगे बढ़ गया। रात के अंधेरे में किसी जंगली जानवर द्वारा महिला के शव को उठा ले जाने की आशंका जताई जा रही है। साथ काम कर रही महिलाओं की सूचना पर ग्रामीणों ने रात में काफी तलाश की, लेकिन कोई सुराग नहीं मिल सका। वन विभाग और पुलिस को भी मामले की जानकारी दी गई।</p>
<p>अगले दिन सुबह नेपाल क्षेत्र के कतर्निया जंगल में महिला का शव बरामद हुआ। शव की हालत बेहद क्षत-विक्षत थी। महिला का चेहरा गायब था, एक हाथ नहीं था और शरीर पर कपड़े भी नहीं थे। शव की स्थिति देखकर ग्रामीणों में दहशत फैल गई और बाघ के हमले की आशंका जताई गई, हालांकि वन विभाग ने इससे इनकार किया है। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, घटनास्थल पर बाघ के पगचिह्न नहीं मिले हैं। आशंका है कि हाथियों के हमले के बाद किसी अन्य जंगली जानवर ने शव को नोचा होगा।</p>
<p>उल्लेखनीय है कि, हाल के दिनों में कतर्नियाघाट क्षेत्र में हाथियों के हमले लगातार सामने आ रहे हैं। बीते दिनों अंबेडकर नगर गांव निवासी शंभू कुमार को हाथी ने पटक दिया था, जो वर्तमान में जिला अस्पताल में भर्ती हैं। इससे पहले चौखड़ा गांव निवासी राम बहादुर की हाथी द्वारा कुचलकर मौत हो चुकी है।</p>
<p>कतर्नियाघाट के प्रभागीय वनाधिकारी सूरज कुमार ने बताया कि कतर्निया जंगल में वन्यजीवों की आवाजाही लगातार बनी रहती है। हाथियों के मूवमेंट पर विशेष नजर रखी जा रही है और ग्रामीणों को जंगल की ओर न जाने की सलाह दी गई है। सुजौली थाना प्रभारी प्रकाश चंद्र शर्मा ने बताया कि घटनास्थल नेपाल क्षेत्र में होने के कारण शव को नेपाल पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया है।</p>
<p>वन विभाग के अनुसार, बफर जोन की मझगईं और पलिया रेंज हाथियों के झुंड से सबसे अधिक प्रभावित हैं। हाथियों ने अब तक करीब 40 एकड़ से अधिक गन्ने की फसल को नुकसान पहुंचाया है। 45 से अधिक किसान प्रभावित हुए हैं, लेकिन अब तक उन्हें मुआवजा नहीं मिल सका है। पिछले दो सप्ताह से बहराइच और लखीमपुर खीरी से सटे सीमावर्ती इलाकों में नेपाली हाथियों का आतंक बना हुआ है, जिससे ग्रामीणों में भय का माहौल है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                            <category>भारत</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/world/nepali-woman-becomes-victim-of-wild-elephant-terror-in-bahraich/article-138143</link>
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                <pubDate>Fri, 02 Jan 2026 16:01:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>सरिस्का में चारागाह विकास की बड़ी पहल, वन्यजीव संरक्षण को नया आधार देने वाली कार्यशाला आयोजित</title>
                                    <description><![CDATA[सरिस्का बाघ परियोजना की उमरी चौकी पर चारागाह विकास और बीज संग्रहण पर कार्यशाला आयोजित हुई। 500 हैक्टेयर क्षेत्र में स्वदेशी घास रोपण और खरपतवार उन्मूलन कार्य जारी है। यह पहल चीतल, सांभर और अन्य वन्यजीवों के लिए बेहतर चारा उपलब्ध कराकर सरिस्का की पारिस्थितिकी को मजबूत करेगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/alwar/major-initiative-of-pasture-development-in-sariska-workshop-organized-to/article-134761"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-12/alwar-sariska.png" alt=""></a><br /><p>अलवर। सरिस्का बाघ परियोजना के उमरी चौकी पर 4 दिसंबर को पूर्व सहायक वन संरक्षक सतीश शर्मा द्वारा चारागाह विकास और बीज संग्रहण पर विशेष कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें सरिस्का के सभी रेंज स्टाफ ने भाग लेकर बीजों के प्रकार, संग्रहण, घास प्रजातियों की पहचान और बीजारोपण तकनीकों पर गहन चर्चा की।</p>
<p><strong>500 हैक्टेयर में चारागाह विस्तार और खरपतवार उन्मूलन जारी</strong></p>
<p>परियोजना क्षेत्र में 500 हैक्टेयर में चारागाह विकास, स्वदेशी घास—धामण, दूब, करड़, फूलेरा—का रोपण तथा जल-संरक्षण एवं मृदा स्थिरीकरण के कार्य प्रगति पर हैं। वहीं लेन्टाना, पार्थेनियम और जुलीफ्लोरा जैसी हानिकारक प्रजातियों को वैज्ञानिक विधियों से हटाया जा रहा है।</p>
<p><strong>वन्यजीवों के लिए समृद्ध चारा और मजबूत पारिस्थितिकी</strong></p>
<p>यह पहल चीतल, सांभर, नीलगाय तथा अन्य वन्यजीवों के लिए बेहतर चारा उपलब्ध कराएगी और सरिस्का की जैव विविधता व आहार श्रृंखला को दीर्घकालिक मजबूती प्रदान करेगी।</p>
<p><br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>अलवर</category>
                                    

                <link>https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/alwar/major-initiative-of-pasture-development-in-sariska-workshop-organized-to/article-134761</link>
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                <pubDate>Thu, 04 Dec 2025 19:26:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur NM]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पर्यटकों का बायोलॉजिकल पार्क के प्रति घटता रुझान : बड़े वन्यजीवों की कमी और टूटते झूलों से मोह हुआ भंग, न टाइगर न लॉयन, पर्यटक और राजस्व में भारी गिरावट </title>
                                    <description><![CDATA[वर्ष 2024 से 31 अक्टूबर 2025 तक के आंकड़ों से हुआ खुलासा।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/tourists--interest-in-the-biological-park-is-declining--the-lack-of-large-wildlife-and-broken-swings-have-dissipated-their-attraction--neither-tigers-nor-lions-have-been-seen--resulting-in-a-sharp-decline-in-tourist-arrivals-and-revenue/article-132707"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-11/111-(1)25.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। देश-विदेश के पयर्टकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क अपनी चमक खोता जा रहा है। पर्यटकों से गुलजार रहने वाला राजस्थान का सबसे बड़ा पार्क अब वीरान सा नजर आने लगा है। जहां कद्रदानों की महफिलें सजा करती थी वहां आज पर्यटकों की बेरुखी देखने को मिल रही है। जिसका असर, राजस्व में भारी गिरावट के रूप देखने को मिला। गत वर्ष की तुलना में इस वर्ष 31 अक्टूबर तक करीब तीन हजार से ज्यादा पर्यटकों की संख्या घटी है। वहीं, एक लाख रुपए राजस्व का घाटा हुआ है। यह खुलासा वर्ष 2024 व 2025 के 10 माह के आंकड़ों से हुआ है। </p>
<p><strong>3 हजार पर्यटक व 1 लाख से ज्यादा राजस्व घटा</strong><br />वर्ष 2024 व 2025 के जनवरी से अक्टूबर तक के तुल्नात्मक आंकड़ों के विश्लेषण में सामने आया कि वर्ष 2024 के मुकाबले 2025 में पर्यटकों की संख्या में करीब 3 हजार तथा  1  लाख से ज्यादा के राजस्व में गिरावट दर्ज हुई है।  वन्यजीव विभाग से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, गत वर्ष जनवरी से अक्टूबर तक करीब 66 हजार 886 पर्यटक बायोलॉजिकल पार्क में वन्यजीवों के दीदार को पहुंचे थे। जबकि, वर्ष 2025 में 31 अक्टूबर तक यह संख्या घटकर 63 हजार 225 ही रह गई। वहीं, पर्यटकों से होने वाली आय की बात करें तो गत वर्ष अक्टूबर तक करीब 25 लाख 33 हजार से ज्यादा का राजस्व प्राप्त हुआ था। वहीं, अक्टूबर 2025 तक 24 लाख 28 हजार 220 ही हुआ है। </p>
<p><strong>जनवरी के बाद अर्श से फर्श पर पहुंची कमाई </strong><br />अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के लिए जनवरी माह ही कमाई का होता है। पूरे साल में इसी माह में सबसे ज्यादा पर्यटक घूमने आते हैं। वर्ष 2024 की जनवरी में 13 हजार 356 पर्यटक वन्यजीवों की दुनिया निहारने पहुंचे थे। उनसे पार्क को 4 लाख 96 हजार 740 रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ था। वहीं, वर्ष 2025 में पर्यटकों में 2764 की बढ़ोतरी हुई। साथ ही 1 लाख 7 हजार 730 रुपए का राजस्व ज्यादा प्राप्त हुआ। इस तरह इस वर्ष की जनवरी में कुल 6,04470 रुपए की आय हुई। लेकिन इसके बाद के महीनों में पर्यटकों व राजस्व के आंकड़े अर्श से फर्श पर पहुंच गए।  अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क से मिली जानकारी के अनुसार, गत वर्ष 2024 में मार्च में कुल 7,796 पर्यटक पार्क की सैर पर आए थे। जबकि, वर्ष 2025 के मार्च में घटकर पर्यटकों की संख्या मात्र 4, 628 ही रह गई। यानी गत वर्ष के मुकाबले इस वर्ष 3,168 पर्यटक घट गए। </p>
<p>वनकर्मियों का कहना है कि गर्मी के कारण पर्यटक दिन में नहीं आते। लेकिन, शाम को आते हैं। वर्ष 2024 के मार्च माह में पर्यटकों से बायोलॉजिकल पार्क को 2 लाख 67 हजार 580 रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ था, जिसके मुकाबले इस वर्ष के मार्च में 1 लाख 62 हजार 770 रुपए ही राजस्व एकत्रित हुआ। यानी, गत वर्ष की अपेक्षा इस वर्ष के मार्च में 1 लाख 4 हजार 810 रुपए राजस्व का नुकसान हुआ है। जानकारों का मानना है कि पर्यटक व राजस्व में गिरावट का कारण गर्मी से ज्यादा बड़े एनिमल की कमी है। यहां टाइगर-लॉयन, मगरमच्छ, घड़ियाल जैसे बड़े एनिमल की कमी है। जिसकी वजह से पर्यटकों का रुझान घटा है। </p>
<p><strong>अप्रेल : 1540 पर्यटक घटे व 65 हजार का नुकसान</strong><br />बायोलॉजिकल पार्क में वर्ष 2024 के अप्रेल माह में भीषण गर्मी के बावजूद 3 हजार 484 पर्यटक घूमने आए थे। जबकि, इस वर्ष के अप्रेल में पर्यटकों की संख्या तेजी से घटती हुई 1944 ही रह गई। जबकि, अभी पिछले साल के मुकाबले गर्मी का पारा भी कम रहा। गत वर्ष अप्रेल माह के मुकाबले इस वर्ष 1944 पर्यटकों की संख्या दर्ज की गई। वहीं, राजस्व की बात करें तो 80240 रुपए की आय हुई। यानी, गत वर्ष के मुकाबले इस वर्ष 64370 राजस्व का नुकसान हुआ। </p>
<p><strong>पर्यटकों को अखर रहा टिकट का पैसा </strong><br />बायोलॉजिकल पार्क में शाकाहारी व मांसाहारी मिलाकर कुल 70 से ज्यादा वन्यजीव हैं। यहां आने वाले पर्यटक 55 रुपए खर्च करने के बावजूद बब्बर शेर, टाइगर, मगरमच्छ, घड़ियाल, अजगर सहित अन्य बडेÞ वन्यजीवों का दीदार नहीं कर पाने से निराश होकर लौट रहे हैं। हालांकि, यहां उम्र दराज बाघिन   महक व लॉयनेस सुहासिनी ही दिखाई देती है। लेकिन, भेडिए, पैंथर, जरख एनक्लोजर में उगी झाड़ियों में छिपे रहने से दिखाई नहीं देते। वहीं, कैफेटेरिया नहीं होने से लोगों को चाय-नाश्ते के लिए परेशान होना पड़ता है। इसके अलावा पर्यटकों के बैठने के लिए छायादार शेड व वाटरकूलर भी पर्याप्त नहीं है। पानी के लिए भी भटकना पड़ता है। </p>
<p><strong>गर्मी से ज्यादा बड़े एनीमल की कमी बड़ा कारण</strong><br />वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि कोटा अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क क्षेत्रफल की दृष्टि से प्रदेश का सबसे बड़ा पार्क है। इसके बावजूद यह सुविधाओं व बजट की कमी से जूझ रहा है। यहां पर्यटकों व राजस्व में गिरावट का मुख्य कारण गर्मी से ज्यादा बड़े एनिमल की कमी है।  बजट नहीं होने के कारण बायोलॉजिकल पार्क में पिंजरे यानी एनक्लोजर नहीं बन पा रहे। वहीं, टाइगर-लॉयन जैसे बड़े एनिमल्स की कमी है। जबकि, चिड़ियाघर में  मगरमच्छ, घड़ियाल, अजगर सहित दो दर्जन से अधिक  पक्षी है। यदि, एनक्लोजर बने तो इनकी शिफ्टिंग से पर्यटकों का रुझान बढ़ेगा। जिसका असर राजस्व की बढ़ोतरी के रूप में नजर आएगा।</p>
<p><strong>चिड़ियाघर से वन्यजीवों की नहीं हो पा रही शिफ्टिंग  </strong><br />बायोलॉजिकल पार्क के निर्माण के दौरान 44 एनक्लोजर बनने थे लेकिन प्रथम चरण में मात्र 13 ही बन पाए। जबकि, 31 एनक्लोजर अभी बनने बाकी हैं। जब तक यह एनक्लोजर नहीं बनेंगे तब तक पुराने चिड़ियाघर में मौजूद अजगर, घड़ियाल, मगरमच्छ, बंदर व कछुए सहित एक दर्जन से अधिक वन्यजीव बायलॉजिकल पार्क में शिफ्ट नहीं हो पाएंगे।</p>
<p><strong>द्वितीय चरण में यह होने हैं कार्य </strong><br />पार्क में द्वितीय चरण के तहत 25 करोड़ की लागत से करीब 17 एनक्लोजर, स्टाफ क्वार्टर, कैफेटेरिया, वेटनरी हॉस्पिटल, इंटरपिटेक्शन सेंटर, पर्यटकों के लिए आॅडिटोरियम हॉल, छांव के लिए शेड, कुछ जगहों पर पथ-वे सहित अन्य कार्य शामिल हैं। </p>
<p><strong>पर्यटक बोले-न कैफेटेरिया न लॉयन टाइगर, क्या देंखे</strong><br />परिवार के साथ पार्क घूमने आए बोरखेड़ा निवासी अजय कुश्वाह, राहुल प्रजापति व उस्मान अली ने बताया कि यहां बड़े एनिमल नहीं है, जो है वो भी झाड़ियों में छिपे रहते हैं। साइटिंग नहीं होने से बच्चे भी मायूस हो जाते हैं। टिकट का पैसा अखर रहा है। </p>
<p><strong>झूले टूटे, बच्चे होते मायूस</strong><br />बजरंग नगर निवासी अखिलेश शर्मा व खेड़ली फाटक के सूर्य प्रकाश मेहरा का कहना था कि यहां कुछ झूले लगे हुए हैं, जो भी टूट चुके हैं। कुछ तो टेडे हो गए। जिनमें बच्चों के गिरने का खतरा रहता है। वहीं, वाटरकूलर भी कम ही जगहों पर लगे हैं। शाकाहारी जानवरों के पिंजरों की तरफ कम है। पानी के लिए परेशान होना पड़ता है। </p>
<p>टाइगर-लॉयन लाने के प्रयास लगातार जारी है। हमने यहां प्राकृतिक जंगल, जैव विविधता विकसित की है। पर्यटकों के लिए सुविधाएं विकसित करने का पूरा प्रयास कर रहे हैं। <br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 17 Nov 2025 15:55:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[kota]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कोटा में बना पहला तैरता मगरमच्छ का पिंजरा, देशभर में सुर्खियां बटोर रहा कोटा का नवाचार, झालावाड़ से जयपुर तक ने मांगा कोटा का फ्लोटिंग ट्रैप</title>
                                    <description><![CDATA[अब तक आधा दर्जन मगरमच्छों का सफल रेस्क्यू किया जा चुका है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/the-first-floating-crocodile-cage-has-been-built-in-kota--making-headlines-nationwide--kota-s-innovation-is-attracting-requests-from-jhalawar-to-jaipur-for-kota-s-floating-trap/article-132164"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-11/111-(1)20.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। कोटा वन्यजीव विभाग द्वारा बनवाया गया  क्रोकोडाइल फ्लोटिंग कैज देशभर में सुर्खियां बटोर रहा है। पानी में तैरता भारी-भरकम पिंजरे का वजन 150 किलो है और इसमें 100 किलो वजनी मगरमच्छ फंसने के बाद भी यह पानी में नहीं डूबता। विज्ञान और तकनीक के अनूठे संगम से तैयार फ्लोटिंग ट्रैप से पानी में मगरमच्छ का रेस्क्यू संभव हो सका। इधर, वन्यजीव विभाग के डीएफओ अनुराग भटनागर का दावा है कि कोटा का क्रोकोडाइल फ्लोटिंग कैज देश का पहला पानी में तैरता पिंजरा है। नदी-तालाब, नहरों व नालों से अब तक आधा दर्जन मगरमच्छों का सफल रेस्क्यू किया जा चुका है। दरअसल, यह तकनीक आॅस्ट्रेलिया से मिली ट्रेनिंग और अनुभव के आधार पर विकसित की गई है, जिससे इंसान और मगरमच्छ—दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी।</p>
<p><strong>150 किलो वजनी फ्लोटिंग ट्रेप, फिर भी नहीं डूबता</strong><br />डीएफओ अनुराग भटनागर ने बताया कि क्रोकोडाइल फ्लोटिंग कैज के निर्माण में आॅस्टेलियन तकनीक का उपयोग किया गया है। 150 किलो वजनी होने के बावजूद पानी में नहीं डूबता है। इसका निर्माण कुछ इस तरह से किया गया है। </p>
<p>- कैज एल्युमिनियम धातु से बनाया गया है ताकि पानी में आसानी से तैर सके।<br />- इसकी लंबाई 10 फीट, ऊंचाई 2 फीट और चौड़ाई 3 फीट है।<br />- पिंजरे के दोनों तरफ 13-13 फीट के 250 एमएम डाया वाले पीवीसी पाइप लगाए गए हैं, जिस पर दो या तीन व्यक्ति भी खड़े होकर काम करें तो भी ट्रेप पानी में बैलेंस बनाए रखता है।  <br />- पहला ट्रैप कैज बनाने के बाद वन्यजीव विभाग ने कुछ 5 फीट के स्टेनलेस स्टील के अलग-अलग आकार के कैज तैयार करवाए हैं।  <br />- इस तकनीक से मगरमच्छ को न कोई चोट पहुंचती है और न ही रेस्क्यू टीम को खतरा रहता है।</p>
<p><strong>नदी-तालाबों से हो चुके मगरमच्छों का सफल रेस्क्यू </strong><br /><strong>पहला रेस्क्यू:</strong> यह क्रोकोडाइल फ्लोटिंग कैज को पहली बार 13 अप्रैल 2025 को उपयोग में लाया गया। छत्र विलास उद्यान तालाब में कई महीनों से मगरमच्छ का रेस्क्यू संभव नहीं हो पा रहा था। जमीन पर पकड़ने की कोशिश असफल रही। तब आॅस्टेÑलियन तकनीक से बनाए गए कैज से 13 अप्रैल को तालाब से मगरमच्छ का सफल रेस्क्यू किया गया।</p>
<p><strong>दूसरा और तीसरे रेस्क्यू </strong><br />- कोटा ग्रामीण क्षेत्र के खातौली गांव  में तालाब से भी इसी कैज की मदद से मगरमच्छ रेस्क्यू किया गया।<br />- तीसरा प्रयास बालिता गांव के नाले में किया गया।<br />- जयपुर वन्यजीव विभाग के डीएफओ ओम प्रकाश शर्मा के आग्रह पर वर्तमान में यह पिंजरा जमुवारामगढ़ वन्यजीव अभयारण्य के रामगढ़ डेम के डाउनस्ट्रीम में लगाया गया है।</p>
<p><strong>आॅस्ट्रेलिया से मिली प्रेरणा</strong><br />कोटा वन्यजीव विभाग के डीएफओ अनुराग भटनागर ने बताया कि सहायक वनपाल प्रेम कंवर को 2024 में आॅस्ट्रेलिया के डार्विन वाइल्ड लाइफ आॅपरेशन पार्क और आईयूसीएन क्रोकोडाइल स्पेशल ग्रुप प्रोग्राम में भेजा गया था। वहां उन्होंने करीब डेढ़ महीने तक मगरमच्छ रेस्क्यू तकनीक सीखी। आॅस्ट्रेलिया में देखा गया कि कैसे फ्लोटिंग ट्रेप कैज के जरिए मगरमच्छों को पानी में सुरक्षित रेस्क्यू किया जाता है। वहीं से प्रेरणा लेकर इस तकनीक को कोटा में अपनाया गया और भारतीय परिस्थितियों के अनुसार इसकी डिजाइन करवाई गई। फ्लोटिंग ट्रैप कैज से मगरमच्छ का रेस्क्यू कार्य सहायक वनपाल प्रेम कंवर, कमल, कमलेश, अशोक, राजेन्द्र सिंह, अब्दुल कर रहे हैं।  </p>
<p><strong>इंसान-मगरमच्छ संघर्ष पर रोक</strong><br />उन्होंने बताया कि कोटा शहर व ग्रामीण क्षेत्रों में तालाब और नालों में मगरमच्छ पहुंच जाते हैं। जिससे रहवासियों के लिए खतरा पैदा हो जाता है। पहले केवल जमीन पर रेस्क्यू संभव था, जिससे पानी में रह रहे मगरमच्छ को पकड़ना नामुमकिन रहता था। लेकिन, अब इस तकनीक से किसी भी जलीय क्षेत्र से मगरमच्छ को सुरक्षित रेस्क्यू किया जा सकता है। इससे न केवल इंसान और मगरमच्छ के बीच संघर्ष को टाला जा सकता है बल्कि जानवर और रेस्क्यू टीम की सुरक्षा भी सुनिश्चित होती है। वहीं, वन्यजीव संरक्षण को नई दिशा मिली है। </p>
<p><strong>वन्यजीव संरक्षण में मील का पत्थर </strong><br />कोटा में बना भारत का पहला क्रोकोडाइल फ्लोटिंग ट्रेप कैज न सिर्फ तकनीकी नवाचार है बल्कि वन्यजीव संरक्षण की दिशा में मील का पत्थर भी है। यह पहल साबित करती है कि आधुनिक तकनीक और ज्ञान को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ढालकर बड़े से बड़े संकट का समाधान निकाला जा सकता है। यह फ्लोटिंग कैज इसी का जीवंत उदारहण है। <br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 12 Nov 2025 15:33:02 +0530</pubDate>
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                <title>नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क : सर्दी को देखते हुए वन्यजीवों के लिए बनाया गया नया डाइट चार्ट, हीटर की भी व्यवस्था </title>
                                    <description><![CDATA[सर्द हवाओं के साथ अब नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क के शेर, बाघ, बघेरे, भालू सहित अन्य वन्यजीवों के खान-पान में बदलाव किया गया है। इसके तहत वन्यजीवों के लिए डाइट चार्ट बनाया गया है। क्योंकि ठंड बढ़ने के साथ इन वन्यजीवों की ऊर्जा जरूरतें भी बढ़ जाती हैं। हाई प्रोटीन और न्यूट्रिशन से भरपूर डाइट के साथ ही वन्यजीवों को कैल्शियम, विटामिंस एवं रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए आवश्यक दवाइयां दी जा रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/nahargarh-biological-park-%C2%A0new-diet-chart-made-for-wildlife-in/article-131366"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-11/ews-(4)2.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। सर्द हवाओं के साथ अब नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क के शेर, बाघ, बघेरे, भालू सहित अन्य वन्यजीवों के खान-पान में बदलाव किया गया है। इसके तहत वन्यजीवों के लिए डाइट चार्ट बनाया गया है। क्योंकि ठंड बढ़ने के साथ इन वन्यजीवों की ऊर्जा जरूरतें भी बढ़ जाती हैं। ऐसे में अब इन्हें गर्माहट देने वाली हाई प्रोटीन और न्यूट्रिशन से भरपूर डाइट के साथ ही वन्यजीवों को कैल्शियम, विटामिंस एवं रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए आवश्यक दवाइयां दी जा रही है।</p>
<p>सर्दी के हिसाब से बदला डाइट चार्ट: नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क के वरिष्ठ वन्यजीव चिकित्सक डॉ.अरविंद माथुर ने बताया कि सर्दियों में बाघ, बघेरे, भालू, हिप्पो सहित अन्य वन्यजीवों के लिए अलग-अलग डाइट चार्ट तैयार किए गए हैं। शेर, बाघ और बघेरों को डाइट के अतिरिक्त अब स्पेशल खानपान में मुर्गा, चिकन सूप दिया जा रहा है। साथ ही विटामिन और मिनरल सप्लीमेंट्स दिए जाएंगे। भालुओं को रूटिन डाइट के अलावा अब पिंड खजूर, अण्डे, दूध दे रहे हैं। ताकि उन्हें पर्याप्त कैलोरी सहित अन्य जरूरी चीजें मिल सकें। डॉ.माथुर ने बताया कि हिरण प्रजातियों में रींजका की मात्रा बढ़ाने के साथ ही उन्हें गाजर, खीरा एवं चना दाल दिया जा रहा है। भेडिए, जरख और जैकाल को रूटीन डाइट के साथ ही चिकन दिया जा रहा है। हिप्पो को रूटीन डाइट के साथ ही सीजनल फू्रट्स और खीरा-गाजर दिया जा रहा है। </p>
<p><strong>हीटर की भी व्यवस्था </strong><br />तापमान में गिरावट के चलते नाहरगढ़ बायोलॉजिकल पार्क, लायन और टाइगर सफारी में वन्यजीवों के एनक्लोजर में हीटर और सूखे घास की व्यवस्था की जा रही है। डॉ.माथुर ने कहा कि मौसमी बदलाव के बाद बाघ शावक भीम, स्कंदी, शेर शावक और रानी के पांचों शावकों को स्पेशल डाइट में चिकन और चिकन सूप दिया जा रहा है। इनके पिंजरों में हीटर लगाया गया है। ओपन कराल एरिया को ग्रीन नेट से कवर किया गया है। उम्रदराज बाघिन रंभा का विशेष ध्यान रखा जा रहा है।  </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 04 Nov 2025 11:20:34 +0530</pubDate>
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