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                <title>raj-kaj - Dainik Navajyoti Rising Rajasthan</title>
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                <title>'राजकाज'</title>
                                    <description><![CDATA[पर्दे के पीछे की खबरें जो जानना चाहते है आप....]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/rajkaj/article-14053"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-07/rajkaj.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>होड़ नीचा दिखाने की</strong><br />सूबे में इन दिनों एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ मची हुई है। मचे भी क्यों नहीं, खुद के अस्तित्व का सवाल जो है। यह होड़ पहले तो नेताओं में ही मचती थी, लेकिन अब पब्लिक रिप्रजेंटेटिव्स में भी मची हुई है। राज के रत्नों में मची होड़ को लेकर तो वर्कर्स भी चिन्ता में डूबे हुए हैं, उनका दिन का चैन और रात की नींद उड़ी हुई है। उनके समझ में नहीं आ रहा है कि माजरा क्या है। पिछले दिनों राज के सामने एक मंत्री और एमएलए के बीच एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ ने तो सारी सीमाएं लांघ दी। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि अगर ब्यूरोक्रेसी में होड़ मच गई तो खादी वाले कई भाई लोग तो एक-दूसरे से कन्नी काटते नजर आएंगे।</p>
<p><strong>रिकमंडेशन पर भारी डिजायर</strong><br />मलाईदार कुर्सी पर बैठने के लिए अब मेरिट में आना, गुजरे जमाने के बात हो गई। अब सबसे बड़ी योग्यता हरे रंग के कागज पर लिखी डिजायर है। राज का काज करने वाले लंच केबिन में रिकमंडेशन बनाम डिजायर पर घण्टों चर्चा करते हैं। सबसे बुरी हालत खाकी वालों साहब लोगों की है। महकमे को बदनामी से बचाने के लिए झण्डे के नीचे बैठने वाले साहब ने अशोक स्तम्भ वाले तीन साहबों के लिए रिकमंडेशन की थी, लेकिन जब ऊपर से सोम को एक सूची आई तो साहब भी दंग रह गए। सूची में से छह तो अपनी मर्जी से थे, बाकी डिजायर वाले भारी रहे। रिकमंडेशन वालों का नाम देखने के लिए कई नंबरों के चश्मे भी लगाए, पर नाम नहीं दिखा। अब साहब के भी समझ में आ गया कि ज्यादा माथापच्ची करने से कोई फायदा नहीं है, केवल डिजायर की पालना करो और वाहवाही लूटो।</p>
<p><strong>अब अफसरों से फीडबैक</strong><br />भारती भवन में किए जा रहे नए प्रयोग से राज के साथ काज करने वालों की भी नींद उड़ी हुई है। शनि की शाम जो कुछ हुआ, उससे सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में भी सुगबुगाहट है। चर्चा है कि सूबे में राज को दुबारा लाने के लिए भारती भवन वालों ने एक और प्रयोग करने की सोची है। इसके तहत संघ की पृष्ठभूमि वाले अफसरों से फीडबैक लेकर रणनीति को अंजाम दिया जाएगा। भारती भवन से जुडेÞ भाईसाहब ने शनि की शाम सात बजे से शुभ मुहूर्त में बैठक कर चिंतन भी शुरू कर दिया। वैसे भी बुजुर्ग भाईसाहब की आड़ में भारती भवन वालों ने संकेत दे दिए हैं कि अब जो कुछ तय होगा, वह भाजपा और संगठन नहीं, बल्कि संघ से होगा।</p>
<p><strong>शनि की कृपा</strong><br />आजकल दोनों तरफ शनि की कृपा है, जिसने कमल और हाथ वाले नेताओं की फिजा ही बदल दी। जब से शनि का उदय हुआ है, तब से हाथ वालों के साथ भगवा वालों में भूचाल थम सा नजर आया रहा है। अगले दो महीने में इसका असर साफ दिखने लगेगा। राज का काज करने वालो मे लंच केबिनों में चर्चा है कि अब तक जो कुछ कर लिया वो तो ठीक है, मगर अब फूंक-फूंक कर कदम रखने में ही भलाई है। सातवें महीने की पहली तारीख से शनि का जो उदय हुआ है, जो राज के लिए कारक है, लेकिन ब्यूरोक्रेसी में अस्थिरता का माहौल पैदा कर अपना असर जरूर दिखाएगा।</p>
<p><strong>चर्चा में ब्यूरोक्रेट्स</strong><br />सूबे में इन दिनों ब्यूरोक्रेट्स बड़ी चर्चा में है। सत्ता और संगठन तक इससे अछूता नहीं है। राज के दो नंबर के रत्न के मुंह से ब्यूरोक्रेट्स को लेकर दो शब्द क्या निकले, जैसे भूचाल आ गया। अलसुबह ही गांधीनगर वाले साहब ने भाई साहब के कान भरे, तो उन्होंने भी ईमानदारी का तमगा दे दिया। पीसीसी में हर आने वाला एक-दूसरे से पूछता है कि आखिर सरकार चला कौन रहा है। गांधी टोपी वाले बुजुर्गवार की मानें तो राज की नजर में आईएएस ही कार्यकर्ता हैं।</p>
<p><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />सचिवालय में इन दिनों एक जुमला जोरों से चर्चा में है। चर्चा भी क्यूं ना हो, मामला वास्तु दोष से जो जुड़ा है। लंच केबिनों में चर्चा है कि आजकल कुछ बड़े साहब पंडितों की सलाह पर काम कर रहे हैं। कुछ ने अपने दफ्तर की बाहर लगी नेम प्लेट की डिजायन तक बदलने के साथ कुर्सी की दिशा भी मोड़ ली। दूसरे माले पर बैठने वाले एक साहब ने तो अपने आठ अक्षरों वाले नाम को छोटा कर छह में कर लिया। उनकी देखादेखी एक अन्य साहब ने भी नेम प्लेट की डिजायन बदलवा दी। चर्चा है कि यह सब लंबे बालों और मोटे पेट वाले एक पंडितजी का किया धरा है। -<strong>एल.एल शर्मा, पत्रकार</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 11 Jul 2022 15:53:10 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>'राजकाज'</title>
                                    <description><![CDATA[पर्दे के पीछे की खबरें जो जानना चाहते है आप....]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-raj-kaj/article-10257"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/rajkaj1.jpg" alt=""></a><br /><p><span style="color:#ff6600;"><strong>चर्चा में शेरो-शायरी</strong></span><br />अगर कोई शेरो-शायरियों से इशारों ही इशारों में अपनी बात कहता है, तो कई भाइयों को पचती नहीं है और उसके कई मायने निकालने में जुट जाते हैं। और तो और ऊपर वालों के कान भरने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते। अब देखो ना, पिछले मंडे को पिंकसिटी में भगवा वाली मैडम ने अपने पुराने अंदाज में शेरो-शायरी क्या सुना दी, कइयों का दिन का चैन और रातों की नींद उड़ गई। मैडम के नाम से मुंह बिगाड़ने वाले कई भाई लोगों ने इसे खुद से जोड़ कर ऊपर वालों को परोसने में पसीने बहाने में जुट गए। मैडम का शेर था कि जिन पत्थरों को हमने दी थी धड़कनें, उनको जुबान मिली थी, तो हम पर ही बरस पड़े। मैडम के इस शेर को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।</p>
<p><br /><span style="color:#ff6600;"><strong>एम फैक्टर और शनि का असर</strong></span><br />हाथ वाले भाई लोगों का भी कोई सानी नहीं है। चाहे अपना हो या फिर पराया, हत्थे चढ़ने पर कोई कसर नहीं छोड़ते। इन दिनों उनके हत्थे सिंह राशि वाले तीन भाई लोग चढ़े हुए हैं, जो एम फैक्टर में टॉप टेन में शामिल हैं। एक भाईसाहब बाड़ी से ताल्लुकात रखते हैं, तो दूसरे भाईसाहब का पिंकसिटी में कृष्ण की पोल से सीधा संबंध है। तीसरे भाईसाहब नावां की गूदड़ी के लाल हैं। इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के ठिकाने पर आने वाले में खुसरफुसर है कि हाथ वाले दल में सिंह राशि वाले भाइयों पर शनि का असर कुछ ज्यादा ही है, जो उनको या परिवार वालों को लपेटे में लिए बिना पीछा नहीं छोड़ रहा। यह तो भला हो, जोधपुर वाले अशोक जी भाईसाहब का, जो अपने जादू से कोई न कोई गली निकाल लेते हैं, वरना शनि तो कोई कसर नहीं छोड़ रहा।</p>
<p><br /><span style="color:#ff6600;"><strong>पसंद और नापसंद का फेर</strong></span><br />सूबे में चेहरों के नाम पर चार बार राज कर चुकी भगवा वाली पार्टी में इन दिनों लीडर को लेकर उठापटक मची हुई है। चार धड़ों में बंटे नेताओं में एक राय बनाने की कोशिशें भी की गई, लेकिन भारती भवन में बैठकों में चिंतन-मंथन करने वाले भाई लोग कोई ना कोई रोड़ा अटका देते हैं। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि दो बार बाबोसा और दो बार मैडम के चेहरे पर चुनावी जंग फतह कर चुके कमल के फूल वाले दल में बड़ा चेहरा तो है, लेकिन पसंद और नापसंद के फेर में फंसता नजर आ रहा है। ऐसे में अब बेचारों के सामने नमोजी के नाम पर जंग में उतरने के सिवाय कोई चारा भी तो नहीं है, चूंकि खुद के चेहरे के नाम पर वोट मांगने का कॉन्फिडेंस भी तो नहीं है।</p>
<p><br /><span style="color:#ff6600;"><strong>चर्चा नई बीनणी की</strong></span><br />इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के दफ्तर में कुर्सी की इंतजार में बैठे भाई लोगों में नई बीनणी वाली कहावत की चर्चा जारों पर है। कहावत भी गुजरे जमाने में राज का काज कर चुके खाकी वाले नेताजी ठाठ के साथ सुनाते हैं। पीसीसी में घटती भीड़ को लेकर नेताजी चटकारे लेते हैं कि नई बीनणी को देखने के लिए पूरा गांव इकट्ठा होता है, पर पुरानी होने के बाद केवल घर वाले ही रहते हैं। यही हाल लक्ष्मणगढ़ वाले भाईसाहब के साथ हो रहा है।</p>
<p><br /><span style="color:#ff6600;"><strong>एक जुमला यह भी</strong></span><br />सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि भगवा वाले भाईसाहब से ताल्लुक रखता है। जोधपुर की धरा में रमे बसे भाईसाहब पिछले पौने दो साल से चमक नींद सो रहे हैं। जब किसी किसी एम्बुलेंस या पुलिस की गाड़ी पर लगे सायरन की आवाज आती है, तो भाई साहब की सांसें ऊपर-नीचे होने लगती हैं। जुमला है कि भाईसाहब साल भर पहले भी दिल्ली में सायरन की आवाज से चमक कर दीवार लांघने में ऐड़ी तुड़वा चुके हैं।<br /><strong>एल. एल. शर्मा, पत्रकार</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 23 May 2022 11:53:05 +0530</pubDate>
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                <title>'राजकाज'</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-raj-kaj/article-9414"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/rajkaj.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>नजरें झीलों की नगरी की तरफ</strong><br />इन दिनों सूबे के पॉलिटिशियन के साथ ब्यूरोक्रेसी की नजरें झीलों की नगरी पर टिकी हैं। टिके भी क्यों नहीं, मेवाड़ में बनी पांच अक्षरों वाली इस नगरी में तीन दिन तक गहन मंथन के साथ अमृत जो निकालेगा। अमृत निकालने वाले और कोई नहीं, बल्कि हाथ वाले भाई लोग हैं। इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के ठिकाने पर चर्चा है कि उदयपुर के मंथन में निकलने वाले अमृत का ब्रांड वो ही होगा, जो मेष राशि वाले भाई साहब अपने जादू से निकालेंगे। अब समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।</p>
<p><br /><strong>तुम नहीं होते तो</strong><br />आज हम चर्चा करेंगे, हे मेरे अल्लाह और हे मेरे राम की। करना भी लाजमी है, चूंकि इन दिनों इन दोनों पर पूरे इंडिया की नजर है। इनसे न पॉलिटिशियन अछूते हैं और न ही ब्यूरोक्रेट्स। खाकी और खादी वाले तक इन दोनों के भंवरजाल में फंसे हुए हैं, जिनको न आगा सूझ रहा है और न ही पीछा। हर गली और मौहल्ला इनमें बंटा हुआ है। सरदार पटेल मार्ग पर स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा के ठिकाने के साथ इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के दफ्तर में आने वाले भाई लोग सिर्फ ये ही गुनगुना रहे हैं कि हे अल्लाह और हे मेरे भगवान, आज तुम नहीं होते, तो हम राजनीति कैसे करते।</p>
<p><br /><strong>असर अफवाहों का</strong><br />सूबे में इन दिनों कई तरह की अफवाहों का दौर है। ढाणी-गांव से लेकर शहर की गलियों तक अफवाह फैलाने वालों की कमी नहीं है। अफवाहें भी हाथ वालों के साथ भगवा वाले नेताओं को लेकर है। हाथ वाले भाई लोगों का एक गुट जोधपुर वाले भाईसाहब को लेकर अफवाह फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा, तो भगवा वाले भाई लोगों के तीन गुट मैडम को लेकर कई तरह की अफवाहें फैलाने में दिन-रात एक किए हुए हैं। राज का काज करने में वालों में हकीकत को लेकर चर्चा है कि न तो जोधपुर वाले भाई साहब कहीं जा रहे हैं और न ही मैडम सूबे से दूर हो रही हैं। अब अफवाह फैलाने वालों को कौन समझाए कि मिशन-2023 के लिए इन दोनों सेनापतियों की सेना ही मैदान में उतरेगी, जो आप को बोर्डर पर ही रोकने का दम रखती है। सो दीपावली पर सिविल लाइंस के बंगला नंबर 13 में पटाखों के साथ रंग बिरंगी फुलझड़ियां भी छूटे बिना नहीं रहेगी।</p>
<p><br /><strong>कमाल मीठी माई का</strong><br />जोधपुर वाले भाईसाहब कब क्या पैंतरा फेंक दें, पता नहीं चलता। भगवा वाले तो दूर की बात हाथ वाले भी नहीं समझ पा रहे कि आखिर माजरा क्या है। दोनों ओर के नेता इधर-उधर टोह लेने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे। इन दिनों साहब की बदली चाल-ढाल को लेकर भारती भवन में भी चर्चा, चिंतन और बैठकों का दौर जारी है। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में आने वाले भाईसाहबों के चेहरों पर भी चिंता की लकीरें साफ दिखाई देने लगी हैं। सुबह-शाम हाजरी भरने वाले साहबों की लाइन भी लंबी होने लगी है। दिल्ली दरबार में बढ़ती साख से कइयों के आफरा आने लगा है। अब उनको कौन बताए कि यह सारा कमाल सूर्यनगरी स्थित सोजती गेट वाले गणेश मंदिर के साथ मीठी माई का है।</p>
<p><br /><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि ब्यूरोक्रेसी को लेकर है। जुमला है कि सूबे में रनिंग ब्यूरोक्रेसी की स्पीड में कई तरह के ब्रेक लगे हैं। ब्रेक लगाने वाले और कोई नहीं, बल्कि रिटायरमेंट के बाद भी डांग पटेलाई करने वाले साहब लोग हैं। सचिवालय से सिविल लाइन तक खुसरफुसर है कि रिटायरमेंट के बाद राज को सलाह देने वाले न तो सिस्टम को चलने दे रहे और न ही हार्ड कोर वर्कर को स्पीड से बढ़ने दे रहे। अब बेचारे अफसरों के पास उनकी एडवाइस का इंतजार करने के सिवाय कोई चारा नहीं है।<br />एल. एल. शर्मा, पत्रकार</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Mon, 09 May 2022 14:48:17 +0530</pubDate>
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                <title>'राजकाज'</title>
                                    <description><![CDATA[पर्दे के पीछे की खबरें जो जानना चाहते है आप....]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-raj-kaj/article-9023"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-05/raj33.jpg" alt=""></a><br /><p>    मायने मुंह खोलने के : पॉलिटिकल मामलों में आधे से ज्यादा समय अपना मुंह बंद रखने वाले पार्लियामेंट्री अफेयर्स मिनिस्टर कोटा वाले शांतिजी भाईसाहब ने शनि को लालकिले वाली नगरी में अपना मुंह खोला, तो पूरे सूबे में कानाफूसी हुए बिना नहीं रही। कानाफूसी भी भगवा वाले भाई लोगों में नहीं, बल्कि हाथ वाले ब्रदर्स में है। कई दिनों से राज की कुर्सी के लिए उछलकूद कर रहे कुंभ राशि वाले ब्रदर के समझ में नहीं आ रहा है कि पॉलिटिकल बयानों से कोसों दूर रहने वाले धारीवालजी के मुंह खोलने के पीछे का राज क्या है। राज का काज करने वाले भी लंच केबिनों में बतियाते हैं कि शांत रहने वाले भाईसाहब ने लू के थपेड़ों के बीच ऐसे ही मुंह थोड़े ही खोल दिया, उनको भी किसी ने मजबूर किया होगा। अब मजबूर किसने किया, ये तो समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।<br /><br /><br />    चर्चा में ऑड एंड इवन: पड़ोसी सूबे में इन दिनों ऑड एंड इवन को लेकर रोजाना कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं। हो भी क्यों ना, मामला पांच नदियों वाले प्रदेश से ताल्लुक जो रखता है। झेलम, चेनाब, रावी, व्यास और सतलज नदियों का पानी पीने वाले सरदारों के समझ में नहीं आ रहा कि दिल्ली वाले केजरीवालजी का आदेश में मानें या फिर अपनी मस्ती में रहने वाले भगवंत का मान बढ़ाएं। चर्चा है कि जब कोई नहीं सूझा तो शनि को दोपहर में सरदारों के लीडर ने बुद्धि लगाकर फरमान जारी कर दिया कि ऑड एंड इवन के हिसाब से दिन बांट लो, एक दिन केजरीजी की मानो, तो दूसरे दिन भगवंतजी की मानो। अब भाई लोग दो दिन से भंगड़ा कर रहे हैं, थमने का नाम नहीं ले रहे।<br /><br /><br />    ऑल इज वेल : सूबे में हाथ वाले भाई लोगों के साथ ब्यूरोक्रेट्स भी कई दिनों से कंफ्यूज्ड हैं। उनका कंफ्यूज्ड होना भी लाजमी है, चूंकि हर घंटे नई बात उनके कानों तक पहुंचती है। मसखरों ने जब से मई एंड में बहुत बड़ा फैसला होने की डेट दी तो कइयों के पैर तो जमीन पर ही नहीं टिक रहे। हाथ वाले वर्कर्स के बजाय ब्यूरोक्रेट्स तो हाथ मिलाने के बाद हाल-चाल पूछने के बजाय राज में क्या चल रहा है की चर्चा करने में कतई चूक नहीं करते। अब इनको कौन समझाए कि फैसला तो पिछले साल नवंबर में हो चुका है, जब राज के रत्नों की संख्या बीस से बढ़ाकर तीस की गई थी। अब तो आॅल इज वेल है, न राज की कुर्सी वाले बदलेंगे और नहीं राज के रत्न। अब तो अगले मिशन के लिए जिनकी रगड़ाई होना बाकी है, उनको रगड़ा जाएगा, बाकी रामजी की कृपा है।<br /><br /><br />    रत्नों की बढ़ती चिंता: इन दिनों राज के कई रत्नों का वजन एकदम कम होने लगा है। शरीर से तो दुबले हो ही रहे हैं, चेहरों पर भी चिंता की लकीरें भी साफ दिखाई देने लगी हैं। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के दफ्तर में यह चर्चा का विषय बना हुआ है। संगठन से जुड़े एक साहब ने तो चौथे महीने की 28 तारीख को एक समारोह में दो रत्नों को इसका कारण पूछ भी लिया। बात जब बाहर आई तो, आसपास खड़े लोगों के पास हंसने के अलावा कोई चारा भी नहीं था। रत्नों का कहना था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ दिल्ली वालों की ओर से चलाई मुहिम यूपी के बाद सूबे में घुस गई, तो कहीं भी मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। इसकी याद आते ही खाना पीना तक भूल जाते हैं।<br /><br /><br />    चर्चा छुट्टी की: हाथ वाले भाई लोगों में इन दिनों छुट्टी को लेकर बड़ी चर्चा है। सूबे के सदरों के साथ पीसीसी का ठिकाना भी इससे अछूता नहीं है। सूची में जिन लोगों के नाम गिनाए जा रहे हैं, उनके चेहरों पर चिन्ता की लकीरें भी साफ दिखाई देने लगी हैं। चर्चा है कि एक गुप्त छानबीन की मुताबिक 108 में से साठ से ज्यादा विधायकों की परफोरमेंस ठीक नहीं है। रिपोर्ट देने वाले और कोई नहीं, बल्कि जिलों के सदर हैं, जो खुद टिकट की दौड़ में हैं। खुचर-फुसर है कि आगूणी के जिले में दिए गए रिपोर्ट कार्ड में साफ-साफ संकेत दिए गए हैं कि अगर राज में आना है, तो साठ की छुट्टी करनी होगी। राज का काज करने वाले बतियाते हैं कि अपने टिकट के लिए दूसरे का पत्ता साफ कराने वाली रिपोर्ट में ज्यादा दम दिखता नहीं है। चूंकि मामला एवरीबडी वान्ट्स टिकट से जुड़ा है।<br />एल. एल. शर्मा, पत्रकार</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 02 May 2022 14:03:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>'राजकाज'</title>
                                    <description><![CDATA[पर्दे के पीछे की खबरें जो जानना चाहते है आप....]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-raj-kaj--it-s-public--everybody-knows/article-8549"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-04/raj_kaj-2.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>यह पब्लिक है..</strong>.<br />यह पब्लिक है, सब जानती है......। फिल्मी गाने की इन लाइनों को गुनगुनाने वालों की संख्या कम होने का नाम ही नहीं ले रही। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने पर हर कोई जानबूझकर इन लाइनों को गुनगुनाता है। कई दिलजले तो मैसेज देने के लिए चाय की दुकान से लेकर पान की थड़ी तक ऊंची आवाज में भी गाते हैं। पीसीसी में खुसरफुसर है कि सूबे की सरकार के चुनाव में पब्लिक ने हाथ वालों को ऑक्सीजन तो दे दी, मगर दिग्गजों के इलाकों में जो कुछ किया, वह सिर्फ खुद ही जानती है। पब्लिक ने मैसेज दे दिया कि अब जल्द ही नए चेहरों की तलाश के लिए कॉम्पिटिशन की जरूरत है। मैसेज को समझने वाले तो समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं। बाकी पब्लिक तो सब जानती है।</p>
<p><br /><strong>नजरें कमिश्नरी पर</strong><br />सूबे में जब भी खाकी वाले साहब लोगों को इधर-उधर करने की सुगबुगाहट होती है, तो कई साहब लोगों का दिन का चैन और रातों की नींद उड़ जाती है। उड़े भी क्यों नहीं, बेचारे जयपुर कमिश्नरेट वाली कुर्सी के लिए दिन भी सपने जो देखते हैं। अब देखो ना, राज लिस्ट तो पता नहीं कब निकालेगा, लेकिन अभी से ही चार नामों की चर्चा कमिश्नरेट से लेकर पीएचक्यू तक जोरों पर है। सबसे ज्यादा चर्चा तो एक मोहतरमा की है, जो भृर्तहरि की धरती से ताल्लुकात रखती है। चर्चा तो पवन के पर्यायवाची नाम वाले साहब की भी है, मगर उन पर जोधपुर की धरा पर पले-पढ़े मेष राशि वाले साहब भारी पड़ रहे हैं। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि जोधपुर वाले अशोकजी भाईसाहब की पसंदीदा लोगों में एक ही बैच के केरल और कर्नाटक वाले दो साहब भी हैं। वैसे भी जादूगरजी दक्षिण पंथी वाले साहब लोगों पर कुछ ज्यादा ही विश्वास करते हैं।</p>
<p><br /><strong>मायने चौपाई के</strong><br />राज के एक खास रत्न ने रामचरित मानस की रामायण के सुन्दरकाण्ड में लिखी चौपाई क्या सुना दी, भाइयों ने तो कई मायने निकालने ही शुरू कर दिए। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के दफ्तर में उस चौपाई को कई लोग गुनगुना रहे हैं। राज की मौजूदगी में रत्न ने सुनाया कि सचिव, बैद, गुरु तीन जो, प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीन कर, होई बेगहि नास। भाई लोगों के समझ में नहीं आ रहा कि राज के खास रत्न का इशारा किसकी ओर था।</p>
<p><br /><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />राज का काज करने वालों की जुबान पर आजकल दो नाम चढ़े हुए हैं। इनमें एक सबसे बड़ी सरकारी साहब  हैं, तो दूसरे वे अफसर हैं, जिन्होंने प्रेम से राज के खजाने की चाबी संभाल रखी है। दोनों की तारीफ करने वालों की संख्या भी कम नहीं है। बड़ी मैम साहब भी किसी फाइल को अटकाने में कम ही विश्वास करती हैं, तो सरकार के खजाने का मामला इस बार उल्टा है। विभागों के सचिवों को खुद फोन कर फाइल लेकर आने की ताकीद करते हैं। खजाने वाले अफसर साहब की इस दरियादिली से राज-काज निपटाने वाले वे अफसर कायल हैं, जो पहले फाइलों के साथ पुराने वालों  के यहां चक्कर लगाते थक चुके हैं।<br /><strong>- एल. एल. शर्मा, पत्रकार</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 25 Apr 2022 12:55:57 +0530</pubDate>
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                <title>'राजकाज'</title>
                                    <description><![CDATA[जानें राज-काज में क्या है खास]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-raj-kaj/article-8064"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-04/raj3.jpg" alt=""></a><br /><p>एक चेहरा-एक चिन्ह<br />सूबे में इन दिनों भगवा वाले भाई लोगों में एक चेहरा और एक चिन्ह को लेकर काफी खुसरफुसर है। हो भी क्यों ना, चार धड़ों में बंटे वर्कर्स को एकजुट करने के लिए कोई न कोई फार्मूला भी तो जरूरी है। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा के वालों के ठिकाने के साथ भारती भवन वाले भाई साहब भी मिशन-2023 के लिए अभी से पसीना बहा रहे हैं। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि भगवा वालों को हाथ वालों से नहीं बल्कि खुद की एक विंग से बड़ा खतरा है। इसलिए तो नेक्स्ट सीएम का नाम लिए बिना ही मोदी के चेहरे और कमल के चिन्ह पर ही वोट मांगने में अपनी भलाई समझ रहे हैं। यह दीगर बात है कि दिल्ली वाले दोनों बड़े साहब जोधपुर वाले गज्जू बन्ना को आगे लाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे, तभी तो बन्नाजी इन दिनों पॉलिटिकल बयान देने में कतई कंजूसी नहीं कर रहे।</p>
<p><br />तलाश-ए-ठिकाना<br />हाथ वाले कुछ भाई लोग इन दिनों काफी दुबले हो रहे हैं। उनकी रातों की नींद और दिन का चैन काफूर है। हो भी क्यों ना, पब्लिक में अपना रुतबा दिखाने के लिए चॉपर में बैठकर हवा में भी उड़ते हैं, लेकिन उनके अंदर छिपे दर्द को कोई नहीं जानता। इस दर्द के इलाज के लिए दो महीनों से सचिवालय से लेकर सिविल लाइंस तक के चक्कर लगा चुके हैं, लेकिन अभी पार नहीं पड़ी। सबसे ज्यादा दर्द मेष राशि वाले भाई साहब का है, जिनका साढ़े तीन साल ऐड़ियां घिसने के बाद दो महीने पहले पॉलिटिकल अपॉइंटमेंट तो हो गया, मगर बैठने के लिए ठिकाना आज तक नहीं मिला। अब भाई साहब को चिंता सता रही है कि बिना ठिकाने के परशुराम वंशजों की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए गोविन्ददेवजी के साथ कौनसा देवरा ढोका जाए।</p>
<p><br />नहीं लगा मन भक्ति में<br />भगवान की भक्ति में हर किसी का मन लगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है। मन है, लगे तो लगे, नहीं लगे तो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। अब देखो ना, सूबे में राज ने हनुमान जयंती पर मंदिरों में सुन्दरकांड पाठ के आयोजनों में कोई कंजूसी नहीं की। राज को उम्मीद थी कि पिंकसिटी के हाथ वाले भाई लोगों का मन भी हनुमान चालीसा के साथ राम के नाम में रम जाएगा। राज ने इसके लिए हवामहल के सामने मंदिर में हनुमान जन्मोत्सव पर शनि को बंदोबस्त करने के साथ नवरत्नों में से एक मोहतरमा को भी जिम्मेदारी सौंपी, लेकिन हाथ वाले भाई लोगों ने दूरियां बनाकर मैसेज दे दिया कि नकल की नहीं, बल्कि अकल की जरूरत है।</p>
<p><br />राम ही मालिक<br />गुजरे जमाने में काफी उठापटक के दौर से गुजर चुके सरदार पटेल मार्ग पर स्थित बंगला नंबर 51 स्थित भगवा वाली पार्टी के दफ्तर में एक चर्चा जोरों पर है। चर्चा भी मीनेश और देवनारायण के वंशजों को लेकर है। सिर पर सूबे की सरकार के लिए जंग सामने है, लेकिन भगवा टीम में दोनों को ही ज्यादा तव्वजो नहीं मिली है। यहां आने वाले अधिकांश कार्यकर्ताओं की जुबान पर है, कि भाईसाहबों की हेकड़ी से पहले ही दो फाड़ बैरन बनी हुई है और अब मीनेश और देवनारायण के वंशजों को गले नहीं लगाया तो जंग जीतना आसान नजर नहीं आ रहा। अब तो भगवा का राम ही मालिक है।  </p>
<p><br />बढ़ रही है सूची <br />राज और काज करने वालों की बीच छत्तीस का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। जोधपुर वाले भाई साहब तो खाई पाटने की जुगत में हैं, लेकिन उनके नवरत्न कुछ समझना ही नहीं चाहते। काज करने वाले कायदे कानूनों की दुहाई देकर सुशासन के नारे की याद दिलाते हैं। अब देखो ना हर घर को पानी पिलाने में जुटे भाई साहब को ऊपर वालों ने आंख के इशारे से समझा दिया, लेकिन उनके समझ में नहीं आई। गुजरे जमाने में माथुर आयोग के चक्कर लगा चुके अफसरों से अभी भी उम्मीद कर रहे हैं कि आंख बंद कर चिड़िया बिठा दें, चाहे दूध फट ही क्यूं ना जाए। ऐसे में नवरत्नों से पिण्ड छुड़ाने वालों की सूची लंबी होती जा रही है।</p>
<p><strong>      एल. एल. शर्मा, पत्रकार</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 18 Apr 2022 12:47:42 +0530</pubDate>
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                <title>जानें राज-काज में क्या है खास</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B8/article-7753"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-04/rajkaj06.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>आप का बनाम आप में</strong><br />सूबे में नए राज के लिए दंगल तो 20 महीने बाद है, मगर भाई लोगों ने अभी से ही अपनी गोटियां फिट करना शुरू कर दिया। इसके लिए जयपुर से लेकर दिल्ली तक के देवरे ढोकने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। न हाथ वाले चैन से सो रहे हैं, तो नहीं भगवा वाले सुकून में हैं। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि हाथी पर सवारी कर हाथ से हाथ मिलाने वाले कुछ भाई लोग इस बार नए जुगाड़ के तरफ देख रहे हैं। वे आपका में नहीं, बल्कि आप में अपना भविष्य देख रहे हैं। आप वाले भी एक कदम आगे हैं, उनके सांचे में ढलने वाले भाई लोगों की लिस्ट छह महीने पहले ही बना कर बैठे हैं।</p>
<p><br /><strong>बेहाल हैं दो लाल</strong><br />हाथ वाले दल में दिल्ली में इन दिनों जो उबाल आया है, उसको लेकर सूबे में कई लोगों के ललाट पर लकीरें दिखाई देने लगी हैं। गोलमाल के चक्कर में गौरी मैडम और वेटिंग पी.एम. राजकुमार की नजरों से राजा तक नहीं बच सके, तो यहां वालों की बिसात ही क्या है। जब से सोनियाजी के साथ प्रियंका मैडम के पास रिपोर्ट कार्ड पहुंचा है, तब से राज के दो लाल तो दिन रात भाई साहब के आशीर्वाद की दुहाई देते नहीं थकते। अब इनको कौन समझाए कि गोलमाल को लेकर मैडम के उवाच ने तो सरदारजी तक का मुंह बंद कर दिया था।</p>
<p><br /><strong>मालाओं पर हक किसका</strong><br />फूल मालाओं पर हक को लेकर खादी और खाकी वालों के बीच भौंहें तन गई। तनना भी लाजमी है, चूंकि खादी वाले इन पर सिर्फ अपना हक जताते हैं। दूसरा कोई उन पर हक जताए तो उनका हाजमा खराब हो जाता है। पीएचक्यू में बैठ रहे खाकी वाले एक साहब पिछले दिनों तूफानी दौरे पर निकले, तो जगह जगह खादी वालों की तरह स्वागत सत्कार हुआ। फूल मालाओं से लादा गया, यहां तक कि उनके साथ फोटो खिंचवाने की भी होड़ मची। यह सुन उन्हीं की बिरादरी के नेताजी का हाजमा बिगड़ गया और आनन फानन में राज को चिट्ठी लिख भेजी कि काज करने वालों को यह शोभा नहीं देता। लिहाजा इस पर आगे के लिए ब्रेक लगाया जाए। अब राज का काज करने वालों में चर्चा है कि आखिर मालाओं पर हक किसका है।</p>
<p><br /><strong>हम नहीं तो कोई नहीं</strong><br />भगवा वाली पार्टी में एक संदेश तेज गति से फैल रहा है। संदेश भी हम नहीं तो कोई नहीं का है। तीन साल से कोई तालमेल नहीं बैठते देख दुखी कार्यकर्ताओं ने संदेश के सहारे यह सोच कर  राजनीति शुरू की है कि शायद कोई सुलह हो जाए। पर दोनों ओर से कोई भी तालमेल को तैयार नहीं है। राज का काज वालों के लंच केबिन में भी यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि सूबे में विपक्ष कहां गायब हो गया। आखिर राज के नवरत्नों पर नजर रखने वाला तो कोई हो, जिनकी बीस अंगुलियां घी में डूबी हुई हैं।</p>
<p><br /><strong>नब्ज देख पकड़ी बीमारी</strong><br />जोधपुर वाले भाई साहब नब्ज टटोलने में माहिर हैं। नब्ज भी ऐसी पकड़ते हैं कि सामने वाले की बोलती बंद हो जाती है। किसान पुत्रों की तिगड़ी में मंथन के बीच दिल्ली दरबार में सूबे की पंचायत करने वाले एक भाई साहब के मुंह से निकल पड़ा कि अगली बार तो शायद छोटी बस ही काफी होगी। एक किसान पुत्र के पेट में बात पची नहीं, तो भाई साहब के सामने परोस दी। भाई साहब भी कहां चुकने वाले थे, सो कागज और पेन थमाकर आंकड़े मांग बैठे। किसान पुत्र ने तो पहले तो अगल-बगल में देखा और जब पार नहीं पड़ी, तो बोले कि साहब मेरे मुंह से तो यूं ही निकल गया था। भाई साहब भी बेमतलब की बातों वक्त जाया न करने की हिदायत दे, दूसरी बातों में लग गए।</p>
<p><br /><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि गांव-गांव और कस्बा-कस्बा में स्वागत द्वारों पर लिखे स्लोगन को लेकर है। स्लोगन के शब्दों पर भी इन दिनों सबकी नजरें अपने आप ही पड़ती हैं। स्लोगन है कि आपका हार्दिक स्वागत है। सूबे में हाथ वालों के साथ भगवा वालों की पहले से ही आप से नींद उड़ी हुई है। आप वाले भाई लोग जब भी इन द्वारों से गुजरते हैं, तो मुस्कराए बिना नहीं रहते, चूंकि उनका न तो रंग लग रहा और न ही फिटकरी, रंग चौखा आ रहा है।<br /><strong>एल. एल शर्मा, पत्रकार</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 11 Apr 2022 15:49:23 +0530</pubDate>
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                <title>'राजकाज'</title>
                                    <description><![CDATA[पर्दे के पीछे की खबरें जो जानना चाहते है आप....]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-raj-kaj-screenplay-mission-23-in-discussion/article-6447"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-03/राजकाज-4.png" alt=""></a><br /><p><strong>जुबां पर आई सच्चाई</strong><br />सूबे में ट्रांसफर्स को लेकर मिनिस्टरों पर लगे आरोपों को नकाराने में नेताओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी। छोड़े भी क्यों, मामला उनसे सीधा ताल्लुक जो रखता है। नेताओं के लिए धंधा करने वाले वर्कर्स भी भागदौड़ करने में कतई कंजूसी नहीं करते। बेचारे दिन रात लिस्ट को ऊपर नीचे करने में ही पसीना बहाते हैं। दो दिन पहले राज की एक रत्न ने ट्रांसफर्स में लेनदेन का ठीकरा जब वर्कर्स पर फोड़ा, तो उनकी आंखें लाल होना लाजमी थी। बड़ी चौपड़ से सचिवालय तक चर्चा है कि इस सालाना उद्योग में किसी वर्कर ने बहती गंगा में हाथ धो लिया, तो मामला जुबान पर आ गया, लेकिन जब ब्रोकर पूरे थैले को ही हजम कर जाते हैं, तो पेट में दर्द तक नहीं होता। अब इनको कौन समझाए कि वर्कर और ब्रोकर में जमीन और आसमान का फर्क है।</p>
<p><br /><strong>चर्चा में पटकथा मिशन-23</strong><br />सूबे में इन दिनों मिशन-23 को लेकर बैठकों में चिंतन-मंथन का दौर जारी है। हाथ वाले भाई लोगों के साथ भगवा वाले भी रात-दिन पसीने बहा रहे हैं। भारती भवन वाले भाई साहब अलग से चर्चा में मशगूल हैं। लेकिन इन सबकी नजरें दौसा वाले मीनेश वंशज भाई साहब पर टिकी हैं। भाई साहब भी गुजरे जमाने में पीली लूगड़ी के झाले से सूबे की राजनीति में धमाचौकड़ी मचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि किताब पढ़कर कमल का फूल सूंघने आए भाई साहब इन दिनों मिशन-23 के लिए नई पटकथा लिखने में व्यस्त है। इसमें मेष राशि वाले भाई साहब के साथ ही छोटे पायलट भी किरदार के रोल में दिखाई देंगे।</p>
<p><br /><strong>आप के निशाने पर</strong><br />जब से आप ने सरदारों वाले सूबे में राज की कुर्सी संभाली है, तब से रोजाना नए-नए शगूफे आ रहे हैं। इन शगूफो से मरु प्रदेश में भी हाथ वालों के साथ-साथ भगवा वालों की भी नींद उड़ी हुई हैं। उड़े भी क्यों नहीं आप वाले अंदरखाने कब क्या कर जाए, पता ही नहीं चलता है। राज का काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि आप की नजरें फिलहाल हिमाचल और गुजरात की तरफ टिकी हैं, जहां जोर लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। वहां की हवा खाने के बाद हमारे सूबे की तरफ कदम रखेगी। आप की लड़ाई भगवा से नहीं, बल्कि हाथ वालों से है, सो नफा-नुकसान से सामना भी उनको ही करना है।</p>
<p><br /><strong>लॉटरी और किस्मत</strong><br />इन दिनों सिविल लाइंस में पगफेरा करने वालों की संख्या में एकाएक बढ़ोतरी को देख कई भाई लोग चिंता में डूब गए। बैठक और चिंतन-मंथन में खोये भाई साहब पहले तो माजरा समझ नहीं पाए। जब छोटे भाई साहब ने समझाया तो लाल-पीले हो गए, लेकिन पगफेरा करने वालों पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। सिविल लाइंस से सौ कदम दूर तक रहने वाले भाई लोग भी वहां मंडराने में कोई शरम नहीं कर रहे। पगफेरा रोजाना पीसीसी के ठिकाने पर जाने वालों की नहीं बल्कि किसी न किसी के बहाने सिविल लाइंस से पुराने रिश्ते भुनाने वालों की है। राज का काज करने वाले में चर्चा है कि जब से सूबे के शिक्षा के पांच बड़े मंदिरों में ऊंची कुर्सी पर बैठने वाले वीसीज के बनने की सुगबुगाहट शुरू हुई है, तब से ही सिविल लाइंस में पगफेरा करने वालों की संख्या बढ़ी है। इन कुर्सियों के लिए सिविल लाइंस की हरी झण्डी को अहम रोल होगा, सो भाई लोग अपनी किस्मत आजमाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। यह दीगर बात है कि यह लॉटरी किस्मत वालों की ही खुलेगी।</p>
<p>         <strong> एल. एल शर्मा</strong><br /><strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 21 Mar 2022 12:05:53 +0530</pubDate>
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                <title>'राजकाज'</title>
                                    <description><![CDATA[पर्दे के पीछे की खबरें जो जानना चाहते है आप....]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/know-what-is-special-in-raj-kaj/article-6088"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-03/rajkaj4.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>चिढ़ आप से</strong><br />जब से पड़ोसी सूबे में भी आप ने असर दिखाया है, तब हाथ वालों के साथ कमल वाले भी आप शब्द बोलने से पहले आगा-पीछा सोचते हैं। पंजाब के रिजल्ट से मरु प्रदेश के लीडर्स की भी रातों की नींद और दिन का चैन काफूर हो गया और उनको भी आप शब्द से चिढ़ होने लगी है। अब देखो ना, हाथ वाले नेताजी का देवरा ढोकने पहुंचे सरहद जिले के वर्कर को गेट पर समझा दिया कि साहब को आप से बहुत चिढ़ है, से तुम कह कर बात करने में ही भलाई है। वर्कर भी स्याणा निकला, सौ सालों का बैर निकालने के मौके को लपक लिया और तू-तड़ाके से बात कर चक्रवर्ती ब्याज सहित वसूल लिया।</p>
<p><br /><strong>चर्चा में कमरा</strong><br />इन दिनों सूबे में एक कमरे की तरफ हर किसी की नजरें हैं। हो भी क्यों ना, कमरा ही ऐसा है। कमरा भी छोटी-मोटी जगह नहीं, बल्कि सूबे की सबसे बड़ी पंचायत के प्रथम तल पर बना है, उसका नंबर भी 104 हैं। नजरें इसलिए टिकती हैं कि इसमें एक कुर्सी है, जो साढ़े तीन साल से खाली है और उस पर बैठने के लिए कई पंच ऐड़ी से चोटी तक जोर लगा चुके हैं। इस कमरे को लेकर कई भाई लोगों को उम्मीद थी कि इस सत्र में उनकी नेम प्लेट जरूर लगेगी और होली पर खूब गुलाल उड़ेगी, लेकिन उनके सपनों पर पानी फिरता दिखाई दिया तो बेचारों के पास उम्मीद छोड़ने के सिवाय कोई चारा भी तो नहीं है। वैसे गुजरे जमाने में नायब सदर की इस कुर्सी की कई धुरंधर शोभा बढ़ा चुके हैं।</p>
<p><br /><strong>दिल्ली से दिल्लगी</strong><br />राज का काज करने वाले कई साहबों को अचानक दिल्ली से दिल्लगी हो गई। जबसे उनका दिल दिल्ली पर आया है, तब से दिन का चैन और रातों की नींद फुर्र हो गई। सूबे के दो दर्जन से ज्यादा बड़े साहबों को दिल्ली से प्रेम हो गया। वे दिल्ली के लिए हाथ पैर भी मारने के साथ जोड़ तोड़ भी बिठा रहे हैं। हमने भी पता लगाया तो माजरा समझ में आया कि कई बड़े साहब किसी न किसी बहाने अभी से वेटिंग सीएम से नजदीकियां बनाने के जुगाड़ में हैं। इसके लिए दिल्ली सबसे बढ़िया जगह है। अभी डेपुटेशन करा कर दिल्ली में बैठो और डेढ़ साल तक मेल मुलाकात करो। बाद में वापस आकर मनमाफिक कुर्सी के मजे लो।</p>
<p><br /><strong>तलाश अदद सीईओ की</strong><br />जब से लालकोठी स्थित पंडित दीनदयाल उपाध्याय भवन में शहरों की सरकार का ठिकाना गया है, तब से कोई न कोई कूण्डा जरूर हुआ है। और तो और पिंकसिटी के फर्स्ट सिटीजन भी राहू-केतु के चपेट में आए बिना नहीं रहते। अब देखो ना जब से सौम्य मन वाली बहनजी ने मेयर का ताज पहना है, चैन से नहीं बैठ पाई। इस भवन से अब तक एक दर्जन अफसरों को बेआबरू होकर जाना पड़ा। पुराने राज ने भी टोना टोटका करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। मेष राशि वाले ललित, लालचंद और लोकनाथ को भी लगा कर देख था, पर पार नहीं पड़ी। तुला राशि वाले आरपी एवं राजेश को टटोला तो उनको भी बैरंग लौटना पड़ा। पंडितों की सलाह पर लगाए सिंह राशि वाले दोनों एमपी भी नहीं चल पाए तो मकर राशि वाले जगरूप को संवारा गया, तो पार्षद आड़े आ गए थे। इस राज ने भी पंडितों की सलाह पर यज्ञ करने वाले मित्र और देव समान साहब को कुर्सी थमाई पर टोटका फिट नहीं बैठ रहा। अब वृष, मिथुन, कर्क, कन्या, वृश्चिक, धनु, कुंभ और मीन राशि वालों की सूची बनाई जा रही है, मगर उसमें में भी कोई न कोई रोड़ा आड़े आ रहा है।</p>
<p><br /><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />इन दिनों राज का काज करने वालों में एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा मोटा नहीं, बल्कि पिंकसिटी की पॉश कॉलोनी  में हुई एक हाई लेवल की पार्टी को लेकर है। राज का काज करने वाले कुछ साहब लोग भी पार्टी में मौजूद थे, जो माजरा देखकर सब कुछ भांपने में माहिर है। पार्टी में दोनों तरफ के नेताओं ने पकवानों का स्वाद लिया, मगर एक खेमे में कॉंफिडेंस कुछ ज्यादा ही नजर आ रहा था, जिसके छुटभैये नेताओं के भी जमीन पर पैर नहीं टिक रहे थे। दूसरे खेमे के बड़े नेता एक कौने में चुपचाप बैठे थे। बात होटल से निकल कर जेएलएन मार्ग होते हुए सचिवालय तक पहुंची तो, साहब लोगों ने अपने हिसाब से मायने निकाल लिए।</p>
<p>         <strong> एल. एल. शर्मा</strong></p>
<p>(यह लेखक के अपने विचार हैं) </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 14 Mar 2022 10:54:10 +0530</pubDate>
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                <title>जानें राज-काज में क्या है खास</title>
                                    <description><![CDATA[पर्दे के पीछे की खबरें जो जानना चाहते है आप....]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/know-what-is-special-in-raj-kaj/article-5160"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-02/rajkaj2.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>स्ट्रोक ऑफ मास्टर माइंड</strong><br />सूबे में बुध को मारे गए स्ट्रोक ऑफ मास्टटर माइंड का असर सूबे से निकल कर दिल्ली तक जा पहुंचा। पहुंचा भी इसलिए कि सूबे के साथ ही दिल्ली तक के नेताओं की रातों की नींद और दिन का चैन काफूर जो हो गया। न उनसे निगलते बन रहा है, और न ही निगलते। राज का काज करने वालों में खुसरफुसर है कि जोधपुर वाले भाई साहब के माइंड का कोई मुकाबला नहीं है। पानी पी पीकर जो करते हैं, उसके बारे में सामने वालों की सोच तक नहीं होती है। अब देखो ना, बजट में पेंशन का मास्टर स्ट्रोक मार कर सामने वालों को टेंशन दे दिया। जादूगर भाईसाहब की जब से न तो रंग लगा और न ही फिटकरी, फिर भी ऐसा चौखा रंग आ गया कि सबकी बोलती बंद हो गई।</p>
<p><br /><strong>कहीं पे निगाहें-कहीं पे निशाना</strong><br />पड़ोसी खेत के मालिक को कुछ सुनाना हो, तो समझदार लोग अपने ही बैल का सहारा लेते हैं। हमारे सूबे के राज के राजा ने भी कुछ ऐसा ही किया कि उनके लोगों को भी सब कुछ समझ में आ गया। भाईसाहब ने सूबे की सबसे बड़ी पंचायत में सामने वाली मैडम को लीडर का खिताब दिया, तो हाथ वाले भाई लोगों ने टेबिले थपथपाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भगवा वाले भाई लोग तो उसी समय समझ गए, लेकिन हाथ वालों को समझने में 24 घण्टे लग गए कि लीडर तो लीडर ही होता है, और उसकी मौजूदगी और जुबान का असर भी होता है। लीडर की दौड़ में तो कई होते हैं, लेकिन हर कोई नहीं बन पाता। सचिवालय से विधानसभा तक चर्चा है कि अशोकजी भाईसाहब के इस जुमले को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।</p>
<p><br /><strong>चिट्ठी आई है, वतन से</strong><br />आलाकमान के नाम लिखी एक चिट्ठी को लेकर हाथ वाले भाई लोगों में घमासान मचा हुआ है। इस चिट्ठी का असर इंदिरा गांधी भवन तक में दिखाई दे रहा है। चौकड़ी के चेहरों पर भी चिन्ता की लकीरें दिखाई दे रही है। चिट्ठी भी किसी छोटे-मोटे नेता ने नहीं, बल्कि दिल्ली की राजनीति में पैठ रखने वाले भाईसाहब ने लिखी है। चिट्ठी में वैसे कई बातों का उल्लेख है, मगर सबसे दमदार लाइन एक ही है, जिसमें सारा निचौड़ है। उसमें लिखा है कि दिसम्बर तक फिर से राज की उम्मीद करने वाले ही अब बराबर की टक्कर की बातें करने लगे हैं। ढाई महीने में ही सीटों की कमी की जिम्मेदारी अभी तय कर ली जाए, तो बाद में पोस्टमार्टम की नौबत नहीं आएगी।</p>
<p><br /><strong>अदला-बदली खेमों की</strong><br />भगवा वाले भाई लोगों में इन दिनों खेमों की अदला-बदली को लेकर काफी खुसरफुसर है। हो भी क्यों नहीं, मामला भी कुछ ऐसा ही है। अब देखो ना, जो गुजरे जमाने में जो भाई लोग मैडम को देख कर नजरें चुराते थे, वे आजकल अगल-बगल में खड़े नजर आते हैं। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने में भी अब संतुष्ट और असंतुष्टों के कमरे तक बदल गए। कानाफूसी है कि मैडम ने चुप रह कर जो असर दिखाया था, उसमें वे कामयाब हो गई हैं।</p>
<p><br /><strong>एक जुमला यह भी</strong><br />इन दिनों गांधीजी के तीन बंदरों का जुमला खाकी वालों के बीच जोरों पर है। गुजरे जमाने में यह जुमला खादी पर सटीक बैठता था, पर अब खाकी पर फिट है। जुमला पीएचक्यू से शुÞरू होकर सचिवालय के गलियारों तक जा पहुंचा। लंच केबिनों में भी चटकारे लगा कर सुनाया जा रहा है। हमें भी स्टेच्यू सर्किल पर खाकी वाले साहब ने सुनाया। खाकी में इन दिनों न कोई सुनता है, न कोई देखता है और न ही कोई बोलता है। वही करते हैं, जो ऊपर वालों का आदेश होता है। यानी कि वे गूंगे, बहरे और अंधे के समान हैं।<br />(यह लेखक के अपने विचार हैं)</p>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Mon, 28 Feb 2022 10:39:04 +0530</pubDate>
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                <title>राज-काज</title>
                                    <description><![CDATA[जानें राज-काज में क्या है खास]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/know-what-is-special-in-raj-kaj/article-4751"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-02/rajkaj.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>खतरे में पगड़ी </strong><br />सरदारों वाले सूबे में हो रही चुनावी जंग में खेले जा रहे दलित कार्ड की गूंज पूरे इंडिया में है। हो भी क्यों ना, हाथ वालों के साथ-साथ दूसरे दलों ने इस कार्ड को खेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि जब से भगवा वालों ने हरियाणा में नॉन जाट खट्टर को सीएम की कुर्सी संभलवाई है, उसी दिन से भाईसाहबों के ठिकाने पर हुए चिंतन-मंथन में मुहर लग गई थी कि अब पंजाब में भी नॉन पगड़ीधारी की लॉटरी लगाने में कोई रोड़ा नहीं है। यानि कि पंजाब में पगड़ीवालों की लाज खतरे में पड़ती दिख रही है।</p>
<p><br /><strong>अब आसरा बाबाओं का</strong><br />इन दिनों योगीजी वाले पड़ोसी सूबे में बाबाओं की खूब महिमा हो रही है। महिमा होने के पीछे का कारण भी सबके समझ में आ रहा है। खुद बाबाजी ने अपनी जीत के लिए बाबाओं का फार्मूला जो अपनाया है। अब देखो ना, परशुराम वंशजों की लाल आंखों के चलते योगी बाबा ने दुबारा राज में आने के लिए क्षत्रियों के साथ बाबाओं को एक करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हर मंदिर में एक आध्यात्मिक शक्ति काम कर रही है, इसके लिए एक-एक बाबा मंत्रोच्चारण करने में लगा हुआ है। दिल्ली दरबार की नजर भी इन बाबाओं पर इसलिए टिकी है कि यूपी की चुनावी जंग से ही देश की पॉलिटिक्स का फ्यूचर तय होने वाला है।</p>
<p><strong><br />गई भैंस पानी में</strong><br />इन दिनों राज के कुछ रत्नों का चौघड़िया कुछ ठीक नहीं है। उनकी रातों की नींद और दिन का चैन गायब है। उनके चेहरों पर चिंता की लकीरें भी साफ दिखाई देने लगी हैं। उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के ठिकानेदार और लक्ष्मणगढ़ वाले भाईसाहब से कुछ उम्मीदें थीं, परन्तु उनके पास मुस्कुराने के सिवाय कुछ हाथ नहीं लगा। पिछले दिनों रत्नों ने अपनी मन की पीड़ा को बताने के लिए एक जाजम पर खुसरफुसर भी की, पर राज के तेवरों के सामने उनकी पार नहीं पड़ी। उन बेचारों को पता थोड़े ही था, वे जिस साहब पर निशाना साध रहे हैं, वो राज की आंखों का तारा है। रही-सही आस भी खत्म हो गई, तो दुबला होना लाजमी है। अब डिनर के बहाने आपस में बतियाते रहते हैं कि जब ऊपर वालों के यहां ही सुनवाई नहीं है, तो गई भैंस पानी में।</p>
<p><br /><strong>बेचारे हरकारे</strong><br />इस बार जो दशा हरकारों की बिगड़ी है, वह किसी सपने से भी कम नहीं है। उन्हें चारों तरफ से लताड़ के सिवाय कुछ भी नहीं मिल रहा। बेचारों के आंसू पौंछने वाले तक नहीं मिल रहे हैं। जिनके सहारे कॉलर ऊंची कर मार्केट में घूमते हैं, वो भी बगलें झांकने में ही अपनी भलाई समझते हैं। अब देखो ना रात दिन राज के गीत गाने के बाद भी बताशों की जगह दुत्कार ही पल्ले पड़ती है। राज का काज करने वाले भी नहीं समझ पा रहे हैं कि आखिर माजरा क्या है। पहले चौकड़ी की सलाह से सिविल लाइंस के चारों तरफ लक्ष्मण रेखा खींची गई और अब प्रेम से बुलावा देने के बाद दुत्कार दिया जाता है। बड़ी कुर्सी को कौन सलाह दे कि हरकारों और राज का संबंध तो जन्मों-जन्मों से है। अब राज को दोष भी तो नहीं दिया जा सकता, चूंकि उनके सलाहकारों को तो अपने कामों से ही फुर्सत नहीं है। सचिवालय में खुसर फुसर है कि राज के कानों तक सच पहुंचे, तो कई चापलूसों का पत्ता साफ हो। लेकिन खांटी कहने वाले भी तो कम नहीं है, वो चौकड़ी से भी दो कदम आगे हैं। जो कुछ हो रहा है, उसे देख वे मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं। उनकी छठी इन्द्री का संकेत है कि थोड़ा ठण्डी करके खाओ, वक्त एक सा नहीं होता।</p>
<p><strong><br />एक जुमला यह भी</strong><br />आजकल राज का काज करने वालों में एक नई बहस छिड़ी हुई है। बहस का मुद्दा भी वफादारी से जुड़ा हुआ है। लंच क्लब में घण्टों चर्चा होती है कि मातहत कर्मचारी अपने आला अफसरों के बजाय नेताओं के प्रति ज्यादा वफादार हैं। कारण साफ है कि डिजायर सिस्टम में उनको मलाईदार कुर्सी भी तो वो ही संभलवाते हैं।</p>
<p><strong>      एल. एल. शर्मा<br />(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Mon, 21 Feb 2022 12:18:02 +0530</pubDate>
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                <title>जानें राज-काज में क्या है खास</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%9C-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%B8/article-4436"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-02/rajkal.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>गुस्से में नाथियां</strong><br /> सूबे में इन दिनों नाथियों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। हो भी क्यों ना, बेचारियों के नाम को बिना मतलब ही बदनाम जो कर रहे हैं। बदनाम करने वाले भी और कोई नहीं, बल्कि राज से जुड़े बड़े लोग हैं। अब देखो ना सूबे की सबसे बड़ी पंचायत के पंचों की जुबान पर भी नाथी के अलावा किसी का नाम नहीं है। नाथियों का गुस्सा भी जायज है, चूंकि हर कोई अगल-बगल वाला उसके बाड़े के साथ ही सासरे के बारे ऊट पटांग बोलने से पहले न आगा सोचते हैं और न पीछा। नाथियों की मानें तो करे कोई और भरे कोई। रीट परीक्षा से उनका दूर तक कोई लेना-देना नहीं, फिर भी भाई लोग उछल-उछल कर उनके नाम को बदनाम कर रहे हैं। नाथियों का गुस्सा भी जायज है, चूंकि पाली के रोहट वाली नाथी तो दानशीलता की साक्षात देवी थी, उसके बाड़े के बाहर मदद लेने वालों की लम्बी लाइनें लगती थीं।</p>
<p><strong><br /> दिल के अरमां आंसुओं में.....</strong><br /> सूबे के हाथ वाले कई नेता इन दिनों मन ही मन एक गाना गुनगुना रहे हैं। बेचारे इसे दूसरों को सुना भी नहीं सकते। चालीस साल पहले सलमा आगा का गाया यह गाना गुनगुनाने की मजबूरी भी है। तीन साल से दिन-रात देखे सपने अधूरे रह गए। राज ने उनको नियुक्तियां तो दे दी, पर रुतबा नहीं मिलने से सारा गुड़ गोबर हो गया। कुछ भाई लोगों ने शनि को बेमन से कुर्सियां भी संभाल ली, लेकिन उनकी चाल-ढाल ने सब कुछ पोल दी। अब उनके सामने सब्र के सिवाय कोई चारा भी तो नहीं है। अब उनको कौन समझाए कि न मामा के बजाय तो काणा मामा ही ठीक है।</p>
<p><br /> <strong>बचपन बनाम पचपन</strong><br /> नमोजी का भी कोई सानी नहीं है। अपने स्वार्थ के लिए कब किसकी तारीफ कर दें, कोई पता नहीं। जो समझदार है, वो तो उनकी चाल को समझ जाते हैं, और जो नहीं समझे, वो तो अनाड़ी ही हैं। अब देखो ना नमोजी को एक मारवाड़ी ने सलाह दे दी कि दुश्मन को मात देनी है, तो हमेशा उसके कमजोर घोड़े की तारीफ करो, ताकि वह उसी पर बैठे। सलाह और वो भी मारवाड़ी की। नमोजी के गले नहीं उतरे, यह तो कतई संभव नहीं है। सो एक मकसद के साथ नमोजी ने अपने कांग्रेस के राजकुमार को जिन्दा रखने के लिए उसकी तारीफ में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। अब बेचारे कांग्रेसियों के पास राहुल के बचपन की जीत मानने के सिवाय कोई चारा भी तो नहीं है।</p>
<p><strong><br /> बड़े बेआबरू होकर निकले</strong><br /> इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के ठिकाने पर इन दिनों एक गाना गुनगुनाने वालों की संख्या में एकाएक इजाफा हो गया। और तो और गाने के पर्दे के पीछे की कहानी भी ठहाके लेकर सुनाई जा रही है। बीकाजी की नगरी से जुड़े भाई साहब ने बड़ी उम्मीदों से सात साल पहले हाथ वालों से हाथ मिलाया था। भाईसाहब भी छोटे-मोटे नहीं, बल्कि काफी सुशील हैं। खुद ने भी घाट-घाट का पानी पीकर पिंकसिटी के साथ दौसा वालों तक को भी छक कर पानी पिलाया था। कुछ महीनों तक जोधपुर वाले अशोकजी भाईसाहब से कदम से कदम मिलाकर चले थे, लेकिन उनसे थोड़े दिनों में ही मुंह फेर कर छोटे पायलट के जहाज में सवार हुए। जब पायलट साहब के जहाज में भी मौजी नहीं आई, तो हाथ वालों को अलविदा कहने में तनिक भी देर नहीं की। अब भाईसाहब जब भी ठिकाने के सामने से गुजरते हैं तो उन्हें देख भाई लोग बड़े बेआबरू होकर निकले तेरे कूंचे से बोल वाला गाना गुनगुनाना शुरू कर देते हैं।</p>
<p><strong><br /> एक जुमला यह भी</strong><br /> इन दिनों हाथ वाले भाई लोगों में एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि 96 और 108 की संख्या को लेकर है। जुमला है कि हाथ वाली पार्टी में इन दिनों कामकाज का आकलन किया जा रहा है। आकलन भगवा वालों से नहीं, बल्कि अपनों से हो रहा है। इंदिरा गांधी भवन में हाथ वालों के ठकाने पर चर्चा है कि इन 108  के बजाय वे 96 बढ़िया थे, जो मजबूती से राज करने की भूमिका में थे। दूसरे दलों के लोगों को गले लगा कर भी जोधपुर वाले भाईसाहब के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सूबे के इतिहास के पन्नों में नाम दर्ज करा गए। अब हाल उलटा है, सरकार की उपलब्धियों को गिनाने के बजाय खुद की पार्टी की जड़ काटना अपनी कर्तव्य समझ रहे हैं।</p>
<p>  <strong>        एल. एल. शर्मा<br /> (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>]]></content:encoded>
                
                

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                <pubDate>Mon, 14 Feb 2022 11:14:09 +0530</pubDate>
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