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                <title>राजस्थान की सरकारी वेबसाइट्स की सुरक्षा के लिए बनेगा अति-आधुनिक साइबर शील्ड</title>
                                    <description><![CDATA[राजस्थान सरकार ने साइबर सुरक्षा को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाने शुरू कर दिए हैं]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/over-modern-cyber-shield-will-be-built-for-the-protection-of/article-112913"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-06/col-rajyavardhan-rathore.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। राजस्थान सरकार ने साइबर सुरक्षा को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। प्रदेश की सरकारी वेबसाइट्स पर बढ़ते साइबर हमलों को रोकने के लिए आज आईटी मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने भारत के सर्वश्रेष्ठ साइबर वारियर्स और DOIT (डिपार्टमेंट ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी) के अधिकारियों के साथ अहम बैठक की।</p>
<p>बैठक में मंत्री राठौड़ ने कहा कि सरकारी वेबसाइट्स को हैकिंग से बचाने के लिए एक फुल प्रूफ प्लान तैयार किया जाएगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि DOIT अब स्किल अपग्रेडेशन पर फोकस करेगा और कर्मचारियों को हाई-लेवल टेक्नोलॉजी ट्रेनिंग प्रदान करेगा। राज्य में अत्याधुनिक साइबर शील्ड बनाने की योजना पर काम शुरू हो गया है, जो सरकारी वेबसाइट्स की सुरक्षा के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन की जाएगी। यह शील्ड न केवल वर्तमान तकनीकी खतरों को निष्प्रभावी करेगी बल्कि भविष्य के साइबर खतरों के लिए भी तैयार रहेगी। इस पहल को राजस्थान की डिजिटल सुरक्षा को सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। मंत्री राठौड़ ने कहा कि राज्य को तकनीकी और कौशल दोनों क्षेत्रों में सशक्त बनाना जरूरी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 03 May 2025 17:24:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जेड श्रेणी की सुरक्षा से बची सब्जियों की जान, बारिश से खेतों में मौजूद सब्जियों को नहीं हुआ नुकसान</title>
                                    <description><![CDATA[तेज बरसात में कारगर साबित हुई प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक ।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/z-category-protection-saved-the-lives-of-vegetables/article-101097"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2025-01/257rtrer26.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय होने के कारण कोटा जिले में बुधवार रात को तेज बरसात खेतों में मौजूद सब्जियों की फसल के लिए आफत बन सकती थी, लेकिन प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक सब्जियों के लिए जेड श्रेणी की सुरक्षा साबित हुई और कोई नुकसान नहीं हो पाया। इस तेज सर्दी के मौसम में बरसात से सब्जियों का उत्पादन प्रभावित होने की संभावना बन गई थी। किसानों द्वारा उद्यान विभाग की मल्चिंग तकनीक से पौधों को सफेद प्लास्टिक से कवर करने से उनकी सुरक्षा हो गई है। अब कोटा जिले में मौसम की मार से परेशान किसान मल्चिंग खेती की ओर कदम बढ़ा रहे है। इससे न केवल उनकी फसल का उत्पादन बढ़ रहा है वहीं उनके खेती के खर्चे में भी कमी आने लगी है। </p>
<p><strong>उत्पादन और आमदनी में हो रहा इजाफा</strong><br />जिले में सैकड़ों बीघा भूमि के खेतों में किसान अब इसी तर्ज पर मिर्च, करेला, आलू व टमाटर की खेती कर रहे हैं। कृषि एक्सपर्ट का मानना है कि इस तकनीक से किसान के खेत में खरपतवार भी नहीं होती है जिससे उसे खरपतवार हटाने के लिए खुदाई की जरूरत भी नहीं पड़ती है। अब सैकड़ों किसान इस तकनीक से फसल उत्पादन कर रहे है। मल्चिंग तकनीक का अर्थ अपनी फसल को पूरी तरह से सफेद प्लास्टिक के कवर करके उसकी सुरक्षा करना है। इससे पौधों की ग्रोथ में बढ़ोतरी हो रही है और ग्रोथ अच्छी होने से फसल का उत्पादन भी बढ़ने लगा है। इससे किसानों की आमदनी भी अन्य तरकीब से होने वाली आमदनी के बजाय दोगुनी होने लगी है।</p>
<p><strong>पाले से सुरक्षा, शीतलहर का झंझट समाप्त</strong><br />प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक से फसल की पौध को ऊपर की ओर प्लास्टिक से ढंकने के कारण सर्दी के मौसम में पाला पड़ने से सुरक्षा मिल रही है। वहीं शीत लहर से भी फसल को बचाया जा रहा है। उक्त प्लास्टिक सफेद व पारदर्शी होने से सूरज की किरणें भी पर्याप्त मात्रा में पौधों तक पहुंचने के कारण पौधे की बढ़ोतरी में कोई नुकसान नहीं हो रहा है। इस तरकीब को अपनाने से फसल के पौधे के चारों तरफ उगने वाले खरपतवार नहीं होने से खरपतवार हटाने के लिए लगने वाले मजदूर की आवश्यकता नहीं पड़ती है। साथ ही खरपतवार हटाने के लिए रासायनिक दवा की आवश्यकता भी नहीं होती है। इसी प्रकार फसल में किसानों की ओर से दिया जाने वाला रासायनिक खाद व गोबर की खाद भी बूंद- बूंद सिंचाई के साथ देने से खर्च में कमी आती है। </p>
<p><strong>शीत ऋतु में नुकसान का खतरा अधिक</strong><br />कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार जब शीतऋतु में तापमान काफी नीचे गिर जाए और दोपहर बाद अचानक हवा का बहाव बन्द हो जाए व आसमान साफ रहे तो उस रात तेज सर्दी पड़ने के संकेत है। तेज सर्दी के कारण फसलों, फलवृक्षों, सब्जियों के तनों, पत्तियों, फूलों तथा फलों में उपस्थित द्रव बर्फ के रूप में जम जाता है, जो सूर्य की रोशनी से पिघलना शुरू होती है। इससे पौधों के इन भागों की कोशिकाएं फट कर नष्ट हो जाती है। जिससे पौधों की पत्तियां झुलसी हुई नजर आती है और फल व फूल झड़ जाते हैं। इससे सब्जी फसलों का उत्पादन प्रभावित हो जाता है और किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है।</p>
<p>हर बार सर्दी में बरसात के कारण सब्जियों की फसल को काफी नुकसान पहुंंचता था। इस साल प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक से पौधों को सुरक्षा प्रदान की गई थी। इस कारण तेज बरसात में भी सब्जियों की पौध को कोई नुकसान नहीं हो पाया।<br /><strong>- शिवरतन मीणा, किसान</strong></p>
<p>अब कोटा जिले में मौसम की मार से परेशान किसान मल्चिंग खेती की ओर कदम बढ़ा रहे है। इससे न केवल उनकी फसल का उत्पादन बढ़ रहा है वहीं उनके खेती के खर्चे में भी कमी आने लगी है। तेज बरसात, पाला और शीतलहर से पौधों को सुरक्षा मिलती है। <br /><strong>- एन.बी. मालव, उपनिदेशक, उद्यान विभाग कोटा</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Jan 2025 15:16:10 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>टाइगर के बराबर प्रोटेक्शन का अधिकार फिर भी बेकद्री का शिकार </title>
                                    <description><![CDATA[रिहायशी इलाकों में आने से रोकने को लेकर कोई एक्शन प्लान नही ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/has-equal-protection-rights-as-tiger-but-still-is-a-victim-of-neglect/article-89856"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-09/pze-(2)8.png" alt=""></a><br /><p>कोटा। वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 के तहत मगरमच्छ को सुरक्षा व संरक्षित का उतना ही अधिकार है, जितना टाइगर को है। क्योंकि, दोनों ही एनिमल शेड्यूल-1 में संरक्षित है। इसके बावजूद  मगरमच्छ बेकद्री का शिकार हैं। इनके प्राकृतिक आवास व फूड-चैन को सुरक्षित रखने, नेचुरल हैबीटाट डवलपमेंट व रिहायशी इलाकों में आने से रोकने को लेकर अब तक वन्यजीव विभाग द्वारा कोई एक्शन प्लान तैयार नहीं किया गया। नतीजन, शेड्यूल वन एनीमल मगरमच्छों का गंदे सीवरेज के नाले बसेरा बन गए। वहीं, सुरक्षा दीवार नहीं होने से यह रिहायशी इलाकों में आ रहे हैं। जिससे इंसान और वन्यजीवों के बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है। वहीं, अनहोनी का खतरा बना रहता है। </p>
<p><strong>रायपुरा नाले में सीवरेज, 5 दर्जन से ज्यादा मगरमच्छ</strong><br />नेचर प्रमोटर एएच जैदी बताते हैं, रायपुर का नाला बेहद गंदा है। जिसमें सीवरेज व फैक्ट्रियों के अपशिष्ट पदार्थ गिरते हैं। नाले का गंदा पानी आगे जाकर चंद्रलोही नदी से चंबल में गिरता है। यह नाला करीब डेढ़ से दो किमी लंबा और 20 फीट चौड़ा है। जिसमें 5 दर्जन से अधिक मगरमच्छों का बसेरा है, जिनकी लंबाई 3 से 15 फीट तक है। हालात यह हैं, गंदगी के कारण मगरमच्छ का प्राकृतिक रंग सफेद हो चुका है। इस नाले के पास से गुजरते वक्त लोगों का सांस लेना तक मुश्किल हो जाता है। ऐसे दूषित पानी में रहने से मगरमच्छों का सरवाइवल रेट प्रभावित हो सकता है।</p>
<p><strong>चंद्रलोही नदी में मिल रहा नाले का गंदा पानी</strong><br />स्थानीय निवासी भैरवलाल व पप्पू कुमार ने बताया कि रायपुरा नाले की लंबे समय से सफाई नहीं हुई। वर्तमान में यह गंदगी व कचरे से अटा होने से इसकी गहराई बहुत कम हो गई। फैक्ट्रियों का रसायनयुक्त दूषित पानी भी इसी नाले में प्रवाहित होता है।  नाले का गंदा पानी रायपुरा, देवली अरब व राजपुरा होते हुए चंद्रलोही नदी में मिल रहा है। जहां जलीय जीव-जंतुओं के जीवन पर भी खतरा मंडरा रहा है। </p>
<p><strong>इंसानों पर हमला कर चुका मगरमच्छ   </strong><br />वन्यजीव प्रेमी जुनेद शेख ने बताया कि कुछ वर्षों पहले  रायपुरा नाले के किनारे बाड़ियां हैं, जहां सब्जियों की खेती कर रहे एक किसान पर मगरमच्छ ने हमला कर कर लहुलुहान कर दिया था। किसान का एक पैर जख्मी हो गया था। वहीं, 20 वर्ष पहले देवली अरब में नाले किनारे एक चबुतरा बना हुआ था। जहां एक महिला अपने बच्चे को बिठाकर कपड़े धो रही थी तभी मगरमच्छ ने बच्चे पर हमला कर दिया था।  </p>
<p><strong>इंसान और मगरमच्छ दोनों की जान को खतरा</strong><br />वन्यजीव प्रेमी हेमेंद्र कुमार बताते हैं, रायपुरा नाले से 100 फीट की दूरी पर ही आबादी क्षेत्र है। नाले के किनारे रायपुरा, देवली अरब राजपुरा, बोरखेड़ा सहित कई कॉलोनियां बसी हैं। नाले की फेंसिंग नहीं होने से यह पानी से बाहर निकल जाते हैं। जिससे इंसान व वन्यजीव में संघर्ष की स्थिति बन जाती है। रेस्क्यू टीम के अनुसार, हर साल रिहायशी इलाकों से 70 से 80 मगरमच्छों का रेस्क्यू करते है। वर्तमान में अप्रेल से अब तक 35 से ज्यादा मगरमच्छों का रेस्क्यू किया जा चुका है। कई बार लोग अपने बचाव के लिए मगरमच्छों पर पत्थरों से हमला भी कर देते हैं। वन विभाग की लापरवाही से दोनों की जान का खतरा बना रहता है। </p>
<p><strong>मगरमच्छ को मारने पर 7 साल की सजा</strong><br />मगरमच्छ शेड्यूल-1 श्रेणी का वन्यजीव है। इसे नुकसान पहुंचाने या मारने पर गैर जमानती 7 साल की सजा का प्रावधान है। जबकि, जुर्माने का कोई प्रावधान नहीं है।</p>
<p><strong>वन्यजीव प्रेमियों ने दिए सुझाव </strong><br />- नाले से नदी तक के किनारे चारों तरफ तार फेंसिंग करवाकर क्रोकोडाइल प्वाइंट डवलप किया जाए। साथ ही जगह-जगह चेतावनी बोर्ड लगाए जाएं।<br />- नदी-नालों की सफाई करवाकर नेचुरल हैबीटॉट डवलप हो।<br />- एक से ज्यादा क्रोकोडाइल रेस्क्यू टीम बनाई जाए। <br />-वन्यजीव विभाग रेस्क्यू के दौरान मगरमच्छों पर टेगिंग करवाएं। <br />- नहर व नालों में मृत जीव-जंतु, जानवर, मटन-चिकन के अवशेष व खाद्य सामग्री न फेंकी जाए। <br />- जब मगरमच्छों को भोजन नहीं मिलेगा तो वह आबादी क्षेत्रों से सटे नहर-नालों में नहीं आएंगे। <br />- इनके संरक्षण व भोजन की नियमित व्यवस्था की जाए। </p>
<p><strong>इनका कहना है</strong><br />बेकद्री जैसी कोई बात नहीं है। इस नाले की सफाई होना जरूरी है। मौका स्थिति देख मगरमच्छों के संरक्षण के बेहतर प्रबंधन के लिए प्रस्ताव तैयार करवाकर उच्चाधिकारियों को भिजवाया जाएगा। <br /><strong>-अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग</strong></p>
<p>मौका स्थिति दिखवाकर मामले की जानकारी लेंगे। मगरमच्छों के उचित संरक्षण के लिए प्रस्ताव तैयार करवाएंगे। साथ ही फेंसिंग करवाकर आसपास चेतावनी बोर्ड भी लगवाएंगे, ताकि, मगरमच्छ आबादी क्षेत्र में न आ सके। रेस्क्यू के लिए  टीमें 24 घंटे तैनात हैं। <br /><strong>-रामकरण खैरवा, संभागीय मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्र निदेशक, वन विभाग कोटा </strong></p>
<p><strong>क्या कहते हैं वन्यजीव प्रेमी</strong><br /><strong>क्रोकोडाइल प्वाइंट बनाकर करें सुरक्षित  </strong><br />रायपुरा नाला चंद्रलोही नदी से होते हुए चंबल से जुड़ा है। 2 किमी लंबे नाले में 5 दर्जन से अधिक व चंद्रेसल मठ के पास चंद्रलोही नदी के 200 मीटर के क्षेत्र में बड़ी संख्या में मगरमच्छों की संख्या है। जिनके संरक्षण के लिए वन्यजीव विभाग को ठोस योजना बनानी चाहिए। नाले से नदी तक के किनारों से कुछ दूरी पर फैंसिग कर दी जाए तो यह सुरक्षित रह सकते हैं और ग्रामीणों का भय भी दूर हो सकता है। क्रोकोडाइल प्वाइंट बनने से न केवल पर्यटन बढ़ेगा बल्कि शेड्यूल वन के एनिमल भी संरक्षित रह पाएंगे। इससे पहले नाले की सफाई करवाई जाना जरूरी है।<br /><strong>-एएच जैदी, नेचर प्रमोटर</strong></p>
<p>आलनिया, चंद्रलोही व चंद्रेसल तीनों नदियां प्रदूषित हो रही है, जिनमें मगरमच्छ रह रहे हैं। भोजन नहीं मिलने से यह जानवरों पर अटैक करते हैं और आबादी क्षेत्र में घुसते हैं। इसे रोकने के लिए तीनों नदियों को जीवित करने की जरूरत है, जो वर्तमान में इंडस्ट्रीयल पॉल्यूशन की वजह से मृत अवस्था में है। जब पानी साफ रहेगा तो ईको सिस्टम बनेगा और फूडचैन डवलप होगा। <br /><strong>-तपेश्वर सिंह भाटी, अध्यक्ष पर्यावरण एवं मुकुंदरा समिति </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 07 Sep 2024 15:20:37 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>पाकिस्तान, अफगानिस्तान में मिले पोलियो के मरीज: 30 जून राजस्थान में एक करोड़ से ज्यादा बच्चों को सुरक्षा चक्र मिलेगा</title>
                                    <description><![CDATA[चिकित्सा विभाग के आरसीएच डायरेक्टर, डॉक्टर सुनीत राणावत ने बताया कि इस दिन प्रदेश भर में 65,000 पोलियो बूथों पर 70000 से ज्यादा चिकित्सा कर्मी लगाए गए हैं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/pakistan-polio-patients-found-in-afghanistan-june-30-more-than/article-82837"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-12/polio.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। भारत के पड़ोसी देश और राजस्थान की बॉर्डर से सटे पाकिस्तान और अफगानिस्तान में पोलियो के चार-चार मरीज मिलने के बाद राजस्थान में चिकित्सा विभाग अलर्ट मोड पर आ गया है।</p>
<p>पाकिस्तान से भारत में और हमारे यहां से पाकिस्तान में लोगों की आवाजाही के चलते राजस्थान में टीकाकरण से वंचित बच्चों पर पोलियो का खतरा मंडराने लगा है। ऐसे में 30 जून को चिकित्सा विभाग प्रदेशभर में अभियान चलाकर एक करोड़ सात लाख बच्चों को पोलियो के खिलाफ सुरक्षा चक्र प्रदान करने जा रहा है ।</p>
<p>चिकित्सा विभाग के आरसीएच डायरेक्टर, डॉक्टर सुनीत राणावत ने बताया कि इस दिन प्रदेश भर में 65,000 पोलियो बूथों पर 70000 से ज्यादा चिकित्सा कर्मी लगाए गए हैं। ये चिकित्सा कर्मी एक-एक बच्चे को पोलियो की खुराक पिलाने का काम करेंगे, जो बच्चे बूथ पर जाकर पोलियो की दवा लेने से छूट जाएंगे। उन्हें दूसरे दिन घर-घर जाकर पोलियो की दवा पिलाई जाएगी। </p>
<p>उन्होंने बताया कि देश में 2011 के बाद पोलियो का कोई भी मरीज नहीं मिला है। वही राजस्थान में वर्ष 2009 में दोसा जिले में पोलियो का अंतिम केस मिला था। इसके बाद राजस्थान पोलियो मुक्त हो चुका है लेकिन पाकिस्तान और अफगानिस्तान में पोलियो के मरीज मिलने के बाद प्रदेश में सावधानी बरतनी जरूरी है। इसलिए पोलियो की दवा पिलाने का विशेष अभियान चलाया जा रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 26 Jun 2024 19:10:55 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur ]]></dc:creator>
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                <title>Heat Wave से बचाव के लिए आपदा प्रबंधन ने जारी की एडवाइजरी</title>
                                    <description><![CDATA[हीटवेव की अर्ली वार्निंग डिसेमेनिशन को पीएचसी, सीएचसी, जिला अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों से कनेक्टिविटी पहुंचाई जाएगी। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/jaipur/disaster-management-issued-advisory-to-prevent-heat-wave/article-79251"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-05/heatwave.png" alt=""></a><br /><p>जयपुर। प्रदेश में भीषण गर्मी और हीटवेव से बचाव और जरूरी व्यवस्थाओं के लिए आपदा प्रबंधन विभाग ने एडवाइजरी जारी की है। एडवाइजरी के अनुसार जिला कलक्टरों और सभी विभागों को जरूरी उपकरण और दवा उपलब्ध कराने के लिए निर्देशित किया है। एडवाइजरी का मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से व्यापक प्रचार प्रसार भी किया जाएगा।</p>
<p>एडवाइजरी के अनुसार जिलों में चिकित्सा विभाग से समन्वय करते हुए हीट स्ट्रोक उपचार के लिए जरूरी उपकरणों और दवाईयों, तरल पेय पदार्थ, बर्फ आदि की उपलब्धता तय हो। चिन्हित सरकारी अस्पतालों, डिस्पेंसरी, मेडिकल कॉलेजों में डेडीकेटेड वार्डों और एम्बुलेंसों में दवा, उपकरण, डॉक्टर्स और नर्सिंग स्टाफ उपलब्धता हो। हीटवेव की अर्ली वार्निंग डिसेमेनिशन को पीएचसी, सीएचसी, जिला अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों से कनेक्टिविटी पहुंचाई जाएगी। किसी जगह पर भीड इकट्ठा होने पर संबंधित नजदीकी हेल्थ सेंटर को अलर्ट रखा जाए। धार्मिक और पर्यटन स्थलों पर पीने का पानी,छाया आदि व्यवस्थाएं होनी चाहिए। जनता से जुड़े सरकारी विभागों और भामाशाहों को प्रेरित करते हुए सार्वजनिक एवं पर्यटन स्थलों, मुख्य ट्रेफिक सिग्नलों, बस स्टैण्ड आदि पर पीने का पानी,ओआरएस पैकेट, छाया व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। नरेगा श्रमिकों को हीटवेव समय में काम के समय में बदलाव की व्यवस्था हो। निर्माण क्षेत्र, औद्योगिक क्षेत्रों और वाणिज्यिक संस्थान परिसरों में हीटवेव संबंधी बीमारियों के संबंध में ट्रेनिंग दी जाए। पशुधन के लिए चारे पानी और जरूरी दवाईयों की व्यवस्था की जाए। </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>जयपुर</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 May 2024 09:39:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Jaipur]]></dc:creator>
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                <title>5 रुपए में जंगल की सुरक्षा, रक्षक-वन बचाएं या जान</title>
                                    <description><![CDATA[ वन अपराध रोकने के लिए वनकर्मियों को डंडा दिया जाता है। जबकि माफिया हथियारों से लैस होते हैं। जब आमना सामना होता है तो वनकर्मी अपनी जान बचाए या वन सम्पदा। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/forest-protection-for-5-rupees--protector---save-forest-or-life/article-67011"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2024-01/kota-forrest.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। प्रदेश में वन विभाग 5 रुपए में प्रकृति की रक्षा करवा रहा है। सुनकर हैरानी होगी, पर यह सच है। आधुनिक युग में वनरक्षक साइकिल से जंगलात की रक्षा कर रहा है। इसके लिए उन्हें प्रतिदिन 5 रुपए साइकिल भत्ता दिया जाता है, जो महीने के हिसाब से 150 रुपए होता है। जबकि, एक वनरक्षक पर 15 से 20 वर्ग किमी वनक्षेत्र की सुरक्षा का जिम्मा होता है। साइकिल से जंगल की सुरक्षा  संभव नहीं है। समय के साथ अपराधी और अपराध का तरीका हाईटेक हो चुका है। लेकिन, विभाग अब भी साइकिल दौड़ा रहा है। आलम यह है, साइकिल पंक्चर ठीक कराने का खर्चा ही 20 रुपए है। वहीं, वन अपराध रोकने के लिए वनकर्मियों को डंडा दिया जाता है। जबकि माफिया हथियारों से लैस होते हैं। जब आमना सामना होता है तो वनकर्मी अपनी जान बचाए या वन सम्पदा। नतीजन, जंगलों में अवैध खनन, माइनिंग, पेड़ों की कटाई, अतिक्रमण, वन उपज का अवैध परिवहन अन्य घटनाएं बढ़ रही है।  </p>
<p><strong>माफियाओं से सामना तो फूल जाती है सांसें </strong><br />वन मंडल 180 वर्ग किमी तो मुकुंदरा टाइगर रिजर्व 760 वर्ग किमी के दायरे में फैला है। अकेले वनरक्षक के जिम्मे करीब 20 से 25 वर्ग किमी का वनक्षेत्र रहता है। जिसकी निगरानी के लिए विभाग द्वारा 5 रुपए साइकिल भत्ता दिया जाता है। सुरक्षा के नाम पर उन्हें हथियार तक नहीं दिया जाता। महज एक डंडे के भरोसे वन सम्पदा की रक्षा करते हैं। जबकि, जंगल में घुसपैठ करने वाले खनन माफिया समूह में होते हैं, उनके पास धारदार हथियार व बंदूकें होती हैं। </p>
<p><strong>जंगल में न नेटवर्क और न ही वॉकी-टॉकी</strong><br />फोरेस्ट गार्ड रघुवीर, सुशांत, फौजदार, घनश्याम का कहना है, वन मंडल के जंगलों में कम्यूनिकेशन की कोई सुविधा नहीं है। मोबाइल नेटवर्क नहीं मिलता और न ही वॉकी-टॉकी है। जबकि, टाइगर रिजर्व क्षेत्रों में फोरेस्ट गार्ड को वॉकी-टॉकी की सुविधा दी गई है। वहीं, करोड़ों का ई-सर्विलांस एंड एंटी पोचिंग सिस्टम, कैमरा टावर व जगह जगह ट्रैप कैमरे लगे हैं। जबकि, वन मंडल की सभी सातों रेंजों में इस तरह की कोई सुविधा नहीं है। साथ ही खुद की हिफाजद के लिए कोई आर्म्स भी नहीं है। ऐसी स्थिति में जंगल में अवैध गतिविधियां या बदमाशों द्वारा हमला किए जाने पर गार्ड मदद के लिए विभाग को सूचना तक नहीं दे पाते। </p>
<p><strong>माफिया हथियारों से लैस, वनकर्मी खाली हाथ</strong><br />जंगलों में वन सम्पदा को जमकर लूटा जा रहा है। माफिया तंत्र संगठित होने के साथ हाईटेक उपकरणों व हथियारों से लैस है। नेशनल पार्क, सेंचूरी, टाइगर रिजर्व व वनमंडल में माइनिंग, खनन, कटान, पेड़ों की कटाई सहित अन्य अवैध गतिविधियां चलती हैं। जिनकी जानकारी होते हुए भी विभाग के लिए रोक पाना मुश्किल हो जाता है। वनकर्मियों से सामना होते ही माफिया हमला कर देते हैं। प्रदेशभर में वनकर्मियों से मारपीट की कई घटनाएं हो चुकी हैं। वनकर्मियों को अपनी जान बचाने के लिए हथियार तो दूर पथराव से बचने के लिए हेलमेट तक नहीं दिए जाते। ऐसे में वनकर्मियों को अपनी जान बचाने के लाले तक पड़ जाते हैं। </p>
<p><strong>हाल ही में हुए वनकर्मियों पर जानलेवा हमले</strong><br /><strong>5 जनवरी :</strong>  कोटा शहर के अनंतपुरा इलाके में दो दर्जन हथियारों से लैस वन माफियाओं ने वनकर्मियों पर हमला कर दिया था। जिसमें एक वनकर्मि के हाथ की तीन जगहों से हड्डियां टूट गई और सिर पर चोट लगने से गंभीर घायल हो गया। </p>
<p><strong>7 जनवरी :  </strong>रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व में चौकी निर्माण के दौरान 150 लोगों ने वनकर्मियों को बंधक बनाकर लाठियों व सरियों से हमला कर दिया। सरकारी गाड़ियों में जमकर तोड़फोड़ कर दी। हमले में तीन कर्मचारी गंभीर घायल हो गए।  </p>
<p><strong>12 जनवरी :  </strong>बारां जिले के छबड़ा कस्बे में अवैध खनन कर बजरी से भरी टैÑैक्टर-ट्रॉली को चौकी पर ले जाते समय माफियाओं ने वनकर्मियों पर हमला बोल दिया। जिसमें वनकर्मी घायल हो गए और माफिया ट्रैक्टर-ट्रॉली छुड़ाकर फरार हो गए। </p>
<p><strong>2 जनवरी :  </strong>भतरपुर के डीग इलाके में स्थित अढ़ावली वनक्षेत्र में खनन कर पत्थर निकाल रहे अपराधियों को रोकने पहुंची वन विभाग की टीम पर 50-60 माफियाओं ने धावा बोल लाठियों व सरियों से हमला कर दिया। ट्रैक्टर ट्रॉली छुड़ाकर भाग गए। हमले में कई वनकर्मी घायल हो गए। </p>
<p><strong>एमपी में हथियार तो राजस्थान में क्यों नहीं?</strong><br />हम लंबे समय से सरकार से साइकिल भत्ते की जगह पेट्रोल अलाउंस  देने, वनकर्मियों को जंगल व खुद की हिफाजत करने के लिए हथियार देने की मांग कर रहे हैं। इसके लिए प्रदेश स्तर पर धरना-प्रदर्शन भी किए। राजस्थान में वन विभाग के पास कुल 147 हथियार हैं। जिनमें 104 दोनाली (12 बोर) बंदूक व 43 रिवाल्वर है। सभी हथियार जंग लगे हुए हैं। इन्हें धौलपुर, रणथम्भौर व मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में कार्यरत अफसरों को ही दिए जाते हैं। लेकिन, इन्हें भी हथियार चलाने का अधिकार नहीं है। वहीं, जंगल की सुरक्षा में तैनात वन रक्षकों को हथियार की जगह केवल डंडा ही दिया जाता है। जबकि, खनन माफिया धारदार व आधुनिक हथियारों से लैस होते हैं। <br /><strong>- भूपेंद्र सिंह जादौन, प्रदेशाध्यक्ष राजस्थान अधिनस्त वन कर्मचारी संघ </strong></p>
<p>जिस तरह मध्यप्रदेश में वन रक्षकों को जंगल की सुरक्षा के लिए हथियार व वाहन उपलब्ध करवाए गए हैं, वैसे ही राजस्थान में भी दिए जाने चाहिए।  टाइगर रिजर्व में कम्यूनिकेशन सिस्टम मजबूत करने के लिए वॉकी-टॉकी की सुविधा दी हुई, ऐसी ही सुविधा वन मंडल में भी दी जानी चाहिए। <br /><strong>- मुकेश गुर्जर, जिलाध्यक्ष राज.अधि.वन कर्मचारी संघ सवाईमाधोपुर</strong></p>
<p>एक वन रक्षक के पास 20 से 25 वर्ग किमी वनक्षेत्र की सुरक्षा का जिम्मा होता है। इतने बड़े भू-भाग की साइकिल से सुरक्षा संभव नहीं है। माफिया समूह में होता है<br /><strong>- रामस्वरूप गोचर, जिलाध्यक्ष, राज. अधि.वन कर्मचारी संघ कोटा</strong></p>
<p>फोरेस्ट के पास न तो आईपीसी की पावर है और न ही हथियार, इसलिए अपराधियों में वनकर्मियों का डर नहीं होता। जबकि, पुलिस के पास हथियार होते हैं तो अपराधी डरते हैं। जब से वन विभाग को जब्त वाहन व माल को नीलाम करने का अधिकार मिला है तब से वनकर्मचारियों के साथ मारपीट की घटनाएं अधिक होने लगी है। वन माफियाओं का तंत्र संगठित है। हालांकि, कैम्पा योजना के तहत फिल्ड स्टाफ के लिए वाहन खरीदने की अनुमति मिली है।  संघर्ष व चुनौतियां बहुत हैं फिर भी वनकर्मी वन सम्पदा की सुरक्षा को मुस्तैद है। <br /><strong>- तरुण कुमार, उप वन संरक्षक, कोटा वनमंडल</strong></p>
<p>फ्रंट लाइन वर्कर को जंगल की सुरक्षा के लिए प्रतिदिन 5 रुपए साइकिल भत्ता दिया जाता है। जबकि, माफिया लग्जरी वाहनों में वारदात अंजाम देते हैं। माफिया पलटकर हमला कर दे तो जान बचाना तक मुश्किल हो जाता है। सरकार को साइकिल की जगह पेट्रोल भत्ता दिया जाना चाहिए। <br /><strong>- बुधराम जाट, प्रदेश प्रवक्ता, राजस्थान अधिनस्थ वन कर्मचारी संघ कोटा</strong></p>
<p><strong>हथियारों से नहीं टेक्निक से होता है काम</strong><br />वाइल्ड लाइफ का मैनेजमेंट हथियारों से नहीं बल्कि टेक्निक से किया जाता है। डिवीजन में भर्ती के माध्यम से नए वनरक्षक मिले हैं। स्टाफ बढ़ने से बेहतर काम हो सकेगा। सरकार ने आईपीएस और आईएफस की रैंक एक समान मानते हुए दोनों को सुविधाएं भी एक जैसी ही दी जा रही है। लेकिन, कांस्टेबल और फोरेस्ट गार्ड की पे-ग्रेड, भत्ते सहित अन्य सुविधाओं में बहुत अंतर है। पुलिसकर्मी को हार्ड ड्यूटी व पेट्रोल एलाउंस मिलता है लेकिन वनरक्षक को नहीं मिलता। समस्याएं हैं, जिनका समाधान के लिए उच्चाधिकारियों के सामने रखेंगे। वनकर्मियों को बाइक व पेट्रोल अलाउंस मिलना चाहिए। <br /><strong>- अनुराग भटनागर, डीसीएफ, उड़नदस्ता वन्यजीव विभाग कोटा </strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 15 Jan 2024 18:11:58 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>सरिस्का मॉडल से बदल सकती है मुकुंदरा की तकदीर</title>
                                    <description><![CDATA[वर्ष 2005 में सरिस्का को बाघ विहिन घोषित किए जाने के बाद 2008 से यहां बाघों के पुनर्वास का दौर शुरू हुआ।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/sariska-model-can-change-the-fate-of-mukundra/article-44838"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2023-05/mukundara-ke-lie-sariska-ka-modal-badal-sakata-hai...kota-news-06-05-2023.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। सरिस्का टाइगर रिजर्व ने बाघ पुनर्वास व संरक्षण को लेकर प्रदेश में मिसाल कायम की है। बाघ विहिन होने के बाद 15 साल में ही फिर से 28 बाघों से आबाद हो गया और पर्यटन के नक्शे पर तेजी से उभरकर सामने आया। सरिस्का की सफलता में वाइल्ड पॉपुलेशन मील का पत्थर साबित हुई है। विशेषज्ञों का मत है कि सरिस्का मॉडल अपनाकर मुकुंदरा की तकदीर बदली जा सकती है। इसके लिए जरूरी है, जिस तरह रणथम्भौर से पांच बाघिनों को एक साथ शिफट किया गया था, उसी तरह मुकुंदरा में भी एक से अधिक बाघ-बाघिनों का पुनर्वास किया जाना चाहिए। </p>
<p><strong>2008 से शुरू हुआ बाघों के पुनर्वास का दौर</strong><br />वर्ष 2005 में सरिस्का को बाघ विहिन घोषित किए जाने के बाद 2008 से यहां बाघों के पुनर्वास का दौर शुरू हुआ। करीब 15 साल पहले रणथंभौर से बाघ लाने का सिलसिला शुरू हुआ था, यह दौर अभी जारी है। डेढ़ दशक में 11 बाघ- बाघिन रणथंभौर से सरिस्का लाए गए। इनके लिए प्रे-बेस, गांवों का विस्थापन, सुरक्षा व मॉनिटरिंग को लेकर गंभीरता से कार्य किया गया। यही कारण है कि साल दर साल सरिस्का में बाघ-बाघिन और शावकों का कुनबा बढ़ता चला गया। </p>
<p><strong>मुकुंदरा में बढ़ाई जाए वाइल्ड पॉपुलेशन</strong><br />बाघिन एमटी-4 की मौत के बाद मुकुंदरा में अब एकमात्र बाघ एमटी-5 ही बचा है। ऐसे में जल्द से जल्द रणथम्भौर से दो बाघिन लाकर बसाया जाना चाहिए। साथ ही प्रे-बेस की संख्या भी बढ़ाई जानी चाहिए। इसके अलावा मुकुंदरा के दायरे में आ रहे गांवों के विस्थापन प्रक्रिया में तेजी लाते हुए बाघों के स्वछंद विचरण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। वन्यजीव प्रेमियों ने दो बाघ और दो बाघिन लाकर जोड़ा बनाने की मांग की है। </p>
<p><strong>अब तक 99 चीतल ही आए</strong><br />मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में प्रे-बेस बढ़ाने के प्रयासों में तेजी लाने की जरूरत है। यहां 500 के करीब चीतल छोडेÞ जाने हैं। हालांकि, भरतपुर केवलादेव नेशनल पार्क से 20 दिसम्बर 2022 से 15 फरवरी 2023 तक कुल 99 चीतल लाए जा चुके हैं। जानकारी के अनुसार अब तक दो सौ से ज्यादा चीतल आ चुके हैं। शेष प्रे-बेस को भी जल्द लाने का प्रयास किया जाना चाहिए। सूत्रों ने बताया कि मुकुंदरा में प्रे-बेस की कमी है। ऐसे में जंगल से सटे गांवों से जंगल में चराई के लिए आने वाले मवेशियों का शिकार करते हैं और ग्रामीणों का जंगल में बढ़ते दखल से वन्यजीव और इंसानों के बीच टकराव की आशंका बनी रहती है। </p>
<p><strong>11 गांवों का अब तक नहीं हुआ विस्थापन </strong><br />एमएचटीआर को विकसित करने के लिए जरूरी हैं कि यहां जंगल से सटे गांवों को जल्द से जल्द विस्थापित किया जाए। वन अधिकारी गांवों में जाकर लोगों को जागरूक करें और उन्हें वन्यजीवों के महत्व से अवगत कराएं ताकि, बाघों व अन्य वन्यजीवों के स्वछंद विचरण की राह आसान हो सके। लेकिन, हालात यह है कि मुकुंदरा टाइगर रिजर्व घोषित होने के 11 साल बाद भी रिजर्व में बसे 11 गांवों का विस्थापन नहीं हो सका। यहां 14 गांवों में से अभी तक मात्र लक्ष्मीपुरा, घाटी जहांगीर व खरली बावड़ी का ही विस्थापन हो सका है, जबकि, 11 गांवों के बाशिंदे  अभी तक विस्थापन के इंतजार में हैं। हालांकि, वर्तमान में दामोदरपुरा का सर्व किया जा रहा है। वहीं, मशालपुरा गांव का विस्थापन कार्य जारी है।  जबकि, सरिस्का टाइगर रिजर्व में कुल 29 गांव बसे हैं, जिनमें से अब तक 11 गांव के 1151 परिवारों में से 848 परिवारों को विस्थापित किया जा चुका है।</p>
<p><strong>मुकुंदरा में बसे ये 14 गांव </strong><br />मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में कुल 14 गांव बसे हैं, जिनमें लक्ष्मीपुरा, खरली बावड़ी, घाटी जांगिर, मशालपुरा, गिरधरपुरा, दामोदरपुरा, दरा गांव, नारायणपुरा, कोलीपुरा, रूपपुरा, अखावा, रोजा का तालाब, अंबा रानी, नोसेरा शामिल हैं। </p>
<p>मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व में सरिस्का की तर्ज पर एक से अधिक बाघ-बाघिन लाए जाना चाहिए। हाल ही में रणथम्भौर से एक बाघिन लाने की परमिशन मिली है, जिसे जल्द से जल्द मुकुंदरा में शिफ्ट किया जाए। वहीं, अभेड़ा में पल रहे बाघिन टी-114  के दोनों शावकों को भी मुकुंदरा के सॉफ्ट एनक्लोजर में छोड़ा जाना चाहिए। उनकी 24 घंटे मॉनिटरिंग के लिए डेडीकेट स्टाफ तैनात हो। <br /><strong>- डॉ. सुधीर गुप्ता, वन्यजीव प्रेमी</strong></p>
<p>बाघ एमटी-5 के लिए बाघिन लाने की सख्त आवश्यकता है। देरी होने पर वह भटक सकता है और कहीं निकल सकता है। पूर्व में बाघिन एमटी-4 करीब ढाई साल अकेली रही, उसके लिए नर बाघ लाने में देरी हुई। ऐसी स्थिति एमटी-5 के साथ न हो, इसलिए जल्द से जल्द बाघिन शिफ्ट की जानी चाहिए। <br /><strong>- दौलत सिंह शक्तावत, सदस्य, स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड</strong></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 May 2023 15:45:35 +0530</pubDate>
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                <title>सवा रुपए में जंगल की सुरक्षा, जान बचाने के भी लाले</title>
                                    <description><![CDATA[महंगाई के इस दौर में वनरक्षक साइकिल से जंगलात की रक्षा कर रहा है। इसके लिए उन्हें प्रतिदिन सवा रूपए साइकिल भत्ता दिया जाता है, जो महीने के हिसाब से 50 रूपए होता है। जबकि, एक वनरक्षक पर 20 किमी वनक्षेत्र की सुरक्षा का जिम्मा होता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/kota/forest-protection-for-a-quarter-of-a-rupee--even-to-save-lives/article-27998"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-10/sawa-rupaye-mei-jungle-ki-suraksha-,-jaan-bachane-ke-bhi-laale...kota-news-28.10.2022.jpg" alt=""></a><br /><p>कोटा। जीवन का यही आधार, पर्यावरण ही हमारा परिवार, पेड़-पौधों में बसते भगवान, रखो ध्यान तो होगा कल्याण, चारों तरफ सन्नाटा, प्रकृति बिना ना दाल ना आटा......, ये महज स्लोगन नहीं, वन विभाग के वो दांत हैं, जो खाने के कुछ और दिखाने के कुछ ओर हैं। हाथी यूं ही बदनाम है...., असल में शातिर वन विभाग है। आखिरी पंक्ति विभाग की कथनी-करनी में फर्क बयां करती है। दरअसल, वन विभाग सवा रूपए में प्रकृति की रक्षा करवा रहा है। सुनकर हैरानी होगी पर यह सच है। महंगाई के इस दौर में वनरक्षक साइकिल से जंगलात की रक्षा कर रहा है। इसके लिए उन्हें प्रतिदिन सवा रूपए साइकिल भत्ता दिया जाता है, जो महीने के हिसाब से 50 रूपए होता है। जबकि, एक वनरक्षक पर 20 किमी वनक्षेत्र की सुरक्षा का जिम्मा होता है। लेकिन, वर्तमान में स्टाफ की कमी के कारण क्षेत्र का दायरा 50 से 60 किमी बढ़ जाता है। साइकिल से जंगल की नफरी संभव नहीं है। समय के साथ अपराधी और अपराध का तरीका हाईटेक हो चुके हैं। लेकिन, विभाग अब भी साइकिल दौड़ा रहा है। स्थिति यह है कि साइकिल के पंक्चर ठीक कराने का खर्चा ही बीस रुपए आता है।  नतीजन, जंगलातों में अवैध खनन, माइनिंग, पेड़ों की कटाई, अतिक्रमण, वन उपज का अवैध परिवहन अन्य घटनाएं बढ़ रही है।  </p>
<p><strong>सेंचूरी में वन्यजीवों के हमले का खतरा</strong><br />वाइल्ड लाइफ सेंचुरी शेरगढ़, भैंसरोडगढ़ व अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क सहित अन्य अभयारण्य जहां टाइगर नहीं है लेकिन पैंथर, लेपर्ड, सियार, भालू, जरख सहित मांसाहारी व शाकाहारी वन्यजीव की संख्या अधिक है। यहां वनरक्षक जंगल में रहकर निर्धारित 8 घंटे से ज्यादा डयूटी करता है। उसके पास न तो अवैध घुसपैठियों व शिकारियों रोकने तथा खुद की रक्षा के लिए कोई हथियार नहीं होता। माफिया तो छोड़िए कोई वन्यजीव भी हमला कर दे तो अपनी जान बचाने के भी लाल पड़ जाते हैं। जंगली जानवर से बचने के लिए धमाका करने वाली कोई खिलौना बंदूक तक नहीं होती। ऐसे में जंगल व वन्यजीवों की सुरक्षा तो दूर खुद की जान बचा लें, वो ही बड़ी बात है।</p>
<p><strong>जंगल में न नेटवर्क और न ही वॉकी-टॉकी</strong><br />वनकर्मियों का कहना है कि वन मंडल के जंगलों में कम्यूनिकेशन की कोई सुविधा नहीं है। मोबाइल नेटवर्क नहीं मिलता और न ही वॉकी-टॉकी है। जबकि, टाइगर रिजर्व क्षेत्रों में फोरेस्ट गार्ड को वॉकी-टॉकी की सुविधा दी गई है। वहीं, करोड़ों का ई-सर्विलांस एंड एंटी पोचिंग सिस्टम, कैमरा टावर व जगह जगह ट्रैप कैमरे लगे हुए हैं। जबकि, वन मंडल की सभी रेंजों में इस तरह की कोई सुविधा नहीं है। साथ ही खुद की हिफाजद के लिए कोई आर्म्स भी नहंी है। ऐसी स्थिति में जंगल में अवैध गतिविधियां या बदमाशों द्वारा हमला किए जाने पर गार्ड मदद के लिए विभाग को सूचना तक नहीं दे पाएगा। </p>
<p><strong>डंडे के भरोसे वन सम्पदा की सुरक्षा</strong><br />कोटा वन मंडल 7 रेंजों में बंटा हुआ है और करीब 180 वर्ग किमी में फैला है। अकेले वनरक्षक को बहुत बड़े इलाके की निगरानी करनी होती है। सुरक्षा के नाम पर उन्हें हथियार नहीं दिया जाता। महज एक डंडे के भरोसे वन सम्पदा की रक्षा करते हैं। जबकि, समय के साथ अपराधी और अपराध करने का तरीका हाईटेक हो चुका है। जंगल में घुसपैठ करने वाले खनन माफिया समूह में होते हैं, उनके पास धारदार हथियार व बंदूकें होती हैं। ऐसे में वन सम्पदा तो छोड़िए वनरक्षक खुद की रक्षा तक नहीं कर पाता।  </p>
<p><strong>मवेशी चराने से रोका तो वनकर्मियों पर किया हमला</strong><br />लाडपुरा रैंज की नयागांव स्थित वन चौकी में पिछले महीने ग्रामीणों ने अपने मवेशियों को चराने के लिए छोड़ दिया था। ग्रामीणों की समझाइश की तो वे भड़क उठे और वनकर्मियों से मारपीट कर वाहनों में तोड़फोड़ कर दी। जिसकी शिकायत आरकेपुरम थाने में दर्ज करवाई है। </p>
<p><strong>एक गार्ड पर 40 से 50 किमी वनक्षेत्र का जिम्मा</strong><br />राजस्थान अधिनस्त वन कर्मचारी संघ के प्रवक्ता बुद्धराम जाट ने बताया कि एक फोरेस्ट गार्ड पर नियमानुसार 20 वर्ग किमी वनक्षेत्र की सुरक्षा का जिम्मा होता है। वर्तमान में कोटा वन मंडल में 37 वनरक्षक कार्यरत हैं, जबकि कुल स्वीकृत पद 108 हैं। स्टाफ की कमी के कारण वनक्षेत्र का दायरा 40 से 50 किमी बढ़ जाता है। इतने बड़े वनक्षेत्र की सुरक्षा का जिम्मा अकेले एक गार्ड पर होता है, जो हथियार व मैन पावर के बिना संभव नहीं है। इसके अलावा साइकिल से गार्ड को अपने वनक्षेत्र के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचने में करीब तीन से चार घंटे का समय लगेगा। इस बीच जंगल में अवैध खनन, पेड़ों की कटाई, अतिक्रमण, माइनिंग सहित संदिग्ध गतिविधियां होती है तो वह कैसे रोकेगा।  </p>
<p><strong>वनरक्षक के कार्य</strong><br /> जंगल की गश्त करना।<br /> अवैध खनन, अवैध कटान, माइनिंग, संदिग्ध घुसपैठ, अतिक्रमण, शिकार, वन उपज का अवैध परिवहन रोकना।<br /> विकास कार्यों से संबंधित केएमएल फाइल बनाना।<br /> तकनीकी व गैर तकनीकी सर्वे करना।<br /> जंगल में विकास कार्य करवाना। <br /> वन्यजीवों का रेस्क्यू करना। <br /> वाहन चालकों का कार्य।<br /> जीपीएस से संबंधित कार्य।<br /> वन्यजीवों की गणना करना। </p>
<p>वनकर्मियों की मांगें वाजिब हैं। जिस तरह मध्यप्रदेश में वन रक्षकों को जंगल की सुरक्षा के लिए हथियार व वाहन उपलब्ध करवाए गए हैं, वैसे ही राजस्थान में भी दिए जाने चाहिए। वनक्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क नहीं आते, आपात स्थिति में वनरक्षक अधिकारियों से सम्पर्क नहीं हो पाता। जबकि, टाइगर रिजर्व में कम्यूनिकेशन सिस्टम मजबूत करने के लिए वॉकी-टॉकी की सुविधा दी हुई, ऐसी ही सुविधा वन मंडल में भी दी जानी चाहिए। <br /><strong>- मुकेश गुर्जर, जिलाध्यक्ष राजस्थान अधिनस्थ वन कर्मचारी संघ सवाईमाधोपुर</strong></p>
<p>वन विभाग की ओर से कार्मिकों के लिए नई बाइकें खरीदने की कोशिश की जा रही है। राजस्थान के अन्य डिविजन में बाइक खरीदी भी गई है। इसके लिए सरकार अलग से बजट देती है। कोटा डिविजन के लिए प्रयास लगातार जारी है। इसके अलावा सीएसआर के तहत जिला कलक्टर से एक रेस्क्यू वाहन की मांग की गई है, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया है। जल्द ही नया वाहन मिलने की उम्मीद  है। वहीं, वर्तमान में विभाग के पास जो हथियार हैं वो पुराने होने के कारण चलने योग्य नहीं है। वनकर्मियों को जंगल व खुद की हिफाजत के लिए पहले हथियार चलाने की ट्रैनिंग देकर नए हथियार उपलब्ध करवाए जाना चाहिए। <br /><strong> - सुबोध राजपूत, सहायक वन संरक्षक कोटा</strong></p>
<p><strong>हथियारों से नहीं टेक्निक से होता है काम</strong><br />वाइल्ड लाइफ का मैनेजमेंट हथियारों से नहीं बल्कि टेक्निक से किया जाता है। हमारी पहली प्राथमिकता स्टाफ बढ़ाना है। जिसके प्रयास किए जा रहे हैं। स्टाफ बढ़ेगा तो बेहतर ढंग से काम हो पाएगा। वहीं, सरकार ने आईपीएस और आईएफस की रैंक एक समान मानते हुए दोनों को सुविधाएं भी एक जैसी ही दी जा रही है। लेकिन, कांस्टेबल और फोरेस्ट गार्ड की पे-ग्रेड, भत्ते सहित अन्य सुविधाओं में बहुत अंतर है। पुलिसकर्मी को हार्ड ड्यूटी व पेट्रोल एलाउंस मिलता है लेकिन वनरक्षक को नहीं मिलता। समस्याएं हैं, जिनका समाधान के लिए उच्चाधिकारियों के सामने रखेंगे। रेगुलर स्टाफ की कमी पूरी करने के लिए सरकार ने जो बोर्डर व होम गार्ड के रूप में अस्थाई कर्मचारी दिए हैं, उनको अपने स्तर पर ट्रैनिंग देकर बेहतर काम करवाना मेरी प्राथमिकता में शामिल है। <br /><strong>- अनुराग भटनागर, एसीएफ, वन्यजीव विभाग व मुकुंदरा टाइगर रिजर्व कोटा</strong></p>
<p>हम लंबे समय से सरकार से साइकिल भत्ते की जगह पेट्रोल अलाउंस  देने व वनकर्मियों को जंगल व खुद की हिफाजत करने के लिए हथियार देने की मांग कर रहे हैं। इसके लिए प्रदेश स्तर पर धरना-प्रदर्शन भी किए गए।  राजस्थान में वन विभाग के पास कुल 147 हथियार हैं। जिनमें 104 दोनाली (12 बोर) बंदूक व 43 रिवाल्वर है। सभी हथियार जंग लगे हुए हैं। इन्हें धौलपुर, रणथम्भौर व मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में कार्यरत  अफसरों को ही दिए जाते हैं। लेकिन, इन्हें भी हथियार चलाने का अधिकार नहीं है। वहीं, जंगल की सुरक्षा में तैनात वन रक्षकों को हथियार की जगह केवल डंडा ही दिया जाता है। जबकि, खनन माफिया धारदार व आधुनिक हथियारों से लैस होते हैं। <br /><strong>- भूपेंद्र सिंह जादौन, प्रदेशाध्यक्ष राजस्थान अधिनस्त वन कर्मचारी संघ </strong></p>
<p><strong>मांगों का गंभीरता से कर रहे विशलेषण</strong><br />राजस्थान अधीनस्त वन कर्मचारी संघ की 14 सूत्रीय मांगें हैं। जिसे पूरा करने के लिए ज्ञापन भी दिया है। सभी मांगों पर गंभीरतापूर्वक विशलेषण कर रहे हैं। जिसे प्रभावी ढंग से राज्य सरकार के समक्ष रखा जाएगा। पिछले 10 वर्षों से हर साल वन डिविजन में कुछ बाइकें खरीदी जा रही हैं, ताकि हर रेंज व नाके पर बाइक उपलब्ध हो सके। धीरे-धीरे जो बजट उपलब्ध हो रहा है उसी के अनुरूप बाइकों की खरीद की जा रही है।     <br /><strong> - दीप नारायण पांड्य, प्रधान मुख्य वन संरक्षक जयपुर</strong></p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>कोटा</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 28 Oct 2022 15:24:07 +0530</pubDate>
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                <title>पर्यावरण प्रेमी ने परिंदों के लिए बनाए दो हजार आशियानें</title>
                                    <description><![CDATA[पर्यावरण प्रेमी हेमराज मीणा पक्षियों के रहवास के लिए पिछले 8 वर्षों में करीबन दो हजार से अधिक कृत्रिम घोंसला बना चुके हैं। इनके घर व खेत के कोने-कोने मे कृत्रिम घोंसले बना रखें है जहां से अब चिड़िया, कबूतर,मेना, तोता,कोयल सहित अन्य पक्षियों की चहचहाहट सुनाई देती है। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/bundi/environment-lover-built-two-thousand-houses-for-birds/article-23969"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-09/paryavaran-premee-ne-parindon-ke-lie-banae-do-hajaar-aashiyaanen...karwar-bundi-news-22-09-2022.jpg" alt=""></a><br /><p>करवर। नैनवां उपखंड में खजूरी पंचायत के पीपरवाला गांव निवासी पर्यावरण प्रेमी हेमराज मीणा ने खेत पर पक्षियों की सुरक्षा के लिए कृत्रिम घौंसला बना कर पक्षियों को आसरा दे रहे है। साथ ही इन परिंदों के आशियानों में दाना पानी का भी इंतजाम करते है। जिसके चलते अब चिड़ियां, कबूतर,तोता, मेना, कोयल सहित अन्य पक्षियों की चहचहाहट सुनाई देती है। पर्यावरण प्रेमी मीणा ने पक्षियों के रहवास के लिए पिछले 8 वर्षों में करीबन दो हजार से अधिक कृत्रिम घोंसलें बना चुके हैं। अपने घर की पक्षियों से भावनात्मक रिश्ता परिवार व ग्रामीणों की पक्षियों की चहचहाहट से ही नींद खुलती है। परिंदों के लिए घोंसला बनाने का बीड़ा भले ही कई वर्षों पहले मीणा ने उठाया था लेकिन अब गांव के कुछ युवा विजेन्द्र,फोरु लाल, मनीष, मीठा लाल, दिलखुश उनके साथ इस दिशा पर कदम बढ़ा रहे हैं। आधुनिकीकरण की इस दौड़ में घर के आंगन में चिड़ियों की चहचहाहट कम हो गई है। कभी पक्षी हर घर में किसी न किसी कोने में घोंसला बनाकर रहते थे।अंडे देने के बाद जब बच्चे बड़े होते तो घोंसला छोड़कर चले जाते थे पर ऐसा नजारा अब बहुत कम देखने को मिलता है। पेड़ कट रहे हैं तो वहीं अब मकान पक्के बन चुके हैं ,जहां पर पक्षी रहवास के लिए घोंसला नहीं बना पा रहे हैं। गर्मी,सर्दी,बारिश में भी पेड़ों की कमी से पक्षियों को भटकना पड़ता है। इसलिए पर्यावरण प्रेमी हेमराज मीणा ने पक्षियों के रहवास के लिए पिछले 8 वर्षों में करीबन दो हजार से अधिक कृत्रिम घोंसला बना चुके हैं।</p>
<p><strong>पक्षियों के संरक्षण के लिए परिवार का मिला सहयोग</strong><br />पक्षियों के संरक्षण के लिए हेमराज मीणा अपने परिवार के सहयोग से कृत्रिम घोंसला बनाकर पक्षियों की मदद कर रहे हैं इनका परिवार अपने स्तर पर वेस्टेज सामान खाली पीपे,कूलर की बोड़ी, बोतलें आदि का कृत्रिम घोंसला बनाकर पक्षियों को इस भीषण गर्मी,सर्दी,बारिश के मौसम में राहत पहुंचाने का काम कर रहे हैं साथ ही पक्षियों का दाना -पानी का भी विशेष ध्यान रखते हैं। प्रतिदिन पक्षियों के लिए दाना के रूप में गेंहू, बाजरा,ज्वार,दलिया आदि डालते हैं।<br /> <br /><strong>घर व खेत के कोने-कोने में कृत्रिम घोंसला</strong><br />इनके घर व खेत के कोने-कोने मे कृत्रिम घोंसले बना रखें है जहां से अब चिड़िया, कबूतर,मेना, तोता,कोयल सहित अन्य पक्षियों की चहचहाहट सुनाई देती है। पक्षियों के संरक्षण से मीणा व उनका परिवार क्षेत्र में काफी बदलाव कर रहे हैं । लोगों को प्रकृति सहेजने के साथ पक्षियों के संरक्षण का संदेश दे रहें हैं। पर्यावरण प्रेमी हेमराज मीणा अपने पुत्र आचार्य पिंकुराम मीणा व राजेश,पत्नी कमला ,पुत्रवधु मीरा के सहयोग से अब तक करीबन दो हजार से ज्यादा घोंसला बनाकर अलग-अलग जगहों पर लगा चुके हैं। मीणा ने बताया कि वह छोटी उम्र में थे तब पक्षियों के घोंसलें की ओर जाते देखकर दिमाग में आया कि इनके लिए कृत्रिम घोंसला बनाया जाना चाहिए ताकि ये सुरक्षित रह सके। इस प्लानिंग के बाद मीणा कृषि कार्य के साथ परिवार में व्यस्त हो गए लेकिन इनका पक्षियों के प्रति प्रेम कम नहीं हुआ आठ साल पहले अपने पुराने प्लान के मुताबिक कृत्रिम घोंसला बनाना शुरू किया।</p>
<p><strong>इस तरह से करते हैं तैयार</strong><br />पर्यावरण प्रेमी आचार्य पिंकुराम मीणा ने बताया कि घोंसला बनाने के लिए नारियल का छिलका, जूट की रस्सी, जूट, बोरा, बांस की पतली डंगाल,गत्ते का भी उपयोग करते हैं। प्लाईवुड से भी घोंसला बनाते हैं। वहीं खपरैल से भी घोंसला बनाते हैं।  इन घोंसलों को पेड़,घर के कोने,इनके खेत में या फिर अन्य सार्वजनिक जगहों पर रख देते हैं जहां पर चिड़ियां व अनेक प्रकार के पक्षी आते हैं। इसके आसपास किसी पात्र में दाना- पानी भी रख देते हैं। अपने खेत के कुछ हिस्से में तलाई के रुप में पानी भरा रहता है ताकि इस गर्मी में पानी के लिए पक्षियों के साथ बेजुबान जानवरों को पानी के लिए भटकना न पड़े।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>बूंदी</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 22 Sep 2022 16:10:21 +0530</pubDate>
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                <title>मानसून को देखते हुए बाढ बचाव को लेकर बैठक </title>
                                    <description><![CDATA[ मानसून को देखते हुए बाढ बचाव को लेकर उपखण्ड अधिकारी कार्यालय में एसडीएम रूबी अंसार की अध्यक्षता मे ब्लॉक स्तरीय अधिकारियों की बैठक आयोजित की गई, जिसमें मानसून को देखते हुए कोई भी अधिकारी और कर्मचारी बिना अनुमति के मुख्यालय नहीं छोडने के निर्देश दिए। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/rajasthan/tonk/meeting-regarding-flood-protection-in-view-of-monsoon/article-12736"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-06/t-21.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>टोडारायसिंह।</strong> मानसून को देखते हुए बाढ बचाव को लेकर उपखण्ड अधिकारी कार्यालय में एसडीएम रूबी अंसार की अध्यक्षता मे ब्लॉक स्तरीय अधिकारियों की बैठक आयोजित की गई, जिसमें मानसून को देखते हुए कोई भी अधिकारी और कर्मचारी बिना अनुमति के मुख्यालय नहीं छोडने के निर्देश दिए। बैठक में विकास अधिकारी हरिश चंद शर्मा को निर्देशित करते हुए कहा कि प्रत्येक ग्राम पंचायत मुख्यालय पर दो सौ कट्टे मिट्टी के भरवाने, गैती, फावडा, रस्सी, पम्प सेट, टार्च सहित अन्य संसाधनों की व्यवस्था करें।</p>
<p>इसी प्रकार पंचायत समिति स्तर पर 5 सौ कट्टे मिट्टी के भरवाने तथा गांव बनकाखेडा, रिण्डलिया रामपुरा, पंद्राहेडा तालाबों के जलग्रहण क्षेत्र मे हो रहे अवरोध को हटाने तथा मोरियों की सफाई कर चाबी ग्राम विकास अधिकारी के पास रखने के निर्देश दिए है। इसी प्रकार नगरपालिका को तीन दिवस मे कस्बे के सभी छोटे बडे नालों की सफाई करने तथा मुख्यालय पर एक हजार मिट्टी से भरे कट्टे रखने के निर्देश दिए हैं। सिंचाई विभाग के सहायक अभियंता व कनिष्ठ अभियंता को अधीन चारों बांधों का भ्रमण कर उनकी मोरियों के ग्रीस आयल करने तथा सफाई करने के निर्देश दिए हैं। बैठक में अन्य विभागों के अधिकारियों व कर्मचारियों को मानसून के दौरान राहत कार्य में सहयोग करने तथा बिना अनुमति के मुख्यालय नहीं छोडने के निर्देश दिए हैं। बैठक में तहसीलदार धर्मेन्द्र मीणा, नायब तहसीलदार, विकास अधिकारी हरिश चंद शर्मा, बीईईओ राजेंद्र प्रसाद शर्मा, कृषि सहायक अधिकारी हरिसहाय शर्मा, बीसीएमओ डॉक्टर रोहित डण्डोरिया, सीडीपीओ सहित अन्य अधिकारी व कर्मचारी उपस्थिति थे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>टोंक</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Jun 2022 11:38:56 +0530</pubDate>
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                <title>नागरिक सुरक्षा और मानवाधिकारों के सम्मान हेतु रूस-यूक्रेन युद्ध जल्द रोका जाए: गुटेरेस</title>
                                    <description><![CDATA[ संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने यूक्रेन में हिंसा पर तत्काल रोक लगाने का आह्वान किया है। गुटेरेस ने  यूक्रेन में रूस के आक्रमण के 100वें दिन शुक्रवार को कहा,  मैं सभी जरूरतमंद लोगों के लिए मानवीय सहायता पहुंचाने के लिए, लड़ाई के क्षेत्रों में फंसे नागरिकों की सुरक्षित निकासी के लिए, नागरिकों की तत्काल सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार मानवाधिकारों के सम्मान हेतु हिंसा को तत्काल रोकने का आह्वान करता हूं। ]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/world/russo-ukraine-war-should-be-stopped-soon-for-civil-protection-and/article-11304"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2022-06/united-nations.jpg" alt=""></a><br /><p></p>
<p></p>
<p>न्यूयार्क। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने यूक्रेन में हिंसा पर तत्काल रोक लगाने का आह्वान किया है। गुटेरेस ने  यूक्रेन में रूस के आक्रमण के 100वें दिन शुक्रवार को कहा,  मैं सभी जरूरतमंद लोगों के लिए मानवीय सहायता पहुंचाने के लिए, लड़ाई के क्षेत्रों में फंसे नागरिकों की सुरक्षित निकासी के लिए, नागरिकों की तत्काल सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार मानवाधिकारों के सम्मान हेतु हिंसा को तत्काल रोकने का आह्वान करता हूं।<br /><br />उन्होंने कहा कि संघर्ष ने पहले ही हजारों लोगों की जान ले ली है। काफी तबाही मचाई है। लाखों लोगों को विस्थापित किया है। इसके कारण मानवाधिकारों का अस्वीकार्य उल्लंघन हुआ है। इसके कारण  भोजन, ऊर्जा और वित्त की समस्या उत्पन्न हो रही है, जो कमजोर लोगों, देशों और अर्थव्यवस्थाओं के लिए सबसे ज्यादा तबाही मचा रहा है।<br /><br />उन्होंने कहा,   संयुक्त राष्ट्र मानवीय प्रयासों के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन जैसा कि मैंने शुरू से ही जोर दिया है, इस संघर्ष को हल करने के लिए बातचीत की आवश्यकता होगी। जितनी जल्दी पार्टियां इस युद्ध को समाप्त करने के लिए अच्छे कूटनीतिक प्रयासों में शामिल होंगी, यूक्रेन, रूस और दुनिया के लिए उतना ही बेहतर होगा।  संरा ऐसे सभी प्रयासों का समर्थन करने के लिए तैयार है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>दुनिया</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jun 2022 14:46:13 +0530</pubDate>
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                <title>बचाव है जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[लगता है कोरोना की पहली और दूसरी लहर की त्रासदी से भारत की बड़ी आबादी सरकारों व राजनीतिक दलों ने कोई सबक नहीं लिया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://dainiknavajyoti.com/opinion/%E0%A4%AC%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B5-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%9C%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%80/article-3258"><img src="https://dainiknavajyoti.com/media/400/2021-12/corona3.jpg" alt=""></a><br /><p>लगता है कोरोना की पहली और दूसरी लहर की त्रासदी से भारत की बड़ी आबादी सरकारों व राजनीतिक दलों ने कोई सबक नहीं लिया है। जब से कोरोना के नए रूप ओमिक्रॉन का मामला सामने आया था, तभी हमारे कई विशेषज्ञों व विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दे दी थी कि अगर समय रहते पर्याप्त इंतजाम नहीं किए और इस पर नियंत्रण नहीं रखा गया तो यह खतरनाक रूप धारण कर सकता है। ओमिक्रॉन की जानकारी सामने आने के बाद भी देश की बड़ी आबादी सावधानी बरतना जरूरी नहीं समझ रही है। ऐसा होने से अब ओमिक्रॉन ने देश के विभिन्न भागों में अपने पैर पसारने शुरू कर दिए हैं। शुरू में कर्नाटक सहित कुछ राज्यों में ओमिक्रॉन की मौजूदगी की जानकारी मिली थी लेकिन अब यह कई राज्यों में फैल गया है। अब तक इसके संक्रमितों की संख्या 39 तक के आंकड़े को पार कर गई है। कोरोना वायरस का हर रूप धीरे-धीरे ही पांव पसारत हुआ व्यापक रूप धारण कर लेता है, ऐसा हमारा पिछला अनुभव भी बताता है। ओमिक्रॉन के खतरे के संदर्भ में केन्द्र सरकार ने राज्य सरकारों व नागरिकों को चेताया है कि मास्क के उपयोग को अनिवार्य बनाएं। जिनके दोनों टीके लग चुके हैं उन्हें भी मास्क लगाने की सख्त जरूरत है, क्योंकि ओमिक्रॉन से बचाव के लिए टीका नाकाफी साबित होता देखा जा रहा है। केन्द्र की चेतावनी उचित है लेकिन पर्याप्त नहीं है। कई राज्यों विशेषकर उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में अगले साल फरवरी में विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनाव प्रचार के दौरान होने वाली भीड़ में राजनीतिक रैलियों से संक्रमण का खतरा ज्यादा बढ़ने की संभावना है। ऐसा पहले हो चुका है। केन्द्र, राज्य सरकारों व विशेषकर चुनाव आयोग को इसके लिए विशेष निर्देश व पाबंदियां लगा देने की सख्त जरूरत है। जो लोग मास्क नहीं लगाते हैं उनके खिलाफ भी सख्ती बरतने की जरूरत है। हमारे देश में 80 प्रतिशत लोग मास्क की उपेक्षा करते देखे जा रहे हैं जबकि जापान व दक्षिण कोरिया में 92 प्रतिशत लोग मास्क का उपयोग कर संक्रमण के फैलाव से अपने देशों को बचा रहे हैं। ओमिक्रॉन को हल्के में कहना खतरनाक है। इसे समय रहते नियंत्रण में रखना देश व समाज के हित में है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपिनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Dec 2021 14:12:02 +0530</pubDate>
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