वर्ल्ड पॉपुलेशन डे: जिंदगी खूबसूरत है, लेकिन जब ये बोझ बन जाए तो!

अपनी इच्छाओं को मार के जीना भी कोई जीना है। परिवार छोटा तो देश का हर परिवार सुखी।

वर्ल्ड पॉपुलेशन डे: जिंदगी खूबसूरत है, लेकिन जब ये बोझ बन जाए तो!

सोचने पर मजबूर है दुनियां दानिश, जिंदगी तेरा वजूद क्या, आबाद है देश वही जो बढ़ती आबादी का ख्याल रखे। जनसंख्या पर नियंत्रण या घटते हुए संसाधनों पर चिंता करने से क्या ये सवाल, ये समस्या हल हो जाएगी।

जयपुर। सोचने पर मजबूर है दुनियां दानिश, जिंदगी तेरा वजूद क्या, आबाद है देश वही जो बढ़ती आबादी का ख्याल रखे। जनसंख्या पर नियंत्रण या घटते हुए संसाधनों पर चिंता करने से क्या ये सवाल, ये समस्या हल हो जाएगी। समय-समय पर ये सवाल उठता रहा है, जिन्हें फिल्मों ने अपने तरीके से आम लोगों के सामने रखा। आज हम ऐसी ही कुछ फिल्मों का जिक्र करेंगे, जो परिवार  के माध्यम से देश को जागरूक करती हैं।

दंगल: ये फिल्म इस सोच का खंडन करती है कि बेटे की चाहत में बेटियां पैदा करते जाओ क्योंकि बेटा न हुआ तो वंश, नाम खत्म हो जाएगा। बेटियां भी ये काम गर्व के साथ कर सकती हैं।

परिवार: बढ़ते परिवार का बोझ जब बढ़ता जाता है तो इंसान टूट जाता है। सीमित परिवार ही सुखी परिवार होता है, उसे रोकने के लिए जो भी कदम उठाने पड़े उठाने चाहिए।

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पिया का घर: ये फिल्म भी छोटे घरों में बड़े परिवार की समस्या को उजागर करती है। अपनी इच्छाओं को मार के जीना भी कोई जीना है। परिवार छोटा तो देश का हर परिवार सुखी।

जल:  पानी की समस्या और पर्यावरण को बढ़ती हुई आबादी की दुविधा से जोड़ के दर्शाती है ।

कड़वी हवा: आबादी और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के बीच असंतुलन के दुष्प्रभाव ये फिल्म दिखाती है।

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कृष 3: ये फिल्म वायरस और घनी आबादी वाले देशों में होने वाले भयंकर दुष्परिणामों पर इसके पड़ने वाले सीधे असर को दिखाती है, जो हमने कोरोना काल में भी देखा कि घनी आबादी के बीच कोई भी महामारी कितनी आसानी से फैलती है और किस तरह पूरा देश श्मशान घाट बन जाता है। वर्ल्ड पॉपुलेशन डे इसलिए बनाया जाता है कि इसकी गंभीरता को लोग समझे, जागरूक हो और अपनी सेहत, भविष्य व देश की खुशहाली का ख्याल रखे।

ऐसी कुछ और भी हैं फिल्में ताकि लोग ये समझे के ‘बच्चे एक या दो ही अच्छे’, इसलिए कई फिल्में हेलमेट, छतरी, पोस्टर बॉयज और जन हित में जारी, जागरूक करती हैं, हर उम्र के आदमी-औरत को कि कंडोम खरीदना या उसका उपयोग करना गलत या शर्म की बात नहीं है बल्कि अपने परिवार, अपने समाज, अपने देश के प्रति जिम्मेदारी है, जिसे उठाकर हर देशवासी देश के लिए, दुनिया के लिए, अपना योगदान करे तो ये दुनिया खूबसूरत और बहुत अच्छी बन सकती है, जहां हर जीवन, भुखमरी, बेरोजगारी, लाचारी और बेगारी से निजात पा सकता है। शुरुआत कहीं से भी हो, होगी तो ही बदलाव आएगा।

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