मौन सबसे अच्छा

सभापति वैंकया नायडू ने उन्हें पद की शपथ दिलवाई। बाद में नए सांसदों को जलपान भी सभापति की ओर से करवाया गया।

मौन सबसे अच्छा

ऐसे में कुछ भी बोलकर जोखिम क्यों लेना? हंसी मजाक में कुछ भी बोला गया। तो कहीं ऐसा न हो कि अवसर की संभावनाएं जाती रहें।

मौन रहने का मतलब कई इशारे और संकेत भी। शायद वह हो भी गया। असल में, बीती आठ जुलाई को 27 नवनिर्वाचित राज्यसभा सांसदों ने शपथ ली थी। सभापति वैंकया नायडू ने उन्हें पद की शपथ दिलवाई। बाद में नए सांसदों को जलपान भी सभापति की ओर से करवाया गया। लेकिन स्वभाव के विपरित वैंकया नायडू चुप रहे। ज्यादा कुछ बोले नहीं। जिस पर कई सांसदों को थोड़ा अचरज हुआ। क्योंकि वैंकया नायडू स्वभाव से हंसी मजाक करने वाले। वैसे भी नए सांसदों से घुलने मिलने के लिए तो यह बनता है। लेकिन उस समय वहां मौजूद एक सांसद ने इसे कुछ अलग ही अर्थ में समझा। उपराष्ट्रपति पद का चुनाव नजदीक। ऐसे में कुछ भी बोलकर जोखिम क्यों लेना? हंसी मजाक में कुछ भी बोला गया। तो कहीं ऐसा न हो कि अवसर की संभावनाएं जाती रहें। सो, वैंकया नायडू चुप ही रहे! हालांकि अब राजग के उम्मीदवार की घोषणा हो चुकी। और शायद इसका अंदाजा वैंकया नायडू को रहा भी होगा!

कहां पहुंच गए!

इसमें कोई दो राय नहीं कि शरद पवार महाराष्ट्र की राजनीति के दिग्गज खिलाड़ी। अब तो उन पर तीन बार शिवसेना को तोड़ने के आरोप भी लग रहे। उन्होंने ही 2019 में तीन दलों के एमवीए का गठजोड़ करवाया। लेकिन अचानक सरकार बीच में ही गिर गई। शिवसेना से एकनाथ शिंदे बागी गुट के नेता होकर उभरे। बाद में पवार ने दावा किया। यह सरकार अपने ही मतभेदों में उलझकर जल्दी ही गिर जाएगी। इसी बीच, पवार का नाम राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के रुप में भी चला। लेकिन वह उम्मीदवार बनने के बजाए इसकी चौसर बिछाते हुए नजर आए। इसी बीच, उन्होंने अचानक बीएमसी के चुनाव का राग अलापना शुरू कर दिया। पार्टी कार्यकतार्ओं से कहा, बीएमसी के चुनाव जीतने की तैयारी करो। हालांकि एनसीपी के अभी बीएमसी में एक दर्जन पार्षद भी नहीं। उसके बावजूद पवार अब मुंबई पर फोकस कर रहे। क्या हालत हो गई महाराष्ट्र के दिग्गज की। राष्ट्रपति चुनाव से सीधे गिरकर निगम चुनाव पर आ गए!

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दक्षिण पर नजर!

ऐसा लग रहा। भाजपा उत्तर में अपना सर्वोच्च एवं उत्कृष्ट प्रदर्शन कर चुकी। इसीलिए उसकी नजर दक्षिण पर। कर्नाटक के अलावा अभी तक भाजपा किसी भी अन्य राज्य में ठीक से पैर नहीं जमा सकी। हालांकि तेलंगाना में केसीआर की हरकतें बता रही। भाजपा से उनको कांग्रेस से ज्यादा खतरा नजर आ रहा। इसी प्रकार ज्यों-ज्यों कांग्रेस या वामदल कमजोर होंगे। केरल में भाजपा का दायरा बढ़ेगा। वहीं, आंध्रप्रदेश में अभी जगनमोहन रेड्डी की वायएसआर कांग्रेस का जलवा। चूंकि टीडीपी लगातार गिर रही। लेकिन जगन आड़े वक्त में भाजपा के काम भी आते रहे। ऐसे में फिलहाल भाजपा उन्हें परेशानी में नहीं डालना चाहेगी। लेकिन भाजपा जमीन पर काम चल ही रहा होगा। हां, वह शायद खुलकर सामने नहीं आना चाहती हो। इसी प्रकार तमिलनाडु में भाजपा को एआईएडीएमके की आंतरिक लड़ाई से स्पेस मिल रहा। क्योंकि अम्मा की पार्टी की कलह सड़कों पर। जिससे भाजपा की प्रासंगिकता बढ़ रही। क्योंकि डीएमके के भाजपा पर तीखे हमले बहुत कुछ बयां कर रहे।

सूद समेत !

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महाराष्ट्र में राजनीति अभी बाकी। नई एकनाथ शिंदे सरकार भले ही बन गई। जिसमें डिप्टी सीएम भाजपा के देवेन्द्र फड़नवीस। लेकिन अब नई सरकार का मंत्रिमंडल गठित होने की चर्चा। लेकिन अभी भी एमवीए का भूत पीछा नहीं छोड़ रहा। इस बीच, पिछली सरकार में उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे मंत्री रह लिए। और अब मनसे प्रमुख राज ठाकरे के बेटे अमित ठाकरे को मंत्री बनाए जाने की चर्चा। मतलब भाजपा सूद समेत उद्धव ठाकरे का कर्जा उतारने को आमादा। यहां तक कि फड़नवीस, राज ठाकरे के घर जाकर मिल आए। जिस तरीके से फड़नीवस का राज ठाकरे के घर पर स्वागत हुआ। इसके अपने मायने। हां, उद्धव ठाकरे एवं संजय राउत के बोल बहुत कुछ संकेत बता रहे। चर्चा यह भी कि पीएम मोदी और उनके अमित शाह 2014 से शिवसेना द्वारा किए गए अपमान को भुला नहीं पा रहे। इसीलिए उनका अब जवाब दिया जा रहा। ऐसे में, शिवसेना के पास बिलबिलाने के अलावा कोई विकल्प भी तो नहीं!

हंगामा, भिड़ंत तय!

संसद का मानसून सत्र सोमवार से राष्ट्रपति पद के लिए मतदान के साथ शुरू हो रहा। लेकिन पक्ष-विपक्ष के रवैये से लग रहा। सदन में हंगामा और भिड़ंत के आसार बन रहे। ऐसे में लगता नहीं कि सत्र शांतिपूर्ण ढंग से चलेगा। हालांकि पेगासस मामला पिछले सत्रों में चर्चा में रहा। लेकिन इस बार सत्र के पहले ही पूर्व के आदेश या रवायत टसल का कारण बन रही। पहले बुधवार को असंसदीय शब्दों पर पक्ष-विपक्ष के बीच जमकर बहस हुई। जिस पर खुद लोकसभा अध्यक्ष को भी सफाई देनी पड़ी। वहीं, अगले ही दिन संसद भवन परिसर में धरने, प्रदर्शन पर दोनों पक्षों के बीच अदावत सामने आ गई। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया कि ऐसे आदेश संप्रग सरकार द्वारा भी जारी किए जाते रहे। इसके बावजूद कांग्रेस द्वारा यह मसला उठाया गया। इसी प्रकार नए संसद भवन की छत पर स्थापित किए गए राष्ट्रीय प्रतीक को लेकर हंगामा हो चुका। मतलब कांग्रेस जितनी आक्रामक रहेगी। भाजपा उसे उतना ही चिढ़ाने वाली!

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 परतें उघड़ीं !

राष्ट्रपति पद की राजग प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू की जीत अब महज औपचारिकता बची हुई। लेकिन पीएम नरेन्द्र मोदी की पसंद से विपक्ष की परतें मानो उघड़ सी गईं। राष्ट्रपति पद के लिए उन्होंने एक आदिवासी महिला को चुना। जिसके बाद विपक्ष को जवाब देते नहीं बन रहा। क्योंकि लगभग हर राज्य में वोटों की राजनीति के लिहाज से आदिवासी समाज का अपना एक गणित एवं समीकरण। ऐसे में, विरोध करे भी तो कैसे। इसीलिए जेएमएम, बसपा, शिवसेना, अकाली दल, जद-एस, यहां तक कि ओमप्रकाश राजभर भी द्रौपदी मुर्मू के पक्ष में आ खड़े हुए। उधर, विपक्षी यशवंत सिन्हा के समर्थन में कांग्रेस के अलावा टीएमसी, वामदल, सपा, राजद, एनसीपी, एनसी, डीएमके और आप जैसे दल ही बचे रह गए। हां, टीआरएस की यशवंत सिन्हा को समर्थन देने की मजबूरी। लेकिन ओडिशा की बीजद और आंध्रप्रदेश की वायएसआर कांग्रेस ने विरोध के लिए विरोध के बजाए राजनीतिक समझदारी दिखाई। ऐसे में 2024 के आम चुनाव से पहले विपक्षी एकता के राग की परतें उघड़ गईं।

 

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