जानें इंडिया गेट में क्या है खास

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चर्चा से गायब मायावती!, लाइन पर पवार!, अशगुन तो नहीं?, घुड़की तो नहीं?, भंवर में अखिलेश?

चर्चा से गायब मायावती!

चुनाव सिर पर हो और नेता चर्चा में न हो। तो थोड़ा अटपटा लगेगा। लेकिन आजकल बसपा प्रमुख मायावती पर यह बात लागू हो रही। मानो वह सीन से गायब सी। राजनीतिक गलियारे में उनकी चर्चा ज्यादा नहीं हो रही। जबकि उनके प्रतिद्वंदी सीएम योगी आदित्यनाथ, सपा प्रमुख अखिलेश यादव और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी मैदान में तगड़ी दौड़ धूप कर रहे। लेकिन मायावती अभी तक मैदान में नहीं उतरीं। यहां तक कि गृह मंत्री अमित शाह ने तंज भी कस दिया। कहा, बहन जी आखिर चुनाव हैं। जरा घर से बाहर भी आइए। तो मायावती ने भी उसी अंदाज में जवाब दिया... मेरे कार्यकर्ताओं के पास रैली करने के पैसे नहीं। असल में, दलित वर्ग में जबरदस्त पैठ रखने वालीं बहनजी की गैर मौजूदगी अन्य नेताओं और दलों को भी अखर रही और उन्हें हैरान कर रही। हालांकि अंदरखाने उनकी चुनावी तैयारियां और यूपी के सामाजिक समीकरण साधने की रणनीति पर काम बराबर हो रहा। सोशल इंजीनियरिंग में वैसे भी उन्हें महारथ।


लाइन पर पवार!

महाराष्ट्र में साल 2019 के विधानसभा चुनाव में मराठा क्षत्रप शरद पवार ने भाजपा को करारा झटका दिया था। आखिर इतनी बड़ी रणनीतिक चूक जो हुई थी। रात के अंधेरे में बनी सरकार 80 घंटे भी नहीं चल पाई। पवार ने अपने दांव से सबको चित कर दिया। लेकिन अब पवार बदले-बदले से। पीएम मोदी की तारीफ कर रहे। उन्हें सबसे अलग हटकर मेहनती और काम को अंजाम तक पहुंचाने वाला नेता बता रहे। आखिर पीएम की तारीफ का राज क्या? पवार के करीबी रिश्तेदारों द्वारा कई सहकारी समितियों एवं कंपनियों का संचालन दशकों से हो रहा। तिस पर सीएम ठाकरे बीमार। मुंबई नगर निगम के चुनाव सिर पर। इधर, सरकार में शामिल कांग्रेस का एकला चलो का राग। सो, पवार को पुरानी बातें याद आ रहीं। माना जा रहा। मोदी-शाह ने अबके ठीक से शिकंजा कसा। हजारों करोड़ के सहकारी बैंक और समितियां पर नए मंत्रालय के गठन के बाद नियंत्रण कसने का डर। फिर गठबंधन सरकार की स्थिरता पर हमेशा संशय।

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अशगुन तो नहीं?
कांग्रेस के 136वें स्थापना दिवस पर पार्टी का झंडा क्या गिरा। मानो यह अपशगुन हो गया हो। हालांकि यह मानवीय चूक से ज्यादा कुछ नहीं। शायद संबंधित पार्टी कार्यकर्ताओं ने पूर्व में ठीक से तैयार न की हो। लेकिन इस घटना से एकायक सोनिया गांधी हक्की बक्की रह गईं। हालांकि झंडा नीचे जमीन पर नहीं गिरा। बल्कि सेवादल कार्यकर्ता के कंधे पर जा गिरा। असहज हुई स्थिति को तुरंत संभाला गया। असल में, कांग्रेस का देशभर में लगातार राजनीतिक ग्राफ नीचे गिर रहा। हर राज्य में पार्टी मानो संकट के दौर से गुजर रही। गुटबाजी और अनिश्चितता वाला माहौल। पार्टी शासित राज्यों राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। तो चुनावी राज्य पंजाब में सीएम चरणजीत सिंह चन्नी और पीसीसी चीफ नवजोत सिंह सिद्धू के बीच कुछ न कुछ चल ही रहा। ऐसे में पार्टी की रणनीति प्रभावित होने की संभावना बनी रहती। इसी बीच, स्थापना दिवस पर पार्टी का झंडा गिरना। उसके हितचिंतकों को अपशगुन का संकेत लग रहा।


और कितना नीचे?
कांग्रेस, पीएम मोदी और भाजपा के विरोध में उस पड़ाव तक पहुंच गई। जो किसी भी गतिशील राजनीतिक संगठन की सेहत के लिए ठीक नहीं। जैसे राजधानी दिल्ली में। आप को पार्टी ने 2013 में एक बार समर्थन क्या दिया। कांग्रेस शून्य पर आ गई। फिर आप पंजाब में भी प्रमुख विपक्षी दल बन बैठी। इसी तरह बंगाल में कांग्रेस की हालत दिनोंदिन दयनीय हो रही। अब बात सरवाइवल की नहीं। बल्कि मानो अस्तित्व पर आ रही। हाल ही में कोलकाता नगर निगम के चुनाव में कांग्रेस शून्य पर आ गई। इससे पहले विधानसभा में भी वामदलों के साथ शून्य पर रही। अब राज्य में मुख्य मुकाबला केवल टीएमसी और भाजपा के बीच रह गया। राज्य में कांग्रेस और वामदल करीब 65 साल राज कर चुके। अगर ऐसा ही चलता रहा। तो कांग्रेस कार्यकर्ता के पास विकल्प सिमित ही बचेंगे। इन सबके बावजूद पार्टी नेतृत्व शायद सावचेत नहीं हो रहा। जो बेहद चिंताजनक। क्योंकि अगली बारी त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की। तो आगे क्या उम्मीद बचेगी?


घुड़की तो नहीं?  
हरीश रावत ने कांग्रेस आलाकमान की ऐन चुनावी मौके पर घुड़की देकर मुसीबत बढ़ा दी। उपर से पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली पर ही सवाल। हालांकि एक दिन बाद ही देवभूमि का यह दिग्गज नेता पलटी मार गया। राहुल गांधी से मिलकर गिले शिकवे भी दूर कर लिए। लेकिन जो नुकसान होना था। वह हो गया। असल में, रावत की चाहत चुनाव में फ्रिहैंड की। क्योंकि प्रदेश अभियान समिति के मुखिया की जिम्मेदारी उनके कंधों पर। अब पार्टी का चुनावी चेहरा भी बनने की चाह। पार्टी नेताओं से सहयोग नहीं मिलने की शिकायत सार्वजनिक रुप से कर दी। कांग्रेस अपने इस नेता को खोना नहीं चाहती। क्योंकि देशभर से कई नेता कांग्रेस से किनारा कर रहे। फिर रावत के बहाने भाजपा को बैठे ठाले कांग्रेस को घेरने का मुद्दा मिल गया। जबकि वह खुद कुछ समय के अंतराल में दो सीएम बदल चुकी। मतलब वहां भी सब कुछ ठीक नहीं। लेकिन भाजपा में समय रहते चीजें और हालात दुरुस्त करने में कांग्रेस से ज्यादा चुस्ती।

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भंवर में अखिलेश?

सपा प्रमुख अखिलेश यादव की बयानबाजी से लग रहा। उनके लिए आगे आने वाला समय आसान नहीं। उनके शब्दों की आक्रामकता और बॉडी लैंग्वेज से ऐसा ही प्रतीत हो रहा। विधानसभा चनाव का रण सामने। पिछली बार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन था। तो लोकसभा में बसपा के साथ। हालांकि दोनों ही बार अपेक्षित परिणाम नहीं मिला। लेकिन इस बार चाचा शिवपाल यादव की पार्टी से गठबंधन की नौबत आ गई। मतलब सपा कमजोर हालत में। इसी बीच, अखिलेश के करीबी माने जाने वाले व्यापारियों पर आईटी के ताबड़तोड़ छापे। बड़ी मात्रा में नकदी और सोना-चांदी मिलने की खबरें। घेरा बढ़ता ही जा रहा। जिसे अखिलेश छुपा नहीं पा रहे। जानकार कह रहे। साल 2016 में हुई नोटबंदी ने बसपा को करारा झटका दिया। जिससे वह आज तक नहीं उभर पाई। अबकी बारी सपा की। अखिलेश चारों तरह से भंवर में फंसे हुए नजर आ रहे। आखिर सच क्या? किसी को पता नहीं। लेकिन परसेप्शन की लड़ाई में पिछड़ते दिखाई दे रहे।    -दिल्ली डेस्क

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