भारत में बढ़ती महंगाई और महंगा ऋण

जमा पर ब्याज दर भी तो बढ़ती है

भारत में बढ़ती महंगाई और महंगा ऋण

यदि रेपो दर ओर बढ़ती है, लेकिन जमा पर ब्याज दर भी तो बढ़ती है, जो कि जमाकर्ताओं के लिए एक राहत की बात है। लेकिन व्यवहार में ऐसा हो नहीं रहा है।

यदि रेपो दर ओर बढ़ती है, लेकिन जमा पर ब्याज दर भी तो बढ़ती है, जो कि जमाकर्ताओं के लिए एक राहत की बात है। लेकिन व्यवहार में ऐसा हो नहीं रहा है। ऋण दरें पहले बढ़ती है, लेकिन जमा ब्याज दरें बाद में बढ़ती है। वर्तमान में घरेलू जमाकर्ता भी अधिक उत्साहित नहीं है, क्योंकि स्थाई जमा पर ब्याज दरें घट रही है। केंद्र सरकार ने भविष्य निधि पर ब्याज दर घटाकर 8.1 प्रतिशत कर दी है, डाकघर बचत योजनाओं पर ब्याज दर कम होने की संभावना रहती है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा घोषित मौद्रिक नीति में महंगाई को नियंत्रित करने को प्राथमिकता प्रदान की है तथा इसी दिशा में नीतिगत निर्णय लिए गए हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के लिए महंगाई चिंता का विषय है। एक तरफ  की विकास दर के कम होने के संकेत हैं तो दूसरी तरफ मुद्रास्फीति दर के बढ़ने के संकेत है, जो कि भारत को अप-मुद्रास्फीति की तरफ ले जा रही है। भारतीय रिजर्व बैंक का अनुमान है कि विकास दर 7.2 प्रतिशत अपरिवर्तित रहेगी, लेकिन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 6.7 प्रतिशत रहेगा, जो कि 6 प्रतिशत की सीमा से अधिक होगा । नई मौद्रिक नीति का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय रेपो दर में 0.5 प्रतिशत की वृद्धि का है, जो कि महंगाई को रोकने का नीतिगत निर्णय है तथा देश में व्याप्त तरलता को कम करने में मददगार होगा, जो कि महंगाई का एक कारण माना जाता है। रेपो दर वह दर होती है, जो कि केंद्रीय बैंक व्यापारिक बैंकों से अल्पकालीन ऋण के बदले में वसूलता है जिसमें गत एक माह में 0.9 प्रतिशत की वृद्धि हो गई है तथा इसी अनुपात में रिवर्स रेपो दर वृद्धि हुई है, जो कि व्यापारिक बैंक अपने तरल कोषों को रिजर्व बैंक में रखने के बदले में प्राप्त करता है।

रेपो दर में वृद्धि का तत्काल प्रभाव यह होता है कि बैंकों से ऋण लेना महंगा हो जाता है तथा वर्तमान में लिए गए निर्णय अधिक ब्याज चुकाना होता है। बैंक ब्याज दरों को बढ़ाने में देरी नहीं करते हैं। सार्वजनिक एवं निजी बैंकों ने भी अपनी ऋण ब्याज दरों को 0.5 प्रतिशत से तत्काल बढ़ाने का निर्णय लिया है। बैंकों द्वारा दिए गए ऋणों की तीन प्रकार की दरें होती हैं। बैंकों द्वारा दिए गए ऋणों का लगभग 40 प्रतिशत ऋण ईबीएलआर पर आधारित है तथा 30 प्रतिशत सीमांत लागत तथा शेष 30 प्रतिशत स्थाई दर पर आधारित है। खुदरा एवं लघु तथा मध्यम उद्योगों को ऋण ईबीएलआर पर दिए जाते हैं। निगमों को सीमांत लागत पर दिए जाते हैं। सभी प्रकार के ऋणों में 0.9 प्रतिशत की वृद्धि हो गई है। ऋण ब्याज दरों में वृद्धि का असर यह हुआ है कि कार्यशील पूंजी, खुदरा, उपभोक्ता, ग्रह एवं ऑटो ऋण लेना तत्काल प्रभाव से महंगा हो गया है, जो कि उपभोक्ताओं की ऋण उठाव क्षमता को प्रभावित करेगा तथा उनकी मासिक ऋण पर ब्याज की किस्तों में वृद्धि हो जाएगी। आजकल अधिकांश ऋण परिवर्तित ब्याज दरों पर आधारित हो गया है, जो कि स्वत: है ईएमआई में वृद्धि कर देते हैं। उपभोक्ता के पास यह विकल्प होता है या तो वह पुन: भुगतान अवधि को बढ़ाए या अधिक ईएमआई दे।

खुदरा उपभोक्ता ऋण एवं गृह एवं आटो ऋण महंगे होने से इनसे संबंधित उत्पादों की मांग प्रभावित होगी तथा निवेश में भी गिरावट आएगी। इस समय जो अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजार में उथल-पुथल एवं अनिश्चितता तथा जोखिम का माहौल व वातावरण चल रहा है। पूंजी व मुद्रा बाजार भी उथल-पुथल का शिकार है। अंतरराष्ट्रीय व घरेलू निवेशक कोषों का आवागमन तेजी से करते हैं तथा स्थिरता एवं वृद्धि खतरे में रहती है। उत्पादक एवं ऋण प्रदान करने वाली कंपनियां एवं निवेश सभी के निर्णय पर रेपो दर में हुए परिवर्तन का प्रभाव पड़ता है। महंगाई एक महत्वपूर्ण कारण है, ऋण उठाव क्षमता में कमी करने का।  इन कंपनियों के पास मांग को बनाए रखने का एक विकल्प है, अधिक आकर्षित बट्टा दरें तथा ऑफर। यदि रेपो दर ओर बढ़ती है, लेकिन जमा पर ब्याज दर भी तो बढ़ती है, जो कि जमाकर्ताओं के लिए एक राहत की बात है। लेकिन व्यवहार में ऐसा हो नहीं रहा है। ऋण दरें पहले बढ़ती है, लेकिन जमा ब्याज दरें बाद में बढ़ती है। वर्तमान में घरेलू जमाकर्ता भी अधिक उत्साहित नहीं है, क्योंकि स्थाई जमा पर ब्याज दरें कम रही है। केंद्र सरकार ने भविष्य निधि पर ब्याज दर कम होकर 8.1 प्रतिशत कर दी है, डाकघर बचत योजनाओं पर ब्याज दर कम करने की संभावना रहती है। इसका सबसे ज्यादा नुकसान सीनियर सिटीजन एवं पेंशन धारकों को उठाना पड़ता है।

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बैंकों द्वारा देय जमाओं पर ब्याज दरों एवं सरकारी बांड्स में निवेश पर ब्याज दरों में 0.9 प्रतिशत से 1.5 प्रतिशत तक का अंतर है, जो कि सर्वाधिक हैं, लेकिन बांड्स में निवेश का लॉक इन समय होता है, जो कि कम से कम 3 वर्ष का होता है, उससे पहले किसी भी कीमत पर पैसा नहीं निकाला जा सकता है, जबकि बैंकों की स्थाई जमा तरलता बनी रहती है। परिपक्वता पूर्व निकासी का प्रावधान रहता है पेनल्टी के कारण ब्याज दर कम हो जाती है। यह अंतर कम हो तो घरेलू बचत कर्ता के लिए राहत की बात होगी। ब्याज दरें निर्णायक आधार होती है चाहे निवेश किया जाए या बचत।             

- डॉ. सुभाष गंगवाल
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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