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अब केसीआर!...

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को तेलंगाना के सीएम के चंद्रशेखर राव के रुप में अब एक और कट्टर विरोधी मिल गया। वैसे इस मसमे में कांग्रेस के अलावा टीएमसी की ममता दीदी सबसे आगे। इस सूची में शिवसेना, डीएमके, लेफ्ट पार्टी समेत कई दल एवं नेता भी। केसीआर सितंबर 2016 को भारतीय सेना द्वारा पाक में की गई सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर सबूत मांग लिए। माजरा दिलचस्प। असल में, यह केसीआर की शुद्ध रुप से भाजपा से राजनीतिक अदावत। जब से हुजूराबाद उपचुनाव केसीआर की पार्टी हारी। वहां टीआरएस के बागी एटाला राजेन्द्र जीते। उन्हें केसीआर ने हटाया था। साथ में, आम चुनाव में खुद की बेटी की हुई हार को वह पचा नहीं पा रहे। राज्य में भाजपा तेजी से आगे बढ़ रही। जिस प्रकार से हैदराबाद नगर निगम चुनाव में भाजपा ने टीआरएस को चुनौती दी। उससे केसीआर बैचेन। फिर कांग्रेस से उनकी पुरानी अदावत। लेकिन अब उनकी चाहत नए प्रतिद्वंदी के रुप में टीडीपी के बजाए भाजपा। सारी कवायद इसी बात की।

‘रीट’ का बढ़ता दायरा?
‘रीट’ में हुई धांधली के विरोध का दायरा लगातार बढ़ रहा। जिससे सरकार में बैचेनी। भाजपा पुरजोर इसे जनता का मुद्दा बनाने पर तुली हुई। इसीलिए विधानसभा में सारा कामकाज एक तरफ रखकर दो घंटे से ज्यादा इस पर चर्चा भी करवा ली। भाजपा इसे एक कदम आगे बढ़ने के रुप में ले रही। अब तो पूर्व सीएम राजे ने भी सरकार से जवाब मांग लिया। दूसरी ओर, राज्य सरकार में अभी कुछ और राजनीतिक नियुक्तियां बाकी। इसीलिए जिन्हें प्रसाद नहीं मिला। वह भी शांत। लेकिन बात ‘रीट’ की। सरकार को जो जमीन से फीड बैक मिल रहा। वह कम से कम सरकार की सेहत के लिए ठीक नहीं। आखिर 26 लाख परीक्षार्थियों के रोजगार से जुड़ा मामला। जिसे भाजपा समझ रही। शानदार एवं ज्वलंत मुद्दा हाथ लगा। ऐसे में बीच में कैसे छोड़ दे? किसान कर्जमाफी, कानून व्यवस्था तो पहले से चल रहे। इस बीच, बीते मंगलवार को भाजपा ने विधानसभा का घेराव कर आगे के इरादे तो जता दिए।


यूपी के संकेत!
यूपी में तीन चरणों का मतदान हो चुका। विभिन्न दलों के नेताओं की बॉडी लैंग्वेज बहुत कुछ बता रही। राज्य में 136 सीटों वाले पश्चिमी यूपी का खासा महत्व। यहां जाट, मुस्लिम एवं दलित मतदाता अच्छी खासी संख्या। साथ में समीकरण भी विशेष। ऐसे में जो संकेत मिल रहे। उसमें जहां भाजपा इस बात को लेकर सुकुन में, कि नुकसान होगा। लेकिन उतना भी नहीं, जितना बताया गया। वहीं, सपा को बसपा का डर। बसपा ने बहुत ही सोच समझकर जातिगत समीकरण साधे। इसीलिए बहनजी शांत। बसपा के कैडर ने सपा को चोट पहुंचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। फिर आवैसी की पार्टी भी सपा की तकलीफ बढ़ा रहे। अब जयंत चौधरी का भी रोल खत्म। क्योंकि रालोद का पश्चिमी यूपी में ही असर। ऐसे में, उनको लेकर जो चर्चाएं हो रहीं। उन पर भी विराम। उनके परिणाम बाद भाजपा में जाने की चर्चा। जिसे वह लगातार खारिज करते रहे। लेकिन भाजपा उन पर डोरे डालती रही। अब इंतजार दस मार्च का।


ट्विस्ट पर ट्विस्ट!
पंजाब में मतदान हो चुका। लेकिन अंत तक ट्विस्ट पर ट्विस्ट आते रहे। सबसे आखरी में कुमार विश्वास का दावा। कहा, केजरीवाल बहुत महत्वाकांक्षी। जोश में कह बैठे या तो सीएम बनेंगे। नहीं तो एक आजाद देश के पीएम बनेंगे। इससे पहले प्रियंका गांधी की मौजूदगी में सीएम चरणजीत सिंह चन्नी यूपी, बिहार वालों के लिए ऐसा बोल गए कि कम से कम चुनावी माहौल तो कसैला हो जाएगा। कांग्रेस को अब अश्विनी कुमार भी अलविदा कह गए। सुलील जाखड़ पार्टी नेतृत्व से उखड़े हुए। खुद को राजनीति में असक्रिय कर लिया। मतलब पंजाब की चुनावी राजनीति में मतदान होने तक कुछ न कुछ नया होता ही रहा। सारा डर इसी बात का। पंजाब, पाक से सटा हुआ सीमावर्ती प्रदेश। बहुत संवेदनशील मामला। फिर चुनाव का माहौल। कहा जा रहा, खालिस्तानी इस समय ज्यादा सक्रिय। फिर एक आशंका लगातार बलवती हो रही। अगली विधानसभा त्रिशंकु होने की संभावना। मतलब लोग पिछली स्मृतियों से डर रहे। इसीलिए खुलकर बोलने से भी कतरा रहे।


वटवृक्ष याद आया!
कहते हैं सबसे ज्यादा मुसीबत में वही याद आता है। जो आपका सबसे ज्यादा हितैषी हो। सपा प्रमुख अखिलेश यादव की जब राजनीतिक जमीन हिलने लगी। तो पार्टी संरक्षक मुलायम सिंह यादव याद आए। अखिलेश करहल से चुनावी मैदान में। जहां उनके सामने केन्द्रीय मंत्री एसपी बघेल। चर्चा यह कि अखिलेश चुनाव में भाजपा से घिरे हुए। ऐसे में अंतिम समय में पिताजी को मंच बैठा दिया और अपने लिए वोट भी मंगवा लिए। यह वही अखिलेश। जिन्होंने पांच साल पहले सपा और परिवार में मची रार के चलते मंच पर ही मुलायम सिंह से अच्छा व्यवहार नहीं किया। तब सत्ता के मद में अखिलेश पूरे रंग और रौ में थे। उन्हें कुछ भी सूझ नहीं रहा था। जबकि मुलायम सिंह उन्हें लगातार सार्वजनिक मंचों से ताकीद करते हुए नजर आते थे। सो, अखिलेश को अब चुनावी मौके पर पार्टी और राजनीति के वटवृक्ष याद आए। आखिर पिता से बड़ा आपका हितैषी भी कौन होगा? फिर राजनीतिक और चुनावी मजबूरी भी यही।


बोराए ट्रुडो?
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो ऐसी हरकतें कर रहे। मानो बोराए हुए। भारत से अदावत पाल रहे। पहले भी उन्होंने किसान आंदोलन के समर्थन में राजनयन की सारी मयार्दाएं लांघकर अनावश्यक एवं अनर्गल बयानबाजी की। अब फिर से वह सनातनी पंरपरा के प्रतीक स्वास्तिक को नाजीवाद के प्रतीक से जोड़ने की कोशिश कर रहे। जबकि भारतीय परंपरा में सदियों से स्वास्तिक शुभ एवं समृद्वि का प्रतीक। लेकिन ट्रुडो इसमें भी ट्वीस्ट कर रहे। असल में, ट्रुडो सरकार स्वास्तिक पर प्रतिबंध लगाने के लिए विधेयक लाई है। इसने आम जनता एवं विपक्ष को नाराज कर दिया। कनाडाई सरकार स्वास्तिक की तुलना हेकेनक्रेज से कर रही। जिसका उपयोग हिटलर के समय जर्मनी में नाजियों द्वारा किया जाता था। असल में, ट्रुडो जनता का ध्यान बंटाते हुए नजर आ रहे। वह ट्रक चालकों के प्रदर्शन का सामना नहीं कर पा रहे। देश में हड़तालियों के चलते आपातकाल अलग से लगा दिया। फिर भी लोकतंत्र की दुहाई अ‍ैर खुद को भी लोकतांत्रिक बताने का ढोंग कर रहे।

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