कर्नाटक कांग्रेस में बढ़ती अंदरूनी कलह

दोनों गुट हार का ठीकरा एक दूसरे पर फोड़ने लगे

कर्नाटक कांग्रेस में बढ़ती अंदरूनी कलह

लोकसभा चुनावों के दौरान सिद्दारमैया ने दावा किया था कि नई सरकार ने  एक साल में इतना अच्छा काम किया है कि पार्टी सभी 28 लोकसभा सीटें जीतने की स्थिति में है

कर्नाटक में लोकसभा के चुनावों में आशा से बहुत कम सीटें आने के बाद सत्तारूढ़ कांग्रेस में आन्तरिक कलह बढ़ गई है। राज्य में मोटे तौर पर दो गुट हैं। एक गुट मुख्यमंत्री सिद्दारमैया का तथा दूसरा गुट उपमुख्यमंत्री तथा प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष डी के शिवकुमार का।
गत वर्ष मई में हुए विधानसभा चुनावों में  कांग्रेस को कुल 224 सीटों में से 135 सीटें मिली थीं। पार्टी बीजेपी को पराजित कर सत्ता में आई थी। लोकसभा चुनावों के दौरान सिद्दारमैया ने दावा किया था कि नई सरकार ने  एक साल में इतना अच्छा काम किया है कि पार्टी सभी 28 लोकसभा सीटें जीतने की स्थिति में है , लेकिन माना जा रहा था कि पार्टी कम से कम 20 सीटें तो जरूर जीत सकेगी।  पिछले लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने 28 में से 26 सीटों पर अपनी जीत दर्ज की। कांग्रेस को केवल एक सीट पर ही  सब्र करना पड़ा था। उन चुनावों में कभी कांग्रेस के साथ रही पार्टी जनता दल (स) को एक सीट मिली थी। इस बार बीजेपी और जनता(स) ने मिलकर चुनाव लड़ा था। इस गठबंधन को कुल 19 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस को 9 सीटें लेकर संतोष करना पड़ा।
इस हार के बाद कांग्रेस पार्टी में आन्तरिक कलह खुल कर सामने आ गई। दोनों गुट हार का ठीकरा एक दूसरे पर फोड़ने लगे। विरोधी गुट ने इस हार के लिए सिद्दारमैया को जिम्मेदार ठहराया। जबकि सिद्दारमैया गुट कहना था कि हार की जिम्मेदारी संगठन की भी है, जिसके मुखिया   शिवकुमार हैं। सच्चाई यह है कि चुनाव के दौरान दोनों गुटों में सामंजस्य नहीं था। गुटबंदी के चलते जीत सकने वाले कई पार्टी नेताओं को टिकट नहीं मिला। चुनाव परिणाम सामने आने के बाद शिवकुमार गुट ने मुख्यमंत्री पर सीधा हमला कर दिया। शिवकुमार राज्य के प्रभावशाली वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं। इस समय वे इस समुदाय के एकमात्र और निर्विवादित नेता हैं। राज्य की जातिवादी राजनीति में समुदायों के संत और महंत बड़ी भूमिका निभाते हैं। शिवकुमार को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से कुछ दिन पहले वोक्कालिगा समुदाय के संतों का एक बड़ा सम्मलेन आयोजित किया गया। इसमें यह मांग की गई कि पार्टी नेतृत्व को बदलकर शिवकुमार को मुख्यमंत्री का पद दिया जाना चाहिए।
इसका तुरंत उत्तर देते हुए सिद्दारमैया ने कहा कि वे राज्य के निर्वाचित मुख्यमंत्री हैं। उन्हें  किसी ने नामजद नहीं किया है। वे अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे। 
सिद्दारमैया पिछड़े वर्ग से आते हैं। जिन्हें स्थानीय भाषा में अहिन्दा कहा जाता है। अब बारी अहिन्दा नेताओं की थी। उन्होंने एक बयान जारी कर कहा कि सिद्दारमैया को किसी भी सूरत में उनके पद से नहीं हटाया जाना चाहिए। सिद्दारमैया और शिवकुमार की अदावत पुरानी है। विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले जब शिवकुमार को राज्य में पार्टी का मुखिया बनाया गया था, तो सिद्दारमैया ने इसका विरोध किया था। उस समय  शिवकुमार गांधी परिवार के बहुत निकट थे। इसलिए वे राज्य पार्टी के मुखिया बनने में सफल रहे। वे न केवल राज्य कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता हैं, बल्कि एक कुशल संगठक भी हैं। पार्टी के नेताओं का एक बड़ा वर्ग मानता है कि  विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की जीत का ज्यादा श्रेय  उन्हीं को जाता है। जीत के बाद मुख्यमंत्री पद के वे एक बड़े दावेदार थे, लेकिन कुछ अन्य कारणों से कांग्रेस हाई कमान ने सिद्दारमैया को मुख्यमंत्री  बनाया गया।
शिवकुमार  को  उपमुख्यमंत्री का पद दिया गया। उन्हें उनकी पसंद का और महत्वपूर्ण विभाग भी उन्हें दिया गया। इसके साथ यह भी तय हुआ लोकसभा चुनावों तक शिवकुमार राज्य कांगेस पार्टी के मुखिया बने रहेंगे। यह भी तय हुआ कि मुख्यमंत्री सभी बड़े फैसले शिवकुमार की सहमति से ही करेंगे। यह भी साफ कर दिया गया कि शिवकुमार लोकसभा का चुनाव होने तक कांग्रेस के मुखिया भी बने रहेंगे। यानी लोकसभा चुनाव उनके नेतृत्व  में लड़ा जाएगा। उन दिनों यह भी चर्चा  थी कि ढाई साल बाद शिवकुमार को मुख्यमंत्री का पद दे दिया जाएगा। ऐसा माना जाता है कि शिवकुमार के समर्थक कांग्रेस आला कमान पर यह दवाब बना रहे है कि राज्य सरकार के नेतृत्व में परिवर्तन को जल्दी से जल्दी अंजाम दे दिया जाए। जिस ढंग से दोनों गुट एक दूसरे के आमने सामने  खड़े हैं, उसको  देखते हुए लगता है कि जंग अभी और तेज होगी।

-लोकपाल सेठी
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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