जब डाकिए की घंटी से खिल उठते थे चेहरे : रिश्तों की गर्माहट का अहसास कराने वाली चिट्ठी बनी इतिहास, मैसेज में खो गया अपनापन

गांवों में अक्सर पढ़ा-लिखा व्यक्ति दूसरों की पढ़कर सुनाता था चिट़्ठियां

जब डाकिए की घंटी से खिल उठते थे चेहरे : रिश्तों की गर्माहट का अहसास कराने वाली चिट्ठी बनी इतिहास, मैसेज में खो गया अपनापन

मोबाइल और सोशल मीडिया के दौर में हाथों से लिखी चिट्ठियों की आत्मीयता कहीं खोती दिख रही है। समाजसेवी डॉ. हरिमोहन पुरवार ने कहा, कभी पोस्टमैन खुशियों का संदेशवाहक होता था और चिट्ठियां रिश्तों की गर्माहट समेटे रहती थीं। वरिष्ठ पत्रकार संजय श्रीवास्तव बोले, तकनीक जरूरी है, लेकिन संवाद में भावनाओं और अपनापन बचाए रखना भी उतना ही अहम है।

जालौन। एक समय था, जब घर के बाहर पोस्टमैन की साईकिल की हल्की-सी घंटी सुनते ही लोगों के चेहरे खिल उठते थे।  उस दौर में चिट़्ठिया केवल कागज के टुकड़े नहीं होती थीं, बल्कि रिश्तों की गर्माहट और भावनाओं की धड़कन हुआ करती थीं। वरिष्ठ समाजसेवी डॉ. हरिमोहन पुरवार ने कहा कि आज मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया के युग में संदेश पलभर में पहुंच जाते हैं। वीडियो कॉल और मैसेजिंग एप ने संवाद को बेहद आसान बना दिया है, लेकिन हाथों से लिखी चिट़्ठियों में जो आत्मीयता और अपनापन होता था, वह अब कहीं खोता जा रहा है।  उन्होंने कहा कि पहले लोग कम बोलते थे, लेकिन रिश्तों में गहराई अधिक होती थी। चिट़्ठियों की शुरुआत अक्सर यहां सब कुशल है, आपकी कुशलता की ईश्वर से कामना करते हैं, जैसे शब्दों से होती थी, जिनमें प्रेम, संस्कार और सम्मान झलकता था। आज के छोटे संदेश और इमोजी उस भावनात्मक सुकून को नहीं दे पाते, जो कभी पत्रों से मिलता था। पुरवार ने बताया कि पुराने समय की चिट़्ठियां अपने भीतर पूरा जीवन समेटे रहती थीं। मां बेटे को समय से भोजन करने की सीख देती थी, पिता मेहनत और अनुशासन का संदेश लिखते थे। लोग डाकिए के आने का समय तक ध्यान रखते थे और कई दिनों तक पत्र आने पर बेचैन हो उठते थे।

उन्होंने कहा कि उस दौर में डाकिया केवल सरकारी कर्मचारी नहीं, बल्कि खुशियों और उम्मीदों का संदेशवाहक होता था। नौकरी लगने की खबर, परीक्षा में सफलता या दूर रह रहे बेटे का हाल-सब कुछ उसी के जरिए घर तक पहुंचता था। गांवों में अक्सर कोई पढ़ा-लिखा व्यक्ति दूसरों की चिट़्ठियां पढ़कर सुनाता था। कई अनपढ़ लोग भी उन पत्रों को छूकर अपनों की मौजूदगी महसूस करते थे। परिवार के सदस्य एक ही पत्र को कई-कई बार पढ़ते थे और मां उन्हें संदूक में संभालकर रखती थी।

पुरवार ने कहा कि चिट़्ठियां केवल संवाद का माध्यम नहीं थीं, बल्कि संस्कारों की पाठशाला भी थीं। पत्रों के अंत में माताजी-पिताजी को चरण स्पर्श, छोटों को प्यार जैसे शब्द भारतीय संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों की झलक देते थे। वरिष्ठ पत्रकार संजय श्रीवास्तव ने कहा कि आज सब कुछ मोबाइल की छोटी-सी स्क्रीन में सिमट गया है। संदेश आते हैं और कुछ ही क्षणों में मिट भी जाते हैं। तकनीक ने जीवन को आसान जरूर बनाया है, लेकिन रिश्तों की गर्माहट कम होती महसूस हो रही है।  उन्होंने कहा कि समय और साधन बदलते रहते हैं, लेकिन भावनाओं का महत्व कभी कम नहीं होना चाहिए। आधुनिक जीवन में भी रिश्तों की मिठास बनाए रखने के लिए संवाद में संवेदनाओं को जीवित रखना जरूरी है। कभी-कभी अपने हाथों से लिखे कुछ शब्द किसी महंगे उपहार से भी अधिक खुशी दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि भले ही आज चिट़्ठियां कम हो गई हों, लेकिन उनकी खुशबू अब भी लोगों में बरकरार है और यही एहसास कराती है कि सच्चा संवाद वही होता है, जिसमें केवल शब्द नहीं बल्कि भावनाएं भी शामिल हों।

 

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