सीएम रहते दो सीट से चुनाव हारे, लेकिन किशनगढ़ से उपचुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बने थे जयनारायण व्यास
1989 में जब सीएम के शपथ के लिए जोशी राजभवन में करते रहे इंतजार, लेकिन राज्यपाल बाहर नहीं आए
ब्यूरो/नवज्योति, जयपुर। राजस्थान में राजनीतिक इतिहास में कई बार चौकाने वाले फैसले भी हुए है। अर्थात पहले विधानसभा के आमचुनाव में मुख्यमंत्री रहते जयनारायण व्यास ने जोधपुर-बी और जालौर-ए सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन दोनों ही जगहों से चुनाव हार गए। वहीं इसके विपरित टीकाराम पालीवाल महुआ और मलारनाचौड दो जगहों से चुनाव जीते और मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन कुछ समय बाद ही व्यास अजमेर की किशनगढ़ सीट से उपचुनाव में विजयी होकर आए और एक नवंबर 1952 को मुख्यमंत्री बने, तो पालीवाल भी 8 जनवरी 1954 को इसी मंत्रिमण्डल में पुन: शामिल हुए। इसके बाद व्यास बहुमत साबित नहीं कर सके और मोहनलाल सुखाड़िया सीएम बन गए और उन्होंने 13 नवंबर 1954 को अपने मंत्रिमण्डल का गठन किया।
1956 में अजमेर का विलय
एक नवंबर 1956 को अजमेर का राजस्थान में विलय हो गया, इसके बाद कांग्रेस विधायक दल के नेता का फिर से चुनाव हुआ। इसमें सुखाड़िया फिर से नेता चुन लिए गए। 1957 के आमचुनाव तक विधानसभा की सदस्य संख्या 190 रही, लेकिन बाद में विधानसभा क्षेत्रों का पुनर्सीमांकन किया गया, जिसके फलस्वरूप यह संख्या घटकर 176 रह गई। द्वितीय विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पांच प्रत्याशी निर्विरोध निर्वाचित हो गए। चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस के विधायक दल के नेता पद के लिए सुखाड़िया और टीकाराम पालीवाल के बीच मुकाबला हुआ, जिसमें सुखाडिया जीते और मुख्यमंत्री बने।
पांच मंत्रियों ने कैबिनेट से दिया था इस्तीफा
विधानसभा के चौथे आम चुनाव से पूर्व कुंभाराम आर्य ने रामकिशोर व्यास से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में पराजित हो जाने तथा मुख्यमंत्री सुखाडिया के साथ तीव्र मतभेद हो जाने के कारण हरिश्चन्द्र सिंह झालावाड़, भीमसिंह मंडावा, कमला बेनीवाल और दौलतराम सारण के साथ 27 दिसंबर 1966 को न केवल राज्य मंत्रिमंडल से त्याग पत्र दे दिया, बल्कि पांच नेताओं ने कांग्रेस दल से भी संबंध विच्छेद कर लिया। यह मंत्रिमण्डल चतुर्थ आमचुनाव के बाद 13 मार्च 1967 को राज्य में राष्टÑपति शासन लागू होने तक कार्यरत रहा।
गोली चलने के बाद सीएम बनने से इनकार
1967 के चुनाव में दामोदर व्यास तो टोंक और मालपुरा दोनों सीटों से जीत गए, लेकिन कांग्रेस को बहुमत नहीं मिल सका। तत्कालीन राज्यपाल डॉ. संपूर्णानंद ने बडेÞ दल के नाते सुखाड़िया को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। इसका विपक्षी दलों ने विरोध किया और जौहरी बाजार में विरोध को शांत करने के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ी। इसमें कुछ लोगोंं की मौत भी हुई, इस पर सुखाड़िया ने सरकार बनाने से इंकार कर दिया और राष्टÑपति शासन लग गया। इसके 44 दिन बाद फिर से सुखाडिया ने सीएम की शपथ ली।
एमपी से राज्यसभा सदस्य होते बने सीएम
1977 के चुनाव में जनता पार्टी की भारी सफलता के बाद भैरोसिंह शेखावत ने 22 जून 1977 को राज्य के प्रथम गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश की बागडौर संभाली। उस समय शेखावत एमपी से राज्यसभा सदस्य थे, जो बाद में छबड़ा से उपचुनाव जीतकर सदस्य बने। जनवरी 1980 में लोकसभा के मध्यावधि चुनावों के पश्चात केन्द्र में पुन: सत्तारूढ़ होने वाली कांग्रेस ने 18 फरवरी 1980 को शेखावत की सरकार को बर्खास्त कर विधानसभा भंग कर दी और राष्टÑपति शासन लागू कर दिया।
बरकतुल्ला खां के निधन के दिन ही जोशी बने सीएम
11 अक्टूबर 1993 को बरकतुल्ला खां का आकस्मिक निधन हो जाने के बाद हरिदेव जोशी को उसी दिन मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई गई। 29 अप्रैल 1977 को जोशी की सरकार को देश में चल रही आपात स्थिति की समाप्ति के बाद राष्टÑपति शासन लागू कर दिया गया। प्रदेश में इस प्रकार दूसरी बार राष्टÑपति शासन लागू किया गया।
केन्द्र में मंत्री रहते बने मुख्यमंत्री
पांच जून 1980 को कांग्रेस विधायक दल की बैठक में जगन्नाथ पहाड़िया को नेता चुना गया और 6 जून 1980 को मुख्यमंत्री की शपथ ली। पहाड़िया उस दौरान बयाना से लोकसभा सदस्य थे और केन्द्र में वित्त राज्यमंत्री थे। बाद में वैर से उपचुनाव जीतकर विधानसभा सदस्य बने। आंतरिक विरोध के चलते 12 जुलाई 1981 को पहाड़िया ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद शिवचरण माथुर सीएम बने, लेकिन 21 फरवरी 1985 को डीग में चुनाव के दौरान निर्दलीय प्रत्याशी राजा मानसिंह की पुलिस की गोली से मौत होने के बाद माथुर ने त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद हीरालाल देवपुरा को सीएम बनाया गया।
आमेर और निम्बाहेडा से जीते भैरोसिंह शेखावत
1985 के आम चुनाव में भाजपा नेता भैरोसिंह शेखावत ने आमेर और निम्बाहेडा दो सीटों से चुनाव लड़ा और दोनों से जीते, लेकिन भाजपा को 37 सीटे ही मिली और कांग्रेस के हरिदेव जोशी ने दूसरी बार सीएम की कुर्सी संभाली। कांग्रेस आलाकमान के निर्देश पर जोशी ने 18 जनवरी 1988 को त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद शिवचरण माथुर ने सीएम की कुर्सी संभाली। इसके बाद लोकसभा चुनाव में हार के चलते माथुर ने इस्तीफा दे दिया।
शपथ का इंतजार करते रहे राज्यपाल नहीं आए
शिवचरण माथुर के 1989 के त्यागपत्र के बाद हरिदेव जोशी 3 दिसंबर 1989 को कांग्रेस विधायक दल के नेता चुने गए और उसी दिन राज्यपाल की ओर से शपथ ग्रहण के लिए आमंत्रित कर लिया गया। जोशी अपने मंत्रिमंडल में मनोनीत दस मंत्रियों की टीम के साथ प्रचलित परंपरा के अनुसार प्रदेश कांग्रेस कार्यालय से तिलक लगवाकर निर्धारित समय पर राजभवन पहुंच गए। लेकिन राज्यपाल बाहर ही नहीं आए और आखिर में मुख्य सचिव ने माइक पर कहा कि किन्हीं अपरिहार्य कारणों के चलते कार्यक्रम स्थगित किया जाता है। इसके बाद अगले दिन शपथ ग्रहण करवाई गई।

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